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मेक इन इंडिया की सफलता के सूत्र...

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मेक इन इंडिया की सफलता के सूत्र...
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अजय दीप वाधवा

एबीएन बिजनेस डेस्क। कॉस्ट आडिट और मेक इन इंडिया देश में रोजगार के अवसर बढ़ाने, राष्ट्रीय आय में वृद्धि करने, उत्पादों के मूल्य में कमी करने के साथ-साथ इनकी आसानी से आम भारतीय को उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार ने मेक इन इंडिया योजना का प्रारंभ किया।

इसका उद्देश्य देश में ही उत्पादों को बनाकर उनके आयात में कमी करना भी था ताकि डॉलर के रिजर्व को कम होने से बचाया जा सके और आत्म निर्भर की परिकल्पना सच हो सके। पर मेक इन इंडिया को सफल करने के लिए यह भी आवश्यक है कि जो उत्पाद भारत में बनने आरंभ हों उनका विक्रय भी हो। 

हम सब जानते हैं कि कोई भी कंपनी किसी भी उत्पाद को स्टॉक में रखने के लिए नहीं, बल्कि विक्रय के लिए बनाती है। यदि उसके उत्पाद विक्रय नहीं होंगे तो कंपनी बंद हो जाएगी और सरकार का मेक इन इंडिया जैसी महत्वाकांक्षी योजना भी फेल हो जायेगी। इस कारण उत्पादों को बनाने के साथ साथ उनका विक्रय बढ़ाना भी आवश्यक है। पर समस्या यह है कि भारतीयों की क्रय करने की क्षमता सीमित है।

भारत तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था अवश्य है, पर अभी भी एतिहासिक कारणों से अधिकांश भारतीयों के पास विकसित देशों के नागरिकों की तुलना में कम आमदनी है और इस कारण वे महंगे उत्पाद नहीं खरीद सकते हैं। इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि अगर भारतीय उत्पादकों को अपने उत्पाद भारत में बेचने हैं तो उनकी उत्पादों की लागत और मुक्त को कम रखना होगा और इस बिंदु पर कॉस्ट आॅडिट की भूमिका समझ में आती है। 

कॉस्ट आडिट एक प्रक्रिया है जिसमें उत्पादक अपने उत्पादन के दौरान होने वाले तमाम लागत का विस्तृत विवरण नियमानुसार रखते हैं,  जिसका कॉस्ट अकाउंटेंट (सीएमए) विश्लेषण कर कंपनी को यह बताते हैं कि कौन सी लागत सही है और कौन सी लागत अनावश्यक है। अनावश्यक लागत को कम करने या बंद करने का तरीका भी कॉस्ट आडिट के दौरान बताया जाता है।

 इस से उत्पादक अपने लागत को नियंत्रण कर मूल्यों को भी नियंत्रण में रख पाते हैं। यह पाया गया है कि जो कंपनी लागत के विवरण को ठीक ढंग से रखती है और  कॉस्ट आडिट करवा कर दिए गए सुझावों का पालन करते हैं तो उनका उत्पादन लागत काफी कम हो जाता है जिससे न सिर्फ कम्पनी का लाभ बढ़ता है, बल्कि उसके उत्पादों के मूल्य भी कम होते हैं और उनका विक्रय बढ़ जाता है।

विकसित देशों ने कॉस्ट आडिट के महत्व को पहचान कर उनका पालन अपने देशों अनिवार्य कर दिया है पर भारत में इसके लिए जागरूकता कम पाई जाती है। भारत सरकार को चाहिए कि वह भारत की हर कंपनी में कॉस्ट आडिट को अनिवार्य कर दे ताकि अनावश्यक लागत को कम कर देश के संसाधनों का समुचित उपयोग सुनिश्चित किया जा सके और उत्पादों का मूल्य भी कम किया जा सकें। मूल्य कम होंगे तो आम व्यक्ति उत्पादों को खरीद पायेगा और सरकार का मेक इन इंडिया सफल हो पायेगा। (लेखक झारखंड की राजधानी रांची के प्रख्यात वित्त/कर विशेषज्ञ हैं।)

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