कल मंत्रियों के साथ हार के कारणों पर होगी चर्चाएबीएन सेंट्रल डेस्क। लोकसभा चुनावों में भाजपा को यूपी से निराशा हाथ लगी है। इस चुनावों में पार्टी 33 सीटों पर सिमट गई। हार के इन कारणों पर चर्चा करने के लिए शनिवार को कैबिनेट बैठक बुलायी गयी है। लोकसभा चुनावों में यूपी में मिली हार के बाद योगी सरकार एक्शन के मोड में आ गयी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शनिवार को मंत्रिमंडल के सभी सहयोगियों के साथ बड़ी बैठक करेंगे। चुनाव परिणाम आने के बाद होने वाली इस महत्वपूर्ण बैठक में मुख्यमंत्री प्रदेश में भाजपा की हार के साथ ही सभी मंत्री के कार्यों की समीक्षा करेंगे। लोकभवन में होने वाली इस बैठक में सभी कैबिनेट मंत्रियों के साथ राज्य मंत्रियों को बुलाया गया है। इस दौरान केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की प्रगति पर भी चर्चा होगी और मुख्यमंत्री अहम दिशा-निर्देश देंगे। इसके अलावा रिक्त सरकारी पदों पर भर्तियों को लेकर भी निर्देश दिए जा सकते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि उन सीटों पर विशेष चर्चा होगी जहां पर मंत्रियों की हार हुई है। सरकार के अलावा संगठन के स्तर पर भी जल्द ही बैठक का आयोजन होना है।पीएम से मिले सीएमभाजपा और एनडीए के संसदीय दल द्वारा संसद के सेंट्रल हॉल में शुक्रवार को नरेंद्र मोदी को लोकसभा का नेता चुनने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पीएम मोदी को बधाई दी। उन्होंने पीएम मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भर और विकसित भारत की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने की उम्मीद जताई। सेंट्रल हॉल के कार्यक्रम में मौजूद सीएम योगी ने जब पीएम को पुष्पगुच्छ भेंट किया, तो उन्होंने योगी की पीठ थपथपा कर हौसला अफजाई की।वहीं, पीएम को बधाई देते हुए सीएम योगी ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा- एक भारत-श्रेष्ठ भारत के शिल्पकार, अमृतकाल के सारथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार तीसरी बार सर्वसम्मति से भाजपा संसदीय दल, एनडीए संसदीय दल और लोक सभा के नेता चुने जाने पर हार्दिक बधाई। प्रधानमंत्री मोदी के यशस्वी नेतृत्व में एनडीए परिवार आत्मनिर्भर भारत-विकसित भारत के निर्माण और 140 करोड़ परिवारीजनों की सेवा के लिए पूर्णत: संकल्पित है।
इनमें एक नाबालिग है बाकी के नाम इरफान, अरबाज, असलम, रज्जाक, मुबारक खान और इमरान खान हैएबीएन सेंट्रल डेस्क। अजमेर में पिछले दिनों 11वीं क्लास की लड़की के साथ हुए गैंगरेप के मामले में अब तक 7 लोग गिरफ्तार हो चुके है। इसमें तीन को पुलिस ने शिकायत दर्ज होने के तुरंत बाद गिरफ्तार किया था। वहीं 4 की गिरफ्तारी 17 पुलिसकर्मियों की एसआईटी टीम गठित होने के बाद हुई थी।बता दें कि ये मामला अजमेर के क्रिश्चियनगंज थाना का था। एक 11वीं क्लास की लड़की के पिता की शिकायत पर पता चला था कि इंस्टाग्राम के जरिए इरफान ने लड़की को फँसाया और फिर उसका गैंगरेप करके, उसकी वीडियो बनकर उसे ब्लैकमेल करते हुए लाखों रुपये लूटे। पिता ने ये भी बताया था कि उनकी बेटी को उसकी एक सहेली ने इरफान से दोस्ती करने का दबाव बनाया था। उसी के बाद वो इस पूरे जाल में फंसी।अब पुलिस द्वारा आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद खुलासा हुआ है कि सारे आरोपित मिलकर गैंग चला रहे थे। इनका टारगेट एक समुदाय की लड़कियां थीं।। एसपी देवेंद्र कुमार बिश्नोई ने भी कहा है कि अब तक की जांच में संगठित गिरोह की लिप्तता सामने आयी है। इनके जेहादी मिशन की तफ्तीश चल रही है। ये गिरोह कई लड़कियों के संपर्क में थे। इनके फोन से अश्लील कमेंट्स, रील्स और अश्लील वीडियो एक दूसरे को भेजने के सबूत मिले हैं। ये भी सामने आया है कि यये आरोपित एक दूसरे के रिश्तेदार हैं।पुलिस ने ये भी बताया है कि आरोपितों को पोर्न देखने की और नशा करने की आदत थी। पुलिस इनसे इनके नेटवर्क के बारे में पूछताछ कर रही है। वहीं प्रशासन ने कहा है कि गैंगरेप के आरोपितों की संपत्ति पर बुलडोजर चलाने से परहेज नहीं किया जायेगा। अभी जांच हो रही है।आरोपितों ने अपने मोबाइल से डेटा को गायब कर दिया है, पुलिस डेट रिकवर करने की कोशिस कर रही। वहीं छानबीन और पुलिस पूछताछ से ये साफ हो गया है कि ये लोग इंस्टाग्राम के जरिए लड़कियों को फंसाते थे और फिर उन्हें अपने जाल में फंसाकर उनका यौन शोषण करते थे। बाद में उनके पैसे ऐंठते थे। छानबीन से ये भी पता चला है कि ये सारे आरोप कई लड़कियों के संपर्क में थे। इसके अलावा ब्लैकमेल कांड के ये भी सामने आया है कि आरोपितों में कांग्रेस के पूर्व पार्षद के नाते-रिश्तेदार और गांव निवासी भी शामिल हैं। गैंगरेप की घटना सामने आने बाद इस मामले में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। भाजपा के जिलाध्यक्ष रमेश सोनी ने भी इस मामले में गहनता से जांच की मांग की है। उन्होंने आशंका जतायी है कि ये अजमेर 1992 जैसा कांड को दोहराने का प्रयास हो सकता है। मामले में विधानसभा स्पीकर वासुदेव देवनानी ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने साफ कहा कि अजमेर में ब्लैकमेल कांड की पुनरावृत्ति होने नहीं दी जाएगी। आरोपित चाहे कितने भी प्रभावशाली हों, उन्हें बख्शा नहीं जायेगा। उन्होंने अभिभावकों को कहा है कि बच्चों का खास ध्यान रखें।
मुरलीधरएबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोकसभा चुनाव रूझानों के अनुसार राजग की सरकार तीसरी बार बनती दिख रही है। सभी पूर्व सर्वेक्षणों से अलग कांग्रेसनीत गठबंधन को भी बेहतर सफलता मिली है लेकिन पूर्ण बहुमत से दूर हैं। भाजपा को अकेले बहुमत नहीं मिला। नीतिश कुमार और चंद्रबाबू नायडू सहित अन्य के सहयोग से ही उन्हें सरकार चलानी होगी। भाजपा को मध्य प्रदेश, दिल्ली, गुजरात और ओड़िसा में बेहतरीन सफलता मिली। ओड़िसा जहां राज्य के विधानसभा के चुनाव भी हुए थे, वहां राज्य विधानसभा में पहली बार भाजपा सरकार बन रही है और 24 साल तक चली पटनायक सरकार का अंत हो गया है। साथ ही आंध्र प्रदेश में भी टीडीपी के साथ राज्य के चुनाव में उसे सफलता मिली है। इस प्रकार भाजपा दो राज्यों में अपनी सरकार बनाने में सफल हो गयी है। वहीं उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में भाजपा को उम्मीद से अधिक हार का सामना करना पड़ा, जिससे पार्टी का पुराना जनादेश 303 सीट को दोहराया नहीं जा सका। भाजपा 240 सीटों के आसपास सिमट गयी है। वहीं कांग्रेस को भी 99 के आसपास सीटें मिल रही है। विगत दस साल से सरकार में रही भाजपा ने हिंदी पट्टी में रोजगार और रियायत पर अपने विचार स्पष्ट नहीं किये, जिससे युवाओं और मध्यम निम्न वर्ग का आक्रोश पार्टी को झेलना पड़ा। सबसे बड़ी बात पीएम मोदी का वाराणसी से मात्र डेढ़ लाख वोट से जीतना यह संकेत देता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की नीतियों को लेकर आम लोगों में उत्साह नहीं था। देश के चुनाव परिणाम को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे थे। पांच साल बाद हुए इस चुनाव में कोई ठोस मुद्दा तो नहीं था, लेकिन विपक्ष ने संविधान बचाने और सत्ता पक्ष ने इसे हिंदू-मुस्लिम आरक्षण सहित दर्जनों मुद्दों के बीच अपनी जीत सुनिश्चत करने का प्रयास किया। भारतीय लोकतंत्र की यही शोभा है कि आम जनता अपने मत से सत्ता के उन सभी अनुमानों को ध्वस्त करती है जो कुछ क्षेत्र या सीमित चिंतन और समझ के माध्यम से बनाये जाते हैं। देश का आम आदमी अगर निराश हो तो सत्ता का इसका दंश झेलना ही पड़ता है। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस दोनों को इस चुनाव के परिणाम से सबक लेना चाहिए। आम जन को लुभाकर कोई निश्चित परिणाम हासिल नहीं किया जा सकता है। देश के लोकतंत्र में कल्याणकारी सरकार की अवधारणा है जिसमें 100 करोड़ लोगों और 25 करोड़ परिवार गांवों में 10 हजार रुपये और शहरों में अधिकतम 30 हजार रुपये से अपने परिवार का भरण पोषण करता है। इन परिवारों पर चाहे पेट्रोलियम पदार्थ के अधिकतम मूल्य हो या टोल टैक्स, चाहे परोक्ष जीएसटी का उच्च दर हो या फिर दर्जनों प्रकार के विविध शुल्क इन सब से वो परेशान होता है। कोरोना के दो-दो लॉकडाउन से त्रस्त आमलोंगों के इस चुनाव में वृद्ध जनों की रेल रियायत खत्म करने वाली सरकार को पूर्ण बहुमत मिलना कठिन था। मंगलवार, 4 जून को उनकी वेल्थ लगभग 31 लाख करोड़ कम हो गयी। बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का ओवरआल मार्केट कैप 395 लाख करोड़ रुपये हो गया। एक दिन पहले यह लगभग 426 लाख करोड़ था। यह मंगल वित्त बाजार के लिए, उद्यागपतियों के लिए और भाजपा के लिए अमंगल साबित हुआ।
आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भाजपा ने अयोध्या धाम के विकास पर सबसे ज्यादा फोकस किया। सोशल मीडिया से लेकर चुनाव-प्रचार में अयोध्या धाम में हुए विकास कार्यों को बताया गया। लेकिन भाजपा ने अयोध्या के ग्रामीण क्षेत्रों पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया।कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। लेकिन दिल्ली के रास्ते में पीएम नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ा अवरोध लखनऊ बन गया। इस बार के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को उत्तर प्रदेश में करारी हार का सामना करना पड़ा है। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 2024 के आम चुनाव में अयोध्या में अपनी पकड़ कायम न रख सकी। जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी टाट-पट्टी में रहते थे, तो भाजपा अयोध्या में राम की गरिमामय देवत्थान बनाने के संकल्प को लेकर दो सदस्य संख्या को बढ़ाते-बढ़ाते कई बार प्रदेश और केंद्र में अपना बहुमत बना कुशलपूर्वक सरकार चलायी थी। वर्तमान में नरेंद्र मोदी जैसे कुशल प्रधानमंत्री और योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्री को जनता की सेवा का अवसर पाने में अयोध्या की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका रही। देश प्रदेश तथा अंतराष्ट्रीय जगत में इस प्रकरण को बहुत ही अहमियत मिली, परंतु 2024 के आम चुनाव में भाजपा ने अपनी स्थिति बरकरार बनाये रखने में विफल रही। उत्तर प्रदेश की सबसे हॉट सीट बनी फैजाबाद-अयोध्या लोकसभा सीट तथा उससे लगे हुए अंबेडकर नगर, बस्ती, खलीलाबाद सुलतानपुर, अमेठी, रायबरेली और गोंडा आदि पर भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। यूपी के सियासी मैदान में अखिलेश यादव और राहुल गांधी एक साथ आये। एक बार पहले भी आये थे। तब ये कामयाब नहीं हो सके थे, लेकिन इस बार ये अपने मकसद में कामयाब होते देखे जा रहे हैं। भाजपा को पिछले एक दशक में सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। इस सीट पर सपा के अवधेश प्रसाद विजय प्राप्त कर चुके हैं। इसके कारणों और परिस्थितियों पर एक बार विहंगम दृष्टि डालना अनुचित न होगा।चुनाव हारने के प्रमुख कारण :- माननीय प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की अतिसक्रियता : जब देश और प्रदेश के मुखिया जहां ज्यादा सक्रिय रहेंगे, वहां स्थानीय सांसद और विधायक की पकड़ ढीली हो जायेगी। वह लोगों में अपनी इमेज नहीं बना पायेगा। वह आम जनता से दूर होता जायेगा। इस कारण एसटी स्थानीय सांसद और विधायक अपना कर्तव्य बखूबी से निभाने में विफल रहे।पुराने जन प्रतिनिधियों का सहयोग न ले पाना : यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अयोध्या आंदोलन के प्रणेता आडवाणी जी, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह आदि का सहयोग नहीं लिया गया। सब कोई प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की सक्रियता के कारण अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन न कर सके।विकास योजनाएं जनता को पसंद नहीं : अयोध्या में रामलला मंदिर के निर्माण के साथ करोड़ों की विकास योजनाओं को पूरा कराया गया। पिछले दिनों पीएम मोदी ने 15,700 करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास-लोकार्पण किया था। अयोध्या में भव्य रेलवे स्टेशन का पुननिर्माण किया गया है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा का विकास किया गया। अयोध्या रामलला मंदिर के साथ-साथ सड़कों से लेकर गलियों तक को दुरुस्त किया गया। अयोध्या में विकास करना कोई काम नहीं आया। अयोध्या में 2017 के बाद से हर साल दिवाली पर दीपोत्सव किया जा रहा है। इस प्रकार के आयोजनों का भी प्रभाव नहीं दिखा। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया। इसके बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त 2020 को रामलला के मंदिर की आधारशिला रखने अयोध्या आये। कोरोना के खतरे के बीच रामलला का मुद्दा देश भर में गरमाया। 22 जनवरी को इस साल रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। इस समारोह में भाग लेने पीएम नरेंद्र मोदी पहुंचे थे। उनके साथ-साथ देश भर से विशिष्ट लोगों का यहां आगमन हुआ। ये सब जन आयोजन न होकर सरकारी आयोजन बन गये।राम लहर काम न आयी : राम मंदिर का मुद्दा वैसे तो पूरे देश के लिए अहम था, लेकिन उत्तर प्रदेश के लिहाज से कुछ सीटों पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव था। अब फैजाबाद सीट तो केंद्र में थी ही। इसके अलावा गोंडा, कैसरगंज, सुल्तानपुर, अंबेडकरनगर, बस्ती सीट पर भी राम मंदिर का काफी प्रभाव था। यह सारी सीटें फैजाबाद के आसापास ही पड़ती हैं। ऐसे में माना जा रहा था कि यहां से भाजपा को ज्यादा चुनौती नहीं रही। इस क्षेत्र के चुनावी नतीजों ने सभी को हैरान कर दिया है। जिस अयोध्या को लगातार राम नगरी कहकर संबोधित किया गया, जहां पर सबसे ज्यादा भाजपा ने राम के नाम पर वोट मांगा, उसी सीट को राम विरोधी समाजवादी पार्टी ने हथिया लिया है।ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा, फोकस सिर्फ अयोध्या धाम पर : भाजपा ने अयोध्या धाम के विकास पर सबसे ज्यादा फोकस किया। सोशल मीडिया से लेकर चुनाव-प्रचार में अयोध्या धाम में हुए विकास कार्यों को बताया गया, लेकिन भाजपा ने अयोध्या के ग्रामीण क्षेत्रों पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अयोध्या धाम से अलग ग्रामीण क्षेत्र की तस्वीर बिल्कुल अलग रही। ग्रामीणों ने इसी आक्रोश के चलते बीजेपी के पक्ष में मतदान नहीं किया।जमीनों का अधिग्रहण : अयोध्या में रामपथ के निर्माण के लिए जमीन का अधिग्रहण किया गया। कई लोगों के घर-दुकान तोड़े गये। निराशाजनक पहलू यह रहा कि कई लोगों को मुआवजा नहीं मिला। इसकी नाराजगी चुनाव परिणाम में साफ नजर आ रही है। कुछ ऐसी ही स्थिति चौदह कोसी परिक्रमा मार्ग के चौड़ीकरण में भी देखने को मिली। बड़ी संख्या में घर-दुकान तोड़े गये लेकिन प्रभावितों को उचित नहीं मिला।प्रत्याशी को एंटी इन्कंबैंसी का असर : निवर्तमान सांसद लल्लू सिंह के खिलाफ क्षेत्र में सत्ता विरोधी लहर थी। लोगों की नाराजगी उनके क्षेत्र में मौजूदगी को लेकर थी। उम्मीदवार से लोगों की नाराजगी उन्हें ले डूबी। उम्मीदवार के प्रति यह गुस्सा लोगों के भीतर बदलाव के रूप में उभरने लगा। वे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और बड़े-बड़े मठों से तो जुड़े पर छोटे तपकों से दूर होते गये। स्थानीय प्रत्याशी लल्लू सिंह के प्रति लोगों की बहुत नाराजगी रही। भाजपा हाई कमान ने सांसद लल्लू सिंह पर भरोसा जताते हुए तीसरी बार चुनावी मैदान में उतारा था। यह निर्णय लोगों को अनुकूल न लगा। भाजपा उम्मीदवार लगातार 10 साल से सांसद थे। उनको बदले जाने का दबाव स्थानीय स्तर के नेताओं की ओर से भी बनाया जा रहा था। इसके बाद भी भाजपा ने इस पर ध्यान नहीं दिया। नया चेहरा न उतरना ही भाजपा को यहां भारी पड़ गया। लल्लू सिंह के खिलाफ स्थानीय लोगों को नाराजगी का अंदाजा पार्टी नहीं लगा पायी। नतीजतन भाजपा को प्रतिष्ठित सीट गंवानी पड़ी। लल्लू सिंह ने चुनाव-प्रचार के दौरान संविधान बदलने का बयान भी दिया था। बयान पर काफी हो-हल्ला मचा था।आवारा पशु को लेकर नाराजगी : अयोध्या के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान आवारा पशुओं से खासे परेशान रहे हैं। सरकार ने गोशाला जरूर बनायी हैं लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाल पायी है। आवारा पशुओं के मुद्दे को समाजवादी पार्टी ने मुद्दा बनाया था। भाजपा को इस मुद्दे पर नाराजगी झेलनी पड़ी और हार का दंश झेलना पड़ा।जनरल सीट पर दलित उम्मीदवार उतरना : जातीय समीकरण को साधने में भाजपा सफल नहीं हो पायी। अखिलेश यादव इस सीट पर पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक यानी पीडीए को एकजुट करने में सफल हो गये। यह भाजपा की हार का कारण बन गयी। समाजवादी पार्टी ने एक बड़ा प्रयोग करते हुए मंदिरों के इस शहर से एक दलित को उम्मीदवार बनाया था। उसकी यह रणनीति काम कर गयी।जातिगत समीकरण हावी : अयोध्या के जानकारों के मुताबिक जातिगत समीकरण और अयोध्या के विकास के लिए जमीनों का अधिग्रहण को लेकर जनता में जबरदस्त नाराजगी है। इसके साथ ही कांग्रेस का आरक्षण और संविधान का मुद्दा काम कर गया। लल्लू यादव का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो संविधान में बदलाव के लिए भाजपा को 400 से अधिक सीटें जिताने की बात कर रहे थे। वहीं बसपा का कमजोर होना भी सपा की बढ़त में बड़ा काम किया।मुस्लिम वोटरों की एकजुटता : कांग्रेस-सपा के जिस गठबंधन को 2017 में नहीं चल पाया था, वह गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में जमकर वोट बटोरे हैं। उत्तर प्रदेश के जानकारों के मुताबिक इस चुनाव में मुस्लिम वोट ने एकजुट होकर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया। संविधान और आरक्षण बचाने के मुद्दे को हवा देकर इंडिया गठबंधन ने भाजपा के कोर हिंदू वोट बैंक को भी बांट दिया। विपक्ष के इस नैरेटिव ने बड़ी संख्या दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को भाजपा से दूर किया। महंगाई और बेरोजगार के मुद्दे ने भी का मुद्दा भी काम करता दिखा।बड़े शीर्षस्थ नेताओं के कारण ओवर कॉफिडेंस : भाजपा यहां पर ओवर कॉन्फिडेंस का शिकार हो गयी। भाजपा ने माना कि उम्मीदवार के चेहरे की जगह अयोध्या में पीएम मोदी का चेहरा चलेगा। यह सफल नहीं हो पाया।स्थानीय सांसद द्वारा जमीन का खरीद फरोख्त : स्थानीय प्रत्याशी लल्लू सिंह पर क्षेत्र में जमीन खरीद और फिर उसे ऊंचे दामों में बेचने का आरोप लगा हुआ है। श्रीराम मंदिर पर फैसले के बाद जमीन खरीद-बिक्री का मामला जोर-शोर से उठा था। इस पर बड़ा जोर दिया गया। इससे लल्लू सिंह की छवि धूमिल हुई और उन्हें कम वोट मिले। (लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल, आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)
नयी लोकसभा के दो सदस्य अमृतपाल व राशिद जेल में बंद, क्या कहता है कानूनएबीएन सेंट्रल डेस्क। आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद दो उम्मीदवार संसदीय चुनाव में विजयी हुए हैं, जिससे आगामी दिनों में गठित होने वाली 18वीं लोकसभा के लिए असामान्य स्थिति पैदा हो गयी है। हालांकि कानून के तहत उन्हें नये सदन की कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी, फिर भी उन्हें संसद सदस्य के रूप में शपथ लेने का संवैधानिक अधिकार है।निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित किए। पंजाब की खडूर साहिब सीट पर कट्टरपंथी अमृतपाल सिंह ने जीत दर्ज की, जबकि जम्मू-कश्मीर की बारामूला सीट पर आतंकवाद के वित्तपोषण के आरोपी शेख अब्दुल राशिद उर्फ इंजीनियर राशिद ने जीत दर्ज की। इंजीनियर राशिद आतंकवाद के वित्तपोषण के आरोप में 9 अगस्त 2019 से तिहाड़ जेल में बंद हैं। सिंह को अप्रैल 2023 में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर असम की डिब्रूगढ़ जेल भेज दिया गया था।अब सवाल यह उठता है कि क्या जेल में बंद इन नवनिर्वाचित सांसदों को शपथ लेने की अनुमति दी जायेगी, यदि हां, तो कैसे। इस विषय में शामिल कानूनी पहलुओं को समझाते हुए संविधान विशेषज्ञ और पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचारी ने ऐसे मामलों में संवैधानिक प्रावधानों का पालन करने के महत्व पर बल दिया।उन्होंने कहा कि संसद सदस्य के रूप में शपथ लेना एक संवैधानिक अधिकार है। आचारी ने कहा कि चूंकि वे फिलहाल जेल में हैं, इसलिए इंजीनियर राशिद और सिंह को शपथ ग्रहण समारोह के लिए संसद तक ले जाने के लिए अधिकारियों से अनुमति लेनी होगी।उन्होंने कहा कि शपथ लेने के बाद उन्हें वापस जेल जाना होगा। वैधानिक पहलुओं को और स्पष्ट करने के लिए आचारी ने संविधान के अनुच्छेद 101(4) का हवाला दिया, जो अध्यक्ष की पूर्व अनुमति के बिना संसद के दोनों सदनों से सदस्यों की अनुपस्थिति से संबंधित है।उन्होंने कहा कि शपथ लेने के बाद वे लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सदन में उपस्थित होने में अपनी असमर्थता के बारे में सूचित करेंगे, इसके बाद अध्यक्ष उनके अनुरोधों को सदन की अनुपस्थिति संबंधी समिति के पास भेज देंगे।समिति तय करेगी कि सदस्य को सदन की कार्यवाही से अनुपस्थित रहने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं। इसके बाद अध्यक्ष सदन में सिफारिश पर मतदान करायेंगे। यदि इंजीनियर राशिद या सिंह को दोषी ठहराया जाता है और कम से कम दो साल के कारावास की सजा होती है, तो वे 2013 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार लोकसभा में अपनी सीट तुरंत गंवा देंगे।न्यायालय के फैसले के अनुसार ऐसे मामलों में सांसदों और विधायकों को अयोग्य घोषित किया जाता है। इस निर्णय के तहत जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) को निरस्त कर दिया गया था, जिसके तहत दोषी सांसदों और विधायकों को अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील करने के लिए तीन महीने का समय दिया जाता था।
हिंदी पट्टी में औद्योगिक केंद्रों वाली लगभग सभी सीटों पर जीती भाजपाव्यापार के बड़े वितरण केंद्र वाली दिल्ली की चांदनी चौक सीट पर कारोबारी नेता प्रवीन खंडेलवाल ने जीत दर्ज कीरामवीर सिंह गुर्जरएबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भले ही अपने दम पर बहुमत हासिल करने में कामयाब नहीं हुई हो। लेकिन पार्टी ने औद्योगिक केंद्रों वाली सीटों पर बेहतर प्रदर्शन किया। भाजपा ने पिछले आम चुनाव की तुलना में उत्तर प्रदेश व हरियाणा में करीब 50 फीसदी सीटें गंवाने के बावजूद औद्योगिक केंद्रों वाली करीब करीब सभी सीटों पर जीत हासिल की। पार्टी हिंदी पट्टी की ज्यादातर औद्योगिक केंद्र वाली सीटें जीतने में कामयाब रही। हालांकि भाजपा को महाराष्ट्र के साथ ही दक्षिण भारत की औद्योगिक केंद्र वाली सीटों पर कम कामयाबी मिली।हिंदी पट्टी के औद्योगिक केंद्रों वाली सीटों पर भाजपा ने लहराया परचमउत्तर प्रदेश में दूसरे नंबर पर रहने के बावजूद भाजपा ने इस राज्य की प्रमुख औद्योगिक केंद्रों वाली सीटों पर जीत हासिल की। उत्तर प्रदेश में औद्योगिक केंद्रों वाली कानपुर, गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद और आगरा प्रमुख लोकसभा सीटें हैं और इन सभी पर भाजपा जीती। हरियाणा में पिछले आम चुनाव की तुलना में बुरा प्रदर्शन करने वाली भाजपा प्रमुख औद्योगिक केंद्रों वाली गुरुग्राम और फरीदाबाद सीट जीतने में कामयाब रही।मध्य प्रदेश का औद्योगिक शहर कही जाने वाली इंदौर लोकसभा भी भाजपा रिकॉर्ड मतों से जीत गई। इसी राज्य के भोपाल, विदिशा, मुरैना, भिंड लोकसभा के तहत मंडीदीप, गोविंदपुरा, बानमोर, मालनपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्र आते हैं। इन क्षेत्रों में भी भाजपा को जीत मिली।राजस्थान की अलवर लोकसभा सीट इस राज्य का प्रमुख औद्योगिक केंद्र है। भाजपा को इस सीट पर भी सीट मिली। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के औद्योगिक केंद्रों वाली सीटों पर पार्टी को जीत हासिल हुई। प्रमुख औद्योगिक राज्य माने जाने वाले गुजरात के अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा समेत अन्य औद्योगिक केंद्रों वाली सीटों पर भी भाजपा ने परचम लहराया।देश के प्रमुख व्यापारिक वितरण केंद्र चांदनी चौक सीट भी भाजपा के खाते मेंपुरानी दिल्ली के बाजारों को देश का प्रमुख व्यापारिक वितरण केंद्र कहा जाता है। इनमें कई ऐशिया के बड़े बाजार माने जाते हैं और ये बाजार चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र के अंदर आते हैं। इस सीट पर भाजपा उम्मीदवार प्रवीन खंडेलवाल ने जीत दर्ज की। इस सीट के विजेता की खास बात ये है कि व कारोबारियों के अहम संगठन कन्फेडरेशन आॅफ आॅल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय महामंत्री भी हैं और छोटे खुदरा व थोक कारोबारियों के प्रमुख कारोबारी नेता माने जाते हैं।खंडेलवाल से पहले एक प्रमुख कारोबारी संगठन भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष रहे और कारोबारी नेता दिवंगत श्याम बिहारी मिश्रा कई बार उत्तर प्रदेश से सांसद रहे थे। दिल्ली में कारोबारियों की बड़ी संख्या के कारण चुनाव में ये अहम भूमिका निभाते हैं। दिल्ली की सभी 7 लोकसभा सीटें भाजपा ने जीती।महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल व दक्षिणी राज्यों में मिली कम कामयाबीमहाराष्ट्र देश का प्रमुख औद्योगिक राज्य है। इस राज्य की औद्योगिक केंद्र वाली लोकसभा सीटों पर हिंदी पट्टी की तुलना में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहा। महाराष्ट्र में पुणे, चंद्रपुर, लातूर, सांगली, शोलापुर, नासिक और मुंबई रीजन प्रमुख औद्योगिक केंद्रों वाली लोकसभा सीटें मानी जाती हैं। इनमें से भाजपा को पुणे और मुंबई उत्तर में जीत हासिल हुई, जबकि भाजपा के सहयोगी शिवसेना शिंदे गुट ने औरंगाबाद सीट जीती।चंद्रपुर, लातूर, शोलापुर कांग्रेस और नासिक उद्धव गुट की शिवसेना ने जीती। मुंबई रीजन की 6 सीटों में से भाजपा को 5 में हार मिली। पश्चिम बंगाल के कोलकाता, हल्दिया, हुगली और दार्जिलिंग जैसे औद्योगिक केंद्रों वाली सीटों में से भाजपा सिर्फ दार्जिलिंग में जीती।भाजपा का दक्षिण भारत की औद्योगिक केंद्रों वाली सीटों पर प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। आंध्र प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों वाली गुंटूर, कडप्पा, चित्तूर (श्री सिटी औद्योगिक केंद्र) में भाजपा तो नहीं जीती। लेकिन उसकी सहयोगी टीडीपी ने इन तीन में से दो पर जीत हासिल की। तमिलनाडु के चेन्नई व कोयंबटूर औद्योगिक केंद्र वाली सीटों पर भी भाजपा को हार मिली। कर्नाटक में भाजपा को इस राज्य के अहम औद्योगिक केंद्र बेंगलूरु रीजन की 4 सीटों पर जीत हासिल हुई।
बैठक में पारित प्रस्ताव में 21 नेताओं ने किया हस्ताक्षरएबीएन सेंट्रल डेस्क। एनडीए के घटक दलों ने एक बार फिर सर्वसम्मति ने पीएम मोदी को अपना नेता चुन लिया है। बुधवार को पीएम आवास पर हुई बैठक में इसका प्रस्ताव पास किया गया। इस प्रस्ताव पर 21 नेताओं के हस्ताक्षर हैं।इनमें टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और जदयू प्रमुख नीतीश कुमार भी शामिल हैं। माना जा रहा है कि आज शाम एनडीए की ओर से सरकार बनाने का दावा पेश किया जायेगा।
तीसरी बार बनी मोदी सरकार को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साहएबीएन सेंट्रल डेस्क। एनडीए गठबंधन की जीत को लेकर और देश में एक बार फिर से तीसरी बार मोदी सरकार बनाने को लेकर बीते मंगलवार को भाजपा कार्यकर्ता में उत्साह देखने को मिला। प्रदेश कार्यालय के बाहर गुलाल लगाकर और मिठाई खिला कर लोग एक दूसरे को बधाई देते नजर आये और जमकर आतिशबाजी की गयी। भाजपा के नेताओं ने विपक्ष को बरनेल का कटआउट दिखाकर कहा कि विपक्ष की जो मनसा थी वह नाकाम हो गयी है और तीसरी बार केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने जा रही है। भाजपा के नेताओं ने कहा कि इसलिए विपक्ष को बरनोल भेंट कर रहे हैं। बता दें कि झारखंड की 14 लोकसभा सीटों और गांडेय विधानसभा उपचुनाव पर हुए चुनाव का परिणाम आ चुका है।राज्य में बीजेपी को 8, आजसू को 1, कांग्रेस को 2, झामुमो को 3 सीटें मिली है। वहीं, गांडेय विधानसभा उपचुनाव में कल्पना सोरेन ने जीत हासिल की है। झारखंड लोकसभा चुनाव में कुल 244 उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे। कल यानी 4 जून को राज्य में बीजेपी ने लगातार अपनी बढ़त बनायी हुई थी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। इंदौर में एक अनोखा रिकॉर्ड बना है, जहां नोटा को करीब दो लाख वोट मिले हैं। दरअसल, कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय बम ने नाम वापस ले लिया था, जिसके बाद कांग्रेस ने किसी को भी समर्थन न देते हुए कहा था कि जनता के पास नोटा का विकल्प है। ऐसे में माना जा रहा है कि जो लोग कांग्रेस प्रत्याशी को वोट देने वाले थे, उनमें से कई ने नोटा का विकल्प चुना।इंदौर सीट पर एक और रिकॉर्ड बना है और यहां भाजपा प्रत्याशी शंकर लालवानी दस लाख से ज्यादा वोटों से आगे चल रहे हैं। इस तरह लालवानी देश में सबसे बड़ी जीत की तरफ आगे बढ़ रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के सीआर पाटिल ने 6.90 लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की थी।
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