Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
लाइव: 35
होम ई-पेपर देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन
विचार

जो जीवन में उलझेगा नहीं, वह कभी सुलझेगा भी नहीं...

शेयर करें: WhatsApp Facebook X Back to ePaper
जो जीवन में उलझेगा नहीं, वह कभी सुलझेगा भी नहीं...
विज्ञापन

अजयदीप बाधवा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मैंने कुछ दिन पहले एक विद्वान को संघर्ष पर बोलते सुना था और उसके बाद यह मैंने काफी विचार किया। तो पाया कि उस विद्वान ने कुछ ऐसी बातें कहीं थी, जो कुछ हद तक सही थी। 

उस विद्वान ने कहा था कि प्रायः जब भी हम अपने से जूनियर को या बच्चों को मिलते हैं, तो हम उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि वे जीवन में बहुत सफल हो और जीवन में उन्हें कोई कठिनाई न हो। सब कुछ उनके रास्ते में आसानी से हो जाये और जीवन में वे बहुत आसानी से आगे बढ़ें।

पर क्या यह आशीर्वाद सही है?

जीवन में एक बात तो पक्की है कि सफलता उसी को मिलती है जो जीवन में संघर्ष करता है। अगर हमने जीवन में संघर्ष नहीं किया है, तो हमें सफलता भी नहीं मिलेगी। जीवन में सुलझने के लिए उलझना जरूरी है; जो जीवन में उलझेगा नहीं, वह सुलझेगा भी नहीं।

कई वैज्ञानिकों ने कहा है कि जब तक वे फेल नहीं हुए, वे अच्छा प्रोडक्ट नहीं बना पाये। अभी भारत का चंद्रयान चांद पर लैंड कर गया। अब याद करिये, इसरो ने यह सफलता चौथी बार में प्राप्त की। बल्कि जो तीसरी बार इसरो फेल हुआ था, वह तो दो वर्ष पूर्व ही हुआ था। अगर इसरो वह दो-तीन बार फेल नहीं करता, तो वह उन छोटी-छोटी बातों का ध्यान नहीं रखता। जिसने इस बार चंद्रयान को चंद्रमा में उतरने के लिए पूरा सहयोग दिया।

याद रखें, कि जब हम जीवन में असफल होते हैं या जीवन में हम जब संघर्ष करते हैं, तो जीवन में आगे बढ़ने की हमारी क्षमता और मजबूत होती है। हमारे इरादे और मजबूत होते हैं और हम जीवन में आगे बढ़ते हैं।
कहा जाता है कि अब्राहम लिंकन के जीवन में बहुत बाधाएं आयीं। वे जीवन में हर संघर्ष में फेल होते थे, हर चुनाव में वे पहले हारते थे,  पर वे बाद में जीत जाते थे। 

वे फेल करते रहे, हारते रहे और अंत में जाकर अमेरिका के राष्ट्रपति बने। अमेरिका में तो कितने राष्ट्रपति आये और गये, जिनका हमें नाम भी याद नहीं है। पर अब्राहम लिंकन को हम याद आज भी याद रखते हैं। वैसे ही थॉमस एडिसन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जब बल्ब बनाया, तो उसके पूर्व 9999 बार फेल हो चुके थे और उन्होंने बाद में कहा कि अगर मैं इतनी बार फेल नहीं होता, तो मैं बल्ब नहीं बना सकता। मुझे इतनी बार फेल होने के बाद पता चला कि 9999 तरीकों से बल्ब नहीं बनता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर अपने बच्चों को हम चाहते हैं कि  वे सफल हों, तो हमें उन्हें आशीर्वाद देना चाहिए कि जीवन में सफल हों, पर सफलता आसानी से न आये। सफल तुम जरूर हो पर सफलता के लिए तुमको संघर्ष करना पड़े। हमें उन्हें बोलना चाहिए कि तुम वह सोना हो कि जब तक तुम गलोगे नहीं तुम किसी के गले का आभूषण नहीं बन पाओगे। हमें अब अपने बच्चों का आशीर्वाद देने का तरीका बदलना चाहिए। उन्हें सफलता के साथ-साथ संघर्ष करने का आशीर्वाद भी देना चाहिए। उन्हें जीवन में उलझने का आशीर्वाद देना चाहिए, तभी वे जीवन में सुलझ पायेंगे। (लेखक झारखंड की राजधानी रांची के प्रख्यात मोटिवेटर हैं।)

विज्ञापन