Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
लाइव: 38
होम ई-पेपर देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन
कानून व्यवस्था

नाबालिगों को सोशल मीडिया के जोखिमों से बचाने को सुप्रीम कोर्ट सख्त

शेयर करें: WhatsApp Facebook X Back to ePaper
नाबालिगों को सोशल मीडिया के जोखिमों से बचाने को सुप्रीम कोर्ट सख्त
विज्ञापन

नाबालिगों को सोशल मीडिया से जुड़े जोखिमों से बचाने के लिए सुरक्षा उपायों की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जारी किया नोटिस 

एबीएन सेंट्रल डेस्क (नयी दिल्ली)। सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को आॅनलाइन शोषण और सोशल मीडिया व अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े दूसरे जोखिमों से बचाने के लिए फायरवॉल (नेटवर्क सुरक्षा प्रणाली) समेत प्रभावी सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की मांग की गयी है। 

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस की ओर से दायर इस याचिका में इस बात को लेकर चिंता जतायी गयी है कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 11 के तहत नाबालिगों के अनुबंध करने में सक्षम न होने के बावजूद उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्वतंत्र रूप से अकाउंट बनाने और संचालित करने की अनुमति दी जा रही है। 

याचिका में कहा गया है कि उपयोगकर्ताओं की उम्र और उनकी ओर से किसी कानूनी रूप से वैध अनुबंध में प्रवेश करने के अधिकार को सत्यापित करने वाली प्रभावी और एक समान व्यवस्था के अभाव में बच्चे आॅनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, डिजिटल ट्रैफिकिंग, सेक्सटॉर्शन, व्यवहार संबंधी प्रोफाइलिंग, निजी डेटा के दुरुपयोग, साइबर बुलिंग और उम्र के अनुरूप न होने वाली एडल्ट सामग्री के संपर्क जैसे गंभीर जोखिमों के सामने आ रहे हैं। 

इस मामले की सुनवाई भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना भी शामिल थे। याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह सोशल मीडिया इंटरमीडियरी समेत डिजिटल प्लेटफॉर्मों को सूचित करे कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया गया कोई भी अनुबंध शुरू से ही अवैध है और इसके आधार पर आगे की जाने वाली किसी भी कार्रवाई को निलंबित किया जाये। 

याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी नियम- 2021 में एक विशेष प्रावधान शामिल करने अथवा उपयुक्त दिशा-निर्देश तैयार करने की भी मांग की गयी है, ताकि नाबालिग माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति के बिना ऐसा कोई अनुबंध न कर सकें। इसके साथ ही माता-पिता या अभिभावक की पहचान और उनके अधिकार की पुष्टि इलेक्ट्रानिक केवाईसी अथवा कानूनन मान्य किसी अन्य व्यवस्था के माध्यम से किए जाने की मांग की गई है। 

याचिका में यह भी मांग की गयी है कि जहां नाबालिगों को डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच की अनुमति है, वहां माता-पिता या अभिभावक की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए परामर्श जारी किये जायें और संबंधित डिजिटल सेवा की प्रकृति तथा उससे जुड़े जोखिम के अनुरूप सुरक्षा उपाय लागू किये जायें। सरकार की ओर से उपयुक्त व्यवस्था तैयार किए जाने तक अंतरिम दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की गयी है। 

सुप्रीम कोर्ट में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फुल्का ने कहा, काननून नाबालिग कोई अनुबंध नहीं कर सकता और यह कानूनी संरक्षण केवल इसलिए समाप्त नहीं हो सकता कि समझौता कागज से निकलकर आॅनलाइन एक क्लिक के जरिए किया जा रहा है। हर दिन लाखों बच्चों को केवल उनके द्वारा बतायी गयी जन्मतिथि के आधार पर शक्तिशाली डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोड़ा जा रहा है। न वास्तविक उम्र का सत्यापन होता है और न ही अभिभावक की कोई भूमिका सुनिश्चित की जाती है। 

हमारी याचिका इसी अंतर को समाप्त करने और यह सुनिश्चित करने के लिए है कि आॅफलाइन बच्चे को मिलने वाला वही कानूनी संरक्षण आॅनलाइन दुनिया में भी समान रूप से लागू हो। उन्होंने कहा, अदालत ने कहा है कि भारत में सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है और डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा के लिए कुछ फायरवॉल (नेटवर्क सुरक्षा प्रणाली) होने चाहिए। हम आज जारी किये गये नोटिस का स्वागत करते हैं। यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है कि कानून उस डिजिटल दुनिया के साथ कदम मिलाकर चले, जहां आज बच्चे वास्तव में मौजूद हैं। 

याचिका में बच्चों को डिजिटल इकोसिस्टम से बाहर करने की मांग नहीं की गई है। इसमें कहा गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म शिक्षा, शोध, कौशल विकास, परीक्षा की तैयारी, करियर के अवसरों और नागरिक भागीदारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। याचिका का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नाबालिगों की डिजिटल पहुंच केवल उनके द्वारा उम्र की अप्रमाणित घोषणा पर निर्भर न हो, बल्कि इसके लिए कानूनी रूप से जवाबदेह और डिजिटल रूप से सत्यापित व्यवस्था मौजूद हो। 

याचिका में डिजाइन के स्तर पर रोकथाम की अवधारणा को अपनाने की वकालत की गई है। इसके तहत डिजिटल सेवाओं को डिजाइन और उपलब्ध कराते समय ही बच्चों के लिए संभावित और पूवार्भासी जोखिमों को दूर किया जाए, बजाय इसके कि नुकसान होने के बाद केवल उसकी पहचान, शिकायत, हानिकारक सामग्री हटाने या दोषियों के खिलाफ कार्रवाई पर निर्भर रहा जाये। 

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस की जनरल काउंसिल रचना त्यागी ने कहा, डिजिटल सुरक्षा की शुरूआत डिजाइन के स्तर पर रोकथाम से होनी चाहिए। हमें नुकसान होने का इंतजार करके उसके बाद प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। हमें अपने स्कूलों, अपनी माइग्रेशन प्रणालियों और अपनी तकनीकों को इस तरह डिजाइन करना होगा कि शोषण के लिए कोई जगह ही न बचे। इस खबर से संबंधित अधिक जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (85959 50825) से संपर्क करें। 

विज्ञापन