हृदयनारायण दीक्षितएबीएन एडिटोरियल डेस्क। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा दसवीं, ग्यारहवीं व बारहवीं की पुस्तकों में कतिपय संशोधन किये गये हैं। इन पुस्तकों में बच्चों के लिए ज्ञानवर्धक पाठ्यक्रम बनाए जाते हैं। विषय विशेषज्ञों की समिति विचार करती है। अन्य विषय की पुस्तकों में भी संशोधन हुए हैं। लेकिन इतिहास की पुस्तकों में हुए कतिपय संशोधनों को लेकर बहस चल रही है। अध्ययन की दृष्टि से इतिहास, संस्कृति और दर्शन महत्वपूर्ण विषय माने जाते हैं। इतिहासबोध राष्ट्रबोध का आधार है। भारत में इतिहास संकलन की विशेष परंपरा रही है। यूरोपीय तर्ज के इतिहास में राजाओं और सामंतों के संघर्षों का वर्णन ज्यादा होता है। भारतीय इतिहास में संस्कृति का विवरण महत्वपूर्ण होता है।इतिहास सर्वोच्च मार्गदर्शी होता है। सृष्टि के उदय से लेकर अब तक का विवरण इतिहास है। इतिहास का अर्थ है-ऐसा ही हुआ था। भारतीय जीवन दृष्टि में इतिहास कभी बूढ़ा नहीं होता। यह अजर अमर आख्यान है। इतिहास के वृक्ष पर नित नया वसंत खिलता रहता है। सूर्य उगते हैं। प्रतिपल नया सूर्योदय होता है। इसके पहले ऊषा आती है।बार-बार आती है। मधु मास आते हैं। नए फूल फल उगते हैं। ऋतुएं नया रंग रूप लेती हैं। मनुष्य और प्रकृति की प्रीति चलती रहती है। संघर्ष भी चलते हैं। मनुष्य मनुष्य से परस्पर लड़ते हैं। हिंसा होती है। मनुष्यता पश्चाताप में होती है। इतिहास के अंत:करण में ऐसी सारी घटनाएं संकलित रहती हैं।भारतीय इतिहास की शुरुआत सृष्टि सृजन की मधुमय मुहूर्त से होती है। ऋग्वेद के एक मंत्र (10.72.2) में कहते हैं, देवताओं के जन्म से पहले असत्य से सत्य का उद्भव हुआ। सृष्टि उगती है। इतिहास का गायन शुरू हो जाता है। बड़ी बात है कि ऋषि उस कालखंड का वर्णन कर रहे हैं जब देवता भी नहीं थे। ऋग्वेद के ऋषि सृष्टि संरचना से इतिहास का क्रम शुरू करते हैं। यूरोपीय तर्ज के इतिहास लेखक इसे प्रागैतिहासिक काल बता कर छुट्टी पा जाते हैं। पहले समय नहीं था। सृष्टि सृजन के शुरूआत के साथ गति हुई और गति से समय का जन्म हुआ। ऋग्वेद के ऋषि इसके भी पहले का वर्णन करते हैं, तब न सत्य था न असत्य था। भू, आकाश आदि भी नहीं थे। न दिन था न रात्रि। वायु भी नहीं थी। यह भारतीय दृष्टि का इतिहास है। असिमोव ने वर्ल्ड क्रोनोलॉजी में बताया है कि अग्नि की खोज मानव जीवन की महत्वपूर्ण घटना है।ऋग्वैदिक ऋषि अग्नि की खोज का श्रेय भारतीय पूर्वजों को देते हैं। कहते हैं, मनु ने मानवता के हित में अग्नि की स्थापना की। (1.36.19) मनु के बारे में कहते हैं, वह हम सब के पिता हैं। भारत में इतिहास की ज्ञान उपासना प्राचीन है। इस इतिहास में अतीत के तथ्य काव्य रूप में हमारे सामने आते हैं। यह शैली लोकमंगल से जुड़ी प्रकृति की शक्तियों को देवता रूप देती हैं। लेकिन इतिहास के प्रति सजगता बनी रहती है। एक सुन्दर सूक्त (10.14.15) में कहते हैं, इदं नम: पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकृष्टभ्य:, ऋषिभ्य: - पूर्वजों को नमस्कार है। वरिष्ठों को नमस्कार है। मार्गदर्शक ऋषियों को नमस्कार है। पूर्वज पूर्वकाल में हुए थे और पूर्व काल का विवरण इतिहास है।अथर्ववेद के पंद्रहवें अध्याय में अथर्वा ने व्रात्य नाम के देवता का विवरण दिया है। वेदों में व्रात्य शब्द का अर्थ उच्चतर आध्यात्मिक चेतना के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह विवरण इतिहास दृष्टि का सुन्दर उदाहरण है, व्रात्य ने उच्चतर स्थिति प्राप्त होते ही ब्रह्मा का मार्गदर्शन प्राप्त किया। ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की। ऋषि व्रात्य की यात्रा का सुन्दर वर्णन करते हैं। सूक्त 6 में कहते हैं, उसने ऊर्ध्व दिशा की ओर प्रस्थान किया। भूमि, अग्नि औषधियां, वनस्पतियां उसके अनुकूल हो गयीं। जो यह तथ्य जानते हैं वह उक्त सभी तत्वों को अपने अनुकूल कर लेते हैं। यहां समस्त भौतिक जगत को अपने अनुकूल करने की प्रेरणा है।कर्तव्य पालन करने वाला व्यक्ति हमेशा गतिशील रहता है। प्रारम्भिक चरण में वह भौतिक जगत को अपने अनुकूल करता है। फिर कहते हैं, व्रात्य ने ऊर्ध्व दिशा की ओर प्रस्थान किया।ऋत, सत्य, सूर्य और नक्षत्र उसके अनुकूल हो गए और पीछे चलने लगे। यहां चेतना के ऊर्ध्वगमन की बात कही गई है। फिर कहते हैं कि व्रात्य ने वृहती दिशा की ओर प्रस्थान किया। तब इतिहास, पुराण और नारसंशी गाथाएं उसके साथ चलीं। अथर्ववेद में इतिहास का यह उल्लेख ध्यान देने योग्य है। यहां इतिहास भी परिश्रमी व्यक्ति के साथ चलता हुआ बताया गया है।हिन्दुओं पर इतिहास की उपेक्षा का आरोप पुराना है। अलबेरुनी का आरोप था कि हिन्दू चीजों के ऐतिहासिक क्रम पर ध्यान नहीं देते। वे अपने सम्राटों के कालक्रमानुसार उत्तराधिकार के वर्णन में लापरवाह हैं। निस्संदेह भारत में युद्धों आदि के विवरण का संकलन कालक्रमानुसार नहीं किया गया। वस्तुत: भारतीय इतिहासवेत्ताओं और पुराणकारों की दृष्टि भविष्य की ओर थी। हिन्दुओं ने इतिहास से प्रेरक और अनुकरणीय पात्रों को महत्व दिया है। वैदिक ऋषियों और पुराणकारों ने प्रेय और श्रेय को मंत्र बनाया। काव्य की तरह गाया। लोकस्मृति आखिरकार है क्या?वस्तुत: यह इतिहास का ही स्वर्ण कोष है। श्रीराम भी राजा हैं। भारतीय इतिहास में ढेर सारे राजा हुए। लेकिन राजा रामचंद्र भारत की श्रुति में, गीत में, परस्पर बतरस में गांव-गली तक चर्चा पाते हैं। श्रीकृष्ण भी ऐतिहासिक नायक हैं। राम राज्य विश्व का आदर्श राज्य है। इतिहास के लाडले राजा हरिश्चंद्र भी महत्वपूर्ण नायक हैं। देश के प्रत्येक गांव-घर में हरिश्चंद्र नाम के हजारों लोग मिलते हैं। सवा अरब की जनसंख्या में ज्यादातर नाम राम, कृष्ण, हरिश्चंद्र जुड़े हुए हैं। राम प्रसाद, राम नाइक, राम भरोसे, राम बहादुर जैसे नाम इतिहास में हैं। और आधुनिक भारत में भी गांव गली तक चर्चित हैं।प्राचीन भारत में इतिहास का नाम पुरावृत्त था। यह अमरकोश में सुरक्षित है। उत्तर वैदिक काल की छान्दोग्य उपनिषद में नारद ने सनत् कुमार को बताया था कि मैंने इतिहास और पुराण पढ़े हैं। कालिदास ने रघुवंश में लिखा है कि विश्वामित्र ने राम को पुरावृत्त सुनाया था। भवभूति और राजशेखर ने रामायण को इतिहास बताया है। महाभारत भी इतिहास है। इस इतिहास में यक्ष प्रश्न हैं। ऋग्वेद इस इतिहास का प्राचीनतम विवरण है। इस इतिहास में ऋग्वेद है और ऋग्वेद में इतिहास है। सुदास वैदिक इतिहास के राजा हैं। दस राजाओं से सुदास का युद्ध हुआ था। यह बड़ा युद्ध था। (7.83.7) यह हजारों वर्ष प्राचीन इतिहास है। गीता के चौथे अध्याय के पहले व दूसरे श्लोक में इतिहासबोध है कि हे अर्जुन यह योग पहले विवस्वान को दिया था। उन्होंने मनु को बताया और मनु ने इक्ष्वाकु को।इतिहास की इसी परंपरा में राजऋषियों ने इस ज्ञान का प्रवाह बनाए रखा लेकिन दीर्घकाल में यह ज्ञान नष्ट हो गया। कृष्ण ने कहा वही ज्ञान मैं तुमको बता रहा हूं। ऋग्वेद से लेकर महाभारत पुराणकाल तक का इतिहास प्राचीन ग्रंथों में सुरक्षित है। इससे भी ज्यादा वह भारत की लोक स्मृति में गांव-गली तक फैला हुआ है। इसके बाद मध्यकाल में मुगल सत्ता व आधुनिक काल में ब्रिटिश सत्ता है। इस इतिहास का विरूपण हुआ है। निष्पक्ष ही इतिहास आधुनिक पीढ़ी को जिज्ञासु विज्ञानी बनायेगा। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
मनीष कुमार पाण्डेयएबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहते हैं प्रतिभा कभी छिपाये नहीं छिपती है। महान पुरूषों के सद्गुण मृग में बसी कस्तूरी के समान होते हैं, जिसकी सुगंध सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। ऐसे ही विभूतियों में शुमार हैं युग पुरूष साहित्यकार डॉ फादर कामिल बुल्के। जिनकी सरलता, सहजता, बुद्धिमता, सादगी, तप, त्याग, दूरदर्शिता एवं हिन्दी भाषा के प्रति असीम लगाव को केवल भारत में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में सराहा गया है। परहित सरिस धरम नहिं, भाई।पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥बेल्जियम के फ्लैंडर्स प्रांत रम्सकैपेले गांव के रहने वाले फ्लेमिश भाषी डॉ कामिल बुल्के को तुलसीदास रचित रामचरितमानस की इस पंक्ति ने इतना प्रभावित किया कि उनके मन में भारत आने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वे तुलसीदास की पावन भूमि भारत खिंचे चले आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गये। डॉ कामिल बुल्के के मन में यह जिज्ञासा थी कि आखिर इतनी उदात्त सोच रखने वाले तुलसीदास का देश भारत कितना महान और पावन होगा। उसे अनुभव और महसूस करने आखिर वे भारत आ ही गये। बाद में उन्होंने अपने को हिंदी के लिए आजीवन समर्पित कर दिया। साहित्य के अनन्य साधक, धर्मयोद्धा और संत साहित्यकार डॉ फादर कामिल बुल्के का जन्म 1 सितंबर 1909 को बेल्जियम में हुआ था। सन् 1935 ईस्वी में फादर कामिल बुल्के भारत पहुंचे जहां से उनकी जीवन यात्रा का एक नया दौर शुरू हुआ। शुरुआत में उन्होंने दार्जिलिंग के संत जोसेफ कॉलेज और गुमला के संत इग्नासियुस मिशन स्कूल में बतौर शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया। कुछ ही दिनों में उन्होंने महसूस किया कि जैसे बेल्जियम में मातृभाषा फ्लेमिश की उपेक्षा और फ्रेंच का वर्र्चस्व था, वैसी ही स्थिति भारत में हिन्दी की उपेक्षा और अंग्रेजी का वर्चस्व है। उन्होंने 1938 ई़ में सीतागढ़ा में पंडित बदरीदत्त शास्त्री के निर्देशन में हिन्दी और संस्कृत सीखा। 1940 ई़ में फादर बुल्के ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की विषारद की परीक्षा पास किया। 1947 ई़ में इलाहाबाद विश्वविद्यायल से हिन्दी में एमए की शिक्षा ग्रहण किया। 1947 ई़ में फादर बुल्के ने डॉ धीरेन्द्र वर्मा की प्रेरणा से रामकथा : उत्पत्ति और विकास विषय पर डॉ माता प्रसाद गुप्त के निर्देशन में शोध कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने हिन्दी प्रेम के कारण अपनी पीएचडी शोध प्रबंध हिन्दी में ही लिखी। जिस समय वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोध कर रहे थे उस समय देश में सभी विषयों की थीसिस अंग्रेजी में लिखी जाती थी। उन्होंने जब हिन्दी में शोध प्रबंध लिखने की अनुमति मांगी तो विश्वविद्यालय ने अपनी शोध संबंधी नियमों में बदलाव कर उनकी बात मान ली। उसके बाद देश के अन्य हिस्सों में भी हिन्दी में शोध प्रबंध लिखी जाने लगी। फादर बुल्के के द्वारा प्रस्तुत शोध-प्रबंध हिन्दी में लिखा गया पहला षोध प्रबंध है। उनके द्वारा किया गया शोध इतना गहन, गंभीर और उत्तम था कि आगे चलकर यह भारत सहित पूरे विष्व में प्रकाशित हुई और हिन्दी प्रेमी फादर बुल्के को पूरा विश्व जानने लगा। वास्तव में उनके द्वारा प्रस्तुत शोध प्रबंध को रामकथा संबंधी समस्त सामग्री का विश्व-कोष कहा जा सकता है। उनका शोध प्रबंध चार भागों में विभक्त है। पहले भाग में प्राचीन रामकथा साहित्य की विवेचना की गयी है। इसके अंतर्गत पांच अध्यायों में वैदिक साहित्य और रामकथा, वाल्मीकि कृत रामायण, महाभारत की रामकथा, बौद्घ रामकथा तथा जैन रामकथा संबंधी सामग्री की पूर्ण परीक्षण की गयी है। दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनकी ही देन है कि आज बैंको में हिन्दी माध्यम से कार्य सम्पन्न हो रहा है। उन्होंने रामकथा और रामचरितमानस को बौद्घिक जीवन दिया। फादर बुल्के ने अपने बुलंद हौसलों से यह साबित कर दिया कि-लहरों को साहिल की दरकार नहीं होतीहौसले बुलंद हो तो चिराग की चाह नहीं होती।फादर बुल्के हिन्दी अंगेजी शब्द-कोष के निर्माण के लिए वे सत्त प्रयत्नशील रहे। 1968 ई़ में उनका अंग्रेजी हिन्दी कोष प्रकाशित हुआ जो आज भी सबसे प्रामाणिक शब्द कोश माना जाता है। उन्होंने इसमें 40 हजार शब्द जोड़ा है। वे बाइबिल का भी हिन्दी भाषा में अनुवाद किये। भारत में हिन्दी के महत्व को डॉ फादर बुल्के ने बखूबी समझा। इस संदर्भ में उनका यह कथन उल्लेखनीय है- संस्कृत भारत की महारानी, हिन्दी बहुरानी, और अंगे्रजी भारत की नौकरानी है। यह उनके हिन्दी प्रेम का परिचायक है। 17 अगस्त 1982 ई को फादर कामिल बुल्के इस धराधाम से हमेशा के लिए चल बसे। फादर बुल्के को हिन्दी भाषा की सेवा के लिए अनेको सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें 1974 ई में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1951 ई़ में उन्हें भारत की नागरिकता मिली। फादर कामिल बुल्के की प्रमुख रचनाएं हैं- रामकथा : उत्पत्ति और विकास, नया विधान, नील पक्षी, मंथन, राम कथा और तुलसीदास, मानस कौमुदी, ईसा जीवन और दर्षन, अंग्रेजी हिन्दी शब्द कोष, हिन्दी अंग्रेजी लघु कोष। डॉ कामिल बुल्के ने अपनी साधना से हिन्दी को पूरब और पश्चिम से जोड़ दिया। भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति की दीवारों को तोड़ते हुए हिन्दी के अनन्य संत हमेशा के लिए अजर अमर हो गये। हिंदी के लिए उनका समर्पण अविस्मरणीय और अनुकरणीय है।इस महान विभूति को शत -शत नमन। फिराक गोरखपुरी की ये पंक्तियां बुल्के साहब पर सही बैठती हैं -बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।
मनोज कुमार शर्मा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जल्द ही रेडियो पर प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम का 100वां एपिसोड प्रसारित होगा। इस लोकप्रिय कार्यक्रम के 100वें एपिसोड का रेडियो पर वैश्विक प्रसारण होगा। मन की बात कार्यक्रम का पहला एपिसोड 03 अक्टूबर 2014 को प्रसारित हुआ था। यह कार्यक्रम प्रत्येक महीने के आखिरी रविवार को रेडियो पर प्रसारित होता है। भारत जैसे देश में जिसकी आबादी सवा अरब से ज्यादा हो वहां के प्रधानमंत्री का जनता से सीधा संवाद करने का यह तरीका स्वयं में अभिनव सा है। अब तक यह परिपाटी सी रही थी कि भारत के प्रधानमंत्री चुनावों के समय, राष्ट्रीय पर्वों या किसी खास अवसर पर ही टीवी के माध्यम से जनता को संबोधित करते थे। लेकिन, वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के माध्यम से देशवासियों से किसी खास अवसर की बजाय आम जन के सरोकार वाले प्रत्येक अवसर पर संवाद किया और इसके लिये उन्होंने सर्वसुलभ और देश के 91 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच रखने वाले माध्यम रेडियो को चुना।हालांकि मन की बात कार्यक्रम दूरदर्शन और अन्य राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर भी प्रसारित होते हैं, पर इसका मुख्य माध्यम रेडियो ही है। जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं लोगों से मुखातिब हों और छात्रों से परीक्षा, महामारी, अंगदान, मोटे अनाज के उपयोग, कृषि जैसे विषयों पर संवाद करें तो निश्चय ही देशवासियों के बीच इसका सकारात्मक प्रभाव होता है।जनता ऐसे प्रसारण से अपने प्रधानमंत्री को अपने करीब एक जिम्मेदार प्रतिपाल की भांति महसूस करती है। जब प्रधानमंत्री स्वयं 10वीं, 12वीं की परीक्षाओं के समय छात्रों को सहज होकर परीक्षा देने का संदेश देते हैं और छात्रों को कहते हैं कि आप टॉपर होने शत-प्रतिशत नंबर लाने का तनाव न लें, कुछ प्रतिशत कम नंबरों से पास होना आप की सफलता में बाधक नहीं बनता नही इससे आप की योग्यता में कोई कमी आती है, तो परीक्षा के तनाव से गुजर रहे छात्रों, युवाओं को एक राहत मिलती है निश्चय ही उनका मनोबल बढ़ता है। मन की बात कार्यक्रम के तकरीबन प्रत्येक एपिसोड में प्रधानमंत्री ने देशवासियों के बीच सकारात्मकता का संचार किया है। इस कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण बिंदु है कि पीएम अक्सर सराहनीय कार्यकरने वालों के बारे में नाम लेकर बताते हैं और संवाद भी करते हैं। इस कार्यक्रम के जनता से जुड़ाव में सबसे बड़ा योगदान रेडियो का रहा है। ग्रीक भाषा में रेडियस का अर्थ दायरा होता है और इसी शब्द से रेडियो का नाम पड़ा क्योंकि रेडियो का प्रसारण एक व्यापक दायरे में होता है। ऐसे में मन की बात कार्यक्रम के लिये रेडियो का चुनाव एक सफल कदम है। प्रधानमंत्री ने मन की बात के लिए रेडियो को चुना। इससे रेडियो को भी इस टीवी, डिजिटल और इंटरनेटयुग में फिर से पुरानी पहचान मिली है।अब सभी मन की बात कार्यक्रम को गावों कस्बों, खेतों में भी लोगों को रेडियो पर सुनते देखते हैं। यही नहीं रेडियो को कभी-कभार उपयोग में लेने वाले देश भर के महानगरों और शहरों में रहने वाले लोगों ने रेडियो का उपयोग करना प्रारंभ कर दिया है। मुंबई और चेन्नई के अलावा 6 बड़े शहरों में किये गये एक सर्वेक्षण से यह पता चला कि कि लगभग 66.7% आबादी ने प्रधानमंत्री के संबोधन को सुनने के लिए ट्यून किया था और इसे बहुत ही अच्छा कहा। झारखंड के लोगों के लिए उपलब्धि का क्षण संचार का एक सामान्य तथ्य है कि वह आम जन के लिये सुलभ, रूचिकर, प्रेरणादायी भी हो। जब प्रधानमंत्री स्वयं आकर किसी विषय पर जनता के बीच संदेश दें उन लोगों का नाम लें जो अपने क्षेत्र में बेहतरीन काम कर रहे हैं, संघर्ष से अपना लक्ष्य प्राप्त किये हैं या देश समाज के लिये नि: स्वार्थ काम कर रहे हैं तो इसका आम जन में तो व्यापक सकारात्मक प्रभाव होता ही है, उस क्षेत्र के अनय लोग भी इससे प्रेरणा पाते हैं। प्रधानमंत्री ने कई एपिसोड में झारखंड में गांव कस्बों तक में बेहतरीन कार्य कर रहे लोगों, युवाओं, महिलाओं, किसानों का नाम लेकर उनके बारे में लोगों को बताया। सितंबर 2022 में जब प्रधानमंत्री ने रांची के महिला समूह के शोभा दीदी और उनके सहयोगियों के कार्य की सराहना की तो पूरे झारखंड का गौरव बढ़ा। 75वें एपिसोड में प्रधानमंत्री ने रांची झारखंड के युवा नवीन का विशेष उल्लेख किया और देशवासियों को बताया कि युवा नवीन कैसे झारखंड के स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के बारे में लोगों को अवगत करा रहे हैं और बिरसा मुंडा से लेकर सिदो कान्हो व अन्य गुमनाम से स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में भी लाग अब जान रहे हैं तो यह झारखंड के लिये बड़ा ही उपलब्धि का क्षण था। 92वें एपिसोड में गिरिडीह के पीरटांर के मधुबन पंचायम के सिंहपुर गांव के आंगनबाड़ी केंद्र के कुपोषण के खिलाफ किये जा रहे कार्यों की दिल खोल कर सराहना की और झारखंड की यह खबर रेडियो और अन्य माध्यमों से पूरे देश में सुर्खियों में आया। दुमका के संजय कच्छप को जिन्होंने अपने प्रयास से चाइबासा समेत अन्य जिलों में 24 लायब्रेरी का निर्माण करवाया है उन्हें लायब्रेरीमैन कह कर जब पीएम ने रेडियो पर पुकारा तो यह झारखंड के लिए बड़ी उपलब्धि थी। वैसे ही गोमो रेलवे स्टेशन जिसे अब सुभाषचंद्र बोस स्टेशन नाम से जाना जाता है, उसके बारे में भी देशवासियों को पीएम ने रेडियो पर अपने कार्यक्रम के माध्यम से ही बताया कि कैसे अंग्रेजों को चकमा देकर इसी स्टेशन से रेल पर सवार होकर निकलने के बाद नेता जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। उनके इस सफर को महानिष्क्रमण नाम दिया और स्टेशन का नाम गोमो से सुभाषचंद्र बोस स्टेशन नाम दिया गया। कोरोना काल में 31 जनवरी 2021 के अंक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में झारखंड के दुमका के शिक्षा मॉडल की चर्चा की। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान स्कूली शिक्षा जारी रखने के लिए दुमका में किये गये अनूठे प्रयास की सराहना की । अभी हाल में प्रसारित 99वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 मार्च को अंग दान करने वालों की तारीफ की। अपने संबोधन में उन्होंने झारखंड के जमशेदपुर की रहने वाली स्नेह लता चौधरी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब अंगदान या देहदान करने वाला कोई मिल जाता है तो उसमें ईश्वर का स्वरूप ही नजर आता है। उन्होंने अपने संबोधन में आगे कहा कि झारखंड की स्नेह लता चौधरी ऐसी ही थीं। जिन्होंने ईश्वर बनकर दूसरों को जिंदगी दी। 63 साल की स्नेह लता चौधरी अपना हार्ट, किडनी, आंख और लीवर दान कर के गयीं। मन की बात रेडियो पर प्रसारित एक कार्यक्रम ही नहीं बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के मुखिया का अपनी जनता से सीधा जुड़ाव और संवाद है जो जनता और सरकार के बीच संवादहीनता को खत्म करने के साथ ही विश्वास का संचार करता है और बेशक इसके लिए चुना गये माध्यम रेडियो का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। (लेखक स्कूल आॅफ मास कम्युनिकेशन, रांचीविश्विवद्यालय, रांची से जुड़े हैं।)
संजय पासवानएबीएन एडिटोरियल डेस्क। जाति उन्मूलन चाहने वाले, दलित मुक्ति के लिए पूंजीवाद और जातिगत भेदभाव के खिलाफ वैचारिक संघर्ष को जरूरी मानने वाले क्रांतिकारी समाज सुधारक संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर का 14 अप्रैल को 132वां जन्मदिन मनाया जा रहा है।इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब जब धरती पर जुल्म बढ़ा है, तो जुल्म के खिलाफ शोषित पीड़ित लोगों ने जंग लड़ी है और जिसमें जीत भी मिली है। जिसका नेतृत्व करने वाले नायक का नाम इतिहास में अमिट है। यह भी हकीकत है कि जुल्म अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए इंसान को कई बार यातनाएं भी मिली है और कुर्बानियां भी देनी पड़ी है, लेकिन इस सब की बदौलत ही दुनिया में क्रांतियां हुई है, बदलाव आया है। बुनियादी बदलाव बिना बदनामी और बलिदान के संभव नहीं है। इसके लिए समर्पित संघर्षशील नेतृत्वकारी लोगों को दैवीय बनाकर, मसीहा, महामानव कहना या भगवान बना देना अज्ञानता, गैर वैज्ञानिक जनविरोधी सोच है। इससे समाज में जड़ता और रूढ़ीवादिता मजबूत होती है। इससे जन संघर्ष को कमतर कर दिया जाता है। इंसान जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है। जनसाधारण के बीच से यदि कोई जनता के दुख दर्द को ठीक से समझे, जनता के हक और अधिकारों के लिए सार्थक और सतत प्रयास करे, भ्रष्ट और लालची नहीं बने, बदनामी सहन कर सके और जरूरत पड़ने पर बलिदान भी दे सके, तो वह व्यक्ति महान बन सकता है। किसी नायक का पूजा करना भी उचित नहीं है। जैसा बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी कहा है कि क्योंकि इससे तानाशाही पनपती है, मिथ्या अवतारवाद को बढ़ावा मिलता है। आमलोगों में जनसंघर्षों के प्रति उदासीनता पनपती है।ज्योतिबा फुले, अंबेडकर जैसे क्रांतिकारी नायकों ने ईश्वर अल्लाह के आदेश से नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियों में इंसान की बेहतरी और बदलाव के लिए अपने ज्ञान और विवेक का बेहतरीन इस्तेमाल किया था। संगठन बनाकर बुनियादी बदलाव का प्रयास किया था। आज भारत को शोषणमुक्त, समतामूलक बनाने के लिए आर्थिक शोषण के साथ साथ जातिगत भेदभाव और शोषण से मुक्ति अत्यंत जरूरी है। साथ ही महिलाओं के साथ भेदभाव, धर्म के नाम पर अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत के खिलाफ भी बोलना जरूरी है। क्योंकि वोट के खातिर हिंदु मुसलमान के बीच भड़काये दंगों में दलितों का इस्तेमाल बड़े स्तर पर हो रहा है। जिसके कारण रोजी रोटी के लिए संघर्ष कमजोर पड़ रहा है। चिंता की बात यह है कि समतामूलक भारत बनाने के लिए मार्गदर्शक हमारे समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष संविधान और लोकतंत्र पर हमले तेज हो रही हैं और कॉरपोरेट हितैषी, जातीय विषमता एवं सांप्रदायिक राजनीति और विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसलिए इन हमलों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाना भी देश की जरूरत है। इस वर्ष देश के दो राज्यों केरल और तमिलनाडु में वाइकोम आंदोलन की 100वीं वर्षगांठ मनायी जा रही है। वाइकोम आंदोलन वह आंदोलन है, जिसके माध्यम से केरल और तमिलनाडु में पिछड़ों और दलितों ने आंदोलन किया था और मंदिरों में प्रवेश का अधिकार जीता था। इस आंदोलन का इतना असर था कि पूरे केरल में किसी भी जाति के मंदिर में प्रवेश पर कोई रोक नहीं थी। आज वामपंथी शासन वाला राज्य केरल में दलित उत्पीड़न की घटनाएं न के बराबर हैं। लेकिन यह उत्तर, पश्चिम या पूर्वी भारत में नहीं हो सका। उत्तर भारत के बड़े राज्यों की बात करें तो आज दलितों के खिलाफ अत्याचारों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 2018 से दलितों के खिलाफ अपराध के 1.3 लाख से अधिक मामले दर्ज किये गये हैं और यूपी, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में दलितों के खिलाफ अपराध के मामले में सबसे ऊपर हैं।गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराध के अधिकतम 36,467 मामले दर्ज किये गये, इसके बाद बिहार (20,973 मामले), राजस्थान (18,418) और मध्य प्रदेश में (16,952) मामले दर्ज हुए हैं। सनद रहे कि ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्हें बाहुबलियों, सामंतों और पुलिस की धमकियों की वजह से दर्ज नहीं किया जाता है। देश आजाद हुए 75 साल हो गया है, लेकिन चिंता की बात यह है कि महात्मा फुले, अंबेडकर, भगत सिंह, गांधी के सपनों का भारत नहीं बन पाया। आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का बेरहमी से दोहन के परिणामस्वरूप हम दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था जरूर बन गये हैं, लेकिन मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान 131वां है। वैश्विक भूख सूचकांक में हम 94वें पायदान पर हैं। सतत विकास के मानकों में भारत का स्थान 193 देशों की सूची में 117वां है। जेंडर समानता की दृष्टि से हमारा का स्थान 156 देशों में 140वां है। डेमोक्रेसी इंडेक्स में 167 देशों की सूची में भारत का स्थान 142वां है। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के तहत 180 देशों की सूची में इंडिया का स्थान 142वां है। निजीकरण के कारण आरक्षण पर खतरा मंडरा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य का तेजी से निजीकरण हो रहा है। आजादी के 75 वर्ष बाद भी शिक्षा पर जीडीपी का लगभग तीन प्रतिशत और स्वास्थ्य पर मात्र दो प्रतिशत ही खर्च किया जा रहा है। बेरोजगारी में दुनिया में पहले स्थान पर चल रहे हैं हम। करीब 35 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। किसान और मजदूर बदहाल है। राजनीति में बढ़ते धनबल और अपराधीकरण ने लोकतंत्र को बुरी तरह से कमजोर कर दिया है। जाति-धर्म के नाम पर नफरत और हिंसा तेजी से बढ़ रही है। विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे बुद्धिजीवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, छात्र-युवा, किसान-मजदूर, सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, यहां तक कि पत्रकारों को भी यूएपीए कानून लगाकर प्रताड़ित किया जा रहा है। नागरिकों की निजता खतरे में है। क्रोनी कैप्टलिज्म एवं जाति धर्म के नाम पर विभाजन की राजनीति ने हमारी आजादी को खतरे में डाल दिया है। संविधान और लोकतंत्र को कमजोर किया है। पूंजीवादी विकास के चलते जल, जंगल, जमीन के परंपरागत हक से आदिवासी वंचित हो रहे हैं। ज्योतिबा फुले, अंबेडकर, भगत सिंह व गांधी के वैचारिक विरासत को बचाने के लिए सांप्रदायिक कॉरपोरेट गठजोड़ के खिलाफ हमें बाबा साहेब की जयंती पर अपनी आजादी, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए साझा संघर्ष तेज करने का संकल्प लेना होगा। (लेखक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिवमंडल सदस्य हैं।)
रमेश सर्राफ धमोरा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजस्थान विधानसभा चुनाव होने में सिर्फ सात महीने का समय रह गया है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल चुनावी व्यूह रचना बनाने में लग गए हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का मानना है कि उनकी लोक हितकारी योजनाओं से इस बार के चुनाव में हर बार सत्ता बदलने का रिवाज बदल जायेगा। भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों के नेताओं का मानना है कि प्रदेश की जनता गहलोत सरकार को हटाकर राज बदलने को तैयार बैठी है। वोट पड़ेंगे तब राज बदल जायेगा। राजस्थान में आम आदमी पार्टी ने कोटा के नवीन पालीवाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम करना प्रारंभ कर दिया है। विधानसभा चुनाव का प्रभार राज्यसभा सदस्य व पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री डॉ संदीप पाठक को पहले ही दे चुकी है। दिल्ली के द्वारका से विधायक विनय मिश्रा को राजस्थान का प्रभारी बनाया गया है। पार्टी ने दिल्ली, पंजाब और गुजरात के सात विधायकों अमनदीप सिंह गोल्डी, नरेश यादव, चेतर वसावा, नरेंद्र पाल सिंह सवाना, हेमंत खावा, शिवचरण गोयल और मुकेश अहलावत को सह प्रभारी बनाया है है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान जयपुर में रोड शो करके चुनाव तैयारी का आगाज कर चुके हैं। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा था। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे रामपाल जाट को 628 वोट ही मिल पाये थे। यही हाल अन्य का था। 2018 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को प्रदेश में 0.38 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि अब पार्टी के नेता प्रदेश में अगली सरकार बनाने का दावा कर रह हैं। राजस्थान में मुख्य विपक्षी दल भाजपा है। भाजपा विधानसभा चुनाव की तैयारी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 1.22 प्रतिशत यानी एक लाख 77 हजार 699 वोट अधिक प्राप्त कर 79 सीट अधिक जीत ली थी। वही इतने वोटों के अंतर पर भाजपा की 90 सीटें कम हो गयी थी। इससे भाजपा सत्ता से बाहर हो गई थी। अपनी पिछले विधानसभा चुनाव की कमी को दूर करने के लिए भाजपा अभी से जुट गयी है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा प्रदेश की राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग के फामूर्ले पर काम कर रही है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर ब्राह्मण समाज के सीपी जोशी को नियुक्त किया गया है। सीपी जोशी चित्तौड़गढ़ से दूसरी बार लोकसभा सदस्य हैं। जयपुर में कुछ दिनों पूर्व ही ब्राह्मण समाज ने लाखों लागों को एकत्रित कर एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया था। इसमें ब्राह्मण समाज ने प्रदेश की सभी पार्टियों से उनके समाज को सत्ता में अधिक भागीदारी देने की मांग की थी। उस सम्मेलन के कुछ दिनों बाद ही भाजपा ने सीपी जोशी की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी कर दी। भाजपा ने राजपूत समाज के सातवीं बार विधायक बने राजेंद्र राठौड़ को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया है। प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए गए डॉक्टर सतीश पूनिया को विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष बना कर जाट समाज को भी खुश कर दिया गया है। सतीश पूनिया पहली बार आमेर से विधायक बने हैं। इसलिए उन्हें उपनेता का पद ही मिल पाया है। चर्चा है कि मीणा समाज के राज्यसभा सदस्य डॉक्टर किरोड़ीलाल मीणा को केंद्र में मंत्री बनाया जा सकता है। राजपूत समाज के गजेंद्र सिंह शेखावत, यादव (अहीर) समाज के डॉक्टर भूपेंद्र यादव, ब्राह्मण समाज के अश्विनी वैष्णव केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। जाट समाज के कैलाश चौधरी, अनुसूचित जाति के अर्जुन राम मेघवाल केंद्र सरकार में राज्य मंत्री हैं। बनिया समाज के ओम बिरला लोकसभा अध्यक्ष हैं। वही गुलाबचंद कटारिया को असम का राज्यपाल बनाया गया है। झुंझुनू से सांसद, केंद्र सरकार में उप मंत्री व अजमेर जिले के किशनगढ़ से विधायक रहे जगदीप धनखड़ भी उपराष्ट्रपति पद पर हैं। गुर्जर समाज की अलका गुर्जर भाजपा के राष्ट्रीय सचिव है। ओमप्रकाश माथुर केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे या उनके किसी समर्थक को भाजपा चुनाव अभियान समिति का संयोजक बनाया जा सकता है। आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असादुदीन ओवैसी भी अपनी पार्टी का संगठन बनाने में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का पूरा संगठन पार्टी अध्यक्ष व नागोर सांसद हनुमान बेनीवाल के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। बेनीवाल ने हाल ही में दिल्ली में अपनी पुत्री का जन्मदिन मनाया था। इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान शामिल हुए थे। कांग्रेस की चुनाव कमान पूरी तरह मुख्यमंत्री गहलोत ने संभाल रखी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा भी संगठन के काम में लगे हैं। उन्हें अध्यक्ष बने तीन साल होने वाले हैं। ऐसे में चर्चा चल रही है कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर किसी अन्य नेता को नियुक्त किया जा सकता है। यदि प्रदेश अध्यक्ष बदला जाता है तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का पूरा प्रयास रहेगा कि उनके समर्थक रघु शर्मा, महेश जोशी, महेंद्र चौधरी, नरेंद्र बुडानिया, लालचंद कटारिया में से किसी को अध्यक्ष बनाया जाए। ताकि चुनाव में उनके मन मुताबिक टिकटों का वितरण हो सके। कांग्रेस के 400 में से 367 ब्लॉक अध्यक्षों की तो नियुक्तियां हो चुकी है। मगर अधिकांश जिलाध्यक्षों के पद लंबे समय से खाली हैं। इस कारण नीचे के स्तर पर संगठन पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पा रहा है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने हाल ही में तीन विधायकों अमित चाचान, इंद्राज सिंह गुर्जर, प्रशांत बैरवा सहित कुल 8 लोगों को पार्टी का प्रवक्ता नियुक्त किया है। वही सात लोगों को मीडिया पैनलिस्ट और तीन लोगों को मीडिया को-आर्डिनेटर बनाया गया है। कांग्रेस में 25 सितंबर 2022 की घटना में दोषी नेताओं पर अभी तक कार्रवाई नहीं होने से भी सचिन पायलट खासे नाराज हैं। सचिन पायलट ने जयपुर में एक दिन का उपवास रखकर अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर मिलीभगत का खेल खेलने का आरोप लगाया है। पायलट के अनशन को रोकने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने बहुत दबाव बनाया मगर पायलट आखिर अनशन करके ही माने हैं। हालांकि कांग्रेस प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने पायलट के अनशन को पार्टी विरोधी गतिविधि घोषित कर दिया था। मगर पायलट के खिलाफ अभी तक अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की किसी ने हिम्मत नहीं दिखायी है। पायलट को हनुमान बेनीवाल सहित आम आदमी पार्टी का भी समर्थन मिल रहा है। कांग्रेस आलाकमान को पता है कि यदि पायलट के खिलाफ किसी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई करेंगे तो राजस्थान की स्थिति भी पंजाब की तरह हो सकती है। कुल मिलाकर चुनावी दौर में कांग्रेस आपसी गुटबाजी की शिकार हो गयी है जिसका खामियाजा उन्हें अगले विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ेगा। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
स्वामी सत्यानंद परमहंसएबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्वामी सत्यानंदजी परमहंस कहते है कि बुद्ध को नास्तिक क्यों कहा जाता है? क्योंकि बुद्ध आत्मा को नहीं मानते थे। बुद्ध कहते थे मेरा जन्म नहीं हुआ है। मैं अविनाशी हूं। देश-दुनिया के विद्धान इस बात को समझ नहीं पाते हैं। मैं कई बार यूनिवर्सिटी के बुद्धिज्म पढ़ाने वाले प्रोफेसरों से पूछता हूं कि आप बुद्ध को इस प्रकार गलत ब्याख्या के साथ क्यों पढ़ाते हैं ? तब वे कहते हैं कि मेरा सिलेबस वैसा है अगर मैं जो आप समझा रहें है जो हमलोगों को सही भी लगता है लेकिन पढ़ा नहीं सकते हैं। चेतन ही आत्मा और परमात्मा है।आप जीवन भर क्या करते हैं? आप जीवन भर क्या चाहते हैं? दुख कम हो सुख अधिक हो। सुखा बढ़े और दुख घटे। इसके लिये ही तो सब उपाय करते हैं। बुद्ध कहते हैं दुख है, दुख का कारण है, दुख का निवारण भी है। सांख्य का प्रथम सूक्त है सृष्टि परमानंद के लिए हुई।बुद्ध जब बंधन में थे तब मृत्यु का भय था। तब जरा (बीमार) होने का डर था। तब वे सिद्धार्थ थे। वही सिद्धार्थ बोध गया में कहते हैं मेरा न जन्म है न मेरी मृत्यु है। चेतन ही जीवात्मा और परमात्मा है। अकेले आत्मा कुछ नहीं है अविनाशी है आकाश की तरह। वायु,जल और अग्णि मिलाकर ब्रह्मांड कहलाती है और इसमें गति हो जाती है।मन, बुद्धि, चित्त और अंहकार के साथ जब आत्मा मिल जाती है तब वह जीवात्मा बन जाती है। यह जीवात्मा अगर ज्ञान में है तो वह परमात्मा हो जाती है। बुद्ध को ज्ञान हुआ। बुद्ध ने कहा कौन सिद्धार्थ न जन्म न मृत्यु। बुद्ध ने आत्मा को स्वीकार किया और उसके परमात्मा होने की दिशा में सार्थक प्रयास किया। जीवात्मा का एक ही उदेश्य है परमात्मा की प्राप्ति। अपने अत:करण में उसे स्थापित कर पाना। बुद्ध ने यही बात दुनिया को समझा दिया। लोग विशेषकर बुद्धिजीवी बुद्ध को समझ नहीं पाये और कह दिया कि बुद्ध नास्तिक थे। कभी मत सोचिए दुनिया नहीं है। समय बराबर जीरो से हम आंरभ करते हैं। अखंडमण्डलाकारम का अर्थ ही है वह अखंड है और गोल है। जो गोल उसका छोर नहीं पकड़ा जा सकता है उसे कही भी मान कर आरंभ किया जाता है। क्या ज्ञान में आने के बाद मनुष्य दुख पूरी तरह दुख से मुक्त हो जायेगा? नहीं ऐसा नहीं होगा। त्रिकुटी के उपर तक सत, रज और तक है। इसके उपर जाने पर दुख कम हो जाएगा समाप्त नहीं होगा। ज्ञान हो जाने की स्थिति के बाद आपको पत्ता होता है कि यह शरीर का अंत है आत्मा का नहीं। देह धरे का दंड भुगते हर कोई।ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोये।क्या अभिमण्यु की मृत्यु के बाद कृष्ण को दुख नहीं हुआ होगा? अवश्य हुआ होगा लेकिन ज्ञानी ज्ञान से दुख को कम कर पाता है। अर्जुन अधिक व्याकुल होते हैं कृष्ण से कहते हैं कि आप तो ईश्वर है मेरे अभिमण्यु से मुझे मिला दिजीए। कृष्ण कहते हैं चलो। कृष्ण दिखाते हैं अर्जुन देखते हैं अभिमण्यु एक सिंहासन पर विराजमान हैं। अर्जुन कहते हैं अभिमण्यु मेरा पुत्र। अभिमण्यु कहता है कौन पुत्र कैसा पुत्र। उस शरीर को मैंने छोड़ दिया है। मैं उतने ही समय के लिए धरती पर गया था। अर्जुन समझ जाते हैं। ब्रह्म विद्यालय आश्रम राजपुर में गुरुदेव स्वामी जी सरकार को भी महात्मा दर्शनानंद जी शरीर छोड़ें जाने का दुख हुआ होगा लेकिन वे ज्ञान में थे इसलिए उन्होंने उस भाव को नियंत्रित कर लिया। जीवन का मध्यकाल ही ज्ञान के प्रकट होने का काल है। जब जीवात्मा के पास परमात्मा के होने का अवसर मिलता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार समाप्त होता है ज्ञान से। महात्मा दर्शनानंद भक्ति के अनुपम उदाहरण थे। उनकी जीवन की एकमात्र इच्छा थी कि उनके गुरुदेव समाधि सरकार की हर इच्छा जो उनसे चाहते हो वह पूरा हो। उनकी अपनी कोई इच्छा नहीं थी।जब इच्छा समाप्त हो गयी तो वे मुक्त हो गये। महात्मा दर्शंनानंद कहा करते थे कुटी में कुटाओं और मठिया में मढ़ाओ। स्वामी परमहंस दयाल जी भी कुटी बनाने और भक्त बनाने से भी परहेज करते थे। लेकिन जिस प्रकार एक चादर बेचने वाला साइकिल पर घूम-घूमकर चादर बचें और उसका काम हो और फिर वही व्यक्ति एक दुकान खोल ले तो उसका कार्य व्यवस्थित हो जाए यही अंतर है।हमारे देश में सन्तों की अनेक परम्परा है। राम और कृष्ण की कोई आश्रम परम्परा नहीं है लेकिन गुरु वशिष्ठ, कबीर, नानक सहित अनेक संतो-महात्माओं की है। मठ और आश्रमों से धर्म की परम्परा व्यवस्थित और सुचारु हो जाती है।एक वृक्ष की तरह ब्रह्मांड भी युवा और वृद्ध होता है यह समाप्त भीहोता है और इसका निमार्ण भी होता है। विग वेन थ्योरी के अनुसार विस्फोट से पृथ्वी का निर्माण हुआ लेकिन यह विस्फोट कहां हुआ। पहले से उपस्थित आकाश और 118 एलीमेंट की उपस्थित के बिना क्या विस्फोट संभव है? निश्चित रुप से यह निर्माण और विध्वंध की प्रकिया चल रही है इसके समय का अनुमान लगाना कठिन है। कृष्ण ईश्वर थे। लेकिन एक सामान्य बेहेलिया के तीर से मृत्यु को प्राप्त हो गये। अर्जुन को द्धारिका से बासुदेव ने संदेश भेजा कि कृष्ण के जाने के बाद बड़ी संपति और रानियां द्वारिका में असुरक्षित है आप उन्हें हस्तिनापुर ले जायें। अर्जुन जैसा पराक्रमी और वीर जब द्धारिका से हस्तिनापुर चले तो रास्ते में भीलों ने उनकी संपति लूट ली। उन्हें ज्ञान हो गया कि उनका बल समाप्त हो रहा है। इसके बाद ही पांचों पाडंव हिमालय में हिम समाधि के लिये चले चले गये।शरीर नाशवान है यह सत्य है। आप परमात्मा बनकर इसे छोड़ना चाहते हैं या व्याकुल आत्मा इसी कार्य के लिये आपको यह मानव तन मिला है। तब आपको यह मार्ग सुझाने के लिए राजपुर हो या टेरी स्वामी परमहंस दयाल हो या समाधि सरकार शिवधर्मानंदजी अपने आप को उनके इच्छा में मिलाना होगा जहां सच्चा सुख है सगुण के साथ। बुद्ध ने ऐसा ही किया था।
अजय कुमार शर्मा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मदर इंडिया की कालजयी छवि प्राप्त नर्गिस को इस मुकाम पर पहुंचाने में केवल एक ही हाथ था और वह था उनकी मां जद्दनबाई का। पुरुष प्रधान समाज में उन्होंने मेहनत कर अपने बल पर अपनी बेटी को इस मुकाम तक पहुंचाया। इलाहाबाद में 1892 में पैदा हुई जद्दनबाई हिंदू मां दिलीपा और मुस्लिम पिता मियांजान की संतान थीं। उन्होंने अपने हुनर को इतना निखारा कि वह उस समय की महफिलों की शान बन गईं। यह राजा-रजवाड़ों का दौर था जहां मनोरंजन के नाम पर संगीत और नाच की महफिलें लगा करती थीं और उसमें अमीर राजा, व्यापारी भरपूर पैसे लुटाया करते थे। जद्दनबाई एक दबंग और खुद्दार औरत थीं और सुरीली आवाज की मालकिन थीं। उन्हें कुछ खास महफिल में गाने के निमंत्रण मिलते थे और उनकी मशहूरी दूर-दूर तक फैल गई थी। खूबसूरत चेहरे और लंबे घने काले केशों वाली जद्दनबाई बहुत दिलकश थीं। गोरा रंग उन्होंने अपनी वालिदा से विरासत में पाया था। अपने को हुनरमंद बनाने के लिए जद्दनबाई ने ठुमरी, दादरा, गजलें और यहां तक कि पंजाबी लोकगीत सीखना भी शुरू कर दिया था।जद्दनबाई ने बनारसी ठुमरी के स्तंभ उस्ताद मोएजुद्दीन खान से संगीत की शिक्षा पायी। वह एक लाजवाब और कायदे कानून वाले उस्ताद थे क्योंकि उनकी देखरेख में जद्दनबाई चोटी की गायिका बनकर उभरीं। उनकी आवाज परिपक्व, गहरी और सुरों पर उनकी पकड़ अदभुत थी, चाहे ब्रजभाषा का गीत गाती हों या गालिब की गजल। उनकी आवाज बेगम अख्तर के लिए प्रेरणा थी। जद्दनबाई ने अपना पहला प्रोग्राम बनारस में ही किया था और उनके सबसे पहले प्रशंसक थे बनारस के रईस नरोत्तमदास खत्री जो बच्चू भाई के नाम से जाने जाते थे। इस शादी से उनका पहला बेटा अख्तर हुसैन पैदा हुआ। उनकी दूसरी शादी थी मास्टर इरशाद हुसैन जो मीर खान के नाम से भी जाने जाते थे और जद्दनबाई के लिए हारमोनियम बजाते थे। इनसे उनकी संतान पैदा हुई अनवर हुसैन और फिर दोनों जुदा हो गए। इसके बाद जद्दनबाई लखनऊ चली गई और फिर वहां से कलकत्ता। लखनऊ आना उनकी जिंदगी में एक नया मोड़ साबित हुआ। यहां उनकी मुलाकात रावलपिंडी से आए और डॉक्टरी पढ़ने के लिए विदेश जाने वाले युवा से हुई जिन्होंने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा। जद्दनबाई ने इसके लिए उनके माता-पिता की अनुमति चाही तो वे वापस रावलपिंडी लौट गया। इस बीच जद्दनबाई कलकत्ता चली आयी। यहां कुछ समय बाद फिर वह युवा पहुंचा उसका नाम था उत्तमचंद मोहन या मोहन बाबू। प्यार में अपना नाम बदलकर अब्दुल रशीद बन गया और 1928 में दोनों ने निकाह कर लिया। उनके धर्म परिवर्तन की रस्म मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने संपन्न कराई थी। तब जद्दनबाई 32 साल की थीं और मोहन बाबू उनसे 4 साल छोटे थे। 01 जून 1929 को कलकत्ता में जद्दनबाई ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसके बचपन का नाम था बेबी रानी। वैसे हिंदू और मुस्लिम रिवाजों के अनुसार उसके दो अन्य औपचारिक नाम भी रखे गए तेजेश्वरी और फातिमा। यही बालिका आगे चलकर हिंदी सिनेमा की प्रसिद्ध तारिका नर्गिस बनीं। पहले इस परिवार ने किसी इज्जतदार धंधे में पैर जमाने की कोशिश की लेकिन विफल होने पर जद्दनबाई को अपने नाच गाने के हुनर पर ही विश्वास करके काम करना पड़ा। इस बीच हुआ यह कि मूक फिल्में बनना शुरू हो गयी थीं और ज्यादातर फिल्मों में तवायफों को ही काम मिल रहे थे। लाहौर फिल्मों का एक बड़ा केंद्र बनने लगा था। 1928 में अब्दुल रशीद करदार ने यूनाइटेड प्लेयर्स कॉरपोरेशन की स्थापना कर फिल्में बनाना शुरू किया तो जद्दनबाई को परिवार समेत लाहौर बुला लिया और उनके बेटे अनवर को भी काम-धंधे में लगाया। अभिनेत्री के रूप में जद्दनबाई की पहली फिल्म थी-राजा गोपीचंद (1933)। लाहौर में उन्होंने मोती गिडवानी की फिल्म इंसान या शैतान में भी काम किया, लेकिन बात बनी नहीं। इस बीच इम्पीरियल स्टूडियो के मालिक आर्देशिर ईरानी ने जद्दनबाई को बंबई बुला लिया। नानूभाई वकील द्वारा निर्देशित फिल्म सेवा सदन (1934) में जद्दनबाई ने उस दौर की मशहूर तारिका जुबैदा के साथ अभिनय किया। जद्दनबाई, फातिमा बेगम और जुबैदा की जीवनशैली से बहुत प्रभावित थीं और अपनी इच्छाओं को भी वैसे ही साकार करना चाहती थीं। 1934 में जद्दनबाई ने पांच साल की बेबी रानी (नर्गिस)को फिल्म नाचवाली में प्रस्तुत किया। मैरीन ड्राइव के शानदार फ्लैट में रहने वाली जद्दनबाई के पति मोहन बाबू कोई काम नहीं करते थे, इसलिए बेटे-बेटियों का भविष्य संवारने के लिए दबंग जद्दनबाई को ही पहल करना पड़ी। साल 1936 में उन्होंने संगीत मूवीटोन नामक कम्पनी की स्थापना की। अपने बच्चों को लेकर ही उन्होंने लगातार पांच फिल्में बनाईं और महिला फिल्मकारों की पंक्ति में अपना नाम दर्ज कराया। ये फिल्में थीं- तलाश-ए-हक, हृदय-मंथन, मैडम फैशन, जीवन-स्वप्न और मोती का हार, जिनके सारे पक्षों का काम स्वयं जद्दन ने संभाला। कहानी और संवाद लिखे। निर्माण और निर्देशन किया। संगीत दिया और अभिनय भी किया। उन्होंने अपने बेटी को हिंदी और अंग्रेजी की तालीम दिलाई और उसे तराशकर हीरा बना दिया। उनका निधन 08 अप्रैल, 1949 को हुआ। चलते-चलते जद्दनबाई ने अपने घर के दरवाजे सबके लिए खोल रखे थे। हर वह आदमी जो सिनेमा में हाथ आजमाना चाहता, जद्दनबाई के घर जरूर आता था। वह बिना किसी लालच के जरूरतमंदों की मदद करती थीं। अपनी मां, तीन बच्चों और पति के अलावा उनका घर मेहमानों से भरा रहता। शातो मरीन, जिस इमारत में आखिर तक रही, जहां उनके नाती-पोते अभी तक रहते हैं, बंबई के समुद्र तट पर कला का बेजोड़ नमूना है, जो बड़े-बड़े कमरों वाले फ्लैटों का पांच मंजिला बंगला है। उनके समय में सभी कमरे भरे रहते और अगर फिर भी कोई आ जाता तो उसके सोने के लिये बरामदे में चारपाई डाल दी जाती थी। (लेखक, वरिष्ठ कला-संस्कृति एवं फिल्म समीक्षक हैं।)
डॉ सौरभ मालवीय एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की प्राचीन गौरवशाली संस्कृति समस्त विश्व के सुख, समृद्धि एवं शान्ति की कामना करती है। भारतीय चिन्तन में व्यष्टि से समष्टि तक का विचार किया गया है। भारतीय पर्व इस बात का प्रतीक हैं। यहां पर प्राय: प्रतिदिन कोई न कोई लोकपर्व, व्रत, पूजा एवं अनुष्ठान का दिवस होता है, जो इस बात का प्रतीक है कि भारतीय अपने जीवन में कितने प्रसन्न रहते हैं। हमारे धर्म ग्रन्थों में भी सुख पर अनेक श्लोक एवं मंत्र हैं। सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दु:खभाग भवेत।। अर्थात सभी सुखी रहें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुख का भागी न बनना पड़े। किंतु आज भारतीय प्रसन्नता के मामले बहुत पिछड़ गये हैं। अब भारतीय पूर्व की भांति प्रसन्न नहीं रहते। वे दुखी रहने लगे हैं। एक सर्वे में यह बात सामने आयी है। अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस पर जारी वार्षिक प्रसन्नता रिपोर्ट के अनुसार 137 देशों की सूची में भारत 125वें स्थान पर है। वर्ष 2022 में भारत इस सूची में 144वें स्थान पर था तथा वर्ष 2021 में 139वें स्थान पर था। प्रसन्नता के संबंध में पड़ोसी देशों की स्थिति भारत से अच्छी है। यह अतिरेक सा लगता है। पाकिस्तान 108वें स्थान पर है, जबकि म्यांमार 72वें, नेपाल 78वें, बांग्लादेश 102वें और चीन 64वें स्थान पर है। इस रिपोर्ट के अनुसार फिनलैंड विश्व का सर्वाधिक प्रसन्नता वाला देश है। विगत छह वर्षों से वह अपने इस स्थान पर बना हुआ है। डेनमार्क द्वितीय और आइसलैंड तृतीय स्थान पर है। इस सूची में इजरायल चौथे स्थान पर है, जबकि नीदरलैंड्स पांचवें, स्वीडन छठे, नार्वे सातवें, स्विटजरलैंड आठवें, लक्जमबर्ग नौवें और न्यूजीलैंड दसवें स्थान पर है। सबसे कम प्रसन्न देशों की सूची में लेबनान, जिम्बॉब्वे, द डेमोक्रेटिक रिपब्लिक आॅफ कांगो आदि देश सम्मिलित हैं। इस सूची में अफगानिस्तान अंतिम स्थान पर है। उसे 137वां स्थान प्राप्त हुआ है। उल्लेखनीय है कि विगत एक वर्ष से रूस और यूक्रेन के मध्य युद्ध चल रहा है। फिर भी इन देशों की स्थिति भारत से अच्छी बताई गई है। इस सूची में रूस 70वें स्थान पर है, जबकि यूक्रेन को 92वें स्थान पर है। यह रिपोर्ट यूएन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क द्वारा जारी की गई है। यह रिपोर्ट 150 से अधिक देशों के लोगों पर किये गये ग्लोबल सर्वे डाटा के आधार पर बनायी जाती है। प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने जुलाई 2011 में प्रसन्नता के संबंध में एक प्रस्ताव अपनाया था। इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली ने 12 जुलाई 2012 को प्रस्ताव के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाने की घोषणा की थी। इस संबंध में अप्रैल 2012 में भूटान की राजसी सरकार ने विश्वभर के प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलाई थी। इसमें इस बात पर चर्चा की गई कि लोगों की प्रसन्नता और कल्याण को भी आर्थिक दृष्टिकोण की तरह देखने की आवश्यकता है। बैठक में इसके लिए एक आयोग नियुक्त करने की भी अनुशंसा की गई। भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मे थिनले ने इस अनुशंसा को स्वीकार किया। उनका कहना था कि सभी देशों की सरकारों को लोगों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के साथ-साथ उनकी प्रसन्नता और कल्याण को भी अधिक से अधिक महत्व देना चाहिए। उन्होंने बैठक में प्रस्ताव रखा कि संयुक्त राष्ट्र भी इस आयोग का सह-स्वामित्व करे और यह आयोग यूएन महासचिव के सहयोग से इस दिशा में कार्य करे। विश्वभर के प्रसन्नता वाले नगरों में उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर सम्मिलित है। यहां के लोग प्रसन्न रहने वाले तथा मित्र बनाने वाले हैं। यह नगर समस्त भारत के लिए प्रेरणा बन गया है। इससे यह बात सामने आती है कि मित्रों के साथ रहने से व्यक्ति प्रसन्न रहता है। मित्र दुख- सुख के साथी होते हैं। मित्रों से बात करने पर मन हल्का हो जाता है। मित्र निराशा के समय आशा की किरण दिखाते हैं। मित्र प्रोत्साहित करते हैं। मित्रों के साथ व्यक्ति अपने जीवन का बहुत अच्छा समय व्यतीत करता है। मित्रों के साथ रहने से प्रसन्नता प्राप्त होती है। प्रसन्नता एक अनुभूति है। यह मानव मस्तिष्क में पाई जाने वाली भावनाओं में सबसे सकारात्मक अनुभूति है। इस अनुभूति के उत्पन्न होने के अनेक कारण हैं। इनमें अपनी किसी इच्छा की पूर्ति होने पर होने वाली संतुष्टि की अनुभूति सर्वोपरि है। प्राय: जीवन बहुत विशाल होता है। जीवन से सदैव सुख प्राप्त नहीं होता। मनुष्य को अनेक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है। यह अतिशय नहीं है कि जीवन में सुख कम और दुख अधिक होता है। इसके अनेक कारण है। मनुष्य जीवन में सदैव सुख की कामना करता है। वह समृद्धि प्राप्त करना चाहता है। वह अपार धनराशि संचय करना चाहता है, अर्थात वह जीवन में सबकुछ प्राप्त करना चाहता है, परन्तु सदैव ऐसा नहीं होता। उसकी कुछ इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं तथा कुछ इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं। उसकी जो इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं, वह उसके बारे में विचार नहीं करता, अपितु उससे अधिक की कामना करने लगता है।ऐसी परिस्थितियों में वह दुख का भागीदार बन जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी जो इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं वह उनके बारे में भी चिंता करता रहता है। इस चिंता के कारण वह मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाता है। यह मानसिक तनाव उसे अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त कर देता है। इस प्रकार के मानसिक तनाव से ग्रस्त व्यक्ति आत्महत्या करके अपना जीवन भी समाप्त कर लेता है। उल्लेखनीय है कि आत्महत्या की सभी घटनाओं के पीछे मानसिक तनाव ही कारण होता है। यह स्थिति दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती जा रही है। वयस्क ही नहीं, अपितु बालक भी आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर रहे हैं। ऐसी अनेक घटनाएं सामने आती रहती हैं। मानसिक तनाव के क्या कारण हैं? इस पर चिंतन-मनन किया जाना चाहिए। बाल्यकाल जीवन का सबसे उत्तम समय होता है। यह तनाव मुक्त होता है। बच्चों पर किसी भी प्रकार का कोई दायित्व नहीं होता। उन्हें केवल शिक्षा प्राप्त करनी होती है तथा अपना शेष समय खेलकूद में व्यतीत करना होता है। फिर आज के बच्चे तनाव ग्रस्त क्यों हैं? इसके अनेक कारण हो सकते हैं। प्राय: देखने में आता है कि माता-पिता बच्चों पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव बनाते हैं। सभी बच्चे पढ़ाई में श्रेष्ठ नहीं हो सकते। बच्चे प्रात:काल में अपने विद्यालय जाते हैं। वहां से आने के पश्चात ट्यूशन के लिए जाते हैं। वहां से आने पर विद्यालय एवं ट्यूशन का कार्य करते हैं। ऐसे में बच्चों के पास अपने स्वयं के लिए समय ही नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त बच्चों को जबरन अन्य गतिविधियों में डालना एवं उन पर श्रेष्ठ प्रदर्शन का दबाव डालना भी उन्हें मानसिक तनाव से ग्रस्त कर देता है। माता-पिता के लिए अत्यावश्यक है कि वे अपने बच्चों की मनोस्थिति को समझें तथा उनकी पसंद एवं नापसंद का ध्यान रखें। वे बच्चों को विपरीत परिस्थितियों में भी सुख से रहने की शिक्षा दें। वे बच्चों को बताएं कि सुख और दुख दोनों ही जीवन के अभिन्न अंग हैं। हमें दुखों से घबराना नहीं चाहिए, अपितु ऐसे समय में संयम और धैर्य बनाए रखना चाहिए।यदि हम दुखों को चुनौती मानेंगे तथा स्वयं को योद्धा मानकर उसका सामना करेंगे, तो अवश्य ही हम विजय प्राप्त कर सकेंगे तथा विजेता सिद्ध होंगे। बच्चों को धार्मिक कथाएं सुनानी चाहिए कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्टों का सामना किया। इसी प्रकार भगवान राम का उदाहरण भी है कि किस प्रकार उन्होंने अपने पिता का वचन पूर्ण करने के लिए चौदह वर्षों का वनवास सहर्ष स्वीकार किया, किस प्रकार उन्होंने रावण का संहार किया। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र की कथा भी प्रेरणा देने वाली है कि किस प्रकार राजा हरिश्चंद्र ने अनेक कष्टों का सामना किया, परन्तु सत्य को नहीं त्यागा। इसी प्रकार पंचतंत्र की कहानियां बच्चों के लिए बहुत ही उपयोगी हैं तथा प्रेरक प्रसंग एवं महापुरुषों की जीवनी का ज्ञान बच्चों को करानी चाहिए। आज के वातावरण में बच्चे टीवी या मोबाइल में ही अधिक लगे रहते हैं। ऐसे में बच्चों को टीवी पर ऐसे कार्यक्रम देखने के लिए प्रोत्साहित करें, जो उनके लिए उपयोगी हैं। दूरदर्शन के अनेक चैनलों पर शिक्षा से संबंधित कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, विद्यार्थियों के लिए बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त बच्चे मोबाइल पर भी केवल शिक्षा संबंधी चीजें ही देखें। कोरोना काल से मोबाइल भी बच्चों की शिक्षा का एक अंग बन चुका है। माता-पिता को चाहिए कि वे इस पर पूर्ण दृष्टि बनाये रखें कि उनके बच्चे मोबाइल में क्या देख रहे हैं, क्योंकि बहुत से ऐसे खेल सामने आ रहे हैं, जो बच्चों को मानसिक तनाव से ग्रस्त कर रहे हैं। इस खेलों के कारण बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के अनेक मामले में भी सामने आ चुके हैं। इतना ही नहीं, यूट्यूब पर अनेक ऐसी चीजें हैं, जो बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं। उदाहरण के लिए हंसी-मजाक के अनेक वीडियो ऐसे हैं, जिनमें अशिष्टता के साथ-साथ अश्लीलता भी है। मानव को बाल्यकाल से ही जीवन मूल्यों की शिक्षा देना हमारी भारतीय परंपरा का अंग रहा है। यह हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता है। विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा दी जाये, जो उन्हें अक्षर ज्ञान के साथ-साथ जीवन मूल्यों को समझने में भी सहायक सिद्ध हो। बच्चे जीवन में प्रसन्न रहना सीखें। बच्चा विद्यालय में कम समय व्यतीत करता है, परंतु अधिक समय अपने घर में ही परिवारजनों के साथ रहता है। इसलिए यह अत्यावश्यक है कि माता- पिता स्वयं भी प्रसन्न रहें तथा अपने बच्चों को प्रसन्न रहना सिखायें। (लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल में सहायक प्रोफेसर हैं। )
रमेश सर्राफ धमोराएबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरता है जिस दिन देश के किसी ना किसी भाग में सड़क हादसा न हुआ हो और उनमें कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़े। विकास की प्रतीक मानी जाने वाली सड़कें विनाश का पर्याय बनती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में सड़क हादसों में मारे गए 10 लोगों में से कम से कम एक भारत से होता है। भारत में सड़क हादसों के आंकड़े बताते हैं कि देश में वर्ष 2021 में सड़क दुर्घटनाओं में 1.55 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई है। यह आंकड़ा औसतन 426 लोग प्रतिदिन या हर घंटे 18 लोगों का है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार पिछले साल देशभर में 4.03 लाख सड़क दुर्घटनाओं में मौतों के अलावा 3.71 लाख लोग घायल भी हुए थे।देश में दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों पर राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक रोड एक्सीडेंट के मामले 2020 में 3,64,796 से बढ़कर 2021 में 4,03,116 हो गये। मौतों में 16.8% बढ़ोतरी हुई है। 2020 में 1,33,201 और 2021 में 1,55,622 लोगों ने सड़क हादसे में अपनी जान गंवायी है। साथ ही 2021 में प्रति हजार वाहनों की मौत दर 2020 में 0.45 से बढ़कर 2021 में 0.53 हो गयी है। विश्लेषण से पता चलता है कि अधिकांश सड़क दुर्घटनाएं तेज गति के कारण हुई हैं।देश में मोटर व्हीकल एक्ट में किया गया संशोधन 1 सितंबर 2019 से लागू हुआ था। इसका मकसद देश में सड़क पर यातायात को सुरक्षित बनाना और सड़क हादसों में लोगों की मौत की संख्या को कम करना था। भारत में होने वाले सड़क हादसे में करीब 26 फीसदी खतरनाक या लापरवाह ड्राइविंग या ओवरटेकिंग की वजह से होते हैं। कोविड-19 महामारी की रोकथाम के लिए देशभर में लॉकडाउन लगाया गया था। उससे सड़क हादसों में लगभग बीस हजार लोगों की जिंदगी बचायी गयी। अप्रैल से लेकर जून 2020 तक सड़क हादसों में 20 हजार 732 लोगों की मौत हुई। जबकि 2019 में अप्रैल से जून के बीच 41 हजार 32 लोगों की सड़क हादसों में जान चली गयी थी।केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि भारत का राजमार्ग ढांचा 2024 तक अमेरिका के बराबर हो जायेगा। जिसके लिए समयबद्ध मिशन मोड में काम चल रहा है और ग्रीन एक्सप्रेसवे और रेल ओवर ब्रिज का निर्माण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारतमाला 2 के लिए जल्द ही कैबिनेट की मंजूरी मिलने की संभावना है और इसके बाद यह देश में एक मजबूत बुनियादी ढांचे की आवश्यकताओं को पूरा करेगा। गडकरी ने कहा मुझे विश्वास है कि भारत के राजमार्ग 2024 तक अमेरिका के बराबर हो जायेंगे। भारत की लंबाई और चौड़ाई में हरित एक्सप्रेसवे के नेटवर्क सहित एक मजबूत बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए समयबद्ध मिशन मोड में काम चल रहा है। गडकरी ने उम्मीद जताई कि 2025 तक सड़क दुर्घटनाएं और इसके कारण होने वाली मौतें 50 प्रतिशत तक कम हो जायेंगी।गडकरी का कहना है कि जानलेवा सड़क हादसों पर लगाम लगाने के लिए राज्यों को केन्द्रीय सड़क कोष के एक हिस्से का इस्तेमाल करना चाहिये और दुर्घटना वाली जगहों को दुरुस्त करना चाहिये। उन्होंने कहा कि हम न सिर्फ राष्ट्रीय राजमार्गों पर बल्कि राज्य राज मार्गों पर भी हादसों की संख्या कम करने की कोशिश कर रहे हैं। जिलों में सड़क सुरक्षा समितियां गठित की जानी चाहिये। जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ सांसदों को करनी चाहिये और जिलाधिकारियों को इनका सचिव बनाया जाना चाहिये। यह समिति जिला स्तर पर दुर्घटना के सभी पहलुओं को देखे।सरकार सड़क दुर्घटनाओं और मौतों को कम करने के लिए तेजी से काम कर रही है। इसके लिए नीतिगत सुधारों और सुरक्षित प्रणालियों को अपनाया जा रहा है। 2030 तक भारतीय सड़कों पर जीरो एक्सीडेंट की दृष्टिगत करने की दिशा में कई कदम उठाये गये हैं। गडकरी के अनुसार सरकार सड़क पर दुर्घटना संभावित क्षेत्र की पहचान करने और इसके समाधान के लिए 14 हजार करोड़ रुपये खर्च करेगी।सड़कों पर बने मोड़ों जैसे टी जंक्शन और टी वाई पर सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं होती है। देश भर में हुए कुल हादसों में से 37 फीसदी हादसे उन्हीं चौराहों और मोड़ों पर होते हैं। उनमें से तकरीबन 60 फीसदी हादसे टी और टी वाई जंक्शन पर रिकॉर्ड किए गए। इनकी सबसे बड़ी वजह ड्राइवरों की गलती रहती है। स्पीड सीमा को पार करना, शराब पीकर गाड़ी चलाना, ओवरटेकिंग और मोबाइल पर बात करते हुए गाड़ी चलाना कुछ ऐसी गलतियां हैं। जिनसे बड़ी संख्या में सड़क हादसे हो रहे हैं। कुल सड़क हादसों में से 84 फीसदी हादसों के पीछे ड्राइवरों की गलती होती है।शहरों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से नगरीय बस सेवाओं के भरोसे है। जिनमें ज्यादातर बसें पुरानी हो चुकी हैं। कई अध्ययनों में ये बात सामने आई है कि शहरों की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए हमें इस समय सड़कों पर चल रही बसों के मुकाबले कई गुना अधिक बसों की जरूरत है। सड़क हादसों के कारण अक्सर परिवारों की आमदनी के स्रोत को नुकसान होता है व उनकी रोजी रोजगार छिन जाता है। संबंधित परिवार को आर्थिक दिक्कतें होती हैं। जो लोग सड़क दुर्घटनाओं में बच भी जाते हैं उनके इलाज में भारी रकम खर्च करनी पड़ती है। हालांकि 2019 का मोटर व्हीकल एक्ट सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों को बीमा के जरिए आर्थिक मदद उपलब्ध कराता है। लेकिन इस कानून से सड़क हादसों के शिकार लोगों को होने वाली मानसिक क्षति की भरपाई नहीं होती। इंटरनेशनल रोड फेडरेशन के मुताबिक भारत में सड़क हादसों में सालाना करीब 20 अरब डॉलर का नुकसान होता है।देश की सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ता जा रहा है। इस पर नियंत्रण के उचित कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही वाहनों की सुरक्षा के मानकों की समय-समय पर जांच होनी चाहिए। स्कूलों में सड़क सुरक्षा से जुड़े जागरूकता अभियान चलाये जायें। भारी वाहन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को परमिट दिये जाने की प्रक्रिया में कड़ाई बरती जाये। ड्राइविंग लाइसेंस के लिए योग्यता भी तय की जाये। साथ ही छोटे बच्चे और किशोरों के वाहन चलाने पर कड़ाई से रोक लगे। तेज रफ्तार, सुरक्षा बेल्ट का प्रयोग न करने वालों और शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। तभी देश में सडकों पर लगातार हो रही दुर्घटनाओं पर रोक लग पायेगी। (लेखक राजस्थान के झुंझनु के वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)
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