सत्यनारायण गुप्ता
एबीएन सेंट्रल डेस्क। उत्तराखंड के चमोली में स्थित ज्योतिर्मठ या जोशीमठ को बद्रीनाथ भगवान की शीतकालीन गद्दी भी कहा जाता है। सर्दियों में बद्री विशाल की मूर्ति को जोशीमठ के वासुदेव मंदिर में ही रखा जाता है। आदि शंकराचार्य ने यहां पहला ज्योतिर्मठ स्थापित किया था। कहा जाता है कि प्रहलाद ने भगवान नरसिंह के गुस्से को शांत करने के लिए यहां महालक्ष्मी के कहने पर तप किया था। जोशीमठ वो स्वर्गद्वार भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि पांडव इसी रास्ते से स्वर्ग गये थे। इसके बाद फूलों की घाटी शुरू हो जाती है।
लगातार जमीन धंसने की घटनाओं के मद्देनजर जोशीमठ को सिंकिंग जॉन (धंसता क्षेत्र) घोषित किया गया है राष्ट्रीय भूभौतिक अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) के विशेषज्ञों की टीम जोशीमठ पहुंच रही है।
जमीन धंसने की मुख्य वजह यह बताई जाती हैं :
- पहला, जोशीमठ पूरी तरह से लैंड स्लाइड के मलवे पर बसा हुआ है । ऐसे में यहां अत्यधिक निर्माण करना खतरे से खाली नहीं था लेकिन पर्यटकों को लुभाने के लिए और भूमाफियाओं द्वारा बेतरतीब निर्माण किये गये। 1939 में एक किताब सेंट्रल हिमालया जियो लॉजिकल ऑब्जरवेशन ऑफ द स्विस एकसपेडिशन में इसके लेखक प्रोफेसर अर्नोल्ड हेम और प्रोफेसर आगस्टो गैंस ने चेतावनी दी थी कि यह पूरी तरह पहाड़ों के मलबे पर बसा हुआ है।
- दूसरा, सूरंग खोदने वाली मशीन से प्राकृतिक जल भंडार को नुकसान हुआ ।इससे इलाके के कई झरने और पानी के सोते सुख चुके हैं। जिस पहाड़ पर जोशीमठ बसा है ,उसके अंदर की जमीन भी सुख चुकी है इसलिए पहाड़ का मालवा धंसने लगा है।
- तीसरा, 1976 में जोशीमठ में लैंडस्लाइड हुआ था तब इसकी जांच के लिए तत्कालीन गढ़वाल कमिश्नर महेश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में एक कमिटी गठित की गई थी ।कमिटि कि रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ में हो रहे निर्माण कार्यो को यदि नहीं रोका गया तो वह विनाशकारी होगा ।इस पर ध्यान नहीं दिया गया और पहाड़ों पर पावर प्रोजेक्ट के बनने का काम चलता रहा।
- चौथा, नदियों से घिरे रहने से कारण यहां जमीन के नीचे और ऊपर पानी का बहाव झरने की तरह लगातार होता रहता है। इससे तल पर नमी हमेशा बनी रहती है ।जमीन के भीतर की चट्टानें कमजोर हैं जो नमी के प्रभाव से धंस रहीं हैं।
- पांचवां, जोशीमठ के ऊपर के इलाके में काफ़ी बर्फबारी होती बारिश होती है। मौसम बदलता है और बर्फ पिघलती है, तब जोशीमठ से चारों ओर नदियों में पानी का बहाव तेज हो जाता है।सतह के कमजोर होने और भूस्खलन का यह भी एक बड़ा कारण है।
- छठा, जोशीमठ के अधिकतर क्षेत्रों में नीस चट्टानें हैं, जो तापमान और हवा की वजह से तेजी से आकार बदलती हैं।यह भी क्षेत्र में धंसान की एक वजह है।
- सातवां, स्थानीय लोग इसके लिए मुख्य रूप से एनटीपीसी की तपोवन- विष्णु गढ़ परियोजना को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं ।लोगों के अनुसार दशकों से एनटीपीसी के लिए खोदी जा रही सूरंग इस भयावह स्थिति के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ।तपोवन -विष्णु गढ़ पनबिजली परियोजना की सूरंग जोशीमठ के ठीक नीचे स्थित है।
जोशीमठ ही नहीं प्राकृतिक आपदाओं से लगातार जूझ रहे उत्तराखंड में बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं के प्रभाव का आकलन किए बिना आगे बढ़ने की गलती बार-बार दोहराई जा रही है ।हिमालय की संवेदनशीलता, पर्यावरण मानकों और सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज करते हुए जिस तरह ऑल वेदर रोड के लिए पहाड़ों को काटा गया, हजारों पेड़ों का कटान हुआ और मलबे को नदियों में डंप किया गया। यह प्रकृति के साथ खिलवाड़ का सटीक उदाहरण है।
सिर्फ टिहरी गढ़वाल जिले में चारधाम हाईवे के 150 किलोमीटर हिस्से में 60 डेंजर जोन चिन्हित किये गये हैं। करीब 12000 करोड़ रुपए लागत वाली 889 किलोमीटर की चार धाम परियोजना में मुख्य रूप से सड़कों के चौड़ीकरण का काम शामिल है। सड़कों को कितना चौड़ा किया जाना है इस पर विवाद है केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय वर्ष 2016 में परियोजना की शुरुआत से ही 10 से 12 मीटर चौड़ी ऑल वेदर रोड बनने पर जोर दे रहा है। मंत्रालय अपने ही नियमों की अनदेखी कर रहा है।
पहाड़ी राजमार्गों के लिए निर्धारित 5.5 से 7 मीटर चौड़ाई के अपने ही मानक को बदल दिया गया है ।पर्यावरण प्रभाव आकलन किए से बचने के लिए 889 किलोमीटर की चार धाम प्रोजेक्ट को 53 टूकडों में बांटा गया है। क्योंकि 100 किलोमीटर से बड़ा प्रोजेक्ट होने पर पर्यावरण प्रभाव का आकलन कराना जरूरी होता है।
यह विवाद जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो पर्यावरणविद रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस परियोजना की अवैज्ञानिक व अनियोजित क्रियान्वयन से हिमालय के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा है और भूस्खलन जैसी आपदाओं को बुलावा दिया जा रहा है। खतरे का अनुमान लगाए बिना पहाड़ों के ढलानों को सीधा और लंबवत काटने से स्लोप फेलयर का खतरा बढ़ गया है।
रवि चोपड़ा सहित उच्च अधिकार समिति के 3 सदस्यों की राय सड़क की चौड़ाई 5.5 मीटर तक सीमित रखने की थी लेकिन समिति के 21 सदस्य जिनमें ज्यादातर अधिकारी थे ने सड़क की चौड़ाई की मूल डिजाइन (10- 12 मीटर) रखने की वकालत की और निर्माण कार्य चलते रहे।
जोशीमठ ही नहीं हिमालय की ऊंचाईयों में बसे अन्य शहरों और गांवों के पर्यावरणीय कारणों से उजड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है। लेकिन यह संकट प्रकृतिजनित न होकर मानवजनित है। बिना सोचे समझे विकास की चाहत ने हमें विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है।