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रांची विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा के केंद्रीकरण का निर्णय विद्यार्थियों के हितों के विरुद्ध : आजसू

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रांची विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा के केंद्रीकरण का निर्णय विद्यार्थियों के हितों के विरुद्ध : आजसू
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एबीएन कैरिया डेस्क (रांची)। रांची विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित महाविद्यालयों में स्नातकोत्तर (पीजी) की पढ़ाई बंद कर केवल विश्वविद्यालय के विभागों में संचालित करने की खबर ने विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं अभिभावकों के बीच गंभीर चिंता उत्पन्न कर दी है। प्रदेश वरीय उपाध्यक्ष ऋतुराज शाहदेव ने कहा कि समाचारों के अनुसार विश्वविद्यालय से संबद्ध अनेक महाविद्यालयों में पीजी की सीटों का आवंटन शून्य कर दिया गया है तथा अब स्नातकोत्तर अध्ययन केवल विश्वविद्यालय परिसर के विभागों में संचालित किए जाने की तैयारी है।  

यह निर्णय झारखंड की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों की अनदेखी करता प्रतीत होता है। झारखंड का एक बड़ा भाग ग्रामीण, आदिवासी एवं दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित है, जहां से हजारों विद्यार्थी वर्षों से अपने निकटवर्ती महाविद्यालयों में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करते रहे हैं। यदि उन्हें उच्च शिक्षा के लिए केवल रांची या विश्वविद्यालय मुख्यालयों पर निर्भर होना पड़ेगा, तो आर्थिक रूप से कमजोर एवं ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना अत्यंत कठिन हो जाएगा। 

वर्तमान समय में झारखंड उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पहले से अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। सकल नामांकन अनुपात, आधारभूत संरचना, शिक्षकों की उपलब्धता तथा उच्च शिक्षा तक पहुंच जैसे मुद्दों पर राज्य को अभी लंबी दूरी तय करनी है। ऐसी स्थिति में महाविद्यालयों से पीजी शिक्षा समाप्त करना उच्च शिक्षा के विस्तार के बजाय उसके संकुचन की दिशा में उठाया गया कदम प्रतीत होता है। 

यह समझ से परे है कि जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति  उच्च शिक्षा के विस्तार, पहुंच और समावेशिता की बात करती है, तब विद्यार्थियों को उनके स्थानीय महाविद्यालयों से वंचित करने वाली व्यवस्था क्यों लागू की जा रही है। इससे छात्राओं, आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों तथा दूरदराज क्षेत्रों के युवाओं पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अनेक विद्यार्थी अतिरिक्त आवास, परिवहन एवं अन्य खर्च वहन करने में सक्षम नहीं होंगे, जिसके कारण ड्रॉपआउट दर में वृद्धि की आशंका है। 

झारखंड की परिस्थितियों को महानगरों या विकसित राज्यों के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। यहां की भौगोलिक विषमताएं, परिवहन की सीमाएं तथा सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताएं अलग हैं। एसी कमरों में बैठकर बनायी गयी नीतियां तब तक सफल नहीं हो सकतीं, जब तक वे जमीनी हकीकतों को ध्यान में न रखें। उच्च शिक्षा किसी प्रयोगशाला का विषय नहीं है, जहां विद्यार्थियों के भविष्य को दांव पर लगाकर लगातार नये प्रयोग किये जायें। 

हम रांची विश्वविद्यालय, झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग तथा संबंधित नीति-निर्माताओं से आग्रह करते हैं कि इस निर्णय पर पुनर्विचार करें। विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभागों को सुदृढ़ बनाने के साथ-साथ महाविद्यालयों में संचालित पीजी पाठ्यक्रमों को भी जारी रखा जाये, ताकि शिक्षा का विकेंद्रीकरण, समान अवसर और सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो सके। 

उच्च शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों तक पहुंच होनी चाहिए, न कि विद्यार्थियों के लिए शिक्षा तक पहुंचना कठिन बनाना। झारखंड के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए इस निर्णय की व्यापक समीक्षा समय की मांग है। उक्त जानकारी अखिल झारखंड छात्र संघ (आजसू) के प्रदेश वरीय उपाध्यक्ष ऋतुराज शाहदेव ने दी।

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