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एशियाई खेलों में भारत की उम्मीदें...

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एशियाई खेलों में भारत की उम्मीदें...
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  • एशियाई खेलों में भारत की उम्मीदें... 

सत्यनारायण गुप्ता

एबीएन स्पोर्ट्स डेस्क। 19 सितंबर से जापान के आइची-नगोया में 20वें एशियाई खेलों का आगाज होने जा रहा है।4 अक्टूबर तक चलने वाले इन खेलों में एशिया के शीर्ष खिलाड़ी और टीमें अपनी श्रेष्ठता साबित करने उतरेंगी। कुल 43 खेलों में 469 स्पर्धाओं में 11000 एशियाई एथलिट अपनी किस्मत आजमाएंगे। भारत की ओर से 37 खेलों में 508 एथलिट भाग लेंगे।

भारत के लिए यह आयोजन इसलिए खास है कि पिछली बार 2023 में हांगझोऊ में उसने पहली बार 100 पदकों का आंकड़ा पार किया था। 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य सहित कुल 107 पदकों के साथ भारत पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा था। अब सवाल यह है कि क्या भारत नगोया में उस उपलब्धि को दोहरा पाएगा अथवा उससे आगे निकल सकेगा? भारत की इस बार की चुनौती केवल पदकों की संख्या तक सीमित नहीं है। 

खेल शुरू होने से पहले ही भारतीय दल पर डोपिंग का साया पड़ गया है। कुश्ती में तीन खिलाड़ी डोपिंग मामलों के कारण एशियाई खेलों से बाहर हो चुके हैं। इसके अलावा भारोत्तोलन, जूडो, एथलेटिक्स, निशानेबाजी, रोइंग और वुशु सहित कई खेलों में भी डोपिंग संबंधी मामले सामने आए हैं। 1951 में नई दिल्ली में पहली बार एशियाई खेलों का आयोजन हुआ था। 11 एशियाई देशों के 489 खिलाड़ियों ने सात खेलों में हिस्सा लिया था। भारत ने 15 स्वर्ण, 16 रजत और 20 कांस्य सहित 51 पदक जीते और जापान के बाद दूसरे स्थान पर रहा।

तब भारत एशिया की प्रमुख खेल शक्तियों में था। लेकिन बाद के दशकों में चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने खेलों में जबरदस्त निवेश किया और भारत धीरे-धीरे पदक तालिका में पीछे होता गया। इसके बावजूद भारत ने प्रत्येक एशियाई खेल में कम से कम एक स्वर्ण पदक जीता है और एशियाई खेलों के हर संस्करण में भाग लेने वाले चुनिंदा देशों में शामिल है। 1982 में भारत ने दूसरी बार दिल्ली में एशियाई खेलों की मेजबानी की। लेकिन भारतीय खेलों का नया दौर वास्तव में 21वीं सदी के दूसरे दशक में दिखाई देने लगा। निशानेबाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन, तीरंदाजी और एथलेटिक्स में भारतीय खिलाड़ियों ने लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति मजबूत की। 

2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में मिला, जब भारत ने 70 पदक जीते। इसके बाद हांगझोऊ में भारत ने 107 पदक जीतकर पहली बार शतक पार किया। भारत ऐसा करने वाला चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के बाद चौथा देश बना। नगोया में भारतीय खेल दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पिछली उपलब्धि को बनाए रखने की है। हांगझोऊ के 107 पदक अब एक नया मानक बन चुके हैं। अच्छी बात यह है कि भारत की पदक संभावनाएं अब केवल एक-दो खेलों पर निर्भर नहीं हैं।एथलेटिक्स, निशानेबाजी और तीरंदाजी भारत के प्रमुख पदक स्रोत होंगे।

इनके अलावा कुश्ती, मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, बैडमिंटन, हॉकी, क्रिकेट, कबड्डी, स्क्वैश और टेबल टेनिस से भी भारत को महत्वपूर्ण पदकों की उम्मीद है। एथलेटिक्स में, जैवलिन थ्रो में नीरज का स्वर्ण भारत के लिए लगभग एक सुनिश्चित उम्मीद माना जाता रहा है। लेकिन इस बार एशियाई खेलों में वह नहीं होंगे। एथलेटिक्स में अविनाश साबले की स्टीपलचेज, तजिंदरपाल सिंह तूर की शॉटपुट, पारुल चौधरी की लंबी दूरी की दौड़, अब्दुल्ला अबूबकर की ट्रिपल जंप और अन्य भारतीय एथलीटों पर नजर रहेगी।

2023 तक भारत के एशियाई खेलों के कुल पदकों में एथलेटिक्स का योगदान 283 पदकों का रहा है, जिसमें 85 स्वर्ण शामिल हैं। इसके बाद निशानेबाजी, कुश्ती और मुक्केबाजी जैसे खेल आते हैं। यदि नगोया में भारत के लिए किसी एक खेल से बड़ी संख्या में पदकों की उम्मीद की जा सकती है तो वह है निशानेबाजी। सबकी  निगाहें ईशा सिंह पर होंगी। 21 वर्षीय ईशा महिलाओं की 25 मीटर पिस्टल में विश्व नंबर एक और 10 मीटर एयर पिस्टल में विश्व नंबर दो के रूप में प्रतियोगिता में उतर रही हैं। हांगझोऊ में उन्होंने दो व्यक्तिगत रजत और एक टीम स्वर्ण जीता था। 

पिछले डेढ़ वर्ष में विश्व चैंपियनशिप और विश्व कप में उनके प्रदर्शन ने उनकी पदक संभावनाओं को और मजबूत किया है।  उनके साथ मनु भाकर, सुरुचि फोगाट, सरबजोत सिंह, स्वप्निल कुसाले, सिफ्त कौर सामरा और मैराज अहमद खान जैसे निशानेबाज भारत की पदक उम्मीदों को मजबूत करेंगे।@        तिरंदाजी में  ज्योति सुरेखा वेन्नम भारत की सबसे बड़ी उम्मीद होंगी। कंपाउंड तीरंदाजी में उनका अंतरराष्ट्रीय अनुभव और निरंतरता भारत के लिए महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत मुकाबले के साथ-साथ टीम स्पर्धाओं में भी भारत पदक का दावेदार है।यह उन खेलों में से है जहां भारत ने पिछले कुछ वर्षों में केवल प्रतिभा ही नहीं, बल्कि व्यवस्थित प्रशिक्षण के दम पर खुद को एशिया की शीर्ष शक्तियों में स्थापित किया है।

कुश्ती में अमन सहरावत, अंतिम पंघाल और सुजीत कलकल जैसे खिलाड़ियों पर विशेष निगाह रहेगी। लेकिन इस बार कुश्ती का उल्लेख एक कड़वी चिंता के साथ करना पड़ रहा है। तीन भारतीय पहलवान डोपिंग मामलों के कारण टीम से बाहर हो चुके हैं। इससे कुछ भार वर्गों में भारत की चुनौती कमजोर हुई है और भारतीय कुश्ती की छवि पर भी सवाल उठे हैं। भारोत्तोलन में मीराबाई चानू पर विशेष निगाह रहेगी। ओलंपिक रजत पदक विजेता मीराबाई ने विश्व स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है, लेकिन एशियाई खेलों में उनके नाम अभी तक पदक नहीं है। 

नगोया उन्हें यह अधूरा अध्याय पूरा करने का अवसर देगा। पी. वी. सिंधु और लक्ष्य सेन भारतीय बैडमिंटन की सबसे बड़ी उम्मीद होंगे। सिंधु लंबे समय से भारतीय खेल की सबसे विश्वसनीय खिलाड़ियों में रही हैं। उनके पास ओलंपिक और विश्व स्तर का अनुभव है।लक्ष्य सेन से भी पदक की उम्मीद होगी। इनके अलावा युवा खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर भी नजर रहेगी।डबल्स में सात्विक -चिराग की जोड़ी से उम्मीदें हैं। हॉकी में गत विजेता पुरूष टीम से स्वर्ण पदक की  उम्मीद है।विश्वकप में शानदार प्रदर्शन करने वाली महिला टीम भी मजबूत दावेदार है। 

एशियाई खेलों में हॉकी का स्वर्ण केवल पदक नहीं होता, बल्कि ओलंपिक क्वालीफिकेशन की दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है।@    पिछले एशियाई खेलों में महिला और पुरूष दोनों वर्गों में भारत ने स्वर्ण  पदक जीता था। भी इस बार भी पुरुष और महिला दोनों भारतीय टीमें स्वर्ण पदक की दावेदार हैं। कबड्डी, मुक्केबाजी और स्क्वैश भी महत्वपूर्ण : कबड्डी भारत की पारंपरिक ताकत है। पुरुष और महिला दोनों टीमों से स्वर्ण की उम्मीद की जा रही है। पवन सहरावत जैसे खिलाड़ियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

मुक्केबाजी में लवलीना बोरगोहेन और अन्य भारतीय मुक्केबाज पदक के दावेदार हैं। स्क्वैश में भी भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मजबूत स्थिति बनाई है। टेबल टेनिस और टेनिस से भी कुछ पदक आने की उम्मीद है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल—डोपिंग : भारत ने खेलों में अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि बनाने के लिए पिछले वर्षों में काफी मेहनत की है। ऐसे में डोपिंग के मामले गंभीर चिंता पैदा करते हैं। विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी के आंकड़ों को लेकर भारत पहले भी सवालों के घेरे में रहा है और 2024 में भारतीय खिलाड़ियों के खिलाफ 260 प्रतिकूल विश्लेषणात्मक निष्कर्ष सामने आए थे। यह केवल नगोया की समस्या नहीं है। 

यदि भारत भविष्य में ओलंपिक जैसे बड़े आयोजन की मेजबानी की आकांक्षा रखता है तो विश्वसनीय और मजबूत डोपिंग नियंत्रण व्यवस्था उसकी अनिवार्य शर्त होगी।@खेल में हार स्वीकार की जा सकती है, खराब दिन भी स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन प्रतिबंधित पदार्थों के सहारे मिली सफलता खेल भावना के मूल अर्थ को ही समाप्त कर देती है।@पदकों से आगे भी है सफलता का अर्थ@आइची-नगोया में भारत के सामने लक्ष्य निश्चित रूप से 107 पदकों के आंकड़े को पार करना होगा। लेकिन भारतीय खेल की सफलता को केवल पदक तालिका से नहीं मापा जाना चाहिए।

1951 में दिल्ली से शुरू हुई भारत की एशियाई खेल यात्रा में 51 पदकों से लेकर 2023 में 107 पदकों तक का सफर केवल आंकड़ों का सफर नहीं है। यह भारतीय खेलों में आए बदलाव की कहानी है। एथलेटिक्स के पुराने गौरव से लेकर निशानेबाजी, कुश्ती, मुक्केबाजी, बैडमिंटन, तीरंदाजी और अब क्रिकेट तक- भारतीय खेल का दायरा लगातार विस्तृत हुआ है। अब नगोया की बारी है।

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