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आखिर क्यों पत्रकारिता के पेशे से भाग रहे हैं आज के युवा!

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आखिर क्यों पत्रकारिता के पेशे से भाग रहे हैं आज के युवा!
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राजकुमारी पाण्डेय

एबीएन डेस्क (रांची)। आजकल धीरे-धीरे लोगों का पत्रकारिता के प्रति रुझान कम होता जा रहा। इसके पीछे न केवल पत्रकारों को समुचित सम्मान न मिल पाना, गंभीर आर्थिक संकट, परिवार को समय न दे पाना समेत कई कारण है बल्कि समाज में उनकी खोती हुई प्रतिष्ठा भी अहम भूमिका निभा रही है। 

यही कारण है कि रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में एडमिशन लेने के बाद भी पत्रकारिता का कोर्स करने को इच्छुक विद्यार्थी क्लास नहीं कर रहे। आइये एक पत्रकार की पीड़ा आप सबों के समक्ष प्रस्तुत करता हूं। 

एक व्यथित पत्रकार ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि

हमने गलत प्रोफेशन (पत्रकारिता) चुन लिया। कभी-कभी लगता है जैसे ख़ुद को बर्बाद कर रहे हैं हम। हमारे फैमिली स्टेटस के हिसाब से यह सही नहीं है। क्षेत्रीय मुद्दों पर पत्रकारिता करने में न पैसा है न इज्जत। ऊपर से बदनामी मुफ़्त में मिलती है। पहले तो इस बात को रत्ती भर भी नहीं मानते थे, सोचते थे पैसे का क्या करेंगे? 

लेकिन वर्तमान में जो गुज़र रहा है उसे सार्वजनिक करने में कोई कुरेज नहीं है। सच्चाई यह है कि पिछले 4 साल में न तो परिवार को देने भर पैसा मिला और न ख़ुद के लिए फाइनेंसियल फ्रीडम। कॉर्पोरेट माइक उठा के महीनों चिल्लाने के बाद, सच दिखाने के बाद भी कंपनी ने चुटकी में ठुकराने के लिए नहीं सोचा। 

सेविंग तो छोड़िए यहाँ रोज़ का खर्चा निकलना मुश्किल हो जाता है। तभी सोचने लगे आख़िर सामाजिक सेवा करते-करते ख़ुद का The End न कर लू। ऊपर से ईमानदारी चोला पहने रिपोर्टर घूमे फिर रहे हैं फिर भी लोग पैसे लेने का आरोप लगा रहे हैं। तब जा के समझ आ रहा कि दुनिया कैसी है…

 आज जब एक साथ पापा की बीमारी, दादा का मृत्यु भोज, भाई की पढ़ाई, सामाजिक कार्य और ख़ुद के खर्चे का बोझ आया तो लाखों कर्ज हो गये। ऐसे में ख़ुद को समझ पाना मुश्किल हो रहा है। कभी लगता है संकुचित छोड़ के पैसे कमा लूँ और पापा-मम्मी की जरूरत पूरी कर दूँ तो कभी लगता है सामाजिक, राजनीतिक लड़ाई लड़ लूँ। 

लेकिन जब सामने अपने पारिवारिक भावनाओं को टूटते-बिखरते देख रहा हूँ तो कुछ भी करने का मन नहीं करता। और पिछले 4 महीने से इसी हलचल को रोज़ झेल रहा हूं। 3 महीने से न्यूज़ चैनल और कंपनी को छोड़ चुका हूं। राँची से गाँव और गाँव से राँची बस यही सिलसिला चल रहा है। जब भी सोच रहा हूँ कुछ बड़ा ब्लास्ट करना है तब एक हॉपिटल प्रॉब्लम आ जा रहा है। 

अपने परिजन को परेशान और बेबस देखके न जॉब करने का इक्षा हो रहा है और न ही ख़ुद के पेज पर काम। अगली कदम को लेकर बस प्लानिंग और प्लानिंग ही मन में चल रहा है। फिर भी पॉजिटिव हूं कि कुछ अच्छा होगा। अब आगे बुद्धिजीवी चाहने वाले लोगों से परामर्श चाहता हूं। 

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