परशुराम तिवारी
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज से बाईस वर्ष पूर्व झारखंड के अस्तित्व में आते ही उम्मीदों और आकांक्षाओं के हिचकोले खाते यहां के लोग खुशी से झूम उठे थे। सड़क पर मांदर की थाप पर थिरकते झारखंडी जीत के गीत गा रहे थे। वादियों की खूबसूरती मानो द्विगुणित हो गयी थी और झरने प्रफुल्लित हो गुनगुना रहे थे। खुशी की खुशबू चहुंओर फैली हुई थी। भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, नीलांबर-पीतांबर सहित अनेक धरतीपुत्र के संघर्षों को जैसे मुकाम मिल गया था। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, उमंग बेरंग होने लगे। प्रगति के बादल बरसने के बजाय निराशा की घनघोर घटाएं छाने लगीं। ऐसा नहीं है कि झारखंड प्रगति के मार्ग पर नहीं चला। पर यह गति इतनी धीमी व धुंधली रही है कि इसे प्रगति कहना बेमानी सा लगने लगा।
कहना न होगा कि पूर्ववर्ती सरकारों के नेतृत्व में भी कुछ न कुछ प्रगति हुई है, वर्तमान सरकार भी प्रगति के पथ पर अग्रसर है और परवर्ती सरकारें भी अवश्य ही प्रगति के मार्ग का वरण करेंगी। मगर आज यह विचारणीय है कि क्या वास्तव में हम सपनों का झारखंड बनाने को ओर अग्रसर हैं?
लंबी अवधि बीत जाने के बाद भी राजनीतिक दांवपेंच में सरकारें झारखंड हक में स्थानीय नीति तक तय नहीं कर पायीं हैं। अब कहीं जाकर 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाया गया है जिस पर राजनीतिक दलों में मतैक्य नहीं है। इन विडंबनाओं के कारण इन बाईस सालों में यहां के बेरोजगारों को निराशा ही हाथ लगी है। उनके हाथों से उनके हक की नौकरियां छिटकती रही हैं। झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा की गयी नियुक्तियां विश्वसनीयता की कसौटी पर खरी नहीं उतरी हैं। उन्हें माननीय न्यायालय में चुनौती दी जाती रही हैं। झारखंड लोक सेवा आयोग को अभी साख बनाने की चुनौती है। इसके लिए ठोस व कारगर कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। वैसे सिर से ऊपर काफी पानी बह चुका है।
झारखंड के बारे यह तथ्य बार-बार दुहरायी जाती है कि इसके गर्भ में खजाना और गोद में ग़रीबी है। बेशक खनिज संपदाओं से समृद्ध झारखंड के जनता की गरीबी न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि अपमानित करनेवाली भी है।
झारखंड में आदिवासी समुदाय के विकास का कोरस गान प्रायः सर्वत्र सुनाई देता है मगर धरातल पर कुछ खास नजर नहीं आता। आदिवासियों के विकास के लिए जनजातीय भाषाओं को बढ़ावा देना लाजिमी है। झारखंड में दर्जानाधिक जनजातीय भाषाएं बोली जाती हैं। इन जनजातीय भाषाओं के बीच भी हिन्दी सम्पर्क भाषा का काम करती है। पर पिछले दिनों जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के नाम पर हिन्दी की उपेक्षा करने का मामला सामने आया है। अगर यह गैर इरादतन ही है तब भी इससे हिन्दी भाषी विद्यार्थी निशाना बन रहे हैं। यह कदम राज्य के हित में कतई नहीं है।
शिक्षा की बात करें तो यहां भी स्थिति उत्साहवर्द्धक नहीं है। जिस तामझाम से नि:शुल्क व अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम- 2009 विद्यालयों में लागू किये गये थे, वे सिर्फ नारा बनकर रह गये। छात्र के अनुपात शिक्षक एवं सुदृढ़ बुनियादी ढांचा मुहैया कराने के प्रावधान संचिकाओं में धूल फांकते रह गये। जो शिक्षक कार्यरत हैं उन्हें भी गैर शैक्षणिक कार्यों मुक्त करने का संकल्प पूरा नहीं हो सका।
सरकार की हर महत्वाकांक्षी योजना में शिक्षक लगा दिये जाते हैं। ऐसे में शिक्षकों के लिए शिक्षण द्वितीय प्राथमिकता हो जाती है। राज्य में शिक्षा पदाधिकारियों की भी दिनोदिन कमी होती जा रही है। शिक्षा विभाग के अनेक पद अतिरिक्त प्रभार से चलाये जा रहे हैं। इस परिस्थिति में पदाधिकारियों पर कार्य का बोझ तो बढ़ता ही है, उन्हें बहाने बनाने का अच्छा अवसर भी मिल जाता है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम की बात अभी हो ही रही थी कि नयी शिक्षा नीति-2020 का आगमन हो चुका है। जाहिर है कि इसमें कई प्रावधान प्रथमत: लागू किये जायेंगे। सरकारी प्रारंभिक विद्यालयों में पहली बार तीन वर्षों की प्री-स्कूली शिक्षा लागू किया जाना है। इसके बाद बच्चे प्रथम कक्षा में जायेंगे। इसी प्रकार कक्षा-षष्ठ से व्यावसायिक शिक्षा शुरू करने की बात है। इन प्रावधानों की चर्चा तो हो रही है,पर इसके लिए कार्य योजना का कहीं अता पता नहीं है। तैयारी के बिना इसे लागू करने की सिर्फ घोषणा फलदाई नहीं हो सकेगी।
सरकार कई कल्याणकारी योजना चला रही है। मगर भ्रष्ट तंत्र के आगे अच्छी अच्छी योजनाएं दम तोड़ देती हैं। कहने में संकोच नहीं है कि अफसरों को उत्तरदाई अधिक बनाये जाने की आवश्यकता है। उनकी कुर्सी जनता के प्रति जबावदेही है न कि दर्प के दिखावे की वस्तु।
राज्य में बहुत कुछ है। उसके ईमानदार संयोजन की आवश्यकता है।राजनीति है तो वोट की भी बात होगी। उनकी संख्या पर भी नज़र रहेगी। पर यह ध्यान रहना चाहिए कि स्वच्छ प्रशासन, त्वरित निर्णय क्षमता एवं न्यायप्रियता से ही सरकारें जनता के दिल में जगह बना पाती हैं।
समय का चक्र है, चलता ही रहेगा, किन्तु यह एक अप्रिय सत्य है कि विकास के बाईस साल के शोर शराबे में हताश जनता को आज भी प्रगति के सच्चे तेवर की तलाश है। (लेखक अध्यापक व स्वतंत्र लेखक हैं। उनका संपर्क नम्बर 900615 2176 है। )