सत्यनारायण गुप्ता
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बचपन में रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता पढ़ी थी- लोहे के पेड़ हरे होंगे... लेकिन लगता नहीं कि अब कभी लोहे के पेड़ हरे होंगे और कंक्रीट के जंगल से कभी सुगंध फैलेगा। क्योंकि मानवीय गतिविधियों और क्रियाकलापों से हमारे पर्यावरण को पहुंचे नुकसान के कारण दुनिया का तापमान बढ़ रहा है और इससे जलवायु में होता जा रहा परिवर्तन अब मानव जीवन के हर पहलू के लिए खतरा बन चुका है।
अगर इसे अपने ही हाल में छोड़ दिया गया तो आने वाले समय में तापमान इस कदर बढ़ जाएगा कि मानव जीवन पर संकट आ सकता है। भयावह सूखा पड़ सकता है। समुद्री जलस्तर बढ़ सकता है और इन सब प्राकृतिक आपदाओं के फलस्वरूप कई प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं।
हमारे आंगन से गौरैया गायब हो चुके हैं, गंगा तट पर मरे हुए डाल्फिंस दिखाई देते हैं और बल झील के ऊपर मरी हुई मछलियां उपलती हुईं नजर आती हैं। पिघलती बर्फ के कारण जहां ध्रुवीय भालू का संकट खतरे में है वहीं आस्ट्रेलियाई समुद्र तट पर स्थित ग्रेट बैरियर रीफ का आकार छोटा होता जा रहा है।
जैसा कि हम जानते हैं जलवायु परिवर्तन एक लंबे समय में या कुछ सालों में किसी स्थान का औसत मौसम है और जलवायु परिवर्तन उन्हीं औसत परिस्थितियों में बदलाव है। जितनी तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसके लिए मानव क्रियाएं सबसे ज्यादा दोषी हैं। घरेलू कामों, कारखानों और परिवहन के लिए मानव तेल, गैस और कोयले का इस्तेमाल करते हैं जिसकी वजह से जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
जीवाश्म इंधन के जलने से ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। सबसे अधिक मात्रा कार्बन डाइआॅक्साइड की होती है। ग्रीनहाउस गैसों की सघन मौजूदगी के कारण सूरज की गरमी धरती से बाहर नहीं जा पाता है, जिससे धरती का तापमान बढ़ता जाता है। आज 19 वीं सदी की तुलना में तापमान 1.2 सेल्सियस अधिक बढ़ चुका है और कार्बन डाइ आॅक्साइड की मात्रा में 50% तक वृद्धि हुई है।
पर्यावरणविदों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव से बचने के लिए हमें पृथ्वी के क तापमान वृद्धि के कारकों को नियंत्रित के संबंध में ठोस कदम उठाने होंगे। वर्ष 2100 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक तापमान को नियंत्रित रखने की जरूरत है। यदि तमाम देशों द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ सकता है।
यह आगे चलकर 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। फलस्वरूप पृथ्वी को भयानक हीट वेव का सामना करना पड़ेगा। समुद्र के जलस्तर पर वृद्धि होने से लाखों लोग बेघर हो जायेंगे। पौधों और जंतुओं की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो जायेंगी। जलवायु परिवर्तन के कारण ही तूफानों की संख्या में वृद्धि, बार-बार आने वाले भूकंप, नदियों में बाढ़ का विकराल रूप देखने को मिल रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग इसी गति से बढती रही तो पृथ्वी का बड़ा भूभाग जनविहीन हो जायेगा, कृषि भूमि रेगिस्तान में बदल जायेंगे। इसके उलट वैसे क्षेत्रों में भारी बारिश हो सकती है जहां पहले सूखा पड़ता था। जाहिर है गरीब देशों पर इसका कुप्रभाव अधिक व्यापक होगा।
खेती और फसल को व्यापक नुकसान, पेयजल संकट, जंगलों में आग, ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ का पिघलना विशेष जलवायु के अभ्यस्त जीवों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ सकता है। यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस सदी के अंत तक 550 प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं।
2015 में पेरिस समझौते द्वारा दुनिया के तमाम देशों ने कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने तथा ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की प्रतिबद्धता दोहरायी थी। 1992 में रियो सम्मेलन से लेकर 2022 में शर्म अल शेख में आयोजित कॉप - 27 सम्मेलन तक एक साथ बैठकर दुनिया भर के राजनेता पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने के उपायों पर चर्चा कर चुके हैं।
1972 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में नामित किया ।1973 में केवल एक पृथ्वी के नारे के तहत पहला पर्यावरण दिवस उत्सव मनाया गया। 2023 के पर्यावरण दिवस का थीम है- बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन... दुनिया भर में हर साल 430 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से आधा मात्र एक बार उपयोग होता है।
इनमें से 10 फीसदी से भी कम को रिसाइकिल किया जाता है। प्रत्येक वर्ष 1930 मिलियन टन प्लास्टिक झीलों नदियों और समुद्रों में समा जाते हैं। 5 मिलीमीटर व्यास वाले प्लास्टिक कण (माइक्रोप्लास्टिक्स) भोजन पानी और हवा में घुल जाते हैं अनुमानत: प्रति वर्ष प्रत्येक व्यक्ति 50,000 से अधिक प्लास्टिक कणों को सांस के रूप ग्रहण करता है।
फेंके गये या जलाये गये एकल उपयोग वाले प्लास्टिक मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाते हैं और पहाड़ की चोटियों से लेकर समुद्र तट तक पूरी तरह से परिस्थिति तंत्र को प्रदूषित करते हैं।
समय आ गया है कि मनुष्य पृथ्वी के पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक हो, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब यह हमारे रहने लायक नहीं रह जायेगी और हमें अपने जीवन को बचाए रखने के लिए ब्रह्मांड के किसी अन्य ग्रह में शरण लेना होगा। लेकिन दुर्भाग्यवश अब तक वैसे किसी ग्रह की खोज नहीं हुई है जहां जीवन संभव हो।