एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय सानी)। हाल ही में बेंगलूरु के स्कूलों में सेलफोन का पता लगाने के लिए छात्रों के बस्तों की जांच की गई। दसवीं कक्षा के कई छात्रों के बस्तों से गर्भनिरोधक गोलियां और कंडोम मिले। इससे अंदाजा मिलता है कि इन छात्रों को इन चीजों की अच्छी समझ रही होगी। हालांकि कम उम्र में यौन संबंध बनाना गैरकानूनी है लेकिन अगर नाबालिगों में यौन संबंध बनाने का रुझान बढ़ रहा है तो बेहतर यही होगा कि ये संबंध सुरक्षित हों।
दुनिया के अन्य हिस्सों के सामाजिक अध्ययन से संकेत मिलते हैं कि उन जगहों पर किशोरों में गर्भधारण और यौन संचारित रोग अधिक हैं जहां यौन शिक्षा, स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। भारत में यौन शिक्षा अनिवार्य नहीं है और अधिकांश स्कूल इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने से बचते हैं। वहीं अधिकांश भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को प्रजनन और यौन शिक्षा से जुड़ी बातों को समझाने के बजाय दूर जाना ही बेहतर समझते हैं।
हालांकि ये बच्चे आजकल खुद ही कई चीजें सीख जाते हैं और शायद यह इंटरनेट के माध्यम से और भी आसान हो गया है। अच्छी बात यह भी है कि उनकी गर्भनिरोधक तक आसान पहुंच है। उदारीकरण के दौर तक अधिकांश भारतीयों की केवल निरोध तक पहुंच थी जो एक देसी कंडोम था और यह दिखने में भी अजीब था। पश्चिम बंगाल और असम में उच्च मध्यम वर्ग इंडोनेशियाई रबर के इस्तेमाल से एक डच कंपनी द्वारा बनाए गए और तस्करी किए गए बांग्लादेशी कंडोम का उपयोग करता था। 1990 के दौर में मुंबई के यौनकर्मियों वाले एक इलाके और सामान्य जगहों के बीच एक ही अंतर था कि यहां विकसित देशों से आए हुए महंगे कंडोम उपलब्ध थे।
बेंगलुरु के ये बच्चे भारत के तथाकथित कामकाजी वर्ग में शामिल होने वाली आबादी का हिस्सा हैं लेकिन दुखद बात यह है कि उन्हें यौन व्यवहार से जुड़ी जानकारियों से खुद को शिक्षित करना पड़ रहा है। देश के लगभग 25 प्रतिशत भारतीय 15 वर्ष से कम उम्र के हैं और लगभग 65 प्रतिशत 15 से 65 वर्ष की आयु के हैं। अगर आबादी का एक बड़ा हिस्सा कामकाजी उम्र का है, तब प्रति व्यक्ति उत्पादकता में बढ़त के बिना उच्च स्तर की वृद्धि संभव नहीं है।
इससे अंदाजा लगता है कि यह मुनाफे वाला रोजगार है और यह भी कि कार्यबल को तैनात करने के लिए पर्याप्त रूप से शिक्षित किया गया है। वैश्विक स्तर पर कामकाजी आयुवर्ग वाली आबादी के एक बड़े वर्ग में आर्थिक विकास की क्षमता होती है जिसने निरंतर वृद्धि वाली अवधि में एक अहम भूमिका निभाई है। इसके उदाहरण में चीन, जापान, पश्चिम जर्मनी, दक्षिण कोरिया, ताइवान, वियतनाम, बांग्लादेश और इससे पहले19 वीं शताब्दी के अंत से अमेरिका भी शामिल हैं। इस तरह की अवधि प्रति व्यक्ति मुनाफे से जुड़ी हुई है क्योंकि स्मार्ट युवा आबादी नवाचारों पर काम करती है।
हालांकि, आबादी में कामकाजी उम्र वाले लोगों का होना उच्च वृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता है। इसके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर होने चाहिए और आबादी को पर्याप्त रूप से शिक्षा मिलनी चाहिए। दुर्भाग्य से भारतीय शिक्षा प्रणाली में केवल यौन शिक्षा ही अछूता रहने वाला एकमात्र क्षेत्र नहीं है। कई भारतीय कार्यात्मक रूप से अशिक्षित हैं और विशेष रूप से लड़कियां माध्यमिक स्तर की स्कूली शिक्षा के दौरान पढ़ाई छोड़ देती हैं। भारत ने कामकाजी उम्र वाली आबादी को काम देने और उच्च स्तर की वृद्धि करने के लिए पर्याप्त रोजगार के अवसर कभी पैदा नहीं किए हैं जो संभव हो सकता था। भारत में व्यापक स्तर की बेरोजगारी, अल्प-रोजगार, और लोगों विशेष रूप से महिलाओं का नौकरी छोड़ना और कार्यबल से अलग होना कई दशकों से बेहद आम रहा है।
बड़ी-बड़ी नीतियों जैसे कि नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली (जीएसटी) को अमलीजामा पहनाने की प्रक्रिया बेहद खराब रही और लॉकडाउन ने हालात को बदतर बना दिया। हालांकि जहां तक रोजगार सृजन का प्रश्न है उसकी स्थिति हमेशा खराब रही है।
कामकाजी उम्र वाली आबादी से मिलने वाले फायदा का एक दूसरा पक्ष भी है। जैसे-जैसे आबादी आमदनी और शिक्षा की सीढ़ी पर आगे बढ़ती है तब जन्म दर में कमी आती है। जब कामकाजी आबादी कम होती है तब पेंशनभोगियों (जो बेहतर स्वास्थ्य देखभाल के कारण लंबे समय तक जीवित रहते हैं) में वृद्धि होती है। बदलाव का यह चरण और भी खराब होगा अगर स्त्री-पुरुषों के अनुपात में विषमता है। बच्चे पैदा करने की उम्र वाली कम महिलाओं के चलते बच्चे भी कम पैदा होते हैं।
यूरोपीय संघ (ईयू) और जापान में पेंशनभोगियों की तादाद बढ़ रही है और इसकी वजह से दुनिया के कई विकसित देशों की वृद्धि में लगभग ठहराव सा आ गया है। चीन में स्त्री-पुरुषों के अनुपात की स्थिति बेहद खराब है और यहां एक बच्चे की नीति की वजह से देश में अगले 20 वर्षों में आबादी में 35 प्रतिशत की गिरावट देखी जा सकती है और यहां एक बड़ी पेंशनभोगी आबादी से जूझना होगा।
अमेरिका अब तक इस गंभीर संकट से बचा है क्योंकि यहां से लोग दूसरे देश गए हैं। भारत की कुल प्रजनन दर (एक महिला के बच्चों की औसत संख्या) कई राज्यों में कम है, जिसका अर्थ घटती आबादी से जुड़ा है। ऐसे राज्य प्रति व्यक्ति, बेहतर शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवा वाले राज्य हैं। पूरे भारत में जनसंख्या वृद्धि दर में भी गिरावट आई है।
उम्र बढ़ने के साथ ही अधिक लोगों के कार्यबल से बाहर होने पर कामकाजी वर्ग में शामिल होने वाली आबादी का लाभ मिलना बंद हो जाएगा। स्त्री-पुरुष का खराब अनुपात इसे और बदतर बना सकता है। दुर्भाग्य से पांच साल के चुनावी चक्र के बारे में सोचने वाले नेताओं की शिक्षा में दीर्घकालिक निवेश करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती है जिससे इसमें अहम बदलाव आ सकता है। कामकाजी आबादी का लाभ लेने में हमारी विफलता हमें आगे भी परेशान करेगी जब यह दौर खत्म हो जाएगा।