डॉ नितेश शर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की संसदीय राजनीति के मानक ही नहीं बदले हैं बल्कि वे नवाचारों के अधिष्ठाता भी हैं। लाल किले की प्राचीर से स्वच्छता की बात हो या फिर हर घर तिरंगा जैसा राष्ट्रव्यापी अभियान। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि भला प्रधानमंत्री भी कभी बच्चों से उनकी पढ़ाई और फिर परीक्षा पर चर्चा भी कर सकते हैं। परीक्षा एक ऐसा शब्द है जिसका नाम सुनते ही मन में एक अदृश्य भय और तनाव प्रवेश कर जाता है। चाहे बालक हो या युवा, किसी भी आयु का कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, परीक्षा का नाम सुनते ही एक भिन्न प्रकार का मानसिक दबाव महसूस करने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि परीक्षार्थी अपनी प्रतिभा का संपूर्ण प्रदर्शन नहीं कर पाता।अनेक बार यह देखने में आया है कि बोर्ड परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थी परिणाम आने से पहले ही आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। परीक्षा के तनाव को दूर करने के उद्देश्य से नरेन्द्र मोदी 2016 से हर वर्ष देश भर के बच्चों से परीक्षा पे चर्चा करते हैं। प्रधानमंत्री ने विद्यार्थियों को जरूरी टिप्स देने के लिए एग्जाम वॉरियर्स नामक पुस्तक भी लिखी है। इसमें 28 मंत्र दिए गए हैं । इतना ही नहीं पुस्तक में प्रधानमंत्री ने अभिभावकों के लिए भी आठ सुझाव भी दिये हैं।प्रधानमंत्री के इस नवाचार के प्रति बच्चों में उत्साह और भरोसे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष 27 जनवरी को होने वाले कार्यक्रम के लिए देश के 38 लाख बच्चों ने अपना पंजीयन कराया है।परीक्षा के समय केवल विद्यार्थी ही नहीं अपितु माता-पिता के ऊपर भी दबाव रहता है। विद्यार्थी का तनाव उसके अभिभावकों को भी परेशान करता है इसलिए विद्यार्थी और अभिभावक दोनों का ही जागरूक होना नितांत आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने पुराने ढर्रे पर चली आ रही शिक्षा व्यवस्था में अनेक संशोधन किए हैं किंतु फिर भी आज के प्रतियोगी युग में जहां विद्यार्थी के ऊपर परिवार, समाज का दबाव रहता ही है। प्रधानमंत्री द्वारा लिखित इस पुस्तक में बताया गया है कि बोर्ड परीक्षा पूरे जीवन की अंतिम परीक्षा नहीहै।यह जीवनारम्भ है। इसलिए परीक्षा, परीक्षा के लिए है परीक्षा जीवन पर हावी न हो जाए, परीक्षा जीवन के आनंद को नष्ट न कर दे इस बात की प्रेरणा विद्यार्थियों को सतत दी जानी चाहिए। परीक्षा को सजगता के साथ फेस करें न कि उसे जीवन मरण का प्रश्न बनायें।प्रधानमंत्री का यह विचार बहुत ही प्रेरणादायक है कि विद्यार्थियों को जितना संभव हो दूसरों से प्रतिस्पर्धा करने से बचना चाहिए, हमें दूसरे से नहीं अपितु अपने आप से स्पर्धा करना सीखना चाहिए। जब हम स्वयं से स्पर्धा करेंगे तब हम निरंतर अपने आप को बेहतर बनाने का प्रयास करते रहेंगे। इसलिए प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि विद्यार्थियों को स्वयं अपने आप से स्पर्धा करना सिखायें। उन्हें प्रतिस्पर्धा नहीं अपितु अनु स्पर्धा करना सिखाए। परीक्षाओं के समय विद्यार्थियों के ऊपर एक नकारात्मक प्रभाव हावी होने लगता है। कई बार या देखने को मिलता है कि विद्यार्थी पहले से याद किया हुआ भूलने लगते हैं। कुछ विद्यार्थी ऐसा कहते हैं कि अब उन्हें नया याद करने में कठिनाई हो रही है। इस सब के पीछे का कारण क्या है ? इस सब के पीछे का महत्वपूर्ण कारण है तनाव और मानसिक हम यह जानते हैं कि हमारा मन तनाव की स्थिति में चीजों को इतनी आसानी से ग्रहण नहीं कर पाते जितना कि उत्साह की स्थिति में ग्रहण करता है। विद्यार्थी को जब ऐसा लगे कि उसे परीक्षा के समय पहले से याद किया हुआ वह भूल रहा है तब हमें उसे शांत और निश्चिंत हो जाने के लिए कहना चाहिए, कुछ विद्यार्थियों में यह देखने में आता है कि परीक्षा के समय भी अपने सोने के समय में बड़ी कटौती कर देते हैं जबकि सोने से हम अपने मस्तिष्क को आराम देते हैं जिससे कि वह पुन: कार्य करने के लिए तैयार हो सके।अत: हर स्थिति में विद्यार्थियों को परीक्षा के समय पर्याप्त नींद लेते रहना चाहिए। विद्यार्थी इस देश का भविष्य है और परीक्षा इस देश के भविष्य को बनाने के लिए है उन्हें तनाव देने के लिए नहीं। इसलिए समाज के सभी शिक्षकों को बुद्धिजीवियों को एवं जागरूक नागरिकों को एक साथ मिलकर अपने आसपास घर-परिवार के विद्यार्थियों को तनाव मुक्त परीक्षा देने के लिए प्रेरित करना चाहिए। विद्यार्थियों के साथ परीक्षाओं के समय में एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ एक आत्मीय भाव के साथ व्यवहार करना चाहिए। एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सब का यह कर्तव्य है कि बच्चों को नंबरों की अंधी दौड़ की ओर धकेलने से बचें। प्रसन्नता की बात है कि हमारे प्रधानमंत्री स्वयं बच्चों से बात करके उनमें सकारात्मक भाव जागृत करने के लिए परीक्षा पे चर्चा के माध्यम से बच्चों से सीधे जुड़ते हैं। हमारा कर्तव्य है कि अपने बच्चों को इस आयोजन का सीधा प्रसारण सुनवाकर उन्हें लाभान्वित करें। (लेखक, भाजपा शिक्षक प्रकोष्ठ मध्य प्रदेश के संयोजक हैं।)
सत्यनारायण गुप्ताएबीएन सेंट्रल डेस्क। उत्तराखंड के चमोली में स्थित ज्योतिर्मठ या जोशीमठ को बद्रीनाथ भगवान की शीतकालीन गद्दी भी कहा जाता है। सर्दियों में बद्री विशाल की मूर्ति को जोशीमठ के वासुदेव मंदिर में ही रखा जाता है। आदि शंकराचार्य ने यहां पहला ज्योतिर्मठ स्थापित किया था। कहा जाता है कि प्रहलाद ने भगवान नरसिंह के गुस्से को शांत करने के लिए यहां महालक्ष्मी के कहने पर तप किया था। जोशीमठ वो स्वर्गद्वार भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि पांडव इसी रास्ते से स्वर्ग गये थे। इसके बाद फूलों की घाटी शुरू हो जाती है।लगातार जमीन धंसने की घटनाओं के मद्देनजर जोशीमठ को सिंकिंग जॉन (धंसता क्षेत्र) घोषित किया गया है राष्ट्रीय भूभौतिक अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) के विशेषज्ञों की टीम जोशीमठ पहुंच रही है।जमीन धंसने की मुख्य वजह यह बताई जाती हैं :पहला, जोशीमठ पूरी तरह से लैंड स्लाइड के मलवे पर बसा हुआ है । ऐसे में यहां अत्यधिक निर्माण करना खतरे से खाली नहीं था लेकिन पर्यटकों को लुभाने के लिए और भूमाफियाओं द्वारा बेतरतीब निर्माण किये गये। 1939 में एक किताब सेंट्रल हिमालया जियो लॉजिकल ऑब्जरवेशन ऑफ द स्विस एकसपेडिशन में इसके लेखक प्रोफेसर अर्नोल्ड हेम और प्रोफेसर आगस्टो गैंस ने चेतावनी दी थी कि यह पूरी तरह पहाड़ों के मलबे पर बसा हुआ है। दूसरा, सूरंग खोदने वाली मशीन से प्राकृतिक जल भंडार को नुकसान हुआ ।इससे इलाके के कई झरने और पानी के सोते सुख चुके हैं। जिस पहाड़ पर जोशीमठ बसा है ,उसके अंदर की जमीन भी सुख चुकी है इसलिए पहाड़ का मालवा धंसने लगा है।तीसरा, 1976 में जोशीमठ में लैंडस्लाइड हुआ था तब इसकी जांच के लिए तत्कालीन गढ़वाल कमिश्नर महेश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में एक कमिटी गठित की गई थी ।कमिटि कि रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ में हो रहे निर्माण कार्यो को यदि नहीं रोका गया तो वह विनाशकारी होगा ।इस पर ध्यान नहीं दिया गया और पहाड़ों पर पावर प्रोजेक्ट के बनने का काम चलता रहा।चौथा, नदियों से घिरे रहने से कारण यहां जमीन के नीचे और ऊपर पानी का बहाव झरने की तरह लगातार होता रहता है। इससे तल पर नमी हमेशा बनी रहती है ।जमीन के भीतर की चट्टानें कमजोर हैं जो नमी के प्रभाव से धंस रहीं हैं।पांचवां, जोशीमठ के ऊपर के इलाके में काफ़ी बर्फबारी होती बारिश होती है। मौसम बदलता है और बर्फ पिघलती है, तब जोशीमठ से चारों ओर नदियों में पानी का बहाव तेज हो जाता है।सतह के कमजोर होने और भूस्खलन का यह भी एक बड़ा कारण है।छठा, जोशीमठ के अधिकतर क्षेत्रों में नीस चट्टानें हैं, जो तापमान और हवा की वजह से तेजी से आकार बदलती हैं।यह भी क्षेत्र में धंसान की एक वजह है।सातवां, स्थानीय लोग इसके लिए मुख्य रूप से एनटीपीसी की तपोवन- विष्णु गढ़ परियोजना को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं ।लोगों के अनुसार दशकों से एनटीपीसी के लिए खोदी जा रही सूरंग इस भयावह स्थिति के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ।तपोवन -विष्णु गढ़ पनबिजली परियोजना की सूरंग जोशीमठ के ठीक नीचे स्थित है।जोशीमठ ही नहीं प्राकृतिक आपदाओं से लगातार जूझ रहे उत्तराखंड में बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं के प्रभाव का आकलन किए बिना आगे बढ़ने की गलती बार-बार दोहराई जा रही है ।हिमालय की संवेदनशीलता, पर्यावरण मानकों और सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज करते हुए जिस तरह ऑल वेदर रोड के लिए पहाड़ों को काटा गया, हजारों पेड़ों का कटान हुआ और मलबे को नदियों में डंप किया गया। यह प्रकृति के साथ खिलवाड़ का सटीक उदाहरण है।सिर्फ टिहरी गढ़वाल जिले में चारधाम हाईवे के 150 किलोमीटर हिस्से में 60 डेंजर जोन चिन्हित किये गये हैं। करीब 12000 करोड़ रुपए लागत वाली 889 किलोमीटर की चार धाम परियोजना में मुख्य रूप से सड़कों के चौड़ीकरण का काम शामिल है। सड़कों को कितना चौड़ा किया जाना है इस पर विवाद है केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय वर्ष 2016 में परियोजना की शुरुआत से ही 10 से 12 मीटर चौड़ी ऑल वेदर रोड बनने पर जोर दे रहा है। मंत्रालय अपने ही नियमों की अनदेखी कर रहा है। पहाड़ी राजमार्गों के लिए निर्धारित 5.5 से 7 मीटर चौड़ाई के अपने ही मानक को बदल दिया गया है ।पर्यावरण प्रभाव आकलन किए से बचने के लिए 889 किलोमीटर की चार धाम प्रोजेक्ट को 53 टूकडों में बांटा गया है। क्योंकि 100 किलोमीटर से बड़ा प्रोजेक्ट होने पर पर्यावरण प्रभाव का आकलन कराना जरूरी होता है।यह विवाद जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो पर्यावरणविद रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस परियोजना की अवैज्ञानिक व अनियोजित क्रियान्वयन से हिमालय के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा है और भूस्खलन जैसी आपदाओं को बुलावा दिया जा रहा है। खतरे का अनुमान लगाए बिना पहाड़ों के ढलानों को सीधा और लंबवत काटने से स्लोप फेलयर का खतरा बढ़ गया है।रवि चोपड़ा सहित उच्च अधिकार समिति के 3 सदस्यों की राय सड़क की चौड़ाई 5.5 मीटर तक सीमित रखने की थी लेकिन समिति के 21 सदस्य जिनमें ज्यादातर अधिकारी थे ने सड़क की चौड़ाई की मूल डिजाइन (10- 12 मीटर) रखने की वकालत की और निर्माण कार्य चलते रहे।जोशीमठ ही नहीं हिमालय की ऊंचाईयों में बसे अन्य शहरों और गांवों के पर्यावरणीय कारणों से उजड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है। लेकिन यह संकट प्रकृतिजनित न होकर मानवजनित है। बिना सोचे समझे विकास की चाहत ने हमें विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है।
आरके सिन्हाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजधानी दिल्ली का पॉश ग्रेटर कैलाश इलाका। यहां समाज के सबसे सफल, असरदार और धनी समझे जाने वाले लोग ही रहते हैं। बड़ी-बड़ी कोठियों के उनके अंदर-बाहर लग्जरी कारें खड़ी होती हैं। लगता है, मानो इधर किसी को कोई कष्ट या परेशानी नहीं है। पर यह पूरा सच नहीं है। अभी हाल ही में यहां के एक बुजुर्गों के बसेरे, जिसे वृद्धाश्रम या एज ओल्ड होम भी कहते हैं, में आग लगने के कारण क्रमश: 86 और 92 वर्षों के दो वयोवद्ध नागरिकों की जान चली गयी। जरा सोचिये, कि इस कड़ाके की सर्दी में उन्होंने कितने कष्ट में प्राण त्यागे होंगे। इस वृद्धाश्रम में रहने वाले हरेक व्यक्ति को हर माह सवा लाख रुपये से अधिक देना होता है। यानी यहां पर सिर्फ धनी-सम्पन्न परिवारों के बुजुर्गों को ही रख सकते हैं। अफसोस कि इन बुजुर्गों को इनके घर वालों ने इनके जीवन के संध्याकाल में घर से बाहर निकाल दिया। यह कहानी देश के उन लाखों बुजुर्गों की है, जिन्हें उनके परिवारों में बोझ समझा जाने लगा है। अगर इनका आय का कोई स्रोत नहीं है तो इनका जीवन वास्तव में कष्टकारी है।देखिये, भारत में तेजी से बढ़ती जा रही है बुजुर्गों की आबादी। एक अनुमान के मुताबिक, 14 बरस बाद, यानी 2036 में हर 100 लोगों में से केवल 23 ही युवा बचेंगे, जबकि 15 लोग बुजुर्ग होंगे। सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल देश के हर 100 लोगों में से 27 युवा और 10 बुजुर्ग हैं। 2011 में भारत की आबादी 121.1 करोड़ थी। 2021 में 136.3 करोड़ पहुंच गयी। इसमें 27.3 फीसद आबादी युवाओं, यानी 15 से 29 साल की आयु वालों की है। यूथ इन इंडिया 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2036 तक युवाओं की संख्या ढाई करोड़ कम हो जायेगी। फिलहाल देश में युवाओं की आबादी वर्तमान में 37.14 करोड़ है। यह 2036 में घटकर 34.55 करोड़ हो जायेगी। देश में इन दिनों 10.1 फीसद बुजुर्ग हैं, जो 2036 तक बढ़कर 14.9 प्रतिशत हो जायेंगे। मतलब बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है।जिस देश में बुजुर्गों की तादाद इतनी तेजी से बढ़ रही है, वहां पर सरकार को बुजुर्गों के लिए कोई ठोस योजना तो बनानी ही होगी, ताकि वे अपने जीवन का अंतिम समय आराम से वक्त गुजार सकें। उन्हें दवाई और दूसरी मेडिकल सुविधाएं मिलने में दिक्कत न हो। उनका बुढ़ापा खराब न हो।राजधानी दिल्ली के राजपुर रोड में भी एक बुजुर्गों का बसेरा है। यहां पर करीब 35-40 बुजुर्गों के लिए रहने का स्पेस है। इसे सेंट स्टीफंस कॉलेज तथा सेंट स्टीफंस अस्पताल को स्थापित करने वाली संस्था दिल्ली बद्ररहुड सोसायटी चलाती है। इनके कुछ बसेरे अन्य स्थानों और शहरों में भी हैं। यहां पर भी बेबस और मजबूर वृद्ध ही रहते हैं। ये रोज सुबह से इंतजार करने लगते हैं कि शायद कोई उनके घर से उनका हाल-चाल जानने के लिए आये। पर उनका इंतजार कभी खत्म ही नहीं होता। कभी-कभार ही किसी बुजुर्ग का रिश्तेदार कुछ मिनटों के लिए आकर औपचारिकता पूरी कर निकल जाता है। यहां पर रहने वालों से कोई पैसा नहीं लिया जाता। उन्हें दो वक्त का भोजन, सुबह का नाश्ता और चाय भी मिल जाती है। कुछ दानवीरों की मदद से संचालित दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी की तरह से चलाए जा रहे बुजुर्गों के बसेरे देश में गिनती के ही होंगे। वर्ना तो सब पैसा मांगते है किसी बुजुर्ग को अपने यहां रखने के लिए। हालांकि यह बात भी है कि बसेरा चलाने के लिए पैसा तो चाहिए ही। पैसे के बिना काम कैसे होगा।दरअसल, बुजुर्गों के लिए स्पेस घटने के कई कारण समझ आ रहे हैं। जब से संयुक्त परिवार खत्म होने लगे तब से बुजुर्गों के सामने संकट पैदा होने लगा है। संयुक्त परिवारों में तो उम्रदराज हो गये लोगों का ख्याल कर लिया जाता था। तब बच्चे और बुजुर्ग सबके- साझे हुआ करते थे। उन्हें परिवार के सभी सदस्य मिलजुल कर देख लिया करते थे। परिवार का बुजुर्ग सबका आदरणीय होता था। संयुक्त परिवारों के छिन्न-भिन्न होने के कारण स्थिति वास्तव में विकट हो रही है। एक दौर था जब बिहार और उत्तर प्रदेश के हरेक घर के आगे सुबह परिवार के बुजुर्ग सदस्य सुबह चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहे होते थे। जिन परिवारों में बुजुर्ग नहीं होते थे उन्हें बड़ा ही अभागा समझा जाता था। पर अब इन राज्यों में भी बुजुर्ग अकेले रहने को अभिशप्त हैं। मुझे इन राज्यों के बैंगलुरू, मुंबई, दिल्ली, गुरुग्राम में रहने वाले अनेक नौकरीपेशा लोग मिलते हैं। वे अच्छा-खासा कमा रहे हैं। उनसे बातचीत करने में पता चलता है कि उनके साथ उनके माता-पिता नहीं रहते। वे अपने पुश्तैनी घरों में ही हैं। इसका मतलब साफ है कि अगर वे संयुक्त परिवारों में नहीं हैं तो वे राम भरोसे ही हैं। कारण बहुत साफ है। अब बिहार-उत्तर प्रदेश का समाज भी पहल की तरह नहीं रहा। वहां पर भी कई तरह के अभिशाप आ गये हैं। एक बात समझ ली जाए कि हमे अपने बुजुर्गों के ऊपर पर्याप्त ध्यान देना ही होगा। उनका अपने परिवारों को शिक्षित करने से लेकर राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान रहता है। गांधी जी और गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर के सहयोगी रहे दीनबंधु सीएफ एन्ड्रूज से संबंध रखने वाली दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी की तरफ से चलाए जाने वाले बसेरों में तो उन बुजुर्गों का अंतिम संस्कार भी करवाया जाता है जिनका निधन हो जाता है। कई बार सूचना देने पर भी दिवंगत बुजुर्गों के सगे-संबंधी पूछने तक नहीं आते। तब बसेरे में काम करने वाले ही दिवंगत इंसान का अंतिम संस्कार करवा देते हैं। जरा सोच लीजिये कि कितना कठोर और पत्थर दिल होता जा रहा है समाज।केंद्र और राज्य सरकारों को मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, गिरिजाघरों वगैरह में भी बुजुर्गों के बसेरे खोलने के बारे में विचार करना चाहिए। इनके पास पर्याप्त स्पेस भी होता है। इनमें कुछ बुजुर्ग रह ही सकते हैं। वैसे सबसे आदर्श स्थिति तो वह होगी जब परिवार ही अपने बुजुर्ग सदस्यों का ख्याल करेंगे। आखिर कौन चाहता है कि वह इतना अभागा हो कि घर से बाहर अपने बुढ़ापे के दिन गुजारे। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
रविरंजनएबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारे समाज में कुछ ऐसे बहस होते हैं जो राजनीतिक इच्छाओं और लाभ को ध्यान में रखकर होते हैं। इसे आप गुलामी का असर कहें या वर्तमान संदर्भ में ज्ञान और अध्ययनशीलता में कमी लेकिन चर्चा में रामचरितमानस की पंक्तियां ही है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो अपनी संस्कृति पर गर्व न करता हो। दुर्भाग्य से देश में दूसरे देशों से अंगीकार की गयी विचारधारा, परिवेश, जीवन शैली और चर्चित होने या चर्चा में रहने की मजबूरी से ग्रसित जन ऐसा कुछ करते रहते हैं। तुलसीदास ने विक्रम संवत 1631 (1574 ईस्वी) में अयोध्या में रामचरितमानस लिखना शुरू किया। रामचरितमानस की रचना अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट में हुई थी। भारत इस अवधि के दौरान मुगल सम्राट अकबर (1556-1605 सीई) शासक था। मानस तुलसीदास को विलियम शेक्सपियर का समकालीन भी बनाता है। रामचरित मानस एकमात्र रचना है जो दुनिया भर के हिंदुओं, कामिल बुल्के जेसे ईसाई का आस्थाग्रंथ है इसकी पूजा की जाती है। मानस पाठ के नियम है और उसे भी पूजा की तरह किया जाता है। इस पुस्तक को अगर गंभीरता से समझा जाए तो आज के संदर्भ में दुनिया में जितनी भी समस्या है चाहे वह मानव निर्मित हो या प्राकृतिक सभी का हल रामचरितमानस में मिल जाता है। इसके रचियता तुलसीदास संस्कृति के विद्धान होते हुए भी अवधी में इसकी रचना की। क्योंकि वे एक सामाजिक वैज्ञानिक थे।भारतीयों के आत्मबल का एक बड़ा श्रोत रामचरितमानस है जिसे आज के संदर्भ में आर्ट आफ लिविंग की सबसे उत्कृष्ट साहित्य के रुप में देख सकते हैं। यह चरित्र की समग्र गाथा है जिसके कुछ पंक्तियों पर टिप्पणी कर चर्चा में आ सकते हैं लेकिन दुनिया के हर हिंदू के मन से मानस की श्रद्धा कम नहीं कर सकते। यह जननीति, राजनीति और त्याग से समृद्धि की उत्कृष्ट रचना है। एक रचना रची गयी हिंदी समाज के पथ भ्रष्टक तुलसीदास। यह रचना एक विद्धान पत्रकार विश्वनाथ ने रची। वे इस आलोचना में एक अंधे भक्त बने जो हाथी को जहां से पकड़ता है उसका उसी के अनुसार वर्णन कर देता है। उनकी रचना राम के विरोधियों को बहुत अच्छा लगा। लेकिन अक्षर से बनते हैं शब्द और शब्द से वाक्य। वाक्य से अपनी अनुभूति को दिया जाता है रुप। तब रुप राम का हो या कृष्ण का उसमें मिलता है भाव। तब बनते हैं भगवान राम, भगवान कृष्ण। भारतीय संस्कृति का यह भाव की राम के चरित को मन में स्थिर करना ही रामचरित मानस है। राजाराम ही नहीं उस काल के सभी राजा उत्कृष्टता के प्रतीक थे और वे गुरु सत्ता के अधीन हो राज्य चलाते थे जिस कारण राम राज्य आज भी सर्वोत्तम सत्ता का उदाहरण है। गुलामी और प्रताड़ना के सात सौ साल में कुछ विकलांग मानसिकता के लोग ही आलोचना के साधक हो गये और रामचरित मानस रुपी सागर के एक बूंद उठाकर जिसकी भी उनको समझ नहीं है आलोचना करने को उद्धत हुए। राम और मानस तर्कातित हैं। तर्क उन चीजों पर हो सकती है जो समझा जा सके। रामचरित समझा नहीं जिया जा सकता है और बिना जिये समझा नहीं जा सकता है। राम के चरित को मन में स्थापित करने को ही रामचरित मानस कहते हैं। एक अलौकिक विचार धारा अलौकिक मन से निकलती है और मन चिंतन से निर्मित होता है। चिंतन जन्म जन्मातर से प्रभावित होता है।पूरी दुनिया भारत के इसी संस्कृति का सम्मान करती है। दुर्भाग्य से हमारे देश के कुछ गिने चुने लोग अपने निहित स्वार्थवश अज्ञानवश ऐसी करतूत करते हैं जिससे देश की संस्कृति पर सवाल उठता है। मन में स्थापित मानस की अलोचना की जितनी अलोचना की जाए वह कम है लेकिन क्षमाशीलता रामचरित मानस के मूल में हैं जिन्होंने हर रुप में आदर्श प्रस्तुत किया तब जब पूरा विश्व राक्षसवृति से प्रभावित था। राष्ट्र धरोहर मानस तो अकबर काल में सुरक्षित रहा लेकिन आज चंद लोग कुछ भी बोल कर मुद्दा बना देते हैं। साहित्य के तौर पर उत्कृष्ट, भाव के तौर पर भगवत सदृश्य इस कथा से जीवन बदलता है उसकी आलोचना मात्र ही कलियुग के माध्यम से विनाशकारी होता है।
कुलभूषण उपमन्युएबीएन एडिटोरियल डेस्क। जोशीमठ की त्रासदी ने पूरे देश को अचंभित ही नहीं किया है बल्कि हिमालय में विकास की गाड़ी की दिशा पर भी अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। सदियों पुराना शहर आखिर धंस क्यों रहा है। वैसे तो आजादी के बाद से ही हिमालय के लिए विकास योजना को इस क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरण की विशिष्टता के कारण अलग दृष्टि से देखा जाने लगा था। इसी कारण योजना आयोग में भी हिमालय का अलग सेल हुआ करता था। अब नीति आयोग में भी हिमालयन क्षेत्रीय परिषद है। इस परिषद का मकसद है कि हिमालय की विशिष्ट नाजुक स्थिति को ध्यान में रखकर विकास का खाका बनाया जा सके। 1992 में डॉ एसजेड कासिम की अध्यक्षता में योजना आयोग ने हिमालय में विकास की दिशा और दशा को निर्धारित करने के लिए एक ग्रुप का गठन किया था। इस ग्रुप की रपट 1992 में आ गई थी। ऐसी और भी कोशिश हुईं। बावजूद इसके हिमालयी क्षेत्र में विकास के लिए कोई अलग मॉडल विकसित नहीं किया जा सका। इसका मुख्य कारण यह रहा है कि हिमालयी संसाधनों पर तो योजनाकारों की नजर रही किंतु उनके दोहन या दोहन के तरीकों के कारण कितनी विपदाएं हमें घेर सकती हैं और देश के लिए हिमालय द्वारा की जा रही पर्यावरणीय सेवाओं पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ सकता है इस ओर किसी ने नहीं सोचा।बातें तो हुईं किन्तु जमीन पर कुछ उतर नहीं सका। इसी का नतीजा है की हिमालय में मनमानी उखाड़-पछाड़ विकास के लिए की गई। कमोबेश यह अब तक जारी है और कमेटियों या हिमालयी विकास को दिशा देने के लिए बनाए गए ग्रुपों की संस्तुतियां धूल फांक रही हैं। विडंबना यह है कि जो लोग हिमालय के साथ मनमानी छेड़छाड़ का विरोध करते हैं उनको विकास विरोधी ठहरा कर चुप करवाने के प्रयास होते रहते हैं। मामला एक जोशीमठ का नहीं है। हिमालय में जहां भी अंधाधुंध विकास का मॉडल लागू किया गया है वहां कमोबेश इसी तरह की समस्याएं सामने आई हैं। किन्तु उनको लीपापोती वाली भाषा से टालने का काम ही किया गया है। समाधान तलाशने की ओर देखा नहीं गया है। हिमालयवासी स्वयं भी इस मामले में ज्यादा जागरूक नहीं रहे हैं। विकास के अंधे पैरोकारों के दबदबे ने विरोध के स्वरों को दबा दिया। हालांकि पर्यावरणीय दृष्टि से कुछ सावधानियां प्रयोग करने के लिए भी छोटे-मोटे प्रावधान हुए हैं। मगर उनक लागू करने की व्यवस्था बेहद लचर रही। इसलिए प्रोजेक्ट लागू करने वालों को अंधी छूट मिलती रही। और प्रावधनों के मायने जमींदोज हो गए।पर्यावरणीय प्रभाव आकलन जनसुनवाई कभी भी लोगों को जागरूक करके नहीं होती है बल्कि कोशिश की जाति है कि लोगों को कम से कम पता लगे ताकि योजना निर्माता अपने समर्थकों को एकत्र करके योजना के हक की बातों को आगे लाकर अपना रास्ता साफ कर सकें। प्रभाव आकलन का काम परियोजना निर्माताओं द्वारा तैयार रिपोर्ट के आधार पर ही किया जाता है। जाहिर तौर पर निर्माता परियोजना से खतरों को कम करके दिखाता है। परियोजना प्रभाव आकलन रिपोर्ट स्वतंत्र एजेंसी से बनवानी चाहिए। मौके पर निर्माण कार्य कैसे चल रहा है, कोई नहीं देखता। यहां तक कि निर्माण कार्यों में निकलने वाले मलबे की डम्पिंग करने के प्रावधानों का खुला उलंघन होता है किन्तु कोई नहीं सुनता। हिमालय में बन रही सडकों या विद्युत् परियोजनाओं में ऐसी घटनाएं हर कहीं सामान्य बात बन गई हैं। निर्माण स्थलों पर वनों की स्वीकृत से कई गुणा ज्यादा तबाही की जाती है किन्तु कोई नहीं देखता। कुछ प्रोजेक्ट्स पर जुर्माने भी लगे हैं। फिर भी मनमानी कहां रुकती है। गढ़वाल के चंबा से भी कुछ मकान धंसने की सूचनाएं आ रही हैं, उत्तराखंड में और भी कई इलाके खासकर बिजली प्रोजेक्ट्स और बड़ी खुली फोरलेन सड़कों के कारण खतरे में आ रहे हैं।हिमाचल प्रदेश भी ऐसी त्रासदी से अछूता नहीं है। प्रदेश में 450 के करीब जल विद्युत् परियोजनाएं बन चुकी हैं। इनसे 12000 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है। सरकार की 27000 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना है। इन परियोजनाओं से जगह-जगह बस्तियों को खतरा पैदा हुआ है।नाथपा झाकड़ी परियोजना की सुरंग के ऊपर बसे नाथपा, कंडार और निगुल्सेरी गांव धसने लगे हैं। किन्नौर से गुजर रहे राष्ट्रीय राजमार्ग पर करछम वांगतू प्रोजेक्ट सुरंगें गुजरने के कारण उर्नी ढांक में एक स्थाई भूस्खलन बन गया है। जंगी-ठोपन परियोजना का कार्य अभी चल रहा है, जिससे जंगी,रारंग, अक्पा और खदरा गांव को खतरा पैदा हो गया है। भरमौर में बन रही होली- बजोली परियोजना की टनल में दरार आने से झ्न्दौता गांव को भारी नुकसान हुआ है। जमीन धंस रही है कई मकानों में दरारें आ गई हैं। हिमाचल प्रदेश में चार फोरलेन सडकें बन रही हैं। उनके निर्माण से भी नुकसान हो रहा है जिसका कोई जायजा नहीं लिया जा रहा है। तात्पर्य यह है कि हिमालय में बड़े पैमाने के निर्माण कार्य बहुत सावधानी से किये जाने चाहिए और इसके लिए पर्वतीय विकास का अलग मॉडल विकसित किया जाना चाहिए जिसके लिए हिमालयी क्षेत्रों से लंबे समय से आवाजें उ रही हैं।हिमालय में करणीय और अकरणीय गतिविधियों की सूची बननी चाहिए और निर्माण कार्यों एवं उद्योग स्थापना, खनन आदि कार्यों में उसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। हिमालयी राज्यों की सरकारें केंद्र सरकार पर दबाव डाल कर पर्वतीय विकास के लिए अलग विकास मॉडल बनवाने का प्रयास करें और केंद्र सरकार एसजेड कासिम की अध्यक्षता वाली कमेटी की रपट का अध्ययन करके इस काम में नीति आयोग की हिमालयी क्षेत्रीय परिषद को इस काम पर लगाए। विश्वव्यापी अनुभवों के आधार पर पर्वतीय विकास का पर्यावरण मित्र मॉडल विकसित किया जाए। इससे ही विकास की अंधी दौड़ में होने वाले स्थाई नुकसानों से बचा जा सकता है। साथ ही टिकाऊ विकास का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। (लेखक, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों के विश्लेषक और पर्यावरणविद् हैं।)
डॉ विपिन कुमारएबीएन एडिटोरियल डेस्क। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह बीते दिनों कर्नाटक दौरे पर थे। राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उनका यह दौरा बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान उन्होंने ऐलान किया कि यहां भारतीय जनता पार्टी मैदान में अकेले उतरेगी और उनका इरादा दो तिहाई बहुमत हासिल करना है। गौरतलब है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर कयास लगाए जा रहे थे कि यहां भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा। हालांकि यह माना जा रहा था जनता दल (सेक्युलर से भाजपा का गठजोड़ हो सकता है। मगर अब साफ है कि भाजपा अपने बूते जनता की अदालत में जाएगी।अमित शाह ने भाजपा के लिए कर्नाटक को दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार घोषित किया है। उनके इस कथन के बाद दक्षिण भारत में भाजपा के दायरे को लेकर एक बार फिर से नया विमर्श शुरू हो गया है। कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में अपना पैर जमाने के लिए कई अनुभवी कार्यकर्ताओं को तैनात करने का फैसला किया है। इन राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या 50 से भी अधिक है। इस कड़ी में बीते दिनों हैदराबाद में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया था।यह एक ऐसी योजना है, जिससे भाजपा को विधानसभा के अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में सीधा फायदा मिलेगा और यदि पार्टी वास्तव में इस चुनाव में एक नया कीर्तिमान स्थापित करना चाहती है तो उसे दक्षिण भारतीय राज्यों में उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन करना होगा। वहीं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह यह भली भांति समझते हैं कि यदि उन्हें दक्षिण भारतीय दिलों में अपनी एक चिर स्थायी जगह बनानी है, तो उत्तर भारत से सांस्कृतिक और भाषायी रूप से जोड़ना ही होगा।एक दौर ऐसा था, जब दक्षिण भारत खुद को कटा हुआ महसूस करता था। लेकिन बीते 8 वर्ष में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने अथक प्रयासों से पूरे राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोया है और आज लोगों के दिलों में उप-राष्ट्रवाद के स्थान पर राष्ट्रवाद ने अपना घर बना लिया है। इसके हमने कई उदाहरण देखे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण भारतीय राज्यों में अपने दायरे को एक नया आयाम देने के लिए ट्रिपल सी की रणनीति अपनाई है, जिसकी व्यापक परिभाषा - सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीकों को पुनर्जीवित करना, विभिन्न क्षेत्रों के लोकप्रिय हस्तियों को पार्टी में शामिल कर जनमानस के बीच अपनी विश्वसनीयता स्थापित करना और जमीनी स्तर पर अपनी सांगठनिक क्षमता को सुदृढ़ करना है।आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और केंद्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में कुल 130 लोकसभा सीटें हैं। यहां भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 21 सीटों पर, जबकि बीते लोकसभा चुनाव में 29 सीटों पर जीत हासिल की थी। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में भाजपा की स्वीकार्यता दिनों-दिन बढ़ रही है और पार्टी यह धारणा भी तोड़ने में सफल हो रही है, भाजपा एक उत्तर भारतीय पार्टी है।वास्तव में, दक्षिण भारतीय राज्यों में भाजपा के सामने एक खुला मैदान है। उसके सामने संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। पार्टी मोदी-योगी मॉडल के सहारे इन राज्यों में एक नई ऊंचाई हासिल कर सकती है और अपनी जन-कल्याणकारी नीतियों से कांग्रेस और वाम दलों का अंत कर सकती है। इसके फलस्वरूप देश में परिवारवाद, जातिवाद और ध्रुवीकरण की राजनीति का भी अंत होगा। हालांकि, भाजपा के लिए यह एक अग्निपथ है। लेकिन हम जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के कुशल नेतृत्व में कुछ भी असंभव नहीं। (लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)
डॉ वेदप्रताप वैदिकएबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजकल हम भारतीय लोग इस बात से बहुत खुश होते रहते हैं कि भारत शीघ्र ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। लेकिन दुनिया के इस तीसरे सबसे बड़े मालदार देश की असली हालत क्या है? इस देश में गरीबी भी उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही है, जितनी तेजी से अमीरी बढ़ रही है। अमीर होने वालों की संख्या सिर्फ सैकड़ों में होती है लेकिन गरीब होनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। ऑक्सफॉम के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले दो साल में सिर्फ 64 अरबपति बढ़े हैं। सिर्फ 100 भारतीय अरबपतियों की संपत्ति 54.12 लाख करोड़ रुपेय है यानी उनके पास इतना पैसा है कि वह भारत सरकार के डेढ़ साल के बजट से भी ज्यादा है।सारे अरबपतियों की संपत्ति पर मुश्किल से दो प्रतिशत टैक्स लगता है। इस पैसे से देश के सारे भूखे लोगों को अगले तीन साल तक भोजन करवाया जा सकता है। यदि इन मालदारों पर थोड़ा ज्यादा टैक्स लगाया जाए और उपभोक्ता वस्तुओं का टैक्स घटा दिया जाए तो सबसे ज्यादा फायदा देश के गरीब लोगों को ही होगा। अभी तो देश में जितनी भी संपदा पैदा होती है, उसका 40 प्रतिशत सिर्फ एक प्रतिशत लोग हजम कर जाते हैं जबकि 50 प्रतिशत लोगों को उसका तीन प्रतिशत हिस्सा ही हाथ लगता है। अमीर लोग अपने घरों में चार-चार कारें रखते हैं और गरीबों को खाने के लिए चार रोटी भी ठीक से नसीब नहीं होती।ये जो 50 प्रतिशत लोग हैं, इनसे सरकार जीएसटी का कुल 64 प्रतिशत पैसा वसूलती है जबकि देश के 10 प्रतिशत सबसे मालदार लोग सिर्फ तीन प्रतिशत टैक्स देते हैं। इन 10 प्रतिशत लोगों के मुकाबले निचले 50 प्रतिशत लोग छह गुना टैक्स भरते हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को अपनी रोजमर्रा के जरूरी चीजों को खरीदने पर बहुत ज्यादा टैक्स भरना पड़ता है, क्योंकि वह बताए बिना ही चुपचाप काट लिया जाता है। इसी का नतीजा है कि देश के 70 करोड़ लोगों की कुल संपत्ति देश के सिर्फ 21 अरबपतियों से भी कम है।साल भर में उनकी संपत्तियों में 121 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। अब जो नया बजट आने वाला है, शायद सरकार इन ताजा आंकड़ों पर ध्यान देगी और भारत की टैक्स-व्यवस्था में जरूर कुछ सुधार करेगी। देश कितना ही मालदार हो जाए लेकिन यदि उसमें गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ती गई तो वह संपन्नता किसी भी दिन हमारे लोकतंत्र को परलोकतंत्र में बदल सकती है। यह हमने पिछली दो सदियों में फ्रांस, रूस और चीन में होते हुए देखा है। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)
पवन कुमार पांडेयएबीएन एडिटोरियल डेस्क। हिमालय के गढ़वाल इलाके में स्थित तीर्थ जोशीमठ में मिट्टी के धसकने की खबरें लगातार सामने आयीं। इसकी वजह से घरों को नुकसान पहुंचा और लोगों की जिंदगी का भी खतरा उत्पन्न हुआ है। इस विषय में प्रकाशित खबरों और टिप्पणियों में उचित ही कहा गया कि अतीत में इससे संबंधित चेतावनियों की अनदेखी की गयी। हिमालय के एक हिस्से में भूस्खलन का खतरा पहले से मौजूद है और वहां इसके अलावा भी कई खतरे हैं क्योंकि वनों की जमकर कटाई हुई है। ऐसे में वहां महत्त्वाकांक्षी रेल, सड़क, जलविद्युत परियोजनाओं तथा अन्य परियोजनाओं के कारण पर्यावरण को हुई क्षति के बारे में भी उचित ही बातें कही गयी हैं।जोशीमठ के हालात तथा उसे मिली मीडिया कवरेज के साथ ही पर्यावरण को लेकर एक बड़ी चिंता उत्पन्न हुई है: उत्तर भारत के मैदानी शहरों और कस्बों में ठंड के दिनों में हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है, शहरों में बीते वर्षों के दौरान कचरे के पहाड़ खड़े हो गये हैं, पानी जैसे अहम और दुर्लभ संसाधन का जमकर दुरुपयोग, जलवायु परिवर्तन के कारण हो चुका नुकसान मसलन हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना, औद्योगिक कचरे का समुचित निपटान न होना, आदि कई समस्याएं हमारे सामने हैं।कुल मिलाकर संदेश यही है कि उपरोक्त बातों को लेकर जो चिंता जताई जा रही है वह प्रभावी कदमों में रूपांतरित नहीं हो पा रहा है, सुधार की बात तो छोड़ ही दी जाये। इस प्रकार देश की हवा, पानी, जमीन और वन आदि प्राकृतिक संपदा तथा पानी एवं खनिज आदि को जो भी नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई बहुत मुश्किल है। कई पाठकों को यह बात चकित कर सकती है कि हरित अंकेक्षण जो टिकाऊ वृद्धि का आकलन सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी तथा जीडीपी वृद्धि को हासिल करने में प्राकृतिक पर्यावरण को हुए नुकसान के आधार पर करता है, वह दिखाता है कि भारत के समग्र हरित प्रदर्शन में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।गत अक्टूबर में भारतीय रिजर्व बैंक के बुलेटिन में प्रकाशित एक पर्चे में यही संदेश था लेकिन मीडिया ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हकीकत में पारंपरिक जीडीपी और हरित जीडीपी के बीच का अंतर तेजी से कम हो रहा है। यानी हरित जीडीपी पारंपरिक जीडीपी की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम अपनी खोई हुई जमीन दोबारा हासिल कर रहे हैं। अगर आपको लगता है कि यह नजर के सामने दिख रही हकीकत के उलट है तो पर्चा कई सरकारी पहलों को भी रेखांकित करता है जिनकी बदौलत सुधार आया है।उनमें शामिल हैं: नवीकरणीय ऊर्जा को महत्त्वाकांक्षी गति, जीडीपी की प्रति यूनिट के हिसाब से घटी भौतिक खपत, एलईडी बल्ब और ऊर्जा खपत वाली गतिविधियों में अनिवार्य ऊर्जा अंकेक्षण जैसी गतिविधियों की बदौलत कम ऊर्जा घनत्व हासिल करना, पदार्थों के पुनर्चक्रण में इजाफा, स्वच्छ भारत पहल के तहत ठोस कचरे का बेहतर प्रबंधन, नमामि गंगे परियोजना आदि। इस पर्चे के लेखक मानते हैं कि हाल के वर्षों में आया कुछ सुधार आंकड़ों की बेहतर उपलब्धता के कारण है।अगर गैर विशेषज्ञ के नजरिये से देखें तो आरबीआई बुलेटिन ग्रीन जीडीपी के आकलन की दिशा में पहला कदम है। इसमें आकलन के लिए जो प्रविधि अपनायी गयी है और जिसकी बदौलत निष्कर्ष निकाले गए हैं, उनमें सुधार आएगा अगर आकलन और परिभाषाओं के क्षेत्र में और अधिक लोग काम करें। पर्चे में सकारात्मक संदेश निहित है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या हरित जीडीपी यह भी दर्शाता है कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों के साथ क्या हो रहा है। इसे बैलेंस शीट संबंधी रुख में आंकना जरूरी है। समुचित आकलन ही सुधार की दिशा में पहला कदम है। सवाल यह है कि पारंपरिक जीडीपी के अनुमानों के साथ हरित जीडीपी के आंकड़े क्यों नहीं पेश किये जा सकते हैं? तब शायद सतत विकास को सही संदर्भ में समझा जा सके और उस पर बहस की जा सके।इस बीच कुछ चयन करने होंगे और कुछ सवालों को भी हल करना होगा। जोशीमठ के आसपास के इलाकों में फिलहाल विनिर्माण गतिविधियां बंद कर दी गई हैं लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं के दोहराव को किस प्रकार रोका जायेगा। हिमालय तथा अन्य इलाकों में पर्यावरण को पहुंच रही क्षति को लेकर दी जा रही चेतावनियों की अनदेखी के परिणामों से कैसे बचा जायेगा? क्या पानी की खपत वाली धान और गन्ना जैसी फसलें हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे पानी की कमी वाले इलाकों में उगाई जानी चाहिए?चूंकि खेती में अभी भी सबसे अधिक पानी लगता है इसलिए क्या किसानों को समझाया जा सकेगा कि वे इस कदर भूजल का दोहन न करें या धान जैसी फसलों की खेती के लिए कम पानी की खपत वाले विकल्प आजमाएं? क्या इंजीनियरों और विनिर्माण उद्योगों के गठजोड़ को तोड़ा जा सकेगा? क्या हम मजबूत नियामकीय तथा संबद्ध संस्थान बना सकते हैं जो पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित कर सकें? अगर ऐसा नहीं किया गया तो जोशीमठ से लगा झटका एक सप्ताह से ज्यादा नहीं टिकेगा।
डॉ दिलीप अग्निहोत्रीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति से सत्ता तो नसीब हो सकती है, किन्तु इसका नुकसान अंततः सम्बन्धित प्रदेश को उठाना पड़ता है। ऐसी सरकारों में समीकरण महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उनको दुरुस्त बनाये रखना सत्ता पक्ष की प्राथमिकता रहती है। इससे निवेश का मार्ग बाधित हो जाता है। उद्योग जगत की अनेक अपेक्षायें होती हैं। जिस प्रदेश में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं, वह उधर का ही रुख करते हैं। इसमें कानून-व्यवस्था की स्थिति का सुदृढ़ होना पहली शर्त होती है। इसके साथ ही सिंगल विंडों सिस्टम, इज ऑफ डूइंग बिजनेस और बिजली की पर्याप्त आपूर्ति, बेहतर कनेक्टिविटी, लैंड बैक की स्थापना आदि की आवश्यकता होती है। उत्तर प्रदेश में करीब छह वर्ष पहले तक इन्हीं तत्वों का अभाव था। पश्चिम बंगाल, केरल जैसे कुछ राज्य आज भी उसी दौर में हैं। भाजपा जदयू गठबंधन सरकार ने बिहार की छवि में सकरात्मक सुधार किया था। लेकिन नीतीश कुमार ने राजद से गठबंधन करके बिहार को एक बार फिर जंगल राज के दौर में पहुंचा दिया है।दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने निवेश के अनुरूप माहौल बनाने का प्रभावी कार्य किया है। इसके लिए अपेक्षित सभी मोर्चों पर अभूतपूर्व सुधार हुआ है। यहां इनवेस्टर्स समिट और प्रस्तावों के शिलान्यास से अनेक अध्याय कायम हुए।अब उत्तर प्रदेश ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट के लिए तैयार हो रहा है। इस संबंध में योगी आदित्यनाथ की मुंबई यात्रा उल्लेखनीय रही। योगी आदित्यनाथ पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने दिलायी थी। तब उन्होंने विश्वास व्यक्त किया था कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी उत्तम प्रदेश बनेगा। उनका कथन साकार हो रहा है। यह संयोग था कि इस बार मुंबई में योगी आदित्यनाथ की मुलाकात राम नाईक से भी हुई। योगी ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट के संदर्भ में मुंबई गये थे। उद्योगपतियों से उनकी सार्थक बैठक हुई। सभी ने उत्तर प्रदेश में निवेश के प्रति उत्साह दिखाया।योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा सभा में कहा था कि पहले उत्तर प्रदेश की पहचान दंगे वाले, देश के विकास में बाधक बनने वाले प्रदेश के रूप में थी। लेकिन पिछले साढ़े पांच सालों में यूपी ने खुद को विकास के साथ जोड़ा है। बेहतरीन कानून-व्यवस्था लागू करके देश को एक नया मॉडल दिया। यूपी इज ऑफ डूइंग बिजनेस में कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। राज्य बजट करीब साढ़े छह लाख करोड़ पहुंच गया है। छह लाख पंद्रह हजार करोड़ के बजट के बाद तैंतीस हजार करोड़ का अनुपूरक बजट पेश किया गया था। जिन राज्यों की आबादी कम है, वह घाटे का बजट पेश करते हैं। यूपी सरप्लस राजस्व वाला प्रदेश है। उत्तर प्रदेश देश की अर्थव्यवस्था का इंजन बन रहा है। आज यूपी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला प्रदेश है। एक ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी वाला प्रदेश बनाने के लिए काम किया जा रहे है। पांच सालों में साढ़े चार लाख करोड़ से अधिक के निवेश आये हैं। अगले महीने समिट का आयोजन किया जा रहा है।योगी सही कहते हैं कि यूपी में डेढ़ लाख करोड़ से अधिक का निवेश हुआ है। पांच वर्ष पहले करीब अस्सी हजार करोड़ निवेश हुआ था। वर्तमान सरकार विकास का विजन लेकर आगे बढ़ रही है। इसमें कोई दोराय नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि यूपी डेटा सेंटर का हब बन रहा है। पहली डिस्प्ले यूनिट चीन से यूपी में आयी। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में विभिन्न सेक्टर में तमाम ऐसे कार्य शुरू होने जा रहे हैं जिनसे उत्तर प्रदेश की पहचान को नया आयाम मिलेगा। इसमें चिकित्सा, कानून व्यवस्था, पर्यटन, शिक्षा और इन्फ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट पर खासा फोकस किया गया है। योगी आदित्यनाथ के एजेंडे में प्रदेश की कानून व्यवस्था शुरू से ही प्रमुखता पर रही है। इसी का नतीजा है कि प्रदेश में पिछले साढ़े पांच वर्षों में कानून का राज पूरी तरह से स्थापित हुआ है और अपराध की घटनाओं में काफी गिरावट दर्ज की गयी है।नये साल पर अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने के साथ प्रदेश में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य सरकार ने पुलिस को अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस करने को लेकर ड्रोन की खरीदारी के लिए बजट जारी कर दिया है। करीब दो हजार बॉडी वार्न कैमरे आने वाले हैं। सभी थानों को सीसीटीवी से लैस किया जाना है। यूपीसीडा ने प्रदेश को वन ट्रिलियन इकोनॉमी बनाने व इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए पंद्रह हजार एकड़ से अधिक का लैंडबैंक तैयार कर लिया है। इसका मकसद है कि ग्लोबल समिट में आने वाली वैश्विक कंपनियों को यहां प्लांट और अपने प्रोजेक्ट लगाने में कोई असुविधा न हो। यूपीसीडा ने लैंडबैंक से कनेक्टिविटी को बेहतर करने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिये हैं। यूपीसीडी ने अन्य लैंडबैंक के लिए स्पिनिंग मिल्स की बंद इकाइयों की भूमि, स्कूटर इंडिया लखनऊ की डेढ़ सौ एकड़, गाजियाबाद की पांच एकड़, हरदोई की ढाई सौ एकड़ एवं अन्य ग्राम समाज इत्यादि की भूमि लेने की कार्रवाई शुरू कर दी है। औद्योगिक क्षेत्र के श्रमिकों के रहने के लिए डोरमेट्री तथा कम्युनिटी टॉयलेट्स का निर्माण युद्धस्तर पर किया जा रहा है। मुंबई में योगी आदित्यनाथ ने बैंकों व वित्तीय संस्थाओं से प्रदेश के विकास में सहभागी बनने का आह्वान किया।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मादी ने देश को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को एक ट्रिलियन डॉलर का आकार देने का निर्णय लिया है। इस सम्बन्ध में अलग-अलग सेक्टर चिह्नित करते हुए प्रदेश सरकार द्वारा सभी सेक्टरों में कार्रवाई की जा रही है। यूपी ग्लोबल समिट के सम्बन्ध में मुम्बई में विभिन्न बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारियों से योगी ने संवाद किया है। उन्होंने बैंक अधिकारियों को आश्वस्त किया कि प्रदेश सरकार न केवल आपके पूरे सिस्टम और पूंजी की सुरक्षा की गारंटी लेगी, बल्कि हर प्रकार का सुरक्षित वातावरण भी प्रदेश में उपलब्ध कराने में अपना योगदान देगी। प्रदेश का पर्सेप्शन बदला है। प्रदेश का राजस्व बढ़ा है। आज उत्तर प्रदेश राजस्व सरप्लस स्टेट है। इस सदी की सबसे बड़ी महामारी का सामना और वित्तीय अनुशासन का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश ने सबका ध्यान आकर्षित किया है। आज देश व दुनिया के उद्यमी और निवेशक प्रदेश में निवेश करना चाहते हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि राज्य में निवेश को आकर्षित करने के लिए प्रदेश सरकार की टीम देश से बाहर विश्व के अन्य देशों में गयी। इस टीम को लगभग साढ़े सात लाख करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव प्राप्त हुए। एक बिलियन डॉलर का जापान से भी निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुआ है। करीब एक लाख एमएसएमई यूनिटों के साथ उत्तर प्रदेश में देश का सबसे बड़ा आधार मौजूद है। इस सेक्टर को प्रमोट करने की एक जनपद, एक उत्पाद योजना संचालित है। यह देश की एक लोकप्रिय योजना है। इंटरनेशनल एयरपोर्ट अगले साल तक क्रियाशील हो जायेंगे। दस एयरपोर्ट पर वर्तमान सरकार द्वारा कार्य किया जा रहा है। पांच एयर, पोर्ट बनकर तैयार हो गये हैं। प्रदेश के पांच शहरों का मेट्रो की सुविधा से जोड़ा गया है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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