एबीएन सेंट्रल डेस्क। दशकों से चली आ रही भूमि अधिग्रहण की अड़चनें, अफसरशाही और केंद्र-राज्यों के बीच टकराव से 1.26 लाख करोड़ रुपये की 116 महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है। इन परियोजनाओं पर 20,311 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय किया जा चुका है लेकिन केंद्र अब इसे पूरी तरह से बंद करने की योजना बना रहा है।
नीति आयोग द्वारा तैयार की गई आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार 116 परियोजनाओं को चिह्नित किया गया है, जिन्हें रद्द करने, रोकने या बंद करने पर विचार किया जाएगा। इन्हें केंद्र की परियोजना निगरानी तंत्र से हटाया जा सकता है। इस निगरानी तंत्र को बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाने के लिए बनाया गया है। बिजनेस स्टैंडर्ड ने भी इस रिपोर्ट को देखा है।
रिपोर्ट में पाया गया है, इस तरह की ज्यादातर परियोजनाएं रेलवे और सड़क क्षेत्र से जुड़ी हैं। रेलवे की बात करें तो 50 परियोजनाओं को रोका जायेगा (इनमें से कुछ को 40 साल पहले स्वीकृति दी गई थी) और 15 को अभी मंजूरी भी नहीं मिली है। इसी तरह सड़क क्षेत्र की 33 परियोजनाओं को बंद या निलंबित किया जा सकता है। ऐसे में ज्यादातर निवेश रेलवे और सड़क क्षेत्र में भी लगा है।
वित्त वर्ष 2023 के बजट में रेलवे और सड़क परिवहन विभाग को नई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विकास के लिए सबसे अधिक धन का आवंटन किया गया था। लेकिन दशकों से लंबित परियोजनाओं में पैसे डूबने से वित्तीय कुशलता को लेकर भी चिंता खड़ी होती है। इनमें से अधिकांश परियोजनाओं की जगह नई परियोजनाएं लाई जा सकती हैं।
कई परियोजनाओं में देरी की वजह से उनकी लागत में भी लगातार इजाफा हुआ है। रेलवे की अटकी परियोजनाओं की लागत 49 फीसदी बढ़कर 88,373 करोड़ रुपये हो गई। रेलवे की 72 परियोजनाओं पर अब तक कुल 8,500 करोड़ रुपये से अधिक का पूंजीगत व्यय किया जा चुका है।
इसी तरह सड़क परिवहन और राजमार्ग की 33 परियोजनाएं लंबे समय से अटकी हुईं हैं, जिनकी लागत में 6 फीसदी का इजाफा हुआ है। इन परियोजनाओं पर अब तक 11,000 करोड़ रुपये का खर्च हो चुका है। इन 116 परियोजनाओं में से 55 से अधिक परियोजनाओं को केंद्र और राज्यों के बीच भूमि अधिग्रहण के मुद्दों और अफसरशाही के कारण या बंद कर दिया गया या ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार संबंधित मंत्रालयों ने राज्य सरकारों द्वारा जमीन अधिग्रहण की मंजूरी नहीं देने या जरूरी मंजूरियां नहीं देने की बात कही थी।
इस बीच करीब 10 परियोजनाएं राज्यों के साथ लागत साझेदारी अनुबंध का पालन नहीं करने के कारण अटकी हुई हैं। उदाहरण के लिए रतलाम और डूंगरपुर को जोड़ने वाली बहु-राज्यीय रेलवे परियोजना को रोक दिया गया था क्योंकि राजस्थान सरकार ने परियोजना की लागत साझा करने में असमर्थता जताई थी और इस पर करीब 191 करोड़ रुपये का खर्च किया जा चुका है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की दो कोयला परियोजनाओं को पर्यावरण संबंधी मुद्दों की वजह से निगरानी तंत्र से हटाया जा सकता है।