डॉ हाराधन कोईरी
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसे-जैसे अयोध्या नगरी के नवनिर्मित श्रीराम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के दिन नजदीक आते जा रहे हैं। वैसे- वैसे विभिन्न अखबारों,पत्र-पत्रिकाओं एवं अन्य जन माध्यमों में श्रीराम पर विशेष सामग्री प्रस्तुत की जा रही है जिससे जनमानस को राम की भव्यता, दिव्यता और शुभ्रता को अनुभव करने में सहूलियत हो रही है।
भारतीय साहित्य में राम का चरित्र भरा पूरा है। सभी कवि अपनी काव्यात्मक प्रतिभा से राम के शील,शक्ति और सौंदर्य को अपने अपने ढंग से देखने,समझने का प्रयास किया है। कविवर निराला ने भी राम की शक्ति पूजा के माध्यम से राम को नये भाव-बोध के साथ के देखने का प्रयास किया है। उन्होंन राम को युगीन संवेदना के अनुकूल पूरी तरह से समय-सापेक्ष और मानवीय धरातल पर खड़ा किया है। निराला के राम सामान्य मनुष्य की तरह विषम परिस्थित में दुखी एवं निराश होते हैं। यथा -
मित्रवर, विजय होगी न समर
अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति! कहते छल-छल
हो गये नयन, कुछ बूंद पुन: ढलके दृगजल।
रावण के साथ युद्ध करने के क्रम में जब पहली बार राम को कठिन परिस्थित का एहसास होता है,तब उनका मन कौंधने लगता है और वे कहते हैं -
है अमानिशा उगलता गगन घन अंधकार
खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन-चार।
निराला के राम तुलसी के राम जैसे निर्विकार नहीं है। उनका एक रूप आधिदैविक है और दूसरा सहज मानवीय। कविवर निराला इस ओर इशारा करते हुए लिखते हैं-
स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय अर्थात वे जितने दृढ़ चेता हैं,उतने ही शंकालु भी। पूरी कविता में राम की इसी आशा-निराशा के द्वंद्व को दिखाया गया है। राम को उदास देख विभीषण इसका कारण पूछते हैं। राम मंद स्वर में उत्तर देते हैं कि समर में हमें विजय न मिलेगी। यह नर-वानर का राक्षस से युद्ध नहीं रहा। रावण के आमंत्रण पर महाशक्ति उसकी सहायता के लिए उतरी हैं। यह कहते-कहते राम के नेत्र छलछला उठते हैं।
जाम्बवान उन्हें धैर्य देते हुए कहते हैं कि आप भी आराधना का उत्तर दृढ़ आराधना से दीजिए और शक्ति का पूजन कीजिए। जब तक सिद्धि की प्राप्ति न हो जाए तब तक युद्ध छोड़ दीजिये। तब तक युद्ध का संचालन अन्य वीर करते रहेंगे। सुग्रीव आदि एक स्वर से इस सुझाव का समर्थन करते हैं। राम तत्काल ही शक्ति की आराधना करने लगते हैं। वे हनुमान को देवीदह नामक सरोवर से जाकर एक सौ आठ कमल पुष्प ले आने का आदेश देते हैं।
हनुमान प्रभात से पूर्व ही कमल फूल ले आते हैं। रात्रि का अवसान होता है। सूर्य की प्रथम किरण फूटती है। युद्ध भूमि में कोलाहल होने लगता है किन्तु राम मन को एकाग्र किए आराधना में मग्न हैं। इसी प्रकार पांच दिन बीत गए। छठे दिन उनका मन आज्ञाचक्र पर पहुंच गया। भगवती को कमल पुष्प अर्पित करते हुए राम एक ही आसन पर अडिग बैठे रहे।
आठवें दिन एक इंदीवर शेष रह गया और मन सहस्रार को पार करने की प्रतीक्षा करने लगा है। तब दो पहर रात बीतने के बाद साक्षात् भगवती दुर्गा राम की परीक्षा लेने के लिए पूजा का अन्तिम पुष्प उठा ले गयीं। हाथ बढ़ाने पर राम को जब फूल न मिला तो उनका हृदय अस्थिर हो उठा। आसन छोड़ने से असिद्धि होगी यह सोच वे अपने को धिक्कारने लगे-
धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी ! हाय,उद्धार,प्रिये का हो न सका। तभी उनके मन में विचार आया कि बचपन मेरी मां मुझे कमल नयन कहती थीं, ऐसा सोच कर जैसे ही अपने दक्षिण नेत्र को अर्पित करने के लिए ब्रह्मशर उठाये, देवी ने उनका हाथ थाम लिया और युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद देती हुई राम के शरीर में विलीन हो गयीं-
साधु, साधु, साधक धीर,धर्म-धन धन्य राम!
कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
होगी जय, होगी जय,हे पुरुषोत्तम नवीन!
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।
कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने राम की शक्ति पूजा कविता के माध्यम से मनुष्य के कभी न परास्त होने वाले विवेक का बखान किया है। विकट विरोधी परिस्थितयों में भी धैर्य के साथ काम करने की प्रेरणा दी है। राम के व्यक्तित्व की भांति निराला का व्यक्तित्व भी अपराजेय रहा है।
इसीलिए उन्होंने लिखा भी है- वह एक और मन रहा राम का जो न थका। निराला के राम में यद्यपि आत्मग्लानि के स्वर हैं फिर भी संघर्ष के स्वर अधिक प्रबल है। इसलिए हम कह सकते हैं कि निराला के राम गोस्वामी तुलसीदास के राम से भिन्न और भवभूति के राम के निकट हैं। (लेखक गोस्सनर महाविद्यालय, रांची के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के सहायक प्रोफेसर हैं।)