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संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन और भारत की भूमिका
Published / 2023-05-29 19:42:38
संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन और भारत की भूमिका

योगेश कुमार गोयल एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सारी दुनिया में संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस हर साल 29 मई को मनाया जाता है। इस मिशन में भारत की अहम भूमिका है। 1960 से 1964 तक के यूएसओसी कांगो मिशन में भारतीय वायुसेना के छह कैनबरा बॉम्बर एयरक्राफ्ट तैनात किए गए थे।इनमें 467 अधिकारी, 401 जेसीओ और 11354 जवानों ने हिस्सा लिया था। इस मिशन में 39 सैनिकों ने अपने प्राण गंवाये थे। 1992 से 1993 तक कंबोडिया में भारत ने सीजफायर की निगरानी की थी। यहां के चुनाव में भी सहायता की थी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के इस मिशन में 1373 सैनिकों की तैनाती की थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2002 में आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए पहली बार शांति रक्षा मिशन को अधिकार दिये। साथ ही 29 मई को शांति रक्षक दिवस के रूप में नामित किया। तब से प्रतिवर्ष इस दिन को संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यूएन के शांति रक्षा कार्यों में भाग लेना वैकल्पिक है।कनाडा और पुर्तगाल ही विश्व में अब तक सिर्फ दो ऐसे देश हैं, जिन्होंने प्रत्येक शांति रक्षा अभियान में हिस्सा लिया है। यूएन का शांति रक्षा मिशन इस साल अपनी 75वीं सालगिरह मना रहा है। उसके अब तक के शांति रक्षक अभियानों में अब तक दुनियाभर के 4000 से भी ज्यादा शांति रक्षकों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। इनमें भारत के शांति रक्षकों की संख्या करीब 170 है। यह संख्या किसी भी अन्य देश के मुकाबले सर्वाधिक है। 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर होने के साथ ही संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। इसकी स्थापना द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता देशों ने की थी। इसका मकसद था कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के मामलों में हस्तक्षेप करने से भविष्य में पुन: विश्वयुद्ध जैसे हालात न उभरने पाएं। इन देशों में अमेरिका, यूके, फ्रांस, रूस इत्यादि शक्तिशाली देश शामिल थे। इन संस्थापकों को उम्मीद थी कि वे इसके जरिये युद्ध को सदा के लिए रोक पाएंगे किन्तु 1945 से 1991 के शीत युद्ध के समय विश्व के विरोधी भागों में विभाजित होने के कारण शांति रक्षा संघ को बनाये रखना बहुत कठिन हो गया था। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 29 मई 1948 को पहला संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन स्थापित किया गया था। उस समय इजरायल तथा अरब देशों के बीच फैली अशांति को दूर करने के लिए यूएन शांति रक्षक सैनिकों की तैनाती की गई थी। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अफ्रीका, अमेरिका, एशिया, यूरोप तथा मध्य पूर्व में 71 शांति अभियानों की स्थापना की गयी। फिलहाल विश्व में एक लाख से भी अधिक पुरुष व महिला बतौर शांति रक्षक यूएन के शांति अभियानों में संलग्न हैं। संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन में सबसे ज्यादा संख्या इथोपिया और बांग्लादेश के शांति रक्षकों की है। इन दोनों देशों के बाद इसमें सर्वाधिक योगदान देने वाले देशों में भारत है। फिलहाल सात हजार से भी अधिक भारतीय सैन्य और पुलिस जवान अफगानिस्तान, कांगो, हैती, लेबनान, लाइबेरिया, मध्य पूर्व, साइप्रस, दक्षिण सूडान, पश्चिम एशिया और पश्चिम सहारा में तैनात हैं। यूएन के शांति मिशनों में भारत की भूमिका अहम है। सबसे पहले नवम्बर 1950 से जुलाई 1954 तक चले कोरियाई युद्ध के दौरान भारत ने इस मिशन में 17 अधिकारी, नौ जूनियर कमीशंड अधिकारी (जेसीओ) तथा 300 सैनिक तैनात किये गये थे। भारत हथियारों से लैस एक दल को 1956 से 1967 के बीच संयुक्त राष्ट्र की आपातकालीन सेना में भेजने वाला देश भी बना था। इस अवधि के दौरान भारत की ओर से 393 अधिकारी, 470 जेसीओ तथा 12383 जवान संयुक्त राष्ट्र के मिशन में शामिल हुए थे। वर्ष 2017 में संयुक्त राष्ट्र के किसी भी मिशन में भारत के किसी भी शांतिरक्षक को अपने प्राणों की आहुति नहीं देनी पड़ी।अंतरराष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस वैश्विक शांति के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले ऐसे संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षकों की स्मृति के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने शांति स्थापना में अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस दिन ऐसे शांति रक्षकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। मरणोपरांत डैग हैमारस्जोल्ड मेडल प्रदान किया जाता है। इस सम्मान की स्थापना वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव डैग हैमारस्जोल्ड की स्मृति में की गयी थी। हैमारस्जोल्ड की 1961 में एक विमान हादसे में मौत हो गयी थी। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

नया संसद भवन यानी नया भारत-नया सवेरा...
Published / 2023-05-28 14:24:36
नया संसद भवन यानी नया भारत-नया सवेरा...

हृदयनारायण दीक्षितएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत का मन उल्लास से भरा पूरा है। 28 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नये संसद भवन का लोकार्पण करेंगे। यह इतिहास का स्वर्णिम अध्याय होगा। लेकिन भारतीय स्वाभिमान के इस अवसर पर भी लगभग डेढ़ दर्जन राजनीतिक दल कार्यक्रम का बहिष्कार कर रहे हैं। वे राष्ट्रीय महत्व के इस अवसर पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने इसे ओछी राजनीति बताया और कहा है कि नया संसद भवन देश की सांस्कृतिक विरासत परंपरा व सभ्यता को आधुनिकता से जोड़ने का सुंदर प्रयास है। इस ऐतिहासिक समारोह के साक्षी बनने के लिए सबको निमंत्रित किया गया है कि इस कार्यक्रम में सब लोग हिस्सा लें। उन्होंने कहा है कि इस कार्यक्रम को राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय परम्पराओं व आधुनिकता से जुड़ने का महान क्षण है। इस स्थान का इतिहास भी महत्वपूर्ण है।दिल्ली कई सदियों से सत्ता का प्रमुख केन्द्र रही है। ब्रिटिश सत्ता ने प्रारम्भ में अपनी राजधानी कलकत्ता में स्थापित की थी और बाद में दिल्ली। तत्कालीन शासक किंग जार्ज प्रथम ने 12 दिसंबर 1911 में इसकी आधारशिला रखी थी। ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और अलबर्ट बेकर ने इस नए नगर की योजना बनाई थी। लगभग बीस वर्ष बाद योजना पूरी हुई। 13 फरवरी 1931 को दिल्ली को राजधानी घोषित किया गया था।नये भवन की अनेक विशिष्टताएं हैं। नवनिर्मित संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास सेंगोल की स्थापना की जाएगी। यह पांच फीट लंबा चांदी से बना दंड है। इस पर सोने की पालिश है। आठवीं सदी के बाद से लगभग आठ सौ वर्ष तक चोल साम्राज्य था। चोल साम्राज्य में सत्ता का हस्तांतरण इसी सेंगोल से होता था। विद्वान राजनेता सी राजगोपालाचारी के सुझाव पर तमिलनाडु के तिरुवदुथुराई मठ ने इसे तैयार कराया था। इसके शीर्ष पर न्याय के रक्षक और प्रतीक नंदी अटल दृष्टि के साथ मौजूद हैं।चोल शिव उपासक थे। सेंगोल तमिल भाषा के शब्द सेम्मई से निकला है। इसका अर्थ धर्म निष्ठा और सच्चाई होता है। सेंगोल राजदण्ड भारतीय शासक की शक्ति और अधिकार का प्रतीक था। 14 अगस्त 1947 को पं. जवाहर लाल नेहरू ने तमिलनाडु की जनता से सेंगोल को स्वीकार किया था। ब्रिटिशों से सत्ता हस्तांतरण के लिए राजाजी ने चोल वंश के सत्ता हस्तांतरण से प्रेरणा लेने का सुझाव दिया। राजगोपालाचारी के सुझाव के बाद तमिलनाडु के तिरुवदुथुराई मठ ने सेंगोल तैयार कराया था। पूरा भारत नये संसद भवन की खूबसूरती के साथ चोल साम्राज्य की प्राचीन परंपरा से भी जुड़ रहा है। संसद भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की जीवमान सत्ता है। संसद के पास विधायी और संविधायी अधिकार हैं। भारत में ऋग्वेद के रचनाकाल के पहले से ही लोकतंत्र की धारा प्रवाहमान रही है। यहां देवताओं के सम्बंध में भी तर्क प्रतितर्क का वातावरण रहा है। यूरोपीय विद्वान ब्रिटिश संसद को विश्व लोकतंत्र की जननी बताते हैं। वस्तुत: भारत में ही लोकतंत्र और संसदीय संस्थाओं का जन्म और विकास वैदिक काल में ही हो चुका था। सभा और समितियां ऋग्वेद में हैं। महाभारत 18 पर्वों में विभाजित है। एक पर्व का नाम सभा पर्व है। सभा समिति में वैदिक काल में ही सामाजिक महत्व के विषयों पर विचार विमर्श होते थे। गायों को प्रणाम करते हुए ऋग्वेद के एक ऋषि कहते हैं कि हे गौ माता आपकी चर्चा सभा में होती है।भारतीय परंपरा में परस्पर विचार विमर्श का विशेष महत्व रहा है। अथर्ववेद (7.1.63) के एक मंत्र में ऋषि कहते हैं, सभा और समिति प्रजापति की दुहिताएं हैं। वे मेरी रक्षा करें। मुझे उत्तम शिक्षा दें। सदन में एकत्र हुए वरिष्ठ समुचित भाषण करें। सभा और समिति के उल्लेख से वैदिक साहित्य भरा पूरा है। अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है, सभा हमारी रक्षा करे। उसके सभ्य सभासद मेरी रक्षा करें। (15.9.2) ऋग्वेद के एक मंत्र में कहते हैं कि तुम अपने घर को भद्र बनाओ। तुम्हारी वाणी भद्र हो और तुम चिरकाल तक सभा में रहो। (6.28.6) सभा में लंबे समय तक रहना प्रतिष्ठा का विषय था। ऋग्वेद के एक अन्य मंत्र में सभा में जाने वाले की प्रशंसा है। कहते हैं कि वह हमेशा सभा में जाता है। सभा और समितियां सामान्य एकत्रीकरण नहीं थीं। सभा एक सुसंगठित संस्था थी। इसके सदस्य सभ्य या सभेय कहे जाते थे। सभा वैदिक काल में ही राष्ट्र व जनपदों में सक्रिय और जीवंत थी। मधुर बोलना, सुन्दर तर्क देना, विपक्षी के तर्क सुनना जैसे सभी लोकतांत्रिक तत्व वैदिक काल में विकसित हो चुके थे। भारतीय संविधान निर्माताओं ने संसदीय प्रणाली अपनायी। भारत के लिए इसे स्वीकार करने में सुविधा थी। भारत की प्रज्ञा पहले से ही लोकतांत्रिक थी। भारत के लोगों को संसदीय प्रणाली अपनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। हमारी संसद ने जटिल से जटिल विषयों पर धीर गंभीर होकर कानून बनाए हैं। बेशक संवैधानिक आपातकाल के समय सम्पूर्ण विपक्ष जेल में था। संसदीय प्रणाली पर ऐतिहासिक संकट था। अनेक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन भी विपक्ष की गैरहाजिरी में ही पारित हुए। लेकिन संसद ने आपातकाल के बाद जरूरी संशोधन किए। संसद भारतीय बुद्धि और विवेक का मन दर्पण है। अभी भी कभी-कभी संसद में गतिरोध हो जाता है। संसद की कार्यवाही ठप हो जाती है। भारत का मन दुखी होता है। लेकिन संसदीय प्रणाली अपनी कठिनाइयों व चुनौतियों का समाधान स्वयं कर लेती है।नया संसद भवन लोकार्पण के समय से ही विश्व का आकर्षण बन चुका है। हम दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र हैं। दुनिया की सभी संसदीय संस्थाएं भारत की और देखती हैं और प्रेरित होती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद प्रवेश के पहले दिन सीढ़ियों में माथा टेक कर संसद के प्रति अपना श्रद्धा भाव व्यक्त किया था। यह एक ऐतिहासिक भाव प्रवण क्षण था। प्रधानमंत्री के मन में संविधान और उसकी संस्थाओं के प्रति गहन आदर भाव है। विधायिका व न्यायपालिका के प्रति कार्यपालिका का आदर ध्यान देने योग्य है। हजारों वर्ष पहले वैदिककाल की संसदीय संस्थाओं से लेकर आधुनिक काल तक संसदीय संस्कृति का लंबा इतिहास है। यहां सांस्कृतिक निरंतरता है। कायदे से नये संसद भवन के लोकार्पण के अवसर पर सभी दलों, नेताओं और संसद सदस्यों को एक साथ लोकार्पण का साक्षी बनना चाहिए। संसद भवन सामान्य निर्मिति नहीं है। इस भवन के प्रत्येक अंश और कण-कण में राष्ट्र के लोकमंगल का प्रवाह है। जैसे मंदिर सामान्य भवन नहीं होते, मंदिरों के भीतर एक विशेष प्रकार की विद्युत चुम्बकीय धारा बहती है। वैसे ही संसद भवन के भी प्रत्येक अंग में लोकतांत्रिक चेतना की प्राणवान सत्ता है। इसलिए इस अवसर पर सबको एक साथ समवेत होना चाहिए। कुछ राजनीतिक दल इस अवसर को भी मोदी विरोध के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। यह अनुचित है। संसद भवन को श्रद्धा और आदरपूर्वक ही देखना चाहिए। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

आखिर जैव विविधता को कोई क्यों बचाये
Published / 2023-05-21 20:07:50
आखिर जैव विविधता को कोई क्यों बचाये

डॉ सुशील द्विवेदीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारे पृथ्वी ग्रह पर जीवन संतुलन को बनाए रखने के लिए बायोडायवर्सिटी अर्थात जैव विविधता बहुत आवश्यक है। यह पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की आधारशिला है। दुनिया भर में रहने वाले लगभग आठ अरब लोग लगातार धरती की धरोहर का उपभोग कर रहे हैं। जब हम बायोडाइवर्सिटी की बात करते हैं तब हमारा इशारा, धरती पर मौजूद तमाम जीवों और जैवप्रणालियों की जीवविज्ञानी (बायोलॉजिकल) और आनुवंशिक (जेनेटिक) विविधता से होता है। जैव विविधता के अन्तर्गत जीवित जीवधारियों पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों के अलावा फफूंद और मिट्टी में मिलने वाले सूक्ष्मजीवी बैक्टीरिया भी शामिल हैं। वे पूरी दुनिया की उन तमाम व्यापक इको प्रणालियों का हिस्सा हैं जो बर्फीले अंटार्कटिक, ट्रॉपिकल वर्षावनों, सहारा रेगिस्तान, मैंग्रोव वेटलैंड, मध्य यूरोप के पुराने बीच वनों और समुद्री और तटीय इलाकों की विविधता से भरा है।ये बायोडायवर्सिटी जीने लायक चीजें मुहैया कराती हैं जैसे कि पानी, भोजन, साफ हवा और दवा, सामूहिक रूप से इन्हें इको सिस्टम सेवाएं कहा जाता है। और वे प्रजातियों की विविधता की पारस्परिकता पर भी निर्भर होती हैं। अगर कोई एक प्रजाति खत्म हो जाती है तो प्रकृति-प्रदत्त ये सेवाएं भी हमेशा के लिए गायब हो सकती हैं। दुनिया में कुल कितनी प्रजातियां हैं, इस पर बहुत सारे विरोधाभास हैं, लेकिन द इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडाइवर्सिटी ऐंड इको सिस्टम सर्विसेज- आईपीबीईएस के अनुसार इनकी संख्या 30 लाख से 10 करोड़ के बीच है। विश्व में 14,35,662 प्रजातियों की पहचान की गई है। यद्यपि बहुत सी प्रजातियों की पहचान अभी भी होना बाकी है।पहचानी गयी मुख्य प्रजातियों में 7,51,000 प्रजातियां कीटों की, 2,48,000 पौधों की, 2,81,000 जन्तुओं की, 68,000 कवकों की, 26,000 शैवालों की, 4,800 जीवाणुओं की तथा 1,000 विषाणुओं की हैं। पारितंत्रों के क्षय के कारण लगभग 27,000 प्रजातियां प्रतिवर्ष विलुप्त हो रही हैं। इनमें से ज्यादातर ऊष्ण कटिबंधीय छोटे जीव हैं। हर 10 मिनट में औसतन एक प्रजाति खत्म हो रही है। जब कोई प्रजाति इको सिस्टम से गायब हो जाती है तो प्रकृति का संतुलन धीरे धीरे बिखरने लगता है।शोधकर्ताओं के मुताबिक, हम लोग दुनिया की छठी सामूहिक विलुप्ति के बीचो-बीच पहुंच गए हैं। अगर जैव विविधता क्षरण की वर्तमान दर कायम रही तो विश्व की एक चौथाई प्रजातियों का अस्तित्व सन 2050 तक समाप्त हो जायेगा। जैव विविधता खत्म होने से एल्गी यानी शैवालों ( काई) या पेड़ों के बिना, ऑक्सीजन नहीं मिलेगी। और पौधों को परागित करने वाले परागणकर्ता (पोलिनेटर) जैसे पक्षी, मधुमक्खी और अन्य कीड़े के बिना हमारी फसलें चौपट हो जायेंगी। दो तिहाई से ज्यादा फसलें- जिनमें कई फल, सब्जियां, कॉफी और कोकोआ शामिल हैं, कीटपतंगों जैसे कुदरती पॉलिनेटरों पर निर्भर हैं। सुबह-सुबह जब अन्न का कटोरा हमारे सामने होता है तब हम ये नहीं सोचते कि कुदरत ने इन फसलों को पॉलिनेट करने में कितनी मदद की है जिसकी बदौलत वो अन्न तैयार हुआ है। रोजमर्रा के स्तर पर कुदरत जो हमारे लिए कर रही है, वो हमें दिखता ही नहीं है।कोविड-19 जैसी महामारी के पीछे की वजह भी कहीं न कहीं से प्राकृतिक असंतुलन है। जब से हमने जैव विविधता को नष्ट करना शुरू किया तभी से हमने उस तंत्र को समाप्त करना शुरू कर दिया, जो स्वास्थ्य तंत्र के लिए मददगार होता है। आज अगर हम देखें तो इसी कोरोना वायरस की भिन्न-भिन्न किस्मों से हर साल करीब 100 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं और लाखों लोगों की मौत हो जाती है। यही नहीं धरती पर इंसानों में होने वाली जितनी भी बीमारियां हैं उनमें से 75 फीसदी जूनोटिक होती है। जूनोटिक यानी ऐसी बीमारियां जो जानवरों से इंसानों में आती है। साधारण शब्दों में ऐसी बीमारियां जो जानवरों में पैदा होती है और उनसे हम इंसानों के अंदर आ जाती है। दुनिया भर में फैली ये बीमारियां जो वायरस, बैक्टीरिया, फंगस, परजीवियों से होती है। वह हल्की से बहुत घातक तक हो सकती हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि इंसानों में होने वाली 60 फीसद से अधिक बीमारियां जानवरों से इंसानों में पहुंचती है। दरअसल, हमने जिस तरह धरती पर से तमाम तरह के जीवों को नष्ट करके उनकी जगह खुद ले ली या उन जीवों को दे दी जिन्हें हम चाहते थे। इस वजह से धरती पर जैव की विविधता खत्म होती गई और जो जानवर इन वायरस, बैक्टीरिया या दूसरे बीमारी पैदा करने वाले जीवों को संभाल सकते थे, वे धरती पर नहीं रहे। इस तरह दूसरे होस्ट के तौर पर सूक्ष्म जीवों को अपना जीवन आगे बढ़ाने के लिए जो जीवन चाहिए था, वह उन्हें हमसे मिलने लगा और उन्होंने हमारे अंदर प्रवेश करना शुरू कर दिया। इसी प्रकार सन 1997 में रेबीज से पूरी दुनिया के 50 हजार लोग मर गये।भारत में सबसे ज्यादा 30 हजार मरे। आखिर क्यों मरे रेबीज से, एक प्रश्न उठा। स्टेनफोर्ट विश्व विद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि ऐसा गिद्धों की संख्या में अचानक कमी के कारण हुआ। वहीं दूसरी तरफ चूहों और कुत्तों की संख्या में एकाएक वृद्धि हुई। अध्ययन में बताया गया कि पक्षियों के खत्म होने से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण भी काफी हद तक प्रभावित हुआ। अमेरिका जैसा देश अपने यहां के चमगादड़ों को संरक्षित करने में जुटा पड़ा है। अब हम सोचते हैं कि चमगादड़ तो पूरी तरह बेकार हैं। मगर वैज्ञानिक जागरूक करा रहे हैं। चमगादड़ मच्छरों का लार्वा खाता है। यह रात्रिचर परागण करने वाला प्रमुख पक्षी है। लोग कहते हैं कि उल्लू से क्या फायदा, मगर किसान जानते हैं कि वह खेती का मित्र है, जिसका मुख्य भोजन चूहा है।विकास की दुहाई देकर जैव विविधिता का जिस प्रकार शोषण किया जा रहा है उसका दूरगामी दुष्परिणाम भी विकास पर ही देखने को मिलेगा। आज आवश्यकता यह है कि विकास के लिए जैव विविधिता के साथ बेहतर तालमेल बनाया जाये। विकास के नाम पर हम जंगल के जंगल साफ किये जा रहे प्रकृति की इस अकूत दौलत के आधार यानी पेड़ पर जब आरे चलते हैं तो सिर्फ पेड़ ही नहीं कटता बल्कि तमाम जीव जंतुओं के जीवन चक्र पर कुठाराघात होता है। बारिश-धूप-बारिश का चक्र टूटता है। पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई की वजह से दुनिया के बहुत सारे इलाके सूखे के हालात झेल रहे हैं। शिवजी की तरह अपनी जटाओं में कार्बन डाई ऑक्साइड को उलझाये जंगल कटेंगे तो ये कार्बन कहां जायेगा? इंसानों ने जिस तरह जंगल, जमीन, जानवर, जल और दूसरे जीवन को नष्ट किया है। इसी का नतीजा है कि आज हम इस हाल में आकर खड़े हो गये हैं। हमने जो उपभोग की इंतेहा की है उसकी वजह से आज हमें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए 1.66 धरती की जरूरत है। अब यह सोचने की जरूरत है कुल मिलाकर हमारा जीवन, हमारी अर्थव्यवस्था और हमारी सेहत सब कुछ जैव विविधता पर निर्भर है। हमें यह समझना होगा कि हम मनुष्यों का अस्तित्व प्रकृति से है न कि प्रकृति का अस्तित्व मनुष्य से है। लिहाजा जैव विविधता का संरक्षण समस्त मानव जाति का साझा उत्तरदायित्व है।(लेखक, ख्यातिलब्ध पर्यावरणविद्, अर्थ डे नेटवर्क स्टार वर्ष 2020 और पर्यावरण से संबद्ध ग्रीन ओलंपियाड (टेरी) के उत्तर भारत के समन्वयक हैं।)

मोदी बने जी-20 और जी-7 सहयोग के सूत्रधार
Published / 2023-05-21 20:01:25
मोदी बने जी-20 और जी-7 सहयोग के सूत्रधार

डॉ दिलीप अग्निहोत्रीएबीएन एडिटोरियल, डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विदेश नीति का नया अध्याय लिखा है। उन्होंने विश्व शांति और सौहार्द का प्रभावी संदेश दिया है। यही कारण है कि विकसित देश भी भारत की बढ़ती भूमिका को स्वीकार कर रहे हैं। वैश्विक सम्मेलन में सर्वाधिक आकर्षण मोदी के प्रति होता है। ऐसा जापान के हिरोशिमा में भी हुआ। भारत जी-20 का अध्यक्ष है। मोदी दोनों संगठनों के बीच सहयोग के सूत्रधार बने हैं। उन्होंने कहा कि जी-20 और जी-7 के बीच एक महत्वपूर्ण लिंक बनाया जा सकता है।नरेन्द्र मोदी ने जी-7 शिखर सम्मेलन में खाद्य, स्वास्थ्य और विकास से संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए 10 सूत्री कार्ययोजना का आह्वान किया है। सुझाव दिया कि वैश्विक नेताओं को ऐसी समावेशी खाद्य प्रणाली विकसित करनी चाहिए जिससे गरीब किसानों सहित सबसे कमजोर लोगों की रक्षा की जा सके। पोषण और पर्यावरण के हित में मोटे अनाज के उपयोग होना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाएं विकसित करने के लिए डिजिटल व्यवस्था बढ़ाना आवश्यक है। विकासशील देशों की जरूरतों से प्रेरित विकास मॉडल होना चाहिए। परस्पर सहयोग से स्वास्थ्य सेवा, आरोग्य तथा खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों से संबंधित चुनौतियों का समाधान करना महत्वपूर्ण है।बड़ी बात यह है कि भारत जी-7 समूह का हिस्सा नहीं है। फिर भी भारत को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया। प्रधानमंत्री मोदी लगातार चौथी बार जी-7 में शामिल हुए। जी-7 दुनिया की सात सबसे बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों का समूह है। इसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं, जी-7 समूह की स्थापना 1973 में की गयी थी। इसका किसी भी देश में मुख्यालय नहीं है। यह ग्रुप मानवीय मूल्यों की रक्षा, लोकतंत्र की रक्षा, मानवाधिकारों की रक्षा, अंतरराष्ट्रीय शांति का समर्थक, समृद्धि और सतत विकास के सिद्धांत पर चलता है। वस्तुतः नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जी-20 को नई दिशा मिल रही है। जी-7 के सदस्य भी भारत की इस भूमिका से प्रभावित है। नरेन्द्र मोदी की क्षमताओं का वह लाभ उठाना चाहते हैं। नरेन्द्र मोदी पर दुनिया को विश्वास है।नरेन्द्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने अपनी विदेश नीति में भारतीय संस्कृति का भी समावेश किया है। इसमें सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना है। विश्व शांति का सपना केवल भारतीय चिंतन के माध्यम से ही साकार हो सकता है। नरेन्द्र मोदी ने इसी चिंतन का उद्घोष जी-20 में भी किया है। अन्य देशों की सभ्यताओं के लिए यह विचार दुर्लभ है।नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत के प्रति वैश्विक दृष्टि में परिवर्तन आ चुका है। आज भारत विश्व का नेतृत्व करने के लिए तैयार है। जलवायु परिवर्तन, युद्ध, आतंकवाद और वैश्विक निर्धनता के विभिन्न पक्षों पर मोदी के सुझाव समाधान करने वाले हैं। सर्वे भवन्तु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम भारतीय दर्शन एवं भारतीय जीवन दृष्टि का प्राण तत्व है। भारतीय दृष्टि धरित्री को भूगोल मानने तक सीमित नहीं है। अपितु यह इसे मां के सदृश मानती है।इसी दृष्टि से भारत की जी-20 की अध्यक्षता को लिया गया। पूर्व में आर्थिक रूप से संपन्न रहे भारत की तस्वीर को वापस लाना होगा। आज मानवता के कल्याण के लिए भारत के पास एक सशक्त नेतृत्व है जिसने नवीकरणीय उर्जा के क्षेत्र से लेकर आर्थिक विकास एवं सामरिक हितों को सशक्त किया है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत न केवल राष्ट्रीय स्तर पर अपना विकास कर रहा, अपितु वसुधैव कुटुंबकम की भावना के अनुरूप संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानते हुए सबके साथ सहयोग-भाव लेकर भी चल रहा है।किसी वैश्विक संगठन ने पहली बार भारतीय सूक्ति को अपना ध्येय वाक्य बनाया है। वस्तुतः यह भारतीय चिंतन के बढ़ते प्रभाव और लोकधर्म की प्रतिध्वनि है। इसे विश्व सहजता से स्वीकार कर रहा है। लोगों को धीरे-धीरे यह समझ में आ रहा है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान भारतीय चिंतन के माध्यम से किया जा सकता है। विश्व गुरु भारत ने सम्पूर्ण मानवता के लिए वसुधैव कुटुम्बकम का विचार दिया था। किसी अन्य सभ्यता संस्कृति के लिए यह दुर्लभ चिंतन था। इसमें सभ्यताओं के बीच संघर्ष की कोई संभावना नहीं थी। लेकिन कालान्तर में ऐसे संघर्ष का दौर भी चला। दुनिया में शांति और सौहार्द की अभिलाषा रखने वालों को भारतीय विरासत में ही समाधान दिखाई दे रहा है। अन्य कोई विकल्प है भी नहीं।यह विषय दुनिया को युद्ध मुक्त करने तक ही सीमित नहीं है। भारत ने पृथ्वी सूक्ति के माध्यम से मानवता को पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति संवर्धन का भी संदेश दिया। कोरोना काल में भारतीय जीवन-शैली और आयुर्वेदिक को दुनिया में पुनः प्रतिष्ठित किया है। उस समय अपने को विकसित समझने वाले देश भी लाचार हो गये थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विश्व कल्याण के दृष्टिगत दुनिया को भारतीय विरासत से परिचित करा रहे हैं। उनके प्रयासों से अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है। योग प्रत्येक व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य हेतु बहुत उपयोगी है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ऐसे मानवीय तथ्यों को दुनिया में स्थापित कर रहा है। विगत नौ वर्षों के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रभाव बढ़ा है।जी-20 में भी भारत के विचारों को बहुत महत्व मिलने लगा है। कुछ वर्ष पहले तक यह कल्पना भी मुश्किल थी कि भारत इस संगठन का अध्यक्ष बनेगा। आज यह सहज रूप में सम्भव हुआ है। नरेन्द्र मोदी ने इसे भारत के लिए एक बड़ा अवसर माना है। इसके माध्यम से वह विश्व कल्याण के तथ्यों लोगों को अवगत करा रहे हैं। जी-20 शिखर सम्मेलन का लोगो अपने में एक विचार को अभिव्यक्त करने वाला है। नरेन्द्र मोदी ने भारत की मेजबानी में अगले वर्ष आयोजित होने वाली जी -20 शिखर वार्ता का प्रतीक चिह्न, ध्येय वाक्य और वेबसाइट का अनावरण किया था।जी-20 के प्रतीक चिह्न में सात पंखुड़ियों वाले कमल के फूल पर गोलाकार विश्व स्थित है। इसके नीचे भारतीय संस्कृति का प्रसिद्ध ध्येय वाक्य वसुधैव कुटुम्बकम अंकित है। साथ ही वन अर्थ, वन फैमिली और वन फ्यूचर को स्थान दिया गया है। मोदी ने कहा कि इस लोगो और थीम के माध्यम से एक संदेश दिया गया है। हिंसा के प्रतिरोध में महात्मा गांधी के जो समाधान हैं। जी-20 के जरिए भारत उनकी वैश्विक प्रतिष्ठा को नयी ऊर्जा दे रहा है।नरेन्द्र मोदी ने संयुक्तराष्ट्र महासभा में भी कहा था कि भारत युद्ध नहीं बुद्ध का देश है। प्रतीक चिह्न में कमल का फूल भारत की पौराणिक धरोहर, हमारी आस्था और हमारी बौद्धिकता को चित्रित करता है। प्रतीक चिह्न के कमल की सात पंखुड़ियां दुनिया के सात महाद्वीपों और संगीत के सात स्वरों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रतीक चिह्न इस आशा को जगाता है कि दुनिया एक साथ आगे बढ़ेगी। प्रतीक चिह्न में कमल आज की विपरीत परिस्थितयों में आशा जगाता है। चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियां हों कमल खिलता रहता है। आजादी के अमृतकाल में देश के सामने जी-20 की अध्यक्षता का बड़ा अवसर है। यह भारत के लिए गर्व और गौरव की बात है। जी-20 ऐसे देशों का समूह है जो विश्व के सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी में 85 प्रतिशत की भागीदारी रखता है। इन देशों में दुनिया की दो तिहाई जनसंख्या रहती है। विश्व व्यापार में इसकी 75 प्रतिशत की भागीदारी है। भारत का प्रयास है कि विश्व में कोई पहली दुनिया या तीसरी दुनिया न हो, बल्कि एक दुनिया हो। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

समलैंगिक शादी या सांस्कृतिक बर्बादी
Published / 2023-05-06 13:21:51
समलैंगिक शादी या सांस्कृतिक बर्बादी

विनोद बंसलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय ज्ञान विज्ञान, परंपराएं, रीति रिवाज व सांस्कृतिक मान्यताएं आज विश्व पटल पर स्वीकार की जाने लगी हैं। भोगवादी जीवन से तंग लोग अपनी पाश्चात्य संस्कृति को तिलांजलि देकर जहां वे एक ओर भारतीय संस्कारों व मान्यताओं को अपना रहे हैं वहीं, कुछ मुट्ठी भर लोग भारतीय जीवन मूल्यों का मखौल उड़ाते हुए अपने अमर्यादित, अप्राकृतिक व असांस्कृतिक कुकृत्यों को वैधानिक मान्यता दिलाने पर तुले हैं। दुर्भाग्य से ऐसे लोगों के साथ हमारे यहां के कुछ कथित बुद्धिजीवी, वकील तथा न्यायाधीश भी उनके सहयोगी की भूमिका में दिख रहे हैं। हां! हम बात कर रहे हैं दो समलैंगिकों के अप्राकृतिक व्यवहार को विवाह की मान्यता की।संस्कार भारतीय जीवन मूल्यों तथा सामाजिक व्यवस्था की धुरी होते हैं। यूं तो भारतीय परंपरा में गर्भाधान पुंसवन, सीमंतोनयन, जातकर्म, नाम करण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ा कर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास तथा अंत्येष्टि संस्कार सहित सोलह संस्कारों का वर्णन मिलता है। किन्तु इनमें मात्र एक ही संस्कार ऐसा है जिसमें दो लोग मिलकर सामूहिक रूप से एक साथ संस्कारवान होते हैं। इसे विवाह संस्कार कहते हैं जिसके लिए स्त्री व पुरुष दोनों का होना अनिवार्य है। इस संस्कार का मुख्य प्रयोजन योग्य संतानोत्पत्ति कर समाज व राष्ट्र को उन्नत करना है। यूं तो विवाह भी आठ प्रकार के बताये हैं। ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, असुर, गंधर्व, राक्षस व पैशाच नामक विवाहों में से ब्राह्म विवाह को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।विवाहों की जो निकृष्टतम पद्धति भी है उसमें भी स्त्री व पुरुष दोनों का होना अनिवार्य है। यदि हिंदू मान्यताओं को छोड़ भी दें तो पाएंगे कि दुनियां के अन्य किसी भी मत, पंथ, संप्रदाय में भी सर्वत्र स्त्री के साथ पुरुष या पुरुष के साथ स्त्री के विवाह को ही मान्यता दी गयी है। आदिकाल से ही विवाह को हमारे यहां एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है।भारतीय समाज में चार आश्रमों यथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम में से गृहस्थ आश्रम का विशेष महत्व है। इसमें प्रवेश ही विवाह संस्कार के माध्यम से होता है। यह आश्रम शेष सभी आश्रमों की धुरी भी है। यदि यही कलंकित या दूषित हो जाएगा तो अन्य आश्रमों का क्या होगा। भारतीय मान्यताओं के अनुसार विवाह बंधन में बंधने वाले युगल एक दूसरे के प्रति समर्पित भाव से दायित्व का भाव लेकर एक होने का संकल्प लेते हैं ना कि अपने अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं। वे अपनी संतान माता-पिता, रिश्तेदारों व समाज के लिए दायित्व बोध से काम करते हैं।विवाहों को कानूनी मान्यता हेतु हमारे यहां अलग अलग रिलीजन के हिसाब से अलग अलग कानून बनाए गए हैं। ये सभी संविधान के अनुच्छेद 246 के अंतर्गत संसद को प्रदत्त शक्तियों के अंतर्गत बनाये गये हैं। जो उन कानूनों के अंतर्गत नहीं आता उनके लिए विशेष विवाह अधिनियम 1954 है। इसके अंतर्गत दो विविध मतों के मतावलंबी अपने अपने मत का पालन करते हुए बिना मतांतरित हुए भी विवाह कर सकते हैं। किन्तु किसी भी कानून में दो समलैंगिक व्यक्तियों को पति-पत्नी के रूप मान्यता देने का कोई विधान नहीं है। संसार का कोई भी धर्म समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देता। अब यदि दो समलैंगिकों अर्थात महिला का महिला के साथ या किसी पुरुष का पुरुष के साथ सह-जीवन को विवाह की स्वीकृति दी जाती है तो उसके क्या परिणाम होंगे उन पर विचार करते हैं।यदि समलैंगिक विवाह को मान्यता दी जाती है तो संतानोत्पत्ति कैसे होगी? इन्हें बच्चा कोई गोद देगा ही क्यों? क्या कानून ऐसे जोड़ों को दत्तक गृहण का अधिकार देगा? बच्चे यदि गोद भी ले लिए जायें तो क्या उन समलैंगिकों के आचरण व व्यवहार के दुसप्रभाव से बच्चा अछूता रह सकता है? दत्तक बच्चों को मातृत्व और पितृत्व का सुख कैसे संभव है? बच्चा जब विद्यालय जाएगा तो उसके मां व बाप का नाम क्या होगा? संतानोत्पत्ति होगी ही नहीं तो गोद लिए बच्चे के प्रति उस कथित दम्पत्ति का व्यवहार और बच्चे पर उसका दुसप्रभाव दोनों ही अकल्पनीय होंगे। बच्चों व बड़ों में पारिवारिक संस्कार कहां से आयेंगे जो कि जीवन की शांति, व्यवस्था व नैतिक मूल्यों पर आधारित समाज के लिए बहुत आवश्यक हैं? पति पत्नी की युगल जोड़ी के बिना पूजा पाठ, धार्मिक अनुष्ठान कैसे हो पायेंगे? बच्चे की रिस्तों की डोर ही पूरी तरह टूट जायेगी। भाई-बहिन, माता-पिता, मौसा-मासी, दादी-दादी, नाना-नानी इत्यादि सभी रिश्तों की इति श्री हो जायेगी, जिनसे व्यक्ति जीवन भर ऊर्जावान रहता है। दत्तक को माता पिता की प्रॉपर्टी में हिस्सा कैसे मिलेगा। प्रकृति के प्रतिकूल इस अप्राकृतिक व्यवहार से समाज में व्यभिचार, हिंसा, रोग, असंतोष व अवैधानिक कार्यों को बढ़ावा मिलेगा। यदि सिर्फ शारीरिक आकर्षण को विवाह का रूप दिया गया तो कल कोई भी दो वयस्क (भाई-बहिन या पिता-पुत्री भी) एक दूसरे से विवाह की जिद करेंगे! कहेंगे आप यह तय करने वाले कौन होते हैं कि हम अपनी यौन अभिरुचि किसके साथ रखें? एक बात और, समलैंगिक विवाह की बात तो हो रही है किन्तु अभी तक किसी ने समलैंगिक निकाह की बात नहीं की! आखिर क्यों?हालांकि, भारतीय संस्कृति, संस्कारों व मर्यादाओं को तार तार करने का प्रयास कोई नया नहीं है। षड्यंत्र पूर्वक भारतीय संविधान की मूल प्रति से पहले राम दरबार के चित्र को हटाया गया, संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर व सोशलिस्ट शब्दों को अनधिकृत तरीके से घुसाया गया,  माननीय सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से दो वयस्कों के मध्य सहमति से सेक्स संबंधों को कानूनी मान्यता दी गई। उसके बाद लिव इन रिलेशनशिप तथा विवाहेत्तर संबंधों व समलैंगिक व्यवहार को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया। मतांतरित अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण दिलाकर अनुसूचित समाज के मूल अधिकारों पर भी कुठाराघात के प्रयास हो रहे हैं। अब समलैंगिकों के मध्य अप्राकृतिक व्यवहार को विवाह जैसे पवित्र शब्द से अलंकृत करने के गहरे षडयंत्र हो रहे हैं। अब आगे आने वाले समय में क्या जानवरों के साथ संबंधों को भी मान्यता दिलाने की लड़ाई लड़ी जायेगी? पिछले कुछ वर्षों से लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने के नाम पर नई नई दलीलें भी दी जा रही हैं जैसे- महिला और पुरुषों के लिए टॉयलेट (शौचालय) अलग अलग क्यों? छात्र और छात्राओं के हॉस्टल अलग अलग क्यों? यदि लड़के टॉपलैस रह सकते हैं तो लड़कियां क्यों नहीं इत्यादि...?भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति के मूल अधिकारों की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध है। चाहे वह व्यक्ति स्वयं कोई दुराचारी, पापाचारी या भारतीय संस्कृति का विरोधी ही क्यों ना हो। समलैंगिक व्यवहार चाहे अप्राकृतिक, अमर्यादित या भारतीय मान्यताओं के विरुद्ध हो तो भी, न तो यहां के कानून द्वारा और ना ही यहां के लोगों के द्वारा उनका किसी प्रकार से तिरस्कार किया जाता है। किंतु, इतना सब कुछ होने के बावजूद, यदि उनके इस व्यवहार को विवाह का नाम देने की कोशिश होती है तो, निसंदेह विवाह रूपी पवित्र बंधन को कलंकित करने का प्रयास जरूर माना जायेगा। वे समलैंगिक अपने घर में कैसे भी रहें, चाहे वे वैवाहिक दंपत्ति की तरह ही क्यों न रहें, किंतु भारतीय समाज उन्हें पति-पत्नी के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं कर सकता। ऐसे में कुछ मुट्ठी भर लोग सर्वोच्च न्यायालय का बहुमूल्य समय तो बर्बाद कर ही रहे हैं साथ ही, भारत के नागरिकों द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों द्वारा कानून बनाने की उनकी शक्तियों का अतिक्रमण भी कर रहे हैं। जो काम संसद का है, उसे भला न्यायालय कैसे कर सकता है? दूसरी बात, इस तरह की मान्यता क्या कुछ व्यक्तियों या न्यायाधीशों द्वारा दी जा सकती है? तीसरी बात कि फ्री शिक्षा, स्वास्थ्य रोजगार, पर्यावरण संरक्षण व जनसंख्या नियंत्रण इत्यादि अन्य अनेक महत्वपूर्ण मामलों को किनारे कर इस मामले की त्वरित व दिन प्रति दिन सुनवाई किया जाना क्या उचित है? क्या इस मामले की तुलना श्री राम जन्मभूमि वाद से करना अतार्किक व रामभक्त हिन्दू जनमानस का उपहास नहीं? इस विवाह के बाद महिला, बच्चों व संयुक्त परिवार के अधिकारों के साथ तलाक, भरण पोषण, इत्यादि से जुड़े लगभग 160 कानूनी प्रावधानों में संशोधन करना पड़ेगा जिसके परिणाम स्वरूप क्या अनेक प्रकार की विधि-विषमताएं जन्म नहीं लेंगी? क्या बिना विवाह के दो समलैंगिक अपना बैंक खाता नहीं खुलवा सकते या अपनी बीमा पॉलिसी में एक दूसरे को नामित नहीं कर सकते? क्या सिर्फ इन तर्कों के आधार पर महान व पावन विवाह व्यवस्था तथा उस पर टिकी कुटुंब प्रणाली का यूं ही गला घोंट दिया जाना उचित है? यह बहुत संवेदनशील और पेचीदा विषय है जिसमें हाथ डालने से कहीं इस कथित राइट प्रोटेक्शन से रॉइट्स प्रॉडक्शन न शुरू हो जाये, इस बात का ध्यान भी रखना होगा। (लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता व विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

बस्तर, तेंदूपत्ता और माओवाद
Published / 2023-04-29 21:40:52
बस्तर, तेंदूपत्ता और माओवाद

उपेन्द्र नाथ राय एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा में माओवादियों के कायराना हमले ने सबको झकझोर दिया है। आमतौर पर ऐसी वारदात सोझी समझी रणनीति के तहत तेंदूपत्ता सीजन में ही होती हैं। बस्तर का हर व्यक्ति यह जानता है कि माओवादियों की सक्रियता मार्च से जून तक बढ़ जाती है। चुनावी वर्ष में भी यह बड़ी घटना को अंजाम देने के फिराक में रहते हैं।इसी अवधि में माओवादी टैक्टिकल काउंटर अफेंसिव कैंपेन अर्थात टीसीओसी चलाते हैं। इसी दौरान नए रंगरूटों को भर्ती किया जाता है। ऐसे हमलों का मकसद तेंदूपत्ता हितग्राहियों में दिल-दिमाग में खौफ पैदा करना होता है, जिससे वह पैसा देने में आनाकानी न करें। माओवादियों की यह मारकाट रंग लाती है। तेंदूपत्ता की तुड़ाई मई में शुरू हो जाती है। इसके लिए बस्तर में समितियों के गठन से लेकर अन्य तैयारियां शुरू हो गई हैं। माओवादियों की कमाई का बड़ा जरिया तेंदूपत्ता ही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र कांकेर जिले से माओवादी लगभग डेढ़ करोड़ रुपये (पुलिस खुफिया विभाग की रिपोर्ट) की वसूली करते हैं। यही वजह है कि माओवादी मार्च से ही दहशत फैलाने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि तेंदूपत्ता की तुड़ाई करने वाले आसानी से समितियों को उनका हिस्सा दे देते हैं। पिछली भाजपा सरकार ने तेंदूपत्ता तुड़ाई के पैसे देने की नियमावली में परिवर्तन किया था। सरकार सीधे हितग्राहियों के खाते में पैसा भेजने लगी थी। इससे माओवादियों को वसूली में परेशानी हुई। इसके बाद माओवादियों के इशारे पर बस्तर संभाग में आंदोलन शुरू हो गया। अब इसको समझिए, माओवादियों के ही इशारे आंदोलन भी होते हैं। जंगल से फरमान आता है और लोग न चाहते हुए भी बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं। जब तक भाजपा की सरकार रही, उसने पैसा सीधे हितग्राही के खाते में डाला। रमन सिंह आंदोलन के आगे नहीं झुके। कांग्रेस की सरकार बनते ही इ्स पर पूर्णविराम लगा दिया गया। समितियों के माध्यम से ही पैसा दिया जाने लगा। समितियों के माध्यम से पैसा देने से माओवादियों को यह फायदा होता है कि उन्हें सिर्फ समिति के पदाधिकारियों से मिलना होता है। वहां फरमान चला जाता है। वहां से हर हितग्राही के मेहनत के पैसे में 15 प्रतिशत तक की कटौती कर ली जाती है। बाद में यह पैसा (कटौती) माओवादियों तक पहुंचा दिया जाता है। इसे कांग्रेस या तो समझ नहीं पाई या समझते हुए भी माओवादियों के सामने दंडवत हो गई। सरकारें बार-बार कहती हैं कि माओवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, लेकिन यह अर्द्धसत्य है। हकीकत तो यह है कि फोर्स सिर्फ गतिविधियों को दबाने की दवा मात्र है। यह वैसे ही है, जैसे मलेरिया की दवा कुनैन है। कुनैन से मलेरिया को खत्म तो किया जा सकता है, लेकिन मलेरिया कभी हो न, इसके लिए तो मच्छरों को खत्म करने के उपाय पर विचार करना होगा। माओवादियों की मौजूदगी की वर्तमान स्थिति के बारे में उनके सात नवंबर 2022 को जारी 27 पेज के पत्र से जाहिर होती है। इसमें लिखा है कि 11 महीनों के अंदर (दिसंबर 2021 से नवंबर 2022 तक) देशभर में 132 माओवादी मारे गए। इसमें सबसे अधिक 89 दंडकारण्य क्षेत्र में मारे गये। माओवादियों का यह दंडकारण्य बस्तर संभाग, छत्तीसगढ़ के बार्डर महाराष्ट्र और तेलंगाना के बार्डर को मिलाकर बनाया गया है। माओवादी इसे एक डिवीजन दंडकारण्य संबोधित करते हैं। इस पत्र के मुताबिक पिछले 11 माह में उसके सेंट्रल रीजनल बल का एक, बिहार-झारखंड के 17, पश्चिम बंग का एक, तेलंगाना के 15, आंध्र प्रदेश में एक, ओडिशा के तीन, पश्चिम घाटियों में एक, महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में तीन माओवादी मारे गए। इसमें केंद्रीय कमेटी के सदस्य दीपक को बचाने में ही 27 माओवादी पारेवा मुठभेड़ में मारे गए। यहां महत्वपूर्ण है कि माओवादियों के समूल नाश के लिए केंद्र ने मई 2017 में पांच वर्ष की समय सीमा रखकर समाधान योजना प्रारंभ की थी। इस पत्र में ही लिखा है कि माओवादियों (2017 से) ने इस दौरान पूरे भारत में 1300 से अधिक गुरिल्ला कार्रवाई की। इसके माध्यम से पांच साल में 429 जवान शहीद हो गए। 966 जवान घायल हुए। इस दौरान 40 लोगों को माओवादियों ने मारा। 409 जन सामान्य की भी नृशंस हत्या कर दी गई। इनमें से ज्यादातर आदिवासी समाज के लोग हैं। 300 जगहों पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। एक साल में माओवादियों ने 200 बार दहशत फैलायी। इन घटनाओं में 31 जवान शहीद हुए। 154 जवान घायल हुए। 69 सामान्य लोगों को मार दिया गया। माओवाद की समस्या को आप इसी से समझ सकते हैं कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले का आमाबेड़ा क्षेत्र जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर है। इस क्षेत्र में आज भी ऐसे गांव हैं, जहां के लोग हिंदी बोलना तो दूर छत्तीसगढ़ी भी नहीं बोल पाते। ऐसे में यह लोग अधिकारियों से अपने दर्द को कैसे बयां कर सकते हैं। ऐसे कई गांव हैं, जहां पर प्रशासन को पहुंचने में 12 से 15 घंटे लग जाते हैं। यहां सिर्फ किसी तरह साइकिल या बाइक ही जा सकती है। अधिकारियों की अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती। यदि पूरी फोर्स वहां पहुंचती है तो हर कदम पर खतरा मंडरा रहा होता है। यहां पुलिस और माओवादियों में अंतर यह होता है कि माओवादियों के सचिव स्तर के पदाधिकारी के लिए अनिवार्य योग्यता ही चार भाषाओं का ज्ञान होना होती है। जिस क्षेत्र में उसकी नियुक्ति है, उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के साथ ही हिंदी और अंग्रेजी की जानकारी भी चाहिए। स्थानीय भाषा के जानकार होने से यह लोग स्थानीय लोगों के साथ आसानी से घुल-मिल जाते हैं। वहीं पुलिस को लोगों का दर्द समझने के लिए दुभाषिया की जरूरत होती। ऐसे में सवाल यह है कि पुलिस स्थानीय लोगों के साथ कैसे घुल-मिल सकती है। यह कहा जाता है कि जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। यह बात माओवादी क्षेत्रों में सच साबित होती है। यही कारण है कि बाहर से उस क्षेत्र में जाकर खबर देने वाले पत्रकार भी कभी हकीकत को ठीक से उजागर नहीं कर पाते। इसका कारण है कि उनकी रिपोर्ट स्थानीय लोगों से बातचीत पर आधारित पर होती है। आप सोच सकते हैं कि जो (स्थानीय बाशिंदे) बंदूक की नाल पर हमेशा सांस ले रहा हो, वह कैसे सच बता सकता है। हकीकत यह होती है कि बाहर से जाने वाले पत्रकारों से बातचीत के समय 10 स्थानीय लोगों के बीच एक माओवादी जरूर होता है। उदाहरण के तौर पर आप उनसे पूछिये, क्या इस बीच माओवादी इस क्षेत्र में देखे गए हैं। उनका यही जवाब होता है, वर्षों से देखे नहीं गए, जबकि हकीकत है कि उस क्षेत्र में माओवादी रोज आते-जाते हैं। माओवादी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के सामने एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ पहाड़ है। दोनों के बीच हमेशा उनकी जिंदगी खतरे में पड़ी रहती है। यदि एक पुलिस वाला उनसे बात कर लेता है तो शक में माओवादी उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। कहते हैं, यह पुलिस का मुखबिर था। इधर पुलिस उन्हें हमेशा शक के दायरे में रखती है कि यह जनताना सरकार का सदस्य होगा और कई बार यह हकीकत भी होती है कि उन्हीं आम आदमियों के बीच माओवादियों का मुखबिर भी छिपा होता है, जिसे उस गांव के लोग भी नहीं जानते। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार मैं छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में माओवादियों से प्रभावित सीतरम इलाके में गया था। वहां जाने के लिए एक नदी को पार करना पड़ा। नदी पार करते ही माओवादियों के स्मारक दिखने लगे। मैं चारों तरफ से घिर गया। इसके बाद मैंने अखबार से बताया तो कुछ राहत मिली। कई लोगों से बातचीत की। एक व्यक्ति ने कहा कि यहां माओवादियों की गतिविधियां लंबे समय से शून्य हैं। और यह बातचीत के ठीक तीन दिन बाद पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। यदि आतंकवादियों और माओवादियों की तुलना करें तो माओवादी ज्यादा घातक हैं। आतंकवादी तो पहचान में आ जाएंगे, क्योंकि वे हमेशा आमने-सामने की लड़ाई करते हैं, जबकि माओवादी हमेशा कायरों की भांति छुपकर गुरिल्ला युद्ध करते हैं। जब अकेले पाते हैं तो पीठ में छुरा भोंक कर चले जाते हैं। माओवादियों की पहचान करनी बहुत मुश्किल है। इस कारण इनसे लड़ाई इन्हीं की भाषा में ही की जा सकती है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

अवसरों का जनतंत्र है अमृतकाल...
Published / 2023-04-22 19:35:59
अवसरों का जनतंत्र है अमृतकाल...

प्रो संजय द्विवेदी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजादी के अमृत महोत्सव से अमृतकाल की यात्रा में देश आत्मविश्वास से भरा हुआ है। यह आत्मविश्वास 2014 के बाद हर भारतवासी में आया है जो कुछ समय पहले तक अवसाद और निराशा से घिरा था। भरोसा जगाने वाला यह समय हमें जगा कर कुछ कह गया और लोग राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को रेखांकित और पुनर्पारिभाषित करने लगे।इस देश का कुछ नहीं हो सकता से यह देश सब कुछ कर सकता है तक हम पहुंचे हैं। यह साधारण नहीं है कि कल तक राजनीतिक-प्रशासनिक जड़ता, निर्णयहीनता, नकारात्मक राजनीति और अवसाद से घिरा भारत अवसरों के जनतंत्र में बदलता दिख रहा है। यह आकांक्षावान भारत है। उम्मीदों से घिरा भारत है। अपने सपनों की ओर दौड़ लगाता भारत है। लक्ष्यनिष्ठ भारत है। कर्तव्यनिष्ठ भारत है। यह सिर्फ अधिकारों के लिए लड़ने वाला नहीं, बल्कि कर्तव्यबोध से भरा भारत है। ये वक्त हमारा है : सही मायनों में यह भारत का समय है। भारत में बैठकर शायद कम महसूस हो किंतु दुनिया के ताकतवर देशों में जाकर भारत की शक्ति और उसके बारे में की जा रही बातें महसूस की जा सकती हैं। सांप-संपेरों के देश की कहानियां अब पुरानी बातें हैं। भारत पांचवीं बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में विश्व मंच पर अपनी गाथा स्वयं कह रहा है। अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति, कूटनीति, डिजिटलीकरण से लेकर मनोरंजन के मंच पर सफलता की कहानियां कह रहा है। सबसे ज्यादा आबादी के साथ हम सर्वाधिक संभावनाओं वाले देश भी बन गए हैं, जिसकी क्षमताओं का दोहन होना अभी शेष है। भारत के एक अरब लोग नौजवान यानी 35 साल से कम आयु के हैं। स्टार्टअप इको सिस्टम, जलवायु परिवर्तन के लिए किए जा प्रयासों, कोविड के विरुद्ध जुटाई गई व्यवस्थाएं, जी 20 के अध्यक्ष के नाते मिले अवसर, जीवंत लोकतंत्र, स्वतंत्र मीडिया हमें खास बनाते हैं। चुनौतियों से जूझने की क्षमता भारत दिखा चुका है। संकटों से पार पाने की संकल्प शक्ति वह व्यक्त कर चुका है। अब बात है उसके सर्वश्रेष्ठ होने की। अव्वल होने की। दुनिया को कुछ देने की। नये भारत के शिल्पकार : निश्चित यह सब कुछ इतना आसान नहीं था। नौकरशाही की जड़ता, राजनीति के सीमित पांच साला लक्ष्य, समाज में फैली गैरबराबरी और असमानता, क्षेत्रीयता, जातीयता की भावनाओं में बंटा समाज लक्ष्यों में बाधक था और आज भी कमोबेश ये संकट बने हुए हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय मंच पर आगमन के साथ सारा कुछ बदल गया है। आम आदमी सरकारी प्रयासों के साथ देश के व्यापक लोकतंत्रीकरण में सहायक बना है। भारत सड़क, रेलवे, बंदरगाह और हवाई अड्डे जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण के साथ साफ्ट पावर में भी अग्रणी बना है। स्थान-स्थान पर भारतीय प्रतिभाओं को खोजकर उन्हें सम्मानित करने का क्रम भी जारी है। इससे भारत की आत्मा जाग रही है। आप पिछले कुछ सालों में पद्म सम्मानों की सूची का अवलोकन करें तो आपका मन गर्व से भर जायेगा और एक नये भारत को बनता हुआ देख पायेंगे। दिल्ली से निकल देश की संभावनाएं छोटे शहरों और गांवों तक ले जाने के व्यापक प्रयास सब तरफ दिखने लगे हैं। छोटे शहर अपनी संभावनाओं को तलाश रहे हैं। गांव संसाधनों का केंद्र बनने के लिए व्यग्र हैं। नीतिगत फैसलों में गति लाकर देश का चेहरा बदलने के ये प्रयास साधारण नहीं हैं। प्रधानमंत्री इस परिघटना को बहुत उम्मीद से देखते हैं। प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं- भारत ने आज जो कुछ हासिल किया है, वह हमारे लोकतंत्र की ताकत, हमारे संस्थानों की ताकत की वजह से संभव हो पाया है। दुनिया देख सकती है कि भारत में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार निर्णायक फैसले ले रही है। हमने दुनिया को दिखा दिया है लोकतंत्र कितना फलदायी हो सकता है। नीयत से बदलती नीतियां : परिर्वतन को रोका नहीं जा सकता। यह नैसर्गिक है। किंतु परिर्वतन या बदलाव की दिशा जरूर तय की जा सकती है। सकारात्मक दृष्टिकोण से किये गये काम हमेशा परिणाम देते हैं और उनसे समाज को दिशा मिलती है। बहुत पुरातन और गौरवशाली राष्ट्र होने के बाद भी हमें अपनी कमियों से लगातार आक्रमण, गुलामी और संघर्ष का समय देखना पड़ा। बावजूद इसके चिति स्वतंत्र रही। राज और समाज की दूरी ने समाज के आत्मसम्मान और स्वाभिमान को चुकने नहीं दिया। अत्याचार और विदेशी शासकों के दमन के विरुद्ध भारत का संघर्ष जारी रहा। 1947 के बाद स्वदेशी, स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता, भारतीय भाषाओं और भारतीय जन के सम्मान का जो समय प्रारंभ होना था वह नहीं हो पाया। लोकसेवक और जनसेवक शासक बन बैठे और उनकी मानसिकता वही थी, जो विरासत में मिली थी। इसने देश के स्वाभिमान को जगने नहीं दिया। लंबे समय के बाद अच्छे काम पर भरोसा करते हुए जनमानस का जागरण हुआ है। अपने वर्तमान नेतृत्व के प्रति समाज का असंदिग्ध विश्वास है और उनकी क्षमताओं पर नाज। आजादी के बाद हर सरकार और उसके प्रधान ने निश्चित ही कुछ जोड़ा है। देश ने प्रगति और विकास के नए सोपान तय किये हैं। किंतु भ्रष्टाचार, दिशाहीनता, राजनीतिक निर्णयों में हानि-लाभ के विचार ने उसके संपूर्ण लाभ से वंचित किया। सामान्य जन के विकास योजनाओं के एक रुपये में पचासी पैसे के डूब जाने की कहानियां हमने खूब सुनी हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री की विवशता भी प्रकट होती है कि वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि भ्रष्टाचार का घुन अंदर तक प्रवेश कर चुका है।डिजिटलीकरण ने इस पर न सिर्फ अंकुश लगाया है, वरन लोगों को राहत दी है। सुशासन के लक्ष्य इसी पारदर्शिता से पाये जा सकते हैं। 2015 से 2017 के बीच 50 करोड़ बैंक खाते खोले गये हैं। भारत आज यूरोप और अमेरीका की तुलना में 11 गुना ज्यादा डिजिटल पेमेंट करता है। आयुष्मान भारत ने 31 करोड़ भारतीयों के लिए मुफ्त कैंसर जांच की व्यवस्था सुनिश्चित की है। यह एक साधारण आंकड़ा भर नहीं है। नई व्यवस्था में स्वयं सहायता समूहों में लगभग 9 करोड़ महिलाओं को 32 अरब डालर (2.6 लाख करोड़ रुपये) की उधार सुविधा दी जा रही है। ऐसे अनेक उदाहरण हमें गर्व से भर देते हैं। इसी संदर्भ में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं-2014 के पहले देश के 60 करोड़ लोग सपना नहीं देख सकते थे। प्रधानमंत्री ने उनके जीवन में उम्मीद जगाई है और उनमें महत्वाकांक्षाएं पैदा की हैं। भारत जब आजादी का शताब्दी उत्सव मना रहा होगा तो वह हर क्षेत्र में नंबर-1 होगा। उम्मीद जगाता नया भारत : नया भारत अपने सपनों में रंग भरने के लिए चल पड़ा है। भारत सरकार की विकास योजनाओं और उसके संकल्पों का चातुर्दिक असर दिखने लगा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, अटक से कटक तक उत्साह से भरे हिंदुस्तानी दिखने लगे हैं। जाति,पंथ, भाषावाद, क्षेत्रीयता की बाधाओं को तोड़ता नया भारत बुलंदियों की ओर है। नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत की सुनें तो 2070 तक हम बाकी दुनिया को 20-30 प्रतिशत वर्कफोर्स उपलब्ध करवा सकते हैं और यह बड़ा मौका है। ऐसे अनेक विचार भारत की संभावनों को बता रहे हैं। अपनी अनेक जटिल समस्याओं से जूझता, उनके समाधान खोजता भारत अपना पुनर्अविष्कार कर रहा है। जड़ों से जुड़े रहकर भी वह वैश्विक बनना चाहता है। उसकी सोच और यात्रा ग्लोबल नागरिक गढ़ने की है। यह वैश्चिक चेतना ही उसे समावेशी, सरोकारी, आत्मीय और लोकतांत्रिक बना रही है। लोगों का स्वीकार और उनके सुख का विस्तार भारत की संस्कृति रही है। वह अतिथि देवो भव: को मानता है और आंक्राताओं का प्रतिकार भी करना चाहता है। अपनी परंपरा से जुड़कर वैश्विक सुख, शांति और साफ्टपावर का केंद्र भी बनना चाहता है। हमारे प्रधानमंत्री इसीलिए भरोसे से यह कह पाते हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है। यह समय देश की रचनात्मकता, विश्वसनीयता और क्षमता को प्रकट करने वाला है। यही समय भारत का भी है और भारतबोध का भी। आइए इन सपनों को पूरा करने के लिए भगीरथ प्रयत्नों में अपना भी योगदान सुनिश्चित करें। हमारे छोटे किंतु समन्वित प्रयासों से भारत मां फिर से जगद्गुरु के आसन पर आसीन होंगी और अपने आशीष की हम सब पर वर्षा करेंगी। (लेखक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।)

कर्नाटक में भाजपा हार भी सकती है...
Published / 2023-04-20 21:37:32
कर्नाटक में भाजपा हार भी सकती है...

ईमानदार का टिकट कटा, बेइमानों के पौ बारह रमेश सर्राफ धमोरा एबीएन एडिटोरिलय डेस्क। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए 10 मई को वोट डाले जाएंगे। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं। अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। उससे पूर्व कर्नाटक विधानसभा के चुनाव परिणाम देश की राजनीति में महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होगें।भाजपा ने सत्ता विरोधी माहौल को समाप्त करने के लिए 52 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर उनके स्थान पर नए चेहरों को मौका दिया है। भाजपा ने पार्टी संस्थापकों में से एक रहे पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार एवं पूर्व उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी का भी टिकट काट दिया है। भाजपा के बड़े नेता रहे के अंगारा, आर शंकर और एमपी कुमार स्वामी ने भी टिकट नहीं मिलने पर इस्तीफा दे दिया है। जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। जगदीश शेट्टार 6 बार विधायक, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री सहित कई बार मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं। इतने लंबे राजनीतिक जीवन में उन पर कभी किसी तरह के आरोप नहीं लगे हैं। बीएस येदुरप्पा के बाद वह लिंगायत समुदाय के दूसरे सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। बीएस येदुरप्पा एवं ईश्वरप्पा के इस बार चुनावी मैदान में नहीं होने से पार्टी के पास बड़े चेहरे का अभाव है। कांग्रेस चाहती है कि किसी भी तरह से भाजपा को हरा कर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई जाए ताकि पार्टी के गिरते जनाधार को रोका जा सके। कर्नाटक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे का गृह राज्य है। उनकी सदा से ही मुख्यमंत्री बनने की चाहत रही है जो इस बार सरकार बनने पर पूरी हो सकती है।वैसे भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद मल्लिकार्जुन खरगे के सामने अपने गृह प्रदेश में सरकार बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। कांग्रेस चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के प्रयास कर रही है। जनता दल सेक्युलर मैसूरू इलाके में अपना मजबूत जनाधार रखती है। प्रदेश की 100 सीटों पर जनता दल सेक्युलर चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की ताकत रखती है। जनता दल सेक्युलर ने किसी भी राजनीतिक दल से चुनावी समझौता नहीं किया है। उनका मानना है कि चुनाव में पिछले बार की तरह किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसे में वह अपने जीते हुए विधायकों के बल पर सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगी। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को एक करोड़ 33 लाख 28 हजार 524 वोट यानी 36.35 प्रतिशत मतों के साथ 104 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को एक करोड़ 39 लाख 86 हजार 526 वोट यानी 38.14 प्रतिशत वोटों के साथ 80 सीटों पर जीत मिली थी। जनता दल सेक्युलर को 67 लाख 26 हजार 667 वोट यानी 18.30 प्रतिशत वोटों के साथ 37 सीटों पर जीत मिली थी। पिछले चुनाव में कांग्रेस भाजपा से 6 लाख 58 हजार दो वोट यानी 1.70 प्रतिशत अधिक मत लेकर भी सीटों के मामले में 24 सीटों से पिछड़ गई थी। इसका मुख्य कारण था जनता दल सेकुलर का कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाना। पिछले चुनाव में कांग्रेस के पास कर्नाटक के सबसे प्रभावशाली लिंगायत समुदाय का कोई बड़ा नेता भी नहीं था, लेकिन इस बार जगदीश शेट्टार के आने से कांग्रेस को लिंगायत समुदाय के वोट बैंक में सेंध लगाने का एक बड़ा हथियार मिल गया है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के पास पर्याप्त बहुमत नहीं था। ऐसे में कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर ने मिलकर जनता दल सक्युलर के नेता एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में सरकार का गठन कर लिया था। मगर 14 महीने बाद ही भाजपा ने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के विधायकों से इस्तीफे दिलवा कर जोड़-तोड़ से अपनी सरकार बना ली थी। उस समय येदुरप्पा भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री बने थे। मगर येदुरप्पा की मनमानी व उनके शासनकाल में भ्रष्टाचार को लेकर लगे आरोपों के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा और जुलाई 2021 में बसवराज बोम्मई को भाजपा ने नया मुख्यमंत्री बनाया। बोम्मई मुख्यमंत्री बन गए मगर सरकार पर पूरा प्रभाव येद्दयुरप्पा का ही रहा। 2019 में जोड़-तोड़ कर सरकार बनाने के बाद से ही कर्नाटक भाजपा में लगातार उथल पुथल होती रही है। चुनाव से पहले कई बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने से भाजपा मुश्किलों में घिरी नजर आ रही है। पिछले साल तुमकुर जिले के एक ठेकेदार ने तब के मंत्री ईश्वरप्पा पर रिश्वत लेने का आरोप लगाकर आत्महत्या कर ली थी। जिसके चलते ईश्वरप्पा को राज्य मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। हालांकि बाद में जांच कर ईश्वरप्पा को बरी कर दिया गया था। इसी के चलते इस बार ईश्वरप्पा को टिकट से वंचित रखा गया है। हालांकि भाजपा गुजरात की तर्ज पर अधिकांश विधायकों के टिकट काटना चाहती थी, लेकिन येदुरप्पा के विरोध के चलते ऐसा नहीं कर पायी। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में इस बार जहां भाजपा सत्ता विरोधी लहर के चलते बचाव की मुद्रा में है। वहीं कांग्रेस सहित जनता दल सेक्युलर एवं अन्य विपक्षी दल पूरी तरह सरकार पर हमलावर हो रहे हैं। कांग्रेस में भी पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया व प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के मध्य गुटबाजी चल रही है। कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी विधानसभा के अंदर अश्लील वीडियो देखते पकड़े जा चुके हैं। उनकी छवि विवादास्पद रही है। ऊपर से दूसरे दलों से आए लोगों को कांग्रेस ने टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार दिया है। इससे पार्टी में आंतरिक झगड़े बढ़ गए हैं। कांग्रेस में भी जिन लोगों के टिकट काटे गए हैं वह सभी पार्टी की खिलाफत करते नजर आ रहे हैं। इससे कांग्रेस को भी नुकसान होना तय माना जा रहा है। जनता दल सेकुलर जितनी अधिक सीटों पर मजबूत होगी उतना ही कांग्रेस को नुकसान होगा। यही भाजपा की जीत का मूल मंत्र बनेगा। भाजपा का पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास के चेहरे पर फोकस रहेगा। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

सबसे व्यापक और प्रचंड अवतार है भगवान परशुराम का
Published / 2023-04-20 21:35:13
सबसे व्यापक और प्रचंड अवतार है भगवान परशुराम का

अवतरण दिवस- अक्षय तृतीया पर विशेष  रमेश शर्मा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पृथ्वी पर सत्य, धर्म और न्याय की स्थापना के लिए भगवान नारायण ने अनेक अवतार लिए हैं। इनमें परशुराम का अवतार पहला पूर्ण अवतार है। जो सर्वाधिक व्यापक है। संसार का ऐसा कोई कोना, कोई क्षेत्र या कोई देश ऐसा नहीं, जहां भगवान परशुराम की स्मृति या चिह्न नहीं मिलते हों। उन्होंने संसार में शांति और मानवता की स्थापना के लिए पूरी पृथ्वी की सतत यात्राएं कीं। यदि यह कहा जाय कि विश्व में आर्यत्व की स्थापना भगवान परशुराम ने की तो यह सच्चाई का महत्वपूर्ण तथ्य होगा। भगवान परशुराम का चरित्र वैदिक और पौराणिक इतिहास में सबसे प्रचंड और व्यापक है। उन्हें नारायण के दशावतार में छठे क्रम पर माना गया। वे पहले पूर्ण अवतार हैं। उन्हें चिरंजीवी माना गया इसीलिए उनकी उपस्थित हरेक युग में मिलती है। उनका अवतार सतयुग के समापन और त्रेतायुग आरंभ के संधि क्षण में हुआ। वह वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया थी। चूंकि उनका अवतार अक्षय है इसलिए यह तिथि अक्षय तृतीया कहलायी। इस तिथि का प्रत्येक पल शुभ होता है। उनका अवतार एक प्रहर रात्रि के शेष रहते हुआ इसलिए यह ब्रह्म मुहूर्त कहलाया। उनकी उपस्थिति सतयुग के समापन से आरंभ होकर कलियुग के अंत तक रहने वाली है। इतना व्यापक और कालजयी चरित्र किसी देवता, ऋषि अथवा अवतार का नहीं मिलता। उन्होंने ही वह शिव धनुष राजा जनक को दिया था जिसे भंग करके रामजी ने माता सीता का वरण किया। भगवान परशुराम ने ही वह विष्णु धनुष भगवान राम को दिया था जिससे लंकापति रावण का वध हुआ।इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र और गीता का ज्ञान भी देने वाले परशुराम ही हैं। पुराणों में यह भी उल्लेख है कि धर्म रक्षा के लिए कलयुग में कल्कि अवतार होगा तब उन्हें शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान देने के निमित्त भी भगवान परशुराम ही होंगे। भगवान परशुरामजी का अवतार ऋषिकुल में हुआ। भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि थे और माता रेणुका सूर्यवंशी प्रतापी सम्राट राजा रेणु की पुत्री थीं। भगवान परशुराम पांच भाई और एक बहन हैं। उनके सात गुरु है। पहली गुरु माता रेणुका हैं, दूसरे गुरु पिता महर्षि जमदग्नि। तीसरे गुरु महर्षि चायमान, चौथे गुरु महर्षि विश्वामित्र, पांचवें गुरु महर्षि वशिष्ठ, छठे गुरु भगवान शिव और सातवें गुरु भगवान दत्तात्रेय हैं। भगवान शिव की भक्ति तो पूरा संसार करता है पर उनके एक मात्र शिष्य भगवान परशुराम ही हैं। वे मन की गति से भ्रमण करते हैं। इसे मन व्यापक गति कहते हैं। उन्हें चिर यौवन का वरदान है अर्थात वे कभी वृद्ध नहीं होंगे। संसार को श्रीविद्या का ज्ञान भगवान् परशुराम ने दिया। शक्ति की उपासना भी भगवान परशुराम से आरंभ हुई। परशुराम के ज्ञान, साधना, ओजस्विता और तेजस्विता के आगे कोई नहीं ठहर पाया। उनके आगे चारों वेद चलते हैं। पीठ पर अक्षय तीरों से भरा तूणीर रहता है। एक हाथ में शास्त्र हैं तो दूसरे में शस्त्र। वे श्राप देने और दंड देने दोनों में समर्थ हैं। यह क्षमता किसी और अवतार में या ऋषि में नहीं। उन्होंने यदि प्रत्यक्ष युद्ध करके आतताइयों का वध किया है तो तप करके शिवजी को प्रसन्न भी किया है। उन्होंने समाज निर्माण के लिए दो बार विश्व की यात्रा की। ऋषि रूप वेद ऋचाओं का सृजन भी किया है। मध्यकाल में जिस भारत के मान बिंदुओं को कलंकित किया गया उसी प्रकार भारत के आदर्श चरित्र गाथा में अनेक कूटरचित कथाएं जोड़कर विवादास्पद बनाने का कुचक्र चला। आक्रामणकारियों का घोषित नारा था बांटो और राज करो इसके अंतर्गत ही भगवान परशुराम की गाथा में कुछ प्रसंग जोड़े। जो पूरी तरह असत्य और भ्रामक हैं। भगवान परशुराम पर दो आक्षेप लगाये जाते हैं एक तो यह कि उन्होंने क्षत्रियों का क्षय किया दूसरा यह कि वे बहुत क्रोधी थे। ये दोनों आक्षेप असत्य हैं और समाज में भेद पैदा करने के लिए कुछ विदेशी षड्यंत्रकारियों द्वारा रचित हैं ताकि समाज को विभाजित कर भारत को कमजोर किया जा सके। वे अपने षड्यंत्र में कुछ सफल भी हुए, लेकिन अब हमें स्वयं अध्ययन करके समस्त भ्रांतियों का निवारण करना चाहिए। इन दोनों प्रश्नों पर शास्त्रों में पर्याप्त प्रमाण हैं। श्रीमद्भागवत में स्पष्ट है कि दुष्टं क्षत्रम शब्द आया है। अर्थात दुष्ट राज्य। पुराण कथाओं में तीन शब्द आतें हैं क्षत्र, क्षत्रप और क्षत्रिय। इन तीनों शब्दों में अंतर होता है। क्षत्र यानि राज्य, क्षत्रप यानि राजा और क्षत्रिय यानि राज्य के लिए समर्पित। यदि शब्द दुष्ट क्षत्रम् है तो उसका अर्थ हुआ ऐसे राज्य जो दुष्टता करते थे। महाभारत के एक प्रसंग में भगवान् शिव ने आदेश दिया कि तुम मेरे समस्त शत्रुओं का वध करो। संस्कृत में शब्द चाहे क्षत्र आया हो या क्षत्रप लेकिन हिंदी अनुवाद में सीधा क्षत्रिय ही करके भ्रम फैलाया गया। परशुराम के संदर्भ में क्षत्रिय शब्द का वर्णन पहली बार कालिदास के रघुवंश में हुआ और यहीं से ने क्षत्रिय विनाश के किस्से चल पड़े। इसके बाद जो साहित्य रचा गया उसमें इसके वर्णन में विस्तार होता गया। भला बताइये भगवान परशुराम नारायण के अवतार हैं। क्षत्रिय की उत्पत्ति नारायण के बाहुओं से हुई तो क्या नारायण स्वयं अपनी बाहुओं का विनाश करने के लिए अवतार लेंगे?इसके अतिरिक्त उनकी माता देवी रेणुका क्षत्रिय, उनकी दादी देवी सत्यवती क्षत्रिय, भृगु वंश की अनेक ऋषि कन्याएं क्षत्रियों को ब्याहीं तब भला कैसे वे क्षत्रिय विरोधी अभियान छेड़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त एक बात और नारायण जब भी अवतार लेते हैं, उनके अवतार का कहीं न कहीं निमित्त होता है। यदि किसी अवतार में पत्नी वियोग होना है, वानरों का साथ लेना है, एक ही विवाह करना या एक से अधिक विवाह करना या रणछोड़ का आक्षेप लगना सब निर्धारित होता है। इसीलिए नारायण के अवतार के कार्यों को कर्म नहीं लीला कहा जाता है। नारायण के किसी प्रसंग में किसी शास्त्र में यह उल्लेख नहीं आया कि कभी वे क्षत्रिय हंता बनेंगे। अतएव यह भ्रामक बात समाज को मन से निकालनी होगी। समाज को बांटने के यूं भी कम षड्यंत्र नहीं हो रहे हैं। अतएव हमें सत्य को समझना चाहिए। भगवान परशुराम से संबंधित प्रसंग पूरे विश्व में मिलते हैं। उनके विभिन्न नामों में एक नाम भृगुराम भी है। यह शब्द अपभ्रंश होगा बगराम बना। अफगानिस्तान में भी बगराम नामक स्थान है यहां विमानतल भी बना है। एक बगराम नगर ईराक में भी है। लैटिन अमेरिका की खुदाई में श्रीयंत्र जैसी आकृति निकली है। भगवान परशुराम के कहने पर मय दानव पाताल गया था। संभवत: मय दानव से ही लैटिन अमेरिका की "मायन सभ्यता" विकसित हुई होगी। रोम की खुदाई में पत्थर पर उकेरी गई एक ऐसी आकृति निकली जिसके कंधे पर धनुष बाण है और परशु जैसा शस्त्र भी। यद्यपि इस आकृति के सिर पर टोप तो रोमन ही, पर परशु और धनुष बाण धारण करने वाले एक मात्र परशुराम हैं। संभव है कि रूस नाम ऋषिका का अपभ्रंश हो। पर इस पर व्यापक शोध की आवश्यकता है। मैक्समूलर की पुस्तक हम भारत से क्या सीखें के अनुसार संसार का ज्ञान भारत से ईरान पहुंचा और ईरान से पूरे विश्व में। इस कथन से यह धारणा प्रबल होती है कि विश्व में जो परशुराम से मिलते जुलते शब्द या चिह्न मिलते हैं वे सब परशुराम से ही संबंधित हो सकते हैं। इस प्रकार भगवान परशुराम अवतार विश्व व्यापक है, सबसे प्रचंड है और संसार में अधर्म का नाश करके सत्य की स्थापना करने वाला है। (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

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