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शिक्षक का जीवन राष्ट्र के लिए अतुलनीय पाथेय
Published / 2023-09-05 18:11:16
शिक्षक का जीवन राष्ट्र के लिए अतुलनीय पाथेय

शिक्षक दिवस/5 सितंबर विशेष डॉ वंदना सेन एबीएन एडिटोरियल डेस्क। व्यक्ति जीवन भर शिक्षा ग्रहण करता है, तब भी शिक्षा का कोई न कोई अध्याय अधूरा ही रह जाता है। लेकिन भारत के राष्ट्र निर्माता कहे जाने वाले शिक्षक अपने शिष्य में अपनी छवि का दर्शन देखना चाहते हैं। शिक्षक वही है, जो अपने अनुसार देश का चरित्र निर्माण कर सके। अपने देश के संस्कारों को देश की भावी पीढ़ी में उतार सके। शिक्षा वही सार्थक होती है, जो अपने देश के लिए चरित्रवान समाज और सकारात्मक सोच का निर्माण कर सके। भारत में अभी तक जो शिक्षा दी जा रही थी, उसमें भारत के मानबिन्दुओं का उपहास उड़ाया गया और विदेशियों का गुणगान किया गया। इसमें ऐसे भी विदेशी शामिल किये गये, जिन्होंने भारतीयता को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे चरित्रों के पठन पाठन से ही आज की पीढ़ी भारत के संस्कारों से दूर होती जा रही है। लेकिन हमारे देश के शिक्षकों को भी यह समझना चाहिए कि छात्रों को क्या शिक्षा दी जाये।हमारे देश में शिक्षाविद् डॉ राधाकृष्णन के जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन आज के विद्यार्थियों को यह भी नहीं पता होगा कि डॉ राधाकृष्णन जी के जीवन शिक्षकों के लिए एक आदर्श है, एक पाथेय है। जिस पर चलकर हम शिक्षक की वास्तविक भूमिका का सही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। उनके जीवन पर एक नजर डालते हैं। सन 1962 में जब डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने, तब उनके कुछ विद्यार्थी उनके पास उनका जन्मदिन मनाने की स्वीकृति लेने गये। उस समय राधाकृष्णन जी ने कहा मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे अति प्रसन्नता एवं गर्व महसूस होगा। डॉ राधाकृष्णन का शिक्षकों के बारे में मत था कि शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे। वास्तविक शिक्षक तो वह है जो छात्र को आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे। आज की शिक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि जीवन में पैसे कैसे कमाए जाते हैं, इसे ही ध्यान में रखकर दी जा रही है। कहा जा सकता कि जो शिक्षा दे रहे हैं, वे इसे व्यवसाय मान रहे हैं और जो ग्रहण कर रहे वे इसे आय प्राप्त करने का साधन। ऐसी शिक्षा चरित्र का निर्माण नहीं कर सकती। इसलिए शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों को ऐसी शिक्षा भी दें, जो उनके जीवन को संवार सके। क्योंकि जिस शिक्षा से संस्कारों का निर्माण होता है, वही जीवन के काम आती है। शिक्षा वही सार्थक होती है, जो जीवन में नैतिक मूल्यों का विकास करे, इसके साथ ही सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति कर्तव्य पालन का बोध कराए। राष्ट्रीय दायित्व का बोध केवल इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों के अध्ययन और अध्यापन से ही हो सकता है। वर्तमान में यह देखने में आ रहा है कि हम शिक्षा तो ग्रहण कर रहे हैं, लेकिन पिछले पाठों को भूलते जा रहे हैं। इसका एक मूल कारण हमारे देश की शिक्षा नीति भी रही है। आज से 75 वर्ष पूर्व जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी शिक्षा नीति को भारतीय बनाने पर जितना जोर दिया जाना चाहिए, उतना नहीं दिया गया। शिक्षा के क्षेत्र में हम पूरी तरह से भटक गए। इसलिए आज की पीढ़ी में न तो भारतीय संस्कारों का बोध है और न ही नैतिकता के जीवन मूल्य ही हैं।हम भली भांति जानते हैं कि पुरातन काल में भारतीय गुरुकुलों में जो शिक्षा प्रदान की जाती थी, वह निश्चित रूप से बच्चों का समग्र विकास करने वाली ही थी। इतना ही नहीं वह शिक्षा विश्व स्तरीय ज्ञान का द्योतक भी थी, इसलिए विश्व के कई देश भारत के शिक्षालयों में ज्ञान और विज्ञान की उच्चस्तरीय शिक्षा ग्रहण करने आते थे। हमें अब उसी शिक्षा पद्धति की ओर कदम बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। अभी भारत सरकार ने इस दिशा में सार्थक कदम बढ़ाया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इंडिया को भारत बनाने में सकारात्मक सिद्ध होगी, यह संकेत दिखाई देने लगे हैं। शिक्षकों को भी चाहिए कि वह इस नीति को आत्मसात कर बच्चों के भविष्य को वह दिशा प्रदान करें जो विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। जिनकी याद में हम शिक्षक दिवस मनाते हैं, वे चाहते थे कि शिक्षा विद्यार्थियों को सही और गलत का बोध कराने वाली होना चाहिए। वास्तव में डॉ राधाकृष्णन जी भारतीय संस्कृति के संवाहक थे। उन्होंने अपने लेखों और प्रबोधन के माध्यम से भारतीय संस्कृति की सुगंध को हमेशा ही प्रवाहित किया। एक बार शिकागो विश्वविद्यालय में उनको धर्म पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया। जहां उन्होंने भारत के ज्ञान के बारे में प्रेरणास्पद उद्बोधन दिया। इस उद्बोधन के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन जी की ख्याति वैश्विक धरातल पर और भी बढ़ती चली गई और इसी कारण उन्हें भारत एवं अन्य देशों की प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। उसके बाद विश्व में भारत का गौरव गान होने लगा। उनके भाषणों में सिर्फ भारत ही होता था। वह जब बोलते थे तब ऐसा लगता था कि यही भारत की वाणी है। वह वास्तव में भारत रत्न थे। इसलिए भारत सरकार ने सन 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। शिक्षा अत्यंत ही अनमोल एवं मूल्यवान है। जिससे विद्यार्थी अपने स्वयं के ज्ञान का विस्तार तो करता ही है, साथ ही देश को भी मजबूत करता है। डॉ राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक आधुनिक भारत के राजनीतिक विचारक में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शिक्षकों और शिक्षा के महत्व को बताया है। डॉक्टर राधाकृष्णन के अनुसार शिक्षक देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसी वजह से हुए अधिक सम्मान के योग्य होते हैं। भारत में सनातन काल से गुरु और शिष्य का संबंध समर्पण की भावना से परिपूर्ण रहा है। गुरु देश के भविष्य को संवारता है। वर्तमान पीढ़ी देश का भविष्य है। गुरु जैसे संस्कार युवा पीढ़ी को देंगे वैसा ही देश का चरित्र बनेगा। (लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

राष्ट्र के प्रकाश स्तंभ होते हैं शिक्षक
Published / 2023-09-05 00:02:57
राष्ट्र के प्रकाश स्तंभ होते हैं शिक्षक

रमेश सर्राफ धमोराएबीएन एडिटोरियल डेस्क। शिक्षक हर व्यक्ति के जीवन की रीढ़ होते हैं। शिक्षक ही है जो विद्यार्थियों को जीवन का नया अर्थ सिखाता है। सही रास्ता दिखाता है। गलत करने से रोकता है। वे बाहर से देख सकते हैं। वे प्रत्येक छात्र की देखभाल करते हैं और उनके विकास की कामना करते हैं। शिक्षकों का सम्मान नहीं करने वाले जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ सकते। शिक्षक बच्चों के व्यक्तित्व को ढालते हैं। वे एकमात्र नि:स्वार्थ व्यक्ति हैं जो खुशी-खुशी बच्चों को अपना सारा ज्ञान देते हैं। शिक्षक बच्चों के जीवन के वास्तविक निमार्ता होते हैं, जो न सिर्फ हमारे जीवन को आकार देते हैं, बल्कि इस काबिल बनाते हैं कि वह पूरी दुनिया में अंधकार होने के बाद भी प्रकाश बिखेरते रहें। शिक्षक समाज में प्रकाश स्तंभ की तरह होता है, जो अपने शिष्यों को सही राह दिखाकर अंधेरे से प्रकाश की और ले जाता है। शिक्षकों के ज्ञान से फैलने वाली रोशनी दूर से ही नजर आने लगती है। इस वजह से हमारा राष्ट्र ढेर सारे प्रकाश स्तंभों से रोशन हो रहा है। इसलिए देश में शिक्षकों को सम्मान दिया जाता है। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच के रिश्तों को सुदृढ़ करने को शिक्षक दिवस एक बड़ा अवसर होता है।दुनिया के एक सौ से अधिक देशों में अलग-अलग समय पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह क्रम 1962 से चल रहा है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा जतायी थी। कहा जाता है कि गुरु के बिना ज्ञान अधूरा रहता है। यह बात बिल्कुल सत्य है। हमारे जीवन में सबसे पहली गुरु तो मां होती है जो हमें जन्म लेते ही हर बातों का ज्ञान कराती है। मगर विद्यार्थी काल में बालक के जीवन में शिक्षक एक ऐसा गुरु होता है जो उसे शिक्षित तो करता ही है साथ ही उसे अच्छे बुरे का ज्ञान भी कराता है। पहले के समय में तो छात्र गुरुकुल में शिक्षक के पास रहकर वर्षों विद्या अध्ययन करते थे। उस दौरान गुरु अपने शिष्यों को विद्या अध्ययन करवाने के साथ ही स्वावलंबी बनने का पाठ भी पढ़ाते थे। इसीलिए कहा गया है कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताये। गुरु का स्थान ईश्वर से भी बड़ा माना गया है, क्योंकि गुरु के माध्यम से ही व्यक्ति ईश्वर को भी प्राप्त करता है।हमारे जीवन को संवारने में शिक्षक एक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सफलता प्राप्ति के लिए वो हमें कई प्रकार से मदद करते है। जैसे हमारे ज्ञान, कौशल के स्तर, विश्वास आदि को बढ़ाते है तथा हमारे जीवन को सही आकार में ढालते है। कबीर दास ने शिक्षक के कार्य को इन पंक्तियो में समझाया है:- गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट, अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।कबीर दास कहते हैं कि शिक्षक एक कुम्हार की तरह है और छात्र पानी के घड़े की तरह। जो उनके द्वारा बनाया जाता है और इसके निर्माण के दौरान वह बाहर से घड़े पर चोट करता है। इसके साथ ही सहारा देने के लिए अपना एक हाथ अंदर भी रखता है। डॉ राधाकृष्णन का जन्म पांच सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही किताबें पढ़ने के शौकीन थे और स्वामी विवेकानंद से काफी प्रभावित थे। उन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष अध्यापन में गुजारे।उनका निधन 17 अप्रैल 1975 को चेन्नई में हुआ था। राधाकृष्णन ने 1909 में चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन में प्रवेश करने के साथ ही दर्शनशास्त्र शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरूआत की थी। उन्होंने बनारस, चेन्नई, कोलकाता, मैसूर जैसे कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों और लंदन के आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाया था। अध्यापन पेशे के प्रति समर्पण की वजह से उन्हें 1949 में विश्वविद्यालय छात्रवृत्ति कमीशन का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।पुराने समय में शिक्षकों को चरण स्पर्श कर सम्मान दिया जाता था। परन्तु आज के समय में शिक्षक और छात्र दोनों ही बदल गये हैं।  पहले शिक्षण एक पेशा न होकर एक उत्साह और एक शौक का कार्य था। पर अब यह मात्र एक आजीविका चलाने का साधन बनकर रह गया है। शिक्षक मार्गदर्शक, गुरु, मित्र होने के साथ ही और कई भूमिकाएं निभाते हैं। यह विद्यार्थी के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने शिक्षक को कैसे परिभाषित करता है। संत तुलसी दास ने इसे अच्छे तरीके से समझाया है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। अर्थात भगवान, गुरु एक व्यक्ति को वैसे ही नजर आएंगे जैसा कि वह सोचेगा। उदाहरण के लिए अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण को अपना मित्र मानते थे। वहीं मीरा बाई भगवान श्रीकृष्ण को अपना प्रेमी। यही बात शिक्षक के ऊपर लागू होती है। इसीलिए कहते हैं कि शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक होता है।हर देश में इस दिवस को मनाने की तारीख अलग-अलग है। चीन में 10 सितंबर तो अमेरिका में छह मई, आॅस्ट्रेलिया में अक्टूबर का अंतिम शुक्रवार, ब्राजील में 15 अक्टूबर और पाकिस्तान में पांच अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। ओमान, सीरिया, मिस्र, लीबिया, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, सऊदी अरब, अल्जीरिया, मोरक्को और कई इस्लामी देशों में 28 फरवरी को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।वर्तमान समय में शिक्षकों का समाज में सम्मान कम होने लगा है। बहुत से शिक्षकों की घटिया हरकतों ने उनको समाज की नजरों से गिरा दिया है। मौजूदा दौर में शिष्य भी कुछ कम नहीं हैं। छात्रों की अनुशासनहीना के चलते स्कूल, कालेजों में शिक्षा का वातावरण समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में गुरु-शिष्य को एक-दूसरे की भावनाओं को समझ कर मिल-जुल कर ज्ञान की ज्योति जलानी होगी। शिक्षक दिवस मनाने के साथ हमें शिक्षण कार्य की पवित्रता को फिर से बहाल करने की प्रतिज्ञा भी लेनी होगी। तभी हमारा शिक्षक दिवस मनाना सार्थक हो पायेगा। (लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

जीवन जीने का सलीका सिखाते हैं शिक्षक
Published / 2023-09-04 23:56:35
जीवन जीने का सलीका सिखाते हैं शिक्षक

शिक्षक दिवस/5 सितंबर/विशेषयोगेश कुमार गोयलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्वभर में लगभग सभी महापुरुषों ने शिक्षकों को राष्ट्र निमार्ता की संज्ञा दी है। गुरु रूपी इन्हीं शिक्षकों को सम्मान देने के लिए प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह एकमात्र ऐसा दिन है, जब छात्र अपने शिक्षकों अर्थात गुरुओं को उपहार देते हैं। पहले जहां गुरुकुल परंपरा हुआ करती थी और उस समय जीवन की व्यावहारिक शिक्षा इन्हीं गुरुकुल में गुरु दिया करते थे।आज नये जमाने में गुरुओं का वही अहम कार्य शिक्षक पूरा कर रहे हैं, जो छात्रों के सच्चे मार्गदर्शक बनकर उन्हें स्कूल से लेकर कॉलेज तक वह शिक्षा देते हैं, जो उन्हें जीवन में बुलंदियों तक पहुंचाने में सहायक बनती है। आज भले ही शिक्षा प्राप्त करने या ज्ञानोपार्जन के लिए अनेक तकनीकी साधन सुलभ हैं किन्तु एक अच्छे शिक्षक की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। जिस प्रकार एक अच्छा शिल्पकार किसी भी पत्थर को तराशकर उसे खूबसूरत रूप दे सकता है और एक कुम्हार गीली मिट्टी को सही आकार प्रदान कर सही आकार के खूबसूरत बर्तन बनाता है, समाज में वही भूमिका एक शिक्षक अदा करता है, इसीलिए शिक्षक को समाज के असली शिल्पकार का भी दर्जा दिया जाता है। इतिहास ऐसे शिक्षकों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपनी शिक्षा से अनेक लोगों के जीवन की दिशा ही बदल दी।भारत के प्रथम उप राष्ट्रपति एवं द्वितीय राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के अवसर पर भारत में प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 13 मई 1962 को राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति बने और उसी वर्ष उनके कुछ छात्र उनका जन्मदिन मनाने के उद्देश्य से उनके पास गए तो उन्होंने उन छात्रों को परामर्श दिया कि उनके जन्मदिन को अध्यापन के प्रति उनके समर्पण के लिए शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाये और इस प्रकार 5 सितंबर 1962 से ही देश में यह दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। 5 सितंबर 1888 को एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मे डॉ राधाकृष्णन ने अपने जीवनकाल के 40 वर्ष एक आदर्श शिक्षक के रूप में समर्पित कर दिये। मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने मैसूर यूनिवर्सिटी, कलकत्ता यूनिवर्सिटी तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और लंदन में आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी दर्शन शास्त्र पढ़ाया। 1931 में किंग जॉर्ज पंचम ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि प्रदान की किन्तु उन्होंने देश की आजादी के बाद अपने नाम के साथ सर लगाना बंद कर दिया। राधाकृष्णन 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे और 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।1962 में ब्रिटिश अकादमी का सदस्य बनने पर उन्हें गोल्डन स्पर, इंग्लैंड के आर्डर आफ मैरिट तथा 1975 में मरणोपरांत अमेरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डॉ राधाकृष्णन एक महान् दार्शनिक और आदर्श शिक्षक होने के साथ-साथ राजनीति में भी प्रवीण थे।दर्शन शास्त्र जैसे गंभीर विषय को भी डॉ राधाकृष्णन अपनी अद्भुत शैली से बेहद सरल और रोचक बना देते थे। जिस विषय का वे अध्यापन करते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। डॉ राधाकृष्णन अपने व्याख्यानों के साथ-साथ विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से छात्रों को उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में समाहित करने के लिए प्रेरित कर उनका बेहतर मार्गदर्शन भी करते थे। उनका कहना था कि हमें अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि शिक्षक के बिना इस दुनिया में हम सभी अधूरे हैं। शिक्षक ही हैं, जो देश के भविष्य के वास्तविक आकृतिकार हैं और हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। राधाकृष्णन का कहना था कि हमें मानवता को उन नैतिक जड़ों तक वापस ले जाना चाहिए, जहां से अनुशासन और स्वतंत्रता दोनों का उद्गम हो। उनका कथन स्पष्ट था कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होगा और शिक्षा को एक मिशन के रूप में नहीं अपनायेगा, तब तक अच्छी और उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।आज हम हर बच्चे को महंगी उत्कृष्ट आधुनिक शिक्षा के जरिये टॉपर बनाकर बड़ा डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनाने का सपना संजोये रहते हैं और भूलते जा रहे हैं कि उसे जीवन की बुलंदियों पर पहुंचाने के साथ-साथ एक अच्छा इंसान बनाना भी बेहद जरूरी है और इसके लिए हर बच्चे को नैतिक, भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शिक्षा दिये जाने की भी आवश्यकता है ताकि बच्चे अपने विवेक से बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने और समाज को सही दिशा देने में सक्षम बनें। डॉ राधाकृष्णन का मानना था कि यदि सही तरीके से शिक्षा प्रदान की जाए तो समाज की अनेक बुराइयों का समूल नाश किया जा सकता है। एक सभ्य, सुसंस्कारित, सुंदर एवं शांतिपूर्ण समाज के निर्माण के लिए शिक्षक दिवस के अवसर पर डॉ राधाकृष्णन के आदर्शों, उनकी शिक्षाओं तथा जीवन मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

समुन्नत भारत के निर्माण में रामचरितमानस की भूमिका
Published / 2023-08-22 19:28:50
समुन्नत भारत के निर्माण में रामचरितमानस की भूमिका

आगामी 23 अगस्त 2023 को तुलसी जयंती के उपलक्ष्य पर प्रकाशनार्थ सादर प्रेषित... डॉ हाराधन कोईरीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। साहित्य मनुष्य की आंतरिक अनुभूतियों और संवेदनाओं का अभिव्यक्त रूप होता है। यह माना जाता है कि मानव की आंतरिक भावनाएं समान होती हैं। उसकी महसूस करने तथा भाव प्रकट करने की शक्ति भी सार्वभौमिक है। शोक, हर्ष, घृणा क्रोध, प्रेम और वात्सल्य जैसे अनेक भाव विश्व-मानव में समान पाये जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप साहित्य का मूलभूत ढांचा सभी भाषाओं में एक-सा दिखाई देता है। हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को स्वर्णयुग कहा गया है। इस युग को कबीर, जायसी, सूर, तुलसी जैसे कवियों ने अपनी काव्य-प्रतिभा से विभूूषित किया है। रामाश्री शाखा के कवियों में गोस्वामी तुलसीदास का सर्वोच्य स्थान है। रामचरितमानस उनकी सर्वाधिक उत्कृष्ट व पठनीय कृति है। उन्होंने लोकमंगल की भावना से प्ररित होकर राम के मंगलमय चरित्र का गान प्राय: सभी रचनाओं में किया है। रामचरितमानस लोक-व्यवहार का संचित कोश है। जिसमें गृहस्थ जीवन, संयुक्त परिवार, पति-पत्नी धर्म, भातृत्व प्रेम, सदाचार की नीति के साथ-ही-साथ आदर्श राजधर्म के श्रुति सम्मत सिद्धांत हैं। तुलसीदास को अपने युग की परिस्थितियों का गहरा अनुभव था। युगीन विशमताओं और विसंगतियों को ठीक से पहचाना था। इन सबको देखकर, परखकर ही उन्होंने रामचरितमानस जैसे काव्य का प्रणयन किया। जिसके माध्यम से हताश भारतीय जनता के मन में नवोन्मेष का संचार किया। आपसी भेद-भाव और वैमनस्य को भुलाकर बिखरी हुई जन-शक्तियों को संगठित किया। उनकी इस असाधारण जीवनदृष्टि एवं लोकचेतना को देखते हुए डॉ आनंद नारायण शर्मा लिखते हैं- तुलसी पर हिंदी भाषा ही नहीं, समूचे भारतवर्ष को गर्व है, उसी प्रकार जिस प्रकार शेक्सपियर पर इंगलैंड को गर्व है। हां, यह और बात है कि दूसरे प्रबुद्ध राष्ट्रों की तरह अपनी चीजों पर गर्व करना भी हम अभी नहीं सीख पाये हैं। रामचरितमानस में तुलसीदास राम के मनुज रूप लेने कारणों का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होने लगता है, अभिमानियों का वर्चस्व बढ़ने लगता है, विप्र (विवेक प्रधान व्यक्ति), गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाने लगती है, तब-तब वे मनुष्य रूप धारण करते हैं। यथा- जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।। करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।। तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।। भारत की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में हर पांच साल में नई सरकार बनती है, परंतु गौ, पुथ्वी और विप्र का कल्याण नहीं होेता वरन् अभिमानियों का वर्चस्व बढ़ता है। सामाजिक वैमनस्य घटने के बजाय बढ़ने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में रामचरितमानस के सान्निध्य में जाना समुन्नत भारत के निर्माण में निश्चय ही सहायक होगा। तुलसी के दशरथ और राम यद्यपि पुरानी शासन-व्यवस्था के राजा हैं, ताथपि वे आधुनिक लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप लगते हैं। राजा दशरथ राम का राज्याभिषेक अपने अधिकार से कर सकते थे, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। जनता-जनार्दन की भावनाओं पर छोड़ दिया और कहा आप सबको जैसा उचित लगे कीजिए। यथा जौं पांचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियं रामहि टीका।। इतना ही नहीं जब राम चैदह वर्ष का वनवास बिताकर अयोध्या को आये और राज्य के सिंहासन पर बैठे, तब उन्होंने किसी पूर्ण अधिकार प्राप्त शासक (अधिनायक) की भाँति मनमाना आचरण, (निरंकुशता) स्वेच्छाचारिता, तानाशाही को नहीं अपनाया, बल्कि उन्होंने जनमानस को पूरी छूट दे दी। साथ-ही कहा कि यदि मैं राजधर्म के विरूद्ध राज करूं तो आप सभी निर्भय होकर अपनी बात कहिए। यथा- जौं अनीति कहु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।। आज जन भावनाओं को दबाया जाता है, उन पर जबर्दस्ती कानून थोपे जाते हैं, ताकि वह सुगबुगाहट करने के लायक भी नहीं बचे। ऐसे समय में समुन्नत भारत का निर्माण कैसे संभव है? यह तभी संभव है जब भारतीय जतमानस पुन: राम के दिखाये, सुझाये आदर्शों पर चलने लगेंगे। भौतिक साधनों की अधिकता, वैज्ञानिक उपक्रमों की प्रचुरता से ही मानवता का कल्याण नहीं हो सकता है। रामचरितमानस में लंका वैज्ञानिक उपलब्धि और समृद्धि का प्रतीक है। किंतु वैज्ञानिक उपलब्धियों के ऊपर रावण जैसे अधर्मी शासक की शासन-व्यवस्था हो तो वहां पर शोषण, स्त्री पर अत्याचार, धर्मचारण करने वाले प्रताड़ित होगें ही। हमें समुन्नत भारत के निर्माण में रावण नहीं राम के आदर्श चाहिए। समुन्नत भारत के निर्माण में एक और सबसे बड़ी बाधा है- जातिवाद की, छुआछूत की। उन्हें समाप्त किये बिना भारत समुन्नत नहीं हो सकता है। राम के वनवास के उपरांत ब्राह्मण श्रेष्ठ वशिष्ठ निषादराज चांडाल से गले मिलते हैं, उन्हें हृदय से लगाते हैं तो दूसरी ओर क्षत्रिय कुलभूषण राम शबरी के जूठे बेर खाते हैं। यह क्या है? यह है परम्परागत जाति व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) पर बड़ा प्रहार। राम शबरी के आश्रम में शबरी का बेर खाते हुए स्पष्ट शब्दों में घोषणा करते हैं कि मैं जात-पात नहीं देखता, वरन् व्यक्ति का आचरण को देखता हूं। यथा- कह रघुपति सुनु भामिनी बाता। मानउं एक भगति कर नाता।। जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।। भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।। जातिवाद, छुआछूत का विरोध तुलसी के मानसेत्तर काव्य में भी मिलता है। यथा- धूत कहौ, अवधूत कहौ, राजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ। काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।। मेरे जाति-पांति न चहौं काहू की जाति-पांति। मेरे कोऊ कामको न हौं काहूके कामको। भारत को समुन्नत बनाने के लिए प्राकृतिक संपदाओं का संरक्षण जरूरी है। परन्तु स्थिति उल्टी है। आज मनुष्य का लालच हावी है। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन जारी है। महात्मा गांधी कहा करते थे कि पृथ्वी मनृष्य की हर जरूरत को पूरा कर सकती है, लेकिन वह मनुष्य की लालच को कभी पूरा नहीं कर सकती। प्रकृति के दोहन का दुष्परिणाम हमारे सामने है। मनुष्य काल के गाल में समा रहा है। सम्पूर्ण मानवता के इतिहास पर संकट मंडरा रहा है। रामराज की स्थिति दूसरी थी। उस समय प्रकृति संरक्षित थी। जैसा तुलसी ने स्पष्ट किया है। यथा- फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग गज पंचानन।। खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।। कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।। आज वन-जंगल भी सुरक्षित नहीं है। इसलिए वन्य जीव-जन्तु गाँवों तक आ जाते हैं। किसानों के धान, फल, सब्जी को नष्ट करते हैं। झारखंड के गांवों में अब तो हाथियों का आना, फसलों को नष्ट करना आम बात हो गयी है। हाथियों के उपद्रव से ग्रामीण जन प्रभावित हैं। इतना ही नहीं पक्षियों का कलरव भी कम हो गया है। अनेक पक्षियों की प्रजाति विलुप्त होने की कगार में हैं उनमें- चील, गिद्ध,  कौआ, गौरेया प्रमुख हैं।आज हमारी नदियां भी सुरक्षित नहीं है। उनका अस्तित्व खतरे में है। नदियों पर कूड़ा-कचड़ा का अम्बार हो गया है। नदियों की स्वेद जल धारा मैली हो गयीं हैं। ऐसे में समुन्नत भारत की कल्पना कैसे संभव है? रामराज में ऐसी स्थिति नहीं थीं। उस समय नदियाँ साफ-सुथरी और संरक्षित थीं। यथा- उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।भारत को उन्नत बनाने के लिए ऋषि संस्कृति के साथ-साथ कृषि संस्कृति को भी बढ़ावा देनी होगी। हमारे देश में आये दिन समाचार पत्रों, न्यूज चैनेलों के माध्यम से पता चलता है कि आमुक किसान ने आत्महत्या की। किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? इसकी पड़ताल जरूरी है। इस देश की विडंबना है कि कृषि-कार्य करने वालों को समाज उनके सीधेपन, भलेपन के कारण उन्हें हमेशा से हेय दृष्टि से देखती आयी है। उन्हें बेवकूप समझा जाता है। समाज व देश में किसानों का मसीहा बनकर अपना स्वार्थ साधना करने वालों की भी कमी नहीं है। मानस में वर्णित किसानों की ऐसी दशा नहीं थी। वे उन्नत और समृद्ध थे। यथा-ससि सम्पन्न सदा रह धरनी। त्रेता भइ कृतयुग कै करनी।कोरोना महामारी वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है। इससे भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व प्रभावित है। इस महामारी ने वैश्विक स्तर पर मानवता के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है। इससे निजात पाने के लिए पूरी दुनिया तत्पर है। कुछ हद तक सफलताएं मिली हैं। पूर्णता की खोज जारी है। रामचरितमानस में चिकित्सीय धर्म का भी एक सुंदर प्रसंग मिलता है। जहाँ मेघनाथ युद्ध-भूमि में छिपकर लक्ष्मण पर शक्ति-बाण चलाता है। लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं। उस समय विभीषण सलाह देते हैं कि लंका में सुषेण नाम का एक वैद्य रहता है, जो इसका उपचार कर सकता है। हनुमान राम की प्ररेणा से वैद्य को लाते हैं। तब सुषेण शत्रु पक्ष का वैद्य होने की बात कहते हुए चिकित्सा करने से मना करता है। तब राम उन्हें चिकित्सीय धर्म को बतलाते हैं। फिर वह लक्ष्मण की चिकित्सा (उपचार) करता है। कोरोना काल में चिकित्सीय धर्म का ह्रास हुआ है। भारत की समुन्नोति के लिए पड़ोसी राज्यों से बेहतर संबंध होना भी जरूरी है। हम आये दिन समाचारों के माध्यम से देखते-सुनते आ रहे हैं कि भारत-पाक सीमा पर तनाव हुआ, गोली-बारी हुई। इसलिए पड़ोसी राज्यों से प्रगाढ़ संबंध हो ऐसा सामर्थ्य और शक्ति को भी विकसित करना होगा। मानस में वर्णित कथानुसार अयोध्या का लंका से अच्छा संबंध था। समुन्नत भारत के निर्माण में संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। संस्कृति का संरक्षण, संवर्द्धन आवश्यक है। स्वतंत्रता के पूर्व भारतीय संस्कृति को कलुशित करने के लिए विदेशी आक्रांता आये, परन्तु असफल रहे। वे यहीं के हो गये। उसी प्रकार यहां की नदियां, सभी दिशाओं से बेगवती रूप से बहती हुई समुद्र में मिल जाती हैं। भारतीय संस्कृति सर्वग्राही है। भारतीय संस्कृति में राम तथा रामकथा का अप्रतिम स्थान है। राम के आदर्शों की चर्चा सभी धर्म, सम्प्रदाय व पंथ के लोग करते हैं। राम भारतीय संस्कृति के प्रेरणास्रोत हैं। उनके चरित्र से संस्कृति को सीख मिलती हैं। यथा- अनुज सखा सँग भोज करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं। प्रात:काल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। आयसु मागि करहिं पुर काजा। भारतीय संस्कृति की उदारता सर्वविदित है। यह उदारता हमें राम के चरित्र से मिलती है। मानस के कथानुसार राम विभीषण को यह जानते हुए भी अपनाते हैं कि उनके बड़े भाई रावण ने सीता का हरण किया है। वानरराज सुग्रीव राम को अगाह करते हुए कहते हैं। यथा- कह सुग्रीव सुनहु रघुराई आवा मिलन दसानन भाई कह प्रभु सखा बूझिए काहा। कहइ कपीस सुनहु नर नाहा। जानि न जाइ निसाचर माया काम रूप केहि कारन आया। सुग्रीव की इतनी बात सुनने के बाद उन्हें आश्वस्त करते हुए राम कहते हैं कि संसार में जितने भी राक्षस हैं, उन्हें लक्ष्मण क्षण भर में समाप्त कर सकते हैं। इसलिए विभीषण को मेरे पास आने दीजिए। यथा- जग महुं सखा निसाचर जेते। लछिमन हनइ निमिष महुं तेते।। उभय भांति तेहि आमहु हंसि कह कृपा निकेत भारत को समुन्नत बनाने के लिए भारतीय प्रबुद्ध जनों, साहित्यकारों, जनताओं के बीच वापसी सामंजस्य का होना जरूरी है। किंतु यथा स्थिति ठीक इसके विपरीत है। आज के साहित्यकारों में एक खेमा बन गया है। अपने ही खेमे के रचना व रचनाकारों की प्रशंसा करते हैं, उन्हें आगे बढ़ाते हैं। ऐसे में साहित्य का वास्तविक उत्थान कैसे हो सकता है? जबकि तुलसीदास साहित्य के उद्देश्य को स्पष्ट करते कहते हैं। यथा- कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहं हित होई। राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अंदेसा।। तुसली कृत रामचरितमानस को पढ़ने के बाद चता चलता है कि उन्होंने राम की कथा में शुरू से अंत तक सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है। साथ-ही मानवता के निर्माण में सहानुभूति एवं नैतिकता का उच्चतर चरित्र प्रस्तुत किया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- तुलसीदास के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय-शक्ति में है। उन्हें लोक शास्त्र दोनों का बहुत व्यापक ज्ञान प्राप्त था। उनके काव्य-ग्रन्थों में जहां लोक-विधियों के सूक्ष्म अध्ययन का प्रमाण मिलता है, वहीं शास्त्र के गंभीर अध्ययन का भी परिचय मिलता है। लोक और शास्त्र के इस व्यापक ज्ञान ने उन्हें अभूतपूर्व सफलता दी। उसमें केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय नहीं है, वैराग्य और गार्हस्थ का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण का, पुराण और काव्य का, भावावेग और अनासक्त चिंतन का, ब्राह्मण और चांडाल का, पंडित और अपंडित का समन्वय। रामचरितमानस के आदि से अंत दो छोरों पर जानेवाली परा-कोटियों को मिलाने का प्रयत्न है। तुलसीदास हिंदी साहित्य के प्रतिमान हैं। उनके रामादर्श समुन्नत भारत के निर्माण में भी प्रेरक और प्रासंगिक लगते हैं। तुलसी हिन्दी के गौरव हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में- यदि कोई पूछे कि जनता के हृदय पर सबसे अधिक विस्तृत अधिकार रखनेवाला हिन्दी का सबसे बड़ा कवि कौन है, तो इसका एक मात्र यही उत्तर ठीक हो सकता है कि भारतहृदय, भारतीकंठ, भक्तचूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदास। समुन्नत भारत के निर्माण में रामचरितमानस की भूमिका अपरिहार्य है। यह एक कालजयी रचना है। शाश्वत जीवन-मूल्य का खजाना है। तत्कालीन समय का प्रामाणिक दस्तावेज है। युगीन यथार्थ है। जिसका ध्येय है- मानवता की सुरक्षा और वसुधा की रक्षा। तुलसी के दशरथ और राम यद्यपि पुरानी शासन-व्यवस्था के राजा हैं, तथपि वे आधुनिक लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप लगते हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस से शंबूक-बध तथा सीता-निर्वासन जैसे प्रसंगों को निकाल दिया है।साथ-ही राम के चरित्र में उदारता, शरणागत-वत्सलता एवं समाज के उपेक्षित, शोषित वर्गों के प्रति आत्मीयता को उनके आधार-ग्रन्थों की अपेक्षा अधिक व्यापक बनाया है। वे सनातन संस्कृति और शाश्वत जीवन मूल्य के प्रतिबद्ध कवि हैं। अत: हम कह सकते हैं कि समुन्नत भारत के निर्माण में भरत की भायप भगति और परहित सरिस धर्म नहिं भाई तथा सीय राम मय सब जग जानी का आदर्श बेहतर हो सकता है। (लेखक तुलसी अध्ययन केंद्र, चोगा, सोनाहातू, रांची, झारखंड के निदेशक हैं।) 

अब वह दिन कभी नहीं आयेगा...
Published / 2023-08-18 23:40:54
अब वह दिन कभी नहीं आयेगा...

स्मृति शेष/बिंदेश्वर पाठकआर के सिन्हाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। बिंदेश्वर पाठक जैसी युगांतकारी शख्सियत सदियों में जन्म लेती हैं। स्वाधीनता दिवस के दिन झंडारोहण के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और फिर वे कुछ देर के बाद संसार से विदा हो गए। स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर उन्होंने अपने सुलभ ग्राम में एक कवि सम्मेलन करवाया था। वहां पर तमाम कवियों से मिले और उनकी देश भक्ति से ओत-प्रोत रचनाओं को सुना भी। वे ताउम्र एक्टिव रहे। उम्र बिंदेश्वर पाठक की भले ही अस्सी की हो गई थी, पर वे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम की ही तरह जीवन के अंतिम क्षण तक सक्रिय रहे। उन्होंने भारत को स्वच्छता का एक नया विचार दिया। वे एक किवदंती पुरुष बन गये थे। व्यक्ति जब एक संस्था का रूप ले ले, तो आप जितना भी उनसे सीखेंगे कम ही होगा। अपने गृह जनपद वैशाली, बिहार और भारत का मान बढ़ाने वाले बिंदेश्वर पाठक का निधन सामाजिक क्षेत्र में एक बहुत बड़े रिक्तांक को उत्पन करता है। वे मेरे प्रिय मित्र थे और उनसे अक्सर दिल्ली, पटना और अन्य जगहों में मुलाकातें होती रहती थीं। मैंने और बिन्देश्वर भाई ने सत्तर के दशक की शुरुआत में अपना-अपना काम शुरू किया था। हमारा व्यवसाय अलग जरूर था पर निस्वार्थ मित्रता थी जो उन्होंने आजीवन निभायी।मैं जब भी उनसे मिला अपने क्षेत्र के पुराने मित्र होने के नाते बहुत ही उत्सुकता से मिलते थे और पूछते थे कि गांव, क्षेत्र पटना में सब ठीक ठाक है न? भारत में मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ अभियान चलाने वाले, सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक एक असाधारण इंसान थे। ब्राह्मण कुल में पैदा होकर वाल्मीकि समाज के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले और देश को सुलभ शौचालय जैसा अद्भुत सिस्टम देने वाले बिंदेश्वर पाठक सच्चे गांधीवादी थे। गांधी के लिए सफाई और स्वच्छता कार्य भारत के लिए एक महत्वपूर्ण काम था। भारतीय समाज से अस्पृश्यता का धब्बा हटाने की गांधी जी की इच्छा ने बिन्देश्वर जी को शौचालयों और स्वचछता पर काम करने के लिए और वाल्मीकि समाज के उद्धार के लिए प्रेरित किया। उन्हें समाज की यह परंपरा स्वीकार नहीं थी कि कुछ लोग सफाई का काम करें और वे सही काम करने तथा करते रहने के लिए ही समाज में तिरस्कृत और अभिशप्त हों।बिंदेश्वर पाठक बचपन से ही गांधी जी के विचारों से प्रभावित रहने लगे थे। वे गांधी जी को अपना नायक मानते थे। बिंदेश्वर पाठक जी मैला ढोने वाले समाज से जुड़ी ऐसी भयावह कहानियों को सुनाते थे कि रोंगटे खड़े हो जाते थे। उन्होंने वाल्मीकि समाज को गले से लगाया और देश को सुलभ शौचालय जैसा शानदार आइडिया दिया। बेशक, बिंदेश्वर पाठक का जीवन बदलने में गांधी जी के छुआछूत के खिलाफ चलाये गके आंदोलन का गहरा असर रहा। उन्होंने अगर गांधी जी को नहीं पढ़ा होता तो वे शायद सुलभ जैसी संस्था को खोलने के विषय में नहीं सोचते। वे बिहार गांधी स्वच्छता समिति में भी रहे। यह समिति गांधीजी के जन्म के 100वीं वर्षगांठ को मनाने के लिए बनी थी। उस दौरान उन्हें समझ आया कि सिर पर मैला ढोने की प्रथा कितनी अमानवीय है और इसे समाप्त करना कितना जरूरी है। वे मैला ढोने वालों के बीच में रहे। उनके दुख-दर्द को जाना समझा। वे उनके साथ आरा, वैशाली और चंपारण में रहे और उन्हें पढ़ाया भी। गांधीजी जब 1946 में राजधानी दिल्ली की वाल्मीकि कॉलोनी में रहते थे तो वे वहां पर रहने वालों के बच्चों को पढ़ाते भी थे। उन्हें इस बात की जानकारी थी। इसलिए वे भी गांधी जी की तरह मैला ढोने वालों के गुरु बन गये। बिंदेश्वर पाठक 1968 में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद गांधी शताब्दी समारोह समिति में शामिल हुए थे, जिसने वाल्मीकि समाज को सिर पर मैला ढोने आदि से राहत दिलाने की गारंटी दी। वह इन गरीब दलितों की दुर्दशा देखकर अत्यधिक चिंतित थे। उन्होंने इस समाज को सदियों पुरानी बेड़ियों से मुक्त कराने का संकल्प लिया। ऐसे में उन्होंने 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की, जो देश में सस्ती जगहों पर साफ-सुथरे शौचालय देने की गारंटी देता था। मुझे याद है कि 1970 में सीमांत गांधी के नाम से सुप्रसिद्ध खान अब्दुल गफ्फार खान पटना आए हुए थे और गंगा किनारे गांधी शांति प्रतिष्ठान में ठहरे हुए थे। मैं उन दिनों दैनिक सर्चलाइट और प्रदीप में कार्यालय संवाददाता था। मेरे संपादक जी ने मुझे खान साहब के गतिविधियों पर प्रतिदिन की रिपोर्ट डालने को कहा था। खान साहब खुद बाहर कम ही निकलते थे। कभी जाते भी थे तो मात्र जय प्रकाश नारायण के पास। लेकिन, जब मैं प्रतिदिन उनके पास जाने लगा तो वह भी मेरा इंतजार करने लगे और कौन उनसे मिलने आया था और क्या बात हुई, सब स्वयं ही बताने लगे। बिंदेश्वर जी सस्ते शौचालयों की एक प्रदर्शनी लगाना चाहते थे जिसका उद्घाटन खान साहब से करवाना चाहते थे।मेरे प्रयासों से यह संभव हुआ और प्रदर्शनी लगी। यहीं से सुलभ शौचालय संस्थान की शुरुआत हुई जो आज सुलभ इंटरनेशनल के नाम से प्रसिद्ध है। कल्पना कीजिये सुलभ शौचालय के बिना ये देश आज कैसा होता? आज रोज दो करोड़ लोग सुलभ शौचालय इस्तेमाल करते है, जिनमें शामिल हैं देश के हर स्टेशन, बस अड्डे, बाजार और चौराहे पर स्थित एकलौते सार्वजनिक शौचालय। मैं मानता हूं कि उनके इस काम के लिए उन्हें नोबल पुरस्कार दिया जाना चाहिए था। पर वे पुरस्कार पाने की दौड़ में कभी नहीं रहे। वे कई बार कहते थे कि अगर वे अपने लक्ष्य से भटके तो फिर सुलभ का काम प्रभावित होगा। उन्हीं की पहल पर महावीर एन्क्लेव में सुलभ इंटरनेशनल शौचालय संग्रहालय स्थापित किया गया। ये स्वच्छता तथा शौचालयों के वैश्विक इतिहास को समर्पित है। टाइम पत्रिका ने एक बार इस पर लिखा लिखा था कि यह संग्रहालय विश्व के सबसे विचित्र संग्रहालयों में से एक है। बिंदेश्वर पाठक ने सुलभ इंटरनेशनल में हजारों महिलाओं, पुरुषों और युवाओं को रोजगार दिया। बिंदेश्वर पाठक की संस्था सुलभ ने पूरे देश में कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों, जेजे क्लस्टरों, सरकारी कार्यालयों आदि में सस्ती, बल्कि नगण्य कीमत पर सुविधा प्रदान करते हुए लाखों शौचालय स्थापित किये। उनके आंदोलन ने काम किया जिससे हजारों महिलाओं को रोजगार मिला। उनके नेतृत्व में सुलभ इंटरनेशनल ने सौर ऊर्जा, पर्यावरण उन्नयन, गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों और सामाजिक सुधार की विभिन्न परियोजनाओं के क्षेत्र में काम किया। प्रसिद्ध कवि सुरेश नीरव बिंदेश्वर पाठक के साथ थे स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या के मौके पर। नीरव जी ही पाठक जी के सुलभ ग्राम में हुए कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे थे। वे फफक-फफक कर रोते हुए बता रहे थे कि मैं डॉ पाठक के साथ ही मंच पर बैठकर कवि सम्मेलन का संचालन कर रहा था। जब कार्यक्रम समाप्त हो गया तो वह मेरा हाथ पकड़े बैठे रहे। मुझे क्या पता था कि उनके हाथों का यह स्पर्श मेरे लिए आखिरी होगा।बिहार के जाति से ग्रस्त समाज में ब्राह्मण परिवार से संबंध रखने वाले डॉ पाठक वाल्मीकि समाज के नायक बन कर उभरे। वे बताते थे कि जब 1970 में अपनी संस्था सुलभ की स्थापना की तो उनके पास मात्र 400 रुपये थे। पर उनका लक्ष्य साफ था। वे मैला ढोने वालों की जिंदगी को बदलना चाहते थे। उन्होंने यह करके भी दिखा दिया। डॉ बिंदेश्वर पाठक का निधन हमारे देश के लिए एक गहरी क्षति है। वह एक दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिन्होंने सामाजिक प्रगति और वंचितों को सशक्त बनाने के लिए बड़े पैमाने पर काम किया। बिंदेश्वर जी ने स्वच्छ भारत के निर्माण को अपना मिशन बना लिया था। उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन को जबरदस्त समर्थन प्रदान किया। स्वच्छता के प्रति उनका जुनून हमेशा दिखता रहा। इसी महीने की चार अगस्त को मुझे सपत्नीक सुलभ ग्राम, महावीर एनक्लेव में एक व्याख्यान के लिए बुलाया था । भव्य स्वागत किया । पहुंचने पर अपने पचासों सहयोगियों के साथ गेट पर ही खड़े थे। व्याख्यान के बाद उन्होंने अपने भाषण में कहा- आरके भाई, मन तो भरा नहीं! एक दिन पूरे दिन भर का आपका कार्यक्रम आयोजित करने की इच्छा है। जल्द ही आपका समय लेकर बुलवाता हूं। अब वह दिन कभी नहीं आयेगा...! (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

अब कूटनीतिक तरीके से ही सबक सीखेगा चीन
Published / 2023-08-17 21:42:31
अब कूटनीतिक तरीके से ही सबक सीखेगा चीन

श्याम कुमार पाण्डेयएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव बना हुआ है। भारत और चीन के बीच हुई 19 वीं दौर की वार्ता के बावजूद दोनों के बीच सीमा विवाद का कोई समुचित हल नहीं निकल सका है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन के रिश्ते खराब रहे हैं। भारत की सीमा में चीनी सैनिकों की घुसपैठ बढ़ने से दोनों देशों के बीच सीमा पर कई इलाकों में विवाद कायम है। वहीं, चीन ने जी-20 के लेटर हेड में प्रयोग होने वाले संस्कृत के श्लोक वसुधैव कुटुम्बकम् पर आपत्ति जतायी है। हाल ही में भारत-चीन के बीच कोर कमांडर स्तर की 19 वें दौर की बैठक चुशुलमोल्डो में आयोजित की गई। वार्ता शांतिपूर्ण रही। भारत ने बैठक में देपसांग और डेमचोक समेत अन्य स्थानों से चीनी सैनिकों की वापसी की बात जोरदार तरीके से रखी लेकिन चीन टस से मस नहीं हुआ और समस्या का कोई समाधान नहीं निकल सका। दिल्ली में 9 और 10 सितंबर को जी-20 की बैठक प्रस्तावित है। लेकिन भारत और चीन के प्रतिनिधिमंडलों के बीच तनाव बढ़ रहा है। भारत के नेतृत्व में शंघाई सहयोग संगठन (एसीओ) की बैठक के बाद से ही चीन की तल्खी तेज हो रहा है। दरअसल, दोनों देशों के बीच विवाद का प्रमुख कारण दोनों देशों के बीच 3440 किलोमीटर लंबी सीमा है। यह सीमा तीन सेक्टरों में बंटी हुई है। इनमें पूर्वी सेक्टर, पश्चिमी सेक्टर और मध्य सेक्टर शामिल हैं। भारत के पांच राज्यों जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश, चीन के साथ सीमा लगी हुई है। चीन पश्चिमी सेक्टर में जम्मू-कश्मीर, शिनजियांग और अक्साई चिन की सीमा वाला इलाके को विवादित कहता रहा है। सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच समय-समय पर झड़पें होती रही हैं। चीन अपनी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के चलते लाइन आॅफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) का उल्लंघन करते हुए भारत की सीमा में प्राय: घुसपैठ करता रहा है। गौरतलब है कि भारत-चीन के बीच सीमा विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले वर्ष अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की कोशिश की थी। हालांकि भारत के जांबाज सैनिकों ने चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया था। लेकिन यह बात सच है कि चीन तवांग, डोकलाम, गलवान अथवा लद्दाख में अपनी हरकतों से बाज नहीं आता। उसे जैसे ही मौका मिलता है, घुसपैठ की हरकत शुरू कर देता है। ध्यातव्य है कि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हो चुका है। इस युद्ध में भारत को पराजय का सामना करना पड़ा था। हालांकि अब परिस्थतियां बदल चुकी हैं। जब चीनी सैनिकों ने तवांग जिले में घुसने की कोशिश की, भारतीय सेना ने उसे नाकाम कर दिया था। इसके पहले भी गलवान घाटी में चीन को मुंह की खानी पड़ी थी। लेकिन यह सच है कि भारत और चीन सीमा पर स्थितियां हर साल बिगड़ती जा रही हैं। यही कारण है कि सीमा पर दोनों देशों के बीच तनाव बना रहता है। सीमा में युद्ध जैसे हालात बने रहते हैं। आज अगर हम दोनों देशों के सैन्य बल की तुलना करें तो दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं। संख्या और संसाधनों के लिहाज से चीन की सेना भारी पड़ सकती है परंतु अगर सेना के मनोबल और शक्ति की बात की जाए तो भारत का पलड़ा चीन से भारी है। लेकिन यहां सवाल यह नहीं है कि कौन सी सेना भारी या कमजोर है। यहां यह समझना जरूरी है कि आज आमने-सामने युद्ध करने के बहुत दूरगामी दुष्परिणाम होते हैं। आज यूक्रेन और रूस के युद्ध के कारण मानवता को होने वाली क्षति और आर्थिक खामियाजा ये दोनों देश ही नहीं बल्कि विश्व भी भुगत रहा है। इसलिए आवश्यक है कि भारत अपनी कूटनीति और रणनीति में बदलाव करे और चीन को वैश्विक स्तर एक्सपोज करे। वह विश्व को चीन की साम्राज्यवादी नीतियों और मंशा का न केवल संदेश दे बल्कि विश्व समुदाय को उसके खिलाफ खड़ा कर ऐसा सबक सिखाए ताकि वह एलएसी पर बार-बार अतिक्रमण न करे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

कोटा की दुखद हकीकत बनती जा रही छात्रों की आत्महत्याएं
Published / 2023-08-05 21:55:30
कोटा की दुखद हकीकत बनती जा रही छात्रों की आत्महत्याएं

...आखिर निजी शिक्षण संस्थानों पर लगाम वाले विधेयक को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया गया अभिनय आकाश एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कोटा के कोचिंग सेंटरों में प्रतिस्पर्धा कड़ी है क्योंकि प्रतिष्ठित मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानों में सीटों की संख्या सिर्फ हजारों तक सीमित है। हालांकि, यह उन लाखों उम्मीदवारों को नहीं रोकता है जो आईआईटी या एम्स में उत्तीर्ण होने के अपने महत्वाकांक्षी सपनों को हासिल करने के लिए शहर जाते हैं। कोटा पहले जहां का पत्थर मशहूर था फिर नाम चला कोचिंग क्लास का। लोग कहने लगे कि बच्चों को कोटा भेज दो जिंदगी संवर जायेगी। लेकिन लगातार वहां से बच्चों के सुसाइड करने की खबरें अब कोटा की दुखद हकीकत बनती जा रही है। तमाम सवालों के बीच राजस्थान सरकार की बहुप्रतीक्षित राजस्थान निजी शैक्षिक नियामक प्राधिकरण विधेयक-2022 को लेकर चर्चा तो खूब हुई, लेकिन लगता है ये फिलहाल टंडे बस्ते में ही चली गयी है।ताजा मामला 3 अगस्त की सुबह का है जब राजस्थान के कोचिंग इंस्टीट्यूट हब कोटा में एक और आत्महत्या की सूचना मिली। मेडिकल प्रवेश परीक्षा एनईईटी की तैयारी कर रहा एक छात्र अपने छात्रावास में मृत पाया गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार किशोर की पहचान उत्तर प्रदेश के रामपुर के मनजोत छाबड़ा के रूप में हुई है, जो कुछ महीने पहले कोटा आया था। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके साथ ही इस साल कोटा में आत्महत्या करने वाले छात्रों की कुल संख्या 17 तक पहुंच गयी है। एलन कैरियर इंस्टीट्यूट और बंसल क्लासेज जैसे विरासत केंद्रों से लेकर फिजिक्सवाला जैसे एड-टेक स्टार्टअप तक के लिए मशहूर कोटा अब युवा शिक्षार्थियों की आत्महत्या के लिए प्रसिद्धि पा रहा है।कोटा में छात्र आत्महत्याओं का सिलसिला जारीइंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए हर साल देश भर से लाखों छात्र राजस्थान के इस शहर में आते हैं। शहर भर में कोचिंग सेंटरों के बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं, जो अपने विद्यार्थियों की उल्लेखनीय रैंकों का दावा करके सफलता का प्रचार कर रहे हैं। इस दौड़ में सफल होने के भारी दबाव के बीच, कोटा अपने युवा उम्मीदवारों को मौत के घाट उतार रहा है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार अकेले मई और जून के बीच, कोचिंग इंस्टीट्यूट हब में नौ छात्रों की आत्महत्या से मौत हो गयी। जुलाई में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे एक 17 वर्षीय लड़के को उसके छात्रावास के कमरे में लटका हुआ पाया गया था। इंडिया टुडे के मुताबिक, छात्र की पहचान पुष्पेंद्र सिंह के रूप में हुई है, जो हाल ही में राजस्थान के जालौर से कोटा आया था। पिछले महीने की शुरूआत में, यूपी के रामपुर के रहने वाले 17 वर्षीय बहादुर की आत्महत्या से मृत्यु हो गयी। मनीकंट्रोल के अनुसार, 2022 में कोटा में कम से कम 16 उम्मीदवारों की जान चली गई। टाइम्स आफ इंडिया (टीओआई) की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान सरकार के अनुसार, जनवरी 2019 से दिसंबर 2022 के बीच छात्र आत्महत्या के 53 मामले सामने आये, जिनमें कोटा में 52 और बारां में एक मामला शामिल है। पिछले दिसंबर में कई रिपोर्टों में कहा गया था कि राजस्थान सरकार छात्रों पर तनाव कम करने के लिए निजी शैक्षणिक संस्थानों को विनियमित करने के लिए एक विधेयक लाने की योजना बना रही है। हालाँकि, इस जून में टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार, विधेयक को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।कोटा में प्रेशर कुकर वाला माहौलकोटा के कोचिंग सेंटरों में प्रतिस्पर्धा कड़ी है क्योंकि प्रतिष्ठित मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानों में सीटों की संख्या सिर्फ हजारों तक सीमित है। हालांकि, यह उन लाखों उम्मीदवारों को नहीं रोकता है जो आईआईटी या एम्स में उत्तीर्ण होने के अपने महत्वाकांक्षी सपनों को हासिल करने के लिए शहर जाते हैं। चूंकि इनमें से अधिकांश शिक्षार्थी अपनी पढ़ाई के लिए अपने घरों और परिवारों को पीछे छोड़ देते हैं, इसलिए उन्हें अत्यधिक प्रतिस्पर्धी माहौल में तालमेल बिठाने में अक्सर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। छात्रों के लिए कोचिंग प्रणाली में प्रवेश करना अचानक और घबराहट भरा लगता है - इस प्रक्रिया में कोई सहजता नहीं है और यह बहुत भारी हो सकती है। छात्र प्रतिदिन 16-18 घंटे पढ़ाई करते हैं और उनका जीवन संतुलन से बाहर हो जाता है। जैसे ही कोई बच्चा स्कूल टॉपर बनता है, माता-पिता सपने देखना शुरू कर देते हैं। उन्हें लगता है कि उनका बच्चा देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक में टॉप करने में सक्षम है। जब बच्चा कोटा पहुंचता है, तो उसे एहसास होता है कि वह अपने स्कूल का टॉपर हो सकता है, लेकिन यहां उसके पास कोई मौका नहीं है।जो लोग आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आते हैं उनके दिमाग पर एक अतिरिक्त बोझ रहता है। ऐसे में यदि छात्र शुरूआती प्रयासों के दौरान अच्छा स्कोर करने में असमर्थ रहता है तो उनकी चिंताएं और भी बढ़ जाती है।क्या किया जा सकता है? कोटा अब छात्रों के लिए 24 गुणा 7 हेल्पलाइन नंबर और विशेष पुलिस बूथों से सुसज्जित है। कई कोचिंग सेंटरों ने बढ़ते संकट से निपटने के लिए परामर्शदाताओं को नियुक्त किया है। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, अन्य उपायों में छात्रों के लिए जुम्बा कक्षाएं, योग सत्र और मानसिक कल्याण कार्यशालाएं आयोजित करना शामिल है। पिछले दिसंबर में इंडियन एक्सप्रेस के लिए पत्रकार अविजीत पाठक के आलेख के अनुसार माता-पिता को खुद से कुछ असुविधाजनक प्रश्न पूछने की जरूरत है। क्या हम यह समझने के लिए तैयार हैं कि हमारे बच्चे निवेश नहीं हैं। एक कच्चा माल जिसे कोटा कारखाने में भेजा जाना है, और प्लेसमेंट आफर और एक आकर्षक वेतन पैकेज के साथ एक पॉलिश उत्पाद में बदल दिया जाये। क्या हम इतने साहसी और पारदर्शी हैं कि यह महसूस कर सकें कि हमारे बच्चों की असली खुशी प्रयोग करने, खुद को देखने और अंतत: वही करने में है जिसमें वे रुचि रखते हैं?

भारतीय मेधा की उड़ान चंद्रयान अभियान
Published / 2023-08-05 21:48:23
भारतीय मेधा की उड़ान चंद्रयान अभियान

हृदयनारायण दीक्षित एबीएन एडिटोरियल डेस्क। परिवार समाज की छोटी इकाई है। परिवार के सभी सदस्य आत्मीय होते हैं। हिंदू चिंतन में पूरा विश्व एक परिवार है। इस धारणा में परिवार से बड़ी इकाई समाज है। भारतीय दर्शन उदात्त है। इसके बावजूद परिवार से बड़ी इकाई जाति है। जातिभेद भी हैं। वैसे जातियां श्रम विभाजन का परिणाम हैं लेकिन जन्मना होने के कारण वे मजबूत हैं। जातियां सम्मान अपमान का आधार भी बनीं।वे राष्ट्रीय एकता में बाधक है। अनेक समाज सुधारकों ने जातियों की निंदा की, जाति तोड़क अभियान चलाए। राजनीति के एक धड़े में जातियों को अतिरिक्त महत्व मिला। जाति आधारित राजनीति भी चलती है। जाति अप्राकृतिक वर्ग है। इसे विदा करना और जातिविहीन समरस समाज का निर्माण राष्ट्रीय कर्तव्य है। जाति का उद्भव समाजशास्त्रियों की चुनौती रहा है। डॉ बीआर आम्बेडकर ने कोलम्बिया विश्वविद्याल में 9 मई, 1916 को नृविज्ञान विषयक एक गोष्ठी में जाति की उत्पत्ति और संरचना पर एक शोध प्रस्तुत किया था। डॉ आंबेडकर कहते हैं, भारत में जाति प्रथा व उसके उद्गम के संबंध में प्रश्न पैदा होना स्वाभाविक है। किसी ने इसकी उपेक्षा की है तो अन्य ने इसके साथ छलना की। (वही शोधपत्र: डॉ आबेडकर लेख एवं भाषण, खंड 1, सूचना विभाग उत्तर प्रदेश, पृष्ठ 19) जाति हिंदू समाज की एकता का बाधक तत्व है। भारत का धर्म दर्शन एकात्म मानववादी है। लेकिन समाज में जाति भेद हैं। जातिभेद आधारित समाज व्यवस्था के कारण राष्ट्रीय एकता का संकट है। हम भारतवासी किसी न किसी जाति में जन्मते हैं। किसी जाति का होना हमारी विवशता है। जाति का निर्वचन बड़ी चुनौती है। डॉ केतकर (हिस्ट्री आॅफ कास्ट इन इंडिया 1909) लिखते हैं, जाति एक सामाजिक समूह होती है जिसके लक्षण होते हैं - (1) इसकी सदस्यता समाज के व्यक्तियों की संतति और इस प्रकार जन्मे लोगों तक ही सीमित रहती है, और (2) इसके सदस्यों पर कठोर सामाजिक नियमों के अधीन समाज से बाहर विवाह करने पर सख्त पाबंदी रहती है। डॉ आंबेडकर की परिभाषा में, जाति ऐसी इकाई होती है जो स्वयं को बाड़े में बंद कर लेती है इसीलिए वह अपने सदस्यों के खान पान सहित सामाजिक मेल मिलाप को अपने दायरे तक सीमित कर देती है। फलत: बाहरी लोगों के साथ खान पान संबंधों का न होना निश्चयकारी प्रतिबंधों के कारण नहीं वरन जाति व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम होता है। (वही, पृष्ठ 9) डॉ आंबेडकर के अनुसार एक ही वर्ण वर्ग में विवाह करने की प्रथा की शुरुआत तत्कालीन वर्ण व्यवस्था में सर्वाधिक सम्मान प्राप्त पुरोहित वर्ग द्वारा हुई। वे सवाल करते हैं- जाति उद्भव के अध्ययन से हमें इस प्रश्न का उत्तर मिलना चाहिए कि वह कौन सा वर्ग था, जिसने अपने लिए बाड़ा खड़ा किया? (वही पृष्ठ 20) डॉ आंबेडकर कहते हैं, मैं इसका अप्रत्यक्ष उत्तर ही दे सकता हूं। हिंदू समाज में कुछ प्रथाएं प्रचलित थीं। ये प्रथाएं सर्वव्यापी थीं। अपने समस्त प्रतिबंध के साथ ये प्रथाएं केवल एक जाति में पायी जाती हैं: वह जाति है ब्राह्मणों की। इसे पुरानी वर्ण व्यवस्था में उच्च स्थान प्राप्त था। इन्हें गैर ब्राह्मण वर्गों ने ब्राह्मणों से ग्रहण किया था। अत: उनका पालन न तो कड़ाई से होता है और न ही उतनी पूर्णता से। इन प्रथाओं का गैर ब्राह्मण वर्गों में प्रचलन ब्राह्मणों से आया है। ब्राह्मण वर्ग ने अपनी स्वयं की घेराबंदी एक जाति के रूप में क्यों कर ली थी? यह एक भिन्न प्रश्न है। सभी प्राचीन सभ्यताओं में पुरोहित वर्ग द्वारा सामाजिक उच्चता का अधिग्रहण यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि उन्होंने इस अस्वाभाविक संस्था को अस्वाभाविक ढंग से कायम रखा। (वही पृष्ठ 20) जाति के जन्म के लिए मनु को जिम्मेदार बताने का चलन है। लेकिन डॉ आंबेडकर मनु को जाति वर्ण का जन्मदाता नहीं मानते। वे कहते हैं, मैं यह बतलाना चाहता हूं कि जाति धर्म का नियम मनु द्वारा प्रदत्त नहीं है और न ही वह ऐसा कर ही सकते थे। (वही पृष्ठ 21) वे ब्राह्मण को भी जाति व्यवस्था का जन्मदाता भी नहीं मानते। वे कहते हैं, ब्राह्मण अनेक गलतियां करने के दोषी रहे हों और मैं कह सकता हूं कि वे ऐसे थे लेकिन जाति व्यवस्था को गैर ब्राह्मणों पर लाद सकने की उनमें क्षमता नहीं थी। उन्होंने अपनी तर्कपटुता से भले ही इस प्रक्रिया को सहायता प्रदान की हो, लेकिन अपनी योजना को सीमित क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ा सकते थे। समाज को अपने स्वरूप के अनुरूप ढालना कितना कठिन कार्य होता है। ऐसा कार्य करने में किसी को आनंद प्राप्त हो सकता है और वह इसे प्रशस्ति कार्य कह सकता है लेकिन वह इसे बहुत आगे तक नहीं ले जा सकता। डॉ आंबेडकर के अनुसार समाज में आस्था है कि हिन्दू समाज प्रारंभ से जाति व्यवस्था के अधीन रहा जिसे शास्त्रों ने सुचित्त होकर रचा। आस्था है कि इसकी रचना शास्त्रों ने की है। अत: यह लाभकारी होने के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकती है। शास्त्र गलत नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि यह वैज्ञानिक आधार के सामने टिक नहीं सकता। (वही पृष्ठ 22) जाति विकास के पहले वर्ग बने। हिन्दुओं ने इन्हें वर्ण कहा। वर्ण भौतिक यथार्थ नहीं बने। डॉ. आम्बेडकर भी वर्गों से ही जाति का उद्भव मानते हैं।वे लिखते हैं, अन्य समाजों की भांति हिन्दू समाज भी वर्गों द्वारा गठित हुआ था। प्रारंभ के सुविदित वर्ग थे - (1.) ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग, (2.) क्षत्रिय या सैनिक वर्ग, (3.) वैश्य या व्यवसायी वर्ग और (4.) शूद्र या शिल्पकार अथवा सेवक वर्ग। यह मूलत: वर्ग व्यवस्था थी। इसमें योग्यता प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति अपना वर्ग बदल सकते थे, फलत: वर्गों के कार्मिकों में परिवर्तन हो जाया करता था। हिन्दू इतिहास काल के किसी अवसर पर पुरोहित वर्ग ने (हिन्दू) संस्था के अन्य जनों से अपने को सामाजिक रूप में संतृप्त (घेरे में बंद रहने की) नीति अपना कर स्वयं एक जाति बन गया। श्रम विभाजन के फलस्वरूप विभेदीकरण हो गया। कुछ बड़े ग्रुप कुछ और छोटे ग्रुपों में बंट गये। वैश्य और शूद्र वर्ग मौलिक रूप में अविकसित जीवाणु जैसे थे जो वर्तमान में पाई जाने वाली विभिन्न जातियों के निमार्ता तत्व बने। (वही पृष्ठ 24) वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में जाति नहीं थी। इतिहास में यह काल प्रेरक है। भारतीय इतिहास के सुदूर अतीत में जातिविहीन समाज था। वैदिक साहित्य में इसका उल्लेख है। वैसा ही आनंदपूर्ण समाज हम सबका स्वप्न होना चाहिए। संप्रति भारत की मेधा अंतरिक्ष नाप रही है। चंद्रयान अभियान को लेकर राष्ट्र में प्रसन्नता है। भारत की विश्व प्रतिष्ठा बढ़ी है। समाज में जाति पंथ मजहब आधारित संकीर्णताओं की जगह नहीं होनी चाहिए। भारत जाति पंथ मजहब का गठजोड़ नहीं। संविधान की उद्देशिका में भारत के जन गण मन को हम भारत के लोग कहा गया है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

आचार की मजबूरी और विचार की लाचारी
Published / 2023-08-04 00:12:38
आचार की मजबूरी और विचार की लाचारी

गिरीश्वर मिश्रएबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजकल निजी पारिवारिक जीवन और सार्वजनिक सामाजिक जीवन के तेजी से बदलते परिवेश में जिस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है वे भयावह हैं और नि:संदेह मनुष्य होने के मूल भाव को ही तिरस्कृत तथा अपमानित करने वाले जैसे लग रहे हैं। पिछले दिनों प्यार करना, लिव इन में रहना और फिर उसी प्रियजन की बर्बर हत्या की घटनाएं देश के कई कोनों से आयीं। ऐसे ही पत्नी द्वारा प्रेमी की सहायता से पति की जान लेने जैसी भयानक वारदात की खबरें भी आती रही हैं। दुष्कर्म में व्यक्ति और समूह के स्तर पर लिप्त होने की भी घटनाएं बढ़ रही हैं। ये सभी अंधे-अधूरे स्वार्थ के लिए रिश्तों की गहराती टूटन और आपसी भरोसे को कलंकित करने वाली घटनाएं हैं।चिंता की बात यह है इस तरह की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। वे बार-बार और जगह-जगह हो रही हैं। इन सबके बीच आज हमारा सामाजिक ताना-बाना असहज होता जा रहा है और उसमें गांठें पड़ रही हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति देश के सार्वजनिक जीवन में भी घटित होती दिख रही है। देश के अनेक क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं हो रही हैं जो दिल दहला देने वाली हैं।ज्यादा दिन नहीं हुए पश्चिम बंगाल से विभिन्न मौकों पर आहटें आ रही थीं कि किस तरह तात्कालिक राजनैतिक हित की खातिर द्वेष की आग में लोग झुलस रहे थे। ऐसे ही जंगलराज की ओर वापसी की खबरें बिहार से भी आ रही थीं। छत्तीसगढ़ में भी इस तरह की घटनाएं हो रही थीं। प्रकट राजनैतिक हित के आगे सामाजिक सद्भाव, आपसी समझदारी और भरोसा बनाये रखने की जरूरत को भरसक नजर अन्दाज किया जाता रहा है। पूर्वोत्तर भारत के कला-संस्कृति से सम्पन्न मणिपुर में हुई ताजी हिंसा और दुराचार की अमानवीय घटनाओं की जो जानकारी सामने आ रही है वह समाज और सरकार दोनों में गहरे पैठी जड़ता, अविश्वास और घोर निष्क्रियता को उजागर कर रही है। इस घटना की जितनी भी निंदा और भर्त्सना की जाए वह कम होगी। इन जटिल परिस्थितियों के बीच मणिपुर की कानून व्यवस्था चरमरा गई और आम जनों में भय और दहशत की स्थिति व्याप्त होती गयी।गौरतलब है कि मैतेयी और कुकी दोनों समुदायों की अस्मिता (या पहचान) और उससे जुड़े हितों को न समझना और उपेक्षा करना खतरनाक साबित हुआ। नये ज्ञान-विज्ञान, उद्योग, बाजार और तकनीक से लैस करती आधुनिकता की सबसे बड़ी सौगात अकेली अपनी अस्मिता का आविष्कार करना है। इसके असर में मनुष्य अब अधिकाधिक अस्मिताजीवी होता जा रहा है और एक जैसी अस्मिताएं यदि आपस में जोड़ती हैं तो दूसरे समुदायों या गैर से तोड़ती भी हैं।हम अपने समुदाय को श्रेष्ठ और दूसरे को खराब साबित करने में जुट जाते हैं। इस दौड़ के अगले पड़ाव में दोनों अस्मिताओं वाले लोग एक दूसरे के दुश्मन होने लगते हैं। वे उन बड़ी (और शायद पुरानी पड़ती) अस्मिताओं जैसे- मनुष्य होना या भारतीय होना को भूलने लगते हैं। बड़ी अस्मिताओं के साथ जुड़ना और अपने को पहचानना साझेदारी पर टिकी होती हैं और उनमें परस्पर निर्भरता और पूरकता का रिश्ता होता है।ऐसे में सहयोग तथा संवाद का जरिया बन जाता है पर अलग और खास होती अस्मिताएं तकरार का कारण बनती हैं।मणिपुर की स्थिति निश्चय ही जटिल है और उसके कई कारण हैं। अस्मिताओं और उनसे जुड़ी आकांक्षाओं और प्रेरणाओं के साथ बगल के देश म्यांमार के साथ अंतरराष्ट्रीय आवागमन की व्यवस्था के (कु) प्रबंधन और नशीले पदार्थों की तस्करी की पृष्ठभूमि भी एक कारण है जो इस स्थिति को पैदा करने में सहायक हुई है। समय रहते इन सभी पक्षों पर ध्यान न देने की नीति की परिणति अच्छी नहीं हुई और जो कुछ घटित हुआ वह सबको शर्मसार करने वाला हो रहा है। इसलिए मणिपुर की समस्या को वहां के भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में समझना होगा। साथ ही इस पूरे घटनाक्रम का राजनैतिक संदर्भ में भी देखना जरूरी होगा। हमें उस उभरते माहौल को नजर अन्दाज नहीं कर सकते जो विभिन्न प्रदेशों में दिख रहा है जिसमें संवाद की जगह हिंसा को तरजीह मिल रही है। यह दुर्भाग्य है कि अब हिंसा का राजनैतिक इस्तेमाल नैतिकता की हदें पार करता जा रहा है। मोटी खाल ओढ़े इसके प्रति बेहद उदासीन बने राजनेता उसका फायदा उठाने से कभी भी नहीं चूकते। पिछले महीनों में मैतेयी और कुकी जनजातियों के बीच मणिपुर में आरक्षण के मुद्दे से जो मनमुटाव शुरू हुआ वह हत्या, बलात्कार, दरिंदगी, आगजनी, बमबाजी, दंगा-फसाद और हिंसा की होने वाली जघन्य वारदातों की शृंखला में परिणत होता गया। प्रदेश की सरकार इस पूरे मामले को संभालने और सामाजिक सद्भाव बनाये रखने में नाकामयाब रही। इस मामले को लेकर हर किसी को गम्भीर चर्चा और कार्रवाई की दरकार है। मणिपुर के इस मामले की गूंज संसद में कैसे गूंजे और उस गूंज का श्रेय कैसे लिया जाय अब यह मुख्य राजनैतिक प्रश्न बन गया है। देश और समाज की किस्मत ऐसी कि प्रभावित लोगों के दु:ख-दर्द, पीड़ा और मुश्किलों को कैसे कम किया जाय, सामान्य जनजीवन कैसे बहाल हो और लोग इधर-उधर शिविरों को छोड़ अपने-अपने घरों को वापस जायें ये सारे प्रश्न गौण हो चले हैं। राजनीति के रणनीतिकारों के आकलन के अपने आधार होते हैं जिनका सरोकार अगले चुनाव के लिए सिर्फ वोट बटोरने तक से सीमित होता है। इस बातूनी देश में बतकही की बड़ी पुरानी प्रथा है।लोग बात करने से कभी नहीं थकते। बतरस सभी रसों से ऊपर होता है और सभी इसका आस्वादन करते नहीं अघाते। मीडिया के तीव्र प्रसार के साथ बतियाने का स्वभाव और दायरा और ज्यादा बढ़ गया है। संसद में बतंगड़ी बात-वीरों की छवि निराली है। वे चिल्ला-चिल्ला कर बात करने की धूम मचाते रहते हैं। उनके शोर-शराबे में सिवाय बात करने के वे सबकुछ कर रहे होते हैं।इस माहौल में भारतीय संसद का मौजूदा मानसून सत्र हंगामे के बीच चल रहा है। इसका पूरे एक सप्ताह का कीमती समय देश के माननीयों द्वारा बात करने की बात पर असंयत ढंग से बात करते हुए बिताया गया। गौरतलब है कि बात की गम्भीरताओं को पक्ष तथा विपक्ष दोनों के द्वारा स्वीकार की गयी। ऐसा किए जाने पर भी बात करने पर बात नहीं हो सकी। बातचीत से बात बनती नहीं दिख रही और वेबात की बात करने में अपनी चतुराई दिखाने में हम लोग आगे चल रहे हैं। इसलिए बात को और बात पर बात करने के काम को हम सब बड़ी गम्भीरता से लेते हैं, चाहे काम की बात हो या न हो। यह याद करने लायक बात है कि बात करने के लिए विपक्ष द्वारा जितना समय मांगा जा रहा था उससे काफी ज्यादा समय बिना बात किए बिताया जा चुका है।मणिपुर की घटनाओं को लेकर संसद का हरकत में आना स्वाभाविक है। अब पक्ष और प्रतिपक्ष नियमों और कायदे कानूनों का सहारा लेकर अपनी-अपनी बढ़त सुनिश्चित करने की कोशिश में लगा हुआ है। चूंकि हंगामा और कार्यवाही में गतिरोध पैदा करना संसद का स्थायी स्वर होता जा रहा है इस बार भी सार्थक चर्चा कम और हंगामा अधिक हो रहा है। इस पूरी मुहिम में तीव्र नाटकीयता का उपयोग तो है ही अभद्र भाषा के उपयोग से भी अब किसी को गुरेज नहीं दिख रहा। आये दिन संसद के कार्य की हानि के साथ जनता की गाढ़ी कमाई का करोड़ों रुपया इस पंचायती उपद्रव की भेंट चढ़ रहा है। इन सबसे लगता यही है कि आर्थिक विकास और भौतिक सुख-सुविधा की बढ़त के साथ रिश्तों में सहिष्णुता, पारदर्शिता और भरोसा की जो परिपक्वता आनी चाहिए वह नहीं आ पा रही है। हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक पूंजी चूकती नजर आ रही है और हमारा मूल्यबोध धुंधला पड़ रहा है। देश ने अमृतकाल में आगे बढ़ने का बड़ा संकल्प लिया है। आर्थिक मोर्चे पर एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने को तैयार हो रहा है। ऐसे में व्यक्तिगत और सामाजिक विकास की आंतरिक चुनौती हमें आचार और विचार दोनों ही दृष्टियों से आत्मावलोकन के लिए आवाज दे रही है।मनुष्यता, सामाजिकता और स्वतंत्रता के मूल्य हमसे कुछ दायित्वों की भी अपेक्षा करते हैं जिनके अभाव में हम आगे कदम नहीं बढ़ा सकते। विचारों की लाचारी और आचार की मजबूरी के बीच हमें रास्ता ढूंढ़ना होगा। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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