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क्या छक्का मारना ही क्रिकेट का असली मकसद हो गया है?

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क्या छक्का मारना ही क्रिकेट का असली मकसद हो गया है?
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बासुकीनाथ पाण्डेय 

एबीएन स्पोर्ट्स डेस्क। आज के क्रिकेटरों को देखिए! जिम में तराशी हुई मांसपेशियां, शरीर पर टैटू और बल्ला उठाते ही गेंद को स्टेडियम के बाहर पहुंचाने का इरादा। ऐसा लगता है मानो क्रिकेट खेलने के लिए हुनर से ज्यादा ताकत और शरीर का गठीला होना जरूरी हो गया है। लेकिन जरा उस दौर को याद कीजिए, जब क्रिकेट सिर्फ छक्के मारने का खेल नहीं था। जब एक खूबसूरत कवर ड्राइव पर दर्शक अपना दिल हार बैठते थे, जब गेंद बल्ले के बीचोंबीच लगती थी तो उसकी आवाज भी सुकून देती थी और जब मैदान पर किसी खिलाड़ी की सफलता में पूरा देश अपनी खुशी तलाशता था। 

उस दौर का सबसे बड़ा उदाहरण थे सचिन तेंदुलकर! 

जिस खिलाड़ी के नाम से दुनिया के खतरनाक गेंदबाजों के पसीने छूटते थे, उसका शरीर देखकर कोई नहीं कह सकता था कि यह लड़का आगे चलकर क्रिकेट की दुनिया का सबसे बड़ा नाम बनेगा। छोटी-सी कद-काठी, मासूम चेहरा और पतली-सी आवाज। लेकिन जब बल्ला उठता था तो अच्छे-अच्छे गेंदबाजों का आत्मविश्वास डगमगाने लगता था। 

नब्बे के दशक का भारत आज की तरह आत्मविश्वास से भरा हुआ नहीं था। विदेशी धरती पर जीतना मुश्किल था और बड़े मुकाबलों में भारतीय टीम से उम्मीदें भी सीमित ही रहती थीं। ऐसे दौर में सचिन का बल्ला चलता था तो लगता था कि हमारी अपनी जीत हो रही है। वह चौका लगाता था तो सिर्फ स्कोरबोर्ड नहीं बदलता था, करोड़ों भारतीयों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। हमारी एक पूरी पीढ़ी सचिन को खेलते देखकर बड़ी हुई है। आज उस पीढ़ी की उम्र बढ़ गयी है, जिम्मेदारियां बढ़ गयी हैं, जिंदगी की परेशानियां बढ़ गयी हैं, लेकिन सचिन के उन दिनों की याद आज भी मन को उसी तरह खुश कर देती है। 

और सिर्फ सचिन ही क्यों? 

जवागल श्रीनाथ को देख लीजिए। दुबला-पतला शरीर, कंधों पर उभरी हड्डियां और गेंदबाजी करते समय चेहरे पर मेहनत साफ दिखाई देती थी। लेकिन जब वह दौड़कर गेंद फेंकता था तो अच्छे-अच्छे बल्लेबाजों को संभलने का मौका नहीं मिलता था। अनिल कुंबले का चश्मा याद है? वह किसी इंजीनियर की तरह दिखाई देते थे, लेकिन उनकी फिरकी दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों की समझ से बाहर हो जाती थी। 

सौरव गांगुली को देखकर कौन कह सकता था कि यह आदमी आगे चलकर भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदल देगा? मैदान पर उनकी चाल में भले ही कोई खास फुर्ती नहीं दिखाई देती थी, लेकिन आॅफ स्टंप के बाहर जाती गेंद को कवर और पॉइंट के बीच से निकालने का उनका अंदाज ही अलग था। वह चौका लगाते थे तो लगता था जैसे गेंद को उसकी मंजिल पहले से मालूम हो। मोहम्मद अजहरुद्दीन की कलाइयों का जादू, राहुल द्रविड़ की तकनीक, वीवीएस लक्ष्मण की कलात्मक बल्लेबाजी और वीरेंद्र सहवाग का बेखौफ अंदाज। इनमें से हर खिलाड़ी की अपनी अलग पहचान थी। किसी ने ताकत से नहीं, किसी ने तकनीक से, किसी ने टाइमिंग से तो किसी ने अपने स्वाभाविक खेल से दुनिया को अपना दीवाना बनाया। 

कपिल देव को देखिए। रवि शास्त्री को देखिये। दिलीप वेंगसरकर और कृष्णमाचारी श्रीकांत को याद कीजिये। इनमें से कोई आज के जिम में तराशे गए बॉडीबिल्डर जैसा नहीं था, लेकिन क्रिकेट के मैदान पर इनका कद किसी से छोटा भी नहीं था। उस दौर में खिलाड़ी के शरीर से ज्यादा उसके खेल की चर्चा होती थी। बल्लेबाज की पहचान उसके कवर ड्राइव, पुल शॉट और डिफेंस से होती थी। गेंदबाज की पहचान उसकी स्विंग, लाइन-लेंथ और बल्लेबाज को परेशान करने की क्षमता से होती थी। 

तब बल्लेबाज का काम सिर्फ गेंद को सीमारेखा के पार भेजना नहीं था। उसे नयी गेंद का सामना करना होता था, उछाल लेती पिचों पर टिकना होता था और दुनिया के सबसे खतरनाक गेंदबाजों के सामने अपनी तकनीक की परीक्षा देनी होती थी। टेस्ट क्रिकेट में घंटों बल्लेबाजी करना, खराब गेंद का इंतजार करना और सही गेंद को सही जगह खेलना भी एक कला थी। आज की तरह हर गेंद पर बड़ा शॉट लगाने की मजबूरी नहीं थी। और हां, उस दौर में हार का दर्द भी था, लेकिन जीत की खुशी कुछ अलग ही होती थी। 

जब भारतीय टीम लगातार हारती थी, तब भी हम उसका साथ नहीं छोड़ते थे। कभी किसी बल्लेबाज का शतक हमें खुश कर देता था, कभी किसी गेंदबाज के पांच विकेट लेने पर हम गर्व से भर जाते थे। आज जीत की आदत हो गई है, लेकिन उस दौर में जीत हासिल करना ही किसी उत्सव से कम नहीं था। यही वजह है कि उस समय के खिलाड़ी आज भी हमारे दिलों में बसे हुए हैं। वे सिर्फ क्रिकेटर नहीं थे, हमारी यादों का हिस्सा थे। 

मैं आधुनिक क्रिकेट के खिलाफ नहीं हूं। खिलाड़ियों की फिटनेस जरूरी है, ताकत भी जरूरी है और खेल के साथ बदलना भी जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या क्रिकेट में ताकत का बढ़ता महत्व उस हुनर को पीछे छोड़ रहा है, जिसने इस खेल को खूबसूरत बनाया था? आज गेंदबाज पूरी तैयारी से गेंद फेंकता है और बल्लेबाज कई बार उसे सिर्फ ताकत के दम पर सीमा के पार पहुंचाने की कोशिश करता है। छक्के लगाना बुरा नहीं है, लेकिन क्रिकेट की खूबसूरती सिर्फ छक्कों में भी तो नहीं है। 

कभी-कभी लगता है कि बल्ले का कद इतना बढ़ा दिया गया है कि गेंदबाज की मेहनत ही छोटी दिखाई देने लगी है। बल्लेबाज के लंबे छक्के सुर्खियां बटोरते हैं, लेकिन गेंदबाज की बेहतरीन गेंद पर बल्लेबाज का चकमा खा जाना अब उतना आकर्षण पैदा नहीं करता। क्रिकेट का असली मजा तो इसी मुकाबले में है। बल्लेबाज की कला और गेंदबाज की चुनौती में है। अगर हर गेंद पर सिर्फ छक्के की उम्मीद होगी तो फिर गेंदबाज के हुनर की कद्र कौन करेगा? मेरे लिए क्रिकेट आज भी सिर्फ जीत और हार का खेल नहीं है। यह मेहनत, धैर्य, तकनीक और प्रतिभा का संगम है। यही वजह है कि पुराने खिलाड़ियों को याद करते समय उनके रिकॉर्ड से ज्यादा उनका अंदाज याद आता है। 

और अंत में एक बात! 

क्रिकेट में भगवान के नाम पर बहस करने वालों को शायद यह समझना चाहिए कि कुछ खिलाड़ियों को किसी उपाधि की जरूरत नहीं होती। उनका खेल ही उनकी पहचान होता है। भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में चौथे नंबर पर उतरने वाला वह छोटा-सा लड़का, जिसकी सीधी ड्राइव देखकर गेंदबाज भी अपनी बेबसी समझ जाता था, आज भी करोड़ों दिलों में उसी सम्मान के साथ मौजूद है। 

नाम बताने की जरूरत है क्या? 

सचिन तेंदुलकर! जिसने हमें सिखाया कि महान बनने के लिए विशाल शरीर नहीं, विशाल प्रतिभा चाहिए। गेंद को दूर पहुंचाने के लिए सिर्फ ताकत नहीं, सही टाइमिंग भी चाहिए और दुनिया पर राज करने के लिए ऊंची आवाज नहीं, अपने खेल में दम होना चाहिए। क्योंकि शरीर की ताकत देखकर लोग प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन दिल पर राज हमेशा हुनर ही करता है।

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