विशेष लेख : शिक्षा, समाज और भविष्य
भूमिका : एक बदली हुई कक्षा की तस्वीर
प्रशांत झा
एबीएन कैरियर डेस्क। लगभग 10-12 वर्ष पहले तक देश के शीर्ष तकनीकी संस्थानों की कक्षाओं में एक दृश्य बार-बार दिखाई देता था। 40 विद्यार्थियों की कक्षा में 1 या अधिकतम 2 छात्राएं। यह दृश्य सामान्य माना जाता था। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान और सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान लंबे समय तक पुरुष-प्रधान माने गये। तकनीकी शिक्षा को लेकर समाज में यह धारणा गहराई से बैठी थी कि यह क्षेत्र मुख्यत: लड़कों के लिए उपयुक्त है, जबकि लड़कियों के लिए इसे कठिन, असुरक्षित या अनुपयुक्त माना जाता रहा।
लेकिन पिछले 7 वर्षों (2018 से 2025) में यह तस्वीर निर्णायक रूप से बदली है। आज वही कक्षाएं अधिक संतुलित दिखायी देती हैं। छात्राएं न केवल संख्या में बढ़ी हैं, बल्कि उन्होंने यह भी सिद्ध किया है कि वे मेधा, परिश्रम, अनुशासन और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में किसी से कम नहीं हैं। वे शीर्ष रैंक ला रही हैं, संगणक विज्ञान जैसी कठिन शाखाओं को चुन रही हैं और संस्थानों से निकलकर उद्योग तथा अनुसंधान दोनों क्षेत्रों में मजबूत पहचान बना रही हैं।
यह लेख इसी परिवर्तन की कहानी कहता है- आंकड़ों के साथ, तर्क के साथ और सामाजिक संदर्भ के साथ
खंड 1 : 7 वर्षों में बदली तस्वीर- आंकड़ों की जुबानी
यदि 2018 से पहले की स्थिति देखें, तो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में छात्राओं की हिस्सेदारी लगभग 8-10% के बीच थी। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और अन्य सरकारी तकनीकी संस्थानों में यह प्रतिशत थोड़ा अधिक था, किंतु वहां भी स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती थी। 2020 तक यह अनुपात बढ़कर लगभग 15-16% तक पहुंचा। 2023 से 2025 के बीच यह आंकड़ा और सुदृढ़ होकर 18-21% के बीच स्थिर हुआ।
आज स्थिति यह है कि हर 5 विद्यार्थियों में लगभग 1 विद्यार्थी छात्रा है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों और सरकारी सहायता प्राप्त तकनीकी संस्थानों में कई स्थानों पर यह अनुपात 22झ्र25% तक भी पहुंच चुका है। यह परिवर्तन केवल संख्या का नहीं है। यह भारतीय उच्च तकनीकी शिक्षा की सामाजिक संरचना में आया एक ऐतिहासिक बदलाव है।
खंड 2 : परिवर्तन के पीछे कौन-से कारक रहे
इस बदलाव के पीछे केवल एक कारण नहीं, बल्कि कई कारकों का संयुक्त प्रभाव रहा।
- छात्राओं के लिए अतिरिक्त सीटों की नीति : छात्राओं की भागीदारी बढ़ाने हेतु लागू की गई अतिरिक्त सीटों की व्यवस्था सबसे निर्णायक कदम सिद्ध हुई। यह व्यवस्था किसी भी वर्ग की सीट कम किए बिना केवल छात्राओं के लिए अतिरिक्त अवसर उपलब्ध कराती है।
- अभिभावकों की सोच में परिवर्तन : अब बेटियों की तकनीकी शिक्षा को जोखिम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सम्मान और भविष्य की सुरक्षा के रूप में देखा जाने लगा है।
- प्रवेश परीक्षाओं में छात्राओं की बढ़ती भागीदारी : संयुक्त प्रवेश परीक्षा (मुख्य) में छात्राओं टॉगल सहभागिता। पहले: लगभग 20-22%, वर्तमान में: 30-33%
- सफल छात्राओं की दृश्यता : लगातार कई वर्षों से टॉप 50 और टॉप 100 रैंक में छात्राओं की उपस्थिति ने समाज की सोच को बदला है।
खंड 3 : अतिरिक्त सीटों को लेकर फैली भ्रांतियां
आज भी समाज में यह धारणा प्रचलित है कि छात्राओं के लिए अतिरिक्त सीटें अन्य विद्यार्थियों के अवसर कम करती हैं। यह धारणा तथ्यात्मक रूप से असत्य है। अतिरिक्त सीटें- पहले से मौजूद सीटों के ऊपर जोड़ी जाती हैं। किसी भी वर्ग की सीट कम नहीं करतीं। केवल छात्राओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए होती हैं।
उदाहरण के लिए यदि किसी शाखा में पहले 100 सीटें थीं और छात्राओं की भागीदारी बढ़ाने हेतु 20 अतिरिक्त सीटें जोड़ी गयीं, तो कुल सीटें 120 हो जाती हैं। इन 20 सीटों पर केवल छात्राओं को प्रवेश मिलता है, जबकि छात्राएं पहले की 100 सीटों पर भी समान रूप से प्रतिस्पर्धा करती हैं। अर्थात अवसर बढ़ता है, घटता नहीं।
खंड 4 : तकनीकी संस्थानों में सीटों का कुल स्वरूप
प्रत्येक वर्ष देश में लगभग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान: 17,500-18,000 सीटें। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान: लगभग 24,000 सीटें। सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान: 8,000-9,000 सीटें। अन्य सरकारी तकनीकी संस्थान: कई हजार सीटें।
कुल मिलाकर 60,000+ तकनीकी स्नातक सीटें हर वर्ष अतिरिक्त सीटों की नीति के कारण कुल प्रवेश क्षमता बढ़ी। अधिक विद्यार्थियों को अवसर मिला। छात्राओं की भागीदारी सुदृढ़ हुई।
खंड 5 : प्रवेश परीक्षाओं में छात्राओं का वास्तविक प्रदर्शन
यह धारणा कि छात्राएं केवल विशेष प्रावधानों से आती हैं, आंकड़ों के सामने टिक नहीं पाती। संयुक्त प्रवेश परीक्षा (मुख्य) में हर वर्ष बड़ी संख्या में छात्राएं 99+ प्रतिशतांक प्राप्त कर रही हैं। संयुक्त प्रवेश परीक्षा (उन्नत) में चयनित छात्राएं पहले ही अत्यंत कठिन शैक्षणिक स्तर पार कर चुकी होती हैं। कई बार उनके अंक कुल सर्वोच्च रैंक के अत्यंत समीप होते हैं। यह स्पष्ट करता है कि छात्राएं केवल सीटें नहीं ले रहीं, वे प्रतिस्पर्धा जीत रही हैं।
खंड 6 : आरक्षण व्यवस्था और छात्राओं की भूमिका
छात्राओं के लिए अतिरिक्त सीटें सामाजिक आरक्षण व्यवस्था से अलग हैं। किन्तु योग्यता की शर्त सभी पर समान रूप से लागू होती है। कोई भी छात्रा बिना आवश्यक अंक, बिना परीक्षा उत्तीर्ण किये, प्रवेश प्राप्त नहीं कर सकती। यह व्यवस्था अवसर बढ़ाती है, मानक नहीं गिराती।
खंड 7 : शाखा चयन में छात्राओं की परिपक्वता
पिछले 7 वर्षों में छात्राओं द्वारा चुनी गई प्रमुख शाखाएं संगणक विज्ञान एवं अभियांत्रिकी, इलेक्ट्रॉनिकी एवं संचार अभियांत्रिकी, विद्युत अभियांत्रिकी, आंकड़ा विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता। इनका चयन रोजगार संभावनाओं, वैश्विक अवसरों, तकनीकी भविष्य को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।
खंड 8 : नियोजन और वेतन में समानता
शीर्ष तकनीकी संस्थानों के नियोजन आंकड़े बताते हैं चयन में लिंग नहीं, क्षमता निर्णायक है। वेतन और भूमिका कौशल पर आधारित होती है। संगणक और इलेक्ट्रॉनिकी शाखाओं में औसत वार्षिक वेतन 20-25 लाख रुपये तक छात्राओं को भी अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव।
खंड 9 : शीर्ष छात्राओं की पसंद का सामाजिक संदेश
शीर्ष रैंक प्राप्त छात्राओं द्वारा कठिनतम शाखाओं और प्रतिष्ठित संस्थानों का चयन यह स्पष्ट करता है कि छात्राएं किसी रियायत की नहीं, बल्कि समान प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा रखती हैं।
खंड 10 : संस्थान-वार स्थिति
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) लगभग 20% छात्राएं, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) कई स्थानों पर 25% तक, सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईआईटी) संगणक केंद्रित झुकाव, अन्य सरकारी संस्थान(जीएफटीआई) निरंतर वृद्धि।
खंड 11 : शेष चुनौतियां
उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों की कमी, सामाजिक दबाव, मार्गदर्शन का अभाव , अब भी बाधा बने हुए हैं। नीति के साथ सामाजिक सहयोग भी अनिवार्य है।
खंड 12 : आगे का मार्ग
छात्राओं के लिए आत्मविश्वास, अवधारणात्मक अध्ययन, दीर्घकालिक लक्ष्य, अभिभावकों के लिए, विश्वास समर्थन, अवसर उपलब्ध कराना, विद्यालयों के लिए प्रतिभा पहचान, समान मार्गदर्शन, प्रेरणादायक वातावरण।
निष्कर्ष : गरिमा के साथ बढ़त
पिछले 7 वर्षों में छात्राओं ने भारतीय तकनीकी शिक्षा की दिशा बदल दी है। वे अब परिधि में नहीं, केंद्र में हैं। संख्या भले सीमित हो, परंतु मेधा, प्रभाव और आत्मविश्वास में वे किसी से कम नहीं। संदेश स्पष्ट है छात्राएं तकनीकी संस्थानों में अतिथि नहीं हैं। वे वहां अपने परिश्रम, योग्यता और आत्मसम्मान के बल पर उपस्थित हैं। (लेखक शिक्षा विषयों के स्वतंत्र विश्लेषक हैं।)