- विश्व मस्तिष्क ट्यूमर दिवस : देश में 11 फीसदी की दर से बढ़ रहे मामले
एबीएन सेंट्रल डेस्क। नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ केबी शंकर बताते हैं कि डिजिटल स्क्रीन का संबंध सीधे मस्तिष्क और उससे जुड़े विकारों से है। इसे लेकर अब तक कई अध्ययन भी सामने आए हैं। हालांकि, जिस तरह कुछ साल पहले तक फेफड़े के कैंसर और धूम्रपान के बीच संबंध स्थापित नहीं हुआ था।
उसी तरह फोन और ब्रेन ट्यूमर के बीच संबंध विधिवत स्थापित नहीं है, लेकिन अगले 5-10 साल में यह प्रमाणित हो जाएगा कि मोबाइल फोन की वजह से इसके मामले बढ़ रहे हैं। इसके अलावा तनावपूर्ण जीवन शैली, प्रदूषण और खानपान भी इसके कारण हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए ब्रेन ट्यूमर की जल्दी पहचान हो सकती है। जिन शहरों में विशेषज्ञता युक्त अस्पताल नहीं है, वहां जिला अस्पतालों में इस तरह की मशीनें होनी चाहिए। मौजूदा समय में ज्यादातर एमआरआई मशीन एआई आधारित हैं, यह मस्तिष्क में ट्यूमर की सही जगह के साथ उसके आसपास की कोशिकाओं के बारे में भी बता सकती हैं।
दिल्ली स्थित जीबी पंत सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के डॉ दलजीत सिंह बताते हैं कि हर ट्यूमर की सर्जरी भी जरूरी नहीं होती। अगर मरीज का ट्यूमर बहुत छोटा है, तो पहले दवाएं दी जाती हैं। एक निश्चित समय तक मरीज में दवाओं का असर देखा जाता है। फिर से उसकी एमआरआई कराते हैं और देखते हैं कि ट्यूमर के आकार में कोई बदलाव आया या नहीं। अगर आकार नहीं बदला है तो सर्जरी को टाला भी जा सकता है।
डॉक्टरों के अनुसार, ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी को लेकर अब पहले जैसी स्थिति नहीं है। भारतीय अस्पतालों में कई ऐसी तकनीक मौजूद हैं, जिनके जरिये कम समय, छोटे कट और कम खर्च में ट्यूमर निकाला जा सकता है। इसके अलावा एंडोस्कोपिक ब्रेन ट्यूमर सर्जिकल प्रक्रिया है। गैर-इनवेसिव प्रक्रिया एलआईटीटी यानी लेजर प्रेरित एब्लेशन ट्यूमर थेरेपी और गामा नाइफ का भी इस्तेमाल होता है।