मनोज शर्मा
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बेकारे में अभिसार, पुण्य प्रसून, रविश वगैरह को लोग प्रबुद्ध पत्रकार मान बैठे थे। हकीकत में सब के सब रंगा सियार निकले। जैसे ही नेशनल चैनलों से ये भगाये गये इनका ऊपरी मुलम्मा उतर गया।
एक जानकार पत्रकार काम नहीं रहने पर भी क्या नाच गाने भांड़ लबाड़ का प्रचार करने लगेगा? आज अभिसार को हमेंशा सिर्फ डंकी फिल्म का गुणगान करते देखते हैं तो लगता है, ये पत्रकार कैसे बना था?
पुण्य प्रसून अपने यूट्यूब चैनल पर बेसिर पैर का इतना फेंकते रहता है कि कुछ पल्ले नहीं पड़ता। आज भी किसी मुद्दे पर वही घीसा पिटा लगातार बकवास करता है। उसे सुनकर लगता है कि डिजिटल युग में ये कैसेट टेपरिकार्डर की तरह बज रहा है।
रविश कुमार अब उस डिब्बाबंद एक्सपायर खाने की तरह है जिसकी पैकिंग अच्छी है, पर अंदर सामग्री विष हो चुकी है। हर बार वही भारत-विरोधी, बहुसंख्यक विरोधी, सरकार विरोधी चपड़ चपड़। दुष्प्रचार और झूठ को अच्छे शब्दों में गंभीरता से पेश करना इसका पेशा है। याद कीजिये कोरोना काल में यह श्रीमान केरल माडल की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे और जब केरल में कोरोना विस्फोट हुआ तो चुप्पी साध लिये।
दरअसल, इन पत्रकारों को टीवी मीडिया में औकात से ज्यादा वैल्यू मिल जाता है और अब हाशिये पर खदेड़ाने के बाद रेवेन्यू के लिये किसी भी हद तक जा रहे हैं, औसत सिनेमा और एक्टर एक्ट्रेस का कशीदा पढ़ रहे हैं।
वर्तमान में भी ढेर हैं जिन्हें आज टीवी मीडिया से हटा दिया जाये तो इनका असली रूप सामने आ जायेगा। मैं दावे से कहता हूं कि रविश, पुण्य प्रसून, अभिसार से बहुत ज्यादा हकीकत पसंद गुणी युवा पत्रकार झारखंड में ही हैं और बेशक उनमें रांची विश्वविद्यालय मास कौम विभाग से पढ़े हुए हमारे छात्र भी हैं, कोई शक? (लेखक पत्रकारिता विभाग से जुड़े हुए हैं।)