आरके सिन्हाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। खेल का मैदान किस तरह से देश की सीमाओं से लेकर वर्गभेद मिटा देता है, यह सारी दुनिया ने बीते रविवार को देखा। फीफा विश्व कप के फाइनल को देखने का भारत से लेकर दुनिया के कोने-कोने में रहने वाले खेल प्रेमी इंतजार कर रहे थे। जाहिर है कि जो फाइनल मैच को देख रहे थे, उनमें से अधिकतर का संबंध न तो फ्रांस से था और न ही अर्जेंटीना से। पर इन दोनों देशों के खिलाड़ियों ने अपने श्रेष्ठ खेल और खेल भावना से सबका दिल जीता। खेल देशों-दुनिया को जोड़ता है। एक सूत्र में पिरोता है। हमने कब मोहम्मद अली, पेले, माराडोना, लारा, रोजर फेडरर या उसेन बोल्ट को अपना नहीं माना। इसी तरह से हमारे सफल खिलाड़ियों जैसे दादा ध्यानचंद, मिल्खा सिंह, विश्वनाथन आनंद को देश और देश से बाहर खेल प्रेमियों का भरपूर प्यार मिलता रहा। कुछ समय पहले महान टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर ने टेनिस की दुनिया से संन्यास लिया था। तब सारी दुनिया के खेल प्रेमी उनके चमत्कारी करियर को याद कर रहे थे। उनमें भारतीय भी तो कोई कम नहीं थे।कोई खिलाड़ी मेसी, एम्बाप्पे, रोजर फेडरर, डिएगो माराडोना, मोहम्मद अली या कपिल देव कैसे बन जाता है? इस सवाल का उत्तर तलाश करने के लिए बहुत मेहनत करने की जरूरत नहीं है। सभी खिलाड़ी मेहनत करते हैं। पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी सब महान नहीं कहे जाते। वे ही महान माने जाते हैं जो बिग मैच प्लेयर होते थे। वे बड़े और अहम मैचों में छा जाते थे। तब उनका जलवा देखते ही बनता था। बड़े खिलाड़ी का यही सबसे बड़ा गुण होता है कि वे खास मैचों या विपरीत हालात में छा जाते हैं। मेसी तथा किलियन एम्बाप्पे ने फीफा कप के फाइनल मैच में लाजवाब खेल का प्रदर्शन किया। मेसी और एम्बाप्पे ने कुल जमा तीन और चार गोल किये। ये गुण होता है कि किसी बड़े खिलाड़ी में जो उसे महान बनाता है। मतलब जब टीम को आपकी सर्वाधिक जरूरत होती है तब ही आप अपने जौहर दिखाते हैं। कई बेहतरीन खिलाड़ी कमजोर प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अपने जौहर नहीं दिखा पाते थे। लेकिन, ये फाइनल या अन्य खास मैचों के समय अपने जलवे बिखरते हैं।मेसी और एम्बाप्पे जैसे खिलाड़ी विश्व नागरिक बन चुके हैं। उन्हें सारी दुनिया प्यार करती थी। बड़े प्लेयर के साथ यही होता है। वह सबका होता है और सब उसके होते हैं। अब धावक उसेन बोल्ट को लें। उन्हें भारत में उतना ही अपना माना जाता है जितना किसी अन्य देश में। वैसे वे हैं तो जमैका से। रोजर फेडरर दिसंबर, 2015 में दिल्ली में कुछ प्रदर्शनी मैच खेलने आये थे। भारत के टेनिस के शैदाइयों को लीजैंड बन चुके रोजर फेडरर को साक्षात देखने का मौका मिल रहा था। रोजर फेडरर को खेलते हुए देखकर दर्शक झूम रहे थे। फेडरर बार-बार दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए हाथ हिला रहे थे। हार्ड, क्ले और ग्रास तीनों कोर्ट में एक जैसा शानदार प्रदर्शन करने वाले फेडरर जब कोर्ट में उतरे तो फिटनेस का चरम लग रहे थे। उनके चेहरे पर एक सुपर स्टार वाली गरिमा को देखा जा सकता था।मुझे याद आ रही है 1976 की गणतंत्र दिवस की वह परेड। तब वहां पर महानतम मुक्केबाज मोहम्मद अली आये थे। उस समय इमरजेंसी का दौर चल रहा था। परेड शुरू होने में कुछ पल शेष थे। तब ही लाउड स्पीकर से घोषणा हुई कि विश्व हैवीवेट मुक्केबाज चैंपियन मोहम्मद अली राजपथ पर पधार रहे हैं। यह जानकार राजपथ पर मौजूद हजारों लोग प्रसन्न हो गये थे। मोहम्मद अली तब अपने करियर के शिखर पर थे। वे विश्व नायक थे। वे परेड शुरू होने से पहले राजपथ पर आ गये थे। उनके चाहने वाले उनका नाम लेकर उनका अभिवादन कर रहे थे। लंबे-ऊंचे कद के मोहम्मद अली जवाब में अपने मुक्के को हवा में घुमा रहे थे। मोहम्मद अली देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ बैठे थे। दुर्भाग्य से वह दौर सेल्फी का नहीं था। बहरहाल, लियोनेल मेसी का विश्व विजेता बनने का सपना आखिरकार पूरा हो गया। 2014 में खिताब चूकने वाले मेसी की टीम ने फीफा वर्ल्ड कप इतिहास के सबसे रोमांचक फाइनल में फ्रांस को फुल टाइम में 3-3 से स्कोर बराबर रहने के बाद पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से हरा दिया। यह अर्जेंटीना का तीसरा खिताब है। इससे पहले उसने 1978 और 1986 में ट्रॉफी अपने नाम की थी। पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना के गोलकीपर मार्टिनेज ने कमाल कर दिया। उन्होंने दो मौके बचाए और मेसी का सपना पूरा कर दिया। इसके साथ ही मेसी का नाम माराडोना के साथ सुनहरे अक्षरों में लिख दिया गया है।भारत को भी मेसी, एम्बाप्पे, फेडरर और नीरज चोपड़ा जैसे सैकड़ों विश्वास से लबरेज खिलाड़ियों की दरकार है। अभी तो बस शुरूआत है। किसी भी देश का विकास इस बात से साबित होता है कि उधर खेलों की दुनिया में किस तरह की उपलब्धियां अर्जित की जा रही हैं। भारत की पुरुष बैडमिंटन टीम का भी इस साल इतिहास रचना। आप जानते हैं कि भारत ने थामस कप के फाइनल में 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया को 3-0 के अंतर से हराकर ये उपलब्धि हासिल की। लक्ष्य सेन, किदांबी श्रीकांत, सात्विक साईराज और चिराग शेट्टी ने भारत को थामस कप जितवाया। इसे बैडमिंटन की विश्व चैंपियनशिप माना जाता है। थामस कप में विजय से पहले भारत के बैडमिंटन सेंसेशन लक्ष्य सेन आॅल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंच गए थे। और बात भारतीय मुक्केबाज निखत जरीन की भी। वह इस्तांबुल में महिला विश्व चैंपियनशिप के फ्लाइवेट (52 किग्रा) वर्ग के एकतरफा फाइनल में थाईलैंड की जिटपोंग जुटामस को 5-0 से हराकर विश्व चैंपियन बनीं। तेलंगाना की मुक्केबाज जरीन ने पूरे टूर्नामेंट के दौरान प्रतिद्वंद्वियों पर दबदबा बनाए रखा और फाइनल में थाईलैंड की खिलाड़ी को सर्वसम्मत फैसले से हराया। छह बार की चैंपियन एमसी मैरीकोम (2002, 2005, 2006, 2008, 2010 और 2018), सरिता देवी (2006), जेनी आरएल (2006) और लेखा केसी इससे पहले विश्व खिताब जीत चुकी हैं।
धर्म रक्षा दिवस पर विशेष (21 से 31 दिसंबर) डॉ बिरेन्द्र साहू एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शुद्धि आंदोलन : शुद्धि आंदोलन में स्वामी श्रद्धानंद (1856- 1926) का स्थान अमर है। आगरा में 13 फरवरी, 1923 की क्षत्रिय उपकारिणी सभा की बैठक में उन्हें बुलाया गया था। इसमें सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, जैन भी आए थे। यहीं भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा का गठन हुआ। इसी के दस दिन बाद स्वामी जी की महत्वपूर्ण पुस्तिका ह्यसेव द डाइंग रेसह्ण प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने नव-मुस्लिमों को शीघ्र अपने पुराने कुटुम्ब में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। अगले दो महीनों में वे लगभग सौ गांवों में गए। पहले महीने में ही लगभग पांच हजार मलकानों को वापस लाया गया। उस वर्ष के अंत तक यह संख्या तीस हजार हो गई थी। इस कार्य पर जमीयत उलेमा और कांग्रेस के नेताओं ने आपत्ति भी की, लेकिन स्वामी जी अडिग रहे। 31 मार्च 1923 को भारत धर्म महामंडल और दरभंगा महाराज की ओर से काशी के पंडितों, पंजाब और महाराष्ट्र की विविध धर्म-सभाओं एवं जाति संगठनों ने भी स्वामी जी का समर्थन दिया। 4-5 अप्रैल 1923 को बनारस के सभाओं में भी इस विषय को रखा गया। फलत: काशी के कुछ रुढ़िवादी पंडितों ने भी मलकानों में काम करने का संकल्प लिया। मलकाना मुस्लिम राजपूतों की शुद्धि का काम पूरे हिन्दू समाज ने अपना लिया। स्वयं डॉअंबेदकर ने शुद्धि आंदोलन से अपनी सहानुभूति लिखित रूप से जताई थी। स्वामी श्रद्धानन्द ने 1924 ई. में दनकौर, बुलंदशहर में कई मुस्लिमों को शुद्ध किया। मेरठ, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर में वे लगभग डेढ़ सौ ईसाइयों को भी पुन: हिन्दू समाज में ले आये। उन के सहयोगी रामभज दत्त और मंगल सेन इसी कार्य के लिए अन्य स्थानों पर गए। दिल्ली में मार्च 1926 में कराची से आई हुई महिला असगरी बेगन अपने बच्चों के साथ शुद्ध हुईं और उन्हें शान्ति देवी नाम दिया गया। इस पर असगरी के परिवारवालों ने स्वामी श्रद्धानन्द पर मुकदमा भी किया, किन्तु अदालत ने स्वामी जी को निर्दोष करार दिया। इसके बाद कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों ने स्वामी जी को इस्लाम का शत्रु घोषित किया। इसी प्रचार के वशीभूत एक मतांध मुस्लिम ने 23 दिसंबर, 1926 को स्वामी जी को उन के घर में बीमार अवस्था में धोखे से मार डाला। यह निस्संदेह, शुद्धि के लिए ही स्वामी जी का बलिदान था। 30 दिसंबर, 1922 को गया (बिहार) में कांग्रेस के पंडाल में आयोजित हिन्दू महासभा के वार्षिक अधिवेशन में मोपला के पीड़ित हिंदुओं के प्रति संवेदना प्रकट की गई। मलाबार के लोगों से धर्मांतरित लोगों को पुन: हिन्दू धर्म में स्वीकार करने के लिए भी आह्वान किया गया। इस अधिवेशन के अध्यक्ष पंडित मदन मोहन मालवीय तथा स्वागताध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। बहरहाल, भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा के प्रयासों से सन 1923 से 1931 के बीच लगभग 18,33,422 नव-मुस्लिमों को शुद्ध किया गया। इसी दौरान लगभग साठ हजार अछूत कहलाने वाले लोगों को हिन्दू धर्म छोड़ने से भी बचाया गया। 127 शुद्धि सम्मेलन हुए, 156 पंचायतें हुईं और 81 छोटे-बड़े सहभोज किए गए। सभा की ओर से शुद्धि समाचार नामक एक मासिक पत्र भी निकलता था, जिसके चौदह हजार ग्राहक थे। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का सातवां अधिवेशन मालवीय जी की अध्यक्षता में 19-20 अगस्त 1923 को बनारस में हुआ था। उन्होंने अध्यक्षीय भाषण में शुद्धि कार्य का जोरदार समर्थन किया। वहां बाबू भगवान दास (काशी विद्यापीठ के संस्थापक, थियोसोफिस्ट, 1955 ई में भारत-रत्न से सम्मानित) ने भी शुद्धि के समर्थन में अतिविद्वतापूर्ण भाषण दिया था। सर्वसम्मति से अहिन्दुओं के हिंदू धर्म में प्रवेश संबंधी प्रस्ताव पास हुए। हिन्दू महासभा का आठवां अधिवेशन 11 अप्रैल, 1925 को कोलकाता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुआ था। लालाजी ने इस्लाम में बलात धर्मांतरित हिंदुओं की शुद्धि का समावेश किया। महासभा के नौ उद्देश्यों में इसे भी शामिल किया गया। बाद में भी हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से कई महापुरुषों ने शुद्धि का समर्थन किया। वीर सावरकर ने भी इस तथा अन्य मंचों से शुद्धि का समर्थन और प्रत्यक्ष शुद्धि का कार्य भी किया। वीर सावरकर ने अंडमान के भयावह सेल्यूलर जेल में अपने भाइयों गणेश तथा बाबाराव के साथ मिलकर शुद्धि कार्य किया था। वहां कुछ मुस्लिम कारापाल अल्पवयस्क हिंदू बंदियों को फुसलाकर या यातना देकर मुसलमान बनाते थे। उनमें से अनेक को सावरकर बंधुओं ने विधिपूर्वक शुद्ध कराया था। इसका पता चलने पर बाबाराव सावरकर पर जानलेवा हमला भी हुआ, किन्तु वे अडिग रहे। डॉ हेगडेवार के संपादकत्व में स्वातंत्य दैनिक में शुद्धि संबंधी लेख व एक नाटक संगीत उ: शाप भी लिखा तथा सार्वजनिक व्याख्यान भी दिए। वेद धर्म छोडूं नहीं, कोसिस करो हजार तिल-तिल काटो चाहि,गला काटो कटार लगभग सवा छ: सौ वर्ष पूर्व 1398 की माघ पूर्णिमा को काशी के मड़ुआडीह ग्राम में संतोख दास और कर्मा देवी के परिवार में जन्में संत रविदास यानि संत रैदास को निस्संदेह हम भारत में धर्मांतरण के विरोध में स्वर मुखर करनें वाली और स्वधर्म में घर वापसी करानें वाली प्रथम पीढ़ी के प्रतिनिधि संत कह सकतें है। संत रैदास संत कबीर के गुरुभाई और स्वामी रामानंद जी के शिष्य थे। उनकें कालजयी लेखन को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उनकें रचित 40 दोहे गुरु ग्रन्थ साहब जैसे महान ग्रन्थ में सम्मिलित किये गए हैं। भारतीय समाज में आजकल धर्मांतरण और हिन्दू धर्म में घर वापसी एक बड़ा विषय चर्चित और उल्लेखनीय हो चला है। यह विषय राजनैतिक कारणों से चर्चित भले ही अब हो रहा हो कि किंतु सामाजिक स्तर पर धर्मांतरण हिन्दुस्थान में सदियों से एक चिंतनीय विषय रहा है। इस देश में धर्मांतरण की चर्चा और चिंता पिछले 2 हजार एवं 14 सौ वर्षों पूर्व प्रारम्भ हो गई थी, समय-काल-परिस्थिति के अनुसार यह चिंता कभी मुखर होती रही तो अधिकांशत: आक्रान्ताओं और आतताइयों के अत्याचार से दबे-कुचले स्वरुप में अन्दर ही अन्दर और पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रही। बारहवीं सदी में जब मुस्लिम आक्रांता भारत की ओर बढ़े तब वे धन लूटनें और धर्म के प्रचार के स्पष्ट और घोषित एजेंडे के साथ ही आये थे। इन बाहरी आक्रान्ताओं और शासकों को भारत की जनता का बहला फुसलाकर या जबरदस्ती बलात धर्मांतरण करानें में किसी प्रकार का कोई सामाजिक या सांस्कृतिक अपराध बोध नहीं लगता था, बल्कि ऐसा करके वे अपनें को गौरान्वित ही महसूस करते थे। भारतीय दर्शन से धुर विपरीत ढर्रा चलानें वाले ये मुस्लिम आक्रान्ता कभी भी भारतीय समाज में समरस और एकरस अपनें इन दो गुणों के कारण ही नहीं हो पाए। उस दौर में स्वाभावत: ही हिंदुस्थानी परिवेश में धर्मांतरण को लेकर भय, चिंता और इससे छुटकारे की प्रवृत्ति उपजने लगी थी। पुनश्च यह कि समय के साथ साथ धर्मान्तारण कारी शक्तियों से छुटकारा पानें की यह प्रवृत्ति समय-काल-परिस्थिति के अनुसार कभी उभरती और कभी दबती रही किन्तु सदैव जीवित अवश्य रही। संत रैदास ने जब समाज में तत्कालीन आततायी विदेशी मुस्लिम शासक सिकंदर लोदी का आतंक देखा तब वे दुखी हो बैठे। उस समय लोदी ने हिंदुस्थानी जनता को सताना-कुचलना और डराकर धर्म परिवर्तन कराना प्रारम्भ कर दिया था। हिन्दुओं पर विभिन्न प्रकार के नाजायज कर जैसे तीर्थ यात्रा पर जजिया कर, शव दाह करनें पर जजिया कर, हिंदू रीति से विवाह करनें पर जजिया कर जैसे आततायी आदेशों से देश का हिन्दू समाज त्राहि-त्राहि कर उठा था। भारतीय-हिंदू परंपराओं और आस्थाओं के पालन करनें वालों से कर वसूल करनें और मुस्लिम धर्म माननें वालों को छूट, प्राथमिकता वरीयता देनें के पीछे एक मात्र भाव यही था कि हिन्दू धर्मावलम्बी तंग आकर इस्लाम स्वीकार कर लें। उस समय में स्वामी रामानंद ने अपनें भक्ति भाव के माध्यम से देश में देश भक्ति का भाव जागृत किया और आततायी मुसलमान शासकों के विरुद्ध एक आन्दोलन को जन्म दिया था। स्वामी रामानंद ने तत्कालीन परिस्थितियों को समझकर कर विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि संतों को जोड़कर द्वादश भगवत शिष्य मण्डली स्थापित की। विभिन्न समाजों का प्रतिनिधित्व करनें वाली इस द्वादश मंडली के सूत्रधार और प्रमुख, संत रविदास जी थे। संत रैदास ने हिन्दू संस्कारों के पालन पर मुस्लिम शासकों द्वारा लिए जानें वाले जजिया कर का अपनी मंडली से विरोध किया और इस हेतु जागरण अभियान चला दिया। इस मंडली ने सम्पूर्ण भारत में भ्रमण कर देशज भाव और स्वधर्म भाव के रक्षण और उसके जागरण का दूभर कार्य करना प्रारम्भ किया। संत रैदास के नेतृत्व में उस समय समाज में ऐसा जागरण हुआ कि उन्होंने धर्मांतरण को न केवल रोक दिया बल्कि उस कठिनतम और चरम संघर्ष के दौर में मुस्लिम शासकों को खुली चुनौती देते हुए देश के अनेकों क्षेत्रों में धर्मान्तरित हिन्दुओं की घरवापसी का कार्यक्रम भी जोरशोर से चलाया। संत रविदास न केवल देश भर की पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार्य संत हो गए अपितु अगड़ी जातियों के शासकों और राजाओं ने भी उन्हें राजनैतिक कारणों से अपनें अपनें दरबार में सम्मानपूर्ण स्थान देना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार संत रविदास को मिलनें वाले सम्मान के कारण देश की पिछड़ी और अगड़ी जातियों एतिहासिक समरसता का वातावरण निर्मित हो चला था। संत रविदास भारतीय सामाजिक एकता के प्रतिनिधि संत के रूप में स्थापित हो गए थे क्योंकि मुस्लिम शासकों को चुनौती देनें का जो दुष्कर कार्य ये शासक नहीं कर पाए थे वह समाज शक्ति को जागृत करनें के बल पर एक संत ने कर दिया था। पिछड़ी जातियों में आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन के बाद भी स्वधर्म सम्मान का भाव जागृत करनें में रैदास सफल रहे और इसी का परिणाम है कि आज भी इन जातियों में मुस्लिम मतांतरण का बहुत कम प्रतिशत देखनें को मिलता है। निर्धन और अशिक्षित समाज में धर्मांतरण रोकनें और घर वापसी का जो अद्भुत, दूभर और दुष्कर कार्य उस काल में हुआ वह इस दिशा में प्रतिनिधि रूप में संत रविदासजी का ही सूत्रपात था। इससे मुस्लिम शासकों में उनकें प्रति भय का भाव हो गया। मुस्लिम आततायी शासक सिकंदर लोदी ने सदन नाम के एक कसाई को संत रैदास के पास मुस्लिम धर्म अपनानें का सन्देश लेकर भेजा। यह ठीक वैसी ही घड़ी थी जैसी कि वर्तमान काल में बोधिसत्व बाबा साहेब आंबेडकर के समय आन खड़ी हुई थी। यदि उस समय कहीं संत रैदास आततायी लोदी के दिए लालच में फंस जाते या उससे भयभीत हो जाते तो इस देश के हिंदुस्थानी समाज की बड़ी ही एतिहासिक हानि होती। यदि उस दिन संत रैदास झुक जाते तो निस्संदेह आज इतिहास कुछ और होता किन्तु धन्य रहे पूज्य संत रविदास कि वे टस से मस भी न हुए, अपितु दृढ़ता पूर्वक पुरे देश को धर्मांतरण के विरुद्ध अलख जलाए रखनें का आव्हान भी करते रहे। उन्होंने अपनी रैदास रामायण में लिखा : वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान फिर क्यों छोड़ इसे पढ लूं झूठ कुरआन वेद धर्म छोडूं नहीं कोसिस करो हजार तिल-तिल काटो चाहि,गला काटो कटार देश ने अचंभित होकर यह दृश्य भी देखा कि संत रैदास को मुस्लिम हो जानें का सन्देश लेकर उनकें पास आनें वाला सदन कसाई स्वयं वैष्णव पंथ स्वीकार कर विष्णु भक्ति में रामदास के नाम से लीन हो गया। यह वह समय था जब शक्तिशाली किन्तु निर्मम और बर्बर शास्सक सिकंदर लोदी कु्रद्ध हो बैठा और उसनें संत रैदास की टोली को चमार या चांडाल घोषित कर दिया। इनकें अनुयाइयों से जबरन ही चर्मकारी का और मरे पशुओं के निपटान का कार्य अत्याचार पूर्वक कराया जानें लगा। भारत में चमार जाति का नाम इस घटना क्रम और सिकंदर लोदी की ही उपज है। संत रविदास उस काल में हिन्दू शासकों में इतनें लोकप्रिय और सम्मानीय हुए कि प्रसिद्द मारवाड़ चित्तोड़ घरानें की महारानी मीरा ने उन्हें अपना गुरु धारण किया। महारानी मीरा से रैदास की भक्ति में वे मीरा बाई कहलानें लगी। भक्त मीरा नें स्वरचित पदों में अनेकों बार संत रैदास का स्मरण गुरु स्वरूप किया है - गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी। सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली। कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै। इसका अर्थ है कि ईश्वर भक्ति अहोभाग्य होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशाल हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की पिपीलिका यानि चींटी इन कणों का सहजता से भक्षण कर लेती है। इस प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर भक्त हो सकता है। अपने सहज-सुलभ उदाहरणों वाले और साधारण भाषा में दिए जानें वाले प्रवचनों और प्रबोधनों के कारण संत रैदास भारतीय समाज में अत्यंत आदरणीय और पूज्यनीय हो गए थे। वे भारतीय वर्ण व्यवस्था को भी समाज और समय अनुरूप ढालनें में सफल हो चले थे। वे अपनें जीवन के अन्तकाल तक धर्मांतरण के विरोध में समाज को जागृत किये रहे और वैदिक धर्म में घर वापसी का कार्य भी संपन्न कराते रहे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन धर्म और राष्ट्र रक्षार्थ जिया और अत्यंत सम्मान पूर्वक चैत्र शुक्ल चतुर्दशी संवत 1584 को वे गौलोक वासी हो गये। संत रैदास ने भारतीय समाज को मन चंगा तो कठौती में गंगा जैसी कालजयी लोकोक्ति दी जिसके बड़े ही सकारात्मक अर्थ वर्तमान परिवेश में भी निकलतें हैं। आज उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि केवल यह होगी कि इस भारत भूमि पर सभी वर्णों, जातियों, समाजों और वर्गों के मतावलंबी राष्ट्रहित में एक होकर वैदिक मार्ग अपनाएँ रहें। स्वामी विवेकानंद ने एक धर्मांतरण से एक राष्ट्र शत्रु के जन्म का जो विचार वर्तमान काल में प्रकट किया उसे संत रैदास नें 600 वर्ष पूर्व समझ लिया था और राष्ट्र को समझाने बताने हेतु देश के हर हिस्सें में जाकर जागरण भी किया था। नमन इस अद्भुत संत को, राष्ट्रभक्त को और अनुपम भविष्यदृष्टा को। हिंद दी चादर कहलाने वाले गुरु तेगबहादुर जीनौवें गुरु तेगबहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनके बचपन का नाम त्यागमल था। उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह जी था। वे बाल्यावस्था से ही संत स्वरूप गहन विचारवान, उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक स्वभाव के थे। जिन्होंने धर्म व मानवता की रक्षा करते हुए हंसते-हंसते अपने प्राणों की कुबार्नी दी। गुरु तेगबहादुर जी की शिक्षा-दीक्षा मीरी-पीरी के मालिक गुरु-पिता गुरु हरिगोबिंद साहिब की छत्र छाया में हुई। इसी समय इन्होंने गुरुबाणी, धर्मग्रंथों के साथ-साथ शस्त्रों तथा घुड़सवारी आदि की शिक्षा प्राप्त की। 8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी की अकाल मृत्यु हो जाने की वजह से गुरु तेगबहादुर जी को गुरु बनाया गया था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेगबहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया। एक समय की बात है। औरंगजेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था। एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया किंतु उसे उन श्लोकों के बारे में बताना भूल गया जिनका अर्थ वहां नहीं करना था। उसके बेटे ने जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया जिससे औरंगजेब को यह स्पष्ट हो गया कि हर धर्म अपने आपमें एक महान धर्म है। पर औरंगजेब खुद के धर्म के अलावा किसी और धर्म की प्रशंसा नहीं सुन सकता था। उसके सलाहकारों ने उसे सलाह दी कि वह सबको इस्लाम धारण करवा दे। औरंगजेब को यह बात समझ में आ गई और उसने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दिया और कुछ लोगों को यह कार्य सौंप दिया। उसने कहा कि सबसे कह दिया जाये कि इस्लाम धर्म कबूल करो या मौत को गले लगाओ। जब इस तरह की जबरदस्ती शुरू हो गई तो अन्य धर्म के लोगों का जीना मुश्किल हो गया। इस जुल्म के शिकार कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस तरह इस्लाम धर्म स्वीकार ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और न करने वालों को तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही हैं। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत को खतरा है। जहां से हम पानी भरते हैं वहां हड्डियां फेंकी जाती है। हमें बुरी तरह मारा जा रहा है। कृपया आप हमारे धर्म को बचाइए। जिस समय यह लोग समस्या सुना रहे थे उसी समय गुरु तेगबहादुर के नौ वर्षीय सुपुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंदसिंह) वहां आए और पिताजी से पूछा- पिताजी यह लोग इतने उदास क्यों हैं? आप इतनी गंभीरता से क्या सोच रहे हैं? गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों की सारी समस्या बताई तो बाला प्रीतम ने कहा- इसका निदान कैसे होगा? गुरु साहिब ने कहा- इसके लिए किसी महान व्यक्ति को बलिदान देना होगा। बाला प्रीतम ने कहा कि आपसे महान पुरुष मेरी नजर में कोई नहीं है, भले ही बलिदान देना पड़े पर आप हिन्दू धर्म को बचाइए। उसकी यह बात सुनकर वहां उपस्थित लोगों ने पूछा- अगर आपके पिता जी बलिदान दे देंगे तो आप अनाथ हो जाएंगे और आपकी मां विधवा हो जाएगी। बालक ने कहा कि अगर मेरे अकेले के अनाश होने से लाखों लोग अनाथ होने से बच सकते हैं और अकेले मेरी मां के विधवा होने से लाखों मां विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है। फिर गुरु तेगबहादुर ने उन पंडितों से कहा कि जाकर औरंगजेब से कह दो अगर गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धारण कर लिया तो हम भी कर लेंगे और अगर तुम उनसे इस्लाम धारण नहीं करा पाए तो हम भी इस्लाम धारण नहीं करेंगे और तुम हम पर जबरदस्ती नहीं कर पाओगे। औरंगजेब ने इस बात को स्वीकार कर लिया। गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं चलकर गए। वहां औरंगजेब ने उन्हें तरह-तरह के लालच दिए। किंतु बात नहीं बनी तो उन पर बहुत सारे जुल्म किए। उन्हें कैद कर लिया गया, उनके दो शिष्यों को मारकर उन्हें डराने की कोशिश की, पर गुरु तेगबहादुर टस से मस नहीं हुए। उन्होंने औरंगजेब को समझा दी कि अगर तुम जबरदस्ती करके लोगों को इस्लाम धारण करने के लिए मजबूर कर रहे हो तो यह जान लो कि तुम खुद भी सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि तुम्हारा धर्म भी यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म किया जाए। औरंगजेब को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु साहिब के शीश को काटने का हुक्म दे दिया और गुरु साहिब ने हंसते-हंसते अपना शीश कटाकर बलिदान दे दिया। इसलिए गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके शहीदी स्थल पर एक गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है। हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हुए गुरु तेगबहादुरजी को प्रेम से कहा जाता है- हिन्द की चादर, गुरु तेगबहादुरप्राण त्याग दिये परंतु धर्म नहीं बदलागुरु गोबिंद सिंह के चारों साहिबजादों की शहादत का इतिहासजिनके बलिदान पर मनाया जाएगा वीर बाल दिवस। मुगलों ने श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से बदला लेने के लिए जब सरसा नदी पर हमला किया तो गुरु जी का परिवार उनसे बिछड़ गया था। छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह और माता गुजरी अपने रसोईए गंगू के साथ उसके घर मोरिंडा चले गए। वजीर खां ने छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह बाबा फतेह सिंह तथा माता गुजरी जी को पूस महीने की तेज सर्द रातों में तकलीफ देने के लिए ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया। यह चारों ओर से खुला और ऊंचा था। इस ठंडे बुर्ज से ही माता गुजरी जी ने छोटे साहिबजादों को लगातार तीन दिन धर्म की रक्षा के लिए शीश न झुकाने और धर्म न बदलने का पाठ पढ़ाया था। यही शिक्षा देकर माता गुजरी जी साहिबजादों को नवाब वजीर खान की कचहरी में भेजती रहीं। 7 व 9 वर्ष से भी कम आयु के साहिबजादों ने न तो नवाब वजीर खां के आगे शीश झुकाया और न ही धर्म बदला। इससे गुस्साए वजीर खान ने 26 दिसंबर, 1705 को दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवार में चिनवा दिया था। जब छोटे साहिबजादों की कुबार्नी की सूचना माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में मिली तो उन्होंने भी शरीर त्याग दिया। इसी स्थान पर आज गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब बना है। इसमें बना ठंडा बुर्ज सिख इतिहास की पाठशाला का वह सुनहरी पन्ना है, जहां साहिबजादों ने धर्म की रक्षा के लिए शहादत दी थी। मासूम साहिबजादों की इस शहादत ने सभी को हिला कर रख दिया था। कहा जाता है छोटे साहिबजादों की शहादत ही आगे चलकर मुगल हकूमत के पतन का कारण बनी थी। श्री गुरु गोबिंद सिंह के चार साहिबजादों में दो अन्य चमकौर की जंग में शहीद हुए थे। गुरु गोबिद ने अपने दो पुत्रों को स्वयं आशीर्वाद देकर जंग में भेजा था। चमकौर की जंग में 40 सिखों ने हजारों की मुगल फौज से लड़ते हुए शहादत प्राप्त की थी। 6 दिसंबर, 1705 को हुई इस जंग में बाबा अजीत सिंह (17) व बाबा जुझार सिंह (14) ने धर्म के लिए बलिदान दिया था। (लेखक झारखंड विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री हैं।)
योगेश गोयलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। अरुणाचल के तवांग सेक्टर में भारत-चीन के बीच एकाएक बढ़ी तनातनी और हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल के बीच भारत की समुद्री क्षमता को बढ़ावा देने के लिए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 18 दिसंबर को मुम्बई में नौसेना डॉकयार्ड में स्वदेश निर्मित पी15बी स्टील्थ गाइडेड मिसाइल विध्वंसक युद्धपोत आईएनएस मोरमुगाओ का जलावतरण किया। मौके पर रक्षा मंत्री ने समुद्री सुरक्षा में नौसेना की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए पुराणों का भी हवाला दिया। रक्षामंत्री के मुताबिक भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन और मुम्बई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएसएल) द्वारा तैयार किया गया यह युद्धपोत भारत में निर्मित सबसे शक्तिशाली युद्धपोत में से एक है, जो भारत की समुद्री क्षमता में बढ़ोतरी करेगा और इसके जरिये हिन्द महासागर में भारतीय नौसेना की पहुंच बढ़ेगी तथा देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और चाक-चौबंद होगी। आईएनएस मोरमुगाओ वॉरशिप पहली बार गोवा मुक्ति दिवस के अवसर पर भारतीय नौसेना के दूसरे स्वदेशी विध्वंसक युद्धपोत के रूप में 19 दिसम्बर 2021 को ट्रायल के लिए समुद्र में उतारा गया था, इसी दिन गोवा के पुर्तगाली शासन से मुक्ति पाने के 60 वर्ष पूरे हुए थे। पिछले एक वर्ष से समुद्र में इस युद्धपोत का परीक्षण जारी था। जहां तक इस युद्धपोत का नाम मोरमुगाओ रखे जाने की बात है तो नौसेना में शहरों के नाम पर ही जहाजों के नाम रखने की परम्परा है और यह नाम पश्चिमी तट पर गोवा के ऐतिहासिक बंदरगाह शहर के नाम पर रखा गया है। मोरमुगाओ गोवा का सबसे पुराना बंदरगाह है, जिस पर आजादी से पहले सदैव विदेशी ताकतों की नजरें गड़ी रही। आईएनएस मोरमुगाओ भारत द्वारा निर्मित सबसे घातक युद्धपोतों में शामिल है। एंटी सबमरीन वॉरफेयर (एएसडब्ल्यू) क्षमता वाला यह युद्धपोत स्वदेशी रॉकेट और टारपीडो लांचर से लैस है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही कि इसकी बाहरी परत को विशेष स्टील से बनाया गया है ताकि दुश्मन के रडार लाख प्रयासों के बाद भी इसे ट्रैक नहीं कर पाएं। यह युद्धपोत चार विशाखापत्तनम श्रेणी के विध्वंसकों में से दूसरा है, जो परिष्कृत अत्याधुनिक हथियारों, सेंसरों, दूरसंवेदी उपकरणों, आधुनिक निगरानी रडार के अलावा सतह से सतह और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से लैस है और हथियार प्रणालियों को लक्ष्य डेटा प्रदान करता है, जिसकी वजह से यह सदैव दुश्मन देश के जहाजों पर भारी पड़ेगा। आधुनिक रडार की मदद से इस पर बेहद खराब मौसम के दौरान भी नौसेना के हेलीकॉप्टर लैंड कर सकते हैं। 127 मिलीमीटर गन से लैस इस युद्धपोत में एके-630 एंटी मिसाइल गन सिस्टम भी लगा है। 163 मीटर लंबे, 17 मीटर चौड़े और 7400 टन वजनी आईएनएस मोरमुगाओ को 4 शक्तिशाली गैस टर्बाइन से गति मिलती है, जिनकी मदद से यह युद्धपोत 30 समुद्री मील से भी अधिक की रफ्तार से दौड़ते हुए एक ही झटके में दुश्मन का काम तमाम कर सकता है तथा परमाणु, जैविक और रासायनिक युद्ध स्थितियों में भी दुश्मनों को धूल चटा सकता है। युद्धपोत में लगी मिसाइलें आसमान में उड़ान भरते विमान पर 70 किलोमीटर और जमीन या समुद्र पर मौजूद लक्ष्य पर 300 किलोमीटर दूर से निशाना लगाने में सक्षम हैं। भारतीय नौसेना के अनुसार मोरमुगाओ युद्धपोत की पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमताओं को देश में ही विकसित किया गया है, जिसमें रॉकेट लांचर, तारपीडो लांचर और एएसडब्ल्यू हेलीकॉप्टर की व्यवस्था है। इसके साथ ही इसमें एंटी सबमरीन रॉकेट लांचर भी लगे हैं। निर्देशित मिसाइल प्रणाली से लैस आईएनएस मोरमुगाओ पर ब्रह्मोस तथा बराक-8 जैसी बेहद खतरनाक और अत्याधुनिक आठ मिसाइलें लगायी जायेंगी। मोरमुगाओ पर लगे रडार सिस्टम से दुश्मन को ट्रैक किया जा सकता है और ये आधुनिक रडार दुश्मन के हथियारों की जानकारी देने में सक्षम हैं। यह युद्धपोत दुश्मन की पनडुब्बियों को ढूंढ़कर उन्हें तबाह करने की विलक्षण क्षमता रखता है। इस युद्धपोत के मिलने से भारतीय नौसेना की ताकत में काफी बढ़ोतरी हुई है। आईएनएस मोरमुगाओ युद्धपोत को प्रोजेक्ट 15बी के तहत निर्मित किया गया है, जिसमें चार विध्वंसक युद्धपोतों का निर्माण किया जा रहा है। इसी प्रोजेक्ट के पहले युद्धपोत आईएनएस विशाखापत्तनम को 2021 में ही भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था और दो अन्य युद्धपोतों आईएनएस इम्फाल तथा आईएनएस सूरत का निर्माण तेज गति से अभी मझगांव डॉकयार्ड में ही हो रहा है। प्रोजेक्ट 15बी के तहत भारत विश्वस्तरीय मिसाइल विध्वंसक तैयार कर रहा है, जिनकी गुणवत्ता अमेरिका और यूरोप के विख्यात युद्धपोत निमार्ताओं को टक्कर देती है। प्रोजेक्ट 15बी से पहले शुरू हुए प्रोजेक्ट 15ए के तहत प्रमुख रूसी प्रणालियों को स्वदेशी प्रणालियों से बदला गया था। प्रोजेक्ट 15ए के तहत आईएनएस कोलकाता, आईएनएस कोच्चि तथा आईएनएस चेन्नई अस्तित्व में आये थे। नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार के मुताबिक यह उपलब्धि पिछले दशक में युद्धपोत डिजाइन और निर्माण क्षमता में हमारी ओर से उठाए गए बड़े कदमों का बड़ा संकेत है। एमडीएसएल द्वारा तैयार यह युद्धपोत हमारी स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता का बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले समय में हम न केवल अपनी जरूरतों के लिए बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों की जरूरतों के लिए भी ऐसे युद्धपोतों तथा अन्य रक्षा सामग्री का निर्माण करेंगे। आईएनएस मोरमुगाओ युद्धपोत की विशेषता यह है कि आत्मनिर्भर भारत के तहत निर्मित किए गए इस युद्धपोत में करीब 75 फीसदी हिस्से पूर्ण रूप से स्वदेशी हैं। फिलहाल आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण के दृढ़ निश्चय के साथ 44 पोतों और पनडुब्बियों में से 42 का निर्माण भारतीय शिपयार्ड में ही किया जा रहा है। इसके अलावा 55 पोतों और पनडुब्बियों के निर्माण के लिए आदेश जारी हो चुके हैं, जिनका निर्माण भी भारतीय शिपयार्ड में ही किया जायेगा।
आर के सिन्हा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मान्यता है कि भारत में इसाई धर्म की शुरुआत सबसे पहले केरल से हुई थी। माना जाता है कि ईसा मसीह के 12 प्रमुख शिष्यों में से एक सेंट थॉमस केरल में आये थे। भारत आने के बाद सेंट थॉमस ने 7 चर्च बनावाये। बहरहाल, यह क्रिसमस इस तरह का अनुपम अवसर है, जब हम जीवन के अलग-अलग भागों में भारत में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राष्ट्रवादी ईसाइयों की बात करें। इस लिहाज से पहला नाम डॉ टेसी थॉमस का जेहन में आता है। उन्हें भारत में मिसाइल वुमन के नाम से जाता है। वह अग्नि मिसाइल प्रोग्राम की अहम जिम्मेदारी संभालने वालीं देश की पहली महिला साइंटिस्ट हैं। अभी वह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में महानिदेशक एयरोनॉटिकल प्रणाली हैं। टेसी मिसाइल के क्षेत्र में महिलाओं के लिए पथप्रदर्शक साबित हुई हैं। टेसी थॉमस 1988 में डीआरडीओ में शामिल हुईं। यहां उन्होंने नई पीढ़ी की बैलिस्टिक मिसाइल, अग्नि के डिजाइन और विकास पर काम किया। उन्हें पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने अग्नि परियोजना के लिए नियुक्त किया था। टेसी 3,000 किमी रेंज की अग्नि-ककक मिसाइल परियोजना की सहयोगी परियोजना निदेशक भी रहीं। साल 2018 में वह डीआरडीओ में वैमानिकी प्रणाली की महानिदेशक बनीं। यह जानकारी कम लोगों को ही है कि प्रख्यात वकील हरीश साल्वे का संबंध भी एक ईसाई परिवार से है। वे बेहद प्रखर वक्ता भी हैं। जिरह के दौरान उन्हें इसका भरपूर लाभ मिलता है। वे कान्स्टिटूशनल लॉ और कॉरपोरेट लॉ से जुड़े मामलों पर खासतौर पर महारत रखते हैं। हरीश साल्वे को इस समय देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में एक माना जाता है। वे लगभग उसी स्थान पर विराजमान है, जिस पर कभी नानी पालकीवाला, सोली सोराबजी या फली नरीमन जैसे दिग्गज विद्यामान रहे थे। वे मुकेश अंबानी से लेकर रतन टाटा के लिए सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर चुके हैं। वे टैक्स विवाद में वोडाफोन के लिए भी लड़े। साल्वे ने इतालवी सरकार के लिए दो इतालवी मरीनों के हक में भी सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा था। पर जब इतालवी राजदूत ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे का उल्लंघन किया है तो उन्होंने आगे केस को लड़ने से मना भी कर दिया था। आपको याद होगा कि इतालवी सरकार ने दो भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोपी दो इतालवी मरीनों को सुनवाई के लिए भारत वापस भेजने से मना कर दिया था। इसके बाद साल्वे ने इतालवी सरकार के वकील का पद छोड़ा था। भारत के हरेक शब्दों के शैदाइयों के लिए रस्किन बॉण्ड का कालजयी काम उन्हें विशेष बना देता है। वे अंग्रेजी भाषा के विश्वप्रसिद्ध भारतीय लेखक हैं। बॉन्ड ने बच्चों के लिए सैकड़ों लघु कथाएं, निबंध, उपन्यास और किताबें लिखी हैं। बच्चों में उनकी जान बसती है। वे कभी कोई पुरस्कार ग्रहण करने के लिए नहीं लिखते हैं। वर्ना बहुत से कथित लेखक तो पुरस्कार पाने के लिए ही लिखते हैं। लिखना रस्किन बॉण्ड के जीवन का अभिन्न अंग है। उन्हें 1999 में पद्मश्री और 2014 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। रस्किन बॉण्ड के पिता भारत में तैनात रॉयल एयरफोर्स के अधिकारी थे। अगर बात खेल जगत की करें तो लिएंडर पेस को आजाद भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों की सूची में रखा जाएगा। लिएंडर पेस के पिता वीस पेस भारत की हॉकी टीम में रहे और मां जेनिफर पेस भारत की बास्केटबॉल टीम का हिस्सा रहीं। उन्होंने 1990 जूनियर विंबलडन जीता था। उन्होंने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में कांस्य का पदक जीता। इसके बाद पेस ने महेश भूपति के साथ भारतीय टेनिस के इतिहास में कुछ यादगार पल जोड़ दिये। मीडिया की सुर्खियों से दूर रहने वाले जॉर्ज सोलोमन राजघाट, विजय घाट, शांतिवन और सरकार द्वारा आयोजित होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं का अनिवार्य अंग हैं। महात्मा गांधी जबदक्षिण अफ्रीका में रहते थे। जॉर्ज सोलोमन राजधानी की कई चर्चों में पादरी भी रहे हैं। जॉर्ज सोलोमन कहते हैं कि कि गांधीजी को बाइबिल और ईसाई धर्म के संबंध में करीब से जानने का अवसर मिला दीनबंधु सीएफ एंड्रूज से। दीनबंधु एंड्रूरज राजधानी के सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाते थे। उन्हीं के प्रयासों से गांधीजी पहली बार 1915 में दिल्ली आए थे। सेंट स्टीफंस कॉलेज की स्थापना दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी ने की थी। इससे ही दीनबंधु एन्ड्रूरज जुड़े थे और अब जॉर्ज सोलोमन इसका हिस्सा हैं। पूर्वोत्तर भारत से आने वाली मैरी कॉम की उपलब्धियों पर सारा देश गर्व महसूस करता है। उन्होंने मुक्केबाजी की दुनिया में अनेक बड़ी उपलब्धियां दर्ज की। मैरी कॉम ने 2012 में हुए ओलंपिक खेलों में ब्रोंज मेडल हासिल किया था। उन्होंने 5 बार वर्ल्ड बॉक्सर चैम्पियनशिप जीती है। खेल की दुनिया में इनके कोच चार्ल्स अत्किनसन, गोपाल देवांग, रोंगमी जोसिया, एम नरजीत सिंह रहे है, जिन्होंने मैरी कॉम को शिखर तक पहुंचाने में योगदान दिया। भारत में ईसाइयों की आबादी हिन्दू और मुसलमानों के बाद सबसे अधिक है। देश इसाई समाज से उम्मीद करता रहेगा कि वहां से देश का चौतरफा विकास करने वाली शख्सियतें निकलती रहें। अगर बात स्वाधीनता के बाद की करें तो ईसाई समाज से जॉर्ज फर्नांडीज, भारतीय वायु सेना के चीफ अनिल ब्राउन, चुनाव आयुक्त जेम्स माइकल लिंग्दोह, पुलिस अफसर जूलियस रिबेरो, भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल एसएन रोडग्रिस जैसी शानदार शख्सियतों ने देश को समृद्ध किया। आशा की जानी चाहिए कि ये आगे भी चलता रहेगा। और अंत में बात कर लें फादर कामिल बुल्के की। फादर बुल्के के अंग्रेजी-हिंदी शब्द कोष को कौन नहीं जानता? जिंदगी भर रांची के सेंट जेवियर कॉलेज में हिंदी पढ़ाते रहे। रामचरित-मानस के महान विद्वान थे। प्रतिवर्ष तुलसी जयंती पर देशभर के अनेकों लोग तुलसीदास और उनकी कालजयी कृति रामचरितमानस पर फादर कामिल बुल्के की गूढ़ विवेचनात्मक व्याख्यान को सुनने रांची पहुंचते थे। कई वर्ष मैं भी गया हूं। इन महान ईसाई हस्तियों को सलाम...।
कमलेश पांडेयएबीएन एडिटोरियल डेस्क। लीजिये... देश-दुनिया पर कोरोना संक्रमण का खतरा फिर मंडराने लगा है। चीन में लगातार बढ़ते मामलों के लिए जिम्मेदार कोविड 19 के ओमीक्रोन स्वरूप के सब-वेरिएंट बीएफ.7 के कई मामले भारत के गुजरात और ओडिशा आदि में भी सामने आए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है भारत को इससे ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है, क्यों कि प्राकृतिक और टीकाकरण से प्राप्त हाइब्रीड इम्युनिटी के चलते देश को खतरा सबसे न्यूनतम होगा। यह बात अलग बात है कि यदि कोई नया वेरिएंट जन्म लेता है तो फिर भारत में भी चुनौती बढ़ सकती है। भारत अब तक कोरोना की तीन लहरों का सामना कर चुका है। इसके लिए अल्फा, डेल्टा और ओमीक्रोन वेरिएंट जिम्मेदार थे।चीन में हाहाकार के लिए ओमीक्रोन के सब-वेरिएंट बीएफ.7 को जिम्मेदार माना गया है। चीन के साथ अमेरिका, जापान, अर्जेंटीना, दक्षिण कोरिया और ब्राजील में भी कोरोना के केस बढ़ने लगे हैं। बीएफ.7 पर डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यह अब तक का सबसे तेजी से फैलने वाला वेरिएंट है। यह कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन में आर346टी म्यूटेशन से बना है। इसी की वजह से बीएफ.7 पर एंटीबॉडी का असर नहीं होता। यह एंटीबॉडी को हराकर शरीर में घुसने की क्षमता रखता है। इससे बचने के लिए टीकाकरण को अब भी सबसे अच्छा हथियार माना जा रहा है। इसलिए ब्रिटेन ने हाल में मॉडर्ना के टीके बायवैलेंट बूस्टर्स को मंजूरी दी है। यह कोरोना के सभी सब-वेरिएंट को खत्म करने में कारगर है।कोरोना की मौजूदा वैश्विक स्थिति पर केंद्र सरकार सतर्क हो चुकी है। उसने अधिकारियों को सजग रहने और अपने निगरानी तंत्र को मजबूत करने को कहा है। दिल्ली समेत सभी राज्यों में सतर्कता बढ़ा दी गई है। भारत सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भले ही देश में लगातार कोरोना मामलों में गिरावट का रुझान है और गत सप्ताह रोजाना औसतन 158 संक्रमण के मामले दर्ज किए गए हैं। लेकिन कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ है। इसलिए आप घबरायें नहीं, क्योंकि सरकार किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। उसने लोगों को सुझाव दिया है कि भीड़ में मास्क पहनें और कोरोना टीके की तीसरी यानी एहतियाती खुराक जरूर लें।जहां तक दुनिया के अन्य देशों की बात है तो यहां पर यह बताना जरूरी है कि वैश्विक स्तर पर पिछले 6 सप्ताहों के दौरान कोरोना मरीजों में लगातार वृद्धि हो रही है। विश्व में रोजाना औसत संक्रमण 5.9 लाख है। अनुमान है कि अगले कुछ महीनों में चीन में 80 करोड़ लोग संक्रमित हो सकते हैं। मात्र तीन माह में 10 लाख लोगों की मौत की आशंका जताई गई है। यही वजह है कि भारत के हवाई अड्डों पर चीन और अन्य देशों से आने वाले यात्रियों की औचक कोरोना जांच शुरू कर दी गई है।भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन से पता चलता है कि जब भी कोई कोरोना लहर देश में आई तो लगभग 65-70 फीसदी लोग उससे प्रभावित हुए। कई राज्यों में यह आंकड़ा 90 फीसदी तक रहा है। मोटे तौर पर देश के 80-90 फीसदी लोग कोरोना का सामना कर चुके हैं। यानी कि उनमें प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधक क्षमता आ चुकी है। इसी प्रकार 102 करोड़ से अधिक लोग कोरोना टीके की पहली खुराक और 95 करोड़ लोग दूसरी खुराक ले चुके हैं। इसका अभिप्राय यह है कि यदि पांच साल से छोटे बच्चों को छोड़ दिया जाए तो तकरीबन 95 फीसदी आबादी का टीकाकरण हो चुका है।कोरोना संक्रमण के बचाव में प्राकृतिक रूप से हासिल प्रतिरोधक क्षमता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। कुछ अलग-अलग अध्ययन में यह दावा किया गया था कि प्राकृतिक और टीके दोनों की मिली-जुली हाइब्रीड प्रतिरोध क्षमता लंबे समय तक टिकाऊ रहती है। भारतीय आबादी ने दोनों तरीकों से यह क्षमता हासिल की है। इस हिसाब से भारतीयों में कोरोना के नए संक्रमणों का खतरा न्यूनतम हो सकता है।अब यदि कोई नया वेरिएंट आता है और वह पहले के वेरिएंट से काफी अलग होता है तो चौथी लहर का खतरा बढ़ सकता है। यदि चीन की अनदेखी भी कर दें तो अमेरिका व फ्रांस में कोविड के मामलों का बढ़ना चिंताजनक है क्योंकि वहां पहले अधिक लोग संक्रमित हुए थे। इन देशों में ज्यादातर फाइजर के टीके इश्तेमाल हुए थे।जो एमआरएनए तकनीक पर था। यह तकनीक टीके में पहलीबार प्रयुक्त हुई, इसलिए इसकी प्रभावकारिता को लेकर भी पूराने अध्ययन नहीं हैं। वहीं भारतीय टीकों में समूचे निष्क्रिय वायरस का इस्तेमाल किया गया है जो सबसे पुरानी व प्रभावी टीका पद्धति है।उल्लेखनीय है कि साल 2019 में दिसंबर में ही चीन में कोरोना वायरस नाम की नई महामारी ने दस्तक दी थी। इसके बाद पूरी दुनिया में इस वायरस ने तबाही मचाई। ऐसे में दुनिया को ये चिंता सताने लगी है कि क्या एक बार फिर से नए साल की खुशियों पर कोरोना वायरस नाम का ग्रहण लगने वाला है? याद दिला दें कि दिसंबर-जनवरी 2019 में कोरोना के बढ़े मामलों में क्रिसमस-न्यू ईयर पर होने वाली भीड़भाड़ का भी बड़ा योगदान था, क्योंकि यह वायरस एक-दूसरे के संपर्क में आने से फैलता है। क्रिसमस-न्यू ईयर 2022 के समय कोरोना के मामले बढ़ने से दुनिया वापस उसी जगह पर आकर खड़ी हो गई है जहां तीन साल पहले थी। एक्सपर्ट ने चिंता जताई है कि अगर दिसंबर के आखिरी सप्ताह और जनवरी में आने वाले फेस्टिवल पर सावधानी नहीं बरती गई तो कोरोना विस्फोट भी हो सकता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
डॉ वेदप्रताप वैदिकएबीएन एडिटोरियल डेस्क। धर्म परिवर्तन संबंधी दो-तीन घटनाओं ने आज मेरा ध्यान खींचा। उत्तर प्रदेश के सीतापुर गांव में तीन लोगों को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया कि वे गांव के लोगों को डंडे के जोर पर ईसाई बनाने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने लोगों को कुछ लालच भी दिये और पवित्र क्रॉस भी बांटे। धर्म परिवर्तन करवाने वाले कुछ भारतीय ईसाइयों के साथ ब्राजील के चार पादरीनुमा टूरिस्ट भी थे। उधर मध्यप्रदेश के बस्तर जिले में लगभग 60 ईसाई परिवारों को भागकर एक स्टेडियम में शरण लेनी पड़ी, क्योंकि उन पर कुछ लोगों ने हमले शुरू कर दिए थे। हमलावरों का आरोप है कि पादरी लोग आदिवासियों को गुमराह करके ईसाई बना डालते हैं। इसी तरह बड़ोदरा के पास एक गांव में एक ईसाई को लोगों ने सिर्फ इसलिए पीट दिया कि वह क्रिसमस के अवसर पर सांता क्लाज के कपड़े पहनकर लोगों को चॉकलेट बांट रहा था। उधर, कर्नाटक विधानसभा में एक ऐसा विधेयक लाने की तैयारी है कि मुसलमान लोग मांस के लिए पशुओं को हलाल न कर सकें। इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार की कोशिश है कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की वेशभूषा अन्य स्कूलों के बच्चों की तरह हो और उनकी छुट्टी हर हफ्ते शुक्रवार की बजाय रविवार को हो। ऊपर गिनाए गए लगभग सभी मामले ऐसे हैं, जिनका धर्म से, परमात्मा से, पुण्य से नैतिकता से कोई संबंध नहीं है। इन सब अतिवादी कार्यों का प्रेरणास्रोत मजहबी उन्माद है। जो लोग अन्य लोगों का धर्म-परिवर्तन करवाते हैं, उनसे पूछिए कि आप स्वयं जिस धर्म को मानते हैं, क्या उसे अच्छी तरह से सोच-समझकर आपने अपनाया है या आपके माता ने उसे आपको पैदा होते ही जन्मघुट्टी के साथ पिला दिया था? प्राय: सभी धार्मिक लोग, जिस धर्म के भी हों, वह उन्हें उस वक्त से पिला दिया जाता है, जब उन्हें उनका अपना नाम भी पता नहीं होता। जिस धर्म के लिए वे चिल्ला-चिल्लाकर लोगों के कान फोड़ने के लिए तैयार रहते हैं, उस धर्म का अनुयायी उन्हें उस समय बना दिया जाता है, जब उन्हें यही पता नहीं होता है कि जो मंत्र उनके कान में फूंका जा रहा है, उसका अर्थ क्या है। पिछले आठ दशकों में मैं लगभग 70 देशों में गया हूं और तरह-तरह के लाखों लोगों से मेरा आमना-सामना हुआ है लेकिन मैं आज तक एक भी ऐसे आदमी से नहीं मिला हूं, जो बचपन में वेद पढ़कर हिंदू बना हो, जिंदावस्ता पढ़कर पारसी बना हो, बाइबिल पढ़कर यहूदी या ईसाई बना हो, कुरान पढ़कर मुसलमान बना हो, त्रिपिटक पढ़कर बौद्ध बना हो, अगम सूत्र पढ़कर जैन बना हो या गुरु ग्रंथ साहब पढ़कर सिख बना हो। यदि पढ़-लिखकर या सोच-समझकर कोई किसी भी धर्म को अपनाना चाहे तो उसे उसकी आजादी होनी चाहिए लेकिन जन्मघुट्टी, लालच, भय, ठगी, वर्चस्व से प्रेरित होनेवाले सभी धर्म-परिवर्तन त्याज्य हैं। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)
राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस/24 दिसंबर विशेषयोगेश कुमार गोयलएबीएन सेंट्रल डेस्क। उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के लिए देश में प्रतिवर्ष 24 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस’ मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ता अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक करना और कानून की जानकारी देना है। दरअसल आनलाइन खरीदारी हो या आॅफलाइन, ग्राहकों को कई बार सामान की गड़बड़ी अथवा अन्य प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसी तरह की समस्याओं से निजात दिलाने के लिए उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है।2020 तक विभिन्न ई-कॉमर्स साइटों से आॅनलाइन खरीदारी को लेकर उपभोक्ताओं को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं था लेकिन उपभोक्ता संरक्षण कानून-2019 (कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट-2019) में ई-कॉमर्स को भी दायरे में लाकर उपभोक्ताओं को और मजबूती देने का प्रयास किया गया है। पुराना उपभोक्ता संरक्षण कानून करीब साढ़े तीन दशक पुराना हो चुका था, जिसमें समय के साथ बड़े बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही थी।इसीलिए ग्राहकों के साथ अक्सर होने वाली धोखाधड़ी को रोकने और उपभोक्ता अधिकारों को ज्यादा मजबूती प्रदान करने के लिए 20 जुलाई 2020 को उपभोक्ता संरक्षण कानून-2019 (कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट-2019) लागू किया गया। राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस वास्तव में उपभोक्ताओं को उनकी शक्तियों और अधिकारों के बारे में जागरूक करने का महत्वपूर्व अवसर है। भारत में उपभोक्ता आन्दोलन की शुरूआत मुंबई में वर्ष 1966 में हुई थी। तत्पश्चात पुणे में वर्ष 1974 में ग्राहक पंचायत की स्थापना के बाद कई राज्यों में उपभोक्ता कल्याण के लिए संस्थाओं का गठन किया गया।इस प्रकार उपभोक्ता हितों के संरक्षण की दिशा में यह आन्दोलन आगे बढ़ता गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर 09 दिसंबर 1986 को उपभोक्ता संरक्षण विधेयक पारित किया गया, जिसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बार 24 दिसंबर 1986 को देशभर में लागू किया गया। पिछले कई वर्षों से भारत में प्रतिवर्ष इसी दिन राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस मनाए जाने का मूल उद्देश्य यही है कि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए और अगर वे धोखाधड़ी, कालाबाजारी, घटतौली इत्यादि के शिकार होते हैं तो वे इसकी शिकायत उपभोक्ता अदालत में कर सकें।उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रत्येक वह व्यक्ति उपभोक्ता है, जिसने किसी वस्तु या सेवा के क्रय के बदले धन का भुगतान किया है या भुगतान करने का आश्वासन दिया है और ऐसे में किसी भी प्रकार के शोषण अथवा उत्पीड़न के खिलाफ वह अपनी आवाज उठा सकता है तथा क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है। खरीदी गई किसी वस्तु, उत्पाद अथवा सेवा में कमी या उसके कारण होने वाली किसी भी प्रकार की हानि के बदले उपभोक्ताओं को मिला कानूनी संरक्षण ही उपभोक्ता अधिकार है। यदि खरीदी गयी किसी वस्तु या सेवा में कोई कमी है या उससे आपको कोई नुकसान हुआ है तो आप उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।अगर उपभोक्ताओं का शोषण होने और ऐसे मामलों में उनके द्वारा उपभोक्ता अदालत की शरण लिए जाने के बाद मिले न्याय के कुछ मामलों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि उपभोक्ता अदालतों का उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण में क्या योगदान है। एक उपभोक्ता ने एक दुकान से बिजली का एक पंखा खरीदा लेकिन एक वर्ष की गारंटी होने के बावजूद थोड़े ही समय बाद पंखा खराब होने पर भी जब दुकानदार उसे ठीक कराने या बदलने में आनाकानी करने लगा तो उपभोक्ता ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने अपने आदेश में नया पंखा देने के साथ उपभोक्ता को हजार्ना देने का भी फरमान सुनाया। एक अन्य मामले में एक आवेदक ने सरकारी नौकरी के लिए अपना आवेदन अंतिम तिथि से पांच दिन पूर्व ही स्पीड पोस्ट द्वारा संबंधित विभाग को भेज दिया लेकिन आवेदन निर्धारित तिथि तक नहीं पहुंचने के कारण उसे परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया गया। आवेदक ने डाक विभाग की लापरवाही को लेकर उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया और उसे न्याय मिला। चूंकि स्पीड पोस्ट को डाक अधिनियम में एक आवश्यक सेवा माना गया है, इसलिए उपभोक्ता अदालत ने डाक विभाग को सेवा शर्तों में कमी का दोषी पाते हुए डाक विभाग को मुआवजे के तौर पर आवेदक को एक हजार रुपये की राशि देने का आदेश दिया।ऐसी ही छोटी-बड़ी समस्याओं का सामना जीवन में कभी न कभी हम सभी को करना पड़ता है लेकिन अधिकांश लोग अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ते। इसका प्रमुख कारण यही है कि देश की बहुत बड़ी आबादी अशिक्षित है, जो अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अनभिज्ञ है। हालांकि जब शिक्षित लोग भी अपने उपभोक्ता अधिकारों के प्रति उदासीन नजर आते हैं तो हैरानी होती है। यदि आप एक उपभोक्ता हैं और किसी भी प्रकार के शोषण के शिकार हुए हैं तो अपने अधिकारों की लड़ाई लड़कर न्याय पा सकते हैं। कोई वस्तु अथवा सेवा लेते समय हम धन का भुगतान तो करते हैं पर बदले में उसकी रसीद नहीं लेते। शोषण से मुक्ति पाने के लिए सबसे जरूरी है कि आप जो भी वस्तु, सेवा अथवा उत्पाद खरीदें, उसकी रसीद अवश्य लें। यदि आपके पास रसीद के तौर पर कोई सबूत ही नहीं है तो आप अपने मामले की पैरवी सही तरीके से नहीं कर पायेंगे। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें उपभोक्ता अदालतों से उपभोक्ताओं को पूरा न्याय मिला है लेकिन आपसे यह अपेक्षा तो होती ही है कि आप अपनी बात अथवा दावे के समर्थन में पर्याप्त सबूत तो पेश करें। उपभोक्ता अदालतों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इनमें लंबी-चौड़ी अदालती कार्रवाई में पड़े बिना ही आसानी से शिकायत दर्ज करायी जा सकती है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एनके मुरलीधरएबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने के आदर्श को जीने वाले महानायक एवं शासन में सुशासन के प्रेरक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर को भारत सरकार प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाती है। भारतीय राजनीति के महानायक, अजातशत्रु, हिंदी कवि, पत्रकार, प्रखर वक्ता एवं भारतीय जनता पार्टी के 96 वर्षीय दिग्गज नेता, अटल विहारी वाजपेयी ने न केवल देश के लोगों का दिल जीता है, बल्कि विरोधियों के दिल में भी जगह बनाकर, अमिट यादों को जन-जन के हृदय में स्थापित कर हमसे जुदा हुए थे। उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे। वहीं शिंदे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटलजी का जन्म हुआ था। महात्मा रामचंद्र वीर द्वारा रचित अमर कृति विजय पताका पढ़कर अटलजी के जीवन की दिशा ही बदल गयी। छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही, साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलतापूर्वक करते रहे। अटलजी ने किशोर वय में ही एक अद्भुत कविता लिखी थी- हिंदू तन-मन हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय, जिससे यह पता चलता है कि बचपन से ही उनका रुझान देश हित, राष्ट्रीयता एवं हिंदुत्व की तरफ था। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता, जिजीविषा, व्यापक दृष्टि आद्योपांत प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियां, राष्ट्रव्यापी आंदोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति से जुड़े विचार उनके काव्य में सदैव ही दिखाई देते थे। अटल विहारी वाजपेयी ने पांच दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, केंद्रीय विदेश मंत्री व प्रधानमंत्री- पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे, अनूठे रहे। घाल-मेल से दूर। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। भारत सरकार ने सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से उनको अलंकृत किया। वाजपेयी बेहद नम्र इंसान थे और वह अंहकार से कोसों दूर थे। उनके प्रभावी एवं बेवाक व्यक्तित्व से पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू भी प्रभावित थे और उन्होंने कहा था कि अटलजी एक दिन भारत के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। आज भारतीय जनता पार्टी की मजबूती का जो धरातल बना है, वह उन्हीं की देन है। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वे इसे अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताते थे। 1980 में वे भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे। वे नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक। 1962 से 1967 और 1986 में वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वे संसद में बहुत प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं और महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके भाषण खासे गौर से सुने जाते रहे हैं, जो भारत के संसदीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है। अटल विहारी वाजपेयी 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वे लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साझा घोषणापत्र पर लड़े गये और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। एनडीए का नेतृत्व करते हुए मार्च 1998 से मई 2004 तक, छह साल भारत के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान उनकी सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ़ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाये गये लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊचाइयों को छुआ। उन्होंने पडौसी देश पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सौहार्दपूर्ण बनाने की दृष्टि से भी अनेक उपक्रम किये। 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। कुछ ही समय पश्चात पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया। दुनिया के सबसे बड़ी सड़क परियोजना स्वर्णिम चर्तुभुज का निर्माण कर पूरे देश को एक विश्व स्तरीय सड़क से जोड़ने का काम किया। आज वह सड़क देश के विकास में अहम भूमिका निभा रही है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से देश के पांच लाख गांवों के विकास को मानों पंखअटल विहारी वाजपेयी चाहे प्रधानमन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष- बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की, नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटलजी कभी नहीं चूके।
विनायक चटर्जीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। गुजरात के मेहसाणा जिले के मोढेरा गांव में 8,000 लोग रहते हैं। यह गांव पुष्पावती नदी के किनारे बसा हुआ है। अहमदाबाद से सड़क मार्ग के जरिये दो घंटे से कम समय में इस गांव तक पहुंचा जा सकता है। अभी तक यह गांव नामचीन सूर्य मंदिर के लिए जाना जाता था। इस मंदिर को चालुक्य राजाओं ने बनाया था। अब यह भारत के पहले सौर ऊर्जा गांव के रूप में प्रसिद्ध है। यह कोई संयोग नहीं है कि सूर्य देव के मंदिर वाले इस गांव ने यह तमगा हासिल किया है।गुजरात पावर कॉरपोरेशन ने सूर्य ग्राम परियोजना के तहत गांव के सभी घरों में नि:शुल्क सौर ऊर्जा रूफ टॉप सिस्टम स्थापित किए। बीईएसएस ने मोढेरा से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुजानपुरा गांव में 15 मेगावॉट आवर की बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली के साथ 6 मेगावॉट का ग्राउंड माउंटेड सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया।मोढेरा के 1,400 घरों की छतों पर 1 किलोवॉट आवर के सौर पैनल स्थापित किये गये हैं। गांव के सभी सार्वजनिक व शिक्षण संस्थानों की इमारतों जैसे बस स्टैंड, पुलिस स्टेशन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और पंचायत कार्यालय में भी सौर ऊर्जा संयंत्र लगाये गये हैं। गांव में विद्युत वाहनों के चार्जिंग स्टेशन भी हैं। सौर ऊर्जा से गोधूलिका के समय सूर्य मंदिर भी जगमगाता है। दिन में मोढेरा की ऊर्जा की पूरी मांग सौरऊर्जा परियोजना से पूरी हो जाती है। रात में बीईएसएस से बिजली की आपूर्ति की जाती है।गांव में एक दिन में सौर ऊर्जा से औसतन 30,000 यूनिट बिजली तैयार होती है। इसमें से 5,500 यूनिट का इस्तेमाल दिन में होता है और 6,000 यूनिट बीईएसएस में रखी जाती है। अतिरिक्त यूनिट बिजली की आपूर्ति रोजाना राज्य के ग्रिड को कर दी जाती है। गांव के बाशिंदों ने पुष्टि की कि उनके बिजली बिल में भारी कटौती हुई है। आमतौर पर प्रति माह 3,000 रुपये का बिजली बिल अदा करने वाले घर को अब 1,000 रुपये प्रति माह अदा करने की जरूरत है। गांव के लोग अब अधिक बिजली के उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को आरामदायक बना रहे हैं। इस तरह मोढेरा न केवल नेट जीरो समुदाय बन गया है बल्कि यह हरित ऊर्जा के ग्रिड का आपूर्तिकर्ता भी बन गया है। मोढेरा ने मिसाल पेश की है। लेकिन यह याद रखना होगा कि सौर ऊर्जा नि:शुल्क नहीं है। इसके लिए कीमत केंद्र और राज्य सरकार ने अदा की है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 81 करोड़ रुपये है। लिहाजा यह स्पष्ट रूप से भारत के सभी छह लाख से अधिक गांवों के लिए संभव नहीं है। असलियत यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर घरों की छतों पर सौर ऊर्जा के पैनल लगने का क्रियान्वयन भी कम रहा है जो निराशाजनक है। हालांकि जनवरी 2010 से सौर ऊर्जा का राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन लागू होने के बाद भी सौर ऊर्जा की वृद्धि तेजी से हो रही है। साल 2021-22 तक 20 गीगा वॉट सौर ऊर्जा को ग्रिड से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।हालांकि 2015 में इस लक्ष्य की पुनर्समीक्षा कर 100 गीगावॉट कर दिया गया था। इसमें से 40 गीगावॉट रूफ टॉप फोटोवॉलटिक (आरटीपीवी) से प्राप्त की जानी थी। शेष 60 वॉट यूटिलिटी-स्केल परियोजनाओं से प्राप्त होनी थी। हालांकि निराशाजनक यह रहा कि वित्त वर्ष 22 तक आरटीपीवी से नाममात्र की 11.8 गीगावॉट की क्षमता प्राप्त हुई।आरपीटीवी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए अतिरिक्त जमीन पर पूंजीगत व्यय की आवश्यकता नहीं होती है। उपभोक्ता अपने आवासीय परिसर का इस्तेमाल कर बिजली पैदा कर सकता है। इस तरह उपभोक्ता ही स्वयं निमार्ता व ग्राहक प्रोज्यूमर बन जाता है। हालांकि घरेलू उपभोक्ता कई कारणों से आरटीपीवी निवेश से दूरी बनाकर रखते हैं।इसका एक कारण संयंत्र को लगाने की लागत और उसके लिए वित्तीय संसाधन जुटाने की असमर्थता है। इसके अलावा खुदरा स्तर पर घरों में कम बिजली उपयोग करने वालों के लिए नि:शुल्क / अत्यधिक रियायत उपलब्ध होना है। इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती किराये का घर होता है। दूसरी तरफ रूफ टॉप परियोजना के डेवलपर के लिए छोटे आवासीय उपभोक्ताओं की मांग को पूरा करना महंगा सौदा साबित होता है। ऐसे में संयंत्र लगाने वाले एजेंटों को बिक्री चक्र को बंद करने में लंबी अवधि, कई स्थानों पर डिस्कॉम की अनुमति मिलने में होने वाली परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।डिस्कॉम छतों से सौर ऊर्जा के जरिये बिजली उत्पादन को हतोत्साहित करती हैं। डिस्कॉम नियम व विनियम को बदलने से परहेज कर लॉबिंग करती हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि छतों से तैयार सौर ऊर्जा की बिक्री ग्रिड को होती है और डिस्कॉम को नकदी अदा करने वाले ग्राहकों को भी खोना पड़ता है। जैसे उदाहरण के तौर पर ज्यादातर राज्यों ने मीटर वाले उपभोक्ताओं के लिए आरटीपीवी की क्षमता के आकार को अब सीमित कर दिया है।ज्यादातर राज्यों में अब इस तरीके से तैयार होने वाले सिस्टम को 500 किलोवॉट से कम पर सीमित कर दिया गया है। ऐसे में बड़ी छत वाले वाणिज्यिक व संस्थान वाले उपभोक्ता जो बड़े संयंत्र लगा सकने में समर्थ हों, उन पर सीमाएं लगा दी गई हैं। आरटीपीवी को ट्रांसमिशन इंटरकनेक्शन के लिए कम निवेश की जरूरत होती है लेकिन इसमें डिस्कॉम की रुचि नहीं है। आरटीपीवी का अनुपात अच्छा होने पर स्थानीय ग्रिड को समुचित व स्थिर ढंग से आपूर्ति हो सकती है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने आवासीय क्षेत्रों में आरटीपीवी बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राजकोषीय सह प्रोत्साहन पैकेज तैयार किया गया था। परियोजना के आकार के आधार पर एक ग्रेडेड योजना के अंतर्गत स्थानीय उपभोक्ताओं को केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसके तहत तीन किलोवॉट तक की परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 40 फीसदी तक और 3 से 10 किलोवॉट के बीच की परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 20 प्रतिशत तक का अग्रिम पूंजी अनुदान शामिल है। इसके अलावा डिस्कॉम को प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है। यह प्रोत्साहन राशि मुख्य रूप से डिस्कॉम द्वारा सहायक बुनियादी ढांचा प्रदान करने, डिस्कॉम कर्मचारियों की क्षमता निर्माण, अतिरिक्त मानवशक्ति और उपभोक्ता जागरूकता पैदा करने के किये गये अतिरिक्त व्यय की प्रतिपूर्ति करने के लिए है।मोढेरा ने गांवों में आम भारतीयों के जीवन में संभावित परिवर्तन को स्पष्ट रूप से कर दिखाया है। वैश्विक स्तर पर आरटीपीवी को गरीबी उन्मूलन के एक साधन के रूप में मान्यता दी गयी है। यह घरों पर पड़ने वाली धूप से नि:शुल्क कमाई करता है और ग्रीन डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के रूप में कार्य करता है। आदर्श रूप से यह आंदोलन भारत के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों तक फैल जाना चाहिए। एक नई योजना तैयार किए जाने की आवश्यकता है जो अब तक की सभी जानकारियों पर आधारित हो। इसे व्यावहारिक तरीके से विद्युत और जल के कनेक्शनों की तरह इस मौद्रिक कमाई और गरीबी उन्मूलन के अवसर को पूर्ण शक्ति के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए। तभी भारत का हरेक गांव सूर्य गांव बन पायेगा।
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