विचार
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को लोकतांत्रिक बनाने की मुहिम...
ABN Bureau
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10 Oct, 2022
•
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एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। 24 अक्टूबर 1945 को गठित संयुक्त राष्ट्र संघ इस वर्ष अपनी 77 वीं वर्षगांठ मना रहा है।193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र संघ का कार्य अंतरराष्ट्रीय शांति -सुरक्षा बनाए रखना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, मानवीय सहायता पहुंचाना,सतत विकास को बढ़ावा देना और देशों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन कराना आदि हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के अधिवेशन में इसकी प्रासंगिकता और संरचना पर जारी बहस फिर एक बार मुखर हुई। मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अलोकतांत्रिक संरचना पर फिर से प्रकाश डाला गया है। भारत , ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देश जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए सारी योग्यता रखते हैं, को इसकी स्थाई सदस्यता मिलनी चाहिए इस बात पर भी जोर दिया गया। गत 21 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कि अब समय आ गया है कि इस संस्था को और समावेशी बनाया जाए ताकि वो वर्तमान विश्व की आवश्यकताओं को और भी अच्छे ढंग से पूर्ण कर सके। बाइडेन ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर की रक्षा करनी चाहिए और और बिल्कुल विषम परिस्थितियों में ही वीटो का प्रयोग करना चाहिए, ताकि परिषद विश्वसनीय और प्रभावी बनी रहे। उनके अनुसार इन्हीं वजहों से अमेरिका सुरक्षा परिषद में स्थाई और अस्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ाने का समर्थन करता है। वहीं अमेरिका का धुर विरोधी देश रूस ने भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नए देशों को भी प्रतिनिधित्व देने की बात कही है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के दौरान कहा कि सुरक्षा परिषद की शक्तियों को कुछ देश कमजोर कर रहे हैं, जिसको लेकर रूस चिंतित है। इसमें कोई शक नहीं है कि सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह से आज की वास्तविकताओं के साथ समायोजित किया जाना चाहिए।हम संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियों में लोकतांत्रीककरण की संभावनाएं देख सकते हैं।खास तौर से जिसमें अफ्रीकी एशियाई और लातिन अमेरिकी देशों का व्यापक प्रतिनिधित्व हो। रूसी विदेश मंत्री ने कहा उनका देश भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र में मुख्य भूमिका में देखना चाहते हैं। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर जिनकी संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए भाषण की काफी प्रशंसा हो रही है, ने भी सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग को फिर से उठाया। हालांकि उन्होंने सीधे सीधे तौर पर इस पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने भारत को एक बेहद जिम्मेदार देश बतलाते हुए कहा कि यह बड़ी जिम्मेदारियां लेने के लिए तैयार हैं। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि दुनिया में दक्षिण (देशों) के साथ हो रहे अन्याय को सही तरीके से देखा जाये। भारत की अपील है कि महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर ईमानदारी के साथ गंभीर बातचीत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए और विकासशील देशों को संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रियात्मक रणनीति से रोका नहीं जाना चाहिए। ऊपर कही गईं बातें आदर्श रूप में तो ठीक हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यथार्थ कुछ और और ही है।जी - 4 देश (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में की मांग करता रहा है। ये चारों देश सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए एक दूसरे की दावेदारी का समर्थन करते हैं। लेकिन सफलता अब तक नहीं मिली है। इसका कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों को मिला वीटो का अधिकार ही है। सुरक्षा परिषद में किसी भी प्रस्ताव के पारित होने के लिए इसके पांच स्थाई सदस्यों के सकारात्मक मत की जरूरत होती है। इसलिए जब तक पांचों स्थाई सदस्य सुरक्षा परिषद में नये स्थाई सदस्यों को शामिल कर उसकी सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए सहमत नहीं होते, यह मुहिम सफल नहीं हो सकता। यदि भारत को स्थाई सदस्यता देने का प्रस्ताव सुरक्षा परिषद में रखा जाये तो लगभग तय है कि चीन उस पर वीटो कर दे। वैसे जी- 4 का विरोध क्षेत्रीय असंतुलन का हवाला देकर यूनाइटिंग फोर कंसेंसस नामक समूह कर रहा है, जिसके सदस्य पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, इटली और अर्जेंटीना हैं। अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हो या रूस यूक्रेन संकट, संयुक्त राष्ट्र संघ जिस तरह मूक दर्शक बना रहा, इसे देखते हुए आज इसकी प्रासंगिकता पर फिर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में इसका लोकतांत्रीकरण होना बहुत जरूरी है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)
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