अभिषेक शुक्ल
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। देश की सर्वोच्च भर्ती संस्था- संघ लोक सेवा आयोग आज अपने ही बनाये प्रश्नों के कारण कानूनी और नैतिक कटघरे में खड़ी है। सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2026 में 8 विवादित प्रश्नों को लेकर केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा जारी नोटिस ने परीक्षा प्रणाली में बढ़ते अकादमिक दुस्साहस को उजागर कर दिया है। उलझे हुए विकल्पों ने जहां ज्ञान के परीक्षण को तुक्केबाजी में बदलकर कोचिंग उद्योग को फलने-फूलने का अवसर दिया है, वहीं लाखों होनहार छात्रों का भविष्य दांव पर लगा दिया है।
यह विवाद अब महज कुछ प्रश्नों की त्रुटि का नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था लागू कर संस्था की गरिमा को पुनर्स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता का प्रतीक बन चुका है। संघ लोक सेवा आयोग को देश की सबसे बड़ी भर्ती एजेंसी के रूप में एक सम्मानित संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। दशकों से यह योग्यता का सर्वोच्च मानदंड रहा है, जिसने भारत की नौकरशाही के मजबूत इस्पाती ढांचे को आकार दिया है।
हालांकि, दामिनी राठौर एवं अन्य बनाम संघ लोक सेवा आयोग मामले में हाल ही में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा आयोग को जारी किया गया नोटिस एक गहराते संस्थागत संकट की ओर इशारा करता है। वर्तमान कानूनी विवाद की जड़ परीक्षा की रूपरेखा में ही निहित है। उम्मीदवारों ने सामान्य अध्ययन प्रथम प्रश्न-पत्र में 15 और सामान्य अध्ययन द्वितीय प्रश्न-पत्र में 12 प्रश्नों पर कड़ी आपत्ति जताई है। 180 में से 27 प्रश्नों का न्यायालय में विवादित होना यह दशार्ता है कि त्रुटि की गुंजाइश अब खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है।
विवादित प्रश्नों की यह चौंकाने वाली संख्या आयोग के अकादमिक दुस्साहस के एक चिंताजनक चलन को दशार्ती है। हाल के वर्षों में संघ लोक सेवा आयोग ने अस्पष्ट, पैराग्राफ-आधारित प्रश्नों और जटिल प्रारूपों पर अपनी निर्भरता बढ़ाई है। विकल्पों की बहुलता- जैसे कि केवल दो विकल्प सही हैं, प्रारूप, जो स्पष्ट नहीं करता कि कौन से दो विकल्प सही हैं- ने ज्ञान के परीक्षण को महज एक जुआ के खेल में बदल दिया है। यह प्रारूप परीक्षा भवन में ठोस समझ के बजाय अनुमान लगाने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है।
एक बुनियादी सवाल यह उठता है, ऐसे प्रश्न क्यों पूछे जाएं, जिन पर आयोग के अपने विषय विशेषज्ञों के बीच ही आम सहमति नहीं है? जब कठिनाई का स्तर विशेषज्ञों के स्थापित ज्ञान की सीमा को पार कर जाता है, तो यह स्वाभाविक रूप से न्यायालय में आयोग के लिए भारी मुश्किलें पैदा करता है। एक सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय होना चाहिए, न कि अनावश्यक रूप से जटिल। जैसा कि लियोनार्डो दा विंची ने कहा था, सादगी ही सबसे बड़ी परिष्कृतता है। प्रश्नों की रूपरेखा ऐसी होनी चाहिए कि उनका एक ही, स्पष्ट उत्तर हो, ताकि उस भ्रम से बचा जा सके जो अंतत: लंबी कानूनी लड़ाइयों का कारण बनता है।
यूपीएससी का उद्देश्य ज्ञान का परीक्षण करना होना चाहिए। बहुविकल्पीय प्रश्नों की मूल भावना तथ्यों के आधार पर ज्ञान की जांच करने में निहित है। वहीं, व्यक्तिपरक प्रश्नों की सबसे बड़ी खामी यह है कि एक ही उत्तर अलग-अलग लोगों को अलग-अलग स्तर पर सही या गलत लग सकता है। यूपीएससी ने बहुविकल्पीय प्रश्नों के मॉडल में भी व्यक्तिपरकता की इसी खामी को शामिल कर दिया है, क्योंकि इनके प्रश्न और उत्तर अब तथ्य-आधारित होने के बजाय मत-आधारित अधिक हो गये हैं। उदाहरण के तौर पर हम सेट ए के प्रश्न संख्या 12 को देख सकते हैं:
12. प्रारंभिक बौद्ध मूर्तिविद्या में रिक्त आसन क्या दर्शाता है?
- बुद्ध का ध्यान
- बुद्ध का प्रथम धर्मोपदेश
- बुद्ध का महापरिनिब्बान
- बुद्ध का महाभिनिष्क्रमण
संघ लोक सेवा आयोग की अनंतिम उत्तर कुंजी में इस प्रश्न का उत्तर (ए) बुद्ध का ध्यान दिया गया है, जो कि कक्षा 12 की एनसीईआरटी के अनुसार सही है। किंतु, टाटा मैकग्रा-हिल द्वारा प्रकाशित कृष्ण रेड्डी की पुस्तक भारतीय इतिहास (द्वितीय संस्करण) के अनुसार इसका सही उत्तर (डी) बुद्ध का महाभिनिष्क्रमण होना चाहिए। यूपीएससी ने स्वत: संज्ञान लेते हुए एक प्रश्न को रद्द कर दिया क्योंकि उसके सभी विकल्प गलत थे। किंतु, यहां सबसे बड़ा प्रश्न पारदर्शिता और जवाबदेही का उठता है।
एक आॅनलाइन पोर्टल के माध्यम से छात्रों से आपत्तियां मांगी गयी, किंतु उन आपत्तियों पर क्या निर्णय लिया गया, इसकी कोई सूचना संघ लोक सेवा आयोग ने नहीं दी। अंतिम उत्तर कुंजी प्रकाशित किए बिना ही प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम घोषित कर दिया गया। इससे छात्रों के मन में यह अनिश्चितता बनी हुई है कि उनकी आपत्तियों पर कोई कार्रवाई हुई भी या नहीं। इस अप्रत्याशितता और अनिश्चितता की एक भारी सामाजिक-आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ती है। परीक्षा की पूर्वानुमानित प्रकृति को समाप्त करके, आयोग अनजाने में उम्मीदवारों के बीच एक गहरा भय पैदा कर रहा है।
इस भय का सीधा लाभ तेजी से बढ़ता कोचिंग उद्योग उठाता है, जो परीक्षा के नये पैटर्न को डिकोड करने के नाम पर छात्रों की चिंता को भुनाता है। सभी को समान अवसर प्रदान करने के बजाय- जो एक संवैधानिक संस्था का मूल कर्तव्य है- यह अस्पष्ट मूल्यांकन प्रणाली उन लोगों के पक्ष में झुकी हुई है, जो महंगी टेस्ट-सीरीज और कोचिंग इकोसिस्टम का खर्च उठा सकते हैं। जिन उम्मीदवारों के मामले की केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण में सुनवाई हो रही है, उनकी मांगें केवल व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं हैं। वे ऐसे प्रणालीगत सुधारों की मांग कर रहे हैं, जिन्हें संघ लोक सेवा आयोग को अपनी गरिमा बनाये रखने के लिए तत्काल अपनाना चाहिए।
सबसे पहली और महत्वपूर्ण मांग है प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम घोषित होने से पहले अंतिम उत्तर-कुंजी का प्रकाशन। वर्तमान व्यवस्था में, उम्मीदवारों को इस बात की कोई जानकारी नहीं होती कि उनके पेपर का मूल्यांकन कैसे किया गया, और यह स्थिति पूरे वर्ष चलने वाले परीक्षा चक्र की समाप्ति तक बनी रहती है। परिणाम से पूर्व उत्तर-कुंजी प्रकाशित करने और उम्मीदवारों को उनके ओ.एम.आर की स्कैन कॉपी आॅनलाइन उपलब्ध कराने से संघ लोक सेवा आयोग की विश्वसनीयता और जवाबदेही बढ़ेगी, जिससे प्रतियोगी छात्रों के प्रारंभिक परीक्षा से जुड़े सभी संदेह स्वत: समाप्त हो जाएंगे।
इसके अतिरिक्त, अब समय आ गया है कि आयोग प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया को आधुनिक बनाये। प्रश्नों को अंतिम रूप देने से पहले उनके अस्पष्ट शब्दों, संभावित अर्थों और तथ्यात्मक विरोधाभासों की जांच के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत भाषा मॉडलों का उपयोग किया जाना चाहिए।
अंतत:, न्यायाधिकरण के समक्ष चल रहा यह विवाद संघ लोक सेवा आयोग के लिए मात्र एक कानूनी चुनौती नहीं है, बल्कि आत्ममंथन और व्यवस्था परिवर्तन का एक ऐतिहासिक अवसर है। 21वीं सदी का भारत एक ऐसी पारदर्शी चयन प्रक्रिया की मांग करता है, जहां आधुनिक तकनीक का उपयोग अस्पष्टता दूर करने के लिए हो और परिणामों की प्रक्रिया शीशे की तरह साफ हो।
भारत की नौकरशाही का भविष्य उन युवाओं के हाथों में सुरक्षित होना चाहिए, जिनका चयन उनकी वास्तविक योग्यता और स्पष्ट वैचारिक समझ के आधार पर हुआ हो, न कि परीक्षा भवन में किए गए किसी अंधे अनुमान या कोचिंग संस्थानों की महंगी रणनीतियों के बल पर। यदि आयोग समय रहते अपने प्रयोगात्मक प्रारूपों को त्यागकर इन ढांचागत सुधारों को अपना लेता है, तो यह न केवल लाखों मेधावी छात्रों का खोया हुआ विश्वास वापस लायेगा, बल्कि अपनी सर्वोच्च संवैधानिक गरिमा को भी एक नये, अभेद्य शिखर पर स्थापित करेगा। (लेखक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता है। यह उनके निजी विचार हैं।)