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इसरो : चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण जून में
Published / 2022-10-20 22:25:28
इसरो : चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण जून में

एबीएन सेंट्रल डेस्क। मिशन चंद्रयान-3 को लेकर बड़ा अपडेट आ रहा है। बताया जा रहा है कि इसरो की योजना अगले साल जून में चंद्रमा पर अपने तीसरे मिशन चंद्रयान-3 को और अधिक मजबूत चंद्र रोवर के साथ लॉन्च करने की है। यह भविष्य के मिशनों के लिए भी मददगार होगा। अंतरिक्ष एजेंसी ने अगले साल की शुरुआत में देश के पहले मानव अंतरिक्ष यान गगनयान के लिए एबॉर्ट मिशन की पहली परीक्षण उड़ान भी तैयार की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने एक कार्यक्रम से इतर कहा कि चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण अगले साल जून में लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम3) से होगा। इसरो की योजना 2024 के अंत तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को कक्षा में ले जाने की है। दरअसल, सितंबर 2019 में चंद्रयान-2 मिशन पर विक्रम लैंडर के चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद चंद्रमा पर रोवर उतारने का भारत का पहला प्रयास विफल हो गया था। सोमनाथ ने कहा कि चंद्रयान-3 अब तैयार है। यह चंद्रयान-2 की प्रतिकृति नहीं है। रोवर वहां है। इंजीनियरिंग काफी अलग है। हमने इसे और अधिक मजबूत बनाया है ताकि पिछली बार की तरह समस्या न हो। इसरो के अध्यक्ष ने कहा कि कई बदलाव हैं। इंपैक्ट लेग्स पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं। इसमें बेहतर उपकरण होंगे। इस बार वह समस्या नहीं आयेगी, जो पिछली बार आई थीं। मानव अंतरिक्ष यान गगनयान पर सोमनाथ ने कहा कि इसरो वास्तव में मनुष्यों को अंतरिक्ष में ले जाने से पहले छह परीक्षण उड़ानें करेगा। गगनयान मिशन की तैयारी धीमी और स्थिर गति से चल रही है। उन्होंने कहा कि इसे आगे बढ़ाने का यह सही तरीका है। यह एक बहुत ही जटिल मिशन है। हम इसके बारे में दावा नहीं कर सकते हैं।

दुनिया भर में इस साल फेंक दिये जायेंगे 5.3 अरब फोन, जानें वजह...
Published / 2022-10-18 20:16:20
दुनिया भर में इस साल फेंक दिये जायेंगे 5.3 अरब फोन, जानें वजह...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। इस साल भारत की आबादी के करीब तीन गुना स्मार्ट फोन फेंक दिए जाएंगे। इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निवारण पर काम करने वाली संस्था वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट ने कहा है कि इस साल दुनियाभर में 5.3 अरब फोन फेंक दिए जाएंगे। संस्था का यह अनुमान वैश्विक व्यापार के आंकड़ों पर आधारित है। दुनिया में ई-कचरे के बढ़ते संकट को दिखाते हुए इस शोध में कहा गया है कि ऐसे लोगों की तादाद काफी बड़ी है जो अपने पुराने फोन को रीसाइकल करने के बजाय रखे रहते हैं। ई-कचरा का दोहरा नुकसान है क्योंकि इसे फेंकने के कारण जलवायु को नुकसान होता है और इसमें इस्तेमाल कीमती धातुओं को यदि रिसाइक्लिंग के दौरान निकाला नहीं जाता है तो खनन के जरिए उन्हें पृथ्वी से निकालना पड़ता है, जिसके अपने कई नुकसान हैं। इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने के मामले में भारत दुनिया का पांचवां बड़ा देश है। भारत में हर साल करीब 10 लाख टन ई-कचरा निकलता है। भारतीय शहरों में पैदा होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे में सबसे ज्यादा कंप्यूटर होते हैं। ऐसे ई कचरे में 40 फीसदी सीसा और 70 फीसदी भारी धातुएं मिलीं हैं। एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे देश में लाखों टन ई-कचरे का महज तीन से दस फीसदी ही इकट्ठा किया जाता है। स्मार्टफोन के अंदर होती हैं कई धातुएं : सूत्रों के मुताबिक एक स्मार्टफोन के अंदर 62 धातुएं हो सकती हैं। आईफोन के पुर्जों में सोना, चांदी और पैलेडियम जैसी बेशकीमती धातुएं भी होती हैं, जिन्हें एशिया, अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया में खनन से निकाला जाता है। संस्था के महानिदेशक पास्कल लीरॉय ने कहा कि लोगों को अंदाजा नहीं है कि ई-कचरे में मौजूद कीमती धातुओं की मात्रा कितनी बड़ी है। वह कहते हैं कि लोगों को अहसास नहीं है कि देखने में सामान्य लगने वालीं इन चीजों को अगर वैश्विक स्तर पर एक साथ रखा जाए तो कितनी बड़ी मात्रा बन सकती है। एक अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में इस वक्त 16 अरब से ज्यादा मोबाइल फोन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यूरोप में जितने फोन हैं, उनमें से लगभग एक तिहाई इस्तेमाल नहीं होते। डब्ल्यू ट्रिपल ई का शोध दिखाता है कि इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा 2030 तक सालाना 7.4 करोड़ टन की दर से बढ़ने लगेगा। इस कचरे में सिर्फ फोन शामिल नहीं हैं। टैबलेट और कंप्यूटर से लेकर वॉशिंग मशीन, टोस्टर और फ्रिज व जीपीएस मशीन तक ई-कचरे का बड़ा हिस्सा बन रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2018 में पूरी दुनिया में 5 करोड़ टन ई-कचरा जमा हुआ। इस कचरे में कंप्यूटर प्रोडक्ट्स, स्क्रीन्स, स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और हीटिंग या कूलिंग वाले उपकरण सबसे ज्यादा थे। इसमें से सिर्फ 20 फीसदी कचरे की रिसाइक्लिंग हुई, बाकी खुली जमीन या नदियों और समंदर तक पहुंच गए। बता दें कि नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल के पिछले दिसंबर 2020 में पेश इस रिपोर्ट के मुताबिक 2017-18 में ई-कचरा कलेक्शन का लक्ष्य 35,422 टन था, लेकिन कलेक्शन 25,325 टन ही हुआ। इसी तरह 2018-19 में लक्ष्य था 1,54,242 टन लेकिन जमा हुआ 78,281 टन। और अगले ही साल यानी 2019-20 में भारत में 10,14,961 टन ई-कचरा पैदा कर दिया गया।

23 को वनवेब के 36 उपग्रहों को लांच करेगा इसरो का एलवीएम-3 रॉकेट
Published / 2022-10-15 09:18:58
23 को वनवेब के 36 उपग्रहों को लांच करेगा इसरो का एलवीएम-3 रॉकेट

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का सबसे भारी रॉकेट एलवीएम-3 23 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से ब्रिटिश स्टार्टअप वनवेब के 36 उपग्रहों का प्रक्षेपण करेगा। इस प्रक्षेपण के साथ ही एलवीएम-3 वैश्विक वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में कदम रखेगा। एलवीएम-3 को पहले जीएसएलवी एमके-3 रॉकेट के नाम से जाना जाता था। बेंगलुरु स्थित इसरो मुख्यालय ने शुक्रवार को कहा कि एलवीएम-3-एम2/वनवेब इंडिया-1 मिशन का प्रक्षेपण 23 अक्टूबर (22 अक्टूबर की मध्यरात्रि) को भारतीय समयानुसार 12 बजकर सात मिनट पर निर्धारित है। इसरो ने कहा कि क्रायो स्टेज, इक्विपमेंट बे को जोड़ने का काम पूरा। उपग्रहों को एक कैप्सूल में भरकर रॉकेट में रख दिया गया है। प्रक्षेपक की अंतिम जांच की प्रक्रिया जारी है। इस महीने की शुरुआत में इसरो ने कहा था कि अंतरिक्ष विभाग और अंतरिक्ष एजेंसी की वाणिज्यिक शाखा के तहत काम करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के केंद्रीय उद्यम न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) ने ब्रिटेन स्थित नेटवर्क एक्सेस एसोसिएट्स के साथ दो प्रक्षेपण सेवा अनुबंधों पर हस्ताक्षर किये थे। इन अनुबंधों के तहत एलवीएम-3 रॉकेट के जरिये वनवेब के निचली कक्षा के ब्रॉडबैंड संचार उपग्रहों का प्रक्षेपण किया जाना था। इसरो ने कहा, यह मांग के आधार पर एनएसआईएल के जरिये पहला एलवीएम-3 समर्पित वाणिज्यिक प्रक्षेपण है। अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि वनवेब के साथ हुआ यह करार एनएसआईएल और इसरो के लिए मील का पत्थर है, क्योंकि इसके जरिये एलवीएम-3 रॉकेट वैश्विक वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में कदम रखने जा रहा है। एलवीएम-3 तीन चरणों वाला प्रक्षेपण वाहन है, जिसमें 2 ठोस मोटर स्ट्रैप-ऑन, एक तरल प्रणोदक चरण और एक क्रायोजेनिक चरण शामिल है। यह रॉकेट चार टन भार वर्ग के उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में प्रक्षेपित करने में सक्षम है। भारत की भारती एंटरप्राइजेज वनवेब में एक प्रमुख निवेशक और शेयरधारक है।

मंगल ग्रह : जीवन शुरू होते ही आखिर क्यों हो गया खत्म, जानें सच्चाई...
Published / 2022-10-13 07:28:07
मंगल ग्रह : जीवन शुरू होते ही आखिर क्यों हो गया खत्म, जानें सच्चाई...

एबीएन नॉलेज डेस्क। खबरें आई थीं और काफी चर्चा भी हुई थी कि मंगल पर जीवन की संभावना है, लेकिन अब बताया जा रहा है कि मंगल पर जीवन नहीं रहा है। पहले जब भी पृथ्वी के बाहर जीवन की कल्पना की जाती थी तो मंगल की बात होती थी। वैज्ञानिकों को मंगल पर जीवन को लेकर कई ठोस प्रमाण भी मिले थे। हालांकि, अब ये उम्मीद खत्म होती जा रही है या फिर लगभग खत्म हो गई है। अब कई रिसर्च रिपोर्ट सामने आ चुकी हैं, जिनमें मंगल पर जीवन ना होने का दावा किया जाता है। मंगल पर जीवन ना होने की रिपोर्ट्स के बाद अब लोग जानना चाहते हैं कि आखिर वो रहस्य क्या है कि मंगल पर जीवन खत्म हो गया। अब इसे लेकर कई रिसर्च की जा रही है, जिसमें मंगल पर जीवन शुरू होने से खत्म होने का कारण पता किया जा रहा है, तो आज हम आपको बताते हैं कि आखिर ऐसे क्या हुआ कि मंगल पर जीवन की शुरुआत अच्छे से नहीं हो पाई। तो जानते हैं मंगल पर जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें… क्यों मंगल पर नहीं पनपा जीवन : आपको ये जानकार हैरानी होगी कि जिस जलवायु परिवर्तन की बात पृथ्वी पर की जा रही है, उसी जलवायु परिवर्तन के चलते मंगल पर जीवन संभव नहीं हो पाया है। माना जा रहा है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से ही मंगल का वातावरण प्रभावित हुआ है और इस वजह से आज मंगल की जमीन लंबे समय तक बंजर ही रह गई है। रिसर्च में सामने आया है कि ग्रीन हाउस गैस इफेक्ट की वजह से यह असर हुआ है। एक अमेरिकन वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 3.7 से 4.1 अरब साल पहले मंगल के शुरुआती दिनों का वातावरण, जीवन को पनपने देने के लिए अनुकूल था। हाइड्रोजन पर जीवित रहने वाले और मीथेन का उत्सर्जन करने वाले सामान्य रोगाणु मंगल पर करीब 370 करोड़ साल पहले पनपे होंगे। इस तरह के रोगाणु आज पृथ्वी पर आम हैं, लेकिन ये मंगल के साथ उल्टे साबित हुए। लेकिन माना जा रहा है कि मंगल की स्थिति में हो सकता है कि ज्यादा मीथेन का उत्सर्जन हुआ हो। नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कहा कि इस तरह की घटना ने संभावित गर्म परिस्थितियों को समाप्त कर दिया होगा और मंगल की सतह पर जीवित रहने की क्षमता कम हो गई होगी। बता दें कि इसका पता लगाने के लिए एरिजोना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मंगल ग्रह से कुछ साक्ष्य जुटाकर उन्हें वातावरण और जलवायु के मॉडल के साथ-साथ मीथेन उत्पादक रोगाणुओं के पारिस्थितिक मॉडल का उपयोग करके काल्पनिक मॉडल बनाया। इसमें यह भी पाया गया कि शुरुआत में मगल आज की ठंड वाली परिस्थितियों की तुलना में काफी गर्म था और उस वक्त वहां हाइड्रोजन काफी मात्रा में थी। इस स्थिति में रोगाणुओं को पर्याप्त भोजन आपूर्ति मिली होगी लेकिन, वातावरण के बदलने के साथ ही यहां की स्थिति भी बदल गयी।

अगले साल ऐपल करेगी बदलाव : iPhone 15 को अब USB-C चार्जर भी...
Published / 2022-10-12 10:13:12
अगले साल ऐपल करेगी बदलाव : iPhone 15 को अब USB-C चार्जर भी...

एबीएन नॉलेज डेस्क। Apple को अब यूरोपियन यूनियन के नए नियमों के अनुसार iPhone के लिए चार्जर को लाइटनिंग से USB-C में बदलना होगा। कंपनी के पास नए नियम का पालन करने के लिए 2024 तक का समय है। इसके बाद कंपनी फोन, टैबलेट और हेडफोन जैसे अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के लिए एक ही चार्जिंग पोर्ट देना होगा। जानकारी के मुताबिक iPhone 15 को अगले साल USB-C चार्जिंग पोर्ट मिल सकता है। हालांकि, शुरू में केवल हाई एंड मॉडल iPhone 15 Ultra में यह फीचर दिया जायेगा। ब्लूमबर्ग के मार्क गुरमन ने अपने साप्ताहिक न्यूज लेटर में दावा किया है कि ऐपल शायद अगले कुछ सालों में ऐपल वॉच से मेल खाते हुए आईफोन और आईपैड पर पूरी तरह से अपरिवर्तनीय चार्जिंग शुरू कर देगा। गुरमन का यह भी दावा है कि Apple जल्द ही एक ऐसी तकनीक खोज सकता है जो उसके डिवाइसों को वायरलेस तरीके से चार्ज कर सके। मार्क गर्मन की मानें तो ऐपल की अन्य मोबाइल एक्सेसरीज और मैक एक्सेसरीज में भी USB-C चार्जिंग पोर्ट का सपोर्ट मिल सकता है, जिनमें मैजिक माउस और मैजिक कीबोर्ड वगैरह शामिल हैं। हालांकि, एयरपॉड्स, एयरपॉड्स प्रो और एयरपॉड्स मैक्स को USB-C पोर्ट मिलने में साल 2024 तक का वक्त जरूर लग सकता है। EU ने सभी इलेक्ट्रॉनिक डिवासों के लिए USB-C चार्जर अनिवार्य कर दिया है। पिछले हफ्ते, यूरोपीय संघ ने 2024 के अंत तक यूएसबी-सी पर स्विच करने के लिए फोन, टैबलेट, कैमरा, हेडफोन और हेडसेट, ई-रीडर, कीबोर्ड, चूहों, मोबाइल नेविगेशन सिस्टम, पोर्टेबल गेम कंसोल और स्पीकर बनाने वाली कंपनियों के लिए अनिवार्य बना दिया था।

एयरटेल ने देश में प्रदर्शित किया 5जी संचालित पहला इमर्सिव वीआर विज्ञापन
Published / 2022-10-06 13:03:38
एयरटेल ने देश में प्रदर्शित किया 5जी संचालित पहला इमर्सिव वीआर विज्ञापन

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत की प्रीमियर कम्युनिकेशन सलूशन प्रोवाइडर, भारती एयरटेल (एयरटेल) ने 5जी द्वारा संचालित देश का पहला इमर्सिव वर्चुअल रियलिटी (वीआर) विज्ञापन पेश किया। एयरटेल थैंक्स ऐप पर नया विज्ञापन फॉरमेट ब्रांड्स के लिए कस्टमर्स के साथ एक ऐसे इमर्सिव वातावरण में जुड़ने के नए तरीके उपलब्ध कराता है, जो पहले पारंपरिक विज्ञापन के तरीकों में उपलब्ध नहीं था। अल्ट्रा-फास्ट लो-लेटेंसी 5जी नेटवर्क सुनिश्चित करता है कि 3डी विजुअल और वीडियो जीवंत हों। ब्रांड्स इस प्रकार के विज्ञापन का उपयोग करके अपने ग्राहकों को एक इमर्सिव, लैग-फ्री और अत्यधिक आकर्षक विज्ञापन दिखा सकते हैं। एयरटेल डिजिटल के सीईओ आदर्श नायर ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, अब हम 5जी की बदौलत लो-लेटेंसी के साथ और अधिक लाभ हासिल कर सकते हैं, जो इसका सबसे बड़ा फायदा है। हम इस तकनीक का उपयोग भारत में अब तक का पहला इमर्सिव वीआर विज्ञापन विकसित करने के लिए कर रहे हैं, जो व्यवसायों को मोबाइल-फर्स्ट मार्केट में ग्राहकों के साथ सीधे संवाद की सुविधा प्रदान करता है। इसका उपयोग ब्रांड अपने ग्राहकों को आकर्षक, इमर्सिव और कस्टमाइज्ड एक्सपीरियंस देने के लिए कर सकते हैं।

नासा का अंतरिक्ष यान उल्कापिंड से टकराने के बाद 10,000 किमी तक बिखरा मलबा
Published / 2022-10-06 07:06:26
नासा का अंतरिक्ष यान उल्कापिंड से टकराने के बाद 10,000 किमी तक बिखरा मलबा

एबीएन सेंट्रल डेस्क। नासा के डार्ट अंतरिक्ष यान द्वारा इरादतन टक्कर मारकर जिस उल्कापिंड को तोड़ा था उसका मलबा हजारों किलोमीटर के दायरे में फैला है। इसके बारे में चिली के एक टेलीस्कोप द्वारा ली गई एक नई तस्वीर से पता चला है। जानकारी के अनुसार डबल एस्टेरॉयड रीडायरेक्शन टेस्ट (डार्ट) के अंतरिक्षयान ने इरादतन डाइमॉरफोस नाम के उल्कापिंड को 26 सितंबर को टक्कर मारी थी। डाइमॉरफोस वास्तव में डिडमोस नाम के क्षुद्रग्रह का पत्थर था। यह पहला ग्रह रक्षा परीक्षण था जिसमें एक अंतरिक्ष यान के प्रभाव ने एक क्षुद्रग्रह की कक्षा को बदलने का प्रयास किया था। डार्ट की टक्कर के दो दिन बाद खगोलविदों ने चिली में 4.1-मीटर दक्षिणी खगोल भौतिकी अनुसंधान (एसओएआर) टेलीस्कोप का उपयोग क्षुद्रग्रह की सतह से उड़ी धूल और मलबे के विशाल ढेर की तस्वीरों को लेने के लिये किया। नई तस्वीरों में धूल के निशान को दिखाती है - इजेक्टा जिसे सूर्य के विकिरण दबाव से दूर धकेल दिया गया है, जैसे धूमकेतु की पूंछ - केंद्र से देखने के क्षेत्र के दाहिने किनारे तक फैली हुई है। शोधकर्ताओं ने कहा कि जिस समय यह तस्वीरें ली गई उस समय डिडमोस की पृथ्वी से दूरी टक्कर के बिंदु से कम से कम 10,000 किमी के बराबर होगी। लोवेल वेधशाला के टैडी कारेटा ने कहा, यह अद्भुत है कि हम टक्कर के बाद के दिनों में संरचना और उसकी सीमाओं की इतनी स्पष्ट तस्वीरें लेने में सक्षम थे।

इस महीने के अंत तक 36 वनवेब सैटेलाइट्स लॉन्च करेगा इसरो
Published / 2022-10-06 06:57:33
इस महीने के अंत तक 36 वनवेब सैटेलाइट्स लॉन्च करेगा इसरो

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इस महीने के अंत तक 36 सैटेलाइट्स को लॉन्च करेगा। इसरो ने गुरुवार को कहा कि वह यूनाइटेड किंगडम के ग्लोबल कम्युनिकेशन नेटवर्क वनवेब के 36 सैटेलाइट्स को अपने सबसे भारी लॉन्चर एलवीएम3 या लॉन्च व्हीकल मार्क III पर लॉन्च करेगा। खास बात यह है कि वनवेब इंडिया-1 मिशन/एलवीएम3 एम2 के तहत लॉन्च होने वाले ये उपग्रह एलवीएम3 के ग्लोबल कॉमर्शियल लॉन्च सर्विस मार्केट में एट्री को चिह्नित करेंगे। दरअसल, पिछले महीने उपग्रह संचार कंपनी वनवेब ने प्रस्तावित प्रक्षेपण से पहले 36 सैटेलाइट्स के आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र पहुंचने की घोषणा की थी। कंपनी ने एक बयान में कहा था कि इस प्रक्षेपण के साथ, वनवेब के पृथ्वी की निचली कक्षा (एलईओ) में प्रथम पीढ़ी के उपग्रहों के समूह का 70 प्रतिशत लक्ष्य पूरा हो जायेगा। उसने कहा था कि वह दुनिया भर में उच्च गति वाली इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने में प्रगति कर रही है। बयान में कहा गया था कि यह कंपनी का 14वां प्रक्षेपण होगा और उपग्रहों को इसरो के सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी-मार्क3 के जरिये उनकी कक्षा में भेजा जायेगा। बता दें कि यह सहयोग इसरो की कॉमर्शियल शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के दो सेवा अनुबंधों का परिणाम है, जो लो अर्थ ऑर्बिट (एलईओ) ब्रॉडबैंड संचार सैटेलाइट्स को लॉन्च करने के लिए वन वेब के साथ हस्ताक्षरित है। वहीं, इसरो ने कहा है कि अनुबंध के तहत आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 36 सैटेलाइट्स को एक एलवीएम3 द्वारा कक्षा में स्थापित किया जायेगा। लॉन्च के साथ, वनवेब के पास अपने नियोजित जेन 1 एलईओ तारामंडल का 70 प्रतिशत से अधिक कक्षा में होगा क्योंकि यह सरकारों, व्यवसायों और समुदायों के लिए उच्च गति, कम विलंबता कनेक्टिविटी देने की तैयारी करता है। इसरो ने अपने ट्विटर हैंडल पर लॉन्च की तैयारियों के बारे में डिटेल्स शेयर किया है। इस डिटेल्स में बताया गया है कि आने वाले दिनों में लॉन्च वाहन के क्रायोजेनिक ऊपरी चरण का एकीकरण होगा। साथ ही 36 सैटेलाइट्स के साथ पेलोड फेयरिंग का एकीकरण भी होगा। इसके बाद यह इस महीने के तीसरे या चौथे हफ्ते तक लॉन्च के लिए तैयार हो जायेगा। वनवेब – 648 लियो उपग्रहों के एक समूह द्वारा संचालित एक वैश्विक संचार नेटवर्क है। इसका मुख्यालय लंदन में है। वनवेब को फरवरी 2019 में लॉन्च किया गया था। इसका उद्देश्य लियो उपग्रहों के एक समूह के कार्यान्वयन के माध्यम से दुनिया भर में हर जगह कनेक्टिविटी प्रदान करना है।

गूगल ट्रांसलेशन हुआ इतिहास,  सेवाएं बंद
Published / 2022-10-04 11:37:26
गूगल ट्रांसलेशन हुआ इतिहास, सेवाएं बंद

एबीएन नॉलेज डेस्क। गूगल ने 2010 में चीन के अंदर सर्च इंजन सेवा को बंद कर दिया था। इसकी बड़ी वजह पड़ोसी देश की सरकार द्वारा इंटरनेट सामग्री को बड़े पैमाने पर सेंसर किया जाना था। हालांकि, 2017 में गूगल ने एक समर्पित वेबसाइट और ऐप के जरिए चीन में ट्रांसलेशन सर्विस की शुरुआत की। दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल ने चीन में ट्रांसलेट सर्विस को बंद कर दिया है। इस कदम से पड़ोसी देश में कंपनी की सेवाओं का दायरा और भी छोटा हो गया है। चीन में ट्रांसलेट वेबसाइट खुलने पर अब एक जेनेरिक गूगल सर्च बार दिख रहा है। इस पर क्लिक करते ही यूजर्स हांगकांग की गूगल ट्रांसलेशन वेबसाइट पर पहुंच जाते हैं। हालांकि चीनी यूजर्स हांगकांग की ट्रांसलेशन वेबसाइट का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन में अमेरिकी टेक कंपनी ने ट्रांसलेशन सर्विस को कम इस्तेमाल किये जाने के कारण बंद कर दिया है। चीन में गूगल ट्रांसलेश सर्विस के अचानक बंद होने का असर कुछ चीनी एप्लिकेशन पर भी पड़ा है। ये ऐसी एप्लिकेशन हैं, जो गूगल की ट्रांसलेट सर्विस के ऊपर निर्भर हैं। टेकक्रंच के मुताबिक अमेरिकी कंपनी के इस कदम से को रीडर डॉक्यूमेंट रीडर जैसी सर्विस का इस्तेमाल करने वाले यूजर्स काफी परेशानी का सामना कर रहे हैं। बता दें कि 2006 में गूगल ने चीन में गूगल सर्च का चीनी वर्जन पेश किया था, लेकिन लोकल सर्च इंजन बैडु से इसे कड़ी टक्कर मिली। 2010 में गूगल ने चीन में अपनी सर्च इंजन सेवा बंद कर दी थी। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, 2010 में गूगल ने कहा था कि चीन में हैकर्स ने उसके कुछ सोर्स कोड को चुराया है और कुछ चीनी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के जीमेल अकाउंट को भी छेड़ा है। इंटरनेट सामग्री पर चीनी सरकार की कड़ी निगरानी को देखते हुए गूगल ने पड़ोसी देश में सर्च इंजन सर्विस को बंद कर दिया। कम उपयोग के कारण बंद : गूगल के प्रवक्ता ने कहा है कि कंपनी ने चीन में कम उपयोग के कारण गूगल ट्रांसलेट को बंद कर दिया है। अगस्त में सबसे बड़ी ट्रांसलेशन सर्विस को चीन में 5.35 करोड़ हिट मिले हैं। गूगल ने 2017 में चीन के अंदर ट्रांसलेशन ऐप लॉन्च की थी। चीनी यूजर्स को रिझाने के लिए कंपनी ने मशहूर चीनी-अमेरिकी रैपर एमसी जिन से एड भी कराया था।

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