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योग आध्यात्मिक चरम व भगवान शिव की शरण में पहुंचने का उत्तम मार्ग : योगाचार्य महेश पाल

योग आध्यात्मिक चरम व भगवान शिव की शरण में पहुंचने का उत्तम मार्ग : योगाचार्य महेश पाल
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एबीएन हेल्थ डेस्क। भगवान शिव राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के प्रतीक माने जाते हैं, योगाचार्य महेश पाल बताते है कि भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करने का विशेष अवसर है। महाशिवरात्रि, जो भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का दिन माना जाता है।  इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और महाशिवरात्रि का व्रत रखने से पापों का नाश होता है। मानसिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 

प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है, योग विद्या मै भगवान शिव को आदियोगी आदि गुरु  आदि नामो से जाना जाता है। भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को योग की विद्या का ज्ञान दिया, जिसको संकलित हठयोगीक ग्रंथ शिवसंहिता में किया गया। जिसमें योग ज्ञान का वर्णन, नाड़ी संस्थान का वर्णन करने के साथ ही पांच प्राण उप प्राण का वर्णन, आसन व प्राणायाम व मुद्रा और साधक की घट परिचय निष्पत्ति आदि अवस्था का वर्णन मिलता है। 

आगे इसमें साधक के प्रकार व सप्त चक्र किस तरह हमारे जीवन में उपयोगी हैं। उसका विस्तार से माता पार्वती जी को भगवान शिव द्वारा बताया गया है। सामान्य मानव जीवन के लिए योग आवश्यक है। योग के द्वारा मानव अपने मन व इंद्रियों को स्थिर कर स्वयं को संसार के सभी बंधनों से मुक्त कर सकता है और धर्म की राह पर आगे बढ़कर योग द्वारा अपनी चेतना को विकसित कर अपने जीवन के उद्देश्य को पूर्ण करने में सफल हो जाता है। 

ध्यान के बारे में बताया गया है कि मस्तक में जो शुभ्र-वर्ण का कमल है। योगी प्रभात-काल में उस पदम में गुरू का ध्यान करते हैं कि वह शांत, त्रिनेत्र, द्विभुज है और वह वर एवं अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं। इस प्रकार यह ध्यान, गुरू का स्थूल ध्यान है। वही मूलाधार और लिंगमूल के मध्यगत स्थान में कुण्डलिनी सार्पाकार में विद्यमान हैं। इस स्थान में जीवात्मा दीप-शिखा के समान अवस्थित है। 

इस स्थान पर ज्योति रूप ब्रह्म का ध्यान करे। पूर्व जन्म के पुण्य उदय होने पर साधक की कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है। यह शक्ति जाग्रत होकर आत्मा के साथ मिलकर नेत्ररंध्र-मार्ग से निकलकर उर्ध्व-भागस्थ अर्थात ब्रह्मरंध्र की तरफ जाती है और जब यह राजमार्ग नामक स्थान से गुजरती है तो उस समय यह अति सूक्ष्म और चंचल होती है। इस कारण ध्यान-योग में कुंडलिनी को देखना कठिन होता है। 

साधक शांभवी-मुद्रा का अनुष्ठान करता हुआ, कुंडलिनी का ध्यान करे, इस प्रकार के ध्यान को सूक्ष्म-ध्यान कहते हैं। इस दुर्लभ ध्यान-योग द्वारा आत्मा का साक्षात्कार होता है और ध्यान सिद्धि की प्राप्ति होती है।योग आध्यात्मिक चरम व भगवान शिव के शरण मैं पहुंचाने का एक माध्यम है। जिसके द्वारा हम भगवान शिव का साक्षात्कार कर पाते और हम समस्त बंधनों से मुक्त होकर हमारी आत्मा उस परम सत्य में लीन हो जाती है।

 महाशिवरात्रि को शिव तत्त्व को आत्मसात करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को समाप्त करने और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त करने का सबसे उत्तम अवसर माना जाता है। इसलिए मानव जीवन में योग आवश्यक है योग से हम स्वस्थ रहते हैं और आध्यात्मिक के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपनी आत्मा को परमात्मा में लीन कर देते हैं जिससे कि हमारे जीवन के उद्देश्य पूरा हो जाता, इसलिए हमें हमारी दिनचर्या में योग को जरूर स्थान देना चाहिए।

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