टीम एबीएन, रांची। मेदांता अस्पताल रांची में न्यूरोलॉजी विभाग के डॉ कुमार विजय आनंद ने दुर्लभ बीमारी न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका (एनएमओ) का इलाज दवाओं से करने में कामयाबी हासिल की है। उनकी यह कामयाबी इसलिए भी बड़ी है कि जो मरीज इसे लेकर उनके पास आया था उसमें बीमारी से संबंधित लक्षण स्पष्ट नहीं थे ऐसे में इस बीमारी की पहचान मुश्किल थी। दवाओं से मरीज को ठीक करने के बाद डॉ कुमार विजय आनंद ने कहा कि इस बीमारी के लक्षण की पहचान कर जल्द इलाज शुरू करना एवं जरूरी टेस्ट कराना महत्त्वपूर्ण है।
ऑटोइम्यून डिजीज है न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका
न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका (एनएमओ) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की एक ऑटोइम्यून डिजीज है, जो मस्तिष्क, आंखों और रीढ़ की नसों को मुख्य रूप से प्रभावित करता है। इस बीमारी में शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है, जिससे वह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और प्रोटीन ( AQP4 ) को बाहरी मानकर शरीर में एंटीबॉडी का निर्माण कर मस्तिष्क, आंखों और रीढ़ की नसों पर हमला करने लगता है।
इस दुर्लभ बीमारी और केस के बारे में मेदांता रांची के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ कुमार विजय आनंद कहते हैं कि झारखंड के सुदूर ग्रमीण इलाके से आए 46 वर्षीय मरीज को ब्रेन स्ट्रोक जैसी स्थिति में भर्ती किया गया था। मरीज को चक्कर, लगातार हिचकी और उल्टियां हो रही थी। इसके साथ ही मरीज के शरीर का पूरा बायां भाग लकवा ग्रस्त हो चुका था। जांच के बाद मरीज में न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका (एनएमओ) बीमारी का पता चला।
इस बीमारी की पहचान करना मुश्किल होता है। इस मरीज में ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण थे, जिससे इसकी पहचान करना और भी मुश्किल था।
आमतौर पर इसका प्रमुख लक्षण है - आंखों की रोशनी चले जाना, हमेशा सुस्ती बना रहना, चलने- फिरने में असंतुलन की स्थिति, लगातार हिचकी आना, उल्टियां होना, लकवा की शिकायत आदि।
इस बीमारी में मरीज के प्रतिरक्षा तंत्र मे असंतुलन हो जाती है औऱ नसों को नुकसान करने वाले एंटीबॉडी से मरीज की मस्तिष्क और स्पाइन की कोशिकाएं नष्ट होने लगती है और इसका दुष्प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है।
मरीज की जान बचाने के लिए इलाज जरूरी था : डॉ कुमार विजय आनंद ने बताया कि 46 वर्षीय इस मरीज में न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका के पूरे लक्षण मौजूद नहीं थे इसलिए इनकी बीमारी की पहचान करना मुश्किल था और इसके बाद मरीज को जीवन भर की अपंगता से बचाने के लिए इसका सही इलाज जरूरी था। मरीज के परिजनों ने आर्थिक दिक्कतों के कारण IVIG और प्लाज्माफेरेसिस जैसे इलाज कराने से मना कर दिया गया। ऐसी परिस्थितियों में हमने मरीज को हाई डोज स्टेरॉइड और कुछ एडवांस इमुनोमोडुलेटर टैबलेट्स देकर ठीक किया है। दूसरी बार जब मरीज फॉलोअप में आया तो उसके स्वास्थ्य में काफी सुधार पाया गया।