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रांची विवि के संस्कृत विभाग में मना गुरुवंदन सह अभिनंदन कार्यक्रम

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रांची विवि के संस्कृत विभाग में मना गुरुवंदन सह अभिनंदन कार्यक्रम
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टीम एबीएन, रांची। गुरुवार को स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग रांची विश्वविद्यालय रांची में गुरुवन्दन व अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित किया गया। स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग के छात्र-छात्राओं द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथि रूप में पधारे सभी विभागीय प्राध्यापकों द्वारा दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती माता के चित्र पर माल्यार्पण के साथ किया गया। विभागीय छात्राओं रिचा, प्रिया, प्रतिमा आदि के द्वारा सरस्वती वंदना स्वागत गीत तथा गुरु वंदन गीत की सुमधुर प्रस्तुति की गई। इस अवसर पर बोलते हुए डॉ श्री प्रकाश सिंह ने कहा कि शिष्य भी गुरु बन सकता है, शिष्य में भी गुरुत्व की भावना आ सकती है, आवश्यकता है तो शिष्य को अपने गुरुत्व को जानने व पहचानने की। मन में प्रवेश कर गयी हीन भावनाओं को त्याग कर गुरु की महत्ता को समझें और अपनी सामर्थ्य को पहचानते हुए गुरु पद को प्राप्त कर सकते हैं। डॉ भारती द्विवेदी ने कहा कि गुरु शब्द की विभिन्न शास्त्रों में अनेक प्रकार की व्याख्या की गई है, गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, अवनति से उन्नति की ओर ले जाता है, और अपने छात्र को सफलता के उच्चतम शिखर तक ले जाने का प्रयत्न करता है। हमारी संस्कृति में गुरु और छात्र का संबंध बहुत ही मधुर रहा है। डॉ उषा टोप्पो ने कहा कि छात्रों द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम निश्चित रूप से सराहनीय है। आज के इस युग में गुरुवन्दन कार्यक्रम आयोजित करने का मुख्य प्रयोजन गुरु और शिष्य के सम्बन्धों को और अधिक प्रगाढ़ करना है। डॉ मधुलिका वर्मा ने कहा छात्र और शिक्षक दोनों मिलकर राष्ट्र की समुन्नति का कारण बन सकते हैं। छात्र और शिक्षक के सम्बन्धों में पारदर्शिता तथा विश्वसनीयता के साथ-साथ समर्पण की भावना का होना अत्यन्त आवश्यक है। तथा गुरु और शिष्य दोनों को अपने-अपने दायित्वों का भली प्रकार निर्वहन करना चाहिए। डॉ नीलिमा पाठक ने कहा कि गुरु और छात्र दोनों में अनुशासन, मर्यादा के साथ-साथ समय का पालन अत्यन्त आवश्यक है अनुशासित शिक्षक और छात्र ही समाज व राष्ट्र के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन सकता है। अगर सामान्य परिस्थितियों में देखा जाए तो अनुशासित व्यक्ति अपने विकास के साथ-साथ समाज व राष्ट्र का विकास कर सकता है। विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अर्चना कुमारी दुबे ने कहा की प्राचीन काल से ही गुरु और शिष्य के संबंधों की अनेक कहानियां हमारे साहित्य संसार को समलंकृत करती हैं तथा आज भी वही समर्पण भाव गुरुओं के प्रति देखकर हम गौरवान्वित हैं। गुरु शिक्षण के साथ-साथ समाज में मानवीय मूल्यों को स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। मंच संचालन विभागीय शोध छात्र जगदंबा प्रसाद सिंह ने तथा धन्यवाद ज्ञापन ज्योतिर्विज्ञान विभाग के प्राध्यापक एसके घोषाल ने किया। मौके पर विभागीय प्राध्यापकों के साथ-साथ डॉ धीरेंद्र दुबे,जगन्मय विश्वास, रुपेश कुमार प्रजापति, अजय कुमार अनिल पाण्डेय देव कुमार आदि उपस्थित रहे।
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