योगेश कुमार गोयल
एबीएन सोशल डेस्क। विश्वभर के लगभग सभी देशों में पहली अप्रैल का दिन फूल्स डे अर्थात् मूर्ख दिवस के रूप में ही मनाया जाता है। कोई छोटा हो या बड़ा, इस दिन हर किसी को जैसे हंसी-ठिठोली करने का बहाना मिल ही जाता है और हर कोई किसी न किसी को मूर्ख बनाने की चेष्टा करता नजर आता है।
लोग एक-दूसरे को किसी तरह का नुकसान पहुंचाये बिना ऐसी असत्य और मनगढंत कल्पनाओं को ही यथार्थ का रूप देकर, जिन पर कोई भी आसानी से विश्वास कर सके, एक-दूसरे को मूर्ख बनाने की चेष्टा करते हैं और अक्सर बहुत चतुर समझे जाने वाले व्यक्ति भी मूर्ख बन ही जाते हैं।
शायद यही कारण है कि इस दिन चाहे कोई किसी का कितना ही विश्वासपात्र क्यों न हो, मस्तिष्क में यह बात विराजमान रहती है न कि कहीं यह हमें मूर्ख तो नहीं बना रहा! कई बार होता यह भी है कि लोग कोशिश तो करते हैं दूसरों को मूर्ख बनाने की लेकिन इस कोशिश में खुद ही मूर्ख बन जाते हैं और जब ऐसा होता है तो वाकई बड़ा मनोरंजक माहौल बन जाता है। कभी-कभी तो इस दिन सैकड़ों-हजारों की संख्या में लोग एक साथ मूर्ख बनते भी देखे गए हैं।
पहली अप्रैल को मूर्ख दिवस के रूप में मनाये जाने का कारण यह माना जाता रहा है कि पुराने जमाने में चूंकि नए साल की शुरूआत 1 अप्रैल से ही होती थी, अत: लोग इस दिन को हंसी-खुशी गुजारना चाहते थे ताकि उनका पूरा साल हंसी-खुशी बीते।
लोगों की इसी धारणा के चलते 1 अप्रैल को हास्य दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई थी लेकिन धीरे-धीरे लोगों का उत्साह इस दिवस के प्रति कम होने लगा तो कुछ लोगों ने इस दिन कृत्रिम हास्य के जरिये दूसरों को बेवकूफ बनाना शुरू कर दिया। लोगों को भी यह अंदाज इतना पसंद आया कि इस परम्परा ने धीरे-धीरे मूर्ख दिवस का रूप ले लिया।
अप्रैल फूल बनाने की पश्चिमी देशों में शुरू हुई परम्परा भारतीय संस्कृति में कब और कैसे प्रवेश कर गई, यह पता भी न चला। भले ही इस परम्परा पर पाश्चात्य संस्कृति का रंग बहुत गहरा चढ़ा है पर यदि हम इस परम्परा में निहित उद्देश्यों को गहराई में जाकर देखें तो गौरवशाली भारतीय संस्कृति के आधार पर भी यह परंपरा गलत नहीं ठहराई जा सकती क्योंकि आज की भागदौड़ भरी अस्त-व्यस्त जिंदगी में व्यक्ति के पास जहां चैन से सांस लेने के लिए दो पल की भी फुर्सत नहीं है।
वहीं इस दिवस के बहाने साल में सिर्फ एक दिन ही सही, व्यक्ति को खिलखिलाकर हंसने का मौका तो मिलता है। संभवत: मूर्ख दिवस मनाने की परम्परा की पृष्ठभूमि में व्यस्त जिंदगी में मानव मन को कुछ पल का सुकून प्रदान करने की प्रवृति ही समाई है लेकिन इसके साथ-साथ इस मौके पर इस बात का ध्यान रखा जाना भी अत्यंत आवश्यक है कि मूर्ख दिवस सभ्य मजाक के जरिये किसी को कुछ समय के लिए मूर्ख बनाकर मनोरंजन करने का दिन है।
अप्रैल फूल के बहाने जानबूझकर किसी के साथ ऐसा कोई मजाक न करें, जिससे उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचे या उसका कोई अहित अथवा नुकसान हो। मूर्ख दिवस की आड़ में किसी से अपनी दुश्मनी निकालने या अपने अपने किसी अपमान का बदला लेने की चेष्टा भी नहीं होनी चाहिए। यदि आप विशुद्ध भावना से शुद्ध हास्य के जरिये इस दिन किसी को मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं तो सभवत: उस व्यक्ति को आपके मजाक का बुरा भी नहीं लगेगा।
वैसे भी शुद्ध हास्य तनाव से मुक्ति प्रदान करने के साथ-साथ मन में आपसी प्रेम भाव तथा भाईचारे की भावना का संचार भी करता है और शुद्ध हास्य से सराबोर माहौल और भी खुशनुमा बन जाता है। ऐसे में मूर्ख दिवस मनाने की प्रासंगिकता आज के तनाव व घुटन भरे माहौल में बहुत बढ़ जाती है।
हमारे यहां गधे और उल्लू को हमेशा मूर्ख की उपमा दी जाती रही है, इसलिए अपने दोस्तों, परिचितों अथवा संबंधियों को एक अप्रैल के दिन कुछ समय के लिए ही सही, मूर्ख बनाकर अपना व दूसरों का स्वस्थ मनोरंजन करने में कोई हर्ज नहीं है।
यदि ऐसा करते समय शालीनता, शिष्टता व सभ्यता की उपेक्षा न की जाए तो कोई संदेह नहीं कि मूर्ख दिवस की महत्ता आज के दमघोंटू माहौल में कई गुना बढ़ जाती है और वर्ष भर में एक दिन के लिए ही सही, यह दिन हमें हंसी-खुशी के फव्वारे छोड़ने अर्थात् खिलखिलाकर हंसने-हंसाने तथा मनोरंजन करने का भरपूर अवसर प्रदान करता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
पाप पुंज से भरे, लदे
डहे हुए से हम
मन की चंचलता
पाप-पुण्य से बंधे हुए से हम
कुछ करते, कुछ सोचते
कुछ करने को तैयार मन
बुद्धि कलियुगी भटकाती
बिलगाती और रुलाती
भाग दौड़कर थकते-थकते
मन को भाता अंधकारमय कोठरी
असहज हो बंद आखें
कथित नींद में क्या नहीं पाते
अंतहीन दुख और सुख
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। श्रीराम विष्णु के अवतार हैं। सृष्टि के कथानक में भगवान विष्णु के अवतार लेने के कारणों में भक्तों के मन में आये विकारों को दूर करना, लोक में भक्ति का संचार करना, जन-जन के कष्टों का निवारण और भक्तों के लिए भगवान की प्रीति पा सकने की इच्छा पूरा करना प्रमुख हैं। सांसारिक जीवन में मद, काम, क्रोध और मोह आदि से अनेक तरह के कष्ट होते हैं और उदात्त वृत्तियों के विकास में व्यवधान पड़ता है।
रामचरितमानस में इन स्थितियों का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है, नीच और अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं और अन्याय करने लगते हैं, पृथ्वी और वहां के निवासी कष्ट पाते हैं तब-तब कृपानिधान प्रभु भांति-भांति के दिव्य शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं। एक भक्त के रूप में तुलसीदास जी का विश्वास है कि सारा जगत राममय है और उनके मन में बसा भक्त कह उठता है सीय राममय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी। सारे जगत में चारों ओर राम को देखना भक्ति की पराकाष्ठा भी है और समदर्शी हो कर ऊपर से दिखने वाले विरोधों और उनसे उपजने वाली विपदाओं से उबरने का उपाय भी।
आज के दौर में समानता से ज्यादा अनोखे, अद्वितीय, सबसे अलग, औरों से कुछ हट कर खुद को दिखने-दिखाने का रिवाज जोरों पर चल पड़ा है। वेश-भूषा, आचार-विचार, बात-व्यवहार सबमें अपने लिए आत्यंतिक फर्क साबित करना आज श्रेष्ठता का मानदंड होता जा रहा है। हम विविधता का उत्सव मनाने को सदैव व्याकुल रहने लगे हैं। औरों से अलग होना निश्चय ही बहुमूल्य होता है क्योंकि वह नवीनता लाता है।
नवीनता मन के लिए रमणीय होती है और इसलिए वह प्रिय भी हो जाता है। नये, यानी जो पहले से भिन्न या अपूर्व है, उसे मौलिक कहा जाता है। उसे समाज में आदर मिलता है और पुरस्कृत भी किया जाता है। कहते हैं सृजनात्मक होने के लिए किसी चीज को मौलिक, उपयोगी और प्रासंगिक होना चाहिए। अस्तित्व की मौलिक एकता से विविधता की ओर आगे बढ़ती मनुष्य की दिग्विजय यात्रा निश्चय ही मोहक और चित्ताकर्षक है। परंतु भिन्नता के अति आग्रह या दुराग्रह कुछ कठिन सवाल भी खड़ा करने लगता है क्योंकि सिर्फ विविधता और भिन्नता की सिद्धि के लिए विविधता को बढ़ाते जाने से जीवन-यात्रा नहीं सधती।
धरती पर जिस भौतिक दुनिया में हम रहते हैं वहां बड़ी भारी मात्रा में नाना प्रकार के पदार्थ मौजूद हैं और वे सभी अपने गुण धर्म में एक दूसरे से अलग भी हैं। मनुष्य जीवन के स्तर पर भाषा, धार्मिक विश्वास, खान-पान आदि में भी यह विविधता व्याप्त है। यह विविधता जिस तरह बढ़ती जा रही है उसका कोई ओर-छोर नहीं दिखता। इसलिए उसकी गणना करना आसान नहीं है। इंद्रियानुभव पर जोर देने वाले वैज्ञानिक युग में इस तरह के विश्लेषण की अंतहीन सम्भावनाएं हैं और उसके तरह-तरह के परिणाम भी होते हैं।
हमारा शरीर भी अन्यान्य अंगों और उपांगों से बना है और वे सभी भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं। हाथ, पैर, आंख, नाक और कान न केवल अपनी रचना में एक दूसरे से भिन्न हैं बल्कि इन सबका अलग-अलग उपयोग है और सामान्यत: एक दूसरे की जगह भी नहीं ले सकते। ये सभी स्वभावत: भौतिक जगत के भिन्न-भिन्न विषयों से जुड़े होते हैं।
यह विविधता अनेक तरह के कार्यों को सम्पादित करना सम्भव बनाती है। निश्चय ही क्षमता का यह विस्तार जीवनी शक्ति या प्राणवत्ता से अनिवार्य रूप से जुड़ी होती है। इस तरह विविधता के अंतर्सम्बन्ध को पहचानना जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
भिन्नता पैदा करना या भेद देखना चीजों को एक को दूसरे के विपरीत खड़ा करता है। इससे उपजने वाला अलगाव दूरियां पैदा करता है और हम जो भिन्न है उसमें दोष-दर्शन करने लगते हैं। दूसरी ओर जो समान लगता है उससे स्नेह, निकटता और मित्रता का रिश्ता बनाने लगाते हैं। धीरे-धीरे समय के साथ भिन्न छिजें कब खिसक कर विरोध के ख़ेमे में पहुंच जाती हैं इसका अंदाज़ा ही नहीं लगता। आज की दुनिया की प्रमुख समस्याएं भिन्नता और विरोधजनित असंतोष, तनाव और हिंसा के रूप में उभरती दिख रही हैं।
अलग नाम का उपयोग पहचान के लिए होता है परंतु यदि वह किसी लाभ से जुड़ जाय तो वह अलगाव का आधार बन कर समानता पर छा जाता है। जब मैंपन का अहसास तीव्र होता है और हम अपने अकेले मैं को सबसे परे और सबके ऊपर रखने के लिए उद्यत होते हैं तो समानता ढंकती और बिसरती जाती है। दूसरी ओर भिन्नता प्रखर होती जाती है। तब हम भिन्नता को बचाए और बनाये रखने की कोशिश में लग जाते हैं।
मैं के अखंड विस्तार में जो मेरा है उससे जो भिन्न या ममेतर है उसके साथ टकराव खड़ा हो जाता है। मैं का अहंकार फ़ुंफकार मारता है। उसे अन्य फूटी आंख भी नहीं सुहाता और तब द्वंद्व का बीजारोपण होता है और कलह की पौध पनपती है।
एक और अनेक के बीच के रिश्ते राचीन काल से मनुष्य की सोच के केंद्र में रही है। पुरा काल के सृष्टि के आख्यानों में एक यह भी है की ईश्वर या परमात्मा को अकेले अच्छा नहीं लग रहा था ( स एकाकी न रमते ) और तब उसने एक से अनेक होने की इच्छा की (एकोहं बहुस्याम् ) और फिर जो भी दूसरा रचा गया उसमें वह स्वयं प्रवेश कर गया। इस आख्यान का एक आशय परमात्मा की उपस्थिति की व्याप्ति को दर्शाना है।
ईशावास्योपनिषद भी यही कहता है – ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत्- अर्थात् यह दुनिया ईश्वर की वासस्थली है। इसलिए यहां हर जगह ईश्वर की उपस्थिति है। इस विचार की पराकाष्ठा शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में हुई जिसमें यह प्रतिपादित किया गया- सर्वं खल्विदम् ब्रह्म – अर्थात् जो कुछ है वह ब्रह्म ही है। सर्वव्यापी ब्रह्म, ईश्वर या परमात्मा की संकल्पना जीवन जीने के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करती है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी जगत को सीय-राममय कह कर भी सम्भवत: यही भाव व्यक्त कर रहे हैं। वे सारा जगत एक ही तत्व वाला है या एक ही तत्व का प्रकाश है... इस विचार की प्रतिष्ठा करते दिखते हैं।
वस्तुतः यह मान कर ही सृष्टि मात्र में गुणवत्ता और शक्ति की प्रतिष्ठा हो सकेगी और हम उनका वास्तविक मूल्य समझ सकेंगे। आज हम पृथ्वी, जल, वायु आदि सभी को उपभोग्य वस्तु और खुद को उपभोक्ता मान कर बिना विचारे बहिचक उनका शोषण करते हैं। यह अलग बात है कि अब इस स्वार्थ वृत्ति का हानिकर पहलू उभर कर सामने आने लगा है। यदि पूरा जगत राममय है तो वह भी श्रीराम की ही तरह पूजनीय और वंदनीय हैं।
श्रीराम सत्य, तप, तितिक्षा, संतोष, धैर्य, धर्मपरायणता की प्रतिमूर्ति है। श्रीराम का भाव परदुःखकातरता के साथ प्रतिष्ठित है। राममय होने के साथ यह आशा भी बलवती होती है कि राम के अनुगामियों में इन सब सद्गुणों की वृद्धि होगी। दायित्व आने के साथ शक्ति की उपस्थिति होगी। विरोध और वैमनस्य की जगह आदर और सम्मान ले लेते हैं। राम को समदर्शी, दीन बन्धु, भक्तवत्सल और करुणाकर आदि कहा गया है। जो सीय-राम-मय होगा, वह इन सब भावों से आप्लावित होगा, उसमें ये सब भाव भी उपस्थित होंगे। तब जगत की अनुभूति और प्रतीति का नजरिया तथा पैमाना बदल जाएगा। राम भाव की उपस्थिति में साम्य देखना सम्भव होगा और सम्यक् व्यवहार भी सध सकेगा।
सब में किसी एक तत्व की उपस्थिति सब की अनुकूलता को द्योतित करती है जिससे सबके हित की सम्भावना बनती है। ऐसे में सभी एक दूसरे का भला करना चाहेंगे क्योंकि तब दूसरा पराया नहीं रह जायेगा। ऐसे ही उदार व्यक्ति के लिए कहा गया कि निज और पर का भेद मिट जाता है। वह अपने में सबको और सबमें अपने को देखता है। इस नये समीकरण में परस्पर भरोसा मुख्य हो जाता है। तब प्रतिरोध कम होता जाता है और परस्पर समर्थन बढ़ता है।
सबको अपने जैसा मानने के कई परिणाम होते हैं। अपने अस्तित्व-बोध का विस्तार कर जो अपने लिए ठीक या प्रिय नहीं लगता उसे दूसरों के साथ करने से बचते हैं। उनके लिए आत्मन: प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत् का विचार जीवन का पाथेय सा हो जाता है। तभी सर्व और सर्वोदय की संकल्पना पुरेगी, सर्वे भवंतु सुखिन: की कामना फलवती होगी और राम-राज्य का संकल्प पूरा हो सकेगा।
भेद-बुद्धि को जीवन में अपनाना कितना सतही, सरलीकृत, भ्रामक और हिंस्र है इसका अनुभव हम सब अपने जीवन में नित्यप्रति करते रहते हैं। क्षुद्र मानसिकता वाला यह भाव विचलित और स्खलित कर देने वाला होता है। ऐसी पाप बुद्धि के चलते अहंकार प्रचंड होने लगता है। तब एक दूसरे को नीचा दिखाना, चोट पहुंचाना, परवाह न करना और आधिपत्य ज़माना आसान हो जाता है।
अहं भाव की अनर्गल वृद्धि के बीच हम दूसरे या किसी अन्य का अस्तित्व ही नहीं स्वीकार करना चाहते। सीय राममय कह कर तुलसीदास जी समूची सृष्टि को प्रिय और अभिनंदनीय बनाते हैं। वे यह संदेश भी देते हैं कि वह लोक जिसमें हम विचरण करते हैं सौहार्द और सामरस्य का आगार है क्योंकि राम सबके हैं और सबमें उपस्थित हैं। लोक-मानस में राम आज भी व्याप्त हैं तो इसीलिए कि वे स्वयं ही लोकाराधक हैं। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
योगेश कुमार गोयल
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। तपेदिक रोग के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है, जिसे विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में भी जाना जाता है। इस वैश्विक कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य लोगों को उन प्रयासों से अवगत कराना भी है, जो न सिर्फ इस बीमारी को रोकने बल्कि इसके उपचार के लिए किये जा रहे हैं।
टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) को क्षय रोग तथा तपेदिक के नाम से भी जाना जाता है, जो एक जीवाणु के कारण होने वाला फेफड़ों का एक गंभीर संक्रमण है। यह खांसने अथवा छींकने पर हवा में छोड़ी गयी छोटी बूंदों से फैलता है। ड्रॉपलेट्स के जरिये फैलने वाले बैक्टीरिया कई घंटों तक हवा में रह सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक टीबी दुनिया में मृत्यु के सबसे घातक और संक्रामक कारकों में से एक है, जो विश्वभर में होने वाली मौतों के शीर्ष 10 कारणों में शामिल है। डब्ल्यूएचओ की 2019 में घोषित रिपोर्ट के आधार पर दुनियाभर में एक करोड़ लोग टीबी से संक्रमित थे, जिनमें से 26.9 लाख लोगों को भारत में टीबी था।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक प्रतिदिन 4100 से भी ज्यादा लोग टीबी के कारण अपनी जान गंवाते हैं और करीब 28 हजार लोग इस रोकथाम योग्य और इलाज योग्य बीमारी से बीमार पड़ते हैं। टीबी के कारण प्रतिवर्ष दुनियाभर में करीब 15 लाख लोग मौत की नींद सो जाते हैं। डब्ल्यूएचओ टीबी को दुनिया के सबसे घातक संक्रामक हत्यारों में से एक मानता है। हालांकि टीबी से निपटने के वैश्विक प्रयासों के चलते वर्ष 2000 से लेकर अभी तक साढ़े छह करोड़ से भी ज्यादा लोगों की जान बचायी जा चुकी है।
विश्व टीबी दिवस प्रतिवर्ष एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है और इस साल टीबी दिवस की थीम (हां! हम टीबी को समाप्त कर सकते हैं) है। रोग नियंत्रण और रोकथाम के लिए केंद्र (सीडीसी) के मुताबिक तपेदिक लगभग 30 लाख साल पुराना रोग है और विभिन्न सभ्यताओं में इसके अलग-अलग नाम थे। टीबी को प्राचीन रोम में टैब, प्राचीन ग्रीस में फथिसिस और प्राचीन हिब्रू में स्केफेथ कहा जाता था।
मध्य युग के दौरान गर्दन तथा लिम्फ नोड्स के टीबी को स्क्रोफुला कहा जाता था, जिसे फेफड़ों में टीबी से अलग बीमारी माना जाता था। 1800 के दशक में इसे खपत के रूप में जाना जाता था। माना जाता है कि तपेदिक शब्द 1834 में जोहान शोनेलिन द्वारा गढ़ा गया था। 24 मार्च 1882 के दिन एक जर्मन चिकित्सक और माइक्रो बायोलॉजिस्ट डॉ रॉबर्ट कोच ने पाया कि इस बीमारी का कारण टीबी बैसिलस था। डॉ रॉबर्ट कोच द्वारा इस जानलेवा बीमारी के कारक बैक्टीरिया की पहचान करने की पुष्टि के फलस्वरूप ही टीबी के निदान और इलाज में दुनियाभर के वैज्ञानिकों को बड़ी मदद मिली।
इसके ठीक 100 वर्षों पश्चात 1982 में इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट ट्यूबरक्लोसिस एंड लंग डिजीज ने इसी तारीख को विश्व टीबी दिवस के रूप में घोषित किया और 1996 में इस दिवस को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अन्य संगठनों के साथ डब्ल्यूएचओ भी इस संघ में शामिल हो गया, जिसके बाद औपचारिक रूप से 1998 में स्टॉप टीबी पार्टनरशिप की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य टीबी से लड़ने के साथ-साथ इसे रोकना भी था।
हालांकि दुनिया को टीबी से मुक्ति के लिए वर्षों से प्रयास हो रहे हैं लेकिन विडंबना है कि भारत टीबी से सर्वाधिक प्रभावित एशियाई देश है। वैश्विक टीबी रिपोर्ट के अनुसार 2020 में भारत में टीबी के कुल 26.4 लाख मरीज थे और वर्ष 2019 में टीबी विकसित करने वाले देशों में भारत की 26 फीसदी हिस्सेदारी थी। हालांकि भारत अब तेजी से टीबी उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसी क्रम में भारत सरकार द्वारा एक विशेष कार्यक्रम प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान की शुरूआत की जा चुकी है। जहां दुनिया ने 2030 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है, वहीं भारत का संकल्प 2025 तक टीबीमुक्त होना है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कहना है कि भारत में दुनिया की आबादी का 20 प्रतिशत से कुछ कम है लेकिन दुनिया के कुल टीबी रोगियों का यहां 25 फीसदी से भी ज्यादा है, जो चिंता का विषय है। उनके मुताबिक टीबी से प्रभावित अधिकांश लोग समाज के गरीब तबके से ही आते हैं। इसीलिए उन्होंने गत वर्ष प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान की डिजिटल शुरुआत करते हुए लोगों से 2025 तक देश से टीबी के उन्मूलन के लिए सामूहिक रूप से युद्धस्तर पर काम करने का आग्रह किया था।
टीबी के मुख्यत: दो प्रकार होते हैं, लेटेंट और एक्टिव। लेटेंट टीबी तब होता है, जब किसी व्यक्ति के शरीर में टीबी के जीवाणु होते हैं लेकिन बैक्टीरिया बहुत कम संख्या में मौजूद होते हैं। लेटेंट टीबी वाले लोग संक्रामक नहीं होते और स्वयं को बीमार महसूस नहीं करते। ऐसे व्यक्ति टीबी के बैक्टीरिया को दूसरे लोगों तक नहीं पहुंचा सकते जबकि एक्टिव टीबी वाले लोग संक्रामक होते हैं। जहां तक टीबी के कुछ प्रमुख लक्षणों की बात है जो इसका पता कुछ लक्षणों के माध्यम से लगाया जा सकता है, हालांकि आमतौर पर शुरुआती चरण में लक्षण दिखाई नहीं देते।
टीबी के लक्षणों में कम से कम 3 सप्ताह तक लगातार खांसी आना, खांसी के दौरान रक्त के साथ कफ बनना, खांसते समय खून आना, ठंड लगना, बुखार, भूख न लगना, वजन कम होना, रात को पसीना आना, सीने में दर्द इत्यादि प्रमुख हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक टीबी के कारण पेट में दर्द, जोड़ों में दर्द, दौरे और लगातार सिरदर्द की समस्या भी हो सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक हर ऐसा व्यक्ति टीबी के जोखिम में है, जिसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है।
इसके अलावा जो लोग कोविड-19 से संक्रमित हो चुके हैं या इससे उबर चुके हैं, उन्हें भी टीबी से संक्रमित होने का जोखिम ज्यादा है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक टीबी से मुक्ति के लिए संक्रमित व्यक्ति से बिना-संक्रमित व्यक्ति में इस रोग को फैलने से रोकना और टीबी रोगियों की पहचान कर उनका समुचित उपचार करना बहुत जरूरी है। टीबी से बचने के लिए संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क से बचें और ऐसे किसी व्यक्ति के संपर्क में आने पर यदि आप में भी टीबी जैसे लक्षण उत्पन्न हो रहे हों तो तुरंत प्राथमिक उपचार के लिए नजदीकी चिकित्सालय में जांच कराना जरूरी है।
टीबी का समय से पता चलने पर इस रोग का उपचार किया जा सकता है। इसके उपचार में एंटीबायोटिक्स शामिल हैं। सक्रिय टीबी के मामले में प्रभावित लोगों को छह महीने से एक साल की अवधि के लिए कई दवाएं लेने की सिफारिश की जा सकती है।
टीबी को एक सामान्य बीमारी समझने की भूल न करते हुए टीबी के बारे में जागरूक होना बेहद जरूरी है और यदि किसी को टीबी है तो इसका इलाज शुरू होने के बाद उसे पूरा करना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा इलाज बीच में छोड़ने पर स्थिति काफी खराब हो सकती है। यदि मरीज में टीबी के लक्षणों की पहचान सही समय पर हो जाती है तो पूरा इलाज कराकर जल्द ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है। देशभर के सरकारी अस्पतालों में टीबी की जांच और इलाज पूरी तरह मुफ्त है। बहरहाल, डब्ल्यूएचओ का मानना है कि टीबी को लेकर ज्यादा निवेश से लाखों लोगों की जान बच सकती है, जिससे टीबी महामारी के अंत में भी तेजी आयेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। रामनवमी, आदर्शों के पुंज मर्यादा पुरुषोत्तम के इस धराधाम पर अवतीर्ण होने का पावन दिवस है। अगस्त्य संहिता के अनुसार चैत्र शुक्ल नवमी को मध्याह्न में पुनर्वसु नक्षत्र में जब चंद्रिका, चंद्र और बृहस्पति तीनों समन्वित थे; पाच ग्रह अपनी उच्चावस्था में थे, सूर्य मेष राशि में थे, लग्न कर्कटक थी, तब श्रीराम का जन्म हुआ था। इस दिन किया हुआ व्रतानुष्ठान अगस्त्य संहिता के अनुसार सांसारिक सुख एवं अलौकिक आनंद देने वाला है। अशुद्ध, पापिष्ठ व्यक्ति भी इस व्रत से अपने पापों से मुक्त हो जाता है और सबसे सम्मान पाता है।
रामनवमी का पर्व देश के कोने-कोने में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसका धार्मिक-परंपरागत स्वरूप जो भी हो; इसका मूल उद्देश्य भगवान श्रीराम की परम पावन लीलाओं का सुमिरन करना और उनके आदर्श चरित्र का चिंतन-मनन करना है तथा उनके द्वारा निर्देशित एवं स्थापित आदर्शों के अनुरूप अपने आप को ढालने का सचेष्ट प्रयास-पुरुषार्थ करना है। वर्तमान मर्यादाहीनता एवं नैतिक अवमूल्यन के क्षणों में इसकी आवश्यकता सर्वोपरि है।
आज विघटन एवं विध्वंस की स्थिति बड़ी गंभीर है। इस बीच सृजन की सुखद संभावनाओं की आहट भी विज्ञजन महसूस करते हैं, किंतु प्रबलता विनाशकारी शक्तियों की ही दृश्यमान है।
पूरे समाज, जनमानस पर अनास्था, मर्यादाहीनता एवं अराजकता का साया छाया हुआ है। व्यक्ति के जीवन की दिशा धूमिल है। परिवार, समाज, राष्ट्र- सभी विघटन-बिखराव की ओर प्रवृत्त दिख रहे हैं। इन सबके मूल में मानवीय मन की बहकी-भटकी हुई आकांक्षाएं काम कर रही हैं। जिनको हवा देने में पिछले समय में सक्रिय भोगवादी विचारधारा ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।
हमारी सांस्कृतिक परंपरा में संकीर्ण स्व को महत्त्व नहीं दिया गया है; क्योंकि इसको प्रश्रय देना जीवन को बिखराव विखंडन की ओर ले जाता है। वर्तमान समाज में भ्रष्टाचार, अपराध, आतंक एवं हिंसा, आत्महत्या आदि की घटनाएं इसी की चरम परिणतियां हैं। आध्यात्मिक परंपरा में इस स्व को, अहं को तुच्छ एवं नगण्य माना गया है; क्योंकि यह अहं स्व-केंद्रित क्षुद्रता एवं संकीर्ण स्वार्थपरता को ही जन्म देता है। अत: इसकी जगह यहां सर्वांतर्यामी एवं सर्वव्यापी ईश्वर के सनातन अंश के रूप में अपने स्व की पहचान की गयी है।
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी (मानस-1,203, 2-1/2) के अनुसार वे सर्वांगपूर्ण थे। किंतु वे असामान्य होते हुए भी मर्यादा-पालन हेतु सामान्य ही बने रहे। यहां निम्न स्व अर्थात अहं की कहीं गंध तक नहीं आती। इसी तरह राज-रसभंग प्रसंग में युवराज पद पर जन्मसिद्ध अधिकार होते हुए भी वे कुलहित-परहित के विचार में स्व को मर्यादित रखते हैं और चेहरे पर बिना एक शिकन के सहर्ष चौदह वर्ष का कष्टसाध्य वनवासी जीवन अंगीकार करते हैं।
सागर तट प्रसंग में इसी मर्यादा का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत होता है। प्रभु का एक ही बाण कोटि सिंधु शोषण में समर्थ था, लेकिन प्रभुश्री ने तीन दिन तक विनयपूर्वक प्रतीक्षा करते हुए मर्यादा- पालन की अपूर्व मिसाल प्रस्तुत की। करुणानिधान प्रभु श्रीराम के लिए सदैव लोक-कल्याण, दूसरे का भला ही सर्वोपरि रहा। इसी को वे सर्वश्रेष्ठ कार्य एवं सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते हैं।
राजा के रूप में भी प्रभु श्रीराम का चरित्र इसी आदर्श से ओत-प्रोत था। रामराज्य का अलौकिक सुख प्रभुश्री के इसी चरित्र का फल था। जिसके प्रताप से प्रजा भी श्रद्धावनत होकर उसी आदर्श पर न्योछावर थी। राम भगति रत नर अरु नारी (मानस-7/20/2)। इस तरह रामराज्य में राजा और प्रजा सब परहित के आदर्श से प्रेरित थे।
रामराज्य अनंत सुख-समृद्धि एवं शांति से समृद्ध था; जिसकी आज भी एक आदर्श राज्य के रूप में मिसाल दी जाती है। इसके विपरीत वर्तमान स्थिति में जीवन पर के बजाय स्व पर केंद्रित है। सब अपने क्षुद्र अहं एवं संकीर्ण स्वार्थ के पोषण में लगे हुए हैं। आज की विघटनकारी परिस्थितियां इसी की उपज हैं। आज हमारा धर्म परहित नहीं, स्वहित हो गया है और हम अपने सहज संतत्त्व से विमुख हो गये हैं। नाना पापों में प्रवृत्त होकर लोक में पतित हो रहे हैं और अपना परलोक भी बिगाड़ रहे हैं-
करहिं मोह बस नर अघ नाना।
स्वारथ रत परलोक नसाना॥ (मानस-7/40/2)
नर- पशु से भी पतित होकर साक्षात् असुरों का आचरण कर रहे हैं-
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पांवर पापमय देह धरें मनुजाद॥ (मानस-7/39)
मनुष्य, समाज एवं संस्कृति के पतन की इस गंभीर स्थिति में रामनवमी का पुण्यपर्व इस दुर्दशा से उबरने के लिए संकल्पित होने का अवसर है। प्रभु श्रीराम के आदर्श चरित्र का चिंतन एवं उनकी परम पावन लीलाओं का स्मरण करते हुए यह सहज ही संभव है। (लेखक, बीआरडीबीडीपीजी कॉलेज, देवरिया में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)
आरके सिन्हा
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कौन सा हिन्दुस्तानी होगा जिसके मन में शहीद भगत सिंह को लेकर गहरी श्रद्धा का भाव नहीं होगा। होगा भी क्यों नहीं। आखिर वे क्रांतिकारी, चिंतक और आदर्शों से लबरेज मनुष्य थे। उनसे अब भी भारत के करोड़ों नौजवान प्रेरणा पाते हैं। पर यह भी जरूरी है कि देश भगत सिंह के करीबी साथियों जैसे चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेशवर दत्त, दुर्गा भाभी वगैरह के बलिदान को भी याद रखा जाए।
राजगुरु का संबंध पुणे (महाराष्ट्र) से था। उन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च, 1931 को लाहौर में फांसी पर लटका दिया गया था। वे भगत सिंह और सुखदेव के घनिष्ठ मित्र थे। इस मित्रता को राजगुरु ने मृत्युपर्यंत निभाया। देश की आजादी के लिए दिये गये राजगुरु के बलिदान ने इनका नाम भारत इतिहास में अंकित करवा दिया।
अगर बात वीर स्वतंत्रता सेनानी सुखदेव की हो तो वो भी महाराष्ट्र से थे। राजगुरु के पिता का निधन इनके बाल्यकाल में ही हो गया था। इनका पालन-पोषण इनकी माता और बड़े भैया ने किया। राजगुरु बचपन से ही बड़े वीर और मस्तमौला थे। भारत मां से प्रेम तो बचपन से ही था। वो बचपन से ही वीर शिवाजी और लोकमान्य तिलक के बहुत बड़े भक्त थे।
संकट मोल लेने में भी इनका कोई जवाब नहीं था। महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद से मुलाकात के बाद उनका जीवन पूर्णत: बदल गया। उन्हें जीवन का एक लक्ष्य मिल गया। चंद्रशेखर आजाद इस जोशीले नवयुवक से बहुत प्रभावित हुए और बड़े चाव से इन्हें निशानेबाजी की शिक्षा देने लगे। शीघ्र ही राजगुरु भी आजाद जैसे एक कुशल निशानेबाज बन गये।
राजगुरु का निशाना कभी चूकता नहीं था। चंद्रशेखर की मार्फत राजगुरु भगत सिंह और सुखदेव से मिले। राजगुरु इन दोनों से बड़े प्रभावित हुए। ये तीनों परम मित्र बन गये। इन सब क्रांतिकारियों ने लाला लाजपत राय की मृत्यु के जिम्मेदार अंग्रेज अफसर स्कॉट का वध करने की योजना बनाई। इस काम के लिए राजगुरु और भगत सिंह को चुना गया।
राजगुरु तो अंग्रेजों को सबक सिखाने का अवसर ढूंढ़ते ही रहते थे। अब वह सुअवसर उन्हें मिल गया था। 19 दिसंबर, 1928 को राजगुरु, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने सुखदेव के कुशल मार्गदर्शन के फलस्वरूप सांडर्स नाम के एक अन्य अंग्रेज अफसर, जिसने स्कॉट के कहने पर लाला लाजपत राय पर ताबड़तोड़ लाठियां चलायी थीं, का वध कर दिया।
अपने काम को पूरा करने के बाद भगत सिंह अंग्रेज साहब बनकर तथा राजगुरु उनके सेवक बनकर पुलिस को चकमा देकर लाहौर से निकल गए थे। उस समय भगत सिंह और राजगुरु के साथ दुर्गा भाभी भी थीं। वो भगत सिंह की पत्नी बनी हुईं थीं। वो भगत सिंह की परम सहयोगी थीं। दुर्गा भाभी का पूरा नाम दुर्गा देवी वोहरा था। वो मशहूर हुईं दुर्गा भाभी के रूप में।
दुर्गा भाभी असली जिंदगी में पत्नी थीं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) के सदस्य भगवती चरण वोहरा की। इसी संगठन के सदस्य भगत सिंह भी थे। वोहरा की बम का टेस्ट करते वक्त विस्फोट में जान चली गई थी। दुर्गा भाभी के अलावा एचएसआरए में सुशीला देवी जैसी कुछ और महिलाएं भी एक्टिव थीं।
बहरहाल, भगत सिंह को राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी हो जाती है। उनका संगठन बिखर सा गया। उसके बाद दुर्गा भाभी ने 1940 के दशक में लखनऊ के कैंट में एक बच्चों का स्कूल खोला। उसे वह दशकों तक चलाती रहीं। वो 1970 के दशक तक लखनऊ में ही रहीं। फिर वो अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ गाजियाबाद शिफ्ट हो गयीं। 1999 में उनकी गुमनामी में ही मृत्यु हो गयी।
इस बीच, शहीद भगत सिंह ने 8 अप्रैल, 1929 को जब केंद्रीय असेंबली (अब संसद भवन) में बम फेंका और पर्चे बांटे तब बटुकेशवर दत्त उनके साथ थे। इसके बाद दोनों ने गिरफ्तारी दी और उनके खिलाफ मुकदमा चला। बटुकेशवर दत्त को बी.के.दत्त भी कहते हैं। उन्हीं के नाम पर 1950 में साउथ दिल्ली में लोदी कॉलोनी के पास बीके दत्त कॉलोनी स्थापित हुई।
बटुकेश्वर दत्त मूल रूप से एक बंगाली-कायस्थ परिवार से थे। उनकी 1924 में कानपुर में भगत सिंह से भेंट हुई। इसके बाद उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए कानपुर में कार्य करना प्रारंभ किया। इसी क्रम में बम बनाना भी सीखा। 12 जून, 1929 को इन दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी।
जेल में ही, उन्होंने 1933 और 1937 में भूख हड़ताल की। उन्हें 1938 में रिहा कर दिए गया। अंडमान द्वीप के काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्ष बाद 1945 में रिहा किए गए। वे 1947 में अंजलि दत्त से विवाह करने के बाद पटना में रहने लगे। उनका 1965 में निधन हो गया था।
इस बीच, वरिष्ठ लेखक विवेक शुक्ला ने हाल ही में प्रकाशित अपनी किताब दिल्ली का पहला प्यार- कनॉट प्लेस में लिखा है कि कनॉट प्लेस से मिलने वाली एक सड़क उस शख्स के नाम पर अब भी आबाद है, जिसके भारत का वायसराय रहते हुए जलियांवाला बाग कांड हुआ था। उस सड़क का नाम है चेम्सफोर्ड रोड।
जलियांवाला बाग कांड में हुए खून खराबे का भगत सिंह पर गहरा असर हुआ था। उस कांड ने उन्हें क्रांतिकारी बनाने में अहम रोल निभाया। दरअसल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन में आने-जाने वालों के लिए चेम्सफोर्ड रोड बहुत जानी-पहचानी है। वे इस चेम्सफोर्ड रोड के रास्ते भी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचते हैं।
ब्रिटेन के भारत में वायसराय थे लॉर्ड चेम्सफोर्ड। जब जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ तब वे भारत के वायसराय थे। उन्होंने उस कत्लेआम पर कभी कोई शोक व्यक्त नहीं किया। ठीक उसी तरह, जैसे कि 1984 में सिखों के कत्लेआम की आज तक गांधी परिवार ने माफी नहीं मांगी।
चेम्सफोर्ड 1916 से लेकर 1921 तक भारत के वायसराय रहे। बेशक, यह सिर्फ भारत में ही संभव है कि जलियांवाला बाग जैसे दिल दहलाने वाले कत्लेआम के समय भारत में तैनात वायसराय के नाम पर हमारे यहां एक बेहद खास सड़क का नाम हो और एक बड़ा क्लब चेम्सफोर्ड के नाम पर आज भी नई दिल्ली के रेल भवन के सामने चल रहा हो।
इस सड़क का नाम दुर्गा भाभी के नाम पर किया जा सकता है। देश की राजधानी में उस महान क्रांतिकारी महिला के नाम पर कुछ भी नहीं है। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सीपीएम नेता ए राजा की विधायकी रद कर दी गयी है। इस प्रकार के सभी धोखेबाज ईसाई सांसद व विधायकों की सदस्यता रद्द होनी चाहिए, जो धोखे से अनुसूचित जातियों के अधिकारों पर कुठाराघात कर इस प्रकार के फ़र्जी जाति प्रमाण पत्रों के आधार पर सदनों में बैठे हैं।
अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों से विधायक व सांसद बने धोखेबाज ईसाई व मुसलमानों को सदनों से बाहर भेजा जाना चाहिए। उपरोक्त बातें विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री विनोद बंसल ने आज ग्रेटर नोएडा के अल्फा 2 के अवध ग्रीनस में नववर्ष - विक्रमी संवत 2080 के स्वागत में आयोजित एक कार्यक्रम में कहीं। (लेखक विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)
नवरात्र हवन के झोंके, सुरभित करते जनमन को।
है शक्तिपूत भारत, अब कुचलो आतंकी फन को॥
नव सम्वत पर संस्कृति का, सादर वन्दन करते हैं।
हो अमित ख्याति भारत की, हम अभिनंदन करते हैं॥
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इस साल 22 मार्च से विक्रम संवत 2080 का प्रारंभ हो रहा है। विक्रम सम्वत् को नव संवत्सर भी कहा जाता है। संवत्सर पांच प्रकार के होते हैं, जिनमें सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास सम्मिलित हैं। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ एवं मीन नामक बारह राशियां सूर्य वर्ष के महीने हैं।
सूर्य का वर्ष 365 दिन का होता है। इसका प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से होता है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ और फाल्गुन चंद्र वर्ष के महीने हैं। चंद्र वर्ष 355 दिन का होता है। इस प्रकार इन दोनों वर्षों में दस दिन का अंतर हो जाता है। चंद्र माह के बढ़े हुए दिनों को ही अधिमास या मलमास कहा जाता है।
नक्षत्र माह 27 दिन का होता है, जिन्हें अश्विन नक्षत्र, भरणी नक्षत्र, कृत्तिका नक्षत्र, रोहिणी नक्षत्र, मृगशिरा नक्षत्र, आर्द्रा नक्षत्र, पुनर्वसु नक्षत्र, पुष्य नक्षत्र, आश्लेषा नक्षत्र, मघा नक्षत्र, पूवार्फाल्गुनी नक्षत्र, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, हस्त नक्षत्र, चित्रा नक्षत्र, स्वाति नक्षत्र, विशाखा नक्षत्र, अनुराधा नक्षत्र, ज्येष्ठा नक्षत्र, मूल नक्षत्र, पूवार्षाढ़ा नक्षत्र, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, श्रवण नक्षत्र, घनिष्ठा नक्षत्र, शतभिषा नक्षत्र, पूवार्भाद्रपद नक्षत्र, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, रेवती नक्षत्र कहा जाता है। सावन वर्ष में 360 दिन होते हैं। इसका एक महीना 30 दिन का होता है।
भारतीय संस्कृति में विक्रम संवत का बहुत महत्व है। चैत्र का महीना भारतीय कैलेंडर के हिसाब से वर्ष का प्रथम महीना है। नवीन संवत्सर के संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। वैदिक पुराण एवं शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को आदिशक्ति प्रकट हुई थीं। आदिशक्ति के आदेश पर ब्रह्मा ने सृष्टि प्रारंभ की थी। इसीलिए इस दिन को अनादिकाल से नववर्ष के रूप में जाना जाता है।
मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन सतयुग का प्रारंभ हुआ था। मान्यता है कि इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने अपना राज्य स्थापित किया था। श्रीराम का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। नवरात्र भी इसी दिन से प्रारंभ होते हैं। इसी तिथि को राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी।
विजय को चिर स्थायी बनाने के लिए उन्होंने विक्रम सम्वत् का शुभारंभ किया था। इसी दिन से महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करके पंचांग की रचना की थी। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व भी है।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की थी। इस दिन महर्षि गौतम जयंती मनाई जाती है। इस दिन संघ संस्थापक डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिवस भी मनाया जाता है।
सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ट काल गणना का श्रीगणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था। तदनुसार हमारे सौरमंडल की आयु लगभग चार अरब 32 करोड़ वर्ष है। आधुनिक विज्ञान भी कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे लगभग चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है। इतना ही नहीं, श्रीमद्भागवद पुराण, श्री मारकंडेय पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार अभिशेत वाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते हैं। जिस दिन सृष्टि का प्रारंभ हुआ, वह आज ही का पवित्र दिन था। इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मंदिर में चैत्र पर्व मनाने की परंपरा बन गयी।
भारतीय महीनों का नामकरण भी बड़ा रोचक है अर्थात जिस महीने की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में पड़ती है, उसी के नाम पर उस महीने का नामकरण किया गया है, उदाहरण के लिए इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं, इसलिए इसे चैत्र महीने का नाम दिया गया। क्रांति वृत पर 12 महीने की सीमा तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किए गए और उनके नाम भी तारा मंडलों की आकृतियों के आधार पर रखे गये। इस प्रकार बारह राशियां बनीं।
चूंकि सूर्य क्रांति मंडल के ठीक केंद्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगते हैं। इसलिए प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक हो जाता है। भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि शताब्दियों तक एक क्षण का भी अंतर नहीं पड़ता, जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते हैं।
इस प्रकार प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीने को लीप ईयर घोषित कर देते हैं। तब भी नौ मिनट 11 सेकेंड का समय बच जाता है, तो प्रत्येक चार सौ वर्षों में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है, तब भी पूर्णांकन नहीं हो पाता। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही पेरिस के अंतरराष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकेंड स्लो कर दिया गया। फिर भी 22 सेकेंड का समय अधिक चल रहा है। यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है, जहां के सीजीएस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किए जाते हैं।
रोमन कैलेंडर में तो पहले 10 ही महीने होते थे। किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था, जिसे जूलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया। उसके एक सौ वर्ष पश्चात किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट अर्थात अगस्त भी बढ़ाया गया। चूंकि ये दोनों राजा थे, इसलिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गए।
आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिनों की संख्या समान है, जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है। यही नहीं, जिसे हम अंग्रेजी कैलेंडर का नौवां महीना सितंबर कहते हैं, दसवां महीना अक्टूबर कहते हैं, ग्यारहवां महीना नवम्बर और बारहवां महीना दिसम्बर है।
इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते हैं। भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितंबर का अर्थ सप्तांबर था, आकाश का सातवां भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवंबर तो नवम अंबर और दिसंबर दशांबर है।
वर्ष 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नववर्ष घोषित किया गया। जेनदअवेस्ता के अनुसार धरती की आयु लगभग 12 हजार वर्ष है। चीनी कैलेंडर लगभग एक करोड़ वर्ष पुराना मानता है। चालडियन कैलेंडर धरती को लगभग दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है। फीनीसयन इसे लगभग 30 हजार वर्ष की बताते हैं।
सीसरो के अनुसार यह लगभग चार लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है। सूर्य सिद्धांत और सिद्धांत शिरोमाणि आदि ग्रंथों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है। संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर शब्द बना है। इस प्रकार यह सिद्ध हो रहा है कि वर्ष प्रतिपदा ही नववर्ष का प्रथम दिन है।
एक जनवरी को नववर्ष मनाने वाले दोहरी भूल के शिकार होते हैं, क्योंकि भारत में जब 31 दिसम्बर की रात को 12 बजता है, तो ब्रिटेन में सायंकाल होता है, जो कि नववर्ष की पहली सुबह हो ही नहीं सकती। और जब उनका एक जनवरी का सूर्योदय होता है, तो यहां के हैप्पी न्यू ईयर मनाने वाले रात्रि भर जागने कारण सो रहे होते हैं।
ऐसी स्थिति में उनके लिए सवेरे नहा धोकर भगवान सूर्य की पूजा करना तो अत्यंत दुष्कर कार्य है। परंतु भारतीय नववर्ष में वातावरण अत्यंत मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गंधर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी, देव, मानव से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते हैं।
नववर्ष पर दिवस सुनहले, रात रूपहली, उषा सांझ की लाली छन-छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली कितनी मनोहारी लगती है। शीतल मंद सुगंध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते हैं। ऐसे ही शुभ वातावरण में अखिल लोकनायक श्रीराम का अवतार होता है। उल्लेखनीय है कि ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है।
मान्यता है कि नव संवत्सर के दिन नीम की कोमल पत्तियों और पुष्पों का मिश्रण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, मिश्री, जीरा और अजवाइन मिलाकर उसका सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है। इस दिन आंवले का सेवन भी बहुत लाभदायक बताया गया है।
माना जाता है कि आंवला नवमी को जगत पिता ने सृष्टि पर पहला सृजन पौधे के रूप में किया था। यह पौधा आंवले का था। इस तिथि को पवित्र माना जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। निसंदेह, जब भारतीय नववर्ष का प्रारंभ होता है, तो चहुंओर प्रकृति चहक उठती है। भारत की बात ही निराली है।
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