टीम एबीएन, रांची। गायत्री शक्तिपीठ सेक्टर टू धूर्वा परिसर में आज पांच कुंडीय गायत्री महायज्ञ मंगल कलश पूजन-अर्चन एवं विवाह दिवसोत्सव संस्कार सहित संपन्न हुआ। इस दौरान गायत्री महामंत्र, संस्कार प्रकरण व यज्ञीय अनुष्ठान विधान पर संक्षिप्त प्रकाश डालकर बताया गया कि गायत्री महामंत्र के एक एक शब्द एवं तीनों चरण बहुत उत्कृष्ट हैं।
उनके अर्थ, भावार्थ व भावनात्मक विश्लेषण सराहनीय है। इस महामंत्र में ॐकार सहित उपयुक्त व्याहृति, तीन चरण, नौ शब्द एवं चौबीस अक्षर पर उसकी महिमा गरिमा, और विशेषताओं पर, ऋषि मुनियों और विद्वत जनों द्वारा गायी गयी महिमा पर प्रकाश डाला गया।
यज्ञीय पुरोहित ने बताया कि यह महामंत्र जीवन में श्रेष्ठतम के चयन की प्रेरणा देता है।मानव मौलिक रूप से स्वतंत्र है। अपनी प्रत्येक परिस्थिति के उत्तरदायी वह स्वयं है। क्योंकि प्रकृति ने उसे चयन की स्वतंत्रता दी है और परिस्थिति प्रारब्ध का प्रतिरूप होती है। प्रारब्ध स्वयं के पूर्व कर्मों का परिपाक है।
यही तत्सवितुर्वरेण्यं के अर्थ को भी साकार करता है। चयन बाद अगले क्रम में आगे उसी प्रकार भर्गो देवस्य धीमहि के माध्यम से आदर्शमय, व्यवहारिक, नैतिक जीवन धारण करना श्रेयस्कर है, धियो यो न: प्रचोदयात् परिष्कार, परिशोधन व परिमार्जन की प्रक्रिया है।
यही व्यापकता विवेकयुक्त बुद्धि अर्थात् परिष्कृत सद्बुद्धि युक्त प्रज्ञा रुप में गायत्री महामंत्र के अंतिम चरण में हृदय की पुकार है। यही जीवन की ऊर्ध्वगामिता के शिखर को स्पर्श कर मानवीय जीवन में सत्य बोध की समग्रता परिणति व अभिव्यक्ति को परिलक्षित करती है।
आगे गायत्री की मंगलमय महिमा पर प्रकाश डालकर बताया कि मानव जीवन परमात्मा की अनुकृति भी कही जाती है। ब्रह्म की सारी क्षमताएं मानव में भी छिपी रहती हैं। यह महामंत्र जीवन देवता की साधना का संदेश वाहक है। इसके प्रत्येक अक्षर में जीवन प्रबंधन के सूत्र समाये हैं।
साथ ही संस्कार प्रकरण व यज्ञीय कर्मकांड के विधान, लाभ व प्रभाव पर उद्बोधन दिया गया। अंत में एक कार्यकर्ता भाई-बहन के विवाह दिवसोत्सव संस्कार सोल्लास यज्ञीय विधान सहित सबके आशीर्वादी मंगलमय स्वस्तिवाचन पाठ सहित शुभ-शुभ कामना प्रदान कर किया गया।
अंत में सर्वत्र मंगलमय वातावरण विस्तार और उज्ज्वल भविष्य के स्वस्तिवाचन पाठ व जयघोष व प्रसाद वितरण कर समापन हुआ। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के जय नारायण प्रसाद और प्रमोद कुमार ने दी।
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