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प्रेम से ही संसार में परिवर्तन

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प्रेम से ही संसार में परिवर्तन
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गुरु महावतार बाबा : स्मृति दिवस 25 जुलाई पर विशेष संध्या एस नायर एबीएन एडिटोरियल डेस्क। श्रीश्री परमहंस योगानंद ने अपने गौरव ग्रंथ योगी कथामृत में आधुनिक भारत के महावतार बाबाजी के इस वचन का उल्लेख किया है, मैं अपने भौतिक शरीर का कभी त्याग नहीं करूंगा। मेरा यह भौतिक शरीर इस पृथ्वी पर कम से कम कुछ लोगों को सदा दिखाई देता रहेगा। इसी पुस्तक के माध्यम से इस संसार को पहली बार महान अवतार बाबाजी के बारे में पता चला था। उनके अनुयायी मानते हैं कि दैवी आदेश अथवा गहन विनम्रता के कारण ये एकांतवासी महान लंबे अरसे से बद्रीनारायण के आसपास के उत्तरी हिमालय पर्वतों के पूर्ण निर्जन प्रदेश में अपने स्थूल शरीर में वास कर रहे थे। उनके अनुयायी मानते हैं कि महागुरु अपने शिष्यों के एक छोटे से समूह के साथ हिमालय के निर्जन पर्वतों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते रहते हैं। अनासक्त महागुरु के रहस्यमय शब्द डेरा डण्डा उठाओ उनके शिष्यों के समूह के लिए सूक्ष्म शरीर के माध्यम से तत्क्षण किसी अन्य स्थान पर पहुंचने का संकेत होते हैं। जनवरी, 1894 में, प्रयागराज कुंभ मेले में, बाबाजी ने स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी से भेंट की थी और उन्हें वचन दिया था कि वे उनके पास एक शिष्य को भेजेंगे, जिसे उनको क्रियायोग परम्परा में प्रशिक्षित करना होगा। वे विशेष शिष्य थे श्री श्री परमहंस योगानंद, जिन्होंने कालान्तर में योगदा सत्संग सोसायटी आफ इण्डिया/सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना की, जिसके माध्यम से एक शताब्दी से अधिक समय से ईश्वरीय सेवा की भावना के साथ प्राचीन क्रियायोग विज्ञान का प्रसार कार्य किया जा रहा है। अपना पवित्र कार्य प्रारंभ करने के लिए पाश्चात्य जगत को प्रस्थान करने से पूर्व योगानंदजी को दैवी आश्वासन की आवश्यकता अनुभव हुई। जैसा कि उन्होंने अपनी पुस्तक योगी कथामृत में लिखा है, अमेरिका जाने का संकल्प तो मेरे मन ने कर लिया था, पर साथ ही ईश्वर की अनुमति और आश्वासन-वाणी सुनने के लिए वह और भी अधिक कृतसंकल्प था। 25 जुलाई, 1920 को योगानंदजी प्रात:काल से ही अत्यंत दृढ़ संकल्प के साथ प्रार्थना करने बैठ गये। जब उनकी प्रार्थना की उत्कटता पराकाष्ठा तक पहुंच गयी, ठीक उसी क्षण उनके कोलकाता स्थित घर के दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। युवा शिष्य को हिमालय के सर्वव्यापी महागुरु का तेज सहस्रों सूर्यों के उदय के समान प्रतीत हो रहा था। उन्होंने मधुर स्वर में बात की, हां, मैं बाबाजी हूं। हम सबके परमपिता ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली है। उन्होंने मुझे तुमसे यह बताने का आदेश दिया है ह्यअपने गुरु की आज्ञा का पालन करो और प्रवास करो। डरो मत; तुम्हारा पूर्ण संरक्षण किया जायेगा। यह अनुभव श्री श्री लाहिड़ी महाशय के दृढ़ विश्वास का साक्षी है कि श्रद्धापूर्वक स्मरण से भक्त को तत्क्षण आध्यात्मिक आशीर्वाद प्राप्त होता है। उस महत्वपूर्ण दिवस की स्मृति में सम्पूर्ण विश्व के भक्त प्रत्येक वर्ष 25 जुलाई को बाबाजी स्मृति दिवस के रूप में मनाते हैं। बताते हैं अनेक वर्षों के पश्चात सन् 1963 में बाबाजी ने वाईएसएस/एसआरएफ की तीसरी अध्यक्ष दया माता को अपनी पूरी महिमा के साथ दर्शन दिये थे, जब वे हिमालय में द्वाराहाट के निकट पवित्र गुफा की तीर्थयात्रा पर गयी हुई थीं, जहां ऐसा माना जाता है कि बाबाजी ने कुछ समय तक निवास किया था। इसी पवित्र स्थल पर उन्होंने श्री श्री लाहिड़ी महाशयजी को क्रिया योग के लुप्त विज्ञान की दीक्षा प्रदान की थी। दया माताजी ने महागुरु से उनके सच्चे स्वरूप के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की थी तो उनके इस मधुर प्रश्न का उत्तर दिया था, मेरी प्रकृति प्रेम है क्योंकि केवल प्रेम ही इस संसार को परिवर्तित कर सकता है।
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