ऑस्ट्रेलियाई समुद्र तट पर बहकर आया अंतरिक्ष मलबाइसरो करेगा अध्ययन, क्या पीएसएलवी का हिस्सा है?एबीएन नॉलेज डेस्क। जब भारतीय अपने चंद्रयान-3 के चांद पर उतरने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, तो ऐसे समय में ऑस्ट्रेलिया से आयी एक तस्वीर ने टेंशन पैदा कर दी। जी हां, ऑस्ट्रेलिया के समुद्री तट पर गुंबद के आकार की एक विशाल रहस्यमय वस्तु बहकर आयी है, हालांकि अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि यह भारतीय अंतरिक्ष संस्थान (इसरो) के पीएसएलवी प्रक्षेपण यान का हिस्सा है या नहीं, जिसके इसरो ने कुछ समय पहले ही लॉन्च किया था।ऑस्ट्रेलिया की अंतरिक्ष एजेंसी ने एक ट्वीट में कहा, हम वर्तमान में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में ज्यूरियन खाड़ी के पास एक समुद्र तट पर स्थित इस वस्तु के बारे में जांच कर रहे हैं। एजेंसी ने कहा, वस्तु किसी विदेशी अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान से संबंधित हो सकती है और हम वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ संपर्क कर रहे हैं जो अधिक जानकारी प्रदान करने में सक्षम हो सकते हैं।एजेंसी ट्वीट में कहा, अगर समुदाय को कोई और संदिग्ध मलबा दिखता है, तो उन्हें स्थानीय अधिकारियों को इसकी सूचना देनी चाहिए और एसपीएसीई.एमओएनआईटीओआरआईएनजी@एसपीएसीई.जीओवी.एयू के माध्यम से ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी को सूचित करना चाहिए।ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि हम मलबा शमन सहित बाहरी अंतरिक्ष गतिविधियों की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर करना जारी रखेंगे।इस बीच अटकलें लगायी जा रही है कि ऑस्ट्रेलिया में मिला मलबा इसरो के पीएसएलवी प्रक्षेपण यान का हिस्सा हो सकता है। इसरो के सूत्र न तो इसकी पुष्टि की और न ही इससे इनकार किया कि ज्यूरियन खाड़ी के पास पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट पर बहकर आई विशाल वस्तु उसके पीएसएलवी रॉकेट का हिस्सा है या नहीं।सूत्रों ने कहा- इसे प्रत्यक्ष रूप से देखे बिना और इसकी जांच किये बिना कुछ भी नहीं कहा जा सकता (चाहे यह पीएसएलवी का मलबा है)। उन्होंने कहा कि हम इसे व्यक्तिगत रूप से देखे बिना और इसकी जांच किये बिना इसके बारे में किसी भी बात की पुष्टि या खंडन नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह तभी पता लगाया जा सकता है, जब ऑस्ट्रेलियाई अंतरिक्ष एजेंसी उस वस्तु का वीडियो भेजेगी। सूत्रों ने कहा- हमें यह देखना होगा कि क्या इस पर कोई निशान हैं। यदि आवश्यक हुआ, तो इसरो अधिकारी यह पुष्टि करने के लिए वहां जा सकते हैं कि यह भारतीय रॉकेट का है या नहीं।
चंद्रमा की यात्रा के लिए निकला चंद्रयान-3इसरो प्रमुख सोमनाथ बोले- 23 अगस्त को होगी सॉफ्ट लैंडिंगएबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने शुक्रवार को कहा कि भारत का तीसरा चंद्र अभियान चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास 23 अगस्त को करेगा। सॉफ्ट लैंडिंग को तकनीकी रूप से चुनौतिपूर्ण कार्य माना जाता है। सोमनाथ ने 600 करोड़ रूपये की अनुमानित लागत वाले इस मिशन के सफल प्रक्षेपण के बाद संवाददाताओं से कहा कि चंद्रयान-3 को एक अगस्त से चंद्रमा की कक्षा में स्थापित करने की योजना है। उन्होंने कहा कि चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग 23 अगस्त को शाम पांच बजकर 47 मिनट पर किये जाने की योजना है।भारत ने शुक्रवार को यहां एलवीएम3-एम4 रॉकेट के जरिए अपने तीसरे चंद्र मिशन-चंद्रयान-3 का सफल प्रक्षेपण किया। सोमनाथ ने कहा कि शुक्रवार को प्रक्षेपण के बाद राकेट दीर्घ वृताकार चंद्र कक्षा में आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा- हमें चंद्रयान-3 को एक अगस्त से चंद्रमा की कक्षा में स्थापित करने की उम्मीद है और इसके दो-तीन सप्ताह के बाद प्रणोदन मॉड्यूल और लैंडर मॉड्यूल अलग होगा जो 17 अगस्त को होगा। सोमनाथ ने कहा कि अगर सभी चीजें निर्धारित कार्यक्रम के अनुरूप रहती हैं तो इसका अंतिम चरण 23 अगस्त को शाम पांच बजकर 47 मिनट पर किये जाने की योजना है। वर्ष 2019 में चंद्रयान-2 के बाद वर्तमान मिशन में हुई देरी के बारे में एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह अध्ययन करने में एक वर्ष लग गया कि पिछले मिशन में क्या गलती हुई। उन्होंने कहा कि दूसरा हमने विचार किया कि इसे बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाने की जरूरत है और क्या-क्या गलत हो सकता है। सोमनाथ ने कहा कि इस बात पर भी विचार किया गया कि क्या कोई छिपी समस्या है और हमने इस आधार पर समीक्षा की और तीसरे वर्ष परीक्षण किया तथा अंतिम वर्ष एलवीएम3-एम4 रॉकेट को जोड़ने का रहा। उन्होंने कहा कि आज जो हुआ है, उसके लिए हजारों लोगों की बड़ी टीम थी।यह पूछे जाने पर कि वर्तमान मिशन के वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिए दक्षिण ध्रुव को क्यों चुना गया। उन्होंने कहा- हमारा लक्ष्य चंद्रमा के सतह पर सभी भू भौतिकी एव रासायनिक विशेषताओं का पता लगाना है। दूसरा यह कि दक्षिण ध्रुव का अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों ने एलवीएम3-एम4 रॉकेट में कई बदलाव किये जिसमें इंजन की संख्या को पूर्ववर्ती पांच से घटाकर चार करना शामिल है। उन्होंने कहा- यह वाहन के वजन को कम करने के लिए किया गया। वहीं, चंद्रयान मिशन की लागत के बारे में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेन्द्र सिंह ने कहा- यह करीब 600 करोड़ रूपये है। केंद्र सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान का उल्लेख करते हुए सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले चार-पांच वर्षों में अंतरिक्ष से जुड़ी व्यवस्था तैयार करने में व्यक्तिगत तौर पर रूचि दिखायी है। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से जुड़ी व्यवस्था को तैयार करने में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के साथ बड़ी संख्या में स्टार्टअप सहयोग कर रहे हैं। भारत को गौरवान्वित करने के लिए इसरो टीम की सराहना करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का धन्यवाद व्यक्त किया और कहा कि उन्होंने श्रीहरिकोटा के द्वार खोलकर तथा भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को सक्षम करके इसे संभव बनाया है।
लैंडर, रोवर और प्रोपल्शन मॉड्यूल से लैसएबीएन नॉलेज डेस्क। भारत के तीसरे चंद्र मिशन चंद्रयान-3 को लॉन्च कर दिया गया है। चंद्रयान-3 ने दोपहर 2:35 बजे चंद्रमा की ओर उड़ान भरा। इसे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से छोड़ा गया है। 615 करोड़ की लागत से तैयार हुआ यह मिशन करीब 50 दिन की यात्रा के बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड करेगा। चंद्रयान-3 को भेजने के लिए एलवीएम-3 लॉन्चर का इस्तेमाल किया गया है। अगर दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर की सॉफ्ट लैंडिग होती है, तो भारत दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला विश्व का पहला देश बन जायेगा। वहीं, पीएम मोदी ने ट्वीट कर शुभकामनाएं दीं और कहा कि आज का दिन सुनहरे अक्षरों में अंकित रहेगा।
एचइसी में बने लांच पैड और क्रेन की मदद से होगी चंद्रयान-3 की लांचिंगएबीएन नॉलेज डेस्क। चंद्रयान-3 के प्रक्षेपण और उसकी सफलता का सभी को इंतजार है। चंद्रयान-3 के प्रक्षेपण की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। शुक्रवार (14 जुलाई 2023) को 14 जुलाई को दोपहर 2:35 बजे इसका प्रक्षेपण होगा। इसके लिए कई कंपनियों ने विभिन्न कल-पुर्जों और उपकरणों की आपूर्ति की है। किसी भी सैटेलाइट की लांचिंग के लिए जरूरी लांच पैड और सैटेलाइट को संभालने वाले क्रेन का निर्माण झारखंड की राजधानी रांची स्थित हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (एचइसी) में हुआ है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए एचइसी ने इसे बनाया था सैटेलाइट को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में भी इसका इस्तेमाल होता है। इसे मोबाइल लांचिंग पैड कहते हैं। मदर ऑफ ऑल इंडस्ट्रीज एचइसी में दूसरा मोबाइल लांचिंग पैड भी तैयार हो रहा है। एचइसी के अलावा लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) ने भी कई पुर्जों की आपूर्ति की है।
वैज्ञानिकों ने खोजा सूर्य से 90 लाख गुना बड़ा ब्लैक होल, जानें क्या है इसका नामएबीएन नॉलेज डेस्क। वैज्ञानिकों को हमारे सूर्य से 90 लाख गुना बड़ा ब्लैक होल मिला है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह अब तक का सबसे पुराना और विशालकाय ब्लैक होल है। उनका मानना है कि इसके अलावा और भी कई विशालकाय ब्लैक होल ऐसे हैं, जिन्हें जेम्स वेब टेलीस्कोप की नजरें अभी तक ढूंढ नहीं पायी हैं।यह ब्लैक होल अब तक की खोजी गयी सबसे शुरुआती आकाशगंगा में से एक के अंदर मिला है, जो मध्यम अवस्था में है। इसमें केंद्रक के उत्सर्जन हावी नहीं होते। पहले इसका नाम इजीएसवाई8पी7 था, अब इसे सीईईआरएस1019 नाम दिया गया है। यह खोज शुरुआती ब्रह्माण्ड की सबसे उलझी पहेली को सुलझाने में मददगार हो सकता है।सबसे पुराना ब्लैक होलबिग बैंग की घटना के केवल 57 करोड़ साल के बाद के समय में देखा गया यह विशालकाय ब्लैक होल अब तक का खोजा गया सबसे पुराना ब्लैक होल है। ऑस्टिन की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास की खगोलभौतिविद रेबैका लार्सन की अगुआई में किये गये शोध के मुताबिक, सीईईआरएस1019 का अध्ययन शुरुआती ब्रह्माण्ड में तारों के निर्माण से बने प्रकाश की जांच के हिस्से के रूप में किया जा रहा है।
निवेशक आयें और हमारे साथ भागीदारी करें : आर के सिंह एबीएन सेंट्रल डेस्क। हरित हाइड्रोजन भविष्य का ईंधन हैं। केंद्रीय बिजली, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री आर के सिंह ने निवेशकों को देश में स्वच्छ ऊर्जा स्रोत में निवेश का आग्रह करते हुए यह बात कही है। सिंह ने हरित हाइड्रोजन पर पहले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन-2023 को संबोधित करते हुए बुधवार को यहां निवेशकों से कहा कि हम आपको हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं के विकास में मदद करेंगे। आप आयें और हमारे साथ भागीदारी करें। सम्मेलन में 2,500 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। सिंह ने कहा कि निवेशक इलेक्ट्रोलाइजर के विकास, हरित हाइड्रोजन के परिवहन तंत्र, हरित इस्पात और सीमेंट के विनिर्माण में हरित हाइड्रोजन के इस्तेमाल जैसे क्षेत्रों में भागीदारी कर सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। केंद्रीय बिजली मंत्री ने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा की तरह भारत हरित हाइड्रोजन क्षेत्र में भी अगुवा बन सकता है। उन्होंने बताया कि ऐसे उद्योग हैं जिन्होंने हरित हाइड्रोजन की बड़ी क्षमता स्थापित करने के लिए काम करना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि ये लोग भूमि अधिग्रहण के लिए विभिन्न राज्यों के साथ काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने जनवरी, 2023 में 19,744 करोड़ रुपए के खर्च के साथ राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी दी थी। इसका लक्ष्य भारत को हरित हाइड्रोजन के विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाना है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी करफड की ओर से चंद्रयान-3 की लॉन्चिंग को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। दरअसल, इसरो चीफ ने ये साफ कर दिया गया है कि चंद्रयान-3 अपनी उड़ान के लिए पूरी तरह तैयार है। यही नहीं इसके साथ ही उन्होंने ये भी साफ कर दिया है कि किस दिन अंतरिक्ष में चंद्रयान-3 उड़ान भरने जा रहा है। दरअसल, बीते लंबे वक्त से इसरो के इस बहुप्रतिक्षित अभियान को लेकर हर किसी की नजरें टिकी हुई हैं। मिशन चंद्रयान-2 की सफलता में जरा सी कमी के बाद से ही इसके अलग कदम को लेकर कई उम्मीदें लगायी जा चुकी हैं। इस दिन लॉन्च होगा मिशन चंद्रायन-3 मिशन चंद्रयान-3 की लॉन्चिंग डेट को लेकर इसरो के प्रमुख ने खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि अगले महीने यानी जुलाई की 13 तारीख को मिशन लॉन्च किया जा रहा है। करफड ने ये भी बताया कि चंद्रयान-3 की लॉन्चिंग कहां से की जायेगी। इसरो के मुताबिक चंद्रयान-3 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा केंद्र से दोपहर 2.30 बजे लॉन्च किया जायेगा। कब लॉन्च हुआ था चंद्रयान-2 इससे पहले इसरो के मिशन चंद्रयान-2 को लेकर भी देश और दुनिया में खासा उत्साह देखने को मिला था। हालांकि जरा चूक के चलते ये मिशन कामयाब नहीं हो पाया था। चंद्रयान-2 को 22 जुलाई 2019 को लॉन्च किया गया था। इसके बाद भी वो 2 महीने तक अपने मिशन पर ठीक से काम कर रहा था। 7 सितंबर को इसे चंद्रमा के दक्षिण पोल पर भी उतारने में काफी हद तक सफलता मिल गई थी। हालांकि लैंडिंग के दौरान विक्रम लैंडर दुर्घटना का शिकार हो गया और मिशन को बड़ा नुकसान हुआ। इन बातों का रखना होगा ध्यान इसरो के प्रमुख सोमनाथ की मानें तो इस बार चंद्रयान-3 में कोई दिक्कत न आये इस बात का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। खास तौर पर इसकी लॉन्चिंग तभी की जायेगी, जब ये सभी टेस्टों में पूरी तरह सफल होगा। इसके लिए चंद्रयान के हार्डवेयर से लेकर सॉफ्टवेयर और सेंटर सभी स्तर पर पूरी तरह ध्यान रखा जायेगा।
वैज्ञानिकों ने खतरे को लेकर किया आगाहएबीएन नॉलेज डेस्क। सूर्य की किरणें धीरे-धीरे मारक होती जा रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है धरती पर सूर्य की किरणों का हमला उसके आकलन से कहीं ज्यादा होने वाला है। हालात बता रहे हैं कि इस बार का सौर तूफान धरती के जीव-जंतु के लिए भी काफी खतरनाक हो सकता है। वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है सूर्य का तापमान अपने शिखर पर पहुंच गया है।विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ये साल सूर्य अपना सबसे खतरनाक असर दिखा सकता है। साल 2023 के अंत तक सूर्य का प्रकोप बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस खतरे का आकलन कुछ समय के बाद लगाया गया था, लेकिन यह समय से पहले ही दिख रहा है।क्यों बदले हालातजानकारी के मुताबिक सौरमंडल में हर 11 साल के बाद ऐसी स्थिति आती है। सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन आता है। उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव में बदल देता है। इस उलटफेर के चलते सूर्य की रोशनी तीक्ष्ण हो जाती है। रोशनी से अग्नि जैसी गर्मी निकलती है।क्या होता है नुकसानसौरमंडल के ये हालात पृथ्वी के लिए खतरनाक माने जाते हैं। सौर तूफानों से संचार माध्यम प्रभावित होने का खतरा रहता है। बिजली के बुनियादी ढांचे को भी नुकसान हो सकता है। इससे अंतरिक्ष यात्रियों पर बुरा प्रभाव होता है।कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि अगला सौर तूफान जल्द आ सकता है। संभव है इसके बारे में जैसा अनुमान लगाया गया है, उससे अधिक शक्तिशाली हो सकता है।समय से पहले खतरा क्योंवैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की थी कि वर्तमान सौर चक्र 2025 में चरम पर होने वाला था लेकिन सनस्पॉट, सौर तूफान और दुर्लभ सौर घटनाओं को देखते हुए अनुमान को बदलना पड़ा है। ये खतरा इसी साल के अंत तक देखने को मिल सकता है।वैसे वैज्ञानिकों के मुताबिक यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि सूर्य का चक्र इतने लंबे समय तक क्यों चलता है। यूके में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के सौर भौतिक विज्ञानी एलेक्स जेम्स का कहना है कि यह सब सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र पर निर्भर करता है। जैसे ही सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र सक्रिय होता है उसके सुरक्षा घेरे पर असर होता है, जिससे प्रचंड रोशनी निकलती है। इसे सौर ज्वाला कहा जाता है।कितना अलग है सौर 2025अप्रैल 2019 में नासा ने सौर चक्र 25 के लिए अपना पूर्वानुमान जारी किया था और चेतावनी भी जारी की थी। इससे पहले 2014 के मध्य और 2016 की शुरुआत के बीच सौर चक्र चरम पर था, लेकिन आने वाले सौर चक्र के मुकाबले वह कमजोर था।वैज्ञानिकों के मुताबिक दिसंबर 2022 में सूर्य 8 साल के सनस्पॉट शिखर पर पहुंच गया था और जनवरी 2023 में ही वैज्ञानिकों ने नासा की भविष्यवाणी के मुकाबले दोगुने से भी अधिक सनस्पॉट देखे। जिसके अगले महीनों में ही यह संख्या फिर बढ़ गयी। कुल मिलाकर लगातार 27 महीनों में देखे गये सौर धब्बों की संख्या अनुमानित संख्या से अधिक हो गयी।
21 जून साल का सबसे लंबा दिन, 12 की बजाए होंगे 14 घंटे...खुद की परछाई भी नहीं आती नजरएबीएन नॉलेज डेस्क। भारत सहित दुनिया भर में 21 जून को योग दिवस का त्यौहार मनाया जाता है और सभी इसमें बढ़ चढ़कर शिरकत करते हैं। 21 जून के दिन की एक खासियत है कि यह वर्ष के 365 दिन में सबसे लंबा दिन होता है और योग के निरंतर अभ्यास से व्यक्ति को लंबा जीवन मिलता है इसलिए इस दिन को योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया गया। 21 जून साल का सबसे बड़ा दिन होता है और इस दिन एक पल ऐसा भी आता है जब परछाई तक साथ छोड़ जाती है। जी हां साल के 365 दिनों में 21 जून इतना लंबा और बड़ा होता है कि समय जल्दी नहीं कटता और रात छोटी होती है। इस दिन को ग्रीष्म अयनांत भी कहते हैं।बाकी दिनों में पृथ्वी की प्रक्रिया सामान्य होती है। पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने के साथ अपने अक्ष पर भी घूमती है। वह अपने अक्ष में 23.5 डिग्री झुकी हुई है। इसकी वजह से सूरज की रोशनी धरती पर हमेशा एक जैसी नहीं पड़ती और दिन रात की अवधि में अंतर आता है।21 जून को सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से चलकर भारत के मध्य से गुजरी कर्क रेखा में आ जाता है। इसलिए सूर्य की किरणें ज्यादा समय तक धरती पर पड़ती हैं। दोपहर के समय सूरज काफी ऊंचाई पर आ जाता है इसलिए आज का दिन लंबा होता है। 21 सितंबर के आसपास दिन व रात की अवधि बराबर हो जाती है जिसके बाद रातें बड़ी होने लगती हैं और दिन छोटे। दिन-रात की अवधि का यह चक्र 23 दिसंबर तक जारी रहता है। जिस वजह से 23 दिसंबर की रात सबसे लंबी और दिन छोटा होता है।सूर्य जब कर्क रेखा के ऊपर होता है तो एक पल ऐसा भी आता है जब परछाई भी साथ छोड़ जाती है। इस दिन सूर्य की किरणें करीब 15 से 16 घंटे तक पृथ्वी पर पड़ती हैं। इस दिन दक्षिणी गोलार्द्ध में ठीक इसका उलटा होता है। जहां उत्तरी गोलार्द्ध में रह रहे लोगों के लिए 21 जून को गर्मी की शुरुआत कहा जाता है, वहीं दक्षिणी गोलार्द्ध में रह रहे लोगो के लिए ये सर्दी की शुरुआत मानी जाती है।हालांकि ऐसा नहीं है कि 21 जून को ही सबसे बड़ा दिन हो। यह 20 या 22 जून को भी हो सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक साल 1975 में 22 जून को साल का सबसे बड़ा दिन आया था और अब 2203 में ऐसा होगा जब 21 को नहीं 22 जून को सबसे लंबा दिन होगा।
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