एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कुमार गौरव, कोडरमा)। दुनिया लोकतंत्र को स्वार्थ के लिए हथियार बनाकर इस्तेमाल करना बंद करे। क्योंकि इससे वैसे राष्ट्र अपनी तात्कालिक स्वार्थ को भले ही पूर्ण कर लेते है। लेकिन इसका खामियाजा पूरे विश्व को भुगतना पड़ता है। ‘संप्रभुता’ लोकतंत्र की न्याय की रक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र है। लेकिन ताना शाह हियो ने लोकतंत्र को अपनी जागीर बना, वही ब्रह्मास्त्र से कुकर्म करते चले आ रहे हैं। जब भी विश्व में तृष्टीकरण की चाल चली जाती है। लोकतंत्र कमजोर हो जाती है। उस बकरी की बच्चे की तरह जो दो चार बूंद दूध की भूखी है मगर उसका मेमीयाना सुनकर ऐसा लगता है मानो उसकी सांसें अब छूट चली। और जब ऐसा होता है, तो वैसे राष्ट्र जो लोकतंत्र को अपनी आत्मा बना बैठे हंै वहां की शासन व्यवस्था वेंटिलेसन पर चली जाती है। अराजकता इतनी बढ़ जाती है कि वहां की सरकारें भले कुछ न कहे लेकिन गृह युद्ध एैसी स्थितियां बन जाती है। वैसे राष्ट्रों का आवाम जो लोकतंत्र की ईबादत लिखने में सकारात्मक कर्म पथ रहते हैं। उन्हेें लोकतंत्र से घिन्न आने लगती है। लोकतंत्र की धज्जियां कुछ राष्ट्र ही उड़ाते हैं, मगर इसकी कीमत लोकतांत्रिक हर राष्ट्र को चुकानी पड़ती है। ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध पर गौर कर लीजिए। दुनिया के हुकुमों की हकीकत दूध का दूध, पानी का पानी की तरह साफ हो जायेगी। द्वितीय विश्वयुद्ध में दुनिया दो गुटों मे पूर्ण रुपेण बंट चुकी थी। अमेरिका इसमें तटस्थ थी। क्योंकि अमेरिका की फौज युद्ध में शामिल नही थी। यह एक पक्ष थी अमेरिका की। मगर यह तो सिर्फ तृष्टीकरण के तरीके थे। अगर न्याय की दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह अमेरिका की दादागिरी तथा धौंस थी। जिसे बिहार की एक लोकउक्ति चोरी भी सीना जोरी भी को चरितार्थ करती है। अमेरिकी फौज लड़ाई में उतरी नहीं। मगर अमेरिका की दुलरुआ राष्ट्र विश्व युद्ध मे टिके हुए थे। उसका कारण था अमेरिकी हथियार। अमेरिका शुरुआती युद्ध में न उतरकर भी युद्ध लड़ रही थी क्योंकि अमेरिका अपने राष्ट्रों को हथियार मुहैया करा रही थी, तो क्या ये नहीं हुई कि अमेरिका तो शुरू से ही चाहता था कि विश्व में एक ग्लोबल युद्ध हो, जिस युद्ध मे लोकतंत्र के पावर सेन्टर पूरा पश्चिमी राष्ट्र युद्ध में लिप्त हो जाए। जिससे विश्व में जो सबसे ज्यादा उपनिवेश पश्चिमी राष्ट्रों के अधीन है वहां उनकी साख टूटे। अराजकता तथा युद्ध की विभीषीका से ऊब कर उपनिवेश पश्चिमी राष्ट्रों के खिलाफ बगावत कर दे। उनसे अपनी सारी पिंड छुड़ा ले। ताकि पश्चिमी राष्ट्रों के प्रोडक्ट का उपनिवेशों पर एकाधिकार है वह समाप्त हो। ताकि उस बाजार की जरुरत अमेरिका पूरा कर अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनायी जा सके। अमेरिका की कूटनीति जानती थी कि जब तक ये राष्ट्र ग्लोबल युद्ध में फंसेंगे नहीं, तब तक इनका बाजार टूटेगा नहीं। क्योंकि उस समयावधि में पश्चिमी राष्ट्रों के बाजार जहां थे वहां उनका एकल साम्राज्य था। पश्चिमी राष्ट्र उस अवधि में अपने अपने बाजार में विकल्प के रूप में दूसरा कहीं रहने ही नहीं दिया। अमेरिका अच्छे से जानती था कि अगर उसे विश्व के सबसे बड़े बाजार पर अपना नियंत्रण करना है तो पश्चिमी राष्ट्रों को युद्ध में धकेल दो। स्वत: पश्चिम की हर राष्ट्र का बाजार उसके पास चला आयेगा। द्वितीय विश्वयुद्ध काल में पष्चिमी राष्ट्रो में भी आपस में फूट थी। वे अपनी ताकत तथा पैसे की घमण्ड में इतने मतवाले हो गए थे कि किसी भी राष्ट्री की सम्प्रभुता उनकी जूतों के नीचे तथा मानवता उनके गुलाम हुआ करती थी। अमेरिका इसका जबरजस्त फायदा उठाया। उन राष्ट्रो को खूब हथियार देकर खूब पैसा कमाया। नौबत यहां तक आ गई कि वह पष्चिम जो दुनिया की भगवान थी, सबसे ज्यादा ताकतवार थी उसे भी बैसाखी की जरुरत होने लगी। अमेरिका अपनी कूटनिति से पष्चिमी राष्ट्रो की सच्च हमदर्द बन उनके बाजारो पर कब्जा करता गया और मानव की नरसंहार करने वाली हथियार भी उन राष्ट्रों को बेचकर धन भी खूब कमाया। और पष्चिम उसे अपना मित्र मानने लगे जो आज भी जारी है मगर किसी वक्त दुनिया पर राज करने वाले पष्चिम अमेरिका की कूटनिति के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया। दुनिया के वे मुल्क जो द्वितीय विश्वयुद्ध में दुसरे खेमे के थे। उन्होने युद्ध शुरू अपने विरुद्ध राष्ट्रो की सैन्य, आर्थिक क्षमता जान कर अपनी रणनिति बनायी थी उसकी वह नीतियां जीत से दूर हो रही थी। उसका खास कारण था अमेरिका के हथियार ,जो उस जमाने में दुनिया के सबसे आधुनिक हथियार थे। अच्छा चूंकि अमेरिका युद्ध से दूर थी इसलिए दूसरे खेमे की राष्ट्र अमेरिका पर सीधा हमला नही कर पा रहे थे। लेकिन इससे उन्हे भारी नुकसान हो रहा था। अमेरिकी हथियारें जापान को ज्यादा नुकसान दे रही थी। इसे जापान पचा नही पाया। हक्कीमत भी थी कि युद्ध मे हथियारों को मुहैया कराने वाला राष्ट्र भी युद्ध का हिस्सेदार होता है। जापान अमेरिका के पर्ल हर्बल मे वायु सेना पर कार्यवाही कर दी। जापान की इस हमले में 50-55 हजार फैजी तथा अमेरिका के नागरिक मारे गए। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका इसे युद्ध के अन्दर होने वाली हवाई हमला ना कहकर इसे नरसंहार का नाम देकर विश्व की सहानभूतियाँ बटोरने की कोशिश की जिसमें अमेरिका सफल भी हुआ। अब तो द्वितीय विश्वयुद्ध जंग ना होकर क्रूरता की हर हद पार कर दी। और अमेरिका जापान की हिरोषिमा तथा नागासाकी पर परमानु बम गिराकर लोकतंत्र की तृष्टीकरण की बहुत बड़ी विसात बिछा दी। इससे जापान का ही नुकसान नही हुआ बल्कि समुचे विश्व में परमानेन्ट असुरक्षा, अराजकता की डर बैठ गई। हर राष्ट्रो में हथियरों की होड़ हो गई। और पृथ्वी जो ब्रँम्हाण्ड में एक ही है उसे हजारो बार मिटा देने की हथियारे बना ली गई। काश जितने पैसे मानव नाश पृथ्वी विनाश के लिए बहाई गई। उतने पैसे से तो यही हमारी पृथ्वी स्वर्ग सी सज जाती। मगर एैसा किसी ने नही किया। अमेरिका का परमाणु भले ही तत्कालिक विश्वयुद्ध बन्द करा दी, मगर दुनिया मे परमाणु होड़ बढ़ गई। हर राष्ट्र अपनी आजादी को सुरक्षा कवच परमाणु का देना चाहने लगी। जबकि परमाणु की विविषिका जापान ही बता सकती है। जब पर्ल हर्बल नरसंहार थी तो हीरोसीमा तथा नागासाकी क्या थी। जब हत्या का इंसाफ हत्या है और जब नरसंहार का बदला नरसंहार है तो इण्डिया एैसे इन्साफ करने वाले अमेरिका से अपना इन्साफ दिलाने की मांग करती है। अमेरिका जिसके गोद में लोकतंत्र है वह साकारात्मक सोच रख इण्डिया का हिसाब करे। क्योंकि विश्व की सबसे पहले तथा सबसे सबसे बड़ी नरसंहार तैमुरगल ने की तैमुरगल ने 12वी सदी में ही एक लाख आवाम की हत्या कराई थी। अच्छा चलो यह पूरानी बाते है नई बाते आधुनिक विश्व की करते है। आधुनिक विश्व में अंग्रेजो ने इण्डिया के जालियावाला बाग में आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी नरसंहार कराई। आप हमारी ये इन्साफ दिला दे। यकीन मानिए इंडिया भगवान की तरह अमेरिका की पूजा करेगी। अगर आप दिला नही सकते तो आप इण्डिया को इंसाफ ले लेने के लिए आजाद छोड़ दे। आप लोकतंत्र के आइडियल है आपकी इन्साफ सर आँखों पर तो क्या मंगोल तथा ब्रिटेन पर इण्डिया को भी परमाणु बम पटक कर अपनी नरसंहार का बदला लेना चाहिए। लेकिन देखिए इण्डिया के संस्कार इण्डिया कभी भी परमाणु उपयोग की बात नही करती तथा उस नरसंहार को माफ कर मानव के लिए मानवता के लिए, आगे बढ़ गई है। और इस नरसंहार को उनकी नीयति तथा अपनी कुबार्नी मानकर अपना वतन सुन्दर वतन, सभ्य वतन, निष्ठावान वतन गढ़ने में लगी है। इण्डिया लोकतंत्र की रास्तो मे बहुत दूर निकल गई है। अगर लोकतंत्र के दिशा की ओर देखी जाए, तो इतना हो जाने के बाद भी इण्डिया ऊगता सूरज की तरह हर अधकार को रौशन दान कर रही है। जय हिन्द...
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कुमार गौरव)। आधुनिक विश्व में चीन आज भी अपने पूर्वजों से सीख नहीं ली है। आज की ग्लोबल व्यवस्था में भी चीन अपने पूर्वजों की तरह लुटेरा, सनकी तथा ताकत की तानाशाही की प्रवृति से उबर नहीं पायी है। उन्हें आज भी दुनिया बहसी, दरिंदे तथा चीन की तानाशाही मिटाने के लिए एकजुट है जैसा लगता है। जबकि चीन को याद होना चाहिए कि सिर्फ वह ही अकेला राष्ट्र नहीं जो अपनी आजादी में रक्त बहाया हैं। अगर देखा जाए तो विश्व में आजादी के लिए कोई राष्ट्र सबसे ज्यादा कुर्बानियां दी है। वह अकेला राष्ट्र है इंडिया। अगर चीन के अंदर सचमुच बर्बरता तथा तानाशाही के अलावा राष्ट्रभक्ति भी जीवित है तो वह इंडिया की इतिहास पढ़े। पता चल जायेगा कि आजादी के लिए किसने सबसे ज्यादा लहू का महासागर बहाया था। आप इसे नहीं समझ सकते, क्योंकि आपकी राष्ट्रभक्ति के दायरे ऐसे हैं। वहां से सिर्फ अपना राष्ट्र ही दिखता है। बाकी के मुल्कों की संप्रभुता सिर्फ लकीरें और मातृभूमि दूसरों की मामूली जमीन के टुकड़े। अरे! जिसे जमीन समझ रहे हैं। उसे मिट्टी के टुकड़े समझते। शायद मिट्टी की अहमियत समझ आती। संप्रभुता से पहचान होती। मगर आप अपनी ताकत, का विकास का, ऐसा चर्बी आंखों में भर रखा है कि मित्र क्या, दुश्मन क्या, अपना कौन। पराया कौन, कुछ भी नहीं दिखती। बस कभी हमें शोषण की गई थी, तो फिर हम भी उन्हीं की तरह आज ताकतवर है सीमा विस्तार क्यों नहीं कर सकते। अरे, भाई यह 19 वीं सदी नहीं 21 वीं सदी है। ग्लोबल विश्व में हर कोई सब जानता है। हंसी आती है बात भले पुरानी हो। मगर सत्य तो सत्य है। तुम तो साम्राज्यवादियों से भी चार कदम आगे निकले। साम्राज्यवादियों के उपनिवेश संबोधन शब्द हटा दिया और जोड़ दिया ‘गुलामी’ यह कहां का और कैसा तुम्हारे सोच ही तरीके हैं तथा संप्रभुता तोड़ने के अपने निर्मम पाप को छुपाने हेतु दूसरों की इतिहासों से भी खेल जाते हो। साम्राज्यवादी विचारधारा की ग्लोबल सेंटर अमेरिका भी मानवता की एक सीमा को समझती तथा मानती भी है। मगर आप तो साम्राज्यवादी लकीरों को भी बौना कर चुके हो। जहां मानव मानवता की कोई जगह नहीं बस दुनिया में लोग मरते हैं, तो मरे। कटते हैं तो कट जाये। कोई फर्क नहीं। हम तो खुश हैं। अजी जरा ठहरिए यही आप मात खा गये। क्योंकि आप जब दूसरों की इतिहासों के साथ खिलवाड़ कर रहे थे। तब यह भूल गये कि ताकत के दम पर लक्ष्मी को गुलाम बनाया जा सकता है। परंतु इतिहासों पर नहीं। सत्यमेव जयते के तहत सरस्वती चलती है। इतिहासों की सच्चाई को भले ही ताकत तथा धन के दम पर कुछ समयावधि तक छुपाई जा सकती है। लेकिन इतिहासों की सच्चाई को हमेशा-हमेशा के लिए दफनाई नहीं जा सकती। क्योंकि इतिहासकारों की मानें तो जब समय का पहिया घूमता है तो इतिहासों की सच्चाई कब्र से निकलकर जिंदा हो ही जाती है। जिस दिन ऐसा होता है। जिस दिन ऐसा हो जाता है। इतिहासें सच को अपने मरी होने के बावजूद सम्मानित, शानदार, जानदार, दमदार, ताकतवर जगह दे देती है। कई उदाहरण पड़े हैं विश्व में ऐसें कि जब न्याय की बात विश्व में आयी, इतिहासों के अनगिनत सच्चाई जमीन फाड़कर अपना स्थान पाया। ताकत तो पीढ़ियों का खेल है जो एक सा हर पीढ़ी के पास नहीं रहती। उदाहरण के तौर पर सन 1962 ईस्वी की इतिहासों को आपने अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया, जो सरकार गलत है। कहा जाता है कि 19वीं सदी की आधुनिक युग में कुछ भी छिपा पाना संभव नहीं। अगर यह सही है तो सन 1962 ईस्वी की चाइना द्वारा सुनियोजित साजिश के तहत इंडिया पर की गयी। हमले की इतिहासों के साथ छेड़ - छाड़ तथा अधूरी क्यों लिखी गयी। ताज्जुब की बात यह कि विश्व बिरादरी बिना सत्यापन किये, चाइना द्वारा लिखित इतिहास को सही मान लिया। क्या कूरूर चाइना की महिमा मंडल के लिए सत्य को नजरअंदाज की गयी या इंडिया की सादगी तथा संप्रभुता की सत्यता को पचा नहीं पाई दुनिया। चलो कोई बात नहीं। हर राष्ट्रों की अपनी अपनी विवशता है। अपनी अपनी समस्या है। वाह रे! लोकतंत्र जरूरत पड़ने पर हर राष्ट्र तेरी दुहाई देती है और जरूरत पड़ने पर तेरी कफन की भी सौदा कर देती हैं। 1962 ईसवी में जहां पूरी दुनिया शीत युद्ध के कारण दो फाड़ में बटी थी। कोई भी छोटी घटना कभी भी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी विश्व युद्ध में बदल जा सकती थी। ऐसा नहीं कि इस भयावह स्थिति में भी शांति के प्रयास नहीं किया जाता था। मगर ताकतवर मुल्कों ने इतिहासों को ऐसा तोड़ - मरोड़ किया, कि हर शांति प्रयास हंसी के पात्र बन जाया करती थी। इस समयकाल में चीन अपनी साम्राज्यवादी नीतियों का विस्तार भी किया और उस घटनाक्रम के इतिहास के साथ छेड़छाड़ भी की। ताज्जुब की बात चाइना को कोई ऐसा करने से रोकना तो दूर टोकना को भी अपनी दायित्व नहीं समझा। 1962 ईस्वी में चाइना की करतूत देखिए उसने सर्वप्रथम इंडिया को अपना भाई कहा। भाई के लिए हर त्याग हर लड़ाई में साथ-साथ रहने का वादा किया। हिंद के एक ही पिता के दो भाई की बखान की। इंडिया के साथ लड़ाई लड़ने से हाय तौबा की और जैसे ही इंडिया भाई की प्रेम के रास्ते पर बढ़ी। वहीं कल तक एक थाली के दो भाई की गुणगान करने वाला चीन कमबख्त पीठ पर छुरा (चाकू) घोंप दी। खुद मारी इंडिया के पीठ पर चाकू और इतिहास में इंडिया को ही साम्राज्यवादी होने का आरोप लगा दिया। जिससे दुनिया की सहानुभूति इंडिया को ना मिल पाये। इसलिए इतिहासों के पन्नों को भी बदल दी गयी। उस समय इंडिया के धांव ऐसे थे कि तन से मिट जाने के बावजूद मन में कैसर की पीड़ा जैसी दर्द मिट ही नहीं रही थी। वेंटिलेशन पर पड़ी हमारी इंडिया जब इस घाव के दर्द से ही नहीं उबर पायी थी। तब इतिहास किसके द्वारा लिखी जा रही थी। उसे देखने की औकात कहां। उसमें शब्द क्या भरे जा रहे हो। इतनी इल्म कहां। जिसका नाजायज फायदा चीन ने उठा ली। इस विवाद की विषाद बिछाकर कि वह जमीन जिन्हें उसने इंडिया से छीनी है। वह चीन की ही थी। इंडिया उसे कब्जा किए हुए था। जबकि यह सच्चाई नहीं, इतिहास की। यह तो साम्राज्यवादी तथा लुटेरा शब्द चाइना के माथे न लगे, इसलिए यह चाइना की एकतरफा पक्ष है। जबकि सच्चाई यह है कि चाइना की नीतियां इन्हीं दो कमरों में बैठकर बनाई गई है। 1962 ईस्वी समय काल में भारत तुरंत तुरंत ही आजादी पाई थी। गुलामी का ऐसी दौड़ से इंडिया गुजरी थी कि आजादी मिलते ही पार्टीशन हो गया। रक्त न बहे इसके लिए पार्टीशन हुई, फिर भी चारों तरफ रक्त बहते रहने के माहौल में आजादी का सूरज देखा और परंतु चीन ने भी इंडिया की इस लाचारी का फायदा उठा ली। जमीन भी हड़पी इंडिया की। शमशान बनाया इंडिया को। साथ ही साथ इतिहास के पन्नों में इंडिया को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। 1962 कि चीन ने जब देखा कि इंडिया अपने विकास रथ में राष्ट्रवाद का फ्यूल भर रही है। पचा नहीं पाया। झोंक दी इंडिया को एक युद्ध में। ताकि इंडिया टूटे। कमजोर हो। इंडिया के नेतृत्व करता चाइना की दोगली नीति समझ नहीं पाये। जिसकी कीमत इंडिया को अपनी जमीन होकर चुकानी पड़ी। इंडिया 1947 ईस्वी की आजादी उपरांत सैन्य ताकत से मुंह मोड़ कर विकास के रास्ते पर चल पड़ी। चीन यह जान चुका था कि इंडिया की फौज कमजोर है। बस क्या था। 20 अक्टूबर 1962 को हमला कर दी। चूंकि इंडिया इसके लिए न मानसिक न ही सैन्य रूप से तैयार थी। फिर भी 25-50 गोलियां लेकर इंडिया के सपूतों ने उनका डटकर मुकाबला किया। जहां चीन के सैनिक 25-50 गोलियों चलाकर अपने हथियारों की छमता नाप कर चली थी। इंडिया के बेटे 25-50 गोलियां तथा 56 इंच का सीना गोलियों को झेल लेने को, फूलाकर युद्ध किया। जो सब जानते थे कि यह युद्ध तो एक शेर तथा बकरी के बच्चे मेमनों की तरह ही है। जहां बेचारी इंडिया के साथ जगधन पाप की जा रही है। फिर भी इंडिया के सपूतों ने चीन के गोलियों का जवाब अपने अपने सीने को आगे कर की। उनके साथ युद्ध की सप्लाई लाइन भी इंडिया विकसित नहीं कर पाई थी। युद्ध लड़ने के लिए हथियार तथा भोजन सैनिकों को मुहैया करना पहली प्राथमिकता होती है, जो इंडिया की नहीं थी। चीन हमें मार दे। मगर हम मां के सपूत तुम्हारे हवाले छोड़ कर अपनी धरती को पीछे नहीं जायेंगे। इस सोच को जिंदा रखने हेतु कई कई दिनों तक, हमारी भूखी फौज, अपने चमड़े की बेल्ट, अपने ही शहीदों के कच्चे मांस तक को खाना मंजूर की ताकि वह उस समय तक जीवित रहे। जब तक निर्दयी चाइना कि हमलावर गोली न मार दे। भारतीय फौज हमेशा अजय रही है। हमारे पास हथियार नहीं तो क्या हम पर कर्ज तो जरूर है मातृभूमि का वीरगति हो जायेंगे। मगर पीठ नहीं दिखायेंगे कायरता की कलंक को माथे पर नहीं लगने देंगे। ऐसा पापी राष्ट्र चाइना जिसके पास मानवता नाम की कोई चीज नहीं है। वह इस बर्बर नरसंहार को अपने युद्ध जीतने की गाथा गढ़ कर सुनाती है। जरूरत पड़ने पर दुनिया को 1962 ईस्वी की अपनी जीत का धौंस देती है। ऐसा कब तक चलेगा। इतिहास के साथ छेड़ छाड़ ऐसा अपराध को बंद करनी होगी। वरना हर युग में संप्रभुता के कारण युद्ध के काले बादल मंडराते रहेंगे। जय हिंद..(लेखक कोडरमा, झारखंड निवासी और स्वतंत्र लेखक हैं।)
सत्यनारायण गुप्ता एबीएन एडिटोरियल डेस्क।10 नवंबर को एडिलेड आस्ट्रेलिया में इंग्लैंड से हारने के बाद भारत में क्रिकेट का नशा उतर चुका है। लेकिन अब फुटबॉल का बुखार दुनिया भर के खेल प्रेमियों पर चढ़ने लगा है। भारत भी उससे अछूता नहीं है। कतर में 20 नवंबर से 18 दिसंबर 2022 तक 22 वां फीफा विश्वकप का आयोजित किया जा रहा है। मध्यपूर्व में पहली बार और एशिया में दूसरी बार फुटबॉल विश्व कप का आयोजन हो रहा है। फुटबॉल विश्व कप की शुरुआत 1930 में हुई थी। उरूग्वे में आयोजित इस टूर्नामेंट में कुल 13 देशों ने भाग लिया था। मेजबान उरूग्वे ने फाइनल में अर्जेंटीना को 4-2 से हराकर जीता था। 1930 से ही हर चार साल में विश्वकप आयोजित होता रहा है। 1942 और 1946 को छोड़कर जब द्वितीय विश्व युद्ध के कारण खेल नहीं हो पाए थे। अब तक हुए 21 विश्वकप में 900 मैच खेले जा चुके हैं, जिनमें 2538 गोल हुए हैं। विश्वकप का पहला गोल 1930 में आयोजित पहले विश्वकप में फ्रांस के लूसियन लारेंट द्वारा किया गया। अब तक सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी हैं- ब्राजील के रोनाल्डो 15 गोल, जर्मनी के जर्ड मूलर- 14 गोल और फ्रांस के जस्ट फोंटेन- 13 गोल। एक ही टूर्नामेंट में सर्वाधिक गोल करने का रिकॉर्ड भी जस्ट फोंटेन के नाम है। इन्होंने 1958 विश्वकप में कुल 13 गोल किये थे। सबसे अधिक उम्र में गोल करने का रिकॉर्ड रोजर मिला के नाम है। इन्होने 42 वर्ष की उम्र में गोल किया था। अब तक सर्वाधिक 5 बार ब्राजील ने विश्वकप का खिताब जीता है। इसके अलावा जर्मनी और इटली ने चार चार बार उरूग्वे, अर्जेंटीना और फ्रांस दो दो बार तथा इंग्लैंड और स्पेन एक एक बार खिताब जीत चुके हैं। 2022 के फीफा विश्वकप में जिन खिलाड़ियों से ज्यादा उम्मीदें हैं और जिन पर नजर रहेगी,वे हैं फीफा रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर रहने वाले अर्जेंटीना के लियोनेल मेसी, नंबर दो पोलैंड के रोबर्ट लेवानडोवस्की, नंबर तीन पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो। इनके अलावा बेलान डी ओर अवार्ड जीतने वाले फ्रांस के करीन बेंजेमा, इंग्लैंड के हैरीकेन,मिश्र के मोहम्मद सालेह, ब्राजील के नेमार, उरूग्वे के लुईस सुआरेज व बेल्जियम के केविन डी ब्रुइन भी अपने जलवे बिखेरने के लिए तैयार हैं। जहां तक टीमों/देशों का प्रश्न है, ब्राजील, जर्मनी, इटली, फ्रांस, अर्जेंटीना, स्पेन, इंग्लैंड, पुर्तगाल और उरूग्वे खिताब के प्रबल दावेदार हैं। अब तक फीफा विश्वकप में दक्षिण अमेरिकी और यूरोपीय देशों का वर्चस्व अधिक रहा है। लेकिन यह खेल दुनिया भर में लोकप्रिय है, भारत में भी। जबकि फीफा विश्व रैंकिंग में भारतीय टीम 104 वें स्थान पर है। विश्व भर के फुटबॉलप्रेमी जो कतर आना चाहते हैं, उनके लिए कतर सरकार ने हय्या कार्ड जारी किया है। हय्या कार्ड एक प्रकार का आईडी कार्ड होगा। कार्ड धारकों को वीजा नहीं लेना पड़ेगा, स्टेडियम तक जाने के लिए बस और मैट्रो का उपयोग कर सकेंगे और स्टेडियमों में प्रवेश मिल सकेगा। फाइनल मैच लुसेल के नेशनल स्टेडियम में होगा, जिसमें 88000 दर्शकों के बैठने की क्षमता है। मानवाधिकार उल्लंघन तथा फीफा विश्वकप आयोजन स्थलों के निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों के शोषण का आरोप झेल रहा देश कतर के लिए फीफा विश्वकप का सफल आयोजन कर अपनी छवि सुधारने का अच्छा अवसर है।
जयंती (19 नवंबर) पर विशेषडॉ वंदना सेनएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत भूमि पर अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए अनेक वीर अग्रणी भूमिका में रहे हैं। लेकिन देश को स्वतंत्र कराने में मातृशक्ति के योगदान को किसी प्रकार से कम नहीं कहा जा सकता। जिन नारियों ने भारत को स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई आज पूरा देश उन्हें वीरांगना के नाम से स्वीकार करता है। वीरांगना नाम सुनते ही हमारे मन मस्तिष्क में स्वाभाविक रूप से रानी लक्ष्मीबाई की छवि उभरती है। भारतीय वसुंधरा को अपने वीरोचित भाव से गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सच्चे अर्थों में वीरांगना हैं। वे भारतीय महिलाओं के समक्ष अपने जीवनकाल में ही ऐसा आदर्श स्थापित कर विदा हुईं, जिससे हर कोई प्रेरणा ले सकता है। वर्तमान युग में जहां हर कोई अपने आप तक केन्द्रित होता जा रहा है, उनके लिए वीरांगना लक्ष्मीबाई का जीवन एक ऐसा उदाहरण है, जो राष्ट्रीय भावना को संचारित करने में एक आदर्श है। भारतीय नारी शक्ति को इस बात का अवश्य ही विचार करना चाहिए कि हमारे नायक कौन होने चाहिए? क्योंकि श्रेष्ठ नायक और नायिकाओं के माध्यम से ही श्रेष्ठ जीवन बनता है। आज हम जिस चमक-दमक में नायकत्व को देखने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में भारत के नायक हैं ही नहीं। इसे सुनियोजित तरीके से भारत में इस रूप में प्रचारित किया गया है और इसी कारण समाज का बहुत बड़ा वर्ग भ्रम में जी रहा है।यह वास्तविकता ही है कि जो भी देश से प्यार करता है, उसे कोई भी प्रलोभन अपने कर्तव्य से डिगा नहीं सकता। ऐसे ही महान व्यक्ति भविष्य में समाज के नायक के रूप में स्थापित होते हैं। वास्तव में नायक वही होता है, जो अपने कर्मों से सही राह पर चलने की प्रेरणा दे सके। ऐसा ही रानी लक्ष्मीबाई का जीवन था, यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। उन्हें अपने राज्य और राष्ट्र से एकात्म भाव को प्रदर्शित करने वाला प्यार था। वीरांगना के मन में हमेशा यह बात कचोटती रही कि देश के दुश्मन अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इसी कारण उन्होंने यह घोषणा की थी कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इतिहास बताता है कि इस घोषणा के बाद रानी ने अंग्रेजों से युद्ध किया। वीरांगना लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति किस कदर घृणा थी, वह इस बात से पता चल जाता है कि जब रानी का अंतिम समय आया, तब ग्वालियर की भूमि पर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में रानी ने संतों से कहा कि कुछ ऐसा करो कि मेरा शरीर अंग्रेज न छू पाएं। इसके बाद रानी स्वर्ग सिधार गईं और बड़ी शाला में स्थित एक झोपड़ी को चिता का रूप देकर रानी का अंतिम संस्कार कर दिया और अंग्रेज देखते ही रह गए। हालांकि इससे पूर्व रानी के समर्थन में बड़ी शाला के संतों ने अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया, जिसमें 745 संतों का बलिदान भी हुआ, पूरी तरह सैनिकों की भांति अंग्रेजों से युद्ध करने वाले संतों ने रानी के शरीर की मरते दम तक रक्षा की।जिन महापुरुषों और महान नायिकाओं का हृदय वीरोचित भाव से भरा होता है, उसका लक्ष्य सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान ही होता है। वह एक ऐसे आदर्श चरित्र को जीता है, जो समाज के लिए प्रेरणा बनता है। इसके साथ ही वह अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं महारानी लक्ष्मीबाई। उनका जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनु व मणिकर्णिका के नाम से जानी जाती थीं। सन् 1850 में मात्र 15 वर्ष की आयु में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से मणिकर्णिका का विवाह हुआ। एक वर्ष बाद ही उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन चार माह पश्चात ही उस बालक का निधन हो गया। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा कि वे फिर स्वस्थ न हो सके और 21 नवंबर 1853 को चल बसे। यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंग्रेज सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया। 27 फरवरी, 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। यह सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित हो गया, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ। रानी लक्ष्मीबाई ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अंग्रेजों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया। बहुत दिन तक युद्ध का क्रम इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं। उन्होंने नाना साहब और उनके योग्य सेनापति तात्या टोपे से संपर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श किया। रानी की वीरता और साहस का लोहा अंग्रेज मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। कालपी में महारानी और तात्या टोपे ने योजना बनाई और अंत में नाना साहब, शाहगढ़ के राजा, बानपुर के राजा मर्दन सिंह आदि सभी ने रानी का साथ दिया। रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और वहां के किले पर अधिकार कर लिया। विजयोल्लास का उत्सव कई दिनों तक चलता रहा, लेकिन रानी इसके विरुद्ध थीं। यह समय विजय के उल्लास का नहीं था, अपनी शक्ति को संगठित कर अगला कदम बढ़ाने का था। इधर जनरल स्मिथ और मेजर रूल्स अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करते रहे और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने घमासान युद्ध करके ग्वालियर का किला अपने कब्जे में ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 18 जून, 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वे घायल हो गईं और अंतत: उन्होंने वीरगति प्राप्त की। रानी लक्ष्मीबाई ने स्वातंत्र्य युद्ध में अपने जीवन की आहुति देकर जनता जनार्दन को चेतना प्रदान की और राष्ट्रीय रक्षा के लिए बलिदान का संदेश दिया। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान उस समाज के लिए भी एक प्रेरणा है जो देश के विरोध में नए नए षड्यंत्र करते हैं। क्योंकि विचार करने वाली यह है कि देश को स्वतंत्र कराने के लिए जिन योद्धाओं ने अंग्रेजों से मुकाबला किया, वह उनके स्वयं के लिए नहीं था, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय समाज के लिए ही था। आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं तो इसमें इन क्रांतिकारियों का अविस्मरणीय योगदान है। भारत की भावी पीढ़ी को ऐसे नायकों से प्रेरणा लेकर जितना भी बन सके, राष्ट्र के लिए योगदान देना ही चाहिए। (लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
शिवकुमार शर्मा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसी भी व्यक्ति के कार्यों का समापन भी उसके संसार से विदा लेने के साथ ही हो जाता है, परंतु उसके द्वारा समाज के लिए किए गए त्याग, समर्पण, बलिदान और सामाजिक योगदान उसे अमर बनाते हैं। भारत की आजादी की जंग में अंग्रेज सरकार से जूझने वाले सेनानियों में लाल, बाल, पाल का नाम अग्रगण्य है। यह बताना प्रासंगिक होगा कि लाला लाजपत राय का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ जो अब पाकिस्तान में है। बाल गंगाधर तिलक का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरि एवं बिपिन चंद्र पाल का जन्म अविभाजित भारत के हबीबगंज सदर उप जिला अंतर्गत हुआ जो अब बांग्लादेश में है। इस प्रकार लाल, बाल, पाल तीनों नाम एक साथ होने पर किन्हीं तीन व्यक्तियों के एक साथ होने मात्र की जानकारी ही नहीं देते अपितु तत्कालीन अखंड भारत का बोध कराते हैं। इन तीन विभूतियों में से एक लाला लाजपत राय ने 18 जनवरी 1865 में पंजाब में (अविभाजित भारत) उर्दू फारसी के सरकारी शिक्षक मुंशी राधाकृष्ण अग्रवाल और गुलाबदेवी अग्रवाल के यहां जन्म लिया। प्रारंभिक शिक्षा राजकीय उच्च मध्य विद्यालय रेवाड़ी में हुई। पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे। इसलिए कानून की पढ़ाई के लिए 1880 में लाहौर के कॉलेज में प्रवेश लिया। वहां उनकी भेंट राष्ट्रवादी लाला हंसराज और पं. गुरुदत्त से हुई। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1884 में अपने पिता के पास रोहतक आ गए और वकालत करने लगे। हिसार के अलावा लाहौर उच्च न्यायालय में भी वकालत की। 1914 में वकालत छोड़कर दयाल सिंह के साथ मिलकर पंजाब नेशनल बैंक तथा लक्ष्मी बीमा कंपनी भी स्थापित की। इस बीमा कंपनी का 1956 में भारतीय जीवन बीमा निगम में विलय कर दिया गया। सर्वेंट्स आॅफ द पीपल सोसाइटी (लोक सेवा मंडल) जैसे सामाजिक संगठन को स्थापित किया। बचपन से ही देशसेवा की ललक थी। वो इटली के महान क्रांतिकारी जोसेफ मेजिनी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे तथा स्वामी दयानंद से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने पंजाब में आर्य समाज को लोकप्रिय बनाया एंग्लो वैदिक विद्यालयों का प्रसार किया। यह विद्यालय वर्तमान में डीएवी स्कूल व कालेज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने यंग इंडिया, दुखी भारत, भारत पर इंग्लैंड का कर्ज, आर्य समाज, भारत का राजनीतिक भविष्य, भगवत गीता का संदेश, भारत की राष्ट्रीय शिक्षा की समस्या और संयुक्त राज्य अमेरिका एक हिंदू प्रभाव आदि पुस्तकों के साथ मैजिनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनी लिखीं। इसके बाद आर्य समाज के समाचार पत्र आर्य गजट के संस्थापक संपादक बने। वे हिंदू समाज में जाति व्यवस्था और छुआछूत को समाप्त करने के हिमायती थे। पिछड़ी जातियों के लोगों को वेद और मंत्र पढ़ने का अधिकार देने के पक्षधर थे। मां क्षय रोग से पीड़ित थीं। इसलिए आम जनता के मुफ्त इलाज की व्यवस्था हेतु गुलाब देवी चेस्ट हॉस्पिटल खोला। वर्तमान में गुलाब देवी मेमोरियल अस्पताल पाकिस्तान के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक है। वे भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वाले नेताओं में से एक थे। उनकी क्रांतिकारी लेखनी और ओजस्वी वाणी दोनों ने उनके प्रभाव का विस्तार किया। किसान आंदोलन का समर्थन करने के कारण फिरंगी सरकार ने 1907 में बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया। लॉर्ड मिंटो सबूत पेश नहीं कर पाया तो उसी वर्ष वापस स्वदेश आ गए। वे अमेरिका गए। वहां उन्होंने इंडियन होम रूल लीग, मासिक पत्रिका यंग इंडिया तथा हिंदुस्तान सूचना सेवा संघ की स्थापना की। भारत आकर सक्रिय राजनीति में भाग लिया। उन्हें पंजाब केसरी का संबोधन मिला। उनका मानना था कि जीत की ओर बढ़ने के लिए हार और असफलता कभी-कभी आवश्यक घटक होते हैं। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन किया। असहयोग आंदोलन का पंजाब में नेतृत्व किया। इसके फलस्वरूप 1921 से 1923 के बीच लाला जी को जेल में डाल दिया गया। साइमन कमीशन का विरोध किया तो अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर क्रूरतापूर्वक लाठियां बरसाईं। लालाजी बुरी तरह घायल हो गए। उन्होंने कहा- मैं घोषणा करता हूं कि आज मुझ पर हुआ हमला भारत में ब्रिटिश शासन के ताबूत मेंआखिरी कील साबित होगा।" इसके बाद 17 नवंबर 1928 को भारत मां के इस वीर सपूत ने देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति दे दी। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
परशुराम तिवारीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज से बाईस वर्ष पूर्व झारखंड के अस्तित्व में आते ही उम्मीदों और आकांक्षाओं के हिचकोले खाते यहां के लोग खुशी से झूम उठे थे। सड़क पर मांदर की थाप पर थिरकते झारखंडी जीत के गीत गा रहे थे। वादियों की खूबसूरती मानो द्विगुणित हो गयी थी और झरने प्रफुल्लित हो गुनगुना रहे थे। खुशी की खुशबू चहुंओर फैली हुई थी। भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, नीलांबर-पीतांबर सहित अनेक धरतीपुत्र के संघर्षों को जैसे मुकाम मिल गया था। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, उमंग बेरंग होने लगे। प्रगति के बादल बरसने के बजाय निराशा की घनघोर घटाएं छाने लगीं। ऐसा नहीं है कि झारखंड प्रगति के मार्ग पर नहीं चला। पर यह गति इतनी धीमी व धुंधली रही है कि इसे प्रगति कहना बेमानी सा लगने लगा।कहना न होगा कि पूर्ववर्ती सरकारों के नेतृत्व में भी कुछ न कुछ प्रगति हुई है, वर्तमान सरकार भी प्रगति के पथ पर अग्रसर है और परवर्ती सरकारें भी अवश्य ही प्रगति के मार्ग का वरण करेंगी। मगर आज यह विचारणीय है कि क्या वास्तव में हम सपनों का झारखंड बनाने को ओर अग्रसर हैं?लंबी अवधि बीत जाने के बाद भी राजनीतिक दांवपेंच में सरकारें झारखंड हक में स्थानीय नीति तक तय नहीं कर पायीं हैं। अब कहीं जाकर 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाया गया है जिस पर राजनीतिक दलों में मतैक्य नहीं है। इन विडंबनाओं के कारण इन बाईस सालों में यहां के बेरोजगारों को निराशा ही हाथ लगी है। उनके हाथों से उनके हक की नौकरियां छिटकती रही हैं। झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा की गयी नियुक्तियां विश्वसनीयता की कसौटी पर खरी नहीं उतरी हैं। उन्हें माननीय न्यायालय में चुनौती दी जाती रही हैं। झारखंड लोक सेवा आयोग को अभी साख बनाने की चुनौती है। इसके लिए ठोस व कारगर कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। वैसे सिर से ऊपर काफी पानी बह चुका है।झारखंड के बारे यह तथ्य बार-बार दुहरायी जाती है कि इसके गर्भ में खजाना और गोद में ग़रीबी है। बेशक खनिज संपदाओं से समृद्ध झारखंड के जनता की गरीबी न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि अपमानित करनेवाली भी है।झारखंड में आदिवासी समुदाय के विकास का कोरस गान प्रायः सर्वत्र सुनाई देता है मगर धरातल पर कुछ खास नजर नहीं आता। आदिवासियों के विकास के लिए जनजातीय भाषाओं को बढ़ावा देना लाजिमी है। झारखंड में दर्जानाधिक जनजातीय भाषाएं बोली जाती हैं। इन जनजातीय भाषाओं के बीच भी हिन्दी सम्पर्क भाषा का काम करती है। पर पिछले दिनों जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के नाम पर हिन्दी की उपेक्षा करने का मामला सामने आया है। अगर यह गैर इरादतन ही है तब भी इससे हिन्दी भाषी विद्यार्थी निशाना बन रहे हैं। यह कदम राज्य के हित में कतई नहीं है।शिक्षा की बात करें तो यहां भी स्थिति उत्साहवर्द्धक नहीं है। जिस तामझाम से नि:शुल्क व अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम- 2009 विद्यालयों में लागू किये गये थे, वे सिर्फ नारा बनकर रह गये। छात्र के अनुपात शिक्षक एवं सुदृढ़ बुनियादी ढांचा मुहैया कराने के प्रावधान संचिकाओं में धूल फांकते रह गये। जो शिक्षक कार्यरत हैं उन्हें भी गैर शैक्षणिक कार्यों मुक्त करने का संकल्प पूरा नहीं हो सका। सरकार की हर महत्वाकांक्षी योजना में शिक्षक लगा दिये जाते हैं। ऐसे में शिक्षकों के लिए शिक्षण द्वितीय प्राथमिकता हो जाती है। राज्य में शिक्षा पदाधिकारियों की भी दिनोदिन कमी होती जा रही है। शिक्षा विभाग के अनेक पद अतिरिक्त प्रभार से चलाये जा रहे हैं। इस परिस्थिति में पदाधिकारियों पर कार्य का बोझ तो बढ़ता ही है, उन्हें बहाने बनाने का अच्छा अवसर भी मिल जाता है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम की बात अभी हो ही रही थी कि नयी शिक्षा नीति-2020 का आगमन हो चुका है। जाहिर है कि इसमें कई प्रावधान प्रथमत: लागू किये जायेंगे। सरकारी प्रारंभिक विद्यालयों में पहली बार तीन वर्षों की प्री-स्कूली शिक्षा लागू किया जाना है। इसके बाद बच्चे प्रथम कक्षा में जायेंगे। इसी प्रकार कक्षा-षष्ठ से व्यावसायिक शिक्षा शुरू करने की बात है। इन प्रावधानों की चर्चा तो हो रही है,पर इसके लिए कार्य योजना का कहीं अता पता नहीं है। तैयारी के बिना इसे लागू करने की सिर्फ घोषणा फलदाई नहीं हो सकेगी।सरकार कई कल्याणकारी योजना चला रही है। मगर भ्रष्ट तंत्र के आगे अच्छी अच्छी योजनाएं दम तोड़ देती हैं। कहने में संकोच नहीं है कि अफसरों को उत्तरदाई अधिक बनाये जाने की आवश्यकता है। उनकी कुर्सी जनता के प्रति जबावदेही है न कि दर्प के दिखावे की वस्तु।राज्य में बहुत कुछ है। उसके ईमानदार संयोजन की आवश्यकता है।राजनीति है तो वोट की भी बात होगी। उनकी संख्या पर भी नज़र रहेगी। पर यह ध्यान रहना चाहिए कि स्वच्छ प्रशासन, त्वरित निर्णय क्षमता एवं न्यायप्रियता से ही सरकारें जनता के दिल में जगह बना पाती हैं।समय का चक्र है, चलता ही रहेगा, किन्तु यह एक अप्रिय सत्य है कि विकास के बाईस साल के शोर शराबे में हताश जनता को आज भी प्रगति के सच्चे तेवर की तलाश है। (लेखक अध्यापक व स्वतंत्र लेखक हैं। उनका संपर्क नम्बर 900615 2176 है। )
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (फिरदौस खान)। दुनियाभर में मधुमेह का खतरा लगातार बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इस समय दुनियाभर में 24 करोड़ 60 लाख लोग मधुमेह से पीड़ित हैं और वर्श 2025 तक यह तादाद बढ़कर 38 करोड़ को पार कर जाएगी। अकेले भारत में करीब चार करोड़ मधुमेह के मरीज हैं और 2025 तक सात करोड़ होने की आशंका है। हर दसवें सेकेंड में मधुमेह से एक व्यक्ति की मौत होती है और तीसवें सेकेंड में एक नया व्यक्ति इसकी चपेट में आता है। गौरतलब है कि हर साल 14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस मनाया जाता है। 14 नवंबर को फ्रैडरिक बेंटिग का जन्मदिन है, जिन्होंने चार्लीज हर्बर्ट बेस्ट के साथ मिलकर 1921 में इंसुलिन की खोज की थी। उनके इस योगदान को याद रखने के लिए इंटरनेशनल डायबिटीज फैफेडरेशन (आईडीएफ) द्वारा 1991 से हर साल 14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस मनाने की प्रथा शुरू की गई। इस दिन दुनिया के 140 देषों में कार्यक्रमों का आयोजन कर जनमानस को मधुमेह के प्रति जागरूक किया जाता है। हर साल इसकी थीम अलग रहती है। साल 1991 की थीम इसकी थी-मधुमेह पर जनता को जागरूक करें। साल 1992 में मधुमेह विश्वव्यापी एवं सभी उम्र की समस्या, 1993 में किशोरावस्था में मधुमेह की देखभाल, 1994 में बढ़ती उम्र मधुमेह का रिस्क फैक्टर है, इसे कम कर सकते हैं, 1995 में बिना जानकारी मधुमेह के मरीज का भविष्य खतरे में होगा, 1996 में इंसुलिन ही जीवन का अमृत है, 1997 में विश्वव्यापी जागरूकता जरूरी है, 1998 में मधुमेह मरीजों के अधिकार सुरक्षित हैं, 1999 में मधुमेह के कारण राष्ट्रीय बजट पर खतरा है, 2000 में सही जीवन शैली से रोकें मधुमेह को, 2001 में मधुमेह में करें हृदय की देखभाल, 2002 में मधुमेह में करें आंखों की देखभाल, 2004 में मोटापा छुड़ाएं, मधुमेह से बचें, 2003 में मधुमेह मरीजों को गुर्दे की खराबी पर जागरूक करें, 2005 में मधुमेह में पैरों की देखभाल जरूरी है, 2006 में बच्चों को मधुमेह से बचायें, 2007 264 कदम चलें, 2008 में अब कुछ अलग कर दिखाने का समय है। बच्चों और किशोरों को मधुमेह से बचाएं और 2009 से 2010 तक मधुमेह की शिक्षा व रोकथाम से संबंधित हैं। विश्व मधुमेह दिवस 2021-23 का थीम डायबिटीज केयर तक पहुंच, अगर अभी नहीं, तो कब है। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पारित कर साल 2007 में मधुमेह अभियान के लिए एक लोगो जारी किया गया था। यह लोगो नीले रंग का है, जो वैश्विक मधुमेह समाज की एकता को प्रदर्शित करता है। चिकित्सकों के मुताबिक मधुमेह तीन प्रकार का होता है, टाइप 1 डायबिटीज, टाइप 2 डायबिटीज और गर्भावधि मधुमेह। यह एक असंक्रामक रोग है। इसमें रोग का प्रभाव जब शरीर के लिए लड़ने वाले संक्रमण, प्रतिरक्षा प्रणाली के खिलाफ होता है तो उसे टाइप 1 डायबिटीज कहा जाता है। टाइप 2 डायबिटीज सामान्य मधुमेह है। करीब 95 फीसद लोग इससे पीड़ित हैं। यह वृद्धावस्था में पाया जाता है। 80 फीसद से ज्यादा टाइप 2 डायबिटीज के मामले मोटापे की वजह से होते हैं, जो मधुमेह संबंधी मौत का कारण भी बनते हैं। बीएमआई और टाइप 2 डायबिटीज के बीच उतार चढ़ाव वाला संबंध है। सबसे कम खतरा उनमें होता है जिनका बीएमआई यानी शरीर का वजन और लंबाई का अनुपात 22 किलोग्राम/2 होता है। अगर बीएमआई 35 किलोग्राम/एम2 से ज्यादा होता हो तो उनमें मधुमेह का खतरा 61 साल की उम्र तक रहता है। यह खतरा बैठकर जिन्दगी बिताने वालों में बढ़ सकता है, जबकि व्यायाम करके इसमें कमी लाई जा सकती है। महिलाओं में 18 की उम्र और पुरुषों में 20 के बाद वजन के बढ़ने से टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। द नर्सेज हेल्थ स्टडी में 18 की उम्र के बाद जिन महिलाओं का वजन स्थिर यानी जिन्होंने 5 किलोग्राम वजन या इससे कम बढ़ाया या फिर वजन कहीं ज्यादा बढ़ाया, दोनों में तुलना की गई। जिन महिलाओं में वजन 5 से 7.9 किलोग्राम बढ़ा उनमें डायबिटीज का खतरा 1।9 गुना बढ़ा और जिन महिलाओं में 8 से 10.9 किलोग्राम वजन बढ़ा उनमें यह खतरा 2.7 गुना ज्यादा हो गया। इसी तरह पुरुषों पर भी अध्ययन किया गया। थोड़े से वजन बढ़ने पर भी मधुमेह का खतरा बढ़ता देखा गया। वजन बढ़ने का मतलब भविष्य में मधुमेह की समस्या के रूप में देखा गया। टाइप 2 डायबिटीज वाले उच्च आशंकित समूह वाले भारतीयों में वजन धीरे-धीरे 30 किलोग्राम तक बढ़ जाता है यानी यह 60 से 90 पहुंच जाता है, जिससे सालों तक उन्हें डायबिटीज से जूझना होता है। इसके विपरीत वजन में कमी करने से टाइप 2 डायबिटीज का खतरा कम होता है। मोटापे के साथ ही इंसुलिन में रुकावट व हाइपर इंसुलिनेमिया मोटापे से होता है और हाइपरग्लाइसेमिया से पहले ही नजर आ जाता है। मोटापे की वजह से ग्लूकोज गड़बड़ा जाता है और इंसुलिन रुकावट बढ़ जाती है जिसकी वजह से हाइपरइंसुलिनेमिया की समस्या होती है। हाइपर इंसुलिनेमिया में हीपेटिक वेरी लो डैनसिटी ट्राइग्लाइसराइड सिंथेसिस, प्लासमिनोजेन एक्टिवेटर इनहिबिटर-1 सिंथेसिस, सिम्पैथिक नर्वस सिस्टम एक्टिविटी और सोडियम रीएब्जार्पशन का घनत्व बढ़ने लगता है। इन बदलावों की वजह से मोटे लोगों में हाइपलीपीडेमिया और हाइपरटेंशन की समस्या होती है। कुछ महिलाओं में गर्भावधि मधुमेह गर्भावस्था में देर से विकसित होता है। हालांकि शिशु के जन्म के बाद यह प्रभाव खत्म हो जाता है। इस मधुमेह का कारण गर्भावस्था में हार्मोन्स का असंतुलन या इंसुलिन की कमी से होता है। काबिले-गौर है कि साल 1924 में पहली बार इंसुलिन का इस्तेमाल मधुमेह पीड़ित 14 वर्षीय लोनार्ड थाम्सन के इलाज में किया गया। जिन मरीजों में इंसुलिन नहीं बनता, उनमें दवाइयों के जरिये इसे बनाया जाता है। जिन मरीजों में इंसुलिन बनता है, लेकिन काम नहीं करता, उनमें दवाइयों के जरिये इंसुलिन को सक्रिय किया जाता है। चिकित्सकों का कहना है कि खून में शुगर की मात्रा अगर 126 प्वाइंट या इससे ज्यादा है तो इसे मधुमेह माना जाता है, जबकि 98 प्वाइंट के नीचे हो तो इसे सामान्य माना जाता है। अगर शुगर की मात्रा 98 प्वाइंट और 126 प्वाइंट के बीच है तो इसे प्री-डायबिटीज स्टेज माना जायेगा। मधुमेह एक ऐसा रोग है जिसमें मेटाबॉलिज्म और हारमोन असंतुलित हो जाता है। यह एक कॉम्पलैक्स डिसआॅर्डर है। थकावट, वजन बढ़ना या कम होना, बेहद प्यास लगना और चक्कर आना इसके लक्षण हैं। मधुमेह आनुवांशिक हो सकता है, लेकिन खान-पान का विशेष ध्यान रखकर इसे काबू किया जा सकता है। बदलते लाइफ स्टाइल और फास्ट फूड की बढ़ती दीवानगी मधुमेह को बढ़ावा दे रही है। खाने में अत्यधिक वसा, कोल्ड ड्रिंक्स और एल्कोहल से मोटापा बढ़ रहा है, जिससे मधुमेह की आशंका बढ़ जाती है। एल्कोहल हार्मोन असंतुलन को बढ़ाती है और इससे भी मधुमेह का खतरा पैदा हो जाता है। मधुमेह को खत्म करने का अभी तक कोई इलाज नहीं है। जो इलाज है वह सिर्फ इसे नियंत्रित करने तक ही सीमित है। इसलिए बेहतर है कि इससे बचा जाये। व्यायाम और खानपान पर विशेष ध्यान देकर मधुमेह के खतरे को कम किया जा सकता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का कौन स्वागत नहीं करेगा कि सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण का आधार सिर्फ गरीबी होगी। यह 10 प्रतिशत आरक्षण अतिरिक्त है। यानी पहले से चले आ रहे 50 प्रतिशत आरक्षण में कोई कटौती नहीं की गई है। फिर भी पांच में से दो जजों ने इस आरक्षण के विरुद्ध फैसला दिया है और तमिलनाडु की सरकार ने भी इसका विरोध किया है। उनका कहना है कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण देना संविधान का उल्लंघन करना है। संविधान की किसी धारा में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निश्चित नहीं की गई है। 1992 का सुप्रीम कोर्ट में आया इंदिरा साहनी प्रकरण बेहद महत्वपूर्ण है। उसी समय नरसिंहराव सरकार ने गरीबी के आधार पर लोगों को आरक्षण देने की घोषणा की थी। उसी घोषणा को 2019 में भाजपा सरकार ने संविधान का अंग बना दिया। अब कांग्रेस और भाजपा दोनों इसका श्रेय लूटने की प्रतिस्पर्धा में हैं लेकिन मैं तो जन्म के आधार पर दिए गए सारे आरक्षणों के एकदम विरुद्ध हूं, चाहे वह अनुसूचितों या पिछड़ों या तथाकथित अल्पसंख्यकों को दिया जाये। मेरी राय में आरक्षण जन्म के आधार पर नहीं, जरूरत के आधार पर दिया जाना चाहिए। मुझे खुशी थी कि नरसिंहराव और मनमोहनसिंह सरकार ने उस दिशा में कदम बढ़ाये और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस मामले में ठोस निर्णय का साहस दिखाया। लेकिन यह काम अभी भी अधूरा है। संसद में 2019 में जब गरीबी को आरक्षण का आधार बनाकर सरकार विधेयक लाई थी, तब 323 सांसदों ने उसका समर्थन किया था और सिर्फ 3 सांसदों ने विरोध। लेकिन किसी नेता या पार्टी की आज हिम्मत नहीं है कि वह डाॅ अंबेडकर की इच्छा को मूर्त रूप दे सके। उन्होंने कहा था कि जन्म के आधार पर दिया गया आरक्षण दस साल के लिए काफी है। अब तो इसको पैदा हुए दर्जनों साल हो गये हैं। यह देश में अयोग्यता, अकर्मण्यता, भेदभाव, जातिवाद और मलाईदार वर्ग को प्रोत्साहित करने का साधन बन गया है। इसी कारण सरकारें रेवड़ी-संस्कृति की शिकार हो रही हैं। यदि नौकरियों के बजाय शिक्षा और चिकित्सा में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया गया होता तो सरकारी भीख पर कौन जिंदा रहना चाहता? गरीबी के आधार पर दिया गया आरक्षण जातीय और सांप्रदायिक आरक्षण से कहीं बेहतर सिद्ध होता। वह भारत में एकता और समानता का मूलाधार बनता और 75 साल में भारत की गिनती दुनिया के महासंपन्न और महाशक्तिशाली राष्ट्रों में हो जाती। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक अधूरी लेकिन बहुत सराहनीय शुरुआत है। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आरके सिन्हा)। उत्तर भारत के ईसाई समाज के लिए पिछली 2 नवंबर की तारीख विशेष रही। उस दिन जब सारी दुनिया के ईसाई ऑल सोल्स डे मना रहे थे, तब हरियाणा के शहर रोहतक में कैथोलिक और प्रोटेस्टेट पादरी समुदाय के लोग मिल-जुलकर इस त्यौहार पर एक साथ बैठे। इन्होंने तय किया कि वे देश और अपने समाज के हित के लिके मिलकर प्रयास करते रहेंगे। ईसाई इस दिन कब्रिस्तानों में जाते हैं और अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ऑल सोल्स डे हिन्दुओं के पितृ पक्ष के श्राद्ध से मिलता-जुलता है। दरअसल ईसाई धर्म के दो मुख्य संप्रदायों- कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट में कुछ बिन्दुओं पर मतभेद रहे हैं। कैथोलिक मदर मैरी की पूजा में भी विश्वास करते हैं। प्रोटेस्टेंट उन पर विश्वास नहीं करते हैं और उनके लिए मैरी केवल यीशु की भौतिक मां है। हां, दोनों संप्रदायों के लिए ईसा मसीह तथा बाइबिल परम आदरणीय हैं। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों के लिए पवित्र दिन क्रिसमस और ईस्टर ही हैं। भारत में कैथोलिक ईसाइयों की आबादी अधिक है। ईसाइयों का भारत में आगमन चालू हुआ 52 ईसवी में। माना जाता है कि तब ईसा मसीह के एक शिष्य सेंट थॉमस केरल आए थे और ईसाई धर्म का विस्तार होने लगा। कहा तो यह भी जाता है कि सेंट थामस बनारस भी आये थे। देखिए भारत में 1757 में पलासी के युद्ध के बाद गोरों ने दस्तक दी। गोरे पहले के आक्रमणकारियों की तुलना में ज्यादा समझदार थे। वे समझ गए थे कि भारत में धर्मांतरण करवाने से ब्रिटिश हुकुमत का विस्तार संभव नहीं होगा। भारत से कच्चा माल ले जाकर वे अपने देश में औद्योगिक क्रांति की नींव रख सकेंगे। इसलिए ब्रिटेन, जो एक प्रोटेस्टेंट देश हैं, ने भारत में 190 सालों के शासनकाल में धर्मांतरण शायद ही कभी किया हो। इसलिए ही भारत में प्रोटेस्टेंट ईसाई बहुत कम हैं। भारत में ज्यादातर ईसाई कैथोलिक हैं। इनका धर्मांतरण करवाया आयरिश,पुर्तगाली स्पेनिश ईसाई मिशनरियों ने। प्रोटेस्टेंट चर्च तो ज्यादातर समाज सेवा में ही लगी रही। भारत में कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के बीच दूरियों को कम करने के स्तर पर दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी लगातार प्रयासरत है। इसी संगठन से गांधी जी और गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर के परम मित्र दीनबंधु सीएफ एंड्रूज भी जुड़े थे। वे दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी से 1916 में मिले थे। उसके बाद दोनों घनिष्ठ मित्र बने। उन्होंने 1904 से 1914 तक राजधानी के सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाया। उन्हीं के प्रयासों से ही गांधी जी पहली बार 1915 में दिल्ली आये थे। वे भारत के स्वीधनता आंदोलन से भी जुड़े हुए थे। उनके समय से भारत के ईसाइयों के अलग-अलग संप्रदायों में एकता और भाईचारे की छिट-पुट पहल होने लगी थी। महत्वपूर्ण है कि प्रोटेस्टेंट चर्च ने भारत में कभी धर्मांतरण की भी कोई ज्यादा कोशिशें नहीं की। यह बेहद महत्वपूर्ण तथ्य है। देखिये, मोटा-मोटी यह कह सकते हैं जहां कैथोलिक ईसाइयों के परम आदरणीय रोम के पोप हैं, वहीं प्रोटेस्टेंट उन्हें अपना धर्मगुरु मानने से इंकार करते हैं। हां, उनका आदर तो सब करते हैं। दुनियाभर में लगभग 7.2 अरब लोग ईसाई धर्म को मानते हैं। भारत में भी एक बड़ी आबादी इस धर्म को मानती है, हालांकि ईसाई धर्म के बारे में सामान्य लोगों में जानकारी का अभाव नजर आता है। ईसाई धर्म एकेश्वरवादी धर्म है, जिसमें ईश्वर को पिता और ईसा मसीह को ईश्वर की संतान माना जाता है। इसके अलावा इसमें पवित्र आत्मा की भी अवधारणा है। इन तीनों को मिलाकर ट्रिनिटी बनती है, जो ईसाइयों के लिए सबसे पवित्र है। भारतीय ईसाई अनेक संप्रदायों में बिखरे हुए हैं और उनका पुरातन इतिहास भी विविधता से भरा है। मुख्य रूप से ईसाई संप्रदाय संख्या के हिसाब से कैथोलिक हैं। इसके अलावा यह ओर्थोडोक्स, प्रोटेस्टेंट्स, ईवेन जेलिकल और पेंटेकोस्टल समूह और अनेक असंगठित समूह में फैला है। भारत में ईसाइयों का पहला प्रभावकारी स्वरूप कैथोलिक देश पुर्तगाल से 1498 ई. में पुर्तगालियों के आने से हुआ और ब्रिटिश, मूलत: एंग्लीकन या प्रोटेस्टेंट, का प्रभाव ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन 1757 से हुआ। उपर्युक्त सभी समूह स्वतंत्र हैं, परंतु अधिकांश लोगों के द्वारा एक आस्था रखने वाले समूह के रूप में देखे जाते हैं। जब कभी भारतीय ईसाइयों की तरफ देखा जाए तो इन वास्तविकताओं को समझना चाहिए। ईसाई धर्म के विद्वानों का कहना है कि भारत में कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट के बीच की दूरियों को कम करने की कोशिशें गुजरे पचास सालों से तेज होती गईं। हालांकि प्रयास पहले भी चल रहे थे। दक्षिण भारत इस बाबत आगे रहा। वहां पर कैथोलिक चर्च तथा प्रोटेस्टेंट चर्च ने प्राकृतिक आपदा के समय मिल-जुलकर काम किया। मसलन केरल में कुछ साल पहले आई बाढ और सुनामी के समय दोनों चर्च मिलकर पीड़ितों के पुनर्वास के लिये काम कर रहे थे। यह सुखद पहल है। यह भी महत्वपूर्ण है कि कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच उस तरह की कतई कटुतापूर्वक स्थिति नहीं है जैसी हम मुसलमानों के सुन्नी और शिया संप्रदायों में देखते हैं। वहां पर तो कटुता न होकर जानी दुश्मनी है। उनमें आपस में हमेशा तलवारें खिंची रहती हैं। इस्लाम के नाम पर बने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में शियाओं की लगातार हत्यायें हो रही हैं। उन्हें दोयम दर्जे का इंसान माना जाता है। अफगानिस्तान में तालिबानियों ने हजारों शिया मुसलमानों का कत्लेआम किया है। ईरान और सऊदी अरब में शिया –सुन्नियों में कुत्ते-बिल्ली वाला बैर का मुख्य कारण यही है कि ईरान शिया और सऊदी सुन्नी मुसलमानों का मुल्क है। देखिए अगले महीने क्रिसमस है और उससे दो-तीन हफ्ते पहले ही देश के अलग-अलग भागों में कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट ईसाइयों की तरफ से सर्वधर्म सभाएं आयोजित की जाने लगेंगी। उनमें विभिन्न धर्मों–संप्रदायों के विद्वान आपसी भाईचारे तथा सदभाव को मजबूत करने के लिए अपने विचार रखेंगे। प्रोटेस्टेंट संप्रदाय की तरफ से कुछ कार्यक्रम दिल्ली ब्रदरहुड़ सोसायटी आयोजित कर रही है। इसमें चर्च के आगे के कार्यक्रम तथा योजनाएं बनेंगी। इसी संगठन ने विश्व विख्यात सेंट स्टीफंस कॉलेज तथा दशकों से दीन-हीन रोगियों का मुफ्त इलाज कर रहे सेंट स्टीफंस अस्पताल की स्थापना की है। ये देश के विभिन्न भागों में धार्मिक,सामाजिक, शिक्षण संस्थानों को चलाता भी है। कैथोलिक चर्च भी इस तरह के आयोजन करेगा। निश्चित रूप से यह देश के लिये अच्छी खबर है कि ईसाइयों के दो मुख्य संप्रदाय आपस में करीब आ रहे हैं। इन्हें देश और समाज कल्याण के कार्यक्रमों पर अधिक फोकस करना होगा। खैर, यह मानना होगा कि कोई भी इस तरह का मसला नहीं है जिसका हल संवाद से संभव न हो। इस रोशनी में कैथोलिक- प्रोटेस्टेंट के मौजूदा संबंधों को देखना होगा। इनसे शिया- सुन्नी संप्रदायों को भी इनसे कुछ सीखना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)
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