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आज ही के दिन 1907 में इंग्लैंड में मात्र 2.31 करोड़ पूंजी के साथ कंपनी बनी थी टाटा स्टील

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आज ही के दिन 1907 में इंग्लैंड में मात्र 2.31 करोड़ पूंजी के साथ कंपनी बनी थी टाटा स्टील
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जमशेदपुर। वर्तमान में देश की सबसे बड़ी स्टील कंपनी टाटा स्टील वैश्विक स्तर पर पांच शीर्ष स्टील कंपनियों में शामिल है। द टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड के नाम से यह कंपनी 26 अगस्त 1907 को इंग्लैंड में पंजीकृत कराया गया, हालांकि ब्रिटिश निवेशकों की प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक नहीं थी। 26 अगस्त 1907 को यह कंपनी भारत में 2,31,75,000 रुपये की मूल पूंजी के साथ पंजीकृत हुई। पूंजी जुटाने का नोटिस जारी किया गया, जिसे जबरदस्त सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और तीन सप्ताह के भीतर पूरी राशि जुटा ली गई। तब वर्तमान में झारखंड के साकची गांव में 1908 में वर्क्स का निर्माण शुरू हुआ जबकि पहली बार स्टील का उत्पादन 16 फरवरी, 1912 को शुरू हुआ। वर्तमान में टाटा स्टील लिमिटेड ग्रुप का सालाना टर्न ओवर 1,57,184 करोड़ रुपये है जबकि इसकी सालाना इस्पात उत्पादन क्षमता 33 मिलियन टन है। आइए जानते हैं कि स्वदेशी कंपनी की रोचक विकास यात्रा के बारे में : 1867 में जमशेदजी नसेरवानजी टाटा ने प्रसिद्ध ब्रिटिश निबंधकार थॉमस कार्लाइल के एक व्याख्यान में हिस्सा लिया जिसमें उन्होंने कहा था, जिस राष्ट्र को लोहे पर नियंत्रण प्राप्त होता है, वह जल्द ही सोने पर भी नियंत्रण प्राप्त कर लेता है। कार्लाइल को शायद ही पता होगा कि उनका यह व्याख्यान भारत को एक आर्थिक पुनरुत्थान की पथप्रदर्शक यात्रा की ओर ले जाएगा और इस प्रकार, उसी क्षण स्टील प्लांट के निर्माण को लेकर जमशेदजी के विचारों को सकारात्मक गतिशक्ति मिला। 1899 में मेजर महोन द्वारा भारत में इस्पात उद्योग को बढ़ावा देने की सिफारिश की एक रिपोर्ट को स्वीकृति मिली, जिसके आधार पर भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने तत्काल कदम उठाते हुए खनिज रियायत नीति को उदार बनाया, जिसने भारत को इसकी पहली एकीत इस्पात कंपनी देने के अपने सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए जमशेदजी को एक सुनहरा अवसर प्रदान किया। 1902 में पिट्सबर्ग, यूएसए में जमशेदजी की मुलाकात जूलियन कैनेडी, सहलिन ऐंड कंपनी लिमिटेड के प्रमुख जूलियन कैनेडी से हुई। जमशेदजी ने कैनेडी को भारत में एक इस्पात संयंत्र स्थापित करने की अपनी इच्छा के बारे में बताया। कैनेडी ने जमशेदजी को स्थानीय परिस्थितियों, कच्चे माल की उपलब्धता और भारत में बाजार की स्थितियों की गहन वैज्ञानिक जांच करने की सलाह दी। उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए न्यूयर्क के एक प्रख्यात कंसल्टिंग इंजीनियर चार्ल्स पेज पेरिन की भी सिफारिश की। 24 फरवरी, 1904 में टाटा को भारत के फर्स्ट ग्रेड जियोलजिस्ट प्रमथ नाथ बोस का एक पत्र मिला, जिसमें मयूरभंज राज्य में उच्च गुणवत्ता वाले लौह और झरिया में कोयले की उपलब्धता के बारे में बताया गया था। 1905 में चार्ल्स पेज पेरिन और उनके सहयोगी सी एम वेल्ड ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें इस्पात संयंत्र के निर्माण का खाका तैयार किया गया था। सितंबर 1905 में, मयूरभंज के महाराजा ने टाटा को पूर्वेक्षण (प्रस्पेक्टिंग) लाइसेंस प्रदान किया। 1906 में भारत सरकार ने एक आधिकारिक पत्र के माध्यम से एक विशेष अवधि के लिए इस्पात खरीदने का वादा कर टाटा की मदद करने के अपने इरादे जाहिर की। साथ ही, सरकार ने अन्य सहायता की भी घोषणा की, जिसकी आवश्यकता आगे चल कर कंपनी को अपना उत्पादन शुरू करने के लिए होने वाली थी।
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