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संविधान ब्रह्मवाक्य नहीं है...
Published / 2023-01-15 10:01:21
संविधान ब्रह्मवाक्य नहीं है...

डॉ वेदप्रताप वैदिकएबीएन एडिटोरियल डेस्क। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के बयान पर हमारे विपक्षी नेता बुरी तरह से बिफर पड़े हैं। कांग्रेस के नेता उन्हें भाजपा सरकार का भोंपू बता रहे हैं और उन्हें उपराष्ट्रपति पद की प्राप्ति ममता-विरोध के फलस्वरूप बता रहे हैं और कुछ विपक्षी नेता उन्हें आपातकाल की जननी इंदिरा गांधी का वारिस बता रहे हैं। जैसे इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय की इज्जत को 1975 में तहस-नहस कर दिया था, वैसा ही आरोप धनखड़ पर लगाया जा रहा है। इस तरह के आरोप लगाने वाले यह बतायें कि इंदिरा गांधी की तरह धनखड़ को क्या किसी अदालत ने कटघरे में खड़ा कर दिया है? वे अपना कोई मुकदमा तो सर्वोच्च न्यायालय में नहीं लड़ रहे हैं। वे स्वयं प्रतिभाशाली वकील रहे हैं। वे प्रखर वक्ता भी हैं। उन्होंने यदि संसदीय अध्यक्ष सम्मेलन में संसद की सर्वोच्चता पर अपने दो-टूक विचार व्यक्त कर दिए तो यह उनका हक है। यदि वे गलत हैं तो आप अपनी बात सिद्ध करने के लिए जोरदार तर्क क्यों नहीं देते? आप तर्क देने की बजाय शब्दों की तलवार क्यों चला रहे हैं? संविधान की पवित्रता और मान्यता पर धनखड़ ने प्रश्न चिह्न नहीं लगाया है। उन्होंने जो मूल प्रश्न उठाया है, वह यह है कि सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है या संसद सर्वोच्च है?देश के सारे न्यायालयों में तो सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है। इसमें किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन वह संसद से भी ऊंचा कैसे हो गया? संसद चाहे तो एक ही झटके में सारे जजों को महाभियोग चलाकर पदमुक्त कर सकती है। संविधान ने ही उसे यह अधिकार दिया हुआ है। जहां तक संविधान के मूल ढांचे का प्रश्न है, किस धारा में उसे अमिट, अटल, और अपरिवर्तनीय लिखा है? वसंत साठे और मैंने तो लगभग 30 साल पहले देश में अध्यक्षीय शासन लाने का अभियान भी चलाया था। मैं तो आजकल चुनाव पद्धति का भी विकल्प ढूंढ रहा हूं। आप मूल ढांचे पर आंसू बहा रहे हैं, संसद चाहे तो पूरे संविधान को ही रद्द करके नया संविधान बना सकती है। क्या हमारा संविधान सर्वोच्च न्यायालय ने बनाकर संसद को थमाया है?सर्वोच्च न्यायालय तो अपने न्यायालयों के और अपने ही कई फैसले रद्द करता रहता है। उसके अपने फैसलों में सारे जजों की सर्वानुमति नहीं होती है। मूल ढांचे के फैसले में भी सात जज एक तरफ और छह जज दूसरी तरफ थे। भारतीय संविधान का मूल ढांचा क्या है, इसे सिर्फ अदालत को तय करने का अधिकार किसने दिया है? यदि संसद चाहे तो वह एकदम नया संविधान ला सकती है, जैसा कि हमारे कई पड़ोसी राष्ट्रों में हुआ है। हिटलर के मरने के बाद जर्मनी ने डर के मारे जो प्रावधान अपने संविधान के लिए किया था, उसकी अंधी नकल हमारे नेता और न्यायाधीश क्यों करें? हमारे देश में हिटलरी चल ही नहीं सकती और हमारा संविधान इतना लचीला है कि पिछले सात दशकों में उसमें लगभग सवा सौ संशोधन हो चुके हैं। इसीलिए इतने उत्थान-पतन के बावजूद वह अभी तक टिका हुआ है लेकिन संविधान संविधान है, कोई ब्रह्मवाक्य नहीं है। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

अपनी गलत नीतियों कारण तबाही के कगार पर है पाकिस्तान
Published / 2023-01-13 22:53:06
अपनी गलत नीतियों कारण तबाही के कगार पर है पाकिस्तान

डॉ अनिल कुमार निगमएबीएन एडिटोरियल डेस्क। शासकों की गलत नीतियों के चलते आज पाकिस्तान तबाही के मुहाने पर खड़ा है। महंगाई आसमान छू रही है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम हो रहा है। वह विदेशी कर्ज तले दबा हुआ है। जनता रोजी और रोटी के लिए न केवल तरस रही है बल्कि एक दूसरे की जान लेने पर अमादा है। पड़ोसी देश श्रीलंका की तरह ही पाकिस्तान के कंगाली में डूबने से भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं। अगर पाकिस्तान की स्थिति और खराब होती है तो यहां पर चीन सहित अन्य वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप बढ़ सकता है, और अगर ऐसा होता है तो यह भारत के लिए प्रतिकूल स्थिति होगी। इसलिए भारत को इस स्थिति से कूटनीतिक तरीके से निबटना होगा।वास्तविकता तो यह है कि पाकिस्तान के शासकों की नीतियां अपने देश के जन्म के साथ ही विकास की जगह विध्वंसात्मक रही हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान में कभी लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सका और आजादी के बाद आधे से अधिक अवधि के दौरान पाकिस्तान पर सेना का शासन रहा है। गौरतलब है कि अंग्रेजों की चालबाजी एवं कुछ नेताओं के राजनीतिक स्वार्थ के परिणामस्वरूप अन्तत: भारत का विभाजन हुआ। विभाजन के बाद भी दोनों देशों के संबंधों में हमेशा तनाव बना रहा है। इस खटास ने दोनों देशों के बीच ऐसी खाईं पैदा कर दी है, जिसकी भरपाई होना नामुमकिन सा लगता है।भारत के प्रति पाकिस्तान का रवैया प्रारंभ से ही कटुतापूर्ण रहा है। स्वतंत्रता वर्ष में ही पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर पर आक्रमण कर दिया था। इसमें उसकी शिकस्त हुई थी। चूंकि स्वतंत्रता के पूर्व ही अंग्रेजी हुकूमत ने यह घोषणा कर दी थी कि भारत की रियासतों को आजादी है कि वह अपने विवेकानुसार भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं अथवा वे खुद को स्वतंत्र रख सकते हैं। इसी का लाभ उठाते हुए कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत का विलय भारत व पाकिस्तान में करने की जगह खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए उस पर हमला कर दिया। इस पर महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर का विलय भारत के साथ किया और भारत ने पाकिस्तान सेना को वहां से खदेड़ दिया।पाकिस्तान के शासकों और सत्ता में रहे तनाशाहों की विदेश नीति हमेशा भारत विरोध की ही रही है। अप्रैल, 1965 में जब पाकिस्तानी सेना की दो टुकड़ियों ने कच्छ के रन तथा कश्मीर में घुसपैठ प्रारम्भ की, तो दोनों देशों के मध्य युद्ध प्रारम्भ हो गया। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के कारण 22 सितम्बर, 1965 को युद्ध विराम हो गया। युद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत रूस के प्रयत्नों के फलस्वरूप दोनों देशों के बीच 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौता हुआ। हालांकि इस समझौते के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई, जिसके पीछे राजनीतिक षड्यन्त्र होने की बात भी कही गई।पाकिस्तान की गलत नीतियों के चलते ही वर्ष 1971 में भारत-पाक के संबंधों की कटुता में पुन: बढ़ गई। इस वर्ष पूर्वी पाकिस्तान में याहवा खां के अत्याचारों के फलस्वरूप गृह-युद्ध छिड़ गया और लाखों की संख्या में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषी लोग अपनी जान बचाने के लिए भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए। भारत में शरणार्थियों की संख्या लगभग 1 करोड़ तक पहुंच गई। भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों के साथ मानवीय व्यवहार किया तथा उनके लिए भोजन एवं आश्रय की व्यवस्था की।इससे क्षुब्ध होकर 2 दिसम्बर, 1971 को पाकिस्तानी वायुयानों ने भारत के हवाई अड्डों पर भीषण बमबारी शुरू कर दी। विवश होकर भारत को जवाबी हमला करना पड़ा। कई दिनों तक दोनों देशों के बीच भयंकर युद्ध चलता रहा। अन्तत: पाकिस्तान की पराजय हुई एवं भारतीय प्रयासों से पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश के रूप में अस्तित्व में आया। इसके बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष को समाप्त करने के उद्देश्य से 3 जुलाई, 1972 को शिमला समझौता हुआ।शिमला समझौते के बाद 1976 में दोनों देशों के बीच फिर से राजनीतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध कायम होने शुरू हुए, किन्तु 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत रूस के आक्रमण के बाद स्थिति पहले जैसी हो गई, क्योंकि भारत सोवियत रूस का पक्षधर था एवं पाकिस्तान अफगानिस्तान का। इसके बाद 1985 में दोनों देशों के बीच मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के कुछ प्रयास हुए, किन्तु सफलता नहीं मिली।फरवरी, 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐतिहासिक लाहौर बस यात्रा के माध्यम से भारत की ओर से मित्रता की पहल करने की कोशिश की, किन्तु उसी वर्ष अप्रैल में पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ कर अपनी मंशा जता दी। कारगिल में पाकिस्तान को तो उसके आक्रमण का जवाब मिल गया, किन्तु दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। पाकिस्तान ने एक साजिश के तहत 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद पर आतंकी हमला किया। इस हमले के बाद लंबे समय तक दोनों देशों के बीच सम्बन्ध अत्यन्त तनावपूर्ण रहे।यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान कश्मीर सहित भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देता रहा है। वहां जो भी प्रशासक आया, वह पाकिस्तान की जनता का ध्यान विकास से भटकाने के लिए हमेशा भारत से खुद को खतरा बताते हुए सीमा में ही नहीं बल्कि भारत के अंदर आतंकी गतिविधियों को प्रायोजित करता रहा। यही कारण है कि वहां की अर्थव्यवस्था बद से बदतर होती गई और वहां की स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी है। आर्थिक संकट से उबरने के लिए पाकिस्तान ने 30 अरब रुपये का अतिरिक्त कर लगाने का निर्णय किया है। तेल और गैस के भुगतान में चूक से बचने के लिए सरकार 100 अरब रुपये जुटाने का प्रयास कर रही है। इस संबंध में उसने आईएमएफ से एक समझौता कर लिया है। बीते कुछ महीनों में देश के कर्ज में 15 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है।कर्ज तले दबा पाकिस्तान अब कर्ज के लिए अपने कुछ इलाकों और कंपनियों को भी दांव पर लगाने की तैयारी में है। पाकिस्तान यूएई का दो अरब डालर का कर्जदार बना हुआ है। पाकिस्तान इसकी अदायगी नहीं कर पाया है। यूएई ने इसकी अदायगी की अवधि को मार्च 2022 में एक साल के लिए बढ़ाकर मार्च 2023 कर दिया है। दूसरी तरफ चीन द्वारा दिए गए कर्ज को पाकिस्तान को 27 जून से 23 जुलाई के बीच अदा करना था। पाकिस्तान को दो अरब डालर के कर्ज का भुगतान चीन को करना है। फिलहाल कुछ समय के लिए चीन ने इसे स्थगित कर दिया है जो पाकिस्तान के लिए राहत की बात है।चीन ने इस धनराशि की अदायगी के लिए अतिरिक्त समय दे दिया है। विदेशी मुद्रा भंडार बचाने एवं नकदी के संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को हाल ही में चीन ने एक बार फिर 2.3 अरब डालर का ऋण मुहैया कराया है। इससे पहले भी चीन ने 4.5 अरब डालर का कर्ज दिया था। पाक की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने, आजीविका में सुधार और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए चीन पाकिस्तान का समर्थन करता है। परंतु यह रणनीति दीर्घकाल में अब पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह साबित होती दिख रही है। चूंकि पाकिस्तान भारत का निकटतम पड़ोसी है, लिहाजा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बदहाली को देखते हुए भारत की चिंता स्वाभाविक है। यहां ध्यातत्व है कि चीन सहित अन्य वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप भारतीय उप महाद्वीप में बढ़ने से पहले भारत को इस गंभीर समस्या के लिए एक सशक्त कार्य योजना तैयार कर उसे लागू करना होगा ताकि भारत की अस्मिता और संप्रभुता अक्षुण्य बनी रह सके। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

स्वामी विवेकानंद ने समाचारपत्रों को बनाया वेदांत के प्रसार का माध्यम
Published / 2023-01-13 07:48:34
स्वामी विवेकानंद ने समाचारपत्रों को बनाया वेदांत के प्रसार का माध्यम

लोकेन्द्र सिंहएबीएन एडिटोरियल डेस्क। मां भगवती की कृपा से स्वामी विवेकानंद सिद्ध संचारक थे। उनके विचारों को सुनने के लिए भारत से लेकर अमेरिका तक लोग लालायित रहते थे। लेकिन हिन्दू धर्म के सर्वसमावेशी विचार को लेकर स्वामीजी कहां तक जा सकते थे? मनुष्य देह की एक मर्यादा है। भारत का विचार अपने वास्तविक एवं उदात्त रूप में सर्वत्र पहुंचे, वह गूंज उठे और उस पर सार्थक चर्चा हो, इसके लिए वह पुण्यभूमि भारत से निकलकर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के अन्य देशों में प्रवचन करने के लिए पहुंच गये। उन्होंने वहांके समाचार-पत्रों में अपने व्याख्यानों पर केंद्रित समाचार प्रकाशित होने के बाद समाज के गुणीजनों पर उसके प्रभाव को अनुभव किया। स्वामी विवेकानंद ने समाचारपत्र एवं पत्रिकाओं की भूमिका को पहचान कर वेदों के विचारों के प्रसार के लिए उनका उपयोग करने पर जोर दिया। स्वामीजी की प्रेरणा एवं योजना से दो प्रमुख समाचारपत्र प्रकाशित हुए- ब्रह्मवादिन एवं प्रबुद्ध भारत। उन्होंने दोनों ही पत्रों की सब प्रकार से चिंता की। समाचारपत्रों के संपादन, रूप-सज्जा एवं प्रसार पर उनकी बारीक दृष्टि रहती थी।स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका से 1894 में अपने शिष्य आलासिंगा पेरुमल को कई पत्र लिखे, जिनमें उन्होंने समाचारपत्र-पत्रिकाओं को लेकर चर्चा की है। एक पत्र में स्वामीजी लिखते हैं- यदि तुम वेदांत के आधार पर एक पत्रिका निकाल सको तो हमारे कार्य में सहायता मिलेगी। एक अन्य पत्र में स्वामीजी लिखते हैं- एक छोटी-सी समिति की स्थापना करो और उसके मुखपत्रस्वरूप एक नियतकालिक पत्रिका निकालो। तुम उसके संपादक बनो। पत्रिका प्रकाशन तथा प्रारंभिक कार्य के लिए कम से कम कितना व्यय होगा, इसका विवरण मुझे भेजो तथा समिति का नाम एवं पता भी लिखना। इस कार्य के लिए न केवल मैं स्वयं सहायता करूंगा वरन यहां के और लोगों से भी अधिक से अधिक वार्षिक चंदा भिजवाने की व्यवस्था करूंगा। इस तरह अमेरिका में जब उन्हें अधिक समय हो गया और शिष्यों को अपने गुरु से दूर रहने की बेचैनी होने लगी और उन्होंने स्वामीजी से भारत लौटने का आग्रह किया। तब स्वामीजी ने आलासिंगा को लिखा- मुझे कुछ काम करके दिखाओ- एक मंदिर, एक प्रेस, एक पत्रिका और हम लोगों के ठहरने के लिए एक मकान। ध्यान दें कि उन्होंने वेदांत के प्रसार-प्रचार के लिए अपने शिष्यों से एक प्रेस की अपेक्षा की।स्वामीजी के निर्देश उनके शिष्यों ने ब्रह्मवादिन एवं प्रबुद्ध भारत का प्रकाशन तो प्रारंभ कर दिया, लेकिन समाचारपत्रों के प्रकाशन का पर्याप्त अनुभव नहीं होने के कारण अनेक प्रकार की समस्याएं खड़ी होने लगीं। जब स्वामीजी के ध्यान में यह बात आई तब उन्होंने कहा भी कि भले ही हमारे पत्र व्यावसायिक दृष्टि से नहीं निकाले जा रहे हैं लेकिन यह है तो एक व्यवसाय ही। इसलिए समाचारपत्र के व्यावसायिक पक्ष को ध्यान में रखना होगा। यद्यपि स्वामी विवेकानंद भारत से प्रकाशित अपने समाचारपत्रों के लिए अमेरिका में धन संग्रह करते थे। परंतु इस बात को भी भली प्रकार समझते थे कि अमेरिका के धनिकों के बल पर लंबे समय तक भारत के समाचारपत्रों को संचालित नहीं किया जा सकता। भारत के लोग ही अपने समाचारपत्रों की चिंता करेंगे, तभी वांछित परिणाम प्राप्त होंगे। इसलिए वे अपने शिष्यों को कहते थे कि भारत से प्रकाशित समाचारपत्रों के आर्थिक प्रबंधन की चिंता वहीं के लोगों को करनी चाहिए।स्वामी विवेकानंद पत्रिका के उद्देश्य को ध्यान में रखकर उसमें प्रकाशित सामग्री के चयन एवं उनकी भाषा-शैली को लेकर भी सचेत रहते थे। ब्रह्मवादिन के एक अंक में कठोर भाषा में लिखा एक पत्र प्रकाशित हो गया। इस पर स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका से ही आलासिंगा को लिखा कि- तुमने ब्रह्मवादिन में क का एक पत्र प्रकाशित किया है, उसका प्रकाशन न होना ही अच्छा था।थियोसॉफिस्टों ने क की जो खबर ली है, उससे वह जल–भुन रहा है। साथ ही उस प्रकार का पत्र सभ्यजनोचित भी नहीं है, उससे सभी लोगों पर छींटाकशी होती है। ब्रह्मवादिन की नीति से वह मेल भी नहीं खाता। अतः भविष्य में यदि कभी किसी संप्रदाय के विरुद्ध चाहे वह कितना ही खब्ती और उद्धत हो, कुछ लिखे तो उसे नरम करके ही छापना। कोई भी संप्रदाय, चाहे वह बुरा हो या भला, उसके विरुद्ध ब्रह्मवादिन में कोई लेख प्रकाशित नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि प्रवंचकों के साथ जानबूझकर सहानुभूति दिखानी चाहिए। स्वामीजी ब्रह्मवादिन के माध्यम से समाज में सकारात्मक वातावरण चाहते थे, इसलिए उनका मत था कि पाठकों के पास जो सामग्री पहुंचे उसमें किसी प्रकार नकारात्मकता, कठोरता या द्वेष के भाव न हों।एक बात ध्यान रखें कि स्वामी विवेकानंद भारतीय विचार के प्रसार लिए समाचारपत्रों का उपयोग करने के हामी थे परंतु वे उन पर आश्रित नहीं थे। उनके शिष्य संगठन खड़ा करने का कार्य छोड़कर पूरी तरह सिर्फ समाचारपत्रों के प्रकाशन एवं प्रचार-प्रसार पर ही ध्यान केंद्रित करने लगें, यह स्थिति निर्मित न हो, इस ओर भी उनका ध्यान था। स्वामीजी 28 मई 1894 को आलासिंगा को लिखते हैं– समाचार–पत्र चलाना निस्संदेह ठीक है, पर अनंत काल तक चिल्लाने और कलम घिसने की अपेक्षा कण मात्र भी सच्चा काम कहीं बढ़कर है। भट्टाचार्य के घर पर एक सभा बुलाओ और कुछ धन जमाकर मैजिक लैंटर्न, कुछ मानचित्र और कुछ रासायनिक पदार्थ खरीदो, एक कुटिया किरायेे पर लो और काम में लग जाओ! यही मुख्य काम है, पत्रिका आदि गौण हैं। जहां एक ओर वे समाचारपत्रों की भूमिका को समझकर उनके प्रकाशन एवं विस्तार पर जोर देते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने शिष्यों को चेताते हैं कि यह मूल कार्य नहीं है, मूलकार्य तो जनता के बीच प्रत्यक्ष कार्य करना है। समाज से प्रत्यक्ष साक्षात्कार के अभाव में न तो समाज की चुनौतियों की अनुभूति होती है और न ही कार्य ठीक दिशा में आगे बढ़ता है।अमेरिका की शिकागो इंटीरियर पत्रिका का रुख विशेषरूप से स्वामी विवेकानंद को लेकर निंदात्मक था। स्वामीजी इसे पागल इंटीरियर कहते थे। आलोचनात्मक या कहें निंदात्मक लेखन से शिष्य निराश न हों और इस प्रकार की सामग्री को अनदेखा कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें, इसलिए भी स्वामीजी समझाइश देते रहते थे– मेरे संबंध में कुछ दिनों के अंतर में ईसाई मिशनरी पत्रिकाओं में दोषारोपण किया जाता है परंतु उसे पढ़ने की मुझे कोई इच्छा नहीं है। यदि तुम भारत की ऐसी पत्रिकाएं भेजोगे तो मैं उन्हें भी रद्दी कागज की टोकरी में डाल दूंगा। मेरे विषय में लोग क्या कहते हैं, इसकी ओर ध्यान न देना, चाहे वे अच्छा कहें या बुरा। तुम अपने काम में लगे रहो.... मिशनरी ईसाइयों के झूठे वर्णन की ओर तुम्हें ध्यान ही नहीं देना चाहिए। पूर्ण मौन ही उनका सर्वोत्तम खंडन है।इस तरह हम देखते हैं कि सिद्ध संचारक होने के साथ ही स्वामी विवेकानंद को समाज जागरण के लिए संचार माध्यमों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने की भी सिद्धता थी। स्वामीजी समाचारपत्रों की शक्ति, समाचारपत्रों के सदुपयोग एवं दुरुपयोग के प्रति अपने शिष्यों को भली प्रकार अवगत कराते रहते हैं। इस दिशा में स्वामीजी की दृष्टि का अध्ययन करें तो ध्यान आता है कि वे समाचारपत्रों को नकारात्मक विचारों से मुक्त करके उन्हें सकारात्मक साधन बनाने पर जोर देते हैं। (लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)

देश के विकास की रीढ़ होते हैं युवा
Published / 2023-01-12 09:56:37
देश के विकास की रीढ़ होते हैं युवा

राष्ट्रीय युवा दिवस (12 जनवरी) पर विशेषयोगेश कुमार गोयलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। युवा पीढ़ी किसी भी राष्ट्र के विकास की रीढ़ होती है। ऐसी रीढ़, जो यदि क्षतिग्रस्त हो जाए तो शरीर का सीधे खड़े रहना भी असंभव हो जाता है अर्थात रीढ़ के क्षतिग्रस्त होने पर शरीर का विकास होना भी संभव नहीं। ठीक इसी प्रकार देश के विकास के लिए विकास की रीढ़ यानी युवा वर्ग की मानसिकता का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। वर्तमान परिवेश में समाज में चारों तरफ अपराधों तथा भ्रष्टाचार का जो मकड़जाल फैल चुका है, वह घुन बनकर न सिर्फ देश को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है बल्कि युवा वर्ग भी भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के इस दूषित माहौल में हताश व निराश है।ऐसे में युवा वर्ग सही मार्ग से न भटके, इसके लिए युवा शक्ति को जागृत कर उसे देश के प्रति कर्तव्यों का बोध कराते हुए सही दिशा में प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना और उचित मार्गदर्शन बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में राष्ट्रीय युवा दिवस की प्रासंगिकता बहुत बढ़ जाती है, जो प्रतिवर्ष स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर 12 जनवरी को मनाया जाता है।हमें भूलना नहीं चाहिए कि देश की आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ बलिदान कर लोगों में क्रांति का बीजारोपण करने वाले अधिकांश युवा ही थे। स्वामी विवेकानंद, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि देश के अनेक युवाओं ने देश की आन-बान और शान के लिए अपने निजी जीवन के समस्त सुखों का त्याग कर दिया था और अपना समस्त जीवन देश के लिए न्यौछावर कर दिया था लेकिन आधुनिक युग में हम स्वार्थी बनकर ऐसे क्रांतिकारी युवाओं की जीवन गाथाओं को भूल रहे हैं और हम सब धीरे-धीरे भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन रहे हैं। ऐसे ही क्रांतिकारी युवा महापुरुषों की जीवन गाथाओं के जरिये देश की युवा पीढ़ी को समाज में व्याप्त गंदगी से बचाकर देश के विकास में उसका सदुपयोग किया जा सके, इसी उद्देश्य से आधुनिक भारत के महान चिंतक, दार्शनिक, समाज सुधारक, युवा संन्यासी स्वामी विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी को ही प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो बहुत कम आयु में अपने विचारों के चलते समस्त जगत में अपनी एक विशेष पहचान बनाने में सफल हुए थे।स्वामी विवेकानंद के वक्तव्यों का आम जनमानस और खासकर युवाओं के मन-मस्तिष्क पर कितना प्रभाव पड़ता था, इसका उनके शिकागो भाषण से बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। 11 सितम्बर, 1893 को जब शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म पर अपने प्रेरणात्मक भाषण की शुरुआत उन्होंने मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों के साथ की थी तो बहुत देर तक तालियों की गड़गड़ाहट होती रही थी। अपने उस भाषण के जरिये उन्होंने दुनियाभर में भारतीय अध्यात्म का डंका बजाया था। विदेशी मीडिया और वक्ताओं द्वारा भी स्वामीजी को धर्म संसद में सबसे महान व्यक्तित्व और ईश्वरीय शक्ति प्राप्त सबसे लोकप्रिय वक्ता बताया जाता रहा। यह स्वामी विवेकानंद का अद्भुत व्यक्तित्व ही था कि वे यदि मंच से गुजरते भी थे तो तालियों की गड़गड़ाहट होने लगती थी। उन्होंने 01 मई 1897 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में रामकृष्ण मिशन तथा 9 दिसंबर 1898 को कोलकाता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। 04 जुलाई 1902 को इसी रामकृष्ण मठ में ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण किए वे चिरनिद्रा में लीन हो गये।स्वामी विवेकानंद सही मायनों में युवाओं के प्रेरणास्रोत और आदर्श व्यक्त्वि के धनी थे, जिन्हें उनके ओजस्वी विचारों और आदर्शों के कारण ही जाना जाता है। विवेकानंद सदैव कहा करते थे कि उनकी आशाएं देश के युवा वर्ग पर ही टिकी हुई हैं। वे आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि थे और खासकर भारतीय युवाओं के लिए उनसे बढ़कर भारतीय नवजागरण का अग्रदूत अन्य कोई नेता नहीं हो सकता। अपने 39 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में स्वामी जी अलौकिक विचारों की ऐसी बेशकीमती पूंजी सौंप गये, जो आने वाली अनेक शताब्दियों तक समस्त मानव जाति का मार्गदर्शन करती रहेगी। उनका कहना था कि मेरी भविष्य की आशाएं युवाओं के चरित्र, बुद्धिमत्ता, दूसरों की सेवा के लिए सभी का त्याग और आज्ञाकारिता, खुद को और बड़े पैमाने पर देश के लिए अच्छा करने वालों पर निर्भर है। उन्होंने देश को सुदृढ़ बनाने और विकास पथ पर अग्रसर करने के लिए हमेशा युवा शक्ति पर भरोसा किया। उनका कहना था कि मेरी भविष्य की आशाएं युवाओं के चरित्र, बुद्धिमत्ता, दूसरों की सेवा के लिए सभी का त्याग और आज्ञाकारिता, खुद को और बड़े पैमाने पर देश के लिए अच्छा करने वालों पर निर्भर है। युवा शक्ति का आह्वान करते हुए उन्होंने अनेक मूलमंत्र दिये। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

खेतड़ी के राजा अजीत और स्वामी विवेकानन्द...
Published / 2023-01-12 09:51:32
खेतड़ी के राजा अजीत और स्वामी विवेकानन्द...

युवा दिवस/ 12 जनवरी विशेष रमेश सर्राफ धमोराएबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजस्थान के झुंझुनू जिले के खेतड़ी नरेश राजा अजीत सिंह धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले शासक थे। गर्मी के दिनों में राजा अजीतसिंह माउंट आबू स्थित अपने खेतड़ी महल में थे। उसी दौरान 4 जून, 1891 को युवा संन्यासी विवेकानन्द से उनकी पहली बार मुलाकात हुई। इस मुलाकात में अजीत सिंह उस युवा संन्यासी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपना गुरु बना लिया और अपने साथ खेतड़ी चलने का आग्रह किया। स्वामी विवेकानन्द 7 अगस्त, 1891 को पहली बार खेतड़ी पहुंचे। खेतड़ी में विवेकानन्द 27 अक्टूबर, 1891 तक रहे। यहीं स्वामी विवेकानन्द ने राज पण्डित नारायणदास शास्त्री के सहयोग से पाणिनी का अष्टाध्यायी व पतंजलि का महाभाष्याधायी का अध्ययन किया। स्वामीजी ने व्याकरणाचार्य और पाण्डित्य के लिए विख्यात नारायणदास शास्त्री को लिखे पत्रों में उन्हें मेरे गुरु कहकर सम्बोधित किया है।अमेरिका जाने से पूर्व 21 अप्रैल, 1893 को स्वामी विवेकानंद दूसरी बार खेतड़ी पहुंचे। इस बार वह 10 मई, 1893 तक खेतड़ी में ठहरे। इस दौरान एक दिन राजा अजीत सिंह और स्वामीजी फतेहविलास महल में बैठे शास्त्र चर्चा कर रहे थे। तभी राज्य की नर्तकियों ने वहां आकर गायन वादन का अनुरोध किया। इस पर संन्यासी होने के नाते स्वामीजी उठकर जाने लगे। नर्तकियों की दल नायिका मैनाबाई ने स्वामी जी से आग्रह किया कि वो विराजें। उन्हें वो भजन सुनायेगी। मैनाबाई ने महाकवि सूरदास रचित प्रसिद्ध भजन प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो, समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो... सुनाया। इस सुनकर स्वामीजी की आंखों में आंसुओं की धारा बह निकली। उन्होंने उस पतिता नारी को ज्ञानदायिनी मां कहकर सम्बोधित किया और कहा कि आपने आज मेरी आंखें खोल दी हैं।इस भजन को सुनकर ही स्वामीजी संन्यासोन्मुखी हुए। 10 मई, 1893 को स्वामीजी ने मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में खेतड़ी से अमेरिका जाने को प्रस्थान किया। महाराजा अजीत सिंह के आर्थिक सहयोग से ही स्वामी विवेकानन्द अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में शामिल हो वेदान्त की पताका फहराकर भारत को विश्व धर्मगुरु का सम्मान दिलाया। अमेरिका जाते वक्त खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह ने अपने मुंशी जगमोहन लाल व अन्य कर्मचारियों को बम्बई तक स्वामी जी की यात्रा की तैयारियों व व्यवस्था करने के लिए भेजा था।इस बात की बहुत कम लोगों को जानकारी है कि स्वामीजी का स्वामी विवेकानन्द नाम भी राजा अजीतसिंह ने रखा था। इससे पूर्व स्वामीजी का नाम विविदिषानन्द था। शिकागो जाने से पूर्व राजा अजीत सिंह ने स्वामीजी से कहा आपका नाम बड़ा कठिन है। उसका अर्थ नहीं समझा जा सकता है। उसी दिन राजा अजीत सिंह ने उनके सिर पर भगवा साफा बांधा व भगवा चोगा पहना कर नया वेश व नया नाम स्वामी विवेकानन्द प्रदान किया, जिसे स्वामीजी ने जीवन पर्यन्त धारण किया।शिकागो में हिन्दू धर्म की पताका फहराकर स्वामीजी विश्व भ्रमण करते हुए 1897 में जब भारत लौटे तो 17 दिसम्बर, 1897 को खेतड़ी नरेश ने स्वामीजी के सम्मान में 12 मील दूर जाकर उनका स्वागत किया व भव्य गाजे-बाजे के साथ खेतड़ी लेकर आये। उस वक्त स्वामी जी को सम्मान स्वरूप खेतड़ी दरबार के सभी ओहदेदारों ने दो-दो सिक्के भेंट किये व खेतड़ी नरेश ने तीन हजार सिक्के भेंट कर दरबार हाल में स्वामी जी का स्वागत किया। उनके स्वागत में पूरे खेतड़ी में चालीस मण (सोलह सौ किलो) देशी घी के दीपक जलवाये थे। इससे भोपालगढ़, फतेहसिंह महल, जयनिवास महल के साथ पूरा शहर खेतड़ी जगमगा उठा था।20 दिसम्बर, 1897 को खेतड़ी के पन्नालाल शाह तालाब पर प्रीतिभोज देकर स्वामी जी का भव्य स्वागत किया गया । शाही भोज में उस वक्त खेतड़ी ठिकाना के पांच हजार लोगों ने भाग लिया था। उसी समारोह में स्वामी विवेकानन्द ने खेतड़ी में सावजनिक रूप से भाषण दिया। भाषण सुनने वालों में खेतड़ी नरेश अजीत सिंह के साथ काफी संख्या में विदेशी राजनयिक भी शामिल हुए थे। 21 दिसम्बर, 1897 को स्वामीजी खेतड़ी से प्रस्थान कर गए। यह स्वामीजी का अन्तिम खेतड़ी यात्रा थी।स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर स्वीकार किया था कि यदि खेतड़ी के राजा अजीतसिंह से उनकी भेंट नहीं हुई होती तो भारत की उन्नति के लिए उनके द्वारा जो थोड़ा बहुत प्रयास किया गया उसे वे कभी नहीं कर पाते। स्वामी जी, राजा अजीत सिंह को समय-समय पर पत्र लिखकर जनहित कार्य जारी रखने की प्रेरणा देते रहते थे। स्वामी विवेकानन्द ने ही राजा अजीत सिंह को खगोल विज्ञान की शिक्षा दी थी। उन्होंने खेतड़ी के संस्कृत विद्यालय में अष्ठाध्यायी ग्रंथों का अध्ययन भी किया था। स्वामी विवेकानन्द के कहने पर ही राजा अजीत सिंह ने खेतड़ी में शिक्षा के प्रसार के लिए जय सिंह स्कूल की स्थापना की थी।राजा अजीत सिंह और स्वामी विवेकानन्द के अटूट सम्बन्धों की अनेक कथाएं आज भी खेतड़ी के लोगों की जुबान पर सहज ही सुनने को मिल जाती हैं। स्वामीजी का मानना था कि यदि राजा अजीतसिंह नहीं मिलते तो उनका शिकागो जाना संभव नहीं होता। स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी, 1863 में व मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई थी। इसी तरह राजा अजीत सिंह जी का जन्म 10 अक्टूबर 1861 और मृत्यु 18 जनवरी 1901 को हुई थी। दोनों का निधन 39 वर्ष की आयु में हो गया था व दोनों के जन्म व मृत्यु का समय में भी ज्यादा अन्तर नहीं था। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है।स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन 12 जनवरी को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा दिवस मनाये जाने का प्रमुख कारण उनका दर्शन, सिद्धांत, आध्यात्मिक विचार और उनके आदर्श है। जिनका उन्होंने स्वयं पालन किया और भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी उन्हें स्थापित किया। स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन नामक सेवा भावी संगठन की स्थापना की थी। उसकी पहली शाखा खेतड़ी में 1958 में खोली थी। मिशन द्वारा खेतड़ी में गरीब तथा पिछड़े बालक-बालिकाओं के लिए श्री शारदा शिशु विहार नाम से एक बालवाड़ी, सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय एवं एक मातृ सदन तथा शिशु कल्याण केन्द्र भी चलाया जा रहा है। खेतड़ी में रामकृष्ण मिशन ने करोड़ों रुपये की लागत से स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रीय संग्रहालय बनवाया है। यह देश का पांचवां और राजस्थान का पहला संग्रहालय है। (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

देश की प्रगति में प्रवासियों का योगदान
Published / 2023-01-10 23:00:23
देश की प्रगति में प्रवासियों का योगदान

डॉ दिलीप अग्निहोत्रीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रवासी भारतीयों की प्रतिभा विकसित देशों तक प्रतिष्ठित हो रही है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने पहली बार प्रवासी भारतीयों पर ध्यान केंद्रित किया है। नरेन्द्र मोदी अपनी प्रत्येक विदेश यात्रा में प्रवासियों से संवाद करते हैं। विगत आठ वर्षों के दौरान विदेशों में प्रवासी भारतीयों के अभूतपूर्व सम्मेलन हुए हैं। इनमें नरेन्द्र मोदी के साथ सम्बन्धित देशों के शासक भी मंच साझा करते रहे हैं। इस नीति के दो प्रभाव हुए। पहला यह कि सम्बन्धित देश में प्रवासी भारतीयों का सम्मान और प्रभाव बढ़ा। वहां के शासन ने उन्हें विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराईं। दूसरा यह कि इन प्रवासियों ने भारत की प्रगति में योगदान देना शुरू किया। वह अपनी मातृभूमि के प्रति दायित्व का निर्वाह करने लगे हैं। नये सिरे से भारतीय सभ्यता संस्कृति से जुड़ रहे हैं।काशी के प्रवासी सम्मेलन में प्रवासियों का संस्कृति प्रेम दिखाई दिया था। इस सम्मेलन के बाद प्रवासी भारतीय प्रयागराज कुंभ स्नान के लिये गये। उनके लिए यह भावनात्मक पल थे। यहां की व्यवस्था देख कर वह प्रभावित हुए थे। प्रयागराज कुंभ में कायम हुए अनेक वैश्विक कीर्तिमान से वह गौरवान्वित लग रहे थे। काशी, अयोध्या उज्जैन आदि के ऐतिहासिक नवनिर्माण उन्हें आकर्षित करते हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान को देख कर उनका भी आत्मविश्वास जागृत होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंदौर में प्रवासी सम्मेलन के सत्रहवें संस्करण का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र अगले 25 वर्षों के अमृत काल में प्रवेश कर चुका है।प्रवासी भारतीय समुदाय को वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को और ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। प्रवासी भारतीय को विदेशी धरती पर भारत के ब्रांड एंबेसडर है।वह मेक इन इंडिया, योग, आयुर्वेद, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प और बाजरा के ब्रांड एंबेसडर हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत द्वारा हासिल किए गए अभूतपूर्व विकास के लिए पूरी दुनिया उत्सुकता से भारत की ओर देख रही है। आज भारत के पास न केवल दुनिया का नॉलेज सेंटर बनने का बल्कि स्किल कैपिटल बनने का भी सामर्थ्य है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इको सिस्टम है। दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा निर्माण में अग्रणी है। यही कारण हैं कि दुनिया भर के लोग भारत की गति और पैमाने के बारे में उत्सुक हैं। भारत की ये स्किल कैपिटल दुनिया के विकास का इंजन बन सकती है। सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी ने कहा कि मां और मातृभूमि स्वर्ग से बढ़कर है। प्रवासी भारतीय सम्मेलन दोनों देशों के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलेगा। प्रवासी भारतीयों के लिए कैरेबियन देशों सहित अन्य देशों में हिंदी योग, आयुर्वेद, अध्यात्म आदि पर प्रशिक्षण की व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता है lइससे धर्म, संस्कृति और हमारी परंपराओं को प्रवासी भारतीय समुदायों में भी सुरक्षित रखने में सहायता मिलेगी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और उनकी वसुधैव कुटुंबकम के अनुरूप संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की दृष्टि महत्वपूर्ण हैं। गुयाना के राष्ट्रपति डॉ मोहम्मद इरफान अली ने अपने पूर्वजों की धरती भारत को प्रणाम तथा महात्मा गांधी का स्मरण किया। इरफान अली ने कहा कि कोविड काल में जब वैश्वीकरण की संपूर्ण व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी, तब नरेन्द्र मोदी ने देशों की सहायता कर दुनिया को प्रेम और सहयोग का संदेश दिया। भारत, विश्व में प्रतिभा और टेक्नोलॉजी के विकास में अन्य देशों की तुलना में कहीं आगे है। नरेन्द्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के संकल्प के साथ देश आज दुनिया को नेतृत्व प्रदान कर रहा है। भौगोलिक दूरी की दृष्टि से भले ही दोनों देश दूर हों पर भावनात्मक रूप से निकटता बहुत अधिक है और भविष्य में हमारे संबंध अधिक प्रगाढ़ होंगे। नरेन्द्र मोदी ने प्रवासी भारतीय दिवस प्रदर्शनी का शुभारंभ किया। पहली बार आयोजित अपनी तरह की इस डिजिटल प्रदर्शनी की थीम आजादी का अमृत महोत्सव : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रवासी भारतीयों का योगदान है। यहां विदेश में चलाए गए गदर मूवमेंट का भी जिक्र है। प्रदर्शन में थ्री डी तकनीक से बना एक ऐसा सिस्टम लगाया गया है, जिससे बीस सेकेंड में आपको पता लगेगा कि आपका चेहरा देश के किस वीर सपूत से मिलता है। स्वामी विवेकानंद के अलावा महात्मा गांधी का भी रोचक तरीके से जीवन वृतांत बताया गया है। डिजिटल प्रदर्शनी में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रवासी भारतीयों के योगदान को डिजिटली बखूबी दर्शाया गया।इस वर्ष भारत दुनिया के जी-20 समूह की अध्यक्षता भी कर रहा है। भारत इस जिम्मेदारी को एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। ये दुनिया को भारत के बारे में बताने का अवसर है। जब हम भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् आधारित विकासपरक सोच एवं विभिन्न विकास क्षेत्रों तकनीकी आधारित विकास, डिजिटल परिवर्तन, सशक्त फार्मा सेक्टर, पर्यावरण आधारित जीवनशैली एवं विकास गतिविधियां आदि में भारत की क्षमताओं तथा गौरवशाली परंपरा, संस्कृति को वैश्विक स्वर प्रदान कर सकते हैं। जी-20 समूह विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों का विश्व का सबसे बड़ा समूह है। जी 20 के सदस्य मिलकर पच्चासी प्रतिशत वैश्विक जीडीपी, पचहत्तर प्रतिशत वैश्विक व्यापार,नब्बे प्रतिशत पेटेंट के प्रति उत्तरदायी है एवं विश्व की साठ प्रतिशत जनसंख्या इन देशों में निवासरत है। यह वैश्विक स्थिति जी-20 को महत्वपूर्ण बनाती है। इसके अंतर्गत विभिन्न आयोजन स्थलों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, मैराथन, सेल्फ़ी विथ मान्यूमेन्ट आदि प्रतियोगिताएं एवं कार्यक्रम किए जा रहे हैं। जी-20 के इतिहास में पहली बार यह कार्यक्रम 56 शहरों में किया जायेगा। आयोजन स्थल के शहरों को भी इसका लाभ प्राप्त होगा। साथ ही वहां की विशिष्टताओं से भी प्रतिनिधियों का परिचय कराने का अवसर प्राप्त होगा। इस कार्यक्रम से हम भारत की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विविधताओं से भी विश्व को अवगत करायेंगे। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

आरक्षण का आधार जाति नहीं सिर्फ गरीबी हो...
Published / 2023-01-10 22:54:21
आरक्षण का आधार जाति नहीं सिर्फ गरीबी हो...

डॉ वेदप्रताप वैदिकएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भोपाल में करणी सेना ने एक अपूर्व प्रदर्शन आयोजित किया और मांग की कि सरकारी नौकरियों, चुनावों और शिक्षण संस्थाओं में, जहां भी आरक्षण की व्यवस्था है, वहां सिर्फ गरीबी के आधार पर आरक्षण दिया जाये। यह करणी सेना राजपूतों का संगठन है। इसने जातीय आरक्षण के विरुद्ध सीधी आवाज नहीं उठायी है, क्योंकि यह खुद ही जातीय संगठन है लेकिन इस समय देश में जहां भी आरक्षण दिया जा रहा है, वह प्रायः जातीय आधार पर ही दिया जा रहा है। यदि सिर्फ गरीबी के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बन जाये तो जाति भेदभाव के बिना भी देश के सभी कमजोर लोगों को आरक्षण मिल सकता है।यह मांग तो भारत के कम्युनिस्टों को सबसे ज्यादा करनी चाहिए, क्योंकि कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में सबसे ज्यादा हिमायत इसी गरीब वर्ग की है। उन्होंने इसे सर्वहारा (प्रोलेटेरिएट) कहा है। कम्युनिस्टों की क्या कहें, देश की सभी पार्टियां थोक वोटों की गुलाम हैं। थोक वोटों का सबसे बड़ा श्रोत जातियां ही हैं। इसीलिए देश के किसी नेता या पार्टी में इतना दम नहीं है कि वह जातीय आरक्षण का विरोध करे। बल्कि कई अन्य जातियों के नेता आजकल अपने लिए आरक्षण के आंदोलन चला रहे हैं। यदि करणी सेना के राजपूत लोग अपने आंदोलन में सभी जातियों को जोड़ लें (अनुसूचित जातियों को भी) तो वह सचमुच महान राष्ट्रीय आंदोलन बन सकता है। अनेक अनुसूचित लोग, जो स्वाभिमानी हैं और दूसरों की दया पर निर्भर रहना गलत मानते हैं, वे भी करणी सेना के साथ आ जायेंगे।करणी सेना की यह मांग भी सही है कि किसी भी परिवार की सिर्फ एक पीढ़ी को आरक्षण दिया जाये ताकि अगली पीढ़ियां आत्मनिर्भर हो जायें। करणी सेना की यह मांग भी उचित प्रतीत होती है कि उस कानून को वापस लिया जाये, जिसके मुताबिक किसी भी अनुसूचित व्यक्ति की शिकायत के आधार पर किसी को भी जाँच किए बिना ही गिरफ्तार कर लिया जाता है। इसमें शक नहीं है कि देश के अनुसूचितों ने सदियों से बहुत जुल्म सहे हैं और उनके प्रति न्याय होना बेहद जरूरी है लेकिन हम भारत में ऐसा समाज बनाने की भूल न करें, जो जातीय आधार पर हजारों टुकड़ों में बंटता चला जाये। भारत और पड़ोसी देशों के तथाकथित अनुसूचित और पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाने का उपाय जातीय आरक्षण नहीं है। उन्हें और तथाकथित ऊंची जातियों के लोगों को भी जन्म के आधार पर नहीं, जरूरत के आधार पर आरक्षण दिया जाये। यदि हम आरक्षण का आधार ठीक कर लें तो देश में समता और संपन्नता का भवन तो अपने आप ही खड़ा हो जायेगा। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

आखिर कैसे सुधरेगा हमारा लोकतंत्र...
Published / 2023-01-09 22:43:47
आखिर कैसे सुधरेगा हमारा लोकतंत्र...

डॉ वेदप्रताप वैदिकएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। कई देशों में लोकतंत्र खत्म हुआ और तानाशाही आ गयी लेकिन भारत का लोकतंत्र जस का तस बना हुआ है लेकिन क्या इस तथ्य से हमें संतुष्ट होकर बैठ जाना चाहिए? नहीं, बिल्कुल नहीं। भारतीय लोकतंत्र ब्रिटिश लोकतंत्र की नकल पर गढ़ा गया है। लंदन का राजा तो नाम मात्र का होता है लेकिन भारत में पार्टी-नेता सर्वेसर्वा बन जाते हैं। सभी पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह या तो कुछ व्यक्तियों या कुछ परिवारों की निजी संपत्तियां बन गयी हैं। उनमें आंतरिक लोकतंत्र शून्य हो गया है। चुनाव से जो सरकारें बनती हैं, वे बहुमत का प्रतिनिधित्व क्या करेंगी? उन्हें कुल मतदाताओं के 20 से 30 प्रतिशत वोट भी नहीं मिलते और वे सरकारें बना लेती हैं। हमारी संसद और विधानसभाओं को पक्ष और विपक्ष के दल एक अखाड़े में तब्दील कर डालते हैं। चुनाव में खर्च होने वाले अरबों-खरबों रुपये नेताओं को भ्रष्टाचारी बना डालते हैं। तब क्या किया जाये?पिछले दिनों मैंने इन समस्याओं पर आचार्य कृपलानी स्मारक व्याख्यान दिया था। उसके कुछ बिंदु संक्षेप में देश के सुधिजन के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं। सबसे पहले तो हम चुनाव-प्रणाली ही बंद कर दें। इसकी जगह हर पार्टी को उसकी सदस्य-संख्या के अनुपात में सांसद और विधायक भेजने का अधिकार मिले। इसके कई फायदे होंगे। चुनाव खर्च बंद होगा। भ्रष्टाचार मिटेगा। करोड़ों लोग राजनीतिक रूप से सक्रिय हो जायेंगे। अभी सभी पार्टियों की सदस्य-संख्या 15-16 करोड़ के आसपास है। फिर वह 60-70 करोड़ तक हो सकती है। इस नई प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो भी सरकार बनेगी, उसमें सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिल जायेगा। वह सरकार राष्ट्रीय सरकार होगी, दलीय नहीं, जैसी कि आजादी के तुरंत बाद बनी थी। इस क्रांतिकारी प्रणाली की कई कमियों को कैसे दूर किया जा सकेगा, यह विषय भी विचारणीय है।जब तक यह नई प्रणाली शुरू नहीं होती है, हमारी वर्तमान प्रणाली में भी कई सुधार किए जा सकते हैं। सबसे पहला सुधार तो यही है कि जब तक किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिलें, उसे चुना नहीं जाये। इसी प्रकार चुने हुए सांसदों की सरकार सचमुच बहुमत की सरकार होगी। उम्मीदवारों की उम्र 25 साल से बढ़ाकर 40 साल की जाये और 50 साल के होने पर ही उन्हें मंत्री बनाया जाये।संसद सदस्यों की संख्या 1 हजार से डेढ़ हजार तक बढ़ाई जाये। सभी जन-प्रतिनिधियों की आय और निजी संपत्तियों का ब्यौरा हर साल सार्वजनिक किया जाये। देश में रेफरेन्डम और रिकाल की व्यवस्था भी लागू की जानी चाहिए। सारे कानून राजभाषा में बनें और सभी अदालतें अपने फैसले स्वभाषाओं में दें। सांसदों और विधायकों की पेंशन खत्म की जाये। उनके, अफसरों और मंत्रियों के खर्चों पर रोक लगायी जाये। अन्य सुझाव, कभी और। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

कृपया हिन्दी के शब्दों की हत्या न करें...
Published / 2023-01-09 22:37:41
कृपया हिन्दी के शब्दों की हत्या न करें...

विश्व हिन्दी दिवस (10 जनवरी) पर विशेषडॉ वंदना सेनएबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारी संस्कृति के कई बिन्दु हैं। इन्हें सुनकर या देखकर हम सभी को गौरव की अनुभूति होती है। इनमें से एक बिन्दु हमारी हिन्दी भाषा है। यह हमारे मूल से प्रस्फुटित है। सही मायनों में हिन्दी भारत का गौरव गान है। जिसे हम जितना आचरण में लाएंगे, उतना ही हम सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होते जायेंगे। यह सर्वकालिक सत्य है कि कोई भी देश अपनी भाषा में ही अपने मूल स्वत्व को प्रकट कर सकता है। निज भाषा देश की उन्नति का मूल होता है। निज भाषा को नकारना अपनी संस्कृति को विस्मरण करना है। जिसे अपनी भाषा पर गौरव का बोध नहीं होता, वह निश्चित ही अपनी जड़ों से कट जाता है और जो जड़ों से कट गया उसका अंत हो जाता है। भारत का परिवेश नि:संदेह हिन्दी से भी जुड़ा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि हिन्दी भारत का प्राण है, हिन्दी भारत का स्वाभिमान है, हिन्दी भारत का गौरवगान है।आज हम जाने अनजाने में जिस प्रकार से भाषा के साथ मजाक कर रहे हैं, वह अभी हमें समझ में नहीं आ रहा होगा, लेकिन भविष्य के लिए यह अत्यंत दुखदायी होने वाला है। वर्तमान में प्राय: देखा जा रहा है कि हिन्दी की बोलचाल में अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का समावेश बेखटके हो रहा है। इसे हम अपने स्वभाव का हिस्सा मान चुके हैं, लेकिन हम विचार करें कि क्या यह हिन्दी के शब्दों की हत्या नहीं है? हम विचार करें कि जब भारत में अंग्रेजी नहीं थी, तब हमारा देश किस स्थिति में था। हम अत्यंत समृद्ध थे, इतने समृद्ध कि विश्व के कई देश भारत की इस समृद्धि से जलन रखते थे। इसी कारण विश्व के कई देशों ने भारत की इस समृद्धि को नष्ट करने का तब तक षड्यंत्र किया, जब तक वे सफल नहीं हो गये। हमें एक बात ध्यान रखना होगा कि हम अंग्रेजी को केवल एक भाषा के तौर पर स्वीकार करें। भारत के लिए अंग्रेजी केवल एक भाषा ही है। जब हम हिन्दी को मातृभाषा का दर्जा देते हैं तो यह भाव हमारे स्वभाव में प्रकट होना चाहिए। हिन्दी हमारा स्वत्व है। इसलिए कहा जा सकता है कि हिन्दी हृदय की भाषा है।भाषाओं के मामले में भारत को विश्व का सबसे बड़ा देश निरूपित किया जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारत दक्षिण के राज्यों में अपनी एक भाषा है, जिसे हम विविधता के रूप में प्रचारित करते हैं। कभी-कभी यह भी देखा जाता है कि राजनीतिक कारणों के प्रभाव में आकर दक्षिण भारत के कुछ लोग हिन्दी का विरोध करते हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में जो भाषा बोली जाती है, उसका हिन्दी भाषियों ने सदैव सम्मान किया है। भाषा और बोली तौर पर भारत की एक विशेषता यह भी है कि चाहे वह दक्षिण भारत का राज्य हो या फिर उत्तर भारत का, हर प्रदेश का नागरिक अपने शब्दों के उच्चारण मात्र से यह प्रदर्शित कर देता है कि वह किस राज्य का है। प्राय: सुना भी होगा कि भाषा को सुनकर हम उसका राज्य या अंचल तक बता देते हैं। यह भारत की बेहतरीन खूबसूरती ही है। जहां तक राष्ट्रीयता का सवाल आता है तो हर देश की पहचान उसकी भाषा भी होती है। हिन्दी हमारी राष्ट्रीय पहचान है। दक्षिण के राज्यों के नागरिकों की प्रादेशिक पहचान के रूप में उनकी अपनी भाषा हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय पहचान की बात की जाए तो वह केवल हिन्दी ही हो सकती है। हालांकि आज दक्षिण के राज्यों में हिन्दी को जानने और बोलने की उत्सुकता बढ़ी है, जो उनके राष्ट्रीय होने को प्रमाणित करता है। आज पूरा भारत राष्ट्रीय भाव की तरफ कदम बढ़ा रहा है। हिन्दी के प्रति प्रेम प्रदर्शित हो रहा है।आज हमें इस बात पर भी मंथन करना चाहिए कि भारत में हिन्दी दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। भारत में अंग्रेजी दिवस और उर्दू दिवस क्यों नहीं मनाया जाता। इसके पीछे यूं तो कई कारण हैं, लेकिन वर्तमान का अध्ययन किया जाये तो यही परिलक्षित होता है कि आज हम स्वयं ही हिन्दी के शब्दों की हत्या करने पर उतारू हो गये हैं। ध्यान रखना होगा कि आज जिस प्रकार से हिन्दी के शब्दों की हत्या हो रही है, कल पूरी हिन्दी भाषा की भी हत्या हो सकती है। हम विचार करें कि हिन्दी भारत के स्वर्णिम अतीत का हिस्सा है। हिन्दी हमारी संस्कृति का हिस्सा है। ऐसा हम अंग्रेजी के बारे में कदापि नहीं बोल सकते।आज हिन्दी को पहले की भांति वैश्विक धरातल प्राप्त हो रहा है। विश्व के कई देशों में हिन्दी के प्रति आकर्षण का आत्मीय भाव संचरित हुआ है। वे भारत के बारे में गहराई से अध्ययन करना चाह रहे हैं। विश्व के कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम संचालित किए जाने लगे हैं। विश्व के कई देशों के नागरिक हिन्दी के प्रति अनुराग दिखा रहे हैं। इतना ही नहीं आज विश्व के कई देशों में हिन्दी के संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। जो वैश्विक स्तर पर हिन्दी की समृद्धि का प्रकाश फैला रहे हैं। भारत के साथ ही सूरीनाम फिजी, त्रिनिदाद, गुआना, मॉरीशस, थाईलैंड व सिंगापुर में भी हिन्दी वहां की राजभाषा या सह राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुकी है। इतना ही नहीं आबूधाबी में भी हिन्दी को तीसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता मिल चुकी है। आज विश्व के लगभग 44 ऐसे देश हैं जहां हिन्दी बोलने का प्रचलन बढ़ रहा है। सवाल यह है कि जब हिन्दी की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ रही है, तब हम अंग्रेजी के पीछे क्यों भाग रहे हैं। हम अपने आपको भुलाने की दिशा में कदम क्यों बढ़ा रहे हैं। (लेखिका, पीजीवी महाविद्यालय ग्वालियर में सहायक प्राध्यापक हैं।)

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