एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया में विश्व मितव्ययिता दिवस केवल बचत का ही दृष्टिकोण नहीं देता है बल्कि यह नियंत्रित इच्छा, आवश्यकता एवं उपभोग की आवश्यकता व्यक्त करता है। जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण, त्याग एवं आडम्बर-दिखावामुक्त जीवन को प्राथमिकता देता है। इसी में विश्व की अनेक समस्याओं को समाधान निहित है और इसी में हमने कोरोना महाव्याधि से मुक्ति का मार्ग पाया है। असल में कोरोना महामारी ने जीवन को नये रूप में निर्मित करने की स्थितियां खड़ी की है, जिसका आधार मितव्ययिता एवं संयम ही है। जिसने इच्छाएं सीमित रखी, वह कभी दु:खी नहीं होगा। क्योंकि वह इस सचाई को जानता है कि इच्छा को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। तभी तो महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वह है जो आदमी को कम-से-कम वस्तुओं पर जीना सीखाए। मितव्ययिता भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श रहा है। सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए उसका बहुत बड़ा महत्व है। आज की उपभोक्तावादी एवं सुविधावादी जीवन-धारा में जैसे-जैसे मितव्ययिता का दृष्टिकोण धुंधला होता जारहा है, कोरोना महामारी, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्रकृति दोहन, आतंकवाद, युद्ध, संघर्ष की स्थितियों बढ़ती जा रही है। यदि मितव्ययिता का संस्कार लोकजीवन में आत्मसात हो जाये तो समाज, राष्ट्र एवं विश्व में व्याप्त प्रदर्शन, दिखावा एवं फिजुलखर्ची पर नियंत्रण हो सकता है। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा भी है कि अगर तुम जितना कमाते हो और उससे कम खर्च करते हो तो तुम्हारे पास पारस पत्थर है। वर्ष 1924 में इटली के मिलान में पहला अंतर्राष्ट्रीय मितव्ययिता सम्मेलन आयोजित किया गया था और उसी में एकमत से एक प्रस्ताव पारित कर विश्व मितव्ययिता दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया। तभी से यह दिन दुनिया भर में बचत करने को प्रोत्साहन देने के लिए मनाया जाता है। मेरी दृष्टि में यह दिवस कोरा बचत का दिवस नहीं है, बल्कि यह अर्थ के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एवं संयममय जीवनशैली को अपनाने का दिवस है। जबकि दुनिया में अनियंत्रित इच्छाओं को बल दिया जा रहा है, जिसका परिणाम क्या होगा? इच्छापूर्ति के लिये, आवश्यकता को बढ़ाने और उसे पूरा करने के लिये हिंसा अनिवार्य हो जाती है। नया उपभोक्तावाद एक प्रकार से नई हिंसा यानी कोरोना महामारियों का उपक्रम है। हिंसा, प्रतिस्पर्धा, सत्ता की दौड़ एवं आर्थिक साम्राज्य को इससे नया क्रूर आकार मिला है। क्योंकि अर्थ की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संग्रह, सुविधा, सुख, भोग-विलास एवं स्वार्थ से जोड़ दिया है। समस्या सामने आई- पदार्थ कम, उपभोक्ता ज्यादा। व्यक्तिवादी मनोवृत्ति जागी। स्वार्थों के संघर्ष में अन्याय, शोषण एवं अनैतिकता होने लगी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई तो दूसरी ओर गरीबी एवं अभाव की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में जलने लगा, तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गई। आदमी-आदमी से असुरक्षित हो गया। फ्रांसीसी विचारक विचारक ज्यां बोद्रियो ने आधुनिक उपभोक्तावाद की मीमांसा करते हुए कहा है कि पहले वस्तु आती है तो वह सुख देने वाली लगती है। अंत में वह दु:ख देकर चली जातीहै। पहले वह भली लगती है, किन्तु अंत में बुरी साबित होती है। आर्थिक विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये मितव्ययिता जरूरी है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने मितव्ययिता के लिये ही वीआईपी कल्चर पर नियंत्रण लगाया है। सामाजिक और राष्ट्रीय संपदा का अर्थहीन अतिरिक्त भोग और दूसरी तरफ अनेक-अनेक व्यक्ति जीवन की मौलिक और अनिवार्य अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए भी तरसते रहते हैं। एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं, दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। यह आर्थिक विषमता निश्चित ही सामाजिक विषमता को जन्म देती है। जहां विषमता है, वहां निश्चित हिंसा है। इस हिंसा का उद्गम है, पदार्थ का अतिरिक्त संग्रह, व्यक्तिगत असीम भोग, अनुचित वैभव प्रदर्शन, साधनों का दुरुपयोग। सत्ता का दुरुपयोग भी विलासितापूर्ण जीवन को जन्म देता है। जनता के कुछ प्रतिनिधि अपनी ही प्रजा के खून-पसीने की कमाई से किस कदर ऐशोआराम एवं भोग की जिन्दगी जीते हैं, यह भी सोचनीय है। किसके पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्व इस बात का है कि अर्थ के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है तथा उसका उपयोग किस दिशा में हो रहा है। प्रदर्शन एवं विलासिता में होने वाला अर्थ का अपव्यय समाज को गुमराह अंधेरों की ओर धकेलता है। विवाह शादियों में 35-40 करोड़ का खर्च, क्या अर्थ बर्बादी नहीं है। प्रश्न उठता है कि ये चकाचौंध पैदा करने वाली शादियां, राज्याभिषेक के आयोजन, राजनीतिक पार्टियां, जनसभाएं- मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विनाश के ही कारण हैं। इस तरह की आर्थिक सोच एवं संरचना से क्रूरता बढ़ती है, भ्रष्टाचार की समस्या खड़ी होती है, हिंसा को बल मिलता है और मानवीय संवेदनाएं सिकुड़ जाती है। अर्थ केन्द्रित विश्व-व्यवस्था समग्र मनुष्य-जाति के लिये भयावह बन रही है। इसलिये विश्व मितव्ययिता दिवस जैसे उपक्रमों की आज ज्यादा उपयोगिता प्रासंगिकता है। मितव्ययिता का महत्व शासन की दृष्टि से ही नहीं व्यक्ति एवं समाज की दृष्टि से भी है। हमारे यहां प्राचीन समाज में मितव्ययिता के महत्व को स्वीकार किया जाता था। किसी सामान की बबार्दी नहीं की जाती थी और उसे उपयुक्त जगह पहुंचा दिया जाता था। भोग विलास में पैसे नहीं खर्च किए जाते थे, पर दान, पुण्य किए जाने का प्रचलन था। पुण्य की लालच से ही सही, पर गरीबों को खाना खिला देना, अनाथों को रहने की जगह देना, जरूरतमंदों की सहायता करना जैसे काम लोग किया करते थे। पर आज का युग स्वार्थ से भरा है, अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर सुंदर महंगे कपडे़ पहनना, फ्लाइट में घूमना, भोग विलास में आपना समय और पैसे जाया करना आज के नवयुवकों की कहानी बन गयी है। दूसरों की मदद के नाम से ही वे आफत में आ जाते हैं, अपने माता-पिता तक की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते, दाई-नौकरों और स्टाफ को पैसे देने में कतराते हैं, पर अपने शौक मौज के पीछे न जाने कितने पैसे बर्बाद कर देते हैं। अपने मामलों में उन्हें मितव्ययिता की कोई आवश्यकता नहीं होती, पर कंपनी का खर्च घटाने में और दूसरों के मामले में अवश्य की जाती है। क्या मितव्ययिता का सही अर्थ यही है ? जैन धर्म में आदर्श गृहस्थ की जिस जीवनशैली का प्रतिपादन हुआ है, उसमें मितव्ययिता पर बहुत बल दिया गया है पर आज उसका जागरूकता के साथ अनुसारण करने वाले बहुत थोड़े हैं। भगवान महावीर ने व्यक्तिगत स्वामित्व का सीमाकरण और उपभोग का सीमाकरण-ये दोनों दर्शन दिये। इसी से समाज सुखी, स्वस्थ और शांत जीवन जीता रहा है। महात्मा गांधी के विचारों पर भी महावीर एवं जैन धर्म का गहरा प्रभाव था। जैनत्व के संयम प्रधान आदर्शों का उन्होंने अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा से अनुसरण किया था। महामात्य चाणक्य एक प्रसिद्ध संत हुए हैं। वे अपने स्थान पर रात्रि में लिख रहे थे। उस समय उनके पास दो दिये जल रहे थे। कुछ जिज्ञासु व्यक्ति उनसे मिलने आये। उनके बैठते ही संत ने एक दिया बुझा दिया। उन्होंने संत से पूछा-आपने ऐसा क्यों किया? चाणक्य ने कहा-लिखने के लिए अधिक उजाले की आवश्यकता होती है। आप लोगों से ज्ञान-चर्चा तो थोड़ी रोशनी में भी हो जाएगी। संत के इस व्यवहार से उन्हें एक नई पे्ररणा प्राप्त हुई। आज पानी और बिजली के अ्रभाव की चर्चा सारे राष्ट्र में हो रही है, पर दूसरी ओर सड़कों पर जगह-जगह नल खुले रहते हैं। इस दिशा में सरकार और जनता दोनों में ही जागरूकता का अभाव है। इसी प्रकार बिजली का भी दुरुपयोग होता रहता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (प्रभात झा)। माओवादियों का अभी भी बस्तर के 37% इलाके पर कब्जा है (बस्तर आकार में केरल राज्य से बड़ा है)। लेकिन उनके आंदोलन का कोई भविष्य नहीं है क्योंकि मध्य भारत के वनवासी लोगों ने अपना विचार बदल दिया है और अब उन्होंने माओवादी आंदोलन से अपनी सहमति वापस ले ली है। भारत में माओवादी आंदोलन किसानों और भूमि अधिकारों के लिए एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। लेकिन 50 साल बाद यह केवल वन क्षेत्रों तक ही सीमित है और आज 99% लड़ाके आदिवासी हैं। यह सही समय है जब माओवादी उन आदिवासियों के लिए कुछ हासिल करने की कोशिश करें जिन्होंने पिछले 40 वर्षों में उनके आंदोलन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। माओवादियों के लिए आदिवासी का कर्ज चुकाने का समय अब आ गया है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में केंद्रित माओवादी संघर्ष को समाप्त करने के लिए यदि बातचीत से समाधान होना है, तो भारत के माओवादी, नेपाली माओवादियों से कुछ सीख ले सकते हैं। मुझे करीब बीस साल पहले नेपाली माओवादी नेताओं से मिलना याद है जब मैं बीबीसी के साथ काम करता था। उनके नोएडा और बैंगलोर में गुप्त ठिकाने हुआ करते थे और बिना नंबर प्लेट के एंबेसडर कारों में वे हमसे मिलने आते थे। एक दिन मैंने उनमें से कुछ से पूछा, कृपया मुझे बताओ कि ये चल क्या रहा है? आप लोग नेपाल में क्रांति की बात करते हैं, वहां चल रहे युद्ध में सैकड़ों आम लोग मर रहे हैं, और यहां आप नेतागण भारतीय राजधानी में ब्यूरो के वाहनों में घूम रहे हैं! उन्होंने शांति से उत्तर दिया था, हम आज नेपाल के लगभग 80% हिस्से को नियंत्रित करते हैं। लेकिन हम यह भी समझ चुके हैं कि भारत हमें कभी भी काठमांडू पर कब्जा नहीं करने देगा। अमेरिका सुनिश्चित करेगा कि ऐसा न हो। इसलिए हम दूसरे सर्वश्रेष्ठ की तलाश कर रहे हैं जो हासिल किया जा सकता है। उन्होंने समझाया कि जनयुद्ध की रणनीति की तरह, संयुक्त मोर्चा भी माओ द्वारा दी गई एक रणनीति है। ठीक यही अगले कुछ वर्षों में काठमांडू की सड़कों पर तब तक नजर आया था जब तक शांति वार्ता के परिणामस्वरूप नेपाल के लिए एक धर्मनिरपेक्ष और परिपक्व लोकतंत्र नहीं बन गया, जिसमें माओवादियों की प्रमुख भूमिका थी। उसके बाद से नेपाल धरती पर स्वर्ग नहीं बन गया है लेकिन बेवजह हजारों लोगों की जान लेने वाली हिंसा का अंत हुआ है। भारत में अब भी कुछ कट्टर माओवादी नेता किसी भी कीमत पर बस्तर जैसे आधार इलाकों में क्रांति की लौ को तब तक जलाए रखना चाहते हैं, जब तक कि पूंजीवाद अपने ही वजन तले धराशायी नहीं हो जाता, पर अब यह भी लग रहा है उनके ही कुछ नेता संयुक्त मोर्चे की बदली हुई रणनीति के तहत गठबंधन बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। भारतीय राज्य सिलगेर (जहां उन्होंने एक पुलिस शिविर का विरोध कर रहे निहत्थे लोगों को मारा था) तथा उस जैसी अन्य जगहों पर भी अनुशासनहीन सैनिकों को दंडित न कर लोगों को जबरदस्ती माओवादियों की ओर और धकेल रहे हैं। पर उन्हीं जगहों पर नीति में बदलाव घोषित किए बिना ही माओवादी इन अवसरों का इस्तेमाल आदिवासियों के हितों के साथ खुद को जोड़कर एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए कर रहे हैं। सिलगेर जैसी जगहों पर ओवरग्राउंड संगठनों के प्रेस नोट अक्सर शुद्ध हिंदी में सैद्धांतिक विवरणों के साथ (स्वयं माओवादियों की शैली के समान) लिखे जाते हैं जो किसी ग्रामीण आदिवासी युवा के लिए लिखना साधारण रूप से मुश्किल है जो इन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे हैं। आंदोलन संवैधानिक अधिकारों के साथ सड़क और पुलिस शिविर का भी विरोध करते हैं। वे माओवादियों के लिए कठिन सवाल कभी नहीं उठाते जैसे मुखबिर होने के आरोप में आदिवासियों की हो रही नियमित हत्याओं का मामला। लेकिन फिर भी सिलगेर की तरह के ये आंदोलन बहुत ही स्वागत योग्य संकेत हैं जिनके साथ काम किया जाना चाहिए। माओवादियों का अभी भी बस्तर के 37% इलाके पर कब्जा है (बस्तर आकार में केरल राज्य से बड़ा है)। 5 लाख से अधिक लोग उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहते हैं। लेकिन उनके आंदोलन का कोई भविष्य नहीं है क्योंकि मध्य भारत के वनवासी लोगों ने अपना विचार बदल दिया है और अब उन्होंने माओवादी आंदोलन से अपनी सहमति वापस ले ली है। पिछले साल मार्च में दूसरी कोरोना लहर से पहले अबूझमाड़ से रायपुर शांति पदयात्रा के दौरान माओवादियों ने अपने प्रेस नोट में संकेत दिया था कि अगर उनके कुछ शीर्ष नेताओं को जेल से रिहा कर दिया जाता है, तो वे बातचीत में उनका नेतृत्व कर सकते हैं। इसे नंबर 2 माओवादी नेता प्रशांत बोस ने अपनी गिरफ्तारी से पहले एक साक्षात्कार में दोहराया था। बोस जैसे कट्टरवादी से इस तरह का वक्तव्य आना एक आश्चर्य की बात थी। सरकार को इन प्रस्तावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देनी चाहिए और अगर बातचीत होनी है, तो माओवादियों के पास भारतीय आदिवासियों के पास मौजूदा उपलब्ध संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करवाने के लिए बात करना एक आसान रास्ता होगा। भारतीय संविधान आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन के नारे में समाहित कुछ विशेष अधिकार देता है, लेकिन 75 वर्षों के बाद भी ये अधिकांश अधिकार केवल कागजों पर ही हैं। मध्य भारत में शांति के बोनस के साथ, माओवादियों के माध्यम से भारतीय आदिवासियों को भारतीय संविधान का हक दिलाने का राज्य के लिए भी यह एक अच्छा अवसर है। भारत में माओवादी आंदोलन किसानों और मुख्य रूप से भूमि अधिकारों के लिए एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। लेकिन 50 साल बाद यह केवल वन क्षेत्रों तक ही सीमित है और आज 99% लड़ाके आदिवासी हैं। यह सही समय है जब माओवादी उन आदिवासियों के लिए कुछ हासिल करने की कोशिश करें जिन्होंने पिछले 40 वर्षों में उनके आंदोलन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। माओवादियों के लिए आदिवासियों का कर्ज चुकाने का समय अब आ गया है। राज्य की एक अति हिंसक कार्रवाई, को सहन करना कठिन होगा। वे कुछ वैसा ही कर सकते हैं जैसा श्रीलंका ने लिट्टे को कुचलने के लिए किया था।
एबीएन डेस्क (टीएन नाइनन)। मिस्र का काहिरा विश्वविद्यालय जो धीरे-धीरे और अधिक इस्लामिक हो गया है, उसके बाहर एक युवा मुस्लिम महिला की एक सदी पुरानी प्रतिमा लगी है जिसमें वह महिला अपना नकाब उठा रही है। यह चित्र इस बात का प्रतीक है कि वह महिला पितृसत्तात्मक परंपरा द्वारा उस पर थोपे गए मानसिक तथा अन्य प्रकार के प्रतिबंधों से आजादी हासिल कर रही है। ऐसे में यह दलील देना मुश्किल है कि हिजाब पहनना इस्लाम की हिदायतों का पालन है। खेद की बात यह है कि भारत में रुझान काहिरा की उस मूर्ति के संदेश के उलट है जिसे मिस्र के जागरण के रूप में देखा जाता है। देश में बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाएं रूढि़वादी पहनावा अपना रही हैं। वे ऐसी जगहों पर भी ऐसा पहनावा पहनती हैं जहां पहले हिजाब या बुरका पहनने की परंपरा नहीं थी। उदारवादी यानी धर्मनिरपेक्ष मानसिकता के सामाजिक प्रगतिशील लोग जो बुनियादी तौर पर मानवतावादी हैं, वे इस रुझान से चिंतित होंगे क्योंकि वे धार्मिकता के सार्वजनिक प्रदर्शन में किसी भी इजाफे के खिलाफ हैं। यह ऐसा रुझान है जो किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। परंतु उनको यह स्वीकार करना होगा कि हिजाब वैसे ही पहचान का प्रतीक है जैसे कि सिख पुरुषों की पगड़ी। जब स्कूलों और कॉलेज परिसरों में पगड़ी पहनने या माथे पर तिलक लगाने की इजाजत है तो क्या हिजाब पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है? यदि नहीं तो क्या यही दलील बुरके पर भी लागू होती है? इस बहस का मैदान बहुत फिसलन भरा और ढलान वाला है। कुछ समाज दूसरों की तुलना में अधिक ईश्वर केंद्रित होते हैं। भारत भी इस दिशा में बढ़ रहा है। क्या यह एक विविधता वाले और विभिन्न धर्मानुयायियों वाले देश के लिए अच्छा है? शायद नहीं। क्या इसके हल के लिए कठोर धर्म निरपेक्षता की गुंजाइश है? एक बार फिर शायद नहीं। हालांकि हर प्रकार के गणवेश (स्कूलों अथवा सशस्त्र बलों में) इसीलिए होते हैं ताकि भेद को न्यूनतम किया जा सके लेकिन उनमें कुछ लचीलापन होता है- अलग-अलग तरह की दाढ़ियां भी एक मुद्दा है। ऐसा कोई जवाब नहीं है जो हर किसी के लिए सही हो। मेरा उद्देश्य ऐसे क्षेत्र में दखल देने का नहीं है जहां अधिक जानकार लोग मौजूद होंगे। इसके बजाय हमें इस बहस पर ध्यान देना होगा कि समाज की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। निश्चित तौर पर महिला शिक्षा और कार्यस्थल पर उनकी भागीदारी बढ़ाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता अन्य तमाम धर्मों की महिलाओं की तुलना में कम है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी यही स्थिति है-आबादी के अनुपात में मुस्लिमों की भागीदारी सबसे कम है। आंकड़ों में सुधार हो रहा है लेकिन अभी काफी प्रगति करनी है। ऐसे में यह बात स्वागत करने लायक है कि मुस्लिम बच्चियां और युवतियां स्कूल और कॉलेज जाने को लेकर उत्सुक हैं और खुद को बेहतर जीवन के लिए तैयार कर रही हैं। ऐसे में पहनावे के व्यक्तिगत चयन के कठिन विषय पर बहस सही नहीं लगती। कार्यस्थल पर महिलाओं की मौजूदगी भी इससे जुड़ा हुआ विषय है। काम कर रही या काम करने की इच्छुक महिलाओं में तमाम समुदायों की महिलाओं की तादाद 30 फीसदी से घटकर 20 फीसदी रह गई है। जबकि पुरुषों के मामले में यह 80 फीसदी से घटकर 75 फीसदी हुई है। यह महामारी के पहले का आंकड़ा है। बीते दो वर्षों में इन दोनों आंकड़ों में और अधिक गिरावट आई होगी। मुस्लिम महिलाओं की हिस्सेदारी सभी महिलाओं के 20 फीसदी के स्तर से भी कम होने की संभावना है। मामला चाहे शिक्षा हासिल करने का हो या आजीविका के लिए काम करने का, मुस्लिम महिलाओं को बाहर निकलने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है। इससे उन्हें तमाम व्यक्तिगत और सामाजिक लाभ हासिल होंगे। इससे अन्य बातों के अलावा वे कम बच्चों को जन्म दे सकती हैं। उन पर अक्सर ज्यादा बच्चे पैदा करने का इल्जाम थोपा जाता है। अंत में गरीबी। श्रमिकों की अधिकता वाले देश में एक व्यक्ति की आय परिवार को गरीबी रेखा के ऊपर रखने के लिहाज से बेहद कम है। रोजगार भी पहले से अधिक अनिश्चित हो गया है। महिलाओं का काम करना अतिरिक्त आय के अलावा परिवार को सुरक्षा प्रदान करता है। कई रोजगारपरक गतिविधियां तमाम समुदायों की महिलाओं को आकर्षित करती हैं- कपड़ा फैक्टरियां और इलेक्ट्रॉनिक असेंबली इकाइयां इसके दो उदाहरण हैं। यह पारंपरिक महिला केंद्रित पेशों मसलन शिक्षण और नर्सिंग से अलग है। केरल ने दिखाया है कि कैसे ये क्षेत्र महिलाओं की आजादी का उदाहरण बन सकते हैं। इस बीच अध्ययन दर्शाते हैं कि आदिवासी, मुस्लिम और दलितों में गरीबी सबसे अधिक है। इन समुदायों की महिलाओं को शिक्षित बनाना और रोजगार प्रदान करना सामाजिक बेहतरी के लिए जरूरी है। यह आर्थिक दृष्टि से भी अनिवार्य कदम है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुधांशु कुमार)। किसानों के खून-पसीने से उगाये और करदाताओं की मेहनत की कमाई से खरीदे गए अनाज के बड़ी मात्रा में उचित भंडारण के अभाव में बर्बाद होने की खबरें हर साल आती हैं। इसके बावजूद बारिश में भीगने तथा पक्षियों व अन्य जीवों द्वारा अनाज के ढेरों की बबार्दी की खबरें हर साल अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। लेकिन प्रबंधन से जुड़ा तंत्र व निगरानी करने वाला प्रशासन इस मुद्दे पर संवेदनहीन बना रहता है। इसी तरह की आपराधिक लापरवाही की नवीनतम घटना करनाल में नजर आई जहां खुले में पड़े अनाज से भरी बोरियों के ढेर बारिश में खराब होते देखे गये। जाहिर है यह अनाज सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत वितरित होना होगा। बहुत संभव है कि अनाज की बबार्दी की जवाबदेही से बचने के लिये खराब अनाज भी गुपचुप तरीके से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिये भेजी जाने वाली अनाज की खेप में खपा दिया जाये। यह विडंबना ही है कि गुणवत्ता से भरपूर अनाज उत्पादन के लिये अग्रणी पंजाब और हरियाणा में ऐसे तमाम मामले प्रकाश में आ रहे हैं। जबकि जवाबदेही तय करके और रखरखाव की उचित व्यवस्था करके इस मौसमी परिवर्तन से होने वाले नुकसान को टाला भी जा सकता है। यह विडंबना ही है कि कई राज्य खाद्यान्न संकट से जूझ रहे हैं और वहीं दूसरी ओर हजारों टन अनाज बारिश व धूप में पड़ा हुआ सड़ता रहता है। इन राज्यों में गुणवत्ता निरीक्षण के दौरान कई ऐसे मामले प्रकाश में आते रहे हैं। निस्संदेह, यह आपराधिक लापरवाही से होने वाली राष्ट्रीय क्षति भी है। इस अनाज को उगाने में कृषक के श्रम के अलावा बिजली-पानी व भूमि की उर्वरता की लागत भी शामिल होती है। अनाज के बर्बाद होने ये घटक भी व्यर्थ चले जाते हैं जो सही मायनों में राष्ट्रीय संसाधनों की क्षति ही है, जिसे भंडारण की क्षमता के विस्तार और जवाबदेही तय करके टाला भी जा सकता है। जिस देश में कुपोषण व भुखमरी के आंकड़े पड़ोस के गरीब मुल्कों से अधिक हों, वहां लाखों टन अनाज यूं ही जाया चला जाये, इससे ज्यादा दुखद स्थिति कुछ और नहीं हो सकती। जटिल परिस्थितियों के बीच लाखों बोरी अनाज को बारिश में भीगने देना, चूहों, पक्षियों तथा कीड़ों द्वारा अखाद्य बनाना देश के नीति-नियंताओं पर सवालिया निशान लगाता है। यह विडंबना ही है कि जो देश आजादी से पहले सदियों तक अकाल व सूखे की वजह से खाद्यान्न संकट से जूझता रहा हो, वहां अन्न की शर्मनाक तरीके से बबार्दी जारी है। आजादी के बाद भी ऐसे संकट आये कि हमें आयातित गेहूं के लिये अमेरिका का मुंह ताकना पड़ा था। हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्रदान की। लेकिन हमें इस उपलब्धि को यूं ही नहीं गंवाना चाहिए। हमें इस अनाज को भुखमरी व कुपोषण के खिलाफ सशक्त हथियार बनाना चाहिए। गत वर्ष मई में जब गेहूं की खरीद एक सार्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई थी तो केंद्र सरकार ने जुलाई के अंत तक दो प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक राज्यों पंजाब व हरियाणा में सौ फीसदी वैज्ञानिक भंडारण का आश्वासन दिया था, लेकिन करनाल का मामला बताता है कि दावे हकीकत नहीं बने हैं। इस मामले में उच्चतम स्तर पर दोषियों की जवाबदेही तय करते हुए सख्त कार्रवाई की जाए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनायक चटर्जी)। देश के बुनियादी ढांचे की विकास यात्रा के पिछले तीन दशकों में परियोजना कार्यान्वयन के लिए धन जुटाने की खातिर गहन प्रयास हुए हैं। इस दिशा में न केवल बजट परिव्यय में वृद्धि की गई, बल्कि संस्थागत वित्त पोषण कार्यक्रमों की शृंखला भी शुरू की गई। सबसे पहली थी वर्ष 1987 में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज। इसके बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनैंस कंपनी (1997), इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी (2006), नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड इनवेस्टमेंट फंड (2015) और नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्क्चर ऐंड डेवलपमेंट (2021) आई। सार्वजनिक-निजी साझेदारी का ढांचा भी स्थापित किया गया। इससे पहले के समय में क्षेत्र-विशिष्ट वित्त पोषण कार्यक्रम चलाए गए थे। इनमें ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (1969), आवास एवं शहरी विकास निगम (1970), पावर फाइनैंस कॉरपोरेशन (1986) और भारतीय रेलवे वित्त निगम (1986) शामिल हैं। पिछले दो दशकों में कई निजी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और निजी इक्विटी फंड भी बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के वित्त पोषण में काफी सक्रिय हो गए हैं। कई वैश्विक दीर्घकालिक संस्थागत निवेशक भी आ गए हैं। पूंजी बाजार उपकरणों की एक नई पीढ़ी वजूद में आई-जैसे रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स। अब भारत लगभग 22 लाख करोड़ रुपये की वार्षिक बुनियादी ढांचागत वित्त पोषण क्षमता को साकार रूप देने के लिए भली-भांति तैयार है, जो राष्ट्र का घोषित लक्ष्य है। इस क्षमता को मोटे तौर पर केंद्रीय बजट परिव्यय (7 लाख करोड़ रुपये), राज्यों की ओर से संयुक्तनिवेश (6 लाख करोड़ रुपये), सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और अतिरिक्त बजट संसाधनों (2 लाख करोड़ रुपये), नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट (3 लाख करोड़ रुपये) तथा घरेलू और विदेशी निजी पूंजी (4 लाख करोड़ रुपये) से निर्मित माना जा सकता है। इसलिए अब जोर अनिवार्य रूप से जमीनी स्तर पर दक्ष कार्रवाई अर्थात समय पर परियोजना कार्यान्वयन पर होना चाहिए। हालांकि वित्त पोषण क्षमता के नितांत विपरीत परियोजना कार्यान्वयन के संबंध में जमीनी हकीकत काफी खराब है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की दिसंबर 2021 तक की नवीनतम सूचना में 1,679 परियोजनाएं शामिल हैं। ये केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाएं हैं, जिनमें से प्रत्येक की लागत 150 करोड़ रुपये या अधिक है। इनमें 10 क्षेत्र-सड़क, रेलवे, बिजली, पेट्रोलियम, शहरी विकास, कोयला, पानी, परमाणु ऊर्जा, इस्पात और दूरसंचार शामिल हैं। इनमें से 11 परियोजनाएं निर्धारित समय से आगे हैं, 292 निर्धारित समय पर हैं, 541 विलंबित हैं और फिर 835 ऐसी परियोजनाएं हैं, जहां न तो चालू होने का वर्ष और न ही पूरा होने की अपेक्षित तिथि उपलब्ध है। रिपोर्ट के अनुसार इन 1,679 परियोजनाओं के कार्यान्वयन की कुल मूल लागत 22.3 लाख करोड़ रुपये थी, लेकिन अब अनुमानित लागत करीब 26.68 लाख करोड़ रुपये है, जो 4.38 लाख करोड़ रुपये की अधिक लागत को दशार्ती है। यह मूल लागत का 20 प्रतिशत है। नवंबर तक इन सभी परियोजनाओं पर लागत का लगभग 48 प्रतिशत भाग व्यय किया जा चुका है। 4.38 लाख करोड़ रुपये की यह अधिक लागत वित्त वर्ष 22 के बजट में प्रस्तावित 5.54 लाख करोड़ रुपये के संपूर्ण बुनियादी ढांचागत परिव्यय की 79 प्रतिशत राशि है। राज्य सरकारों के नियंत्रण वाली विशाल परियोजनाओं की स्थिति उपलब्ध नहीं है और अधिक कड़े प्रशासनिक हस्तक्षेपों में से एक संभवत: वर्ष 2013 की गर्मियों में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा स्थापित परियोजना प्रबंधन समूह (पीएमजी) था। इसके लिए यह अनिवार्य था कि अवरुद्ध परियोजनाओं के लगभग 17 लाख करोड़ रुपये की राशि छुड़ाई जाए और यह कथित तौर पर करीब सात लाख करोड़ रुपये की औद्योगिक और बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को फिर से आगे बढ़वाने में सक्षम था। भले ही पीएमजी को मंत्रिमंडल सचिवालय में एक विशेष प्रकोष्ठ के रूप में स्थापित किया गया था, लेकिन बाद में इसे वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण में लाया गया था। वर्ष 2019 में पीएमजी को उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के साथ मिला दिया गया था। अब इसे प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग-इन्वेस्ट इंडिया सेल के रूप में जाना जाता है। इसके तहत ईसुविधा परियोजना प्रबंधन प्रणाली सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की विशाल परियोजनाओं के डेटाबेस की निगरानी करती है। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रगति (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस ऐंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन) भी है। वर्ष 2015 में शुरू किया गया यह मंच केंद्र सरकार के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों और परियोजनाओं के साथ-साथ राज्य सरकारों द्वारा चिह्नित परियोजनाओं की भी समीक्षा करता है। बढ़ती समस्या को स्वीकार हुए नीति आयोग और भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) ने अक्टूबर, 2020 में राष्ट्रीय कार्यक्रम एवं परियोजना प्रबंधन नीति ढांचे की शुरूआत की थी, जिसका लक्ष्य भारत में बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के कार्यान्वयन के तरीके में आमूलचूल सुधार लाना था। इसकी प्रमुख सिफारिशों में शामिल हैं- (1) क्यूसीआई के अंतर्गत नैशनल इन्स्टीट्यूट फॉर चार्टर्ड प्रोग्राम ऐंड प्रोजेक्ट प्रोफेशनल्स की स्थापना करना (2) कार्यान्वयन के सर्वोत्तम क्रियाकलापों का इंडियन इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉडी आॅफ नॉलेज नामक का एक तकनीकी भंडार विकसित करना (3) परियोजना कार्यान्वयन के पेशेवरों के लिए चार-स्तरीय प्रमाणन प्रणाली और (4) क्षमता निर्माण कार्यक्रम। आखिर में प्रौद्योगिकी-संचालित दो हालिया मंच-आॅनलाइन मंजूरी और अनुमति के लिए नैशनल सिंगल विंडो सिस्टम तथा गति शक्ति परियोजना कार्यान्वयन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए शक्तिशाली उपकरण हैं। इसलिए अब हमारे पास परियोजना कार्यान्वयन में चिरकालीन विलंब की समस्या को हल करने के लिए संस्थागत स्वरूपों का एक समूह है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय सानी)। वर्तमान में देश में लगभग 40 श्रम कानून लागू हैं। सरकार ने इन्हें समेट कर 4 लेबर कोड में संकलित कर दिया है। इन नये कानूनों को एक अप्रैल से लागू होना था, जिसे सरकार ने चुनाव के कारण कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया है। चुनाव के बाद इन्हें शीघ्र ही लागू किये जाने की पूरी संभावना है। इन लेबर कोड को बनाने के पीछे सरकार की मंशा श्रम कानूनों को सरल करने की थी, जिससे कि देश के उद्यमियों के लिए श्रमिकों को रोजगार देना आसान हो जाए और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अधिक संख्या में रोजगार उत्पन्न हो सकें। लेबर कोड के प्रावधानों में कुछ श्रमिकों के पक्ष में हैं तो कुछ उनके विपरीत हैं। जैसे यदि किसी श्रमिक को कोई आरोप लगाकर मुअत्तल किया जाता है तो अब व्यवस्था कर दी गयी है कि 90 दिन में उसकी जांच पूरी की जायेगी। पूर्व में ग्रेच्युटी कई वर्षों के बाद लागू होती थी, जिसे अब एक वर्ष के बाद लागू कर दिया गया है। अल्पकाल के लिए रखे गये श्रमिकों को अब वे सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी जो स्थाई श्रमिकों को उपलब्ध हैं। ये प्रावधान श्रमिकों के हित में हैं।इसके विपरीत उद्यमों को बंद करने अथवा श्रमिकों की छंटनी करने के लिए पूर्व में 100 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों के लिए सरकार से अनुमति लेनी जरूरी थी। अब इसे 300 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों पर लागू किया गया है। 100 से 300 श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों को सरकार से अनुमति लेने से मुक्त कर दिया गया है। यह श्रमिकों के विपरीत है। इस प्रकार नया लेबर कोड मिश्रित है। देखना यह है कि नये लेबर कोड से रोजगार उत्पन्न करने को कितना प्रोत्साहन दिया जाएगा? इसके लिए हमें समझना होगा कि उद्यमी द्वारा रोजगार किन परिस्थितियों में उत्पन्न किये जाते हैं। उद्यमी को सस्ता माल बनाना होता है, जिससे कि वह बाजार में अपना माल बेच सके। सस्ता माल बनाने के लिए जरूरी है कि वह उत्पादन में श्रम की लागत को कम करे। उसके लिए जरूरी है कि वह श्रम की उत्पादकता बढ़ाये, यानी एक श्रमिक से ही पूर्व की तुलना में अधिक उत्पादन कराए। जैसे एक श्रमिक पूर्व में 10 मीटर कपड़ा एक दिन में बुनाई करता था वही श्रमिक यदि अब 20 मीटर कपड़ा बुनाई करने लगे तो उद्यमी की उत्पादन लागत कम हो जाती है और वह बाजार में अपने सस्ते माल को बेच पाता है। लेकिन अधिक उत्पादन करने के कारण अब कम श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। मान लीजिये पूर्व में उद्यमी प्रतिदिन 100 मीटर कपड़ा एक दिन में बेच पाता था और वह 10 मीटर प्रति श्रमिक की दर से 10 श्रमिकों को रोजगार देता था। उत्पादकता बढ़ाने के बाद उसी 100 मीटर कपड़े का उत्पादन करने के लिए अब 20 मीटर प्रति श्रमिक की दर से उसे केवल पांच श्रमिकों की जरूरत होगी। इस प्रकार सस्ते माल और रोजगार के बीच सीधा अन्तर्विरोध है। यदि माल सस्ता बनाते हैं तो रोजगार कम होते है। चीन का माडल इससे भिन्न था जो विशेष परिस्थितियों में लागू हुआ था। चीन ने श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ अपने बाजार का भारी विस्तार किया। जैसे मान लीजिये पूर्व में चीन में एक श्रमिक 10 मीटर कपड़े की बुनाई करता था, उत्पादकता बढ़ाने के बाद वह 20 मीटर कपड़ा बुनने लगा। लेकिन इसी अवधि में चीन का बाजार 100 मीटर से बढ़कर 400 मीटर हो गया तो 400 मीटर कपड़े का उत्पादन करने के लिए बढ़ी हुई उत्पादकता के बावजूद 20 श्रमिकों की जरूरत पड़ेगी। 20 श्रमिक 20 मीटर कपड़ा प्रतिदिन बुनेंगे तब 400 मीटर कपड़े का उत्पादन होगा। इस प्रकार यदि बाजार का भारी विस्तार होता रहे तो श्रमिक की उत्पादकता के बढ़ने के साथ-साथ रोजगार भी बढ़ सकते हैं। लेकिन यह विशेष परिस्थिति थी जब चीन ने विश्व बाजार पर अपना प्रभुत्व बनाया था। यदि बाजार का तीव्र विस्तार न हो तो उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ रोजगार के बढ़ने की संख्या निश्चित रूप से घटेगी। कटु सत्य यह है कि यदि श्रम की उत्पादकता बढ़ाई जाती है तो सीमित बाजार होने के कारण रोजगार घटते हैं और यदि श्रम की उत्पादकता नहीं बढ़ाई जाती है तो उद्यमी के लिए श्रम के स्थान पर मशीन का उपयोग करना लाभप्रद हो जाता है और पुन: रोजगार में गिरावट आती है। इन दोनों कठिन विकल्पों के बीच हमें श्रम की उत्पादकता तो बढ़ानी ही पड़ेगी। यदि श्रम की उत्पादकता नहीं बढ़ाई जायेगी तो उद्यमी स्वचालित मशीनों का उपयोग करेगा और श्रमिक पूरी तरह बाजार से बाहर हो जाएगा। श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के दो प्रमुख उपाय हैं। एक यह कि उत्तम मशीनों का उपयोग किया जाये, जिससे कि उसी कुशलता के स्तर का श्रमिक अधिक उत्पादन कर सके। दूसरा यह है कि श्रमिक की कुशलता में विस्तार किया जाए। अक्सर उद्योगों में देखा जाता है कि श्रमिक पूरी तत्परता और मनोयोग से काम नहीं करते। वर्तमान श्रम कानून में व्यवस्था है कि यदि कोई उद्यमी श्रमिक को बर्खास्त करना चाहे तो उसे प्राकृतिक न्याय के अनुरूप उसकी सुनवाई करनी होती है और उसके बाद श्रम न्यायालय में उसका विवाद चलता है, जिस भय के कारण उद्यमी अक्सर श्रमिक को रखना ही नहीं चाहते। लेबर कोड ने श्रम कानून की इस बाधा को दूर नहीं किया है। पश्चिमी देशों में उद्यमी को छूट है कि वह अपनी मर्जी से श्रमिकों को रख सकता है अथवा बर्खास्त कर सकता है। इसलिए पश्चिमी देशों में उद्यमी के लिए कुशल श्रमिक को रखना और अकुशल श्रमिक को बर्खास्त करना, दोनों ही आसान हैं। श्रम कानून में इस दिशा में कोई सुधार नहीं किया गया है। इसलिए यह लेबर कोड नये रोजगार उत्पन्न करने में सहायक नहीं होगा। अपने देश के श्रमिक चीन आदि देशों के श्रमिकों की तुलना में अकुशल हैं और उनकी कुशलता में सुधार करने के लिए लेबर कोड असफल है। ऐसे में अपने देश में श्रम की उत्पादकता न्यून स्तर पर बनी रहेगी, उद्यमी अधिकाधिक मशीनों का उपयोग करते रहेंगे और हमारे श्रमिकों के रोजगार के अवसर घटते ही जायेंगे। इस दिशा में लेबर कोड में मूल चिन्तन बदलने की जरूरत है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (गुरबचन सिंह)। भारत सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में अपनी पांच फीसदी हिस्सेदारी का विनिवेश कर रही है। कंपनी का नियंत्रण भारत सरकार के पास रहेगा। यह संभव है कि भारत सरकार समय के साथ इसमें कुछ और हिस्सेदारी बेचे। ऐसा प्रतीत होता है कि बिक्री की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजमार्ग जैसी परियोजनाओं के लिए भी किया जाएगा। यदि ऐसा होता भी है तो क्या यह सब आर्थिक दृष्टि से उचित प्रतीत होता है? एलआईसी जैसे संस्थान संभवत: कई लोगों के दिल के करीब होते हैं। बहरहाल, आर्थिक दृष्टि से इस पर नजर डालने पर कमजोरी नजर आएगी। अक्सर कहा जाता है कि कारोबार करना सरकार का काम नहींं है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत सरकार को प्रासंगिक कानूनों में संशोधन करने के बाद एलआईसी का निजीकरण कर देना चाहिए। उसे कंपनी पर से नियंत्रण भी त्याग देना चाहिए और नियंत्रण हिस्सेदारी को सही कीमत पर निजी क्षेत्र के किसी उचित खरीदार के हवाले कर देना चाहिए। जबकि शेष हिस्सेदारी को चरणबद्ध तरीके से निवेशकों को बेच देना चाहिए। यह सच है कि एलआईसी ने समय के साथ काफी स्थायी ढंग से वृद्धि हासिल की है। यही कारण है कि अब यह इतनी बड़ी कंपनी बन चुकी है। हालांकि इसकी तथाकथित सफलता का ज्यादातर श्रेय बीमा कारोबार पर इसके आधी सदी के एकाधिकार को दिया जाता है। परंतु वह किस्सा तो कब का समाप्त हो चुका है। पहले धीरे-धीरे बदलाव नजर आना शुरू होगा और उसके बाद एक स्तर पर तेज परिवर्तन दिखाई देने लगेगा। इसलिए अब निजीकरण करने का वक्त आ गया है। अब इससे संबंधित पुराने अनुभवों पर एक नजर डालते हैं। सरकारी बैंकों में भी विनिवेश किया गया था लेकिन उनका निजीकरण नहीं किया गया। इसके नतीजे न तो करदाताओं के लिए अच्छे रहे और न ही अर्थव्यवस्था के लिए। दूसरी ओर जिन मामलों में हमने सही तरीके से निजीकरण किया वहां अनुभव काफी बेहतर रहा। अब एलआईसी के निजीकरण का समय आ गया है लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। सरकार ने एलआईसी को पूरे भारत में कारोबार का एकाधिकार दिया था। अब जरा इस बात पर इस पर विचार कीजिए कि इसकी जगह हर राज्य सरकार की अपनी अलग एलआईसी होती और उस राज्य में उसका एकाधिकार होता। ऐसी स्थिति में उस कंपनी को होने वाला मुनाफा और बाजार पूंजीकरण राज्यों के बीच साझा होता। अब समय आ गया है कि इसमें सुधार किया जाए तथा प्रस्तावित निजीकरण से होने वाली प्राप्तियों को राज्यों के साथ साझा किया जाए। परंतु इसकी एक और वजह भी है। यह सही है कि कारोबार करना सरकार का काम नहीं है लेकिन कुछ ऐसी सार्वजनिक वस्तुएं तथा सेवाएं प्रदान करना निश्चित रूप से सरकार का ही काम है जिन्हें मुहैया कराने में निजी क्षेत्र विफल हो जाता है- यानी जहां सही मायनों में बाजार विफलता का परिदृश्य बनता है। अब कई ऐसी सार्वजनिक वस्तुएं एवं सेवाएं हैं जिनमें सुधार और विस्तार की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि केवल भारत सरकार इसमें शामिल है बल्कि इसमें राज्यों की सरकारें भी शामिल हैं। दोनों को पैसे की आवश्यकता भी रहती है। यहां मैं तीन बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करूंगा- पुलिस, न्यायपालिका और कर प्रशासन। देश की आबादी के साथ तुलना करें तो हमारी पुलिस व्यवस्था का आकार कम है। इसमें सुधार करने तथा इसका विस्तार करने की जरूरत एकदम स्पष्ट है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि न्यायपालिका के बुनियादी ढांचे तथा मानव संसाधन में बहुत अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। हम सभी इस बात से परिचित हैं कि कैसे मानव संसाधन में कमी के चलते अदालतों में मामले लंबे चलते हैं। अब कर प्रशासन की बात करते हैं। हमारे देश में कर-जीडीपी अनुपात कम है। इसकी एक अहम वजह यह है कि सार्वजनिक प्रशासन ने ज्यादा से ज्यादा कर जुटाने के उद्देश्य से शोध, नियोजन तथा प्रशासनिक मशीनरी में पर्याप्त निवेश नहीं किया है। बिना उच्च कर दरों तथा प्रताड?ा के कर बढ़ाना संभव ही नहीं रह गया है। उच्च कर-जीडीपी अनुपात बड़े सार्वजनिक व्यय का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह व्यय शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर किया जा सकता है। ये वस्तुएं उत्कृष्ट होती हैं और इन पर व्यय भेदभाव से रहित और उत्पादक हो सकता है। ज्यादा और बेहतर सार्वजनिक सेवाएं अधिक से अधिक लोगों को आर्थिक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए प्रेरित करती हैं और यह काम सुरक्षित तथा सहज तरीके से किया जाता है। इससे सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी में भी इजाफा होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि उक्त व्यय पर हमें सामाजिक प्रतिफल प्राप्त होता है। एक अन्य उपमा पर विचार करते हैं, भले ही वह आंशिक रूप से लागू होती है। निजी क्षेत्र में लंबे समय के दौरान, कई निवेशकों ने टाटा स्टील में पैसा लगाया और उन निवेशकों से कम प्रतिफल हासिल किया जिन्होंने टीसीएस में निवेश किया था। हालांकि टाटा स्टील की तथाकथित भौतिक परिसंपत्तियां टीसीएस की तुलना में कहीं अधिक थीं। इसी प्रकार भारत सरकार और एक हद तक जनता भी, सार्वजनिक सेवाओं पर व्यय से अधिक लाभान्वित हो सकती है। यह लाभ राजमार्ग जैसी परियोजनाओं पर किए गए व्यय से होने वाले लाभ से अधिक हो सकता है। वास्तव में राजमार्ग आर्थिकी के संदर्भों के अनुसार हमेशा सार्वजनिक वस्तुओं की श्रेणी में नहीं गिने जाते। अत्यधिक सहजीकरण की लागत पर एक राजमार्ग पर निजी कारोबारी नियमों के तहत टोल की वसूली कर सकता है ताकि लागत निकालने के अलावा कुछ लाभ कमा सके। सैद्धांतिक तौर पर अक्सर यहां बाजार विफलता की स्थिति नहीं बनती है। जबकि सार्वजनिक सेवाओं के मामले में ऐसा नहीं होता। आखिर में, केवल विनिवेश करने के बजाय एलआईसी का निजीकरण करना अधिक महत्त्वपूर्ण है। बिक्री से हासिल होने वाली धनराशि का इस्तेमाल बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार और उनकी स्थिति में सुधार के काम में किया जाना चाहिए। यह काम उन सेवाओं के क्षेत्र में करना जरूरी है जो उत्पादक सेवाओं की श्रेणी में आती हैं, जिन्हें केवल सरकार ही मुहैया करा सकती है तथा जो आम आदमी के लिए अधिक से अधिक उपयोगी होती हैं। (लेखक स्वतंत्र अर्थशास्त्री एवं भारतीय सांख्यिकीय संस्थान, दिल्ली केंद्र के अतिथि प्राध्यापक हैं)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (देबंजना चौधरी)। पावर फॉर आॅल 2022 एनर्जी एक्सेस ट्रेंड एक इंडिकेटर है जो आने वाली चीजों का संकेत दे रहा है, जब भारत ने 2022 का केंद्रीय बजट पेश किया। बजट का आवंटन कई ट्रेंड्स के साथ जुड़ता है और यह इक्विटी-आधारित अक्षय ऊर्जा रणनीति और वित्तपोषण पर आधारित होता है। भारत ने इस साल जब अपना केंद्रीय बजट पेश किया, तो इसने स्वच्छ ऊर्जा उपक्रमों और उनके दायरे के लिए आशा जगायी है। सीओपी 26 (कॉप 26) में भारत ने कोयले और अन्य जीवाश्म के संदर्भ में फेजिंग आउट के बजाय फेजिंग डाउन की घोषणा की। यानी कोयले या जीवाश्म का इस्तेमाल कम करने की तरफ इशारा किया। अक्षय ऊर्जा जैसे समाधान सरकार की योजनाओं, नीतियों और रणनीतियों में मुख्य रूप से होने की भी उम्मीद है। केंद्रीय वित्त मंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कम से कम अगले दो दशकों के लिए स्वच्छ ऊर्जा मुख्य एजेंडा होगा। इधर एनर्जी एक्सेस ट्रेंड्स 2022 की रिपोर्ट भी भारत के लिए उसी की ओर इशारा करती है। इलेक्ट्रिक वाहनों और सोलर सेल से लेकर हाइड्रोजन प्लांट में बड़े निवेश तक में राजनीतिक मंशा यह है कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता से स्थायी समाधान की ओर बढ़ा जाए। यह बहुत जरूरी है कि हरित ऊर्जा उत्पादन को तत्काल बढ़ावा दिया जाए, केवल स्थांतरण के लिए रणनीति बने और यह सुनिश्चत किया जाए कि हरित क्षेत्र में ऐसे समुदायों के लिए भी नौकरियां हो, जिनतक आम तौर पर सुविधाएं नहीं पहुंच पाती हैं और जो वंचित हैं। 2022 के एनर्जी एक्सेस ट्रेंड उसी इसी दिशा को दर्शा रहे हैं, जिस तरफ दुनिया जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दूर करने के लिए बढ़ रही है। महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की कमी की वजह से अक्षय क्षेत्र में महिलाओं के सामने आ रही सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां कैसे बढ़ जाती हैं, यह भी देखा जा रहा है। महिलाओं की इन चुनौतियों को ध्यान में रख कर सरकारी नीति और योजनाओं को बनाने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण महिलाएं और लड़कियां असमान रूप से प्रभावित हैं और उन्हें अभी भी समान अवसर नहीं मिल सका है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। ऐसा इसलिए है कि दुनिया के अधिकांश गरीबों में महिलाएं ज्यादा है और अपनी आजीविका के लिए उन प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा निर्भर हैं, जो जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे में हैं। विकासशील देशों में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं और पुरुष विशेष रूप से उस समय कमजोर होते हैं, जब वे अपनी आजीविका के लिए स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर होते हैं। उनके उपर चूल्हे पर खाना पकाने के लिए पानी, भोजन और संसाधनों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी होती है। इस दौरान ने सबसे अधिक चुनौतियों का सामना करते हैं। 2022 में डीआरई के क्षेत्र में लैंगिक समानता के मामले में कुछ बेहतर होने की उम्मीद है, लेकिन यह उतना नहीं है, जितना होना चाहिए। डीआरई के अनुकूल नीतियों ने ऐसे फंडिंग तक का रास्ता दिखा दिया है, जो महिलाओं की उद्यमशीलता कौशल को शामिल करता है। भले ही उडश्कऊ-19 का यह प्रकोप जारी रहे और 2022 में लॉकडाउन डीआरई क्षेत्र को धीमा कर दे, लेकिन डीआरई ने इतिहास में काफी लचीलापन दिखाया है। भारत के निर्माण में बेहतर सफर और आत्मानिर्भर भारत की राह में ऊर्जा उद्यमियों और एमएसएमई की प्रमुख भूमिका होगी। यह रिपोर्ट कई देशों के साथ अपने डीआरई रोडमैप को व्यवस्थित करने के एक सिल्वर लाइनिंग को भी प्रकाश में लाती है। एशिया-पेसिफिक देश विशेष रूप से डीआरई कथा को आगे बढ़ाते हैं और अब वे ऊर्जा स्थांतरण निवेश स्तर पर विश्व के शीर्ष 10 देशों में से चार चार स्थानों पर कायम हैं। इस सूची में भारत और दक्षिण कोरिया चीन और जापान के साथ शामिल हो गए हैं। ब्लूमबर्ग एनईएफ की एक रिपोर्ट से पता चला है कि 2021 में ऊर्जा स्थांतरण में वैश्विक निवेश 755 बिलियन डॉलर था। यह बढ़ते जलवायु लक्ष्यों और योजनाओं पर काम कर रहे देशों के लिए और खास कर एशिया-पेसिफिक देशों के लिए नया रिकॉर्ड था। रिपोर्ट के अनुसार विश्व स्तर पर पूर्वी अफ्रीका और एशिया बाहर हैं। यह दिलचस्प है कि ट्रेंड्स सर्वे के जवाब देने वालों का अनुमान है कि भारत की अगली क्रांति बाइक और ई-रिख्शा जैसे दो और तीन पहिया वाहनों के उपयोग के क्षेत्र में होगी। ई-मोबिलिटी ट्रेंड डीआरई क्षेत्र की क्षमता को प्रदर्शित करता है और बताता है कि यह कैसे कमजोर समुदायों को जोड़कर उनकी आजीविका और मुख्य धारा से उनके जुड़ाव को बेहतर कर रहा है। आज जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी संघर्ष कर रही है, भारत में स्वच्छ ऊर्जा मोड उद्यमियों और समुदायों दोनों के लिए समान रूप से जीवन का एक नया आयाम प्रदान कर रहा है। (अनुसंधान से पता चलता है कि अभी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है, लेकिन यह भी बताता है कि तेज गति से विकास निश्चित है)। सरकार समर्थित योजनाओं के कारण भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन बढ़ रहा है। इस वर्ष और भी अधिक राज्यों में सार्वजनिक परिवहन व्यव्सथाओं और असंगठित परिवहन क्षेत्रों में भी इलेक्ट्रिक वाहनों के होने की संभावना है। प्रोडक्टिव यूज आॅफ रेनेवेबल एनर्जी 2022 में भी चलन में होगा। यह खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण और स्वास्थ्य सेवाओं को सुगम बनाने में गेम-चेंजर साबित होगा। कृषि और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में कोल्ड चेन प्रभावी रहेगा। अभी भी जब महामारी लगातार तीसरे वर्ष फैल रही है, ऐसे में एसडीजी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के साथ समान रूप से टीकाकरण देश की प्राथमिकता होगी। जब देश के कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे डीआरई को घोषणापत्रों में शामिल किया जाता है और यह सुशासन के लिए एक बेंचमार्क बन जाता है। एसएमई गवाह बनेगी कि विकास और योजनाएं ही ग्रामीण के साथ शहरी आबादी को आॅफ-ग्रिड नवीकरणीय समाधान प्रदान कराने में सक्षम होगी। बेहतर राजकोषीय नीतियां, कम सीमा शुल्क, और वास्तविक विकास से जुड़ी हुई राजनीतिक मंशा से लाभ मिलेगा। इसके अतिरिक्त, अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को उम्मीद है कि न केवल बजट में बल्कि राज्य-विशिष्ट योजनाओं और नीतियों में भी टैक्स से राहत मिलेगा ताकी हरित प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहन मिल सके। ट्रेंड्स की रिपोर्ट बताती है कि वित्त मंत्री के बजट का बड़ा हिस्सा अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा क्षमता, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ग्रीन बॉन्ड के लिए आवंटित है। बजट में आवंटित किए गए ग्रीन बॉन्ड से मिलने वाली धनराशि का उपयोग उन परियोजनाओं पर किए जाने की उम्मीद है, जो अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को कम करने में मदद करेगी। ट्रेंड्स की रिपोर्ट कहता है कि घरेलू विनिर्माण करना भारत के लिए चर्चा का विषय होगा। हालांकि भारत देश के अंदर ह्यफेजिंग आउटह्ण के नैरेटिव को अच्छी तरह जोड़ सकता है, लेकिन इस साल डीआरई क्षेत्र के बढ़ने की उम्मीद है। रिन्युएबल क्षेत्र भारत के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए प्रमुख बिल्डिंग ब्लॉक्स में से एक है और इज आॅफ डुइंग बिजनेस प्रभावी होगा। जरूरी है कि भारत की ऊर्जा स्थांतरण की कहानी को चार्ट करने के लिए एक नई गति बनायी जाए। भारत में यह सब होते हुए पूरा विश्व करीब से देखेगा। (लेखिका इंडिया पावर फॉर आॅल की कंट्री डायरेक्टर हैं।)
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