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बुद्ध को नास्तिक कहा जाना गलत व्याख्या

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बुद्ध को नास्तिक कहा जाना गलत व्याख्या
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स्वामी सत्यानंद परमहंस

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्वामी सत्यानंदजी परमहंस कहते है कि  बुद्ध को नास्तिक क्यों कहा जाता है? क्योंकि बुद्ध आत्मा को नहीं मानते थे। बुद्ध कहते थे मेरा जन्म नहीं हुआ है। मैं अविनाशी हूं। देश-दुनिया के विद्धान इस बात को समझ नहीं पाते हैं। मैं कई बार यूनिवर्सिटी के बुद्धिज्म पढ़ाने वाले प्रोफेसरों से पूछता हूं कि आप बुद्ध को इस प्रकार गलत ब्याख्या के साथ क्यों पढ़ाते हैं ? तब वे कहते हैं कि मेरा सिलेबस वैसा है अगर मैं जो आप समझा रहें है जो हमलोगों को सही भी लगता है लेकिन पढ़ा नहीं सकते हैं। चेतन ही आत्मा और परमात्मा है।

आप जीवन भर क्या करते हैं? आप जीवन भर क्या चाहते हैं? दुख कम हो सुख अधिक हो। सुखा बढ़े और दुख घटे। इसके लिये ही तो सब उपाय करते हैं। बुद्ध कहते हैं दुख है, दुख का कारण है, दुख का निवारण भी है। सांख्य का प्रथम सूक्त है सृष्टि परमानंद के लिए हुई।

बुद्ध जब बंधन में थे तब मृत्यु का भय था। तब जरा (बीमार) होने का डर था। तब वे सिद्धार्थ थे। वही सिद्धार्थ बोध गया में कहते हैं मेरा न जन्म है न मेरी मृत्यु है। चेतन ही जीवात्मा और परमात्मा है। अकेले आत्मा कुछ नहीं है अविनाशी है आकाश की तरह। वायु,जल और अग्णि मिलाकर ब्रह्मांड कहलाती है और इसमें गति हो जाती है।

मन, बुद्धि, चित्त और अंहकार के साथ जब आत्मा मिल जाती है तब वह जीवात्मा बन जाती है। यह जीवात्मा अगर ज्ञान में है तो वह परमात्मा हो जाती है। बुद्ध को ज्ञान हुआ। बुद्ध ने कहा कौन सिद्धार्थ न जन्म न मृत्यु। बुद्ध ने आत्मा को स्वीकार किया और उसके परमात्मा होने की दिशा में सार्थक प्रयास किया। जीवात्मा का एक ही उदेश्य है परमात्मा की प्राप्ति। अपने अत:करण में उसे स्थापित कर पाना। बुद्ध ने यही बात दुनिया को समझा दिया। लोग विशेषकर बुद्धिजीवी बुद्ध को समझ नहीं पाये और कह दिया कि बुद्ध नास्तिक थे। 

कभी मत सोचिए दुनिया नहीं है। समय  बराबर जीरो से हम आंरभ करते हैं। अखंडमण्डलाकारम का अर्थ ही है वह अखंड है और गोल है। जो गोल उसका छोर नहीं पकड़ा जा सकता है उसे कही भी मान कर आरंभ किया जाता है। 

क्या ज्ञान में आने के बाद मनुष्य दुख पूरी तरह दुख से मुक्त हो जायेगा? नहीं ऐसा नहीं होगा। त्रिकुटी के उपर तक सत, रज और तक है। इसके उपर जाने पर दुख कम हो जाएगा समाप्त नहीं होगा। ज्ञान हो जाने की स्थिति के बाद आपको पत्ता होता है कि यह शरीर का अंत है आत्मा का नहीं। 
देह धरे का दंड भुगते हर कोई।
ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोये।

क्या अभिमण्यु की मृत्यु के बाद कृष्ण को दुख नहीं हुआ होगा? अवश्य हुआ होगा लेकिन ज्ञानी ज्ञान से दुख को कम कर पाता है। अर्जुन अधिक व्याकुल होते हैं कृष्ण से कहते हैं कि आप तो ईश्वर है मेरे अभिमण्यु से मुझे मिला दिजीए। कृष्ण कहते हैं चलो। कृष्ण दिखाते हैं अर्जुन देखते हैं अभिमण्यु एक सिंहासन पर विराजमान हैं। अर्जुन कहते हैं अभिमण्यु मेरा पुत्र। अभिमण्यु कहता है कौन पुत्र कैसा पुत्र। उस शरीर को मैंने छोड़ दिया है। मैं उतने ही समय के लिए धरती पर गया था। अर्जुन समझ जाते हैं। 

ब्रह्म विद्यालय आश्रम राजपुर में गुरुदेव स्वामी जी सरकार को भी महात्मा दर्शनानंद जी शरीर छोड़ें जाने का दुख हुआ होगा लेकिन वे ज्ञान में थे इसलिए उन्होंने उस भाव को नियंत्रित कर लिया। जीवन का मध्यकाल ही ज्ञान के प्रकट होने का काल है। जब जीवात्मा के पास परमात्मा के होने का अवसर मिलता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार समाप्त होता है ज्ञान से। महात्मा दर्शनानंद भक्ति के अनुपम उदाहरण थे। उनकी जीवन की एकमात्र इच्छा थी कि उनके गुरुदेव समाधि सरकार की हर इच्छा जो उनसे चाहते हो वह पूरा हो। उनकी अपनी कोई इच्छा नहीं थी।

जब इच्छा समाप्त हो गयी तो वे मुक्त हो गये। महात्मा दर्शंनानंद कहा करते थे कुटी में कुटाओं और मठिया में मढ़ाओ। स्वामी परमहंस दयाल जी भी कुटी बनाने और भक्त बनाने से भी परहेज करते थे। लेकिन जिस प्रकार एक चादर बेचने वाला साइकिल पर घूम-घूमकर चादर बचें और उसका काम हो और फिर वही व्यक्ति एक दुकान खोल ले तो उसका कार्य व्यवस्थित हो जाए यही अंतर है।

हमारे देश में सन्तों की अनेक परम्परा है। राम और कृष्ण की कोई आश्रम परम्परा नहीं है लेकिन गुरु वशिष्ठ, कबीर, नानक सहित अनेक संतो-महात्माओं की है। मठ और आश्रमों से धर्म की परम्परा व्यवस्थित और सुचारु हो जाती है।

एक वृक्ष की तरह ब्रह्मांड भी युवा और वृद्ध होता है यह समाप्त भीहोता है और इसका निमार्ण भी होता है। विग वेन थ्योरी के अनुसार विस्फोट से पृथ्वी का निर्माण हुआ लेकिन यह विस्फोट कहां हुआ। पहले से उपस्थित आकाश और 118 एलीमेंट की उपस्थित के बिना क्या विस्फोट संभव है? निश्चित रुप से यह निर्माण और विध्वंध की प्रकिया चल रही है इसके समय का अनुमान लगाना कठिन है। 

कृष्ण ईश्वर थे। लेकिन एक सामान्य बेहेलिया के तीर से मृत्यु को प्राप्त हो गये। अर्जुन को द्धारिका से बासुदेव ने संदेश भेजा कि कृष्ण के जाने के बाद बड़ी संपति और रानियां द्वारिका में असुरक्षित है आप उन्हें हस्तिनापुर ले जायें। अर्जुन जैसा पराक्रमी और वीर जब द्धारिका से हस्तिनापुर चले तो रास्ते में भीलों ने उनकी संपति लूट ली। उन्हें ज्ञान हो गया कि उनका बल समाप्त हो रहा है। इसके बाद ही पांचों पाडंव हिमालय में हिम समाधि के लिये चले चले गये।

शरीर नाशवान है यह सत्य है। आप परमात्मा बनकर इसे छोड़ना चाहते हैं या व्याकुल आत्मा इसी कार्य के लिये आपको यह मानव तन मिला है। तब आपको यह मार्ग सुझाने के लिए राजपुर हो या टेरी स्वामी परमहंस दयाल हो या समाधि सरकार शिवधर्मानंदजी अपने आप को उनके इच्छा में मिलाना होगा जहां सच्चा सुख है सगुण के साथ। बुद्ध ने ऐसा ही किया था।

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