टीम एबीएन, रांची। मदन मोहन मंदिर की स्थापना काल क्या है तथा कितने दिनों में यह मंदिर बनकर तैयार हुआ, इन तिथियों की जानकारी स्पष्टत: मंदिर में रखे शिलापट्ट में उत्कीर्ण शिलालेख से मिलती है। यह शिलालेख प्रवेश द्वार के ठीक सामने मंदिर के चबूतरे पर गर्भगृह की दीवार के दक्षिणी भाग में रखा देखा जा सकता है। दो शिलालेखों में ये तथ्य लिखे मिलते हैं। इनके अतिरिक्त गर्भगृह के दरवाजे पर उत्कीर्ण दिन-तारीख तथा राजा द्वारा प्रदत्त ताम्रपत्र जो लक्ष्मीनारायण तिवारी को प्राप्त हुआ था, साक्ष्य के रूप में मौजूद हैं। इन्हीं आधारी तथ्यों का उल्लेख विभिन्न पुस्तकों में भी दिखाई पड़ता है जैसे-डिस्ट्रिकट गजेटियर, रांची मुंडाज एंड देयर कंट्री, बिहार थ्रू एजेज, छोटानागपुर का इतिहास, लिस्ट आॅफ मोनुमेंटस इन दि छोटानागपुर, छोटानागपुर के प्राचीन स्मारक और झारखंड की रूपरेखा तथा झारखंड का भूगोल आदि पुस्तकें उल्लेखनीय हैं। प्रस्तुत है क्रमश: शिलालेखों की पंक्तियां एक शिलालेख जो छोटी आकृत्ति में है, इसमें निम्न पंक्तियां उत्कीर्ण हैं : श्री राम राज्य। संवत सत्रह सइ बाइस। बैशाख सुदि दशमी रजनीश। श्री रघुनाथ नरेश विराज। लक्ष्मी नारायण ईश्वर माठसाज। दूसरे शिलालेख की पंक्तियां निम्नवत हैं : श्री मदन मोहन जी : शुभ संवत 1722 समय वैसाख सुदी दशमी 10 के श्रीश्री मदन मोहनक शुभा दावा देयाल श्री संवत 1725 समय सावन सुदी दशमी 10 के दरवाजा और छरदेवाली दावा देल तैयार भेल संवत 1739 तेकर लगीत भेल रूपैया 14001 चौदह हजार एक रूपैया। ताकर हिन्दू मठ दरयाज छारदेयाली ढहायाय से गाइक रक्त पीयय ब्रह्मण मारलेक हत्या गुरू मारलेक हत्या ताकर हए। मुसलमान मय मठ दरयाज छारदेवाली ढाहायाय से सूअर खाए आखुर मारलक ओ पीरक धारा शुअर कहरा डारलक दोष तेहि-मुसलमानक (हए) तेयारी लक्ष्मीनारायण भगवत इ विनति लिखाय राखल हय। कारीगर अनिरूद्ध विनती सांच हय उपर्युक्त पंक्तियों की सरल व्याख्या आवश्यक है। शिलालेख में श्री राम राज्य लिखने का तात्पर्य आरंभिक संबोधन तो माना जा सकता है लेकिन यह भी संकेत मिलता है कि मंदिर का निर्माण औरंगजेब काल में भी निर्विघ्न संपन्न होना। निश्चय ही बोड़ेया और आसपास का वातावरण शांतिपूर्ण रहा होगा। नागवंशी राजा का काल मुगल सल्तनत के आतंक से दूर रहा होगा और यहां मंदिर निर्माण में पंडित लक्ष्मी नारायण तिवारी को निष्कलंक, निष्कंटक और निश्शंक व विमल परिवेश मिला होगा। आगे यह लिखा गया है कि मंदिर की नीव का शुभारंभ संवत 1722 (1665 ई.) के वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को किया गया। इस अवसर पर राजा रघुनाथ शाही उपस्थित थे। लक्ष्मी नारायण तिवारी ने नींव रखी। दूसरे शिलालेख में यह स्पष्ट किया गया है कि मदन मोहन मंदिर की नीव 1722 संवत (1665 ई.) में वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी को रखी गयी थी। संवत 1725 (1668 ई.) के श्रावण शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को अर्थात् तीन वर्ष तीन माह के बाद चारदीवारी एवं दरवाजे की नींव रखी गयी थी। मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ संवत 1739 (1682 ई.) में। अर्थात् मंदिर को बनकर पूर्ण होने में कुल सत्रह वर्ष लगे। कहीं-कहीं इस लेखन का यह अर्थ निकाला गया है कि मंदिर का निर्माण तीन वर्ष में पूरा हो गया जबकि चारदीवारी पूर्ण होने में 14 वर्ष लगे। लेकिन ठीक से शिलालेख पढ़ें तो अर्थ स्पष्ट है कि 1665 में मंदिर की नींव पडी, 1668 में चारदीवारी की नींव पडी और 1672 ई. में ये सब पूर्ण हुए। मंदिर के निर्माण में कुल 14001 (चौदह हजार एक रुपये) की लागत आयी। शिलालेख की आगे की पंक्तियों से यह ज्ञात होता है कि तत्कालीन हिन्दुस्तान के शासक औरंगजेब की कट्टर धर्मांधता से मंदिर निर्माता लक्ष्मी नारायण तिवारी जरूर परेशान हुए होंगे। उनके मन में मंदिर को क्षति पहुंचाने की शंका अवश्य उत्पन्न हुई होगी। यही कारण है कि उन्होंने शिलालेख में शपथ लिखवाया कि जो कोई भी हिंदू मंदिर के दरवाजे और चारदीवारी को किसी भी प्रकार से ढाहने का अर्थात नुकसान पहुंचाने का प्रयत्न करेगा उसे गाय के रक्त पान का, ब्राह्मण हत्या का और गुरू की हत्या का पाप लगेगा। अगर कोई मुसलमान होकर मंदिर के दरवाजे, चारदीवारी को ढाहने का या किसी तरह के नुकसान पहुंचाने का प्रयास करेगा तो उसे सूअर खाने का, आखुर (सुअर) मारने का और किसी पीर की थाली में सूअर मांस परोसने का घोर पाप लगेगा। यह निवेदन लक्ष्मी नारायण तिवारी ने लिखवाया है। मंदिर का कारीगर अनिरूद्ध भी कहते हैं कि यह लिखा सत्य है। इस प्रकार शिलालेखों में अंकित तिथियों से ज्ञात होता है कि मदन मोहन मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था। यह औरंगजेब का शासन काल था तथा छोटानागपुर में इस समय राजा रघुनाथ शाही विराजमान थे। नागवंशी राजाओं की राजधानी इस समय खुखरा से ढोइसा गढ़ में स्थापित की जा चुकी थी। इस प्रसंग में लक्ष्मी नारायण तिवारी को राजा द्वारा प्रदत्त ताम्रपत्र का उल्लेख करना आवश्यक है। ताम्रपत्र अभी भी बोड़ेया के तिवारी परिवार में उपलब्ध है। यह अभी दो टुकड़ों में देखा जा सकता है। प्रस्तुत है ताम्रपत्र में उल्लेखित पंक्तियों का हू-ब-हू अनुकृति या प्रतिलिपि श्री राम नागवंशी राजाओं की खुदी हुई राजमुहर मुहर की बगल में लिखा है श्री मदन मोहन संवत 1733 साल समै माघ सुदी 13 रोज सुभदी न व्रीत पत्र लीखते भसोसती श्री प्रबल प्रतापों उदीत परताप ताप सम्पन्न महाराजाधीराज श्री रघुनाथ शाहीदेव तेवारी श्री लक्ष्मी न्याराऐनक ठाकुर श्री श्री देवा कही देवोत्रव्रीत के देल मौजा बोड़ेया पहिले तेवारीक ब्रीत हए से गांव फेरीक श्री श्री कही हम व्रीति के देल जलकर पतकर गाछ माछ प्रजा पुर चतुर सीमा बेतलव के देल देल दीनहुजुदन समस्त बाते जे पेल हीन्दु होएपेले तो गाए खाए तुरूक होएपेले सुअर खाए इअथे साख्खी महाराज कुमार ठाकुर श्री इन्दु साही ब्रह्मचारी गोसाई श्री हरीनाथ तथा काजी श्री जानकी रामदास तथा ठाकुर श्री चतुरभुज राय तथा श्री पुरोहित गनपति तथा पंडे श्री बलपति राय तथा पान्डे श्री लक्ष्मी रामदास तथा बीरभद्र दास तथा भंडारी श्री लालराय दास खात अखौरी श्री वंशीदास साखी गणेश पंडित मोकाम डोइसानगर साखी बेनीदत्त ठाकुर साखी तेवारी रामजीठ साखी गुरू विधनेश। उपर्युक्त ताम्रलिपि का अर्थ निम्नवत है संवत 1733 (1682 ई.) के माघ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के शुभ दिन में यह वृत्तिपत्र लिखा जा रहा है कि प्रबल प्रतापी महाराजा श्री रघुनाथ शाही ने श्री लक्ष्मी नारायण तिवारी के ठाकुर श्री को श्री देवता कहकर देवोत्तर में पूर्व से प्राप्त बोड़ेया ग्राम तिवारी जी की वृत्ति है जिसे फिर से वृत्ति (भरण-पोषण हेतु धन) के रूप में जल, वृक्ष, प्रजा, गांव के चारों सीमा तक बिना मांगे प्रदान किया। दिये हुए सभी बातों से कोइ मना करे तो हिन्दु को गौ खाने के तथा मुसलमान को सूअर खाने के समान होगा। इसमें साक्षी हैं महाराज कुमार ठाकुर इंदु शाही, ब्रह्मचारी गोसाई श्री हरिनाथ तथा काजी और श्री जानकी राम दास, ठाकुर श्री चतुर्भुज राय, पुरोहित श्री गणपति, पांडे श्री बलपति राय, पांडे श्री लक्ष्मी राम दास, वीरभद्र दास, भंडारी श्री लाल राय दास, पत्र अखौरी श्री वंशीदास, साक्षी गणेश पंडित ग्राम डोइसानगर, साक्षी बेनीदत्त ठाकुर, साक्षी तेवारी रामजीठ, साक्षी गुरू विघ्नेश। यह ताम्र पत्र महाराजा ने लक्ष्मीनारायण तिवारी को उस समय सौंपा था जब मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा था। इस ताम्र पत्र प्राप्ति के छ: वर्ष उपरांत मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ था। यह भी प्रमाणित होता है कि लक्ष्मीनारायण तिवारी का संपर्क राजाओं से था और राजाओं को यहाँ के मंदिर निर्माण की सूचना थी। नागवंशी राजाओं का काल देखा जाए तो 45वें राजा दुर्जनशाल ने डोइसा में राजधानी बसायी थी। इनका राजकाल था 1550 ई. से 1590 ई. तक। इसके वाद 48वें राजा के रूप में रामशाह 1646 ई. से 1670 ई. तक रहे। यहाँ 1665 ई. में मंदिर का निर्माण आरम्भ हुआ था। 49वें राजा थे रघुनाथ शाही जिनका राजकाल था 1671 ई. से 1706 ई.। इसी समय 1682 ई. में मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ था । मंदिर का आकार / शिल्प मदन मोहन मंदिर की भव्यता का आभास इसके आकार के विवरण से ही प्राप्त होता है। प्रस्तुत है क्रमश: चारदीवारी या परकोटे, प्रवेश द्वार, चबूतरा, गर्भगृह, गर्भगृह का द्वार, गुम्बद आदि का विवरण : चारदीवारी / परकोटा मदन मोहन मंदिर के चारों ओर 3 फीट 5 इंच मोटी दीवार दी गयी है जिसे चारदीवारी या परकोटा कहा जाता है। इस परकोटे की लंबाई बाहर से उत्तर दक्षिण 76 फीट (115 कड़ी) तथा पूरब पश्चिम लम्बाई 112 फीट (170 कड़ी) है। मंदिर परिसर परकोटे के अनुसार 8512 वर्ग फीट अर्थात 19.54 डिसमिल क्षेत्र में विस्तृत है। ये हैं आकर्षण का केंद्र प्रवेश द्वार मंदिर का चबूतरा स्तंभ गर्भगृह गर्भगृह की ऊंचाई शिखर जलकूप तुलसी मंच मंदिर का पश्चभाग प्रसाद गृह डोल चबूतरा कलुआ महादेव विग्रह / मूर्ति
रांची : एक असहाय मंदबुद्धि व्यक्ति को लाया गया सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रमटीम एबीएन, रांची। परमहंस डॉ संत शिरोमणी स्वामी सदानंद जी महाराज के द्वारा संचालित एम.आर.एस श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट राँची के अंतर्गत काम कर रही सामाजिक संस्था श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम पुंदाग में चल रहे मंदबुद्धि, दिव्यांग, निराश्रितों लोगों की निःशुल्क सेवा संस्था जनवरी 2024 से लगातार कर रही है। सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि सोमवार को एक मंदबुद्धि असहाय व्यक्ति को आश्रम में लाया गया। जो मानसिक रोगी है।आश्रम की टीम को सूचना मिली कि एक असहाय मंदबुद्धि व्यक्ति रांची के रातू रोड नजदीक लावारिस अवस्था में घूम रहा है। जो की बहुत ही अस्वच्छ अवस्था में था, आश्रम की टीम ने उस व्यक्ति को रातू रोड के पास से रेस्क्यू करके आश्रम लाया। टीम में आश्रम के सेवा साथी मुकुंद यादव,परमेश्वर प्रमाणिक एवं सूरज प्रमाणिक शामिल थे। उसके बाद अस्पताल में उसकी मेडिकल जांच कराई गई। बाद में सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य प्रेम सभागार) मे लाया गया। उस व्यक्ति का नाम और पते की कोई जानकारी नहीं मिली है। याददाश्त भी खो चुके थे,आश्रम कमेटी ने उस व्यक्ति का नाम मनमोहन रखा है।आश्रम की टीम को सूचना मिलने पर समय-समय पर जरूरतमंदों को रेस्क्यू किया जाता है।प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि आश्रम में रह रहे इन सभी निराश्रितो को गुरुजी सदानंद जी महाराज के सहयोग से घर जैसा माहौल देने की कोशिश की जाती है। आश्रम में अब निराश्रितों की संख्या 43 हो गया है। उन्होंने कहा कि मानव सेवा से बढ़कर कोई सेवा कार्य नहीं है।
रुक्मिणी विवाह से सुदामा चरित्र तक गूंजा भक्ति का स्वर, श्रीमद्भागवत कथा की पूर्णाहुतिसात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का हुआ समापनसच्ची भक्ति में श्रद्धा, विश्वास और पूर्ण समर्पण का है विशेष महत्व: साध्वी गोपिका जीएबीएन सोशल डेस्क। डॉ संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के पावन सानिध्य में एम.आर.एस. श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा रांची के पुंदाग स्थित श्री राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर में श्री राधाष्टमी महोत्सव के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का शनिवार को श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ समापन हुआ। कथा के सप्तम एवं अंतिम दिवस वृंदावन की सुप्रसिद्ध कथा वाचिका साध्वी गोपिका जी ने श्री रुक्मिणी विवाह, कंस उद्धार तथा भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की अद्भुत मित्रता के प्रसंगों का भावपूर्ण एवं विस्तृत वर्णन किया।कथा के दौरान साध्वी गोपिका जी ने बताया कि रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य एवं पति मानकर पूर्ण समर्पण भाव से उनका स्मरण किया। भगवान श्रीकृष्ण ने भक्त की पुकार स्वीकार करते हुए रुक्मिणी जी का हरण कर उनसे विवाह किया। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति में श्रद्धा, विश्वास और पूर्ण समर्पण का विशेष महत्व है। इसके पश्चात कंस उद्धार का प्रसंग सुनाते हुए साध्वी गोपिका जी ने भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा आगमन तथा अत्याचार के प्रतीक कंस के अंत का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जब अधर्म बढ़ता है, तब धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर का अवतार होता है। इसके बाद श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता का मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत करते हुए उन्होंने मित्रता में प्रेम, समानता, आत्मीयता और निस्वार्थ भाव की महत्ता बताई। निर्धन सुदामा के प्रति भगवान श्रीकृष्ण का प्रेम यह संदेश देता है कि सच्ची मित्रता धन-दौलत और पद-प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि हृदय के भाव से जुड़ी होती है। सभी प्रसंगों के दौरान प्रस्तुत की गई सजीव झांकियों ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। साध्वी गोपिका जी के सुमधुर श्री राधा-कृष्ण भजनों से पूरा मंदिर परिसर भक्तिरस में डूब गया। भजनों के दौरान श्रद्धालु भावविभोर होकर झूमते और भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाते रहे। श्री राधा रानी श्यामा जी का वृंदावन से मंगाए गए जड़ित आभूषणों से अत्यंत आकर्षक एवं मनोहारी श्रृंगार किया गया, जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया। कथा के समापन पर श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ की विधिवत पूर्णाहुति हुई। इसके पश्चात सामूहिक आरती की गई तथा श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। भारी बारिश के बावजूद अंतिम दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए मंदिर पहुंचे। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने कथा वाचिका साध्वी गोपिका जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके मुखारविंद से सात दिनों तक श्रद्धालुओं को श्रीमद्भागवत के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की भावनाओं को देखते हुए अगले वर्ष भी साध्वी गोपिका जी से श्रीमद्भागवत कथा कराने का प्रयास किया जाएगा। इस अवसर पर डूंगरमल अग्रवाल, राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, निर्मल जालान,अरविंद अग्रवाल, विजय अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल,पूरणमल सर्राफ, निर्मल छावनिका, नंदकिशोर चौधरी,अंजनी अग्रवाल, सुरेश भगत, मधुसूदन जाजोदिया, संजय सर्राफ, पवन पोद्दार, दिलीप अग्रवाल,शिव भगवान अग्रवाल,श्याम सुंदर गोयल, ज्ञान प्रकाश शर्मा, विष्णु सोनी, मनीष सोनी, विशाल जालान, विद्या देवी अग्रवाल, बिमला जालान, सुनीता अग्रवाल, संतोष देवी अग्रवाल, उर्मिला पाड़िया, दीक्षा अग्रवाल, शकुंतला केजरीवाल, सरिता अग्रवाल, सुमन चौधरी,रमा देवी डोकानिया, आशा मुंजाल, अमिता जालान, दीपिका मोतिका,नीलम गोयल, नंदरानी पाठक, आशा सिंह, उषा मोदी,ललिता पोद्दार, किरण पोद्दार, शोभा अग्रवाल, इंदू पोद्दार,लाल देवी, किरण बरनवाल, नंद रानी पाठक, सुनीता देवी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिला-पुरुष उपस्थित थे।
विश्व पर्यटन दिवस 27 सितंबर कोपर्यटन से संस्कृति, अर्थव्यवस्था और विश्व बंधुत्व को मिलती है नई दिशा : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि विश्व पर्यटन दिवस प्रत्येक वर्ष 27 सितंबर को मनाया जाता है।यह दिवस पर्यटन के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पर्यटन दुनिया के महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रों में से एक है तथा यह रोजगार और आजीविका के साथ विभिन्न देशों एवं संस्कृतियों के बीच संपर्क बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।विश्व पर्यटन दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 1980 में हुई। 27 सितंबर की तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि इसी दिन वर्ष 1970 में संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन के संविधान को अपनाया गया था, जिसे वैश्विक पर्यटन के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।पर्यटन केवल देश-विदेश की यात्रा करने तक सीमित नहीं है। यह विभिन्न सभ्यताओं, परंपराओं, भाषाओं, खान-पान, कला और सांस्कृतिक विरासत को समझने का माध्यम भी है। पर्यटन से स्थानीय स्तर पर होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, खान-पान, गाइड सेवा और छोटे व्यवसायों को रोजगार एवं आर्थिक अवसर प्राप्त होते हैं। साथ ही, ऐतिहासिक धरोहरों और प्राकृतिक स्थलों के संरक्षण में भी पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।इस दिवस का एक प्रमुख उद्देश्य सतत एवं जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा देना है। पर्यटन का विकास ऐसा हो, जिससे प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता और स्थानीय संस्कृति को नुकसान न पहुंचे तथा स्थानीय समुदायों को उसका लाभ मिले।संयुक्त राष्ट्र पर्यटन को सतत विकास लक्ष्यों से भी जोड़ता है।भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में पर्यटन की विशेष महत्ता है। हिमालय से समुद्र तटों तक, ऐतिहासिक स्मारकों से लेकर धार्मिक एवं आध्यात्मिक स्थलों तक भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विविधता पर्यटकों को आकर्षित करती है। झारखंड में भी वन, जलप्रपात, धार्मिक स्थल, जनजातीय संस्कृति और प्राकृतिक संपदा पर्यटन की व्यापक संभावनाएं प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार विश्व पर्यटन दिवस केवल घूमने-फिरने का उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति के सम्मान, प्रकृति के संरक्षण, रोजगार के अवसरों, स्थानीय विकास और विश्व के लोगों के बीच आपसी समझ बढ़ाने का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण दिवस है।
भारी बारिश के बावजूद श्रीमद्भागवत कथा में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब साध्वी गोपिका जी ने सुनाये गोवर्धन लीला एवं मथुरा गमन के प्रसंग एबीएन सोशल डेस्क। डॉ संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के पावन सान्निध्य में एम.आर.एस. श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा पुंदाग स्थित श्री राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर में श्री राधाष्टमी महोत्सव के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के षष्ठम दिवस कथा का वातावरण अत्यंत भक्तिमय रहा। वृंदावन की सुप्रसिद्ध कथा वाचिका साध्वी गोपिका जी ने भगवान श्रीकृष्ण की कालिया नाग दमन, गोवर्धन लीला, दिव्य महारास एवं मथुरा गमन की कथा का भावपूर्ण एवं विस्तृत वर्णन किया। कथा का प्रारंभ श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से हुआ। साध्वी गोपिका जी ने बताया कि कालिया नाग के विष से यमुना का जल दूषित हो गया था। भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना में प्रवेश कर कालिया नाग का दमन किया और उसे अहंकार एवं दुष्टता का त्याग कर यमुना से दूर जाने का संदेश दिया। यह प्रसंग धर्म की अधर्म पर विजय और प्रकृति की शुद्धता का प्रतीक है। इसके बाद गोवर्धन लीला का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को प्रकृति एवं गोवर्धन पर्वत के प्रति कृतज्ञता का भाव रखने की प्रेरणा दी और इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर धारण किया। दिव्य महारास प्रसंग के माध्यम से उन्होंने भक्ति में प्रेम, समर्पण और आत्मिक एकत्व का संदेश दिया। इसके पश्चात श्रीकृष्ण के मथुरा गमन तथा कंस के अत्याचार से मुक्ति की भूमिका का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण एवं राधा रानी से संबंधित सजीव झांकियों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। साध्वी गोपिका जी ने अपने सुमधुर भजनों से वातावरण को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। भजनों पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे। श्री राधा रानी श्यामा जी का जड़ित आभूषणों से आकर्षक एवं मनोहारी श्रृंगार किया गया था।कथा के समापन पर सामूहिक आरती की गई तथा श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण हुआ। भारी वर्षा के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए उपस्थित रहे। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि कथा के सप्तम एवं अंतिम दिवस श्री रुक्मिणी विवाह, कंस उद्धार, श्रीकृष्ण-सुदामा मित्रता तथा श्रीमद्भागवत कथा की पूर्णाहुति होगी। मौके पर डूंगरमल अग्रवाल, राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, अरविंद अग्रवाल, विजय अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, नंदकिशोर चौधरी, अंजनी अग्रवाल, सुरेश भगत, संजय सर्राफ, पवन पोद्दार, शिव भगवान अग्रवाल, निर्मल छावनिका, ज्ञान प्रकाश शर्मा, विष्णु सोनी, मनीष सोनी, विशाल जालान, मधुसूदन जाजोदिया, विद्या देवी अग्रवाल, बिमला जालान, सुनीता अग्रवाल, संतोष देवी अग्रवाल, उर्मिला पाड़िया, दीक्षा अग्रवाल, शकुंतला केजरीवाल, सरिता अग्रवाल, सुमन चौधरी, रमा देवी डोकानिया, आशा मुंजाल, अमिता जालान, दीपिका मोतिका, नीलम गोयल, नंदरानी पाठक, आशा सिंह उषा मोदी, ललिता पोद्दार, किरण पोद्दार, शोभा अग्रवाल, इंदू पोद्दार, लाल देवी, किरण बरनवाल, नंद रानी पाठक, सुनीता देवी,सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं महिलाएं उपस्थित थीं।
पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का विशेष पर्व है पितृपक्ष : संजय सर्राफ एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर माना गया है। यह अवधि हमें अपने उन पितरों को स्मरण करने का संदेश देती है, जिनके संस्कार, त्याग और आशीर्वाद से परिवार और समाज की परंपराएं आगे बढ़ती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन तथा दान-पुण्य करने से पितरों की तृप्ति और शांति की कामना की जाती है।इस वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध 26 सितंबर को होगा। इसके अगले दिन 27 सितंबर से पितृपक्ष के प्रमुख श्राद्ध आरंभ होंगे और 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध पितृपक्ष से ठीक पहले होता है और इसे पितृपक्ष का नियमित भाग नहीं माना जाता। पितृपक्ष का मूल उद्देश्य दिवंगत पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।मान्यता है कि जिन पितरों की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, उसी तिथि पर पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने की परंपरा है। श्राद्ध में संकल्प लेकर पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान किया जाता है। परंपरा में जल, तिल और कुश से तर्पण का विशेष महत्व है। श्राद्ध कर्म सामान्यत: दिन के अपराह्न काल में किया जाता है तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार उपयुक्त मुहूर्त का पालन किया जाता है।पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार की जड़ों, संस्कारों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व भी है। यह नई पीढ़ी को अपने परिवार के इतिहास और परंपराओं से जोड़ने का अवसर देता है।इस अवधि में जरूरतमंदों को भोजन कराना, वस्त्र एवं अन्न का दान करना तथा सेवा कार्य करना पुण्यकारी माना जाता है। पितृपक्ष का संदेश है कि मनुष्य अपने पूर्वजों को केवल स्मृति में ही नहीं, बल्कि उनके संस्कारों और आदर्शों को अपने जीवन में अपनाकर भी सच्ची श्रद्धांजलि दे। श्रद्धा, सेवा, दान और सदाचार के साथ मनाया गया यह पर्व परिवार में संस्कार, एकता और कृतज्ञता की भावना को मजबूत करता है।
टीम एबीएन, रांची। श्री सर्वेश्वरी समूह शाखा रांची (औघड़ भगवान राम आश्रम, अघोर पथ, लेक रोड- पश्चिम, रांची) के महिला संगठन ने ग्राम- हिसाग, जिला- रांची स्थित अपना घर- वृद्धा आश्रम में निवास कर रहे जरूरतमंद माताओं के बीच गुरुवार को फल एवं अन्य खाद्य सामग्री वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत में एक लघु गोष्ठी की गयी, जिसमें शाखा के सदस्य उपेंद्र नाथ शाहदेव ने परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी एवं परमपूज्य बाबा औघड़ गुरुपद संभव राम जी तथा श्री सर्वेश्वरी समूह का संक्षिप्त परिचय देकर समूह द्वारा आयोजित किये जा रहे अनेक जनसेवा के कार्यों के बारे में सभी को अवगत कराया। ज्ञात हो कि श्री सर्वेश्वरी समूह एक विश्वविख्यात सामाजिक एवं धार्मिक संस्था है जो निरन्तर जनसेवा के कार्यक्रम आयोजित करती रहती है। जनसेवा के लिये संस्था का नाम गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और लिम्का बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है। गोष्ठी के बाद उपस्थित 40 वृद्ध माताओं के बीच फलों का वितरण किया गया। यह कार्यक्रम श्री सवेश्वरी समूह के उन्नीस सूत्रीय कार्यक्रम के अन्तर्गत आयोजित किया गया। समस्त कार्यक्रम का आयोजन श्री सर्वेश्वरी समूह- शाखा रांची के महिला संगठन के कुशल नेतृत्व में आयोजित किया गया जिसमें नयनमंजरी बक्सराय, कृष्णा शाहदेव, संगीता सहाय, संगीता लाल, मीना सहाय, गीता तिवारी, ज्योति शहदेव, अर्चना रोनियार, रंभा शहदेव, सविता शहदेव, राशि लाल सम्मलित हुए। अपना घर- वृद्धा आश्रम से सिस्टर एमा एवं अन्य माताओं का सराहनीय सहयोग प्राप्त हुआ।
परमात्मा भक्त के प्रेम और वात्सल्य के आगे स्वयं को बांध लेते हैं : गोपिका जी एबीएन सोशल डेस्क। डॉ. संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के पावन सान्निध्य में एम.आर.एस. श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा पुंदाग स्थित श्री राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर में श्री राधाष्टमी महोत्सव के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के पंचम दिवस भक्ति, वात्सल्य और आनंद का अद्भुत संगम देखने को मिला। वृंदावन की सुप्रसिद्ध कथा वाचिका साध्वी गोपिका जी ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का अत्यंत भावपूर्ण एवं विस्तारपूर्वक वर्णन किया।साध्वी गोपिका जी ने कथा के क्रम में श्रीकृष्ण बाल लीला, माखन चोरी, दामोदर लीला एवं गोचरण लीला के प्रसंग सुनाये। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि प्रेम, वात्सल्य, सरलता और निष्कपट भक्ति का संदेश देती हैं। माखन चोरी के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि भगवान अपने भक्तों के हृदय रूपी मटकी में छिपे प्रेम को स्वीकार करते हैं। दामोदर लीला का वर्णन करते हुए साध्वी गोपिका जी ने माता यशोदा के वात्सल्य भाव को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि परमात्मा भक्त के प्रेम और वात्सल्य के आगे स्वयं को बांध लेते हैं। वहीं गोचरण लीला में भगवान श्रीकृष्ण के ग्वाल-बालों एवं गौमाता के प्रति प्रेम का सुंदर चित्रण किया गया। कथा के दौरान विभिन्न प्रसंगों पर प्रस्तुत सजीव झांकियों ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। बाल स्वरूप में श्रीकृष्ण की मनोहारी झांकी देखकर पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। साध्वी गोपिका जी ने श्री राधा रानी एवं श्रीकृष्ण के सुमधुर भजनों की प्रस्तुति से श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। राधे-राधे जपो चले आएंगे बिहारी तथा श्रीकृष्ण भक्ति के मधुर भजनों पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूमते रहे। मंदिर परिसर राधे-राधे एवं जय श्रीकृष्ण के जयघोष से गूंजता रहा। इस अवसर पर श्री राधा रानी श्यामा जी का जड़ित आभूषणों से आकर्षक एवं अलौकिक श्रृंगार किया गया। दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहा। कथा के समापन पर सामूहिक आरती की गई तथा श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। कथा के पश्चात साध्वी गोपिका जी का जन्मदिवस भी श्रद्धा एवं आनंद के साथ मनाया गया। श्रद्धालुओं एवं ट्रस्ट के सदस्यों ने उन्हें जन्मदिवस की शुभकामनाएं दीं और उनके स्वस्थ, सुखमय एवं मंगलमय जीवन की कामना की। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस गोवर्धन लीला, मथुरा गमन, कालिया नाग दमन एवं दिव्य महारास के प्रसंगों का वर्णन किया जाएगा। कथा प्रतिदिन अपराह्न 2:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक आयोजित हो रही है। इस अवसर पर डूंगरमल अग्रवाल, राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, अरविंद अग्रवाल, विजय अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, नंदकिशोर चौधरी, अंजनी अग्रवाल, सुरेश भगत, संजय सर्राफ, निर्मल छावनिका, ज्ञान प्रकाश शर्मा, विष्णु सोनी, मनीष सोनी, विशाल जालान, विद्या देवी अग्रवाल, बिमला जालान, सुनीता अग्रवाल, उर्मिला पाड़िया, दीक्षा अग्रवाल, सरिता अग्रवाल, सुमन चौधरी, रमा देवी डोकानिया, आशा मुंजाल, अमिता जालान, दीपिका मोतिका, नीलम गोयल, नंदरानी पाठक, आशा सिंह, उषा मोदी, ललिता पोद्दार, किरण पोद्दार, शोभा अग्रवाल, इंदू पोद्दार, लाल देवी, किरण बरनवाल, सुनीता देवी सहित बड़ी संख्या में महिलाएं एवं पुरुष श्रद्धालु उपस्थित थे।
एबीएन सोशल डेस्क। श्री राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर, पुंदाग में श्रीमद्भागवत कथा की कथा वाचिका साध्वी गोपिका महाराज जी का जन्मदिवस श्रद्धा, सेवा एवं आध्यात्मिक भाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर उन्होंने सर्वप्रथम मंदिर में भगवान श्री राधा-कृष्ण की विधिवत पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त किया।जन्मदिवस पर साध्वी गोपिका जी ने सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम पहुंचकर वहां निवास कर रहे दिव्यांग, निराश्रित एवं जरूरतमंद प्रभुजनों के साथ समय बिताया। उन्होंने सभी को भोजन कराया तथा फल एवं मिठाई का वितरण कर उनके साथ जन्मदिवस की खुशियां साझा कीं। उन्होंने प्रभुजनों से स्नेहपूर्वक आशीर्वाद भी लिया। इसके पश्चात उन्होंने श्री कृष्ण प्रणामी गौ सेवा धाम पहुंचकर गौसेवा की। उन्होंने गौमाता को गुड़-रोटी एवं चारा खिलाया और गौसेवा के माध्यम से करुणा, सेवा एवं सनातन संस्कार का संदेश दिया। मौके पर श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने साध्वी गोपिका महाराज जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं एवं मंगलकामनाएं दीं। कार्यक्रम में मंदिर के पुजारी अरविंद पांडे, ट्रस्ट के अध्यक्ष डूंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, अरविंद अग्रवाल, संजय सर्राफ, मधुसूदन जाजोदिया, सुरेश अग्रवाल, नंदकिशोर चौधरी सहित अन्य लोग उपस्थित थे। उक्त जानकारी ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने दी।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.