एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अयोध्या से लौटकर मुरलीधर)। अयोध्या में श्री राम का जन्म और अयोध्या में ही भगवान राम की जल समाधि। मैं सोचता हूं आखिर गुप्तार घाट नाम क्यों है? क्या राम नहीं है यह मानना अयोध्यावासियों के लिये कठिन था, असंभव सा। इसलिये उनके मन ने माना कि राम गप्त हो गये सरयू में। इस जल समाधि के स्थान पर जाकर रामत्व का अनुभव होता है। जब मैंने वहां जाने की बात कही तब आॅटो वाला बोला घाट पर बाढ़ है डूबा है। मैंने कहा जहां हमारे राम डूबें हो वहां ही तो जाना है शेष जीवन तो रामलीला करता ही रहा हूं। कैंट इलाके से होता वहां पहुंचा। पानी घट रहा था। शाम का वक्त। सरयू मईया की आरती। मकई बेचती लड़की। और मंदिर के पुजारी कहते हैं कि 1955 के बाद ऐसी बाढ़ नहीं देखी। मंदिर से पानी आज ही अभी निकला है। अचानक पानी बढ़ता है दस मिनट तक अफरा तफरी फिर शांति। घाट से सटा उपर तक सरयू मानसरोबर से निकल कर छपरा में गंगा से मिलने तक अयोध्या की धरा को राम के स्मृतियों में अपने ऊंचे स्थान पर जैसे गर्व कर रही हो। लगा सरयू कह रही हो अवश्य देखिये देखन योगा। रामनगरी अयोध्या का जिक्र आते ही आपके दिल-दिमाग में भगवान राम के जन्मस्थली की तस्वीर कौंध जाएगी, जहां वह बाल लीलायें किया करते थे। भगवान की स्मृतियों को समेटे राम नगरी में वैसे तो कई दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन गुप्तार घाट की अपनी अलग ही विशेषता है। यह वह घाट है, जहां भगवान श्रीराम ने जलसमाधि ली थी। सरयू नदी के किनारे स्थित गुप्तार घाट पर कई छोटे-छोटे मन्दिरों के साथ यहां का सुन्दर दृश्य मन को मोह लेने वाला है। मुक्ति पाने की इच्छा लेकर इस स्थान पर दर्शनार्थी आते हैं। 19वीं सदी में राजा दर्शन सिंह द्वारा गुप्तार घाट का नवनिर्माण करवाया गया था। इस घाट पर राम जानकी मंदिर, पुराने चरण पादुका मंदिर, नरसिंह मंदिर और हनुमान मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र हैं। गुप्तार घाट के पास ही मिलिट्री मन्दिर, कम्पनी गार्डन, राजकीय उद्यान और अन्य प्राचीन मन्दिर पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। नौका विहार और लम्बे रेतीले मैदानों के इर्द-गिर्द हरियाली व शान्त वातावरण और सूर्यास्त की निराली छटा लोगों को बरबस अपनी ओर खींच लेती है। बक्सर की युद्ध विजय के बाद तत्कालीन नवाब शुजा-उद-दौला द्वारा निर्मित ऐतिहासिक किला, गुप्तार घाट से चंद कदमों की दूरी पर स्थित है। ...जब अयोध्या उजड़ सी गई थी मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के साथ ही कीट-पतंग तक उनके दिव्य धाम चले गये, जिसके चलते अयोध्या उजड़ सी गई थी। बाद में उनके पुत्र कुश ने इस नगरी को फिर से बसाया। प्राचीन इतिहास के मुताबिक, महाराज विक्रमादित्य ने अयोध्या नगरी को बसाया था। अयोध्या में गुप्तार घाट के अलावा ऋणमोचन घाट, लक्ष्मण घाट, शिवाला घाट, जटाई घाट, अहिल्याबाई घाट, धौरहरा घाट, नया घाट और जानकी घाट काफी मशहूर हैं। जीवन का आंरभ यानी आपका जन्म आपके वश में नहीं लेकिन अंत तो महान जनों का भगवान राम का निश्चित ही दुनिया का श्रेष्ठ स्थल ही होगा इस पर बहस कहां है? जिन्होंने बहस किया तर्क किया कुतर्क किया उन्हें पता नहीं हमारे राम तो तर्कातिक हैं, वश गुप्त हुए है अयोध्या के गुप्तार घाट पर।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आरएसएस के मोहन भागवत का सभी के लिए समान कानून वाली एक वक्तव्य पर विविध क्षेत्रो में कई तरह की परिचर्चा आरंभ हुई, कुछ पक्ष में और कुछ विपक्ष में अपनी दलील देते नजर आये। आइये जानने की कोशिश करते हैं कि कॉमन सिविल कोड क्यों आवश्यक है पूर्ववर्ती सरकारों ने छद्म अंतरराष्ट्रीय वाहवाही लूटने के चलते बहुत सारे गलत प्रयास किये। हमारे संविधान के अनुसार, राज्य का कोई धर्म नहीं है और इसको सभी धर्मों के लोगों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। संविधान सभा की बहस के उल्लेखों से स्पष्ट है कि बहुसंख्यकों के लिए स्वीकृत अधिकारों में अल्पसंख्यकों को केवल विभाजन के बाद की असाधारण परिस्थितियों में ही उपस्थित होने के रूप में स्पष्ट किया गया था। यह स्वीकार किया जा सकता है भारत के संविधान निर्माताओं का उद्देश्य नहीं था कि अल्पसंख्यकों को दिये गये अधिकारों से बहुसंख्यकों को वंचित किया जाए। 1970 दशक के बाद अनुच्छेद 25 से 30 की व्याख्याओं ने अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक समुदाय के बीच भेदभाव की बुरी भावना पैदा करने वाल लगभग बना ही दिया। बहुसंख्यकों के अधिकारों को वंचित कर दिया गया। कुछ पूर्व के प्रयास : सोशल मीडिया या मीडिया में छपी रिपोर्ट पर आप खोजें तो मिल जाएगा कि स्वर्गीय सैयद शहाबुद्दीन ने बहुसंख्यक हिंदुओं पर संवैधानिक रूप से लगाये गये प्रतिबंधों की समस्या को समझते हुए, 1995 के लोकसभा में एक निजी सदस्य के विधेयक संख्या 36 को संविधान के अनुच्छेद 30 के दायरे को व्यापक करने के लिए पेश किया ताकि अल्पसंख्यक वर्ग शब्द को नागरिकों के सभी वर्गों से प्रतिस्थापित करके नागरिकों के सभी समुदायों और वर्गों को शामिल करने के लिए उचित संशोधन किया जा सके। धर्म की परवाह किये बिना इस देश के सभी नागरिकों के बीच समानता बहाल करने के लिए, इस भेदभावपूर्ण कानूनी व्यवस्था को समाप्त करने की अनिवार्य आवश्यकता है तथा संविधान के अनुच्छेद 25 से 30 के उचित संशोधन द्वारा उनके धर्म के बावजूद लोगों के सभी वर्गों में संवैधानिक और कानूनी समानता प्रदान की जा सके ताकि हिंदुओं के मामलों में अल्पसंख्यकों के समान कानूनों के समान अधिकार, विशेषाधिकार और सुरक्षा का लाभ ले सकें। पूजा स्थलों का प्रबंधन (मंदिर और धार्मिक अनुदान), सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्ति, लाभ आदि से विभिन्न लाभों के लिए पात्रता, शैक्षिक संस्थानों में पारंपरिक भारतीय ज्ञान और भारत के प्राचीन ग्रंथों के शिक्षण में सक्षम करना तथा सरकार और इसकी एजेंसियों के अनुचित हस्तक्षेप के बिना अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रबंधन। इस संबंध में डॉ सत्यपाल सिंह सांसद (मंत्री बनने से पहले) ने 2016 के लोकसभा में संविधान के अनुच्छेद 26 से 30 में संशोधन करने के लिए एक निजी सदस्य के विधेयक संख्या 226 पेश किया। हम फिर से कहते हैं कि इस विधेयक में जो प्रस्तावित संशोधन हैं वो किसी भी समुदाय या समूहों से कोई अधिकार नहीं छीनते हैं, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करते हैं कि हिंदुओं सहित सभी वर्ग समान अधिकारों और विशेषाधिकारों का लाभ उठायें जो इस समय केवल अल्पसंख्यकों के लिए ही उपलब्ध हैं तथा कानून के तहत सभी समान रूप से माने जाते हैं। कारण : यह दोहराना जरूरी है कि विदेशी वाह वाही एवं कई सुरक्षा एजेंसियों के दबाव में सरकारें दब गई या समझ नहीं पाई। लगातार पांच केंद्रीय शिक्षा मंत्रियों ने अल्पसंख्यकों का ही ऐतिहासिक महिमामंडन किया। नीतियों में होते परिवर्तनों की दूरगामी मार पर पूर्व के शासकों ने ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति ने शिक्षा-संस्कृति की धारा पर कब्जा करने की कोशिश की, सर्वविदित है कि सामाजिक बदलाव के मूल स्रोत वही होता है। केंद्रीय सत्ता पर काबिज हुए बिना भी कम्युनिस्टों ने देश की शिक्षा-संस्कृति पर वर्चस्व बनाया और हिंदू ज्ञान-परंपरा को बेदखल कर दिया इसका उदाहरण गांधी जेएनयू यानि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में आप देख सकते हैं। कुछ दिन पूर्व तक हिंदू धर्म-समाज डूबता जहाज समझा जाता था, 2011 तक ऐसा महसूस होता था कि इससे निकल कर ही जान बचाई जा सकती है। इन सच्चाइयों की अनदेखी कर अनेक हिंदूवादी खुद अपनी वाहवाही करते रहे, मैंने खुद देखा है कि कुछ नेता बहुत श्रद्धा से हिन्दू पर्व मनाते हैं यहां तक कि सूत्र बताते हैं कि एक दो रेलवे भवन के सामने विश्वकर्मा भगवान के मंदिर का भी स्थापना हुआ लेकिन जब नीति निर्धारण करने का समय आता है तो अल्पसंख्यक तुष्टीकरण हेतु कानून बना। पूर्व के दशकों में भारत में ही बहुसंख्यक हिंदू धर्म का चित्रण जातिवादी, उत्पीड़क, दकियानूस आदि जैसा प्रचलित हुआ है। यही विदेशों में भी प्रचारित किया गया। किसी पार्टी की सत्ता बनने से इसमें अंतर नहीं पड़ा, यह विविध घटनाओं से देख सकते हैं।1972 जनवरी के बाद कांग्रेस-कम्युनिस्ट परोक्ष संधि और हिंदू संगठनों के निद्रामग्न होने से संविधान के अनुच्छेद 25 से 31 को मनमाना अर्थ दिया जाने लगा। संविधान की उद्देशिका में जबरन सेक्युलर शब्द जोड़ने से लेकर दिनों-दिन विविध अल्पसंख्यक संस्थान, आयोग, मंत्रालय आदि बना-बना कर अधिकाधिक सरकारी संसाधन मोड़ने जैसे अन्यायपूर्ण कार्य होते गये। विडंबना यह कि इनमें कुछ कार्य स्वयं हिंदूवादी कहलाने वाले नेताओं ने किए। वे केवल सत्ता कार्यालय, भवन, कुर्सी आदि की चाह में रहे। निष्कर्ष : विश्व के किसी भी देश में चले जाएं तो यह साफ पता चलेगा कि बहुसंख्यकों की बातें हर तरफ से मानी जाती हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इजरायल चाहे कोई भी देश हो केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यक हमेशा ही अपरहैंड में रहते आए हैं। अगर राष्ट्रवादी सरकार केंद्र में नहीं रहती तो धीरे-धीरे यहां के बहुसंख्यक को का हाल वही होता जो पाकिस्तान में हिंदुओं का हुआ या बांग्लादेश में हो रहा है। आज आज देखिये कि कैसी विडंबना है अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार मिले हैं जबकि वह अधिकार भारत में रहने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं का होना चाहिए था। आज दुर्भाग्य की यह बात है कि बहुसंख्यक को को अपने अधिकार के लिए भारत में लड़ना पड़ रहा है। बहुसंख्यक बराबरी की मांग कर रहे हैं जो पूर्ववर्ती सरकारों ने उन्हें नहीं दिया, यह लोग बराबरी में आ कर रहना चाहते हैं। पता नहीं कितने षड्यंत्र होंगे, यह अधिकार भारत के बहुसंख्यक को को मिल भी पायेगा या नहीं। फिर भी यह स्पष्ट है कि नागरिकों, बहुसंख्यकों या अल्पसंख्यकों के किसी भी वर्ग द्वारा राज्य के खिलाफ किसी वास्तविक या कथित शिकायत की निगरानी देश की अखंडता और एकता के लिए हानिकारक होगी ही। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। 24 अक्टूबर 1945 को गठित संयुक्त राष्ट्र संघ इस वर्ष अपनी 77 वीं वर्षगांठ मना रहा है।193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र संघ का कार्य अंतरराष्ट्रीय शांति -सुरक्षा बनाए रखना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, मानवीय सहायता पहुंचाना,सतत विकास को बढ़ावा देना और देशों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन कराना आदि हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के अधिवेशन में इसकी प्रासंगिकता और संरचना पर जारी बहस फिर एक बार मुखर हुई। मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अलोकतांत्रिक संरचना पर फिर से प्रकाश डाला गया है। भारत , ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देश जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए सारी योग्यता रखते हैं, को इसकी स्थाई सदस्यता मिलनी चाहिए इस बात पर भी जोर दिया गया। गत 21 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कि अब समय आ गया है कि इस संस्था को और समावेशी बनाया जाए ताकि वो वर्तमान विश्व की आवश्यकताओं को और भी अच्छे ढंग से पूर्ण कर सके। बाइडेन ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर की रक्षा करनी चाहिए और और बिल्कुल विषम परिस्थितियों में ही वीटो का प्रयोग करना चाहिए, ताकि परिषद विश्वसनीय और प्रभावी बनी रहे। उनके अनुसार इन्हीं वजहों से अमेरिका सुरक्षा परिषद में स्थाई और अस्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ाने का समर्थन करता है। वहीं अमेरिका का धुर विरोधी देश रूस ने भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नए देशों को भी प्रतिनिधित्व देने की बात कही है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के दौरान कहा कि सुरक्षा परिषद की शक्तियों को कुछ देश कमजोर कर रहे हैं, जिसको लेकर रूस चिंतित है। इसमें कोई शक नहीं है कि सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह से आज की वास्तविकताओं के साथ समायोजित किया जाना चाहिए।हम संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियों में लोकतांत्रीककरण की संभावनाएं देख सकते हैं।खास तौर से जिसमें अफ्रीकी एशियाई और लातिन अमेरिकी देशों का व्यापक प्रतिनिधित्व हो। रूसी विदेश मंत्री ने कहा उनका देश भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र में मुख्य भूमिका में देखना चाहते हैं। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर जिनकी संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए भाषण की काफी प्रशंसा हो रही है, ने भी सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग को फिर से उठाया। हालांकि उन्होंने सीधे सीधे तौर पर इस पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने भारत को एक बेहद जिम्मेदार देश बतलाते हुए कहा कि यह बड़ी जिम्मेदारियां लेने के लिए तैयार हैं। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि दुनिया में दक्षिण (देशों) के साथ हो रहे अन्याय को सही तरीके से देखा जाये। भारत की अपील है कि महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर ईमानदारी के साथ गंभीर बातचीत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए और विकासशील देशों को संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रियात्मक रणनीति से रोका नहीं जाना चाहिए। ऊपर कही गईं बातें आदर्श रूप में तो ठीक हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यथार्थ कुछ और और ही है।जी - 4 देश (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में की मांग करता रहा है। ये चारों देश सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए एक दूसरे की दावेदारी का समर्थन करते हैं। लेकिन सफलता अब तक नहीं मिली है। इसका कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों को मिला वीटो का अधिकार ही है। सुरक्षा परिषद में किसी भी प्रस्ताव के पारित होने के लिए इसके पांच स्थाई सदस्यों के सकारात्मक मत की जरूरत होती है। इसलिए जब तक पांचों स्थाई सदस्य सुरक्षा परिषद में नये स्थाई सदस्यों को शामिल कर उसकी सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए सहमत नहीं होते, यह मुहिम सफल नहीं हो सकता। यदि भारत को स्थाई सदस्यता देने का प्रस्ताव सुरक्षा परिषद में रखा जाये तो लगभग तय है कि चीन उस पर वीटो कर दे। वैसे जी- 4 का विरोध क्षेत्रीय असंतुलन का हवाला देकर यूनाइटिंग फोर कंसेंसस नामक समूह कर रहा है, जिसके सदस्य पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, इटली और अर्जेंटीना हैं। अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हो या रूस यूक्रेन संकट, संयुक्त राष्ट्र संघ जिस तरह मूक दर्शक बना रहा, इसे देखते हुए आज इसकी प्रासंगिकता पर फिर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में इसका लोकतांत्रीकरण होना बहुत जरूरी है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। देश का अमृत काल और इस अवसर पर हर भारतीय को अपने विकास और संभावना के बारे में जानने समझने और विमर्श करने का काल। विशेषकर देश के युवाओं के लिये यह अमृत काल के 75 वें वर्ष से इसे 100 वर्ष के स्वर्णिम काल तक ले जाने का समय। इस अवसर पर मैंने अपने शिक्षण संस्थान में दो शिक्षाविद, काउंसलर मुरलीधर नंदकिशोर और योगदा सत्संग कॉलेज धुर्वा रांची के आइटी विशेषज्ञ अभिषेक कुमार को इन विषयों पर विमर्श करने के लिये आमंत्रित किया। इस अवसर पर आइटी के विशेषज्ञ अभिषेक कुमार ने बताया कि भारत सहित दुनिया के इतिहास में बीते तीन दशक इस लिहाज से खासे अहम हैं कि इसने व्यक्ति, अभिव्यक्ति और सभ्यता के साझे बूते के साथ आधुनिकीकरण की पूरी प्रक्रिया और आशय को ही बदल दिया। दिलचस्प यह कि यह सब जिस तेजी के साथ घटित हुआ उसके पीछे तकनीक की वह संजालीय ताकत है, जिसे हम इंटरनेट कहते हैं। दुनिया के बाकी हिस्सों के मुकाबले भारत में इस बदलाव का खास मतलब इसलिए है क्योंकि यहां समाज और संस्कृति का बहुलतावादी अस्तित्व पारंपरिक तौर पर कायम रहा है। हमारे विशेषज्ञ अभिषेक ने हमारी छात्राओं को महत्वपूर्ण जानकारी दी। इंटरनेट के ढाई दशक : उन्होंने बताया कि इसी साल अगस्त में इंटरनेट ने भारत में 25 साल पूरे कर किए हैंं। आज इंटरनेट इस्तेमाल करने के मामले में हमारा देश दुनिया में दूसरे स्थान पर है। दरअसल, बीते ढाई दशक से भारत जिस तरह डिजिटल मोड में आता गया है, उसमें बड़ी भूमिका निभाई है कंप्यूटर ने। कंप्यूटर से हमारा परिचय उदारीकरण के दौर से पहले का है। यह परिचय अपवाद से तब आम व्यवहार का हिस्सा बना जब 15 अगस्त 1995 को भारत को इंटरनेट का तोहफा मिला। विदेश संचार निगम ने देश का पहला इंटरनेट कनेक्शन दिया। 2010 तक आते-आते स्मार्टफोन की आमद ने हमारी निजी और सार्वजनिक दुनिया को एक साथ नियंत्रित करना शुरू कर दिया। आज आलम यह है कि देश में 70 करोड़ से ज्यादा लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और यह हमारे लिए पानी या आक्सीजन की तरह जरूरी हो गया है। अगर तकनीक इस कदर हावी हो जाए कि अनुभव और अभ्यास की उसकी रचनात्मकता बड़े पैमाने पर आभासी दुनिया में तैरने लगेगी तो फिर आधुनिकता और मनुष्यता का साझा हश्र क्या होगा। हमें इंटरनेट का उपयोग ही नहीं सदुपयोग करना चाहिए। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी में जानकारियों का संसार भरा है इसका जमकर उपयोग करें जानकारी बढ़ाने के लिये। यह एक फ्री बेवसाइट है जो भारत सरकार द्धारा उपलब्ध कराया गया है। स्मार्ट डिवाईस का उपयोग के पहले यह जानना आवश्यक है कि स्मार्ट डिवाईस वह है जो सेंसर और इंटरनेट के माध्यम से संचालित होता है इस कारण स्मार्ट कहा जाता है। इंटरनेट सहित आइटी के माध्यम का उपयोग अपने स्कील को बढ़ाने के लिये करना चाहिए न कि इसका दुरुपयोग दूसरे मनोरजंन के लिये होना चाहिए। आज समाज को स्मार्ट व्यक्तित्व की आवश्यकता है जो युवाओं के करियर के लिये सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षक से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक आपको आइटी के बेहतर उपयोग की जानकारी होनी ही चाहिए। कुल मिलाकर पढ़ लिखे होने का अर्थ अब स्मार्ट और आइटी के जानकार के रुप में की जा रही है। बेहतरीन ज्ञान और विषयों की जानकारी के लिये इंटरनेट का प्रयोग करें जिससे आप किसी भी दूसरी समस्या से भी बच सकेंगे। साथ ही आप इंटरनेट और मोबाइल पर सुरक्षा को लेकर अति सचेत रहें। क्या आपको मालूम है कि भले आपका फोन आॅफ लेकिन आपकी बात सुन रहा है। सोशल मीडिया के माध्यम ह्वाट्सअप, फेस बुक, ट्विटर, इस्टाग्राम सहित हर वेबसाइट और बैंकिग आन लाइन खरीद में आप सावधान रहें। अनजाने लिंक को भूल कर भी क्लिक न करें। सुरक्षा और सुरक्षित उपयोग विशेषकर लड़कियों के लिये बहुत ही आवाश्यक है। आज देश में हर दिन 300 से अधिक साईबर क्राईम रिकार्ड किये जा रहें हैं। चूंकि मामला वैश्विक है इसलिये अंतरराष्ट्रीय गिरोह भी सक्रिय है। आजादी के अमृतकाल पर आज 5 जी भी लांच हो रहा है इस कारण हमारी गति बढ़ेंगी तो सावधानी भी बढ़ जाना चाहिए। जीवन में कोरोना काल में हम टीवी स्क्रीन, कंप्यूटर या स्मार्टफोन पर देख रहे हैं, उससे जुड़ी विषयवस्तु या कंटेंट काफी मायने रखता है। मैं मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग और दुरूपयोग से प्रभावित छात्रों और अभिभावकों के व्यवहार को लेकर चिंतित रहती हूं। लेकिन कोरोना काल की मजबूरी ने कुछ नियमों में ढील देने को मजबूर किया। फिर भी मेरा मानना है कि शिक्षा पर एकाग्र होना और पढ़ाई के क्रम में मोबाइल सहित ई डिवाईस से दूर रहना सफलता के लिये जरूरी है। 50 लाख से ज्यादा वेब ठिकाने : आज दुनिया में जिन बड़ी कंपनियों का बोलबाला है इंटरनेट के बिना उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। गूगल, अमेजॉन, फेसबुक, नेटफ्लिक्स, पेटीएम जैसी सैकड़ों कंपनियों का पूरा कारोबार ही इंटरनेट पर खड़ा है। भारत में इंटरनेट पर नजर डालें तो 2005 तक देश में 6500 रजिस्टर्ड वेबसाइट थीं। आज कुल रजिस्टर्ड वेबसाइट की संख्या 50 लाख से ज्यादा हैं। निश्चित तौर पर आइटी का क्षेत्र से अधिकतम लाभ है तो अधिकतम सावधानी की भी आवश्यकता है। आजादी के अमृत काल पर हम शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में आइटी के उपयोग को स्वीकारते हैं लेकिन इसके बेहतर उपयोग और शैक्षणिक विकास के लिये इसके संतुलित उपयोग पर भी जोर देते हैं। हम प्रतिबद्ध है देश के 100 वें साल में देश को विकसित और सुरक्षित राष्ट्र बनाने के लिये। विशेषज्ञों के प्रति हमारा आभार और विशेष कार्यक्रम की निरंतरता के लिये धन्यवाद। (लेखिका उर्सूलाइन इंटर कॉलेज, रांची की प्रिसिंपल हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्ष 2030 तक भारत में शहरी आबादी 63 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। शहरीकरण के विभिन्न पहलुओं और देश के विकास में उसकी भूमिका की महत्ता बता रहे हैं अमित कपूर और विवेक देवरॉय। बीते दिनों भारत ने ब्रिटेन को पछाड़कर विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उपलब्धि हासिल की है। इसके साथ ही दुनिया की नजरें इस ओर टिक गई हैं कि अगले 25 वर्षों में भारत किस दिशा में आगे बढ़ता है। इन 25 वर्षों के दौरान भारत ने एक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य तय किया है। हालांकि, इस लक्ष्य की पूर्ति में एक निर्णायक पहलू यही होगा कि भारत में शहरीकरण किस रफ्तार से होता है। वैसे तो 1950 के दशक से ही भारत में शहरीकरण की गति में निरंतर तेजी का रुख कायम रहा है। भले ही इस मोर्चे पर वह अपने साथियों-समकक्षों से पिछड़ गया हो, किंतु भारत ने अपनी विकास रणनीति में नियोजित शहरीकरण को प्राथमिकता दी है। विश्व शहरीकरण संभावनाओं (वर्ल्ड अर्बनाइजेशन प्रॉस्पेक्ट्स के 2018 में संशोधन) के अनुसार 2010 से 2018 के बीच शहरीकरण में 2.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2022 तक भारत के शहरीकरण में 35.9 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था और वर्ष 2047 तक इसमें 50.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है। ब्रिक्स देशों की तुलना में इस मंद शहरीकरण के बावजूद अगले 25 वर्षों के दौरान अपनी विकास यात्रा में विभिन्न चुनौतियों का सामना करने को लेकर भारत की धारणा मजबूत बनी हुई है। विकास के वाहक के रूप में शहरों का कायाकल्प करने की दिशा में शहरीकरण की केंद्रीय भूमिका से भारत भलीभांति अवगत होने के साथ ही समग्र प्रगति के अपने लक्ष्य की पूर्ति के प्रति तत्पर भी है। हालांकि, जब शहरीकरण की गति बढ़ाने की बात आती है तो अनिच्छा उसमें उतनी बड़ी चिंता नहीं दिखती। इसमें बड़ी चिंता की बातें यही हैं कि देश के शहर तमाम समस्याओं के अंबार से जूझ रहे हैं। सीवेज शोधन, शहरी नियोजन, भूजल का गिरता स्तर और वायु गुणवत्ता में कमी सुगम जीवन की राह में बाधक बन रही हैं। इस संदर्भ में हम भारत की शहरीकरण यात्रा में दो तात्कालिक मुद्दों को चिह्नित कर सकते हैं। एक तो शहरीकरण का असममित या विषम प्रारूप और दूसरा नियोजित शहरीकरण। भारत के अधिकांश हिस्सों में आर्थिक विकास के साथ ही शहरीकरण होता गया। इस प्रकार कहें तो आर्थिक वृद्धि के साथ कदमताल करते हुए शहर विकसित होते गए। हालांकि, इसका परिणाम असममित-असंगत शहरीकरण के रूप में निकला। जिन राज्यों में तेजी से आर्थिक वृद्धि हुई, वहां शहरीकरण की रफ्तार भी तेज रही। जैसे कि 2022 तक केरल में 73.19 प्रतिशत शहरी आबादी हो गई, जिसके 2036 तक बढ़कर 96 प्रतिशत होने के आसार हैं। इसकी तुलना यदि असम और बिहार जैसे राज्यों से करें तो 2022 में असम में 15.4 प्रतिशत और बिहार में 12.2 प्रतिशत शहरीकरण का ही अनुमान है। यह लचर स्थिति ही कही जाएगी, जिसमें सुधार के आसार भी नहीं दिखते, क्योंकि 2036 तक भी असम के शहरीकरण में 17.16 फीसदी और बिहार में 13.2 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी का ही अनुमान है। वहीं दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे केंद्रशासित क्षेत्रों की बात करें तो इसी अवधि में वहां शत प्रतिशत शहरीकरण होने की उम्मीद जताई जा रही है। शहरीकरण का असममित स्वरूप भारत के शहरीकरण अभियान के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इस शिथिलता और भिन्नता की जड़ें भारत की उस अनूठी सामाजिक संरचना और नाते-रिश्तेदारियों में चित्रित होती हैं, जो आवाजाही को बाधित करती है। बहरहाल, क्या भारत इस रवायत को जारी रखना गवारा कर सकता है? भारत अपने अमृत काल में प्रवेश कर गया है और इस दौर में जब अपने अपेक्षित विकास के स्तर को प्राप्त पर उसका ध्यान केंद्रित है तो उसे अपने समकक्षों के यहां कायम शहरीकरण की रफ्तार से ताल मिलाने का सुस्पष्ट लक्ष्य भी बनाना है। हालांकि, उसे सूक्ष्म स्तर तक शहरीकरण के प्रभाव पर ध्यान देने की आवश्यकता है और यह राह जिलों तक जाती है, क्योंकि वही देश की व्यापक आर्थिक स्थानिकता को आकार देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो देश के कुल जिलों में शहरी जिलों की संख्या करीब 30 प्रतिशत है, लेकिन वही 45 प्रतिशत रोजगार सृजन और 55 प्रतिशत से अधिक पारिश्रमिक का भुगतान करते हैं। ये आंकड़े कॉम्पिटेटिवनेस रोडमैप फॉर इंडिया एट हंड्रेड यानी भारत के सौवें पड़ाव पर प्रतिस्पर्धी रोडमैप में सामने आए हैं, जो व्यापक स्तरीय और साझा वृद्धि की संकल्पना को आगे बढ़ाते हैं। वस्तुतः भारत को पिछड़े हुए जिलों पर ध्यान देने की आवश्यकता के साथ ही नियोजित शहरीकरण की रफ्तार को भी बढ़ाना होगा। इसके अतिरिक्त एक पहलू यह भी है कि आंतरिक प्रवासन के सीमित स्तर को देखते हुए शहरीकरण की एकतरफा-असंतुलित गति संसाधनों के अपर्याप्त वितरण की चिंता बढ़ाती है। देश में आंतरिक आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा हुआ है। इसके बावजूद देश में हुई पिछली जनगणना (2011) के आंकड़े यही दर्शाते हैं कि इस आवाजाही या पलायन का एक बड़ा हिस्सा कुछ विशिष्ट राज्यों या एक जिले से दूसरे जिले के उसी समान रुझान को दोहराता है। वर्ष 2030 तक देश में शहरी आबादी का आंकड़ा 63 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है तो पूरा जोर केवल और केवल शहरीकरण पर न होकर, बल्कि नियोजित शहरीकरण पर भी होना चाहिए। नियोजित शहरीकरण से यही आशय है कि शहर के डिजाइन, नियोजन और गवर्नेंस पर बराबर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। सुनियोजित ढंग से बसे हुए शहर संसाधनों के महत्तम वितरण और उपयोग के माध्यम से मूल्य वर्धन की ओर उन्मुख करते हैं। इसके अतिरिक्त, ये अपनी सतत वृद्धि और आर्थिक उत्पादकता के जरिये जीवन सुगमता और समृद्धि को प्रोत्साहन देते हैं, जिससे उनके रहवासी लाभ उठा सकते हैं। कई मायनों में शहरीकरण से जुड़ी मुश्किलें सतत उद्देश्यों और सामाजिक-आर्थिक वृद्धि के नजरिये से शहरों के ढांचे को नए सिरे से गढ़ने के शानदार अवसर प्रदान करती हैं, जिसका परिणाम अधिक स्थायित्वपूर्ण सामाजिक ढांचे के रूप में निकलता है। ऐसे में भारत को प्रमुख सुधारों को लक्षित करने की जरूरत होगी, जिसमें शहरों की शासन प्रणाली को नए सिरे से तैयार करने से लेकर उन्हें अधिक जन-केंद्रित बनाना होगा। हालांकि कुछ बड़े शहरों में जनाधिक्य के सैलाब को रोकने के लिए शहरीकरण की रफ्तार का विनियमन भी किया जाना चाहिए। साथ ही शहरीकरण की गति पर करीबी निगाह रखना भी आवश्यक है, क्योंकि यह देश में सामाजिक-आर्थिक विकास के सतत मार्ग निर्माण की प्रक्रिया में सहायक होगी। नियोजित एवं सार्वभौमिक-एकसमान शहरीकरण वाले दोहरे फोकस को भारत की शहरी गाथा को वैश्विक स्वीकृति दिलाने में लंबा सफर तय करना होगा। बहरहाल, यदि अब लक्षित एवं निरंतर प्रयास किये जाते हैं तो अगले दो दशक 2047 तक इन लक्ष्यों और उच्च सामाजिक प्रगति के स्तर की प्राप्ति में निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। मैंने महिलाओं के समूह से सवाल पूछा, क्यों आप गांव के पास के जंगल का निरीक्षण करने के लिए रोजाना जाती हैं और क्यों ऐसा बीते 30 सालों से कर रही हैं। क्यों यह आपके लिए इतना मायने रखता है? ऐसे सवाल पूछने पर महिलाओं ने मेरी तरफ आश्चर्य भरी नजर से देखा। मैं कोडलपाली में हूं। यह गांव ओडिशा के नयागढ़ जिले में है। मैं कोडलपाली गांव से मीलों तक फैला घना जंगल देख सकती हूं। यह गांव दूर-दराज के इलाके में है। इस गांव को आर्थिक नजरिये से गरीब की श्रेणी में रखा जा सकता है। गांव में पुराने तरीके के शौचालय हैं और नल से पानी की आपूर्ति नहीं होती है। गांव में एक स्कूल था लेकिन वह भी औचित्य की विचित्र नीति की भेंट चढ़ गया। इस नीति के कारण 25 से कम छात्रों वाले स्कूल के बच्चों को अब तीन किलोमीटर दूर के स्कूल तक पैदल जाना पड़ता है। लेकिन इस गांव और समीपवर्ती गांवों की महिलाएं पूरे उत्साह के साथ बीते तीन दशकों से गांव की सुरक्षा कर रही हैं। रोजाना बिना नागा किए चार महिलाओं का समूह जंगल का निरीक्षण करने के लिए जाता है। समूह यह देखता है कि किसी ने पेड़ को काटा तो नहीं है। समूह की महिलाएं अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहीं हैं। ये महिलाएं पेड़ काटने वालों से भिड़ जाती हैं और पेड़ काटने वालों की कुल्हाड़ी व साइकिल बेखौफ होकर जब्त कर लेती हैं। उन्होंने मुझे बताया कि जब्त किया गया सामान वापस करने के लिए वे जुमार्ना मांगती हैं। मेरी जहां तक नजर जा रही है, हरे-भरे जंगल ही है। यह बयां करता है कि जंगलों की सुरक्षा का काम अच्छे तरीके से किया जा रहा है। इस आदिवासी जिले के 217 गांव सटे हुए 60,000 हेक्टेयर जंगल की रक्षा कर रहे हैं। इन 60 गांवों में मुख्य तौर पर महिलाओं ने ही जंगल की सुरक्षा के लिए समितियों का गठन किया है। ये महिलाएं बारी-बारी से जंगल का निरीक्षण करने के लिए जाती हैं। इस क्षेत्र में बीते कई सालों से आदिवासी अधिकारों के लिए गैर लाभकारी संस्था वसुंधरा काम कर रही है। इन लोगों ने ब्लॉक और जिला स्तरों तक गांव की सुरक्षा समितियों का संघ बनाया है। इन समितियों में ज्यादातर कार्यकारी महिलाएं हैं। ये महिलाएं हर महीने बैठक आयोजित करती हैं। इन बैठकों में महिलाएं गांवों के आपसी झगड़े और अन्य मसले सुलझाती हैं। जब से जंगल की सुरक्षा समिति बनी है तब से उसमें शशि प्रधान है। उनकी उम्र 80 साल से अधिक है और लोग उन्हें शशि मौसी कहते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि उन लोगों के लिए जिंदा रहने के वास्ते जंगल जरूरी हैं। इसे समझना बहुत आसान है। हमारी सभी जरूरतें जंगल पूरी करता है। जंगलों से जलाऊ लकड़ी से लेकर इमारती लकड़ी मिलती है। खाने के लिए कंदमूल मिलते हैं। दवाई के लिए जड़ी-बूटियां मिलती हैं। इस बातचीत के दौरान उनकी युवा साथी कुंतला नायक ने भी तपाक से कहा कि कोविड -19 के दो खौफनाक सालों के दौरान उन्हें किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं पड़ी और गांव में कोई भी बीमार नहीं पड़ा। उन्होंने कहा, यह हमारे जीवन का आधार है। इसलिए हम इसकी रक्षा करते हैं। सभी पर जंगल की सुरक्षा के नियम कानून लागू होते हैं। इसके तहत रविवार को ही केवल जलावन लकड़ी एकत्रित की जाती है। हरे पेड़ों को काटा नहीं जाता है। मॉनसून के दौरान जंगल में मवेशियों को चरने नहीं दिया जाता है। जंगल से छोटे उत्पादों जैसे बांस और केडू (बीड़ी की पत्तियां) को केवल गांव के लोग ही एकत्रित करते हैं और किसी बाहरी व्यक्ति इसकी अनुमति नहीं है। बड़े स्तर पर किया गया अनुभव एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। कई सालों के संघर्ष के बाद बीते साल नवंबर में 24 गांवों के समुदाय को जंगल के अधिकार दिए गए हैं। जंगल के अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत यह उपबंध है कि गांव के लोग जिस जंगल का पारंपरिक रूप से उपयोग कर रहे हों, उसके एक छोटे से हिस्से (पैच) के संसाधनों व संरक्षण का अधिकार इन लोगों को दिया जा सकता है। जनजातीय मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक 45 लाख हेक्टेयर के लिए समुदायों को अधिकार दिए जा चुके हैं। इन समुदायों को सरकार के अधीन जंगल का 8 फीसदी क्षेत्र अधिकार दिया गया है। मंत्रालय के अनुसार इसके तहत सभी सामुदायिक अधिकार हैं। इनमें जल जल निकायों या लघु वन उपज के उपयोग के अधिकार भी शामिल हैं।इस मामले में जंगल की भूमि के प्रबंधन का मामला सामूहिक रूप से दो गांवों कोडलपाली और सिंदूरिया को दिया गया है। इस पत्र के अंतर्गत लगभग 300 हेक्टेयर जमीन का प्रबंधन दिया गया है। गांव वालों को अधिकार मिल गया है कि वे जंगल के लघु उत्पादों को एकत्रित, प्रसंस्कृत, इस्तेमाल और बेच सकते हैं। इसके तहत इन लोगों को मूल्यवर्धन, भंडारण और गांव के अंदर व बाहर उत्पादों को परिवहन करने का अधिकार भी मिला है। इससे स्पष्ट रूप से पासे पलट गये हैं। इसका मतलब यह है कि गांव वाले अब सुरक्षा मुहैया कराने के अगले चरण की ओर आगे बढ़ेंगे। इसमें हरित संपदा से हरित नौकरियों का सृजन होगा। इससे हरित अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ेगा। ग्रामीण को पेड़ के विविधता वाले क्षेत्र का प्रबंधन करने के लिए योजना बनाने की जरूरत होगी। इससे उन्हें केवल इमारती लकड़ी ही नहीं मिलेगी बल्कि उन्हें जंगल की अन्य समृद्धि भी मिलेगी। यह उनके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद रहेगी। अनुभव यह बताता है कि पेड़ तब ही जिंदा रहे पाते हैं, जब उसमें गांव का समुदाय शामिल रहता है या उसका जंगल पर नियंत्रण रहता है। यह अनुभव कोडलपाली में जंगल के नियंत्रण के मामले में खरा साबित होता है। ऐसा होने पर ही हम लकड़ी पर आश्रित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सकते हैं। हमारा पर्यावरण खतरे में है, ऐसे में असलियत में हमारे लिए संभावनाएं कहां हैं। हमें मालूम है कि विश्व को हरियाली (ग्रीन कवर) बढ़ानी होगी। इससे हम कार्बन डाइआॅक्साइड के दायरे पर लगाम लगा पाएंगे। कार्बन डाइआॅक्साइड को नियंत्रित करने के प्राकृतिक तरीके लोगों की जुबान पर आ गए हैं। लेकिन कोडलपाली, सिंदूरिया और आसपास के गांवों की महिलाओं का कहना है कि ये जंगल उनके घर हैं। वे जंगलों पर आधारित अर्थव्यवस्था ने केवल अपने भविष्य बल्कि पूरी दुनिया के लिए बना सकती हैं। (लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं।)
टीम एबीएन, हजारीबाग (रंजन चौधरी)। शक्ति और भक्ति की देवी आदिशक्ति मां दुर्गा के पूजनोत्सव का त्योहार शारदीय नवरात्र चल रहा है। नवरात्र के पावन मौके पर मां दुर्गे के विभिन्न स्वरूपों की हम पूजा करते हैं। नारी को नारियानी मानकर नौ कन्या का आवाहन करते हैं और नारी सम्मान का संकल्प लेते हैं। मां दुर्गे से पीड़ित और शोषितों के कष्टों को निवारण करने के साथ समाज के कुंडित मानसिकता वालों, पापियों, दुराचारियों को सतमार्ग पर लाने की आराधना करते हैं। बावजूद इसके नवरात्र के पावन अवसर पर हजारीबाग जिले की दो यौवन गर्भवती महिलाओं की निर्मम मौत ने हर किसी के भक्तिमय मन को झकझोर दिया। नवरात्र शुरू होने के दूसरे दिन मंगलवार को जिले के बड़कागांव प्रखंड की नापोखुर्द गांव से एक खबर आई जिसने हर किसी को दहला दिया। यहां एक 20 वर्षीय नवविवाहिता को उसके ही पति ने गोली मार दी। मौत का कारण दहेज की मांग बताया जाता है। नवविवाहिता गर्भवती थी। गर्भ में पल रहे बच्चे की भी मां के साथ ही मौत हो गई। हालांकि नापोखुर्द के ग्रामवासियों ने इस घटना का सामाजिक रूप से पुरजोर विरोध कर आरोपी के घर पर जमकर प्रदर्शन कर भारी रोष भी व्यक्त किया। ठीक इसी प्रकार की घटना नवरात्र के छठे दिन शनिवार को कटकमदाग प्रखण्ड क्षेत्र से प्रकाश में आया, जिसमें बेस गांव में एक 7 माह की गर्भवती महिला की बेरहमी से हत्या कर दी गयी। यह महिला पहले घर से गायब होती है और फिर काफी खोजबीन के बाद गांव के समीप छोटी नाला जंगल में इनका शव मिलता है। इनके शव में सिर व दोनों आंखों पर गंभीर चोट के निशान देखा गया। इस घटना में भी मौत का कारण दहेज की मांग बताया जाता है। वर्तमान समय में भी दहेज लोभियों की लालच और प्रताड़ना का शिकार न जाने कितनी महिलाएं होती होंगी। दहेज के कारण इन दो नवविवाहित गर्भवती की असमय मौत और उनके गर्भ में पल रहें बच्चे को धरती पर कदम भी नहीं रखने देने वाले मनुष्य रूपी हैवानों को ईश्वर कभी माफ नहीं करेगा। समाज को भी ऐसी वीभत्स और दर्दनाक घटनाओं पर सामाजिक मंथन करने की जरूरत है, ताकि ऐसी कुत्सित घटना की पुनरावृति समाज में न हो। इन दोनों मृतक महिलाओं को देखने के बाद हम आदिशक्ति, मां जगदम्बा देवी दुर्गा से बस यही अराधना करते हैं की समाज में सभी को सद्बुद्धि दो मां, ताकि कोई बेकसूर नारी असमय काल के गाल ना समां सकें, कोई गर्भ में पल रहा बच्चा अपनी मासूमियत धरती पर कदम रखकर मां के आंचल तले बीता सके, समाज में महिलाओं के प्रति अत्याचार व क्रूरता कम हो सकें। कोई घर-आंगन किसी नारी की रक्त से रंजिश न हो, कोई परिवार बिखर कर बर्बाद न हो जायें। (लेखक हजारीबाग सदर विधायक के मीडिया प्रतिनिधि हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिव कुमार मिश्रा)। भारत में बहुसंख्यक आबादी अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है लिहाजा ग्रामीण विकास को भारत की प्रगति की कहानी का पर्याय माना जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों का विकास हमेशा से हमारी प्राथमिकता में रहा है डिजिटलीकरण की शुरुआत के बाद ग्रामीण क्षेत्र समावेशी और संवहनीय विकास के दौर से गुजर रहे हैं। जन धन योजना जैसी योजनाएं ग्रामीण भारत में अत्यंत सफल रही हैं। कृषि की गतिविधियों का आधुनिकीकरण हो रहा है और इनमें पर्यावरण के अनुकूल तौर तरीके अपनाए जा रहे हैं। प्रौद्योगिकी से ग्रामीण विकास को बल मिला है। प्रौद्योगिकी समर्थित ग्रामीण विकास के लिए सरकारी योजनाएं:- 1. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी उन्नयन(तारा) - इस योजना को कौशल संवर्धन शिक्षा और विकास कार्यक्रम के तहत चलाया गया है ग्रामीण और अन्य पिछड़े क्षेत्रों में विज्ञान आधारित स्वयंसेवी संगठनों और क्षेत्रीय संस्थाओं को दीर्घकालिक बुनियादी समर्थन मुहैया कराने में इसकी अहम भूमिका है। यह योजना इन संस्थाओं को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी भवन केंद्रों और सक्रिय क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं के तौर पर बढ़ावा देती और पारितोषिक करती है ताकि यह आजीविका सृजन और सामाजिक लाभ के लिए प्रौद्योगिकीए समाधान और प्रौद्योगिकियों की प्रभावी डिलीवरी मुहैया करा सकें। 2. आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन - इसका उद्देश्य भारत की समेकित डिजिटल स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना के लिए जरूरी ढांचे का विकास है। यह स्वास्थ्य सेवा उद्योग में विभिन्न पक्षों के बीच दूरी को खत्म करने के लिए डिजिटल हाईवे का इस्तेमाल करती है। 3. आयुष्मान भारत स्वच्छ खाता (आभा) - इसके जरिए भागीदार स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के बीच सुरक्षित और ज्यादा प्रभावी ढंग से डिजिटल स्वास्थ्य कार्ड का आदान प्रदान किया जा सकता है। एबीडीएम में शामिल होने और डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड रखने के इच्छुक भी व्यक्ति को सबसे पहले अपना आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता बनाना होगा। व्यक्ति की पहचान और प्रमाणन के बाद उसकी सहमति से ही उसके स्वास्थ्य कार्ड को विभिन्न प्रणालियों और हित धारकों को मुहैया कराया जाता है। 4.ई श्रम - इस प्लेटफार्म को श्रम और रोजगार मंत्रालय ने उन असंगठित कामगारों के लाभ के लिए बनाया है। जो कर्मचारी राज्य बीमा निगम या कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के सदस्य नहीं हैं श्रमिक योजना में शामिल होने और ई श्रम कार्ड हासिल करने के अनेक लाभ हैं इसके जरिए सरकार के सामाजिक सुरक्षा के उपायों से कामगारों की मदद की जाती है। 5. राष्ट्रीय ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क - सभी राज्यों में राजधानियों जिला मुख्यालयों और प्रखंड स्तर तक ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी मुहैया कराई गई है। यह काम भारत संचार निगम लिमिटेड रेलटेल और पावर ग्रिड जैसे सार्वजनिक उपक्रमों के फाइबर ओके उपयोग से किया जा रहा है। 6. सार्वजनिक सेवा केंद्र - या डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत मिशन के तौर पर चलाई जा रही एक परियोजना है सीएससी आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के लिए पहुंच के बिंदु के तौर पर काम करता है गांवों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले नागरिक इसके जरिए समाज कल्याण स्वास्थ्य वित्त शिक्षा कृषि और व्यवसाय से संबंधित कार्यक्रमों और उपभोक्ता सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। इसको देशव्यापी नेटवर्क क्षेत्रीय भौगोलिक भाषाई और सांस्कृतिक विविधताओं की जरूरतों को पूरा करता है। 7. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम - यह देश को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और डिजिटल तौर पर सशक्त समाज में बदलने के लिए प्रमुख पहल है। इसमें तीन आवश्यक क्षेत्र सभी नागरिकों के लिए उपयोगिता के रूप में डिजिटल अवसंरचना मांग पर सेवाएं तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी के माध्यम से नागरिकों का सशक्तिकरण शामिल हैं। 8. डिजिटल इंडिया भूमिका रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम किस केंद्रीय योजना का उद्देश्य से जमीन के रिकार्डों की मौजूदा समानता ओं का इस्तेमाल कर एक शाम उचित है। समेकित भूमि सूचना प्रबंधन प्रणाली विकसित करना है इसमें विभिन्न राज्य अपनी विशेष आवश्यकताओं को भी जोड़ सकते हैं। (लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता व पलामू जिला प्रभारी हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ए. सानी)। वेदांता ग्रुप ने घोषणा की है कि वह भारत में सेमीकंडक्टर, डिस्पले उत्पादन इकाई और सेमीकंडक्टर असेंबलिंग-कम-टेस्टिंग सुविधा गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थापित करेगा। इस घोषणा ने दो वजहों से ध्यान खींचा है। निवेश की मात्रा (1.54 लाख करोड़ रुपये) और नई इकाई लगाने के लिए गुजरात का चुनाव, जबकि पहले महाराष्ट्र में लगाने के संकेत थे। तथापि, अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वेदांता ने ताईवान के हॉन हाइ टेक्नोलॉजी ग्रुप (फॉक्सकॉन) को बतौर साझीदार जोड़ा है। फिलहाल ताईवान दुनियाभर में सेमीकंडक्टर उत्पादन का धुरा है और कोविड महामारी से चिप्स आपूर्ति व्यवधान ने वैश्विक स्तर पर अनेकानेक उद्योगों का उत्पादन ठप कर दिया था। इस आपूर्ति शृंखला भंग और विभिन्न क्षेत्रों पर इसके असर ने दुनिया को सेमीकंडक्टर आपूर्ति में केवल एक-दो स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता की हकीकत से जगा डाला, चाहे यह कार हो या वॉशिंग मशीन में प्रयुक्त सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट। इसलिए मुख्य उपभोक्ता वस्तु निर्माताओं ने ताईवानी इकाइयों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने का मन बनाया। मौजूदा चिप डिजाइनिंग के डिसएग्रिगेटेड मॉडल और फैब्रिकेशन पर पुनर्विचार किया जा रहा है। जुलाई माह में, अमेरिका सरकार ने चिप्स (क्रिएटिंग हेल्पफुल इन्सेंटिव टू प्रोड्यूस सेमीकंडक्टर्स) एक्ट से अमेरिकी कंपनियों को 52 बिलियन डॉलर की सब्सिडी देकर सेमीकंडक्टर निर्माण, अनुसंधान एवं विकास प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया है। यूरोपियन यूनियन भी चिप उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना बना रही है। उधर दक्षिण कोरिया ने 540 बिलियन डॉलर सब्सिडी योजना से दुनिया में सेमीकंडक्टर निर्माण का मुख्य केंद्र बनाने की शुरुआत की है। भारत के सेमीकंडक्टर मिशन में सरकार चिप एवं डिस्पले निर्माण इकाइयों को 10 बिलियन डॉलर (76000 करोड़ रुपये) सब्सिडी देगी। निजी कंपनियों को उत्पादन इकाई स्थापित करने में आए खर्च का 50 फीसदी तक अनुदान मिल सकता है। भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण की यात्रा वर्ष 1974 में पंजाब से शुरू हुई थी, जब इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग ने महसूस किया कि देश के अंदर सेमीकंडक्टर डिजाइन और निर्माण होना चाहिए, पहले-पहल विदेशी मदद से सही। केंद्रीय मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बाद सेमीकंडक्टर कॉम्पलैक्स लिमिटेड (एससीएल) बनाना स्वीकृत हुआ। 1976 में विशेषज्ञ पैनल ने दो संभावित जगहें सुझाईं झ्र मोहाली और मद्रास। इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की तरजीह हवाई अड्डे की सुविधा वाले मद्रास पर थी। किंतु पंजाब के मुख्यमंत्री जैल सिंह को भनक लगी और उन्होंने प्रधानमंत्री पर जोर डालकर निर्णय मोहाली के पक्ष में करवा लिया। हालांकि इंदिरा गांधी ने इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अधिकारी अशोक पार्थसारथी को मुख्यमंत्री जैल सिंह को यह समझाने का काम सौंपा कि इस इकाई से पंजाब के स्थानीय लोगों को शायद ही रोजगार मिले क्योंकि इसमें बहुत अधिक प्रवीणता की जरूरत होती है। लेकिन जैल सिंह अड़े रहे और मोहाली को देश की पहली सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई मिली। इस परियोजना पर 15 करोड़ रुपये लगे थे और 1983 में उत्पादन शुरू हुआ, अमेरिका की माइक्रोसिस्टम्स इन्कॉपोर्रेशन से प्राप्त तकनीक से चिप्स बनने लगीं। लगभग उसी समय, एससीएल की तरह, किंतु स्वतंत्र सेमीकंडक्टर डिजाइन गतिविधियां भारत में शुरू हुईं। इसकी अगुवाई आईआईटी कानपुर से पढ़े प्रभाकर गोयल ने की थी, जिन्होंने अमेरिका में बतौर चिप डिजाइनर अच्छा-खासा नाम कमाया था। उनके स्टार्टअप गेटवे डिजाइन आॅटोमेशन (जीडीए) की विशेषज्ञता चिप्स उत्पादन में प्रयुक्त टेस्टिंग टूल वेरीलॉग बनाने में थी। इसने करोड़ों डॉलर्स की आमदनी करवाई और गोयल के ग्राहकों में जापान और ताईवान के उच्चतम चिप निर्माण उद्योग थे। चूंकि वेरीलॉग बनाने में कुछ कामों जैसे कि लाइब्रेरीज में बहुत श्रम खपता था, इसलिए उन्होंने इकाई भारत में स्थानांतरित करने की सोची और इंजीनियरों की एक छोटी टीम बनाकर 1985 में नोएडा में उत्पादन शुरू किया। चार साल बाद सिलिकॉन वैली, अमेरिका की कंपनी काडेन्स डिजाइन सिस्टम्स ने जीडीए का अधिग्रहण कर लिया, इसमें नोएडा वाली इकाई भी थी। इस तरह भारत में काडेन्स के रूप में अग्रणी कंपनी का आगमन हुआ। इसके बाद दो और सेमीकंडक्टर डिजाइन कंपनियों, टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स और एसटी माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स ने 1980 के दशक के आखिर में भारत में अपने दफ्तर खोले। आगे लगभग एक दशक में इंटेल समेत उच्चतम कोटि की 25 चिप्स डिजाइन कंपनियों में 17 ने भारत में केंद्र खोले और देश चिप्स डिजाइनिंग क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति बन गया। बढ़ती मांग पूरी करने हेतु अमेरिकी और यूरोपियन सेमीकंडक्टर कंपनियों ने भारतीयों की डिजाइन प्रतिभा और ताईवान में व्यापक स्तर की उत्पादन क्षमता का फायदा लेकर चिप्स निर्माण किया। लेकिन दूसरी ओर, भारत चिप्स उत्पादन में पिछड़ता गया क्योंकि एससीएल में उत्पादन तकनीक को अपग्रेड करने की प्रक्रिया के दौरान भयंकर आग लग गई। नए सिरे से सबकुछ बनाने में लंबा वक्त लगा और कंपनी पूरी तरह उबर नहीं पाई। हालांकि भारत पर लगे तकनीक-हस्तांतरण प्रतिबंध वाले काल के दौरान सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे कि अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में प्रयुक्त सेमीकंडक्टरों की आपूर्ति करती रही। अब भारत ने एससीएल को व्यावसायिक इकाई की तरह से चलाने का फैसला लिया है। किंतु इसके लिए धन, तकनीक और नेतृत्व प्रदान करने की जरूरत है। शुरुआत काफी पहले करने के बावजूद भारत सेमीकंडक्टर लहर का पूरी तरह फायदा उठाने से चूक गया। गैरवाजिब निवेश, कमजोर स्वदेशी मांग, वैश्विक धंधे की बदलती गतिशीलता इत्यादि से हम पिछड़ते गए। इस क्षेत्र में तकनीक बहुत तेजी से बदलती है और इससे कदम मिलाना एक सामरिक जरूरत है। वेदांता की प्रस्तावित इकाई 28 नैनो नॉड्स तकनीक पर आधारित होगी। इससे सीपीयू, ग्राफिक प्रोसेसर्स, नेटवर्क चिप्स, स्मार्टफोन्स, कार और इंटरनेट में प्रयुक्त होने वाली चिप्स बनाई जा सकेंगी। हालांकि ताईवान और दक्षिण कोरियाई कंपनियां पहले ही कहीं ज्यादा सूक्ष्म नॉड्स यानि 3 नैनोमीटर पर काम कर रही हैं। एससीएल ने काम 5 माइक्रॉन्स (5000 नैनोमीटर) से शुरू किया था और स्वदेशी संवर्धन तकनीक से 1.2 माइक्रॉन (1200 नैनोमीटर) करने की प्रक्रिया चली हुई थी, जब आग लगी। उस समय विश्व की अग्रणी चिप्स निर्माण इकाई केवल एक पीढ़ी आगे यानी 0.8 माइक्रॉन (800 नैनोमीटर) पर काम कर रही थी। अगले एक दशक से कम समय में एससीएल ने विदेशी तकनीक अपनाई और तकनीक-अंतर कम होता गया क्योंकि आरंभ से ही इसका अपना अनुसंधान एवं विकास विभाग बहुत सुदृढ़ था। इस विधा में किसी इकाई का खुद की तकनीकी क्षमता के बिना बाजार की दौड़ के मुताबिक चाल बनाए रखना संभव नहीं है। इसके लिए बहुत बड़े स्तर पर अनुसंधान एवं विकास पर निवेश की आवश्यकता होती है। फिलहाल वेदांता का प्रस्तावित संयुक्त उपक्रम अनुसंधान एवं विकास को लेकर खामोश है। अभी यह ज्ञान नहीं है कि क्या इसमें किसी तरह का तकनीक-हस्तांतरण है या नहीं। उम्मीद करें कि भारत दूसरी बार मौका नहीं चूकेगा। (लेखक विज्ञान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं।)
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