टीम एबीएन, रांची। गायत्री युगतीर्थ शक्तिपीठ सेक्टर टू धूर्वा में गुरुवार संध्याकाल में गायत्री महिला मंडल प्रतिनिधित्व में गायत्री महिमा सत्संग में स्वाध्याय पाठ व संवाद हुआ। दीदी ने बताया कि नारी ही संस्कृति की संरक्षिका है।
दीदी ने बताया कि यदि संस्कृति के उन्नयन-अभिवर्द्धन की सहभागिनी, सामाजिक जीवन की सुरभिवर्द्धिनी, नारी को बनाना है, तो उसके चहुंमुखी विकास का वातावरण बनाना, सुविधाएं देना तथा सहायता करना आवश्यक है। कहा कि जब-जब समाज ने नारी को विकसित हो सकने के अवसर दिए हैं, उसने अपनी सांस्कृतिक क्षमताएं सही दिशा में विकसित की हैं।
ज्ञान, शिक्षा और आध्यात्मिक प्रगति के पर्याप्त अवसर पाने पर तथा समाज-व्यवस्था में समान भागीदारी निभाने का मौका मिलने पर उसने समाज को सदा दीप्तिमान ही बनाया है। पूज्यवर श्रीगुरुदेव वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के युग निर्माण साहित्य पुस्तक का एक उद्धरण पर बताया कि "वाचस्पत्य शब्दकल्पद्रुम" के अनुसार माता शब्द का निर्माण ही निर्माणवाची धातु मा से हुआ है।
इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि सृजन तत्व, निर्माण तत्त्व में मातृरूपा नारी में विशेष रूप से रहे शील, सदाचार, धैर्य, क्षमा, उदारता एवं सहिष्णुता की जीवंत प्रतिमा-नारियां परिवार और समाज के निर्माण का दायित्व सदा से ही पूरा करती रही हैं। आगे बताया कि आत्मसाधना के क्षेत्र में भी नारियों पुरुषों को अपेक्षा अधिक संख्या में और अधिक उत्साह से आगे बढ़ती रही हैं।
महामानवों के मार्मिक आह्वान को सुनकर युग-सृजन के लिए निकल पड़ना भारतीय नारियों की परंपरा रही है। श्रीकृष्ण के आह्वान पर हजारों गोपिकाएं महाकाल के महारास की सक्रिय सदस्याएं, सहयोगिनी व सखियां बनने को आगे आयीं। तथागत बौद्ध के आह्वान को हजारों नारी अंत:करणों ने सुना और बौद्ध भिक्षुणी बनकर सांस्कृतिक चेतना का अलख जगाने निकल पड़ीं।
अंबपाली से आरंभ यह श्रृंखला संघमित्रा के बाद तक यानी शताब्दियों तक अविच्छिन्न रही। प्रबुद्ध नारियां देश-काल और स्थिति अनुसार अनेक उद्धरण स्मरण दिलाते हुए बताया कि युगचेतना की समय की मांग व पुकार पर समयदान योगदान की है। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।