एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ रमेश ठाकुर)। हनुमान जयंती के दिन निकाली जा रही शोभायात्रा के दौरान राजधानी दिल्ली में जो हिंसा हुई उसने कई सवालों को जन्म दिया है। इसकी नींव राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर राजनीतिक शास्त्र ने रखी। राजधानी की हिंसा सुनियोजित थी या नहीं? ये सवाल पुलिस पर छोड़ देते हैं, पर दूसरे सवाल हम खुद में खोजेंगे, आखिर ऐसा क्यों होता जा रहा है हमारे सौहार्दपूर्ण माहौल में, कौन है जो ये जहर घोल रहा है। घटना वाला इलाका ऐसा आवासीय क्षेत्र है जहां बेहद गरीब तबके के लोग रहते हैं, दिहाड़ी-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं, उन्हें राजनीति, दंगा-फसादों से कोई मतलब नहीं। राजनीतिक चश्मे के बिना कड़ाई से जांच होगी, तभी सच सामने आएगा। क्या दिल्ली हिंसा पहले से सुनियोजित थी? या फिर ये ट्रेलर मात्र है, पिक्चर अभी शेष है? या इसकी नींव राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर राजनीतिक शास्त्र ने रखी। ऐसे कुछ सवाल घटना थमने के बाद दिल्लीवासियों के जेहन में उठ रहे हैं। सवाल उठने भी चाहिए, आखिर ऐसा क्या है जो किस्तों में कुछ अंतराल के बाद राजधानी में ऐसे फसाद होते रहते हैं और तब तो और जब चुनावों की सुगबुहाट होने लगती है। कुछ समय बाद दिल्ली में एमसीडी चुनाव होने भी हैं, इसलिए कड़ियां आपसे में काफी हद तक मेल खाती भी हैं? खैर, ये तो आम इंसान के लिए सारे काल्पनिक अंदेशे मात्र हैं, जो होना होता है वो क्षण में हो ही जाता है। कमोबेश, वैसा हो भी रहा है, लेकिन हिंसा के राजनीतिक शास्त्र को अब आम आदमियों को बुनियादी रूप से समझने की जरूरत है। ये सवाल पुलिस पर छोड़ देते हैं, पर दूसरे सवाल हम खुद में खोजेंगे, आखिर ऐसा क्यों होता जा रहा है हमारे सौहार्दपूर्ण माहौल में, कौन है जो ये जहर घोल रहा है। 16 अप्रैल की शाम को जब दिल्ली में हिंसा हो रही थी, उसी वक्त सोशल मीडिया पर दो बेहद खूबसूरत तस्वीरें हम सबको दिख रही थी जिसमें हनुमान जन्मोत्सव के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग रैली में शामिल लोगों पर फूल बरसा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक और पानी की बोतलों का वितरण कर रहे थे। ये तस्वीरें उत्तर प्रदेश के शामली और नोएडा की हैं। शामली में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा कई समय बाद दिखा। दरअसल हमें ऐसा ही तो हिंदुस्तान चाहिए, जो आजादी से पहले था, जब एक ही थाली में सभी धर्म के लोग खाना खाते थे, पर अब न जाने अब ऐसा क्या हो गया है कि दोनों धर्म के लोग एकदूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं। घटना वाला इलाका जहांगीरपुरी दिल्ली का ऐसा आवासीय क्षेत्र है जहां बेहद गरीब तबके के लोग रहते हैं, दिहाड़ी-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं, उन्हें राजनीति, दंगा-फसादों से कोई मतलब नहीं, लेकिन हनुमान जन्मोत्सव के दिन लोगों ने उन्हें उकसाकर ये कारनामा कर दिया। जहां हिंसा हुई, वहां दोनों तरफ आमने-सामने मंदिर और मस्जिद हैं, हिंदु-मुस्लमान आपस में प्यार से रहते हैं। एक दूसरे के बनी-बिगड़ी और सुख-दुख में साथी होते हैं, आपस में हाथ बंटाते हैं। किसी तरह की कोई आज तक दिक्कतें नहीं हुई। घटना कैसे हुई, इस बात को वहां के लोग समझ नहीं पाए हैं, आखिर ये हुआ कैसे? हिंसक घटना के बाद से समूचा इलाका भयभीत है। हर तरह के काम धंधे बंद हैं, पुलिस ने सबको घरों में कैद किया हुआ है। सुरक्षा की दृष्टि से कोई कहीं आ-जा न सके इसके लिए केंद्र सरकार ने इलाके को छावनी में तब्दील कर धारा 144 लगा दी है। गलियों के गेट पर ताला जड़ दिया है। स्कूल, प्रतिष्ठान, दुकानें, बाजार सब बंद पड़े हैं। लोग घरों में सहमे हुए हैं। बहरहाल, घटना के पीछे किसका समाजशास्त्र था, उसकी तस्वीर अब दिखने लगी है। हिंसा को लेकर जमकर सियासत होनी शुरू गई है। पक्ष-विपक्ष की ओर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है, जबकि इस वक्त सिर्फ और सिर्फ समाधान की बात होनी चाहिए, पर नहीं, लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिराक में हैं। कोई एक दल नहीं, बल्कि सभी पार्टियां मौके का फायदा उठाना चाहती हैं। धरातल पर अंदरखाने राजधानी के हालात अच्छे नहीं हैं। इसके बाद भी कुछ अंदेशे ऐसे दिखते हैं जो सुखद नहीं? आगे भी हालात बिगड़ते नजर आते हैं। ये तय है कि जो हिंसा हुई, वह अचानक से घटने वाली घटना नहीं थी, बल्कि उसकी पटकथा पहले ही लिखी गई थी। इलाके के कई लोग तो खुलेआम बोल ही रहे हैं कि अगर पुलिस सतर्क होती तो घटना होती भी नहीं? प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं जब लोग हिंसक हो रहे थे, तब पुलिसकर्मी तमाशबीन बने हुए थे। लोगों के हाथों में धारदार हथियार थे, पत्थर थे। दोनों तरफ से जब पथराव शुरू हुआ तो सबसे पहले लोगों ने पुलिसकर्मियों को ही निशाना बनाया, जिसमें कई पुलिसकर्मी और स्थानीय लोग घायल हुए। घायलों का इलाज पास के बाबू जगजीवन राम अस्पताल में हो रहा है। फिलहाल पुलिस ने पूरे मामले पर एफआईआर दर्ज की हैं जिसमें मुस्लिम समुदाय के 14 लोगों को नामजद किया गया है जिसमें प्रमुख नाम मोहम्मद अंसार है जिसने सबसे पहले विरोध करना शुरू किया था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। ये बंदा इलाके का कुख्यात है, कई मुकदमे दर्ज हैं, गैंगस्टर के तरह चार बार जेल जा चुका है। समय का तकाजा यही है, घटना की निष्पक्ष जांच हो, दोषी पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो। फिलहाल हिंसा को लेकर केंद्र सरकार की नजर बनी हुई है, क्योंकि दिल्ली की सुरक्षा का जिम्मा उन्हीं के कंधों पर है। घटना की जानकारी के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने पुलिस कमिश्नर तलब कर जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी एलजी से बात करके दंगाइयों पर सख्त कार्रवाई की मांग की। गृह मंत्रालय में घटना को लेकर बड़ी बैठक भी हुई। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा हर घटना के बाद होता ही है, पर इस बार सिर्फ मामला शांत होने का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए। ड्रोन कैमरों भी लगे हैं जिन घरों से पथराव शुरू हुआ, उनकी जांच हो। हर एंगल से जांच की जाए। ईमानदारी से और राजनीतिक चश्मे के बिना कड़ाई से जांच होगी, तभी प्रत्येक वर्ष होने वाले दंगों से राजधानी मुक्त हो पायेगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अशोक कुमार)। गंगा नदी में प्रदूषण को कम करने के लिए 1985 में गंगा कार्य योजना (जीएपी) का शुभारंभ किया गया था। इसके जल के बिना सनातन धर्म के किसी अनुष्ठान की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। गंगा नदी अपनी सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से उर्वर यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। लगभग 3 किलोमीटर चौड़ी और 100 फीट यानी 31 मीटर की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में बेहद पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना मां और देवी के रूप में की जाती है। हिंदू धर्म में कहा जाता है कि यह नदी श्र्गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है, जो उत्तराखंड स्थित कुमायूं में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनदी से निकलती है। इस नदी की तुलना मिस्र की नील नदी के महत्व से की जाती है। इस पवित्र पावन नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियां पाई ही जाती हैं। मीठे पानी वाले दुर्लभ डॉल्फिन भी यहां पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, खेल तथा उद्योगों-कारोबारों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है। लेकिन इसकी पहचान दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक के रूप में की गई है। उदाहरणतया, हरिद्वार में गंगा जल में 55 सौ से अधिक कोलिफॉर्म है, जबकि कृषि के लिए माने डी श्रेणी के लिए मानक 5000 से कम कोलिफॉर्म हैं। भारत की सबसे पावन नगरी वाराणसी में कोलिफॉर्म जीवाणु गणना, संयुक्त राष्ट्र संघ नियंत्रित विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्थापित सुरक्षित मानक से, कम से कम 3000 गुना अधिक है। पर्यावरण जीव विज्ञान प्रयोगशाला, प्राणी विज्ञान विभाग, पटना विश्वविद्यालय द्वारा किये गए एक अध्ययन में वाराणसी शहर में गंगा नदी में पारे की उपस्थिति पाई गई है। यहां नदी के पानी में पारे की वार्षिक सघनता 0.00023 पीपीएम थी। इन सबका असर यह है कि भारत के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक गंगा नदी की क्रमिक हत्या हो रही है। इस योजना के अंतर्गत 200 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं। फिर भी प्रदूषण स्तर कम करने में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। जानकारी के मुताबिक, दिसंबर 2019 में गंगा नदी की सफाई के लिए विश्व बैंक एक अरब डॉलर उधार देने पर सहमत हुआ। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में उपस्थित अवशिष्ट का अंत करने की पहल का हिस्सा है। सर्वप्रथम, हमें यह तय करना होगा कि किसी भी कीमत पर मलजल और उद्योगों का गंदा पानी गंगा में नहीं जा पाए। इसके लिए कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, भागलपुर इत्यादि बड़े शहरों में बड़ा ड्रेन बनाया जाए, जिसमें वाहित मल और औद्योगिक कचरा युक्त जल का ट्रीटमेंट व रिसाइकिल कर उस जल को कृषि कार्य के उपयोग में लाया जाए। तीसरा, प्रत्येक स्नान घाट के किनारे शौचालय और चेंजिंग रूम की व्यवस्था होनी चाहिए और उसकी साफ-सफाई का पूर्ण ध्यान रखा जाना चाहिए। चतुर्थ, हरिद्वार से लेकर हल्दिया तक गंगा की चौड़ाई कहीं भी 3 किलोमीटर से कम नहीं रहे, इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इस 3 किलोमीटर की चौड़ाई में बीच का 1 किलोमीटर जहाज आदि के आवागमन के लिए शिपिंग कारपोरेशन आॅफ इंडिया को सौंपा जाए, जिससे कानपुर से हल्दिया तक वाटर ट्रांसपोर्टेशन का मार्ग प्रशस्त हो सके। पांचवां, गंगा की चौड़ाई के दोनों ओर कम से कम फोरलेन सड़क का निर्माण किया जाए, जिससे हरिद्वार से हल्दिया तक एक नया कॉरिडोर, जो काफी उपयोगी होगा और आवागमन को आसान करेगा। छठा, उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा का पानी की गहराई इतनी अवश्य होनी चाहिए कि युद्ध आदि विशेष परिस्थितियों में बोइंग विमान आदि इस पर उतारा जा सके। वहीं, गंगा के स्ट्रेच की चौड़ाई ज्यादा होने से टाल क्षेत्र की समस्या भी अपने आप दूर हो जाएगी। सातवां, बिहार में बक्सर के टेल पॉइंट से सोन, गंडक आदि नदियों को जोड़कर दक्षिण-उत्तर बिहार अर्थात भभुआ, सासाराम, औरंगाबाद, गया, नवादा की ओर एक अलग चैनल बना दिया जाए तो इन जिलों में पटवन का एक बड़ा साधन विकसित किया जा सकता है। इस चैनल को कोसी, कमला, बागमती और बूढ़ी गंडक नदी से जोड़ देने पर खगड़िया और दक्षिण-पूर्व बिहार के कई हिस्सों को पटवन आदि का साधन सहज ही मुहैया कराया जा सकता है। आठवां, गंगा के तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। गंगा आरती भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। अत: उन सभी प्राचीन नगरों और शहरों यथा वाराणसी, बक्सर, पटना, सुल्तानगंज, भागलपुर आदि में नियमित रूप से गंगा आरती का कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए। इससे क्षेत्रीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। नवम, गंगा की घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ, जिसका प्राचीन इतिहास अत्यंत गौरवमयी और वैभवशाली है। जहां ज्ञान, धर्म, अध्यात्म एवं सभ्यता- संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई, जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हुआ। इसी घाटी में रामायण और महाभारत कालीन युग का उद्भव और विकास हुआ। प्राचीन मगध महाजनपद का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ, जहां से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का स्वर्ण युग विकसित हुआ, जब मौर्य और गुप्त वंश के राजाओं ने यहां पर शासन किया। दशम, और सबसे अंतिम प्रयास के रूप में गंगा सफाई अभियान को न केवल सरकारी योजना के रूप में प्रचारित किया जाए बल्कि इसे जन-आंदोलन का व्यापक रूप दिया जाए। इसमें जनता के साथ-साथ राजनेताओं और अधिकारियों को आवश्यक रूप से जोड़ा जाए। मुझे उम्मीद है कि समन्वित प्रयास से ही गंगा को भागीरथी के पुरातन रूप में पाया जा सकता है। (लेखक बिहार सरकार के पूर्व नगर विकास एवं आवास मंत्री हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय कुमार)। 2012 में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने में इन दोनों नेताओं के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है, जबकि मुलायम के बाद शिवपाल यादव और आजम खान मुख्यमंत्री की कुर्सी के प्रबल दावेदार समझे जाते थे। दोनों की ही गणना जनाधार वाले नेताओं के रूप में होती है। समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता और मुस्लिम चेहरा आजम खान की सपा हाईकमान से नाराजगी की जो बात सामने आ रही है, उसमें यदि दम है तो यह तय माना जाना चाहिए कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए खून के रिश्ते वाले चाचा शिवपाल यादव की तरह से ही राजनैतिक चाचा आजम खान भी अनुपयोगी हो गए हैं। इसीलिए तो दोनों चाचाओं का एक-सा दर्द सामने आ रहा है। शिवपाल की तरह आजम खान को भी लगने लगा है कि उनके साथ भतीजे अखिलेश ने यूज एंड थ्रो वाली ही सियासत की है। शिवपाल और आजम खान में समानता की बात की जाए तो दोनों ही सपा के दिग्गज नेताओं में शुमार रह चुके हैं। दोनों ही पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के भाई जैसे थे। दोनों की ही सपा में तूती बोला करती थी। सपा को फर्श से अर्श तक पहुंचाने में दोनों का योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। दोनों ही कई बार विधान सभा का चुनाव जीत चुके हैं। इस समय दोनों के ही सितारे गर्दिश में चल रहे हैं, जिसकी वजह और कोई नहीं वही शख्स है जिसे शिवपाल और आजम ने गोद में खिलाया था। दोनों ने अपने सामने ही अखिलेश को बढ़ते देखा था। 2012 में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने में इन दोनों नेताओं के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है, जबकि मुलायम के बाद शिवपाल यादव और आजम खान मुख्यमंत्री की कुर्सी के प्रबल दावेदार समझे जाते थे। दोनों की ही गणना जनाधार वाले नेताओं के रूप में होती है और वोटरों पर अच्छी पकड़ है। सवाल यह है कि अखिलेश को आजम अनुपयोगी क्यों लग रहे हैं, तो जानकार इसकी वजह प्रदेश में हिन्दुत्व के उभार की राजनीति बता रहे हैं। 2014 में जबसे मोदी ने केन्द्रीय स्तर पर हिन्दुत्व की राजनीति शुरू की थी और यूपी में वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ा था, तबसे अखिलेश की तुष्टिकरण की सियासत को ग्रहण लग गया है। 2017 तथा 2022 के विधानसभा और 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम तुष्टिकरण के सहारे कोई बड़ा राजनैतिक धमाका नहीं कर पाने वाले अखिलेश का धीरे-धीरे मुस्लिम-यादव सियासत से मोहभंग होता जा रहा है। अखिलेश को इस बात का भी मलाल है कि उनकी मुस्लिम परस्त छवि के कारण सपा का परम्परागत यादव वोटर भी मुंह मोड़ता जा रहा है। हाल यह है कि समाजवादी पार्टी की मुस्लिम परस्त छवि का खामियाजा उन दलों को भी भुगतना पड़ जाता है जो उनके साथ हाथ मिलाते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से और 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ जुड़े कई छोटे-छोटे दलों को भी सपा का हाथ थामने का खामियाजा भुगतना पड़ा था। बहरहाल, बात आजम खान की सपा प्रमुख अखिलेश यादव से नाराजगी की खबरों की कि जाए तो अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी से आजम खाम की शिकायत कोई अभी शुरू नहीं हुई है, बल्कि ये दर्द और नाराजगी पुरानी है। 2017 में यूपी में योगी सरकार की शुरूआत के बाद से आजम खान के लिए जब बुरे दौर का आगाज हुआ तो अखिलेश यादव काफी हद तक इस मामले पर चुप्पी साधे रहे। आजम खान के करीबियों का मानना है कि जब आजम की गिरफ्तारी हुई तो अखिलेश ने इसका उस तरह से विरोध नहीं किया, जितना करना करना चाहिए था। अखिलेश न ही विधानसभा के भीतर इस मुद्दे को धारदार तरीके से उठा पाए, न ही सड़क पर आजम के पक्ष में कहीं कोई आंदोलन चलाया गया। आजम खान से मुलाकत तक नहीं करने जाते हैं अखिलेश यादव। विधानसभा चुनाव में सपा को 111 सीटें मिलीं, इसमें मुस्लिमों वोटरों की बड़ी भूमिका थी, लेकिन फिर भी अखिलेश ने जेल जाकर आजम से मिलना जरूरी नहीं समझा। इससे पूर्व जब विधानसभा चुनाव 2022 का मौका आया तो इस मैके पर आजम खान खेमे में और ज्यादा नाराजगी बढ़ गई, क्योंकि अखिलेश यादव ने सिर्फ आजम खान और बेटे अब्दुल्ला आजम को टिकट दिया, जबकि अखिलेश ने उनके समर्थकों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था। बताया जाता है कि आजम खान ने करीब एक दर्जन अपने करीबी नेताओं की लिस्ट सपा प्रमुख को सौंपी थी, जो विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। इसके अलावा आजम खान के समर्थक ये भी चाहते थे कि संसदीय सीट से इस्तीफा देकर रामपुर सीट से विधायक बने आजम खान को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए, लेकिन अखिलेश यादव खुद नेता प्रतिपक्ष बन गए। जबकि अखिलेश चाहते तो आजम खान को नेता प्रतिपक्ष बनवा कर आजम के लिए जेल से बाहर आने की राह आसान कर सकते थे। इसलिए जेल में बंद आजम खान के करीबी खुल कर अखिलेश की मुखालिफत में सामने आ गए हैं। आजम खान के मीडिया प्रभारी फसाहत अली खान शानू ने रामपुर में सपा कार्यालय में कहा कि आजम खां ने अखिलेश यादव और उनके पिता का समाजवादी पार्टी के बनने और मुख्यमंत्री बनने तक हर कदम पर साथ दिया, लेकिन जब अखिलेश यादव को साथ देने की बारी आई तो वह पीछे हट गए। शानू ने कहा कि जब आपने कहा कि मैं कोरोना का टीका नहीं लगवाऊंगा तो आजम खान ने जेल में कोरोना का टीका नहीं लगवाया। नतीजा ये हुआ कि वो मौत के मुंह में जाते-जाते बचे। इसके साथ ही आजम को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाए जाने को लेकर भी नाराजगी नजर आ रही है। उधर, योगी कई बार कह चुके हैं कि अखिलेश ही नहीं चाहते हैं कि आजम बाहर आएं। इसको लेकर भी आजम खान और अखिलेश के बीच दरार बढ़ी है। आजम खान समर्थक अखिलेश को याद दिला रहे हैं कि अखिलेश यादव जी हमारा सलूक आपके साथ ये था कि जब 1989 में अपने वाजिद साहब को कोई सीएम बनाने को तैयार नहीं था।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संजय पासवान)। डॉ भीमराव आंबेडकर ने 1938 में मनमाड रेलवे वर्कर्स कॉन्फ्रेंस में कहा था, मुझे धर्म के प्रति युवाओं की बढ़ती उदासीनता को देख कर पीड़ा होती है। धर्म कोई अफीम नहीं है। जैसा कि कुछ लोग मानते हैं। मुझमें जो कुछ भी अच्छा है या मेरी शिक्षा से समाज का जो भी भला होता है, मैं उसका श्रेय अपने अंदर की धार्मिक भावनाओं को देता हूं। यह कथन उन लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है जो कि आंबेडकर को पढ़े बिना आंबेडकरवाद का अनुसरण करते हैं। ये स्थिति इसलिए है क्योंकि भारत के वामपंथी आंबेडकरवादी कार्यकर्ताओं ने उन्हें धर्म के विरोधी के रूप में चित्रित कर रखा है। जबकि आंबेडकर कार्ल मार्क्स जैसे नहीं थे। इसलिए एक व्यक्ति बिना किसी विरोधाभास के एक ही साथ तीनों हो सकता है एक हिंदू, एक राष्ट्रवादी और एक आंबेडकरवादी। यह बात उस वैचारिक कथानक के बिल्कुल विपरीत है, जो कि एक झूठे विचार की वकालत करता है कि आंबेडकर के विचार और राष्ट्रवाद एक साथ नहीं रह सकते। आंबेडकर ने धर्म को बहुत महत्व दिया था और यह बात उनकी विरासत पर एकाधिकार की हसरत रखने वाले साम्यवादियों की आज की पीढ़ी को रास नहीं आएगी.शांतिपूर्ण विरोध के जरिए दलित वर्ग के मंदिर प्रवेश की हिमायत करना आंबेडकर की विशेषता थी। तमिलनाडु में पेरियार के अनुयायी बड़ी अस्पष्टता की स्थिति निर्मित करते हैं। जबकि एक तरफ तो वे हिंदू प्रतिष्ठानों के तर्कहीन उन्मूलन का समर्थन करते हैं, पर साथ ही वे आंबेडकरवादी होने का दावा भी करते हैं। अपने जीवन के निर्णायक चरण में आंबेडकर धर्मांतरण के सवाल से जूझ रहे थे। धर्मशास्त्र संबंधी गहन विद्वता के मद्देनजर, वह तमाम भारतीय धर्मों की ताकतों और कमजोरियों को लेकर आश्वस्त थे। कोई दृढ़ कारण जरूर रहा होगा कि बहुत सोच-विचार और विभिन्न धार्मिक नेताओं से चर्चा के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसे आमतौर पर हिंदू धर्म की ही एक शाखा के रूप में देखा जाता है। क्या वह इस्लाम या ईसाई जैसे गैर-भारतीय धर्म को अपनाने के संभावित परिणामों से बचना चाहते थे? सामाजिक इतिहासकारों को इस सवाल पर रोशनी डालनी चाहिए, इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आंबेडकर के विचार जाति संघर्ष की उपज थे। उनका जीवन इस निरंतर संघर्ष का प्रमाण है। पर जाति के खिलाफ अपने वैचारिक रुख के कारण आंबेडकर को पूर्वाग्रहों का भी सामना करना पड़ा, यहां तक कि साम्यवादियों से भी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की केंद्रीय कमेटी ने 1952 में आंबेडकर की अगुआई वाले संगठन अनुसूचित जाति महासंघ (एससीएफ) के खिलाफ एक विशेष प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि आर्थिक बेहतरी और सामाजिक बराबरी की आकांक्षा को उनके साम्राज्य-समर्थक और अवसरवादी नेता डॉ आंबेडकर ने एक विकृत और अवरोधकारी रूप दे दिया है, जिन्होंने कि उनको एससीएफ में सांप्रदायिक और जाति-विरोधी हिंदुओं के तौर पर संगठित किया है। चुनाव के साथ भयादोहन भी आता है आरक्षण, हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के लिए संवैधानिक गारंटियों को लेकर। पर, ये कांग्रेस पार्टी ही है जिसने स्वतंत्रता सेनानी और दलितों के सबसे बड़े नेताओं में से एक बाबू जगजीवन राम को कभी भी पार्टी या सरकार में सम्मानजनक पद नहीं दिया। आखिरकार, जगजीवन राम को पार्टी से अलग होना पड़ा था। वे जनता पार्टी में शामिल हो गए और अंतत: जनसंघ समर्थित जनता पार्टी सरकार में उप-प्रधानमंत्री बने। एक दलित नेता के रूप में बाबू जगजीवन राम वामपंथियों के कथानक में फिट नहीं बैठते थे, क्योंकि वह एक समर्पित हिंदू थे। जिन्होंने हिंदू धर्म में रहते हुए इसकी बुराइयों का मुकाबला करने के विकल्प को चुना। कांशीराम और मायावती ने भी किसी अन्य धर्म को नहीं अपनाया। दलित आस्थावान हिंदू होते हैं। परंतु, भारतीय राजनीतिक इतिहास में किसी राष्ट्रीय दल की कमान संभालने वाला पहला दलित बंगारू लक्ष्मण बने, जो 2000 से 2001 तक भाजपा के अध्यक्ष रहे थे। भाजपा की ही अगुआई वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में जीएमसी बालायोगी, एक वकील, लोकसभा का पहला दलित स्पीकर बने थे। और एक बार फिर भाजपा ने ही रामनाथ कोविंद के रूप में भारत को पहला दलित राष्ट्रपति दिया। भारत के दसवें राष्ट्रपति केआर नारायणन एक दलित-ईसाई थे। इस समय सर्वाधिक दलित सांसद भाजपा से ही हैं। आंबेडकर ने लिखा था, जातीय रूप से हर व्यक्ति परस्पर भिन्न है। एकरूपता का आधार तो सांस्कृतिक एकता है। इस बात को मानते हुए, मैं यह कहना चाहूंगा कि सांस्कृतिक एकता में कोई भी देश भारतीय प्रायद्वीप की बराबरी नहीं कर सकता है। इस संदर्भ में संस्कृति की बारीकी से व्याख्या करने पर हमारी कालातीत सभ्यतामूलक अंत:चेतना सामने आती है जो कि युगों की कसौटी पर खरी उतरी है। आंबेडकर की बुनियाद भारतीय सभ्यता और संस्कृति में थी। ये भी कहा जाता है कि आंबेडकर संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रस्ताव के पक्ष में थे। वह हमारी सांस्कृति समृद्धि का हवाला देते रहते थे। मौजूदा वक़्त आंबेडकर के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं के ईमानदार विश्लेषण का है। और आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल) उनकी विरासत को लेकर एक नया, निष्पक्ष और रचनात्मक सार्वजनिक संवाद शुरू करने का उचित अवसर है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर आंबेडकर की पकड़, चीन को लेकर उनकी चेतावनी, और अर्थशास्त्र में उनकी असाधारण विद्वता को मौजूदा पीढ़ी के सामने लाया जाना चाहिए। आंबेडकर को मात्र सामाजिक न्याय का योद्धा और एक विशिष्ट दलित नेता के रूप में देखना उनकी विरासत के साथ बड़ा अन्याय होगा। (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्रेया नंदी और शैली सेठ मोहिले)। नेपाल सरकार ने विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के मद्देनजर गैर-जरूरी वस्तुओं के आयात पर रोक लगा दी है, जिसका असर भारत से होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है। निर्यातकों ने पिछले हफ्ते कहा था कि नेपाल के केंद्रीय बैंक (नेपाल राष्ट्र बैंक) ने वहां के वाणिज्यिक बैंकों को निर्देश दिया था कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार में आ रही गिरावट थामने के लिए वे गैर-जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए उधार सुविधा पत्र (क्रेडिट लैटर) जारी न करें। नेपाल की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार साइकल, मोपेड, चावल, सोना-चांदी, बिजली के उपकरणों आदि के आयात के लिए उधार पत्र जारी नहीं किया जाएगा। हाल के महीनों में नेपाल में आयात बढ़ने से देश से काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जा रही थी, जिससे आर्थिक संकट पैदा होने की चिंता बढ़ गई है। नेपाल दूतावास के एक अधिकारी ने आयात पर लगाए गए प्रतिबंध की पुष्टि की। हालांकि यह प्रतिबंध कितने समय तक रहेगा इस पर कोई टिप्पणी करने से उन्होंने इनकार कर दिया। भारत सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच स्थानीय मुद्रा कारोबार की अनुमति दी गई है लेकिन नेपाल के पास आयात के लिए भुगतान करने के लिए पर्याप्त मात्रा में भारतीय रुपया नहीं है। भारतीय निर्यात संगठनों के संघ (फियो) के महानिदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अजय सहाय ने कहा कि निर्यातक चिंतित हैं और वे आयात प्रतिबंध पर नेपाल से आधिकारिक पुष्टि मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने कहा, अधिकांश निर्यातकों को इसके बारे में पता नहीं है। श्रीलंका में घटनाक्रम देखने के बाद नेपाल सतर्क हो रहा है और यही कारण है कि वहां आयात सीमित किए जा रहे हैं। अभी तक हमारे पास इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है कि आयात के लिए किन सामानों को अनुमति नहीं दी जाएगी। कई देशों (जैसे श्रीलंका) में जैसे हालात बन रहे हैं ऐसे में निश्चित रूप से वैश्विक कारोबार को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है और यही चिंता का एक बड़ा कारण है। वाहन उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि नेपाल में आयात पर रोक से फिलहाल कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन भविष्य में नए अनुबंधों के मामले में चुनौती खड़ी हो सकती है। वाहन उद्योग के एक अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि वाहन और इसके कल-पुर्जों को भी प्रतिबंधित गैर-जरूरी वस्तुओं की सूची में शामिल किया गया है। हालांकि आयात के लिए मौजूदा उधार पत्र पहले की तरह ही नेपाल में मान्य होंगे। ऐसे में भारत से होने वाले निर्यात पर हाल-फिलहाल कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि अभी उधार पत्र उपलब्ध हैं। उधार पत्र वित्तीय अनुबंध या दस्तावेज होता है, जो विक्रेताओं को खरीदारों की ओर से भुगतान की गारंटी प्रदान करता है। समस्या नए अनुबंध की होगी, जिसके लिए नए उधार पत्र की जरूरत होगी। उक्त अधिकारी ने कहा कि इस निर्णय का मकसद नेपाल में जून में शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले व्यापार संतुलन के घाटे को कम करना है। हमें लगता है कि यह अस्थायी उपाय है। भारत हर साल नेपाल को 60 से 70 करोड़ डॉलर मूल्य के वाहन और कल-पुर्जे निर्यात करता है। मूल्य के लिहाज से कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी करीब 4 फीसदी है। भारतीय इंजीनियरिंग एवं निर्यात संवर्द्घन परिषद के सूत्रों ने कहा कि वह अभी इस प्रतिबंध के प्रभाव का आकलन कर रहा है। इस बारे में कोई टिप्पणी करना अभी जल्दबाजी होगा। पहले यह समझना होगा कि किन उत्पादों के आयात पर रोक लगाई गई है। निर्यात के मामले में नेपाल भारत का नौवां सबसे प्रमुख ठिकाना है। 2021 में भारत से 9.6 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया गया था और कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 2 फीसदी से अधिक थी। नेपाल भारत का 29वां सबसे बड़ा व्यापरिक साझेदार है और नेपाल में भारत विदेशी निर्यात का सबसे बड़ा स्रोत और अग्रणी भागीदार है। 2021-22 के पहले 11 महीने में दोनों देशों के बीच 10 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। नेपाल में भारतीय दूतावास के अनुसार नेपाल में वस्तुओं के व्यापार में भारत की हिस्सेदारी दो-तिहाई और सेवाओं में करीब एक-तिहाई है। नेपाल के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारत की हिस्सेदारी एक-तिहाई है। करीब 100 फीसदी पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति भारत से ही होती है और भारत में रहने वाले पेंशनभोगी, पेशेवर तथा श्रमिक काफी मात्रा में पैसे वहां भेजते हैं। एशियाई विकास बैंक ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा कि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के कारण तेल की ऊंची कीमतें होने से आयात बिल और बढ़ेगा। साथ ही नेपाल का व्यापार संतुलन बिगड़ने की भी संभावना है। इसमें चेतावनी देते हुए कहा गया, इन घटनाओं की वजह से चालू खाते का घाटा वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी के 9.7 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है जो वित्त वर्ष 2021 में 8.0 फीसदी तक था।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (देवाशीष बसु)। डीएचएफएल में भारी नुकसान उठाने वाले निवेशकों ने सोचा था कि इस दिवालिया वित्तीय कंपनी के प्रवर्तक कपिल और धीरज वधावन तलोजा जेल में बंद होंगे। लेकिन अब खुलासा हुआ है कि वे नींद में दिक्कत जैसी मामूली अस्वस्थता को लेकर पिछले 15 महीनों से कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में आराम से जमे हुए हैं। वधावन धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत हिरासत में थे। उन पर हजारों फर्जी खाते खोलने और फर्जी ऋण देने (कुख्यात बांद्रा खाते) और 40,000 करोड़ रुपये के घाटे जैसे आपराधिक कार्य करने का आरोप है। उन्होंने ऐसा पहली बार नहीं किया है। दो साल पहले अप्रैल 2020 में महामारी के दौरान सख्त लॉकडाउन के दौरान वधावन परिवार के 23 सदस्यों को प्रतिबंधों के उल्लंघन और मौज-मस्ती के लिए मुंबई से महाबलेश्वर जाने की मंजूरी दी गई थी। उस समय सीबीआई ने कहा था कि वे भाग गए हैं। जब पूरा महाराष्ट्र बंद था तो वे कैसे अपनी गाड़ियां लेकर महाबलेश्वर पहुंच गए? गृह विभाग के प्रधान सचिव (विशेष) अमिताभ गुप्ता ने उन्हें मंजूरी के लिए अपने लेटरहेड पर एक पत्र जारी किया था। जब यह खबर बाहर आ गई तो राज्य के तत्कालीन गृह मंत्री अनिल देशमुख ने जांच के आदेश दिए और गुप्ता के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का वादा किया। गुप्ता ने मानवीय आधार पर मंजूरी देने का दावा किया था। यह सख्त कार्रवाई क्या थी? उन्हें जांच में बरी कर दिया गया और पांच महीने बाद पदोन्नत कर पुणे का पुलिस प्रमुख बना दिया गया। शायद वधावन मामले को देख रहे हर व्यक्ति को भी इनाम मिलना बाकी है, जिन्होंने उन्हें 15 महीने अस्पताल में रहने (एक निजी अस्पताल में नौ महीने) की मंजूरी दी है। एक अन्य और ज्यादा बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) के मामले में पूर्व चयरमैन रवि पार्थसारथी खुले घूम रहे हैं। आईएलऐंडएफएस करीब एक लाख करोड़ रुपये के कर्ज के साथ दिवालिया हो गई थी। पार्थसारथि को गिरफ्तार किया गया लेकिन केवल इसलिए क्योंकि तमिलनाडु पुलिस ने एक निजी कंपनी की शिकायत पर कार्रवाई की थी। हालांकि उन्हें जमानत मिल गई। लेकिन उनके कार्याधिकारियों के उस समूह के सदस्यों को नहीं मिली, जिन्होंने पार्थसारथि को आईएलऐंडएफएस को चलाने में 25 साल मदद दी थी। उनके सहयोगी कई साल से जेल में हैं, लेकिन वह खुले घूम रहे हैं। शायद इसलिए कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के जिन अधिकारियों ने आईएलऐंडएफएस के साथ जुड़ाव का लाभ उठाया था, वे अब उसके बदले में मदद दे रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की पूर्व प्रबंध निदेशक और उनके सहकर्मी-पूर्व समूह परिचालन अधिकारी आनंद सुब्रमण्यन को गिरफ्तार किया है। अगर सीबीआई वास्तव में एनएसई में एल्गो घोटाले की जांच करना चाहती है तो वास्तविक लाभार्थियों, घोटाले में मदद देने वाले लोगों और एक उचित जांच को पटरी से उतारने वाले व्यक्तियों को जवाबदेह बनाया जाए। क्या डीएचएफएल और आईएलऐंडएफएस की तरह एनएसई घोटाले की बड़ी मछलियों को लेकर भी नरमी दिखाई जाएगी? लगातार अकुशलता और भ्रष्टाचार का चौथा उदाहरण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी) हैं। समाधान के लिए स्वीकृत मामलों में से करीब एक तिहाई का परिसमापन हुआ है और इनमें वसूली की दर महज 5 फीसदी है। अगर शीर्ष 15 मामलों (समाधान मूल्य के लिहाज से) को छोड़ दें तो वसूली की दर महज 18 फीसदी है। पीएसबी को 90 फीसदी से ज्यादा बकाया छोड़ना पड़ा है। यह इस मुद्दे की तरफ संकेत है कि कोई भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भ्रष्टाचार के खिलाफ काम नहीं करना चाहता है, जिसे बड़े सहज तरीके से जांच-पड़ताल में खामी करार दे दिया जाता है। एक आम आदमी बैंक के हित पूरे हुए बिना एक रुपया उधार नहीं ले सकता है। ऐसे में हजारों कंपनियां ऐसा करने में कैसे कामयाब रहीं? बैंक अधिकारियों को उधार देते समय नहीं पता होता कि कोई उद्यम सफल होगा या असफल और कर्ज लेने वाला ईमानदार है या जालसाज। इसलिए वे अपने ऋण को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त संपत्ति गिरवी और व्यक्तिगत गारंटी की मांग करते हैं। जब ब्याज और मूलधन को लौटाने में देरी होती है तो वे निर्धारित प्रक्रिया को अपना सकते हैं और गिरवी संपत्ति को बेच सकते हैं। वे कर्जदारों से भी व्यक्तिगत गारंटी के मुताबिक भुगतान करने की मांग कर सकते हैं। ऐसा छोटे कर्जदारों के साथ नियमित रूप से होता है। ऐसे में इतने अधिक मामलों में वसूली केवल 5 फीसदी और कुछ कुख्यात मामलों में महज 1-2 फीसदी ही क्यों हैं? फंसे ऋणों का एक सबसे बड़ा कारण-भ्रष्ट बैंक अधिकारियों और कारोबारियों का गठजोड़ है और कुछ मामलों में उनकी नकेल राजनेताओं के पास है। लेकिन मुश्किल से ही किसी बैंक अधिकारी को जेल में डाला गया है। भाजपा के सत्ता में आने से पहले 2014 में हर भाषण में नरेंद्र मोदी पिछली सरकार को भ्रष्ट बताते थे। उन्होंने भ्रष्टाचार कम करने और सुशासन लाने के लिए चौकीदार के रूप में काम करने का वादा किया था। क्या यह नारा काम कर रहा है? बहुत ज्यादा नहीं। यह अत्यधिक मुश्किल और लंबी अवधि की प्रक्रिया है। मुझे यकीन नहीं है कि अगर मोदी चाहें भी तो एक चौकीदार के रूप में काम कर सकते हैं। लेकिन वह भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा होने के बाद उनका त्वरित समाधान सुनिश्चित करके निश्चित रूप से थानेदार के रूप में काम कर सकते हैं। घोटाले, कदाचार आदि नियमित रूप से इसलिए घटित होते हैं क्योंकि पकड़े जाने की कीमत बहुत मामूली है। इसके बावजूद हम दंड, जुमार्नों, नौकरी से निकालने, मिसाल कायम करने वाले नुकसान और व्यक्तिगत जिम्मेदारी जैसे उपायों पर ध्यान नहीं देते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि पूरी दुनिया में यही स्थिति है। हालांकि आम तौर पर कहा जाता है कि अपराध से कुछ नहीं मिलता है और उनकी कीमत चुकानी पड़ती है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आदिति फडणीस)। श्रीलंका लगातार एक के बाद दूसरे संकट से जूझ रहा है। अपनी कई समस्याओं के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। परंतु कोविड-19 के प्रभाव तथा रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी बाहरी घटनाओं ने भी उसे प्रभावित किया है। एक बात एकदम स्पष्ट है कि जहां भी सत्ता के दो केंद्र रहे हैं, वहां अंत:स्फोट की स्थितियां बनी हैं। चाहे मामला राजनीति का हो या आर्थिक नीति निर्माण का। हाल के वर्षों में श्रीलंका की मुश्किलों की शुरूआत सन 2014-15 में हुई थी, जब प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों का एक गठजोड़ तैयार हुआ था। वाम झुकाव वाली श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) और मुक्त बाजार समर्थक यूनाइटेड नैशनल पार्टी (यूएनपी) का यह गठजोड़ तैयार करने में पूर्व राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना और प्रधानमंत्री राणिल विक्रमसिंघे की अहम भूमिका थी। नैशनल यूनिटी फ्रंट (एनयूजी) की पहली सरकार ने महिंदा राजपक्षे की श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) की सरकार को पराजित किया था। लेकिन अगले दो ही वर्षों में हालात बदल गए। विवाद और सत्ता को लेकर संघर्ष उस समय चरम पर पहुंच गया जब सिरीसेना ने एक संवैधानिक तख्तापलट के जरिये विक्रमसिंघे को हटा दिया और 2018 में महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना दिया। इस बीच देश के सर्वोच्च न्यायालय ने दखल दिया और दिसंबर 2018 में विक्रमसिंघे को बहाल करने का आदेश दिया। अब तक सरकार में सत्ता के दो प्रतिद्वंद्वी केंद्र सामने आ चुके थे। अफसरशाही को भी दो में से किसी एक को चुनने में मुश्किल हो रही थी। श्रीलंका का यह दावा कि वहां सन 2009 से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है, 21 अप्रैल, 2019 को गलत साबित हो गया जब ईस्टर के दिन वहां बम विस्फोट हुए। इसके बावजूद सत्ता के शीर्ष पर आपसी लड़ाई ने खत्म होने का नाम नहीं लिया। सिरीसेना ने अपने रक्षा सचिव से कहा कि वह प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) की बैठक में आमंत्रित न करें। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने बम विस्फोट की घटनाओं को लेकर दो समांतर जांचों के आदेश जारी कर दिए। श्रीलंका इस समय अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 के असर तथा रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव के रूप में दोहरे संकट का सामना कर रहा है। विदेशों से कम धन आने तथा पर्यटकों के न आने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है। ये दोनों श्रीलंका के राजस्व के दो प्रमुख स्रोत हैं। उस पर बकाया कर्ज भी बहुत बड़ी मात्रा में है। ऐसी स्थिति में केवल दो ही विकल्प नजर आते हैं: मित्र देशों से मदद की प्रार्थना की जाए या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास जाकर कर्ज चुकाने तथा अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए कर्ज की मांग की जाए। केंद्रीय बैंक के गवर्नर अजित निवार्ड कबराल ने बार-बार आईएमएफ के पास जाने से इनकार किया है। उन्होंने कैबिनेट की ऐसी सलाह भी ठुकरा दी। वित्त मंत्री बेसिल राजपक्षे ने 2021 का सालाना बजट पेश करते समय भी यह स्वीकार किया कि उनके देश को आईएमएफ के पास जाना पड़ सकता है। कबराल ने जोर देकर कहा कि विदेशी मुद्रा की समस्या अस्थायी हैऔर देश की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है। श्रीलंका के कुलीनों (श्रीलंका एक लोकतांत्रिक समाजवादी गणराज्य है) ने कबराल के पूर्वग्रह को स्पष्ट किया : आईएमएफ के पास जाने का अर्थ होता मुद्रा का अवमूल्यन, ब्याज दरों में इजाफा, सरकारी वाणिज्यिक उपक्रमों का निजीकरण और कर्ज में और डूब जाना। राष्ट्रपति के छोटे भाई बेसिल राजपक्षे को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उनकी बनायी रणनीतियों पर चलकर ही राजपक्षे सत्ता में वापस लौटे। परंतु वह देश के केंद्रीय बैंक के गवर्नर से सार्वजनिक रूप से असहमत दिखे। जब चीन ने श्रीलंका के लिए दरवाजे बंद कर लिए और वित्त मंत्री को भारत से एक नहीं बल्कि अनेक बार मदद मांगनी पड़ी तब राष्ट्रपति ने दखल दिया। राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने व्यक्तिगत रूप से दखल दिया और स्पष्ट किया कि मुद्रा का अवमूल्यन करने तथा मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास जाने के बाद कबराल से पद छोड़ने को नहीं कहा गया था। यदि आर्थिक नीति को लेकर व्यवस्थित ढंग से विचार किया गया होता तो शायद श्रीलंका की आम जनता को इतनी मुश्किलों का सामना न करना पड़ता। कई विपक्षी नेता मानते हैं कि अगर पहले आईएमएफ की मदद ली जाती तो श्रीलंका को 12-12 घंटे की बिजली कटौती और खाने की कमी से बचाया जा सकता था। तब खुद पर गर्व करने वाला यह देश इस कदर शक्तिहीन नहीं महसूस करता। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि श्रीलंका आईएमएफ से कितनी मदद चाहता है। कबराल भी इस वार्ता में शामिल हैं। वह कड़ा मोलतोल करना चाह रहे हैं। उनकी दलील है कि श्रीलंका ने आईएमएफ के पास जाने के पहले अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया और उसने कभी किसी ऋण को चुकाने में चूक नहीं की। उनके मुताबिक यह वित्तीय हालत बेहतर रखने की उनकी देश की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। हकीकत यह है कि श्रीलंका आईएमएफ के पास तब गया है जब वह डिफॉल्ट के कगार पर है। इन हालात में एक भारतीय के रूप में देखा जाए तो भारत के ताजा कदमों से राहत मिलती है। श्रीलंका ने अपने अस्पताल संचालित रखने के लिए भारत से मदद नहीं मांगी। भारत ने मदद की पेशकश की। भारत सैकड़ों अन्य छोटे-मोटे हस्तक्षेप भी कर सकता है जिनका भारत पर कोई खास बोझ नहीं पड़ेगा। ऐसा करके वह श्रीलंकाई कुलीनों के मन की वह आशंका दूर कर सकता है जिसके तहत वे अपनी सरकार से पूछ रहे हैं कि इसके बदले में क्या दिया जाएगा? भारत इतना अच्छा व्यवहार क्यों कर रहा है? भारत के पास अवसर है कि वह एक मददगार पड़ोसी की भूमिका निभाकर तथा ऐसी समस्याएं सुधारकर उपमहाद्वीप में अपनी छवि सुधार सके जिन्हें पैदा करने में उसकी कोई भूमिका नहीं रही। उसे इस अवसर का पूरा लाभ लेना चाहिए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। विश्व जल दिवस इस लिहाज से भी अलग था कि जलवायु परिवर्तन अपने शबाब पर है। यानी हमें हर वह काम करना होगा जो करने की जरूरत है। वर्षा जल की हरेक बूंद को जमा कर पानी की उपलब्धता बढ़ानी है, इसका इस्तेमाल इतने कारगर ढंग से करना है कि वर्षा जल की हरेक बूंद का इस्तेमाल हमारे भोजन या फ्लश होने वाले पानी में हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस्तेमाल पानी की हरेक बूंद का पुनर्चक्रण हो और प्रदूषण से वह खराब न हो। हम यह बात पहले से जानते हैं और अमल में भी लाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में इतना ही काफी नहीं होगा। हमें ये सारे काम कहीं अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर अलग ढंग से करने होंगे। हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का ताल्लुक गर्मी और कम-ज्यादा बारिश से है। इन दोनों का जल चक्र से सीधा सह-संबंध है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए पानी एवं उसके प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। हमें पता है कि हर नया साल इतिहास का सर्वाधिक गरम साल बनता जा रहा है और पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता जा रहा है। भारत में ओडिशा के कुछ हिस्सों में तापमान फरवरी की शुरूआत में ही 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था। उत्तर भारतीय राज्य बढ़ती गर्मी एवं सामान्य से अधिक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब "ला नीना" के साल में हो रहा है। ला नीना प्रशांत महासागर की वे जल धाराएं हैं जो दुनिया का तापमान कम करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। लेकिन भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक ताप वृद्धि ने ला नीना के इस शीतकारी प्रभाव को कम कर दिया है। बढ़ती हुई गर्मी का जल सुरक्षा के लिहाज से कई मायने हैं। पहला, इसका मतलब है कि जल इकाइयों से अधिक वाष्पीकरण होगा। यानी हमें न सिर्फ लाखों जल निकायों में पानी जमा करने पर ध्यान देने की जरूरत है बल्कि वाष्पन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भी योजना बनानी होगी। एक विकल्प भूमिगत जल भंडारण यानी कुओं पर काम करने का है। भारत लंबे वक्त से भूमिगत जल प्रणालियों के प्रबंधन को कम तवज्जो देता रहा है क्योंकि सिंचाई विभाग की समूची अफसरशाही ही नहरों एवं अन्य सतही जल प्रणालियों पर आधारित है। लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं पानी की भारी किल्लत के इस दौर में इसे बदलने की जरूरत होगी। हमें तालाबों, पोखरों एवं नहरों से होने वाले नुकसान की भरपाई के तरीके तलाशने होंगे। ऐसा नहीं है कि वाष्पीकरण से पहले नुकसान नहीं होता था लेकिन तापमान बढ़ने के साथ इसकी दर बहुत ज्यादा हो गई है। हमें योजना बनाने और अधिक काम करने की जरूरत है। दूसरा, बढ़ती गर्मी का मतलब है कि मिट्टी में नमी कम होती जाएगी जिससे जमीन में धूल की मात्रा बढ़ जाएगी और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जाएगी। भारत जैसे देश में जहां भोजन का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा-सिंचित इलाकों में ही पैदा होता है, वहां पर मिट्टी की नमी कम होने से भूमि अपरदन तेज होगा और धूल का बनना भी बढ़ जाएगा। जल प्रबंधन को वनस्पति नियोजन के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा ताकि मिट्टी में पानी को रोके रखने की क्षमता बेहतर हो, अधिक देर तक चलने वाली तीव्र गर्मी के दौर में भी। तीसरा, साफ है कि गर्मी बढ़ने से पानी का इस्तेमाल बढ़ जाएगा क्योंकि पीने एवं सिंचाई के साथ ही जंगलों या इमारतों में लगी आग बुझाने के लिए भी ज्यादा पानी की दरकार होगी। हम दुनिया के कई हिस्सों एवं भारत में भी जंगलों में भीषण आग लगने के डरावने दृश्य देख चुके हैं। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, यह सिलसिला भी तेज होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन से पानी की मांग बढ़ेगी लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम पानी के साथ अपशिष्ट जल को भी बरबाद न करें। सच यह है कि अत्यधिक बारिश होने की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। हम बारिश के एक बाढ़ के तौर पर आने की भी अपेक्षा करें। इस तरह बाढ़ों का एक चक्र पूरा होने के बाद सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो। भारत में पहले से ही साल में बारिश कम दिन होती है। साल भर में औसतन सिर्फ 100 घंटे की ही बारिश होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश वाले दिनों की संख्या और कम करेगा। वैसे भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ जाएगी। इसका जल प्रबंधन की हमारी योजनाओं पर बड़ा असर होगा। हमें बाढ़ प्रबंधन पर अधिक शिद्दत से गौर करने की जरूरत है, नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही बाढ़ के पानी को भूमिगत एवं सतहीय जलभंडार निकायों-कुओं एवं तालाबों में जमा किया जा सके। लेकिन हमें वर्षा जल को इकट्ठा करने के बारे में अलग तरह से योजना बनाने की जरूरत है। फिलहाल मनरेगा के तहत लाखों की संख्या में बन रहे तालाब एवं पोखर सामान्य बारिश के हिसाब से डिजाइन हैं। लेकिन अब भारी बारिश की बात आम होने के साथ ही ये जल भंडार संरचनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि वे लंबे समय तक लबालब रहें। मूल बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पानी की हर बूंद बचानी होगी, चाहे बारिश का पानी हो या बाढ़ का पानी। हमें पानी एवं उसके प्रबंधन को लेकर पहले जुनूनी होना था लेकिन अब तो सेहत एवं दौलत के आधार पानी को लेकर हमें संकल्पित एवं सुविचारित रवैया अपनाना होगा। यह अपने भविष्य को बनाने- बिगाड़ने की बात है। अगर हम आज गंभीर न हुए तो पानी सबसे बड़ा संकट बन सामने आयेगा। (लेखिका सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)।
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