एबीएन, हेल्थ डेस्क। आज के दौर में हाई यूरिक एसिड के मरीजों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। जब हमारे लिवर में बनने वाला यूरिक एसिड किसी वजह से शरीर से बाहर नहीं निकल पाता, तो यह शरीर के छोटे जॉइंट्स में जमा हो जाता है। इसकी वजह से गाउट की समस्या हो जाती है और किडनी पर भी असर पड़ता है। कुछ मामलों में यूरिक एसिड बढ़ने की वजह से किडनी स्टोन हो जाता है तो कई बार किडनी फेलियर की नौबत भी आ जाती है। कई लोग यूरिक एसिड को डायबिटीज की तरह लाइलाज बीमारी मानते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। डायबिटीज की तुलना हाई यूरिक एसिड से करना सही नहीं है। इस बारे में हकीकत एक्सपर्ट से जान लेते हैं।
नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के सीनियर कंसल्टेंट डॉ अमरेंद्र पाठक के मुताबिक जब हमारे शरीर में लिवर या किडनी की फंक्शनिंग बिगड़ जाती है, तब यूरिक एसिड यूरिन के जरिए बाहर नहीं निकल पाता। इससे यूरिक एसिड का लेवल बढ़ जाता है। दूसरी तरफ डायबिटीज में मरीजों के शरीर में इंसुलिन रजिस्टेंस पैदा हो जाता है और ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है। डायबिटीज को दवाओं के जरिए कंट्रोल किया जा सकता है, लेकिन इस बीमारी को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। जबकि यूरिक एसिड की परेशानी को इलाज के जरिए पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। दोनों बीमारियों में यह सबसे बड़ा अंतर माना जा सकता है।
जड़ से खत्म हो सकती है यूरिक एसिड की समस्या : डॉ अमरेंद्र पाठक कहते हैं कि यूरिक एसिड बढ़ने पर अगर शुरुआत में ही इलाज कराया जाए तो इसे आसानी से कंट्रोल कर जड़ से खत्म किया जा सकता है। जब यूरिक एसिड हद से ज्यादा बढ़ जाता है तब इसे खत्म करने के लिए लंबा इलाज कराने की जरूरत होती है। डॉक्टर धीरे-धीरे यूरिक एसिड की दवाइयां कम करते जाते हैं और जब यह पूरी तरह ठीक हो जाता है तो दवाइयां बिल्कुल बंद कर देते हैं। हालांकि डॉक्टर की सलाह के बिना दवाइयां बंद नहीं करनी चाहिए।