एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने माता गुजरी, गुरु गोविंद सिंह और चारों साहिबजादों की वीरता को देश का गौरव बताते हुए कहा है कि इनके आदर्श आज भी हर भारतीय को ताकत और प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि देश का भविष्य बच्चों और युवाओं से ही जुड़ा है इसलिए वह अपेक्षा करते हैं कि वे बड़े सपने देखें, कड़ी मेहनत करें और आत्मविश्वास को कमजोर न पड़ने दें। श्री मोदी ने शुक्रवार को यहां वीर बाल दिवस पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि वीर साहिबजादे क्रूर मुगल शासकों के सामने ऐसे मजबूती से खड़े हुए की महजबी कट्टरपंथ का वजूद हिल गया था। प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कतार से सम्मानित 20 बच्चे भी कार्यक्रम में मौजूद थे।उन्होंने कहा कि वीर साहिबजादे भारत का गौरव, भारत के अदम्य साहस और शौर्य की पराकाष्ठा हैं। माता गुजरी, श्री गुरु गोविंद सिंह और चारों साहिबजादों की वीरता और आदर्श आज भी हर भारतीय को ताकत देते हैं हमारे लिए प्रेरणा हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि जब भी 26 दिसम्बर का दिन आता है तो उन्हें तसल्ली होती है कि वीर बाल दिवस मनाने की यह परंपरा साहिबजादों की वीरता को नयी पीढी तक पहुंचा रही है और इसके लिए एक भी मंच भी तैयार हुआ है।चार वर्ष पहले वीर बाल दिवस मनाने की परंपरा की शुरुआत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीयों के बलिदान और शौर्य की स्मृतियों को दबाया नहीं जायेगा और न ही देश के नायक, नायिकाओं को हाशिये पर रखा जायेगा। उन्होंने कहा कि भारत ने तय किया है कि गुलामी की मानसिकता से मुक्ति पानी ही होगी। अब हम भारतीयों के बलिदान हमारे शौर्य की स्मृतियां दबेंगी नहीं अब देश के नायक नायिकाओं को हाशिये पर नहीं रखा जायेगा।भाषाई विविधता को देश की ताकत बताते हुए उन्होंने कहा कि गुलामी की मानसिकता से मुक्त होते हमारे देश में भाषाई विविधता हमारी ताकत बन रही है। देश को विकसित बनाने के लिए अगले 25 वर्षों को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि इसमें युवा पीढ़ी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। उन्होंने कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मौजूद बच्चों और युवाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि जेन जेड और जेन अलफा आपकी पीढ़ी ही भारत को विकसित भारत के लक्ष्य तक ले जायेगी।उन्होंने कहा कि देश का भविष्य युवाओं और बच्चों से जुड़ा है इसलिए उनकी अपेक्षा है कि वे बड़े सपने देखें, कड़ी मेहनत करें और आत्मविश्वास को कमजोर न पड़ने दें। प्रधानमंत्री ने कहा कि वीर बाल दिवस का मंच हर वर्ष अलग अलग क्षेत्रों में देश के लिए कुछ कर दिखाते हैं उन्हें प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार दिया जाता है। इस वर्ष भी 18 राज्यों के 20 बच्चों को ये पुरस्कार दिये गये हैं।
विज्ञान और धर्म के बीच कोई टकराव नहीं, दोनों की मंजिल सत्य की खोज : संघ प्रमुख मोहन भागवत एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत आगे जायेगा ये निश्चित है और भारत को विश्व को कुछ देना है। भारत का विकास सिर्फ खुद को आगे बढ़ाना नहीं है, जब हम आज विकसित देशों को देखते हैं तो विकास इस प्रकार से हुआ है कि उसके साथ विनाश भी आ गया। सब देश ऐसा सोच रहे हैं कि भौतिक विकास तो हमने कर लिया लेकिन कहीं पर चूक गए क्योंकि सारा विकास सुख के लिए होता है। मनुष्य को सुख चाहिए, सृष्टि में सबको सुख चाहिए। हम विज्ञान के बारे में जानना क्यों चाहते हैं, सूरज यहां से कितनी दूर है? अगर मुझे यह नहीं पता तो इससे मुझे क्या फर्क पड़ेगा? लेकिन मनुष्य इस तरह नहीं सोचता। ये बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने आंध्र प्रदेश में कही। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि विज्ञान और धर्म के बीच कोई संघर्ष नहीं है और अंत में दोनों अलग-अलग रास्तों से एक ही सत्य की खोज करते हैं। आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि धर्म को अक्सर मजहब के रूप में गलत समझ लिया जाता है जबकि वास्तव में यह सृष्टि के संचालन का विज्ञान है। धर्म में असंतुलन ही विनाश का कारण उन्होंने कहा, धर्म कोई मजहब नहीं है। यह वो नियम है जिसके अनुसार सृष्टि चलती है। कोई इसे माने या न माने लेकिन इसके बाहर कोई भी काम नहीं कर सकता। धर्म में असंतुलन ही विनाश का कारण बनता है। भागवत ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से विज्ञान ने यह मानते हुए धर्म से दूरी बनाए रखी कि वैज्ञानिक अनुसंधान में उसका कोई स्थान नहीं है लेकिन यह दृष्टिकोण गलत है। विज्ञान और धर्म या अध्यात्म में कोई टकराव नहीं संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आगे कहा, विज्ञान और अध्यात्म के बीच वास्तविक अंतर केवल कार्यप्रणाली का है। हालांकि दोनों का लक्ष्य एक ही है। विज्ञान और धर्म या अध्यात्म के बीच कोई टकराव नहीं है। उनकी पद्धतियां भले ही अलग हों लेकिन मंजिल एक ही है और वो मंजिल है सत्य की खोज।
राष्ट्रपति मुर्मू ने 20 बच्चों को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से किया सम्मानित एबीएन सेंट्रल डेस्क। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नयी दिल्ली में आज आयोजित एक समारोह में वीरता, सामाजिक सेवा, पर्यावरण, खेल, कला एवं संस्कृति तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धियों के लिए 20 बच्चों को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया।उन्होंने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं को बधाई दी और कहा कि पुरस्कार विजेता बच्चों ने अपने परिवारों, समुदायों और पूरे देश को गौरवान्वित किया है। राष्ट्रपति मुर्मू ने विश्वास व्यक्त किया कि प्रोत्साहित किए जाने के मकसद से प्रदान किये गये यह पुरस्कार देश भर के सभी बच्चों को प्रेरित करेंगे। उन्होंने वीर बाल दिवस के महत्व के बारे में कहा कि लगभग 320 साल पहले, 10वें सिख गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी और उनके चार पुत्रों ने सत्य एवं न्याय के समर्थन में लड़ते हुए सर्वोच्च बलिदान दिये। वीर बाल दिवस 26 दिसंबर को मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि दो सबसे कम उम्र के साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह की वीरता को भारत तथा विदेश दोनों जगह सम्मानित किया जाता है। राष्ट्रपति मुर्मू ने सत्य और न्याय के लिए गर्व से अपने प्राणों की आहुति देने वाले उन महान बाल नायकों को श्रद्धापूर्वक याद किया। राष्ट्रपति ने कहा कि किसी देश की महानता तभी निश्चित होती है जब उसके बच्चे देशभक्ति और उच्च आदर्शों से ओतप्रोत हों। उन्होंने कहा कि सात वर्षीय वाका लक्ष्मी प्रग्निका जैसी प्रतिभाशाली बच्चियों की बदौलत ही भारत को विश्व स्तर पर शतरंज की महाशक्ति माना जाता है। अपनी बहादुरी और बुद्धिमत्ता से दूसरों की जान बचाने वाले अजय राज और मोहम्मद सिदान पी. हर तरह की प्रशंसा के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि नौ वर्षीय बेटी व्योमा प्रिया और 11 वर्षीय बहादुर बेटे कमलेश कुमार ने दूसरों की जान बचाते हुए अपनी जान गंवायी जबकि 10 वर्षीय श्रवण सिंह ने आपरेशन सिंदूर के दौरान युद्ध से जुड़े जोखिमों के बावजूद अपने घर के पास सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों को नियमित रूप से पानी, दूध और लस्सी पहुंचायी।
योगासन खेल जगत की प्रेरणास्रोत हैं डॉ. आरती पालप्रथम बार योगासन खेल में दिया जाएगा अर्जुन अवार्डएबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत में योगासन को खेल और विज्ञान के रूप में स्थापित करने में जिन व्यक्तित्वों का उल्लेख आदर के साथ किया जाता है, उनमें डॉ. आरती पाल का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हाल ही में उन्हें अर्जुन पुरस्कार के लिए नामित किया जाना न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष, साधना और उपलब्धियों का सम्मान है, बल्कि भारतीय योगासन खेल की बढ़ती वैश्विक पहचान का भी प्रमाण है। यह प्रथम बार अर्जुन अवार्ड योगासन खेल में डॉ आरती पाल को दिया जाएगा, योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि डॉ.आरती पाल वर्तमान में योगासन भारत (Yogasana Bharat) की जॉइंट सेक्रेटरी के रूप में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इस पद पर रहते हुए उन्होंने योगासन को एक संगठित, नियमबद्ध और प्रतिस्पर्धात्मक खेल के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके प्रयासों से देशभर में योगासन खिलाड़ियों को एक सशक्त मंच मिला है और युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली है शैक्षणिक क्षेत्र में भी डॉ. आरती पाल की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली है। वे पतंजलि विश्वविद्यालय, उत्तराखंड में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। यहां वे योग के शास्त्रीय सिद्धांतों को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए विद्यार्थियों को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और नैतिक रूप से भी सशक्त बना रही हैं। उनका मानना है कि योग केवल अभ्यास नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन पद्धति है। खेल उपलब्धियों की बात करें तो डॉ. आरती पाल ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय योगासन प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई स्वर्ण पदक (गोल्ड मेडल) अपने नाम किए हैं। उनकी यह उपलब्धियां निरंतर अभ्यास, अनुशासन और समर्पण का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन ने भारत की योग परंपरा को विश्व स्तर पर गौरव प्रदान किया है। डॉ. आरती पाल विशेष रूप से महिला खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर महिलाएं खेल, शिक्षा और प्रशासन तीनों क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं। वे निरंतर कार्यशालाओं, प्रशिक्षण शिविरों और प्रतियोगिताओं के माध्यम से युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान कर रही हैं। अर्जुन पुरस्कार के लिए उनका नामांकन निश्चय ही उनके अब तक के योगदान की एक महत्वपूर्ण पहचान है। यह सम्मान न केवल डॉ. आरती पाल के लिए, बल्कि संपूर्ण योगासन समुदाय के लिए गर्व का विषय है। आने वाले समय में उनसे और भी बड़ी उपलब्धियों की अपेक्षा की जा रही है, जो भारत को योग की वैश्विक राजधानी के रूप में और अधिक सुदृढ़ करेंगी। इस अवसर पर योगासन भारत के समस्त पदाधिकारियों ने उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दी।
अटल जी की 101वीं जयंती पर पीएम मोदी का बड़ा संबोधन, बोले- हमने गिरायी अनुच्छेद 370 की दीवार एबीएन सेंट्रल डेस्क। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती (सुशासन दिवस) के अवसर पर पीएम मोदी ने लखनऊ के वसंत कुंज में भव्य राष्ट्र प्रेरणा स्थल का उद्घाटन किया। लगभग 230 करोड़ रुपये की लागत से बने इस स्मारक को राष्ट्र को समर्पित करते हुए पीएम मोदी ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया। इस दौरान उन्होंने विशेष रूप से अनुच्छेद 370 को हटाये जाने को एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया। एक देश, एक विधान का सपना हुआ सच जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि हमारी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की उस दीवार को गिरा दिया है, जिसने दशकों तक विकास और एकता को रोक रखा था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान के खिलाफ जो बलिदान दिया था, उसे आज के भारत ने सिद्ध कर दिखाया है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता की जीत करार दिया।
श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेई...त्रिवेणी दासकथनी करनी था एक समान मां भारती के चरणों में सर्वस्व समर्पण ध्येय अरमान , हम रहें या न रहेंतेरा वैभव अमर रहे मांथी यही उनकी पहचानअटल जी कहा करते थेहे प्रभु इतनी ऊंचाई न देना मुझे कि गैरों को गले लगा न सकूं ,जमीन पर रहने वालों सेआंखें अपनी मिला न सकूंसरकारें एक जैसी होती है सत्ता का चरित्र समान होता है सत्ताधारी का अपना विशेष अरमान होता है ,यह अलग बात है कि चरित्र बदलने का हम प्रयास कर रहे हैं राजनीति तो माध्यम है राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हो ऐसा अभ्यास कर रहे हैंदूसरों पर हंसना और बात है खुद पर हंसना बड़ी बात है हास्य-रस शक्ति देता है जूझने का बल देता है ,कभी-कभी वीर रस जो काम नहीं कर पाता चुटकी भर हास्य से जीवन बादल जाता हैनव चेतना निकल आता हैहम आज के वर्तमान हैंअटल जी का विशाल व्यक्तित्व कार्यकर्ताओं के सम्मान हैंवह हैं हमारे प्रेरणा स्रोत ,हमारा हर एक कार्यअटलजी के आदर्श सेहै समर्पित ओत-प्रोत..
त्रिवेणी दासएबीएन सेंट्रल डेस्क। सुशासन के शाश्वत आदर्श, सहज, सहृद, चेतना/भावना/संवेदना के प्रतिमूर्ति, सहज उपलब्ध, हमारे प्रेरणा व्यक्तित्व, पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर उन्हें नमन। मित्रों को सुशासन दिवस की हृदयतल से बधाई..! सामान्य कार्यकर्ता, स्वयंसेवक, जननेता, राजनेता से राष्ट्रनेता तक की उनकी गरिमा मयी यात्रा अभिनंदनीय है। भारत माता के सेवा के यज्ञ में उन्होंने अपना सर्वस्व आहुति स्वरूप समर्पित किया। आपका संपूर्ण जीवन यात्रा वंदनीय एवं प्रेरणा का स्रोत है।
प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा का टाइम बदला, अब रात में नहीं इस समय निकलेंगे महाराज एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रेमानंद महाराज आम जन से लेकर बड़ी-बड़ी सेलिब्रिटी तक के लोकप्रिय संत माने जाते हैं। उनसे मिलने के लिए कई भक्त आश्रम पहुंचते हैं तो कई लोगों को उनकी रात में होने वाली पदयात्रा का इंतजार बेसब्री से होता है। अब प्रेमानंद महाराज की झलक पाने के लिए भक्तों को रात का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, उनकी पदयात्रा का समय अब बदल गया है। अगर आप भी प्रेमानंद महाराज के दर्शन के लिए उनकी पदयात्रा में शामिल होना चाहते हैं तो नया समय यहां जान लें। प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा का नया समय प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा अब रात को 2 बजे नहीं बल्कि शाम 5 बजे निकलेगी। ऐसे में इस बदले हुए समय से श्रद्धालुओं को आसानी होगी। प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा वृंदावन स्थित श्रीकृष्ण शरणम् फ्लैट से शुरू होकर श्री राधा केलिकुंज आश्रम तक निकलती है। यह पदयात्रा करीब दो किलोमीटर की होती है। इस दौरान असंख्य भक्त उनकी एक झलक पाने के लिए लंबी कतार लगाए खड़े रहते हैं। कौन हैं प्रेमानंद महाराज संत प्रेमानंद का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे है। प्रेमानंद जी के परिवार में भक्तिभाव का माहौल था और इसी का प्रभाव उनके जीवन पर भी पड़ा। प्रेमानंद जी महाराज संन्यासी बनने के लिए घर का त्याग कर वाराणसी आ गये और यहीं अपना जीवन बिताने लगे। प्रेमानंद जी महाराज ने दस वर्षों से भी अधिक समय तक अपने गुरु सद्गुरु देव की सेवा की। अपने गुरु देव और श्री वृंदावन धाम के दिव्य आशीर्वाद से वे शीघ्र ही पूर्णत: सहचरी भाव में खो गये और श्री राधा के चरण कमलों में उनकी अटूट भक्ति विकसित हो गयी और वह श्री राधा रानी की दिव्य शक्ति के अंश बन गये।
निजी भागीदारी को मिले बढ़ावा बुनियादी ढांचे से जुड़े खर्च को एक बार फिर से आर्थिक विकास के इंजन के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि इसका गुणक प्रभाव बहुत अधिक होता है एबीएन सेंट्रल डेस्क। बुनियादी ढांचे से जुड़े खर्च को एक बार फिर से आर्थिक विकास के इंजन के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि इसका गुणक प्रभाव बहुत अधिक होता है। सीधे शब्दों में कहें तो बुनियादी ढांचे में लगाया गया प्रत्येक एक रुपया अर्थव्यवस्था में लगभग 3 रुपये की वृद्धि करता है। यह आंकड़ा अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि बुनियादी ढांचे के लिए सार्वजनिक पूंजीगत व्यय क्यों इतना महत्त्वपूर्ण है। पिछले बजट में बुनियादी ढांचे के खर्च को थोड़ा कमतर आंकने का जो रुझान दिखा अब उसे बदलने की सख्त जरूरत है। यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि मौजूदा माहौल में निजी निवेशक अब भी नये-नये बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में हाथ डालने से हिचकिचा रहे हैं। बुनियादी ढांचे पर कितना खर्च करना है, इसका एक स्थापित वृहद अर्थव्यवस्था से जुड़ा ढांचा है। हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य यह है कि बुनियादी ढांचे में सकल पूंजी निर्माण (जीसीएफआई) वास्तव में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 7 फीसदी होना चाहिए। इस 7 फीसदी में से सामान्यत: लगभग 3.5 फीसदी केंद्रीय बजट से आता है, जबकि बाकी 3.5 फीसदी राज्य, निजी पूंजी और ईबीआर (अतिरिक्त बजटीय संसाधन जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी शामिल हैं) से आता है। इस ढांचे का इस्तेमाल करते हुए देखें तो आगामी बजट में बुनियादी ढांचे का कुल खर्च 14 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए। विकास के अगले चरण के लिए निजी भागीदारी को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) तंत्र को फिर से आक्रामक रूप से सक्रिय बनाना होगा। वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) के तहत पीपीपी इकाई को अब केवल कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर बेहद आवश्यक सामाजिक बुनियादी ढांचे से जुड़े जमीनी स्तर पर परिणाम दिखाने होंगे। उन्हें स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, पर्यटन, आवास, स्वच्छता, जल, कौशल विकास, डिजिटल परियोजनाएं और कृषि-बुनियादी ढांचे जैसे जरूरी सामाजिक क्षेत्र के लिए सक्षम ढांचा तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए। सरकार की भूमिका क्षेत्र विशेष के मॉडल रियायती समझौते तैयार करने और व्यवहार्यता फंडिंग अंतर (वीजीएफ) जैसे जोखिम कम करने वाले तंत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। राज्यों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और उन्हें पिछले बजट में घोषित इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट डेवलपमेंट फंड (आईआईपीडीएफ) से सहयोग लेना चाहिए। निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कर नीति में भी सुधार की आवश्यकता है। मध्यम आकार की निजी बुनियादी ढांचा कंपनियों के पास 20-30 विशेष उद्देश्य वाली इकाइयां (एसपीवी) होती हैं जबकि बड़े खिलाड़ियों के पास 50 से अधिक हो सकते हैं। एक समूह कराधान व्यवस्था बने जो फर्मों को समूह के स्वामित्व वाले एसपीवी में लाभ और हानि को मिलाने की अनुमति दे तो इससे नकद प्रवाह स्थिर होगा, ऋण प्रोफाइल मजबूत होगी और उधार लेने की लागत कम होगी। यह लंबे समय से चली आ रही एक तर्कसंगत मांग है। आने वाले वर्षों के लिए एक महत्त्वपूर्ण पहलू शहर-स्तर के बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करना है। इसमें गतिशीलता के लिए सड़कें आदि, जल और जल-निकासी तंत्र, जलवायु के अनुकूल बुनियादी ढांचा और किफायती आवास शामिल हैं। पिछले केंद्रीय बजट में घोषित अर्बन चैलेंज फंड (यूसीएफ) एक बेहतरीन कदम है और अब इसे जमीन पर कार्रवाई दिखानी चाहिए। इसके अलावा, शहरों में बढ़ते ट्रैफिक जाम को देख केंद्र सरकार को तब तक किसी भी शहरी परिवहन परियोजना की फंडिंग बंद कर देनी चाहिए जब तक कि संबंधित शहर अनिवार्य एकीकृत महानगरीय परिवहन प्राधिकरण (यूएमटीए) को पूरी तरह से लागू नहीं कर देता। जब सरकार के निवेश से किसी जगह जमीन की कीमत बढ़ती है तब उस बढ़े हुए मुनाफे का कुछ हिस्सा सरकार को वापस मिलना चाहिए यानी लैंड वैल्यू कैप्चर (एलवीसी) को फंडिंग का एक नियमित साधन बनाया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करेगा कि बुनियादी ढांचे की फंडिंग का कुछ हिस्सा सुधार शुल्क, विकास अधिकार या कॉरिडोर वैल्यू कैप्चर जैसे साधनों से आये। बहुत लंबे समय से, सार्वजनिक खर्च से बढ़ती जमीन की कीमतों का लाभ सिर्फ कुछ चुनिंदा दलालों, अफसरशाहों और राजनेताओं के हाथ में जाने दिया गया है जिसे रोकना होगा। हाई-स्पीड रेल (एचएसआर) के लिए रेलवे से अलग बजट होना आवश्यक है। यह बुनियादी ढांचे का एक नया वर्ग है जिसे पारंपरिक रेलवे ढांचे के भीतर प्रबंधित नहीं किया जा सकता। एचएसआर को अपनी तकनीक, मार्ग योजना और भूमि अधिग्रहण के लिए एक अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता है, साथ ही लंबी अवधि की वित्तीय प्रतिबद्धता भी चाहिए। यह क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को तेज कर सकता है और मझोले तथा छोटे शहरों को प्रमुख आर्थिक केंद्रों से जोड़ सकता है, और विकास के नए गलियारों को खोल सकता है। अब एचएसआर को पारंपरिक सड़कों और राजमार्गों के क्षेत्र की जगह सबसे अधिक सार्वजनिक फंडिंग प्राप्त करने वाला क्षेत्र बनना चाहिए। इसे पारंपरिक रेलवे खर्च से अलग आवंटन मिलना चाहिए, साथ ही पारंपरिक रेलवे बोर्ड से अलग एक आधुनिक संस्थागत प्रणाली को बढ़ावा देना चाहिए। बुनियादी ढांचे की उपयुक्त परिभाषा को भी अद्यतन करना महत्त्वपूर्ण है। कई क्षेत्र बुनियादी ढांचा घोषित होने की होड़ में हैं। बुनियादी ढांचे का वर्गीकरण वाहक को स्वीकारता है न कि सामग्री को। उदाहरण के तौर पर एक बंदरगाह बुनियादी ढांचा माना जाता है, जबकि जहाज नहीं (और निश्चित रूप से जहाज निर्माण भी नहीं जिसे हाल ही में बुनियादी ढांचे का दर्जा दिया गया है)। डीईए के पास अनुमोदित बुनियादी ढांचा क्षेत्रों की सूची का संशोधन लंबे समय से लंबित है और इसे तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है। नये, पेशेवर रूप से सही क्षेत्रों को जोड़ने से निश्चित रूप से विकास को बढ़ावा मिलेगा। वर्ष 2026-27 के बजट को एक बार फिर यह संकेत देना चाहिए कि बुनियादी ढांचा भारतीय विकास मॉडल की सर्वोच्च प्राथमिकता बना हुआ है।
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