बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान, मेसरा में रूट्स टू रेनैसांस कार्यशाला का दूसरा दिन: जनजातीय विरासत, नवाचार और डिजिटल उद्यमिता के समन्वय पर जोर
टीम एबीएन, रांची। बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान मेसरा में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला रूट्स टू रेनैसांस: झारखंड में जनजातीय विरासत, नवाचार और डिजिटल उद्यमिता का समन्वय का दूसरा दिन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस कार्यशाला का आयोजन बीआईटी मेसरा के प्रबंधन विभाग ने मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के सहयोग से किया। कार्यक्रम में विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और छात्रों ने भाग लेकर जनजातीय विरासत, तकनीक और नवाचार के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि आसिफ इकराम, निदेशक, कला एवं संस्कृति विभाग, गवर्नमेंट आॅफ झारखंड ने उपस्थित लोगों को संबोधित किया और इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि झारखंड की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और उसे व्यापक स्तर पर प्रचारित करने के लिए आधुनिक तकनीकी साधनों और नवाचारी मंचों का उपयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि जनजातीय विरासत से जुड़े शोध और जागरूकता को मजबूत करने के लिए सरकारी संस्थानों और बीआईटी मेसरा के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग के बीच सहयोग को और बढ़ाया जाना चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान कई विशेषज्ञों द्वारा कार्यशालाएं आयोजित की गयीं। डिजाइनर सुमंगल नाग ने वस्त्र और जनजातीय विरासत विषय पर सत्र का संचालन किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से पारंपरिक जनजातीय वस्त्रों के डिजाइन और पैटर्न को नये रूप में विकसित कर अभिनव सांस्कृतिक उत्पाद तैयार किये जा सकते हैं।
एक अन्य रोचक सत्र शैलेंद्र पाठक ने आयोजित किया, जिसमें उन्होंने शास्त्रीय संगीत, जनजातीय संगीत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समन्वय पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि किस प्रकार विभिन्न पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनियों को मिलाकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से नये वाद्य संगीत के रूप तैयार किए जा सकते हैं।
इसके अतिरिक्त हिमांशु कुमार ने जनजातीय लोककथाएं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता विषय पर कार्यशाला आयोजित की। इस सत्र में उन्होंने बताया कि किस प्रकार आधुनिक डिजिटल चित्रण तकनीकों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से जनजातीय लोककथाओं, पारंपरिक कलाओं और दृश्य कथाओं को नये डिजिटल स्वरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यह कार्यशाला डॉ. मृणाल पाठक के मार्गदर्शन एवं पर्यवेक्षण में सुचारु रूप से संचालित की जा रही है।
कार्यक्रम का समापन रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुआ। इसमें एक जनजातीय परिधान प्रदर्शनी का आयोजन किया गया, जिसमें पारंपरिक परिधानों और हस्तशिल्प की सुंदर झलक प्रस्तुत की गयी। कार्यक्रम का अंत प्रसिद्ध पाइका नृत्य की ऊजार्वान प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसने झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रूप में सामने रखा। इस कार्यशाला का उद्देश्य जनजातीय परंपराओं और आधुनिक तकनीकों के बीच संवाद और नवाचार को प्रोत्साहित करना था, ताकि छात्र, शोधकर्ता और उद्यमी सांस्कृतिक संरक्षण और डिजिटल उद्यमिता के क्षेत्र में नयी संभावनाओं का अन्वेषण कर सकें।