Breaking News
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
खेल समाचार

क्रिकेटर बनने के लिए रोज ढाई घंटे लोकल ट्रेन में सफर करती थीं झूलन गोस्वामी

क्रिकेटर बनने के लिए रोज ढाई घंटे लोकल ट्रेन में सफर करती थीं झूलन गोस्वामी
विज्ञापन
एबीएन स्पोर्ट्स डेस्क। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की दिग्गज पेसर झूलन गोस्वामी का दो दशक लंबा क्रिकेट करियर अब खत्म होने जा रहा है। वो लॉर्ड्स में इंग्लैंड के खिलाफ अपना आखिरी इंटरनेशनल मैच खेल रही हैं। झूलन ने 2002 में 6 जनवरी को इंग्लैंड के खिलाफ ही अपने इंटरनेशनल करियर का आगाज किया था और आखिरी मैच भी उसी टीम के खिलाफ खेल रही हैं। झूलन ने बंगाल के छोटे से गांव चकदा से टीम इंडिया तक का सफर तय किया। हालांकि, यह सफर आसान नहीं रहा। उन्हें कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ा। लेकिन, मन में क्रिकेटर बनने की ऐसी जिद थी कि सपना पूरा हो ही गया। झूलन गोस्वामी बंगाल के छोटे से गांव चकदा में ही पली बढ़ीं। घर में सब लड़के क्रिकेट खेलते थे, तो उनका काम गेंद उठाकर देना होता था। ऐसा करते-करते झूलन को भी इस खेल से लगाव हो गया। जब भाई दोपहर में सो जाते थे तो वो अकेले प्रैक्टिस करती थीं, तो इस तरह उनके क्रिकेट खेलने की शुरुआत हुई। हालांकि, गांव के लड़कों को मनाना उनके लिए आसान नहीं था। उन्होंने एक इंटरव्यू में यह बात बताई थी। दरअसल, लड़कों की नजर में झूलन धीमी गेंदबाजी करती थीं। ऐसे में उन्होंने तेज गेंदबाज बनने की ठानी। लेकिन, गांव की लड़की के लिए ऐसा करना आसान नहीं था झूलन के गांव में क्रिकेट को लेकर कोई सुविधा नहीं था, तो उन्होंने ट्रेनिंग के लिए रोज चकदा से कोलकाता जाना शुरू कर दिया। वो सुबह जल्दी उठकर पहली लोकल ट्रेन पकड़कर गांव से कोलकाता आती थीं और नॉर्थ कोलकाता के श्रद्धानंद पार्क में प्रैक्टिस करती थीं। ट्रेनिंग के बाद फिर से ट्रेन लेकर गांव लौटती थी और स्कूल जाती थीं। झूलन ने सालों-साल यही किया। झूलन की कद-काठी देखकर कोच ने भी उन्हें तेज गेंदबाज बनने की सलाह दी। लेकिन, घरवाले झूलन के क्रिकेट खेलने से खुश नहीं थे और कुछ वक्त बाद उनकी ट्रेनिंग बंद हो गई। जब कोच को यह पता चला तो वो उनके गांव पहुंचे और परिवार को मनाया कि वो झूलन को क्रिकेट खेलने दें। काफी समझाइश के बाद परिवार मान गया और इस तरह उनके गांव से निकलकर प्रोफेशनल क्रिकेटर बनने की शुरुआत हुई। 1997 झूलन के जीवन का बड़ा साल साबित हुआ। उस साल ईडन गार्डेंस में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच महिला विश्व कप का फाइनल खेला गया था। 15 साल की झूलन तब बॉल गर्ल थीं। उनके लिए यह मैच जिंदगी बदलने वाला साबित हुआ। उन्होंने इससे जुड़ा किस्सा बताया, मैंने यह फाइनल देखा था। उसी दिन यह सपना देखा था कि एक न एक दिन देश की तरफ से क्रिकेट खेलूंगी। इसके बाद से मैं खेल को लेकर और संजीदा हो गई और भारत की तरफ से खेलने के लिए और मेहनत करने लगी एक-एक कर झूलन सफलता की सीढ़ियां चढ़ती जा रही थीं। उन्हें 2007 में आईसीसी वुमेंस प्लेयर ऑफ द सीरीज चुना गया। उस साल किसी भारतीय पुरुष क्रिकेटर को आईसीसी का कोई व्यक्तिगत पुरस्कार नहीं मिला था। इसके बाद उन्हें भारतीय टीम का कप्तान भी बना दिया गया। भारतीय टीम की मौजूदा कप्तान हरमनप्रीत कौर ने झूलन की कप्तानी में ही डेब्यू किया था। उन्हें 2010 में अर्जुन अवॉर्ड और 2 साल बाद पद्मश्री भी मिला। वो 2017 और 2019 में आईसीसी की गेंदबाजों की रैंकिंग में नंबर-1 रही थीं।
विज्ञापन

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ 24 अपने सभी पाठकों और प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और विश्वास के लिए धन्यवाद।

विज्ञापन

© 2026 ABN News 24. All Rights Reserved.