- कल पापुआ न्यू गिनी के पीएम जेम्स मरापे पीएम का पैर छूए। ये वाकया चर्चा में है, बीबीसी भी इसपर लिख रहा है
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत में पैर छूना आदर और सम्मान का सूचक है। कहा भी गया है कि पैर उसी का छूते हैं जिसका बहुत ज्यादा आदर करते हैं। लेकिन भारत से हजारों किमी पूर्व में एक अलग थलग से द्वीप देश का पीएम अगर हमारे पीएम का पैर छूयें तो ये कई मायने में आश्चर्यजनक बात है। जैसे...
- जेम्स मरापे के मन में ये भाव आ सकता था कि वह भी एक पीएम हैं वह क्यों छोटा दिखें?
- पापुआ न्यू गिनी भारत से बिल्कुल अलग संस्कृति रहन सहन वाला देश है। वह कैसे हमारे भारतीय परंपरा को आत्मसात कर लिया?
भारत ने कोरोना काल में ब्राजील जैसे बड़े देश से लेकर लैटीन अमेरिका के किसी गरीब और कुछेक लाख आबादी वाले देशों को भी फ्री में वैक्सीन और राहत सामग्री भेजी।
ब्राजील के प्रधानमंत्री तो वैक्सीन पाकर अभिभूत हो गये और कह बैठे कि जैसे हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आये थे वैसे ही भारत ने हमारे लिये हनुमान बन कर संजीवनी बूटी भेजा है।
याद कीजिये उस वैश्विक संकट में जब अमेरिका की फाइजर सरीखी कंपनियां अप्रभावी वैक्सीन को दुनिया भर में ब्लैकमेल कर बेचने के फिराक में थी तब भारत वेनेजुएला जैसे देशों को निशुल्क वैक्सीन मानवता के नाते भेज रहा था।उसी समय चीन पूरे विश्व से मदद में मिले उपकरणों को यूरोप में पैसे लेकर बेच रहा था।
हमने चिर शत्रु तुर्की को भूकंप के बाद आपरेशन दोस्त चला कर दिल खोल कर मदद की। इसके लिए तुर्कीवासी आभार जताते रहे। श्रीलंका, मालदीव, नेपाल सभी की मदद हमने की है। हाल में हमारे शत्रु देश चीन की नौका डूब गयी, तो भारत ने शत्रुता भूल कर अपना खोजी विमान भेजा।
भारत सरकार ने वैश्विक संकट में बिना भेदभाव के छोटे से छोटे देश की मदद की है।
अब कल्पना करें कि भारत की जगह अमेरिका, चीन, ब्रिटेन या यूरोप के देश होते तो क्या बगैर एक हाथ से दो एक हाथ से ल़ो के किसी की मदद करते? विश्व को यह समझना होगा कि भारत और भारतीय विश्व को एक परिवार समझते हैं।
हम किसी को मदद के नाम पर धन देकर धर्म नहीं बदलवाते, हम किसी को ये नहीं कहते कि सिर्फ हमारे परमेश्वर ही तुम्हारा उद्धार करेंगे, हम कभी नहीं कहते कि हमारे भगवान ही सर्वोपरि हैं और बाकियों की आस्था अंधविश्वास है। अब ऐसे देश के पीएम का कोई पैर छूता है तो यह उनका यथोचित वैश्विक सम्मान है।