महेश वर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। साल 2014 में नरेन्द्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री का पदभार संभालने के साथ राष्ट्र में परिवर्तनकारी विकास का हुआ है। मोदीवाद ने इतने विशाल स्तर पर विकास की संकल्पना को साकार किया, जिसके बारे में भारत ने कभी कल्पना नहीं की थी। उनका नेतृत्व अपने साथ इतने बड़े पैमाने पर विकास का वादा लेकर आया जो भारत ने पहले कभी नहीं देखा था।बुनियादी ढांचे का विकासमोदी युग का सबसे उल्लेखनीय और पहला पहलू है, बुनियादी ढांचे का विकास। मोदीवाद में स्पष्ट था कि जब तक बुनियादी ढांचे का विकास नहीं किया जाता है, तब तक समेकित विकास की कल्पना करना मुश्किल है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने राजमार्गों, रेलवे, हवाई अड्डों और बंदरगाहों के विकास व निर्माण में भारी वृद्धि देखी।उदाहरण के लिए, भारतमाला परियोजना का लक्ष्य 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक के नियोजित निवेश के साथ देश में सड़क कनेक्टिविटी में सुधार करना था। आज की तारीख में इस पहल से परिवहन की दक्षता में हुआ उल्लेखनीय सुधार देश का हर नागरिक महसूस कर रहा है। इससे लॉजिस्टिक लागत में भी भारी कमी आयी है और अर्थव्यवस्था को बल मिला है।महत्वाकांक्षी सागरमाला परियोजना का उद्देश्य बंदरगाहों की कार्यशैली में आमूल-चूल बदलाव करना था। परियोजना के तहत वर्तमान बंदरगाहों को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया गया व रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यधुनिक और नये बंदरगाहों का निर्माण किया गया। केरल का विझिंजम बंदरगाह इसका साक्षात उदाहरण है। सागरमाला परियोजना का उद्देश्य समुद्री व्यापार को प्रोत्साहन देने के साथ बंदरगाहों और भीतरी इलाकों के बीच कनेक्टिविटी में सुधार लाना है, जो समग्र विकास के लिए मोदी के दृष्टिकोण का प्रमाण है।डिजिटल इंडिया2015 में शुरू किया गया डिजिटल इंडिया अभियान गेम-चेंजर रहा है। इसका उद्देश्य नागरिकों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से सरकारी सेवाएं और जानकारियां प्रदान करना है और दक्षता तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करने के साथ भ्रष्टाचार पर लगाम कसना है। बायोमीट्रिक पहचान प्रणाली आधार और वित्तीय समावेशन कार्यक्रम जन धन योजना जैसी पहल ने लाखों लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल करने में मदद की है। ये मोदीवाद के दूरदर्शी दृष्टिकोण से ही संभव हो सका कि विमुद्रीकरण के माध्यम से कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़े और यूपीआई जैसे डिजिटल भुगतान प्लेटफार्मों की वृद्धि ने भारतीयों के लिए अपने वित्त को संभालने के तरीके बदल दिये।मेक इन इंडियाविनिर्माण को बढ़ावा देने और भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए मेक इन इंडिया पहल शुरू की गयी। मेक इन इंडिया का दोहरा उद्देश्य था। पहला, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहित करके लोगों की आमदनी बढ़ाना और दूसरा विदेशी निवेश को आकर्षित करना। दोनों उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नियमों को सरल बनाया गया। परिणाम निकला कि उत्पादन और नौकरी के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे देश के आर्थिक विकास में योगदान हो रहा है। विनिर्माण क्षेत्र को इतना ध्यान, समर्थन और ब्रॉन्डिंग कभी नहीं दिया गया, जितना मोदी के नेतृत्व में दिया गया। कह सकते हैं कि मेक इन इंडिया पहल आत्मनिर्भरता की ओर तेज कदम के साथ-साथ भारत को विनिर्माण पावर हाउस में बदलने में भी सहायक रही है।स्वच्छ भारत मिशनस्वच्छ भारत अभियान या स्वच्छ भारत मिशन, भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में से एक है। 2014 में लॉन्च किए गए स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य बेहतर स्वच्छता सुनिश्चित करते हुए भारत को खुले में शौच से मुक्त बनाना था। इस पहल से शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों की स्वच्छता में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। स्वच्छ भारत अभियान ने स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्धता के नए स्तर को चिह्नित किया है। स्वच्छता की प्रेरणा ने वैज्ञानिक रचनात्मकता को बायो-टॉयलेक्ट्स जैसे नवाचारों के लिए प्रेरित किया है। जागरुकता अभियानों के साथ-साथ लाखों शौचालयों के निर्माण ने भारतीय आबादी के जीवन व स्वास्थ्य पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव डाला है।ऊर्जा क्रांतिमोदीवाद का लक्ष्य हरित व नवीकरणीय ऊर्जा है। देश को इस दृष्टिकोण का संकेत मोदी काल के पहले ही मिल चुका था। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने कच्छ में 250 मेगावॉट के सोलर पार्क का निर्माण कराया था। उस समय किसी ने कल्पना नहीं की थी कि सौर ऊर्जा भारत ही नहीं पूरे विश्व को ऊर्जा समस्या के निदान की राह दिखाने में सक्षम है। मोदी सरकार के तहत राष्ट्रीय सौर मिशन ने 2022 तक 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा उत्पन्न करने का लक्ष्य प्राप्त किया है। भारत ने 2030 तक आवश्यकता की 50 प्रतिशत ऊर्जा गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन जिस रफ्तार से नवीकरणीय ऊर्जा का विकास हो रहा है, उससे समय-पूर्व लक्ष्य प्राप्त करने के पूरे आसार हैं। विद्युत वितरण में ऊर्जा ह्रास की समस्या गंभीर रही है। इस समस्या से निपटने और हरित विद्युत वितरण में सुधार के लिए उज्ज्वल डिस्कॉम इश्योरेंस योजना (उदय) योजना शुरू की गयी। इसी क्रम में विद्युत वाहनों को प्रोत्साहन देना मोदी वाद के विकास वाद का अगला चरण है। देश में विद्युत वाहनों को प्रोत्साहन देने और वाहनों के लिए कम लागत पर बेहतर लीथियम आधारित बैटरी के उत्पादन के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव या पीएलआई को मंजूरी दी गयी है। जल्द इसका उत्पादन आरंभ हो जायेगा। दस वर्ष पूर्व से तुलना करें तो देश में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन और ऊर्जा सुधारों के पैमाने और कार्यान्वयन में भारी परिवर्तन दिख रहा है।आर्थिक सुधारमेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत हुई महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के साथ। विभिन्न मदों में लगने वाले करों को एक ही मद में सन्निहित कर जनता की परेशानियों को दूर किया गया। इसे सिंगल विंडो कर भी कह सकते हैं। जीएसटी मोदी सरकार के लागू किये गये कई महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों में सबसे उल्लेखनीय है। अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों में स्टार्टअप इंडिया का उल्लेख करना प्रासंगिक है, जिसका उद्देश्य देश में उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा देने के साथ स्वरोजगार के अवसर उत्पन्न करना है। इन आर्थिक सुधारों और प्रोत्साहनों ने भारत के अंदरुनी और बाहरी व्यापार को आसान बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज की तारीख में भारत निवेशकों का आकर्षक गंतव्य बन चुका है। यह मोदी युग में आर्थिक सुधारों की व्यापकता और प्रमुखता का परिणाम है।समाज कल्याणमोदीवाद के विकासवाद में एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। राष्ट्र के विकास की धुरी व्यक्ति का विकास है। व्यक्ति का विकास होगा तो समाज का विकास होगा और समाज विकसित होगा तो राष्ट्र विकास के मार्ग पर अग्रसर होगा। इसे ध्यान में रखकर समय-समय पर समाज कल्याण की कई योजनाएं आरंभ की गयीं, जैसे प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत), एक स्वास्थ्य बीमा योजना, और प्रधानमंत्री आवास योजना, जिसका उद्देश्य गरीबों को किफायती आवास प्रदान करना है। मोदी सरकार के प्रयासों ने नवाचार और अंतिम मील तक पहुंचने के लिए बढ़ी हुई प्रतिबद्धता सुनिश्चित की है। यह सुनिश्चित हुआ है कि हर योजना का लाभ उन लोगों तक पहुंचे, जिन्हें उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है।विश्वगुरु भारतमोदीवाद के विकासवाद का आधार विशाल पैमाना, तीव्र महत्वाकांक्षा और नवीन तथा दूरगामी दृष्टिकोण हैं। समग्र विकास का आयाम सिर्फ राष्ट्र की सीमाओं तक ही सीमित नहीं। मूलभूत अवधारणा संपूर्ण मानवता की सेवा है। विश्व के विभिन्न हिस्सों की भाषाएं भिन्न-भिन्न हैं। कोरोना काल में सम्पूर्ण मानवता की निस्स्वार्थ सेवा की अवधारणा, वसुधैव कुटुम्बकम दुनिया के हर देश को उनकी भाषा में समझ में आ गयी।इसी अवधारणा का एक स्वरूप सक्रिय विदेश नीति है, जो वैश्विक परिप्रेक्ष्य में दिनों दिन भारत को महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में सफलता प्राप्त कर रही है। जी-20 के अध्यक्षता काल ने विश्व पटल पर भारत की विविधता को उजागर किया है। दुनिया अब भारत को कंट्री ऑफ स्नेकचार्मर्स या डेवलपिंग कंट्री के रूप में नहीं देखती। विश्वपटल पर भारत उस सम्मानजनक मंच पर विराजमान है, जहां भारत की पहल पर बेहतर वैश्विक स्वास्थ्य के लिए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है और भारत की पहल पर वैश्विक खाद्य समस्या के समाधान के अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष मनाया जाता है। यह मोदीवाद की धुरी पर विकासवाद का अंतरराष्ट्रीय पैमाना है। निश्चित रूप से पैमाने की इस धुरी पर विकासवाद को उज्ज्वल भविष्य का आकार मिलने जा रहा है। (लेखक, पूर्व राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी भाजपा किसान मोर्चा हैं।)
अजयदीप बाधवाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। मैंने कुछ दिन पहले एक विद्वान को संघर्ष पर बोलते सुना था और उसके बाद यह मैंने काफी विचार किया। तो पाया कि उस विद्वान ने कुछ ऐसी बातें कहीं थी, जो कुछ हद तक सही थी। उस विद्वान ने कहा था कि प्रायः जब भी हम अपने से जूनियर को या बच्चों को मिलते हैं, तो हम उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि वे जीवन में बहुत सफल हो और जीवन में उन्हें कोई कठिनाई न हो। सब कुछ उनके रास्ते में आसानी से हो जाये और जीवन में वे बहुत आसानी से आगे बढ़ें।पर क्या यह आशीर्वाद सही है?जीवन में एक बात तो पक्की है कि सफलता उसी को मिलती है जो जीवन में संघर्ष करता है। अगर हमने जीवन में संघर्ष नहीं किया है, तो हमें सफलता भी नहीं मिलेगी। जीवन में सुलझने के लिए उलझना जरूरी है; जो जीवन में उलझेगा नहीं, वह सुलझेगा भी नहीं।कई वैज्ञानिकों ने कहा है कि जब तक वे फेल नहीं हुए, वे अच्छा प्रोडक्ट नहीं बना पाये। अभी भारत का चंद्रयान चांद पर लैंड कर गया। अब याद करिये, इसरो ने यह सफलता चौथी बार में प्राप्त की। बल्कि जो तीसरी बार इसरो फेल हुआ था, वह तो दो वर्ष पूर्व ही हुआ था। अगर इसरो वह दो-तीन बार फेल नहीं करता, तो वह उन छोटी-छोटी बातों का ध्यान नहीं रखता। जिसने इस बार चंद्रयान को चंद्रमा में उतरने के लिए पूरा सहयोग दिया।याद रखें, कि जब हम जीवन में असफल होते हैं या जीवन में हम जब संघर्ष करते हैं, तो जीवन में आगे बढ़ने की हमारी क्षमता और मजबूत होती है। हमारे इरादे और मजबूत होते हैं और हम जीवन में आगे बढ़ते हैं।कहा जाता है कि अब्राहम लिंकन के जीवन में बहुत बाधाएं आयीं। वे जीवन में हर संघर्ष में फेल होते थे, हर चुनाव में वे पहले हारते थे, पर वे बाद में जीत जाते थे। वे फेल करते रहे, हारते रहे और अंत में जाकर अमेरिका के राष्ट्रपति बने। अमेरिका में तो कितने राष्ट्रपति आये और गये, जिनका हमें नाम भी याद नहीं है। पर अब्राहम लिंकन को हम याद आज भी याद रखते हैं। वैसे ही थॉमस एडिसन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जब बल्ब बनाया, तो उसके पूर्व 9999 बार फेल हो चुके थे और उन्होंने बाद में कहा कि अगर मैं इतनी बार फेल नहीं होता, तो मैं बल्ब नहीं बना सकता। मुझे इतनी बार फेल होने के बाद पता चला कि 9999 तरीकों से बल्ब नहीं बनता है।कहने का तात्पर्य यह है कि अगर अपने बच्चों को हम चाहते हैं कि वे सफल हों, तो हमें उन्हें आशीर्वाद देना चाहिए कि जीवन में सफल हों, पर सफलता आसानी से न आये। सफल तुम जरूर हो पर सफलता के लिए तुमको संघर्ष करना पड़े। हमें उन्हें बोलना चाहिए कि तुम वह सोना हो कि जब तक तुम गलोगे नहीं तुम किसी के गले का आभूषण नहीं बन पाओगे। हमें अब अपने बच्चों का आशीर्वाद देने का तरीका बदलना चाहिए। उन्हें सफलता के साथ-साथ संघर्ष करने का आशीर्वाद भी देना चाहिए। उन्हें जीवन में उलझने का आशीर्वाद देना चाहिए, तभी वे जीवन में सुलझ पायेंगे। (लेखक झारखंड की राजधानी रांची के प्रख्यात मोटिवेटर हैं।)
डॉ राजेंद्र प्रसाद शर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। शेयर बाजार में जिस तेजी से नए डीमैट अकाउंट खुल रहे हैं, वह स्पष्ट रूप से लोगों के विश्वास का ही परिणाम है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास को आमजन के वित्तीय निवेश को लेकर देखा जा सकता है। देश के शेयर बाजार में लगातार इस मायने में बूम देखा जा रहा है। चालू कलैंडर वर्ष के हर महीने लाखों नये डीमैट खाते खुल रहे हैं। इसी कलैंडर वर्ष की बात की जाए तो जनवरी से अब तक दो करोड़ से अधिक नए डीमैट खाते खुले हैं। अकेले सितंबर में करीब 30 लाख 60 हजार नए डीमैट खाते अस्तित्व में आए हैं। इससे पहले अगस्त में इस साल के सर्वाधिक 31 लाख नए खाते खुले। इसी तरह से गये महीने 10 आईपीओ बाजार में आए हैं और इनमें निवेशकों ने दिल खोलकर पैसा लगाया है। इन 14 आईपीओ के माध्यम से कंपनियों ने 11868 करोड़ रुपये जुटाये हैं। यदि देखा जाये तो दिसबंर 2010 के बाद सबसे अधिक आईपीओ बाजार में आये हैं। समग्र रूप से देखा जाये तो इस साल जनवरी से सितंबर तक 34 आईपीओ के माध्यम से कंपनियों ने निवेशकों से 26913 करोड़ रुपये जुटाये हैं। सभी आईपीओ ओवर सब्सक्राइब रहे हैं।यह सब तो तब है तब है जब आज दुनिया के देश आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। पर यह साफ हो जाता है कि शेयर बाजार में लगातार नये खाते खुलना और आईपीओ को अच्छा समर्थन मिलना इस बात का संकेत है कि देश की अर्थ व्यवस्था को लेकर लोगों में किसी तरह का नकारात्मक विचार नहीं है। बल्कि यह कहा जाना उचित होगा कि लोगों का देश की अर्थव्यवस्था व देश के आर्थिक हालातों के प्रति विश्वास कायम है। दरअसल, कोरोना के बाद जिस तरह के हालात हुए और देश-दुनिया की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुईं उससे लोगों में अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक आशंकाएं हुईं और इसमें भी कोई दोराय नहीं कि दुनिया के अधिकांश देश आर्थिक संकट के दौर से गुजरे और आज भी गुजर रहे हैं। कोढ़ में खाज का काम पिछले लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने किया। अब इजराइल और हमास के ताजा हमलों से नया संकट सामने आ गया है। इससे सबके साथ ही दुनिया के अधिकांश देशों में हालात अच्छे नहीं चल रहे हैं। चीन की नीतियों से दुनिया के देश त्रस्त है सो अलग। इसके अलावा आंतकवादी घटनाएं, जलवायु परिवर्तन के कारण आये दिन आने वाले तूफानों, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, मौसम की बेरुखी आदि को किसी भी हालात में सब कुछ ठीक नहीं माना जा सकता है। इन सब हालातों के बीच देश की अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों के रुख को दो दृष्टि से समझना होगा। एक ओर बैंकों में बचत की भावना में गिरावट दर्ज हो रही है। एक समय था जब हमारी परंपरा में बचत को खास महत्व दिया जाता था आज हालात ठीक विपरीत है। बचत की तुलना में वित्तदायी संस्थाओं से कर्ज लेने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। दूसरी ओर शेयर बाजार जिसे हमेशा से अस्थिर समझा जाता रहा है और जो राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सर्वाधिक जोखिम भरा निवेश माना जाता रहा है, आज देश का मध्यम वर्ग खासतौर से युवा पीढ़ी जोखिम भरे शेयर बाजार में बेहिचक निवेश करने को आगे आ रही है।हालांकि इसके पीछे शेयर बाजार में एक कारण आकर्षक रिटर्न को माना जा रहा है तो दूसरी और अन्य क्षेत्रों में अधिक अस्थिरता देख रहे हैं। हालांकि इसमें कोई दोराय नहीं होनी चाहिए कि शेयर बाजार सबसे जोखिम भरा है, पर जिस तरह से प्रति माह नित नए डीमैट अकाउंट खोले जा रहे हैं और जिस तरह से आईपीओ को रेस्पांस मिल रहा है।उससे साफ हो जाता है कि आज की पीढ़ी लाख रिस्क होने के बावजूद जोखिम भरे रास्ते को चुन रही है। इससे यह तो माना जा सकता है कि निवेशकों खासतौर से मध्यम वर्ग का शेयर बाजार पर पूरा विश्वास जम रहा है। हालांकि शेयर बाजार अंतरराष्ट्रीय हालातों से भी प्रभावित होता है। इसके साथ ही मिनट दर मिनट रिस्क भरा होता है। फिर भी लोगों द्वारा इस पर विश्वास व्यक्त करना कहीं आने वाले समय में संकट का कारण नही बन जाये। सेबी, एनएसडीएल आदि संस्थाओं को इस पर लगातार पैनी नजर रखनी होगी। क्योंकि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सबसे अधिक मध्यम वर्ग प्रभावित करता है और मध्यम वर्ग ही जोखिम में पड़ जाए तो हालात बिगड़ने में देर भी नहीं लगेगी, ऐसे में बाजार पर नजर रखने वाली संस्थाओं को अपनी मॉनेटरिंग व्यवस्था को और अधिक इफेक्टिव बनाना होगा ताकि हालात हाथ से बाहर न हो सकें। इसलिए जहां नये डीमैट खाते खुलना, शेयर बाजार में देशवासियों की हिस्सेदारी बढ़ना, निवेश बढ़ना अच्छी बात है, वहीं कंपनियों की गतिविधियों और शेयर बाजार को प्रभावित करने वाली ताकतों व संस्थाओं व गतिविधियों पर पूरा ध्यान रखना होगा ताकि शेयर बाजार के निवेशकों के हितों को सुरक्षित रखा जा सके। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
आरके सिन्हाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना कि कांग्रेस अपनी विचारधारा को अर्बन नक्सलियों के पास गिरवी रख रही है। उनका मत सही है। जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष भारत तेरे टुकड़े होंगे गैंग के नायक कन्हैया कुमार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस कार्यसमिति में जगह देकर स्पष्ट कर दिया कि उन्हें उन तत्वों से कोई कतई परहेज नहीं हैं, जो भारतीय सेना पर कश्मीर में रेप के झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाते रहे हैं। बेशक, देश की आम राष्ट्रभक्त जनता तो कन्हैया कुमार को कभी माफ नहीं करेगी, क्योंकि उसने सेना पर मिथ्या आरोप लगाए। कन्हैया कुमार ने पिछला लोकसभा चुनाव भी अपने गृह जनपद बेगूसराय से लड़ा और वे वहां से बुरी तरह से हारे थे। वे तब भाकपा के टिकट पर उम्मीदवार थे। उनके लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग के सैकड़ों सदस्यों ने बेगूसराय में डेरा डाला। ये सब सोशल मीडिया पर इस तरह का माहौल बना रहे थे कि मानो भारतीय सेना को बलात्कारी कहने वाला कन्हैया कुमार भाजपा के गिरिराज सिंह को हरा ही देगा। गिरिराज सिंह को बाहरी उम्मीदवार बताना इनका बड़ा मुद्दा था। बात सही भी थी। गिरिराज गंगा के दक्षिणी कछार के प्रसिद्ध गांव बड़हिया के निवासी हैं और बेगूसराय गंगा के उत्तरी छोर पर है। हालांकि, कन्हैया कुमार को कांग्रेस कार्यसमिति में जगह मिलना अप्रत्याशित है।यह कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी और शक्तिशाली समिति है या यूं कहें कि हुआ करती थी। कांग्रेस के अपने संविधान और नियम हैं, इसे लागू करने का अंतिम निर्णय कांग्रेस कार्यसमिति ही करती है। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि इसके पास इतनी शक्तियां होती हैं कि वो पार्टी अध्यक्ष की नियुक्ति भी कर सकती है और पद से चलता भी कर सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होने के बाद नयी कांग्रेस कार्यसमिति बनती है।यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि लखनऊ कांग्रेस बैठक के बाद जब कांग्रेस अध्यक्ष नेहरू की तानाशाही से रुष्ट कार्यसमिति के वरिष्ठ सदस्यों देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद, बल्लभ भाई पटेल, आचार्य कृपलानी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आदि ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया था तो पार्टी में कोहराम मच गया था और स्वयं गांधी जी को हस्तक्षेप करना पड़ा था।बहरहाल, भाजपा और भाजपा के सभी नेताओं पर जहर उगलने वाले कन्हैया कुमार अपनी कटु वाणी के लिए जाने जाते हैं। अब तो वे कांग्रेस कार्यसमिति में हैं। तो क्या माना जाए कि कन्हैया कुमार की भारत की सेना को लेकर की गई टिप्पणियों पर कांग्रेस उनके साथ खड़ी है? उसने न जाने कितनी बार कहा कि भारतीय सेना कश्मीर में घृणित कर्म करती रही है। भारतीय सेना पर कश्मीर में रेप जैसा जघन्य आरोप लगाने वाले और टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थन में कन्हैया कुमार के आरोप को देखने के लिए आप यू- ट्यूब का सहारा भी ले सकते हैं। उससे पूछा जाना चाहिए कि वह किस आधार पर सरहदों की निगहबानी करने वाली भारतीय सेना पर आरोप लगाता रहा है? उसके पास अपने आरोपों को साबित करने के किस तरह के पुख्ता प्रमाण हैं? भारतीय सेना पर मिथ्या आरोप लगाने वाले कन्हैया ने सेना पर आरोप तो लगा दिये। पर उसे तब सेना का अदम्य साहस दिखाई नहीं दिया, जब सेना जान पर खेलकर संकट के वक्त जनता को बचाती है। कन्हैया कुमार जब जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष थे, उस दौरान वहां पर उन्हीं के नेतृत्व में संसद हमले के गुनहगार अफजल का जन्मदिन मनाया जा रहा था। क्या यह बिना उनकी सहमति के संभव था।कन्हैया कुमार बहुत ही चतुर खिलाड़ी है। घोर महत्वकांक्षी भी है। कांग्रेस में शामिल होते ही उन्होंने 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में भड़के दिल-दहलाने वाले सिख विरोधी दंगों और हजारों सिखों के बर्बरतापूर्ण नरसंहार के लिए कांग्रेस को क्लीन चिट दे दी थी। कन्हैया कुमार कहते हैं कि 1984 के दंगे भीड़ के उन्माद के कारण ही भड़के। इस तरह से उन्होंने कांग्रेस को प्रमाणपत्र दे दिया कि कांग्रेस की 1984 के दंगों में कोई भूमिका ही नहीं थी। क्या वे तब दिल्ली में थे? उस समय उनकी कितनी उम्र थी? 1984 के दंगों के कारणों पर मानवाधिकार संगठन पीयूडीआर ने एक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उसने दावा किया था कि सिखों का कत्लेआम कांग्रेस के नेताओं की शह पर ही हुआ। कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार 1984 के दंगों को भड़काने के आरोप साबित होने के कारण ही उम्र कैद की सजा झेल रहे हैं? जगदीश टाइटलर अलग कोर्ट की पेशियां देते फिर रहे हैं। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इन छुटभैये नेताओं ने बिना राजीव और सोनिया के शह पर यह नरसंहार किया।दिल्ली ने 1947 के बाद 1984 में भयानक दंगे देखे थे। देश के बंटवारे के बाद 1947 में भी दिल्ली के बहुत से इलाकों में दंगे हुए थे। हालांकि तब तक दिल्ली एक छोटा सा शहर थी। उस दंगे को रुकवाने के लिए महात्मा गांधी खुद दंगा ग्रस्त इलाकों में जाने लगे थे। ताकि दिल्ली में दंगे रुक जाएं इसलिए गांधी ने 13 जनवरी से 18 जनवरी तक उपवास रखा। वे तब 78 साल के हो चुके थे। उनके उपवास का असर यह हुआ कि दंगाई शांत हो गए। दिल्ली फिर से अपनी रफ्तार से चलने लगी। एक तरफ तो यह महात्मा गांधी की संवेदना थी। दूसरी ओर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की प्रतिक्रिया थी कि जब कोई बड़ा बरगद का वृक्ष जमीन पर गिरता है तो धरती तो थोड़ी बहुत हिलती ही है। यानी तीन हजार सिखों का कत्लेआम इनके लिए थोड़ा बहुत था। जब इंदिरा गांधी की उनके निजी अंगरक्षक सुरक्षा कर्मियों द्वारा हत्या की गई थी तो दिल्ली में दंगे भड़क उठे या भड़काये गये, तब कांग्रेस के लफंगों ने दिल्ली में हजारों निर्दोष सिखों को मौत के घाट उतारा था।देखा जाये तो उसे सांप्रदायिक दंगा कहना भूल होगा। पर तब उन दंगाइयों को कदम-कदम पर अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, कुलदीप नैयर, लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा, लेखक महीप सिंह समेत सैकड़ों छात्रों, राजनीतिक तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं वगैरह से टक्कर लेनी पड़ी थी। फिर भी वह दंगा नहीं बर्बरतापूर्ण नरसंहार था।अटल बिहारी वाजपेयी का उस दिन देश ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजधानी में भड़के सिख विरोधी दंगों के समय एक अलग ही रूप देखा था। वे तब दिल्ली प्रेस क्लब के लगभग सामने स्थित 6 रायसीना रोड के बंगले में रहते थे। राजधानी जल रही थी। यहां पर मौत का नंगा नाच खेला जा रहा था, मानवता मर रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने 1 नवंबर, 1984 को सुबह दसेक बजे अपने बंगले के गेट से बाहर का भयावह मंजर देखा। उनके घर के सामने स्थित टैक्सी स्टैंड पर काम करने वाले सिख ड्राइवरों पर हल्ला बोलने के लिए गुंडे-मवालियों की भीड़ एकत्र थी। वे तुरंत बंगले से अकेले ही निकलकर नंगे पांव टैक्सी स्टैंड पर पहुंच गये। उनके वहां पर पहुंचते ही हत्या करने के इरादे से आई भीड़ तितर-बितर होने लगी। भीड़ ने अटल जी को तुरंत पहचान लिया। उन्होंने भीड़ को कसकर खरी-खरी सुनाई। मजाल थी कि उनके सामने कोई आंखें ऊपर कर देख भी लेता। अटल जी अगर चंदेक पल विलंब से आते तो दंगाइयों ने सारा काम कर दिया होता। ड्राइवरों और टैक्सियों को जला दिया गया होता। अटल जी के साथ दिल्ली भाजपा के कई नेता जैसे मदन लाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा वगैरह अपने साथियों के साथ दंगे रुकवा रहे थे। अब कन्हैया कुमार कांग्रेस को 1984 के दंगों के लिए दूध का धुला साबित करने में लगे हैं। उस समय उनके दूध के दांत टूटे थे या नहीं, यह तो वही बता सकते हैं।बहरहाल, अब वे कांग्रेस की कार्यसमिति में शामिल कर लिये गये हैं। कांग्रेस कार्यसमिति के शत-प्रतिशत सदस्य सोनिया, राहुल, प्रियंका के हैं। बेचारे, खड्गे तो इस मामले में बेचारे ही हैं। अब देश कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और आलकमान के दूसरे नेताओं से जानना चाहता है कि वे बताएं कि भारतीय सेना पर की गयी टिप्पणी पर उनका और उनकी पार्टी का क्या कहना है? (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
रामलाल प्रसाद एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड के कोडरमा की 15 साल की सुधा (बदला हुआ नाम) के साहस और संघर्षों को सलाम किया जा सकता है। परिवार बेहद गरीब था और फिर पिता की भी मृत्यु हो गई। घर में पाई-पाई के संकट के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी और पांच लोगों के परिवार का पेट भरने के लिए नन्हीं सी सुधा रोजाना 14 घंटे अभ्रक की खदानों में खटने लगी। झारखंड में अभ्रक की खदानें पहले नन्हें बच्चों के शोषण और बाल मजदूरों के इस्तेमाल के लिए कुख्यात थीं। लेकिन कमरतोड़ मेहनत के बाद भी सुधा को मुश्किल से 50 रुपए मिल पाते जिससे किसी तरह पांच लोगों के परिवार का पेट भरता था। इसी बीच सुधा के घर वालों ने उसकी शादी तय कर दी। लेकिन सुधा किसी भी तरह पढ़ना चाहती और इस उम्र में शादी के खिलाफ थी। उसने अपने घर वालों को मनाने की हर चंद कोशिश की लेकिन नाकाम रही। सुधा को अपने गांव में बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) के बारे में पता चला। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेंस फाउंडेशन द्वारा संचालित बीएमजी अपनी अभिनव पहलों के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में बच्चों को अगली पांत में रखकर न सिर्फ उन्हें जागरूक कर रहा है बल्कि बाल विवाह एवं बाल श्रम के खिलाफ लड़ाई में नए योद्धा तैयार कर रहा है। यह लोकतांत्रिक हस्तक्षेपों और कार्रवाइयों के जरिये अपने जीवन और समुदाय में सकारात्मक परिवर्तनों के लिए बच्चों को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हुए बाल श्रम, बाल विवाह और बाल यौन उत्पीड़न से बचाव के लिए उनके इर्द-गिर्द एक सुरक्षा घेरे का निर्माण करता है। सुधा ने अपना बाल विवाह रुकवाने में मदद के लिए बीएमजी के सदस्यों से संपर्क किया। लेकिन उसके परिवार ने मिलने से इनकार कर दिया। किसी तरह से वे मुलाकात के लिए राजी हुए। इसके बाद कई मुलाकातों और मान मनुहार के बाद उन्होंने अनमने मन से बालिग होने तक सुधा की शादी नहीं करने का वादा किया। बीएमजी ने सुधा का एक स्कूल में उसका दाखिला करा दिया और इस तरह उसकी पढ़ाई एक बार फिर शुरू हो गयी।सुधा बीएमजी की सक्रिय सदस्य हो गई थी और पिछले साल अपने गांव की बाल पंचायत की उपाध्यक्ष चुनी गई। एक बार स्कूल जाना शुरू करने के बाद सुधा ने अभ्रक की खदानों में काम बंद कर दिया। अब परिवार उसे बोझ समझने लगा था और किसी तरह उसके हाथ पीले कर उसे विदा करने की जुगत में था।शादी के लिए परिवार वालों के लगातार दबाव से परेशान होकर सुधा ने प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) से इसकी शिकायत की। बीडीओ ने तत्काल कार्रवाई करते हुए सुधा के परिजनों से संपर्क किया और उन्हें इस तरह का गैरकानूनी कदम उठाने के खिलाफ चेतावनी दी। सुधा अब अपने गांव और आस पास की बच्चियों को बाल विवाह के नर्क में जाने से बचाने की लड़ाई लड़ रही है। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी कहते हैं, बच्चों को शिक्षा का अधिकार तो मिल गया है लेकिन अब उन्हें अपने अधिकारों के बारे में शिक्षित करने की जरूरत है। बीएमजी की मदद से सुधा ने यही किया है। वह कहती है, मैं बाल पंचायत की सक्रिय सदस्य हूं और मुझे बच्चों के अधिकारों के बारे में पता है। मैं कानूनी रूप से बालिग होने से पहले शादी नहीं करूंगी। आज देश की हर लड़की को सुधा जैसे जज्बे और हौसले से लैस होने की जरूरत है। (लेखक जन सेवा परिषद, हजारीबाग के सचिव हैं।)
महंगाई बढ़ाये ब्याज दर प्याज-टमाटर के भाव सिर्फ रसोई का मसला नहीं हैं। प्याज-टमाटर के भावों का दूरगामी असर समग्र महंगाई दर पर पड़ता है और उसका असर आखिर में ब्याज दर पर पड़ता है। लगातार बढ़ती महंगाई में ब्याज दरों में गिरावट संभव नहीं है। इसलिए प्याज-टमाटरों के भावों को सिर्फ सरकारें नहीं देख रही हैं। रिजर्व बैंक के लिए भी ये भाव विश्लेषण का विषय है। आलोक पुराणिक एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जुलाई, 2023 में खुदरा महंगाई दर 7.44 प्रतिशत पर जा पहुंची। जून 2023 में यह दर 4.87 प्रतिशत पर थी। रिजर्व बैंक की नीतिगत आकांक्षा यह है कि यह महंगाई दर चार प्रतिशत के करीब रहे गिरे तो गिरकर दो प्रतिशत से नीचे न जाये और बढ़े तो यह छह प्रतिशत से ऊपर न जाये। पर महंगाई छह प्रतिशत से ऊपर जा चुकी है यानी 7.44 प्रतिशत पर है। हालिया महंगाई की वजह टमाटरों की महंगाई है। टमाटर की महंगाई का असर समग्र होता है और ब्याज दर पर भी टमाटर की महंगाई असर डालती है। टमाटर-प्याज के भाव महंगाई दर को ऊपर उठा लेते हैं। महंगाई दर से सरकार तो परेशान होती ही है, रिजर्व बैंक आफ इंडिया की परेशानी भी बढ़ जाती है। राजनीति बहुत मुश्किल काम है। कच्चे तेल के भावों से लेकर टमाटर-प्याज के भाव तक के मसले बहुत बड़े बन जाते हैं। अब सरकारें परेशान हैं टमाटर के भाव को लेकर। टमाटर के रिटेल भाव दिल्ली में अगस्त में दो सौ रुपये रुपये प्रति किलो तक पहुंचे। सस्ते टमाटर बिकवाने का इंतजाम सरकार को करना पड़ा। दिल्ली में बरसों पहले भाजपा की एक सरकार प्याज के भावों के चक्कर में गयी थी। प्याज सबसे ज्यादा राजनीतिक आइटम है। इस बार टमाटर के भावों ने सरकार को परेशान किया। बोफोर्स तोप के चक्कर में एक सरकार गयी, प्याज के चक्कर में जाने कितनी राज्य सरकारें परेशान रहती हैं। टमाटर-प्याज के हाल कई राज्यों में टमाटर की फसल तबाह हुई, तो टमाटर के भाव आसमान छूने लगे। प्याज रबी की फसल में भी होता है और खरीफ की फसल में भी होता है। देश की कुल प्याज पैदावार का करीब साठ प्रतिशत रबी में होता है, इसका प्याज ही अक्तूबर तक बाजार में चलता है, इसके बाद नवंबर में खरीफ का प्याज आना शुरू होता है।इस बार भारी बारिश बाढ़ के हालात के चलते प्याज की आपूर्ति पर असर पड़ा है। आपूर्ति कम होने या आपूर्ति कम होने की आशंका का ही मतलब है कि भाव ऊपर जायेंगे। भावों ने ऊपर जाना शुरू किया। प्याज के भावों ने उतना कहर न मचाया, जितना कहर टमाटर के भावों ने मचाया। पर प्याज के भावों के राजनीतिक महत्व को केंद्र सरकार समझती है। सियासत की चुस्ती भाव ऊपर जा रहे हैं, तो सरकारें चिंतित हैं। केंद्र सरकार की अलग चिंता है, राज्य सरकारों की अलग चिंताएं हैं। खासकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि में विधानसभा चुनाव सामने हैं। यहां अलग तरह की राजनीतिक चिंताएं हैं। टमाटर और प्याज आम तौर पर भारतीय खाने का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। तमाम टीवी चैनल लगातार कवरेज दिखाकर इन्हे और खास बना देते हैं। लगातार टीवी चैनलों पर इस आशय की कवरेज आती रहती है कि टमाटर खरीदने के लिए लाइन इतनी लंबी है और फलां सरकार ने सस्ता टमाटर बेचने की घोषणा की है। प्याज-टमाटर केंद्रित राजनीति के परिणाम और दुष्परिणामों से भारत के अधिकांश राजनीतिक दल वाकिफ हैं, इसलिए प्याज-टमाटर को लेकर कोई भी राजनीतिक दल सुस्त नहीं दिखना चाहता, खासकर उन राज्यों में तो बिलकुल नहीं, जहां विधानसभा चुनाव सामने हैं। बाजार का खेल? गौरतलब है कि प्याज जैसी सब्जियों को उगानेवाले किसानों के जोखिम का स्तर धान और गेहूं उगानेवाले किसानों के जोखिम से ज्यादा होता है। धान और गेहूं के मामले में तो न्यूनतम समर्थन मूल्य का सरकारी प्रावधान होता है। पर प्याज में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता है। यानी प्याज का न्यूनतम मूल्य क्या होगा, यह कोई तय नहीं कर सकता, सिर्फ बाजार ही तय करता है। किसान बनाम उपभोक्ता मसले पेचीदा हैं। अगर प्याज के भाव लगातार बढ़ते रहें, तो कहीं न कहीं किसान को इसका फायदा मिलने की उम्मीद होती है। यूं किसान को हर स्थिति में बढ़े हुए भाव नहीं मिलते, बिचौलिये यानी बीच में थोक कारोबारी ज्यादा कमा लेते हैं। प्याज के भाव जब सस्ते होते हैं, और छोटे किसान के पास प्याज को स्टोर करने की क्षमताएं नहीं होतीं, तो किसान सस्ते में प्याज बेचकर निकल लेता है। सस्ता प्याज बिचौलियों के गोदाम में जमा हो जाता है। महंगे टमाटर-प्याज से जुड़ी समग्र महंगाई दरमहंगाई दर का ताल्लुक ब्याज दर से है, ब्याज दर क्या हो, यह निर्धारण रिजर्व बैंक आफ इंडिया करता है जो ब्याज दर निर्धारण में महंगाई दर का विश्लेषण करता है। यानी अगर महंगाई दर लगातार ऊपर जा रही हो, तो रिजर्व बैंक की कोशिश रहती है कि ब्याज दरें सस्ती न हों। ब्याज दर सस्ती कर जायें, तो पब्लिक के हाथ में खूब पैसा सस्ते भावों पर आ जाये, तो फिर महंगाई बढ़ने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। महंगाई अगर लगातार बढ़ती रहे, तो रिजर्व बैंक ब्याज दरें भी बढ़ाने की बात करता है। किसान के हित भी सोचें किसी भी आइटम के भावों में तेज गिरावट और बढ़ोतरी के कारणों में आपूर्ति और मांग का संतुलन ही होता है। अगर किसी आइटम की मांग तेजी से बढ़ जाये, तो भाव बढ़ जाते हैं और किसी आइटम की आपूर्ति तेजी से गिर जाये, तो उसके भाव गिर जाते हैं। आपूर्ति गिरने के कारण कुछ भी हो सकते हैं, बाढ़, सूखा या अन्य प्राकृतिक आपदा के चलते किसी आइटम की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसमें किसी सरकार का कोई दखल नहीं है। (लेखक आर्थिक पत्रकार हैं।)
जी-20 की आधारशिला वर्ष 1999 में वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, कृषि व ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग के संबंध में रखी गयी। समय के साथ इनमें पर्यावरण, आतंकवाद जैसे विषय भी जुड़ गये। अब 19 देश और यूरोपीय संघ इसके सदस्य हैं जिनके बीच संगठन की अध्यक्षता बारी-बारी से घूमती है। इस बार भारत इसका अध्यक्ष है वहीं शिखर बैठक का मेजबान भी। सवाल ये है इस बड़े आयोजन से भारत को क्या हासिल होगा? क्या शी चिनफिंग या पुतिन की अनुपस्थिति कोई प्रभाव डालेगी?पुष्परंजन एबीएन एडिटोरियल डेस्क। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए जी-20 शिखर बैठक में आना जरूरी नहीं था। वो जकार्ता में चल रही आसियान शिखर बैठक की ग्रांड सफलता चाहते थे। चीन का मीडिया उन्हीं खबरों से लबरेज रहा, जिसे पूर्वी एशियाई देशों का मीडिया फॉलो कर रहा है। मंशा यही है कि जी-20 बैठक को महत्वहीन साबित किया जाये, उसकी कवरेज कम से कम हो। जकार्ता की बैठक में चीनी प्रधानमंत्री ली छियांग मंगलवार को अपना वक्तव्य दे रहे थे। 26वीं चाइना-आसियान शिखर बैठक, 26वीं आसियान प्लस थ्री, और 18वीं ईस्ट एशिया समिट के बाद ली छियांग इस आलेख के छपने तक भारत प्रस्थान कर चुके होंगे। जी-20 की शिखर बैठक में ली छियांग शायद उन सवालों को उभारें, जिसपर चीन को आपत्ति है। चीन की बुनियादी आपत्ति जी-20 समारोहों का उन भारतीय इलाकों में होना था, जिसपर वह जबरदस्ती का दावा ठोकता है। कुछ दिल पहले चीन ने एक तथाकथित मानक मानचित्र जारी किया जिसमें अरुणाचल प्रदेश, अक्साईचिन के साथ-साथ ताइवान और दक्षिण चीन सागर पर क्षेत्रीय दावा किया गया। चीन हर साल इस तरह के मानक मानचित्र जारी करता है। यह पहली बार है कि भारत ने चीनी दावों को खारिज करते हुए इस मानचित्र पर कड़ा एतराज किया है। जी-20 शिखर सम्मेलन से कुछ दिन पहले इस नक्शे का प्रकाशन चीनी शरारत ही कहा जाना चाहिए। जोहान्सबर्ग की बैठक में शी और मोदी की मुलाकात, सीमा विवाद के हल के लिए पहल संबंधी जो बयान जारी हुआ था, उससे लगा था कि अब गाड़ी पटरी पर चलने लगेगी। शी को यह भी लगा कि पुतिन के बगैर यदि वो दिल्ली शिखर बैठक में जाते हैं, तो कहीं उनकी कूटनीतिक घेरेबंदी न हो जाये। शी का दिल्ली बैठक में नहीं आना भी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए बड़ी खबर बन गयी, जिसकी व्यापक कवरेज देखकर लगता है कि जैसे सबकुछ पूर्वनियोजित हो। शी 14 मार्च 2013 को चीन के राष्ट्रपति बने, तब से वो लगातार जी-20 की शिखर बैठकों में जाते रहे। अपवाद के रूप में 2021 की बैठक में शी आभासी रूप से स्क्रीन पर दिखे। वह कोविडकाल था। मगर, शी जब नूसा डुआ में थे, पीएम मोदी से उनका हाथ मिलाना भारत के लिए अहम खबर बनी। मोदी समर्थक सोशल मीडिया लहालोट था। इससे खुन्नस खाये ट्रोल आर्मी ने जवाबी हमले में प्रधानमंत्री मोदी को नहीं बक्शा। अजब हो रहा था, हाथ मिलाओ तो बुरा, न मिलाओ तो मुश्किल। क्या शी जो बाइडेन से भी दूरी चाहते थे, इसलिए दिल्ली नहीं आये? इस थ्योरी को भी सही नहीं मानिये। बल्कि, जो बाइडेन ने शी के नहीं आने का अफसोस प्रकट किया है। ठीक से देखा जाये तो अमेरिका-चीन कूटनीति की गाड़ी को धीरे-धीरे पटरी पर लाने के प्रयास लगातार चल रहे हैं। दो अगस्त को अल जजीरा ने खबर दी कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी वाशिंगटन आमंत्रित किये गये हैं। अगस्त 2023 के तीसरे हफ्ते अमेरिकी वित्त मंत्री जीना राइमांडो पेइचिंग हो आई थीं। कई कारणों में से एक कारण अवश्य है कि पुतिन से दोस्ती निभाने की वजह से शी ने भारत आना सही नहीं समझा। रिश्तों में असहजता का पहलूपीएम मोदी से शी की जोहान्सबर्ग में मुलाकात के विजुअल्स को ध्यान से देखिये तो संबंधों में सहजता नहीं प्रकट हो रही थी। बिल्कुल औपचारिक। यांत्रिक। फिर, डोकलाम-देपसांग ला, दौलत बेग ओल्डी जैसे इलाकों में भूमिहरण को लेकर चीन के प्रति भारत का सोशल मीडिया और प्रतिपक्ष जिस तरह से हमलावर है, उससे भारत स्थित चीनी दूतावास ने शी के आने का सही समय नहीं माना। भारतीय विदेशमंत्री एस. जयशंकर से जब पूछा गया कि पुतिन और शी चिनफिंग के भारत न आने का जी-20 सम्मेलन पर क्या असर पड़ेगा? जवाब में विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा- मुझे लगता है कि जी 20 में अलग-अलग मौकों पर ऐसे कुछ राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री रहे हैं, जो किसी भी वजह से शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने नहीं पहुंचे, लेकिन उस देश के प्रतिनिधि बैठक में अपना पक्ष बताते हैं। मुझे लगता है कि बैठक में सभी प्रतिनिधि बहुत गंभीरता से शामिल हो रहे हैं। जयशंकर से दूसरा महत्वपूर्ण सवाल था, शी और पुतिन के जी-20 सम्मेलन में न आने की वजह क्या भारत से नाराजगी है? जयशंकर ने जवाब दिया कि मुझे नहीं लगता कि इसका भारत से कोई संबंध है। दोनों नेताओं ने जो फैसला लिया है, उसके बारे में वो बेहतर जानते होंगे। 1999 में जी-20 की आधारशिला वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, कृषि व ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग के लिए रखी गयी। सबसे पहले यह आइडिया दुनिया के सात समृद्ध देशों के वित्तमंत्रियों व सेंट्रल बैंक के गवर्नरों ने विकसित किया था। समय के साथ जी-20 में पर्यावरण, आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई और महिला अधिकार जैसे विषय जुड़ते चले गये। सात से बढ़ते-बढ़ते 19 देश और यूरोपीय संघ को मिलाकर 20वां समूह, जी-20 के सदस्य हैं। 19 देशों के बीच संगठन की अध्यक्षता बारी-बारी से घूमती रहती है। लेकिन भारत में ऐसी व्याख्या की जाती रही, गोया पीएम मोदी के प्रताप की वजह से भारत को जी-20 की अध्यक्षता का अवसर मिला है। बात भी बहुत हद तक सही है। तीस नवंबर से एक दिसंबर 2018 तक अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में जी-20 की शिखर बैठक थी। (लेखक ईयू एशिया न्यूज के नई दिल्ली संपादक हैं।)
11 सितंबर, विश्व धर्म सभा, शिकागो में स्वामी विवेकानंद के व्याख्यान के 130 वर्ष पूरा होने पर विशेष विजय केसरी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतवर्ष के लिए 9 -10 सितंबर का दोंनो दिन सदा-सदा के लिए स्वर्ण हस्ताक्षर से दर्ज हो चुका है। जी-20 की बैठक की सफलता, सर्वसम्मति से 73 रेजोल्यूशन पारित कर इतिहास रच दिया, जी 20 में शामिल सभी देशों का पूर्ण समर्थन ने भारत को विश्व गुरु बनने के और करीब ला दिया है। इतिहास साक्षी है कि 11 सितंबर को शिकागो में विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने जो भाषण दिया था, जी 20 की बैठक की सफलता से सच होता दिख रहा है। स्वामी विवेकानंद के विचार सदैव देशवासियों के मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। आज से 130 वर्ष पूर्व शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति, रीति रिवाज, रहन सहन, समृद्ध भाषा और पौराणिक ग्रंथों की महत्ता पर प्रकाश डाला था। स्वामी विवेकानंद से पूर्व किसी भी वक्ता ने अपने धर्म और धर्म ग्रंथों की इतनी विद्वता पूर्ण व्याख्यान नहीं दिया था । मंच पर मौजूद कोई भी धार्मिक गुरु ने यह नहीं सोचा था कि भारत से आया यह युवा संन्यासी इस तरह अपनी बातों को रखेगा। दर्शक दीर्घा में बैठे विभिन्न देशों से आए श्रोता गण को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि भारत का यह युवा सन्यासी इतनी गहराई और विद्वता पूर्ण तरीके से अपनी बातों को रखेगा। स्वामी विवेकानंद बहुत ही मुश्किलों का सामना करते हुए इस धर्म सभा में सम्मिलित हो पाए थे। जिस कालखंड में स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म सभा में अपनी बातों को रखा था, भारत ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था। भारत एक गुलाम देश के रूप में जाना जाता था। भारत को गरीबों का एक देश, अनपढ़ों का देश, सपेरों का एक देश के नाम से पश्चिम वाले पुकारा करते थेस्वामी विवेकानंद की विद्वता पूर्ण प्रस्तुति ने भारत वासियों को अब तक देखने की दृष्टि को ही बदल कर रख दिया था।स्वामी विवेकानंद का शिकागो में दिया गया यह व्याख्यान एक नये भारत व स्वतंत्र भारत का शंखनाद था। जिस कालखंड में स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था, तब संपूर्ण देश ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था। ब्रिटिश हुकूमत बहुत ही मजबूती के साथ अपनी पैठ भारत में स्थापित करती जा रही थी। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 1857 क्रांति दर्ज होने के बाद देशवासियों के भीतर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जागृति की लहरें पैदा होना शुरू हो गई थी। स्वामी विवेकानंद का शिकागो में दिया गया व्याख्यान ने भारत वासियों को जगाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।देशवासियों के मन में अपने गौरवशाली पुरखों के इतिहास हिलकोरे मार रहे थें। उन जागृति की लहरों को जन-जन तक पहुंचाने में स्वामी विवेकानंद के विचार ने देशवासियों के भीतर एक नई चेतना पैदा कर दी थी। उनका जन्म देश को जगाने के लिए ही हुआ था।स्वामी विवेकानंद विलक्षण प्रतिभा के महान संत थे। उन्होंने भारतीय उपनिषद, वेद, पुराण सहित विभिन्न ग्रंथों का व्यापक अध्ययन किया था। मानो उन्होंने भारत की गौरवशाली विरासत से साक्षात्कार कर लिया था। उन्हें यह पक्का विश्वास हो गया था कि जिस देश का इतना गौरवशाली इतिहास हो सकता है, वह देश कैसे परतंत्र रह सकता है? देश की परतंत्रता के कारणों की जड़ तक पहुंचने वाले स्वामी विवेकानंद कुछ ऐसा करना चाहते थे कि संपूर्ण विश्व, भारत के गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सके। इसलिए उन्होंने 11 सितंबर 1893 का विश्व धर्म सभा का दिन चुना था। वे कई परेशानियों को झेलते हुए विश्व धर्म सभा के मंच तक पहुंच पाये थे। उस ऐतिहासिक मंच पर वे करोड़ों भारतवासियों के अकेले प्रतिनिधि थे। उन्हें यकीन था कि भारत के प्रति पश्चिम वासियों की जो सोच थी, उसे सदा सदा के लिए बदल देना था। वे इसी उद्देश्य को लेकर मंच पर आसीन हुए थे। उनका सीना गर्व से चौड़ा था। ये बातें उनकी आंखें खुद-ब-खुद बंया कर रही थीं। इस विश्व धर्म सभा में सम्मिलित विचारको ने जब स्वामी विवेकानंद को देखा तो उन सबों को अहसास हो गया था कि स्वामी विवेकानंद कुछ चमत्कार जरूर करेंगे। परंतु भारत के संदर्भ में विश्व भर में प्रचारित बातों को ध्यान में रखते हुए उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह युवा सन्यासी ऐसा व्याख्यान देगा। पश्चिमी देशों की सोच के विपरीत विवेकानंद जी ने यह चमत्कार कर दिखाया था। जिसकी गूंज आज भी विश्व भर में गूंजित हो रही है। उन्होंने कहा, मेरे प्रिय अमेरिकावासी भाइयों और बहनों! आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है। उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं। धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं। सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिंदुओं की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं इस मंच पर बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं।जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरण समस्त धर्मों को सच मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ित और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। स्वामी विवेकानंद ने जिस अंदाज में अपनी बातों को इस मंच से रखा, आज भी उनकी बातें भारत वासियों को गौरवान्वित करती रहती हैं। उन्होंने कहा कि भारत के समस्त हिंदुओं की ओर से मैं आप सभी को धन्यवाद देता हूं। यह सुनकर विश्व धर्म सभा के सभी प्रतिनिधि अवाक रह गये थे। उन सबों ने ऐसी कल्पना भी ना की थी कि भारत का यह युवा सन्यासी इतने विद्वता पूर्ण ढंग से अपनी बातों को रखेगा। स्वामी जी ने बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से भारत की विरासत, भारत के धर्म, भारत के रीति रिवाज, रहन-सहन आदि से संबंधित बातों को रखा था। भारतवासी किस तरह सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते हैं? भारतवासी एक सहिष्णु देश के रूप में अपने सभी भाई बहनों के साथ मिलजुल कर रहते हैं। भारत सभी धर्मों का आदर करने वाला देश है। विश्व धर्म सभा से स्वामी विवेकानंद ने जिस तरह आह्वान किया, फलस्वरूप भारत के प्रति पाश्चात्य देशों की सोच को सदा सदा के लिए बदल कर रख दिया। उन सबों को यह विचारने के लिए विवश होना पड़ा था कि जिस देश का इतना गौरवशाली इतिहास है। वह देश कैसे परतंत्र रह सकता है ? उस धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने ना कोई अनशन किया, ना ही धरना दिया था। लेकिन अपनी जागृति पूर्ण बातों से वह काम कर दिखाया, जो पिछले दो हजार वर्षों में किसी भारतीय ने नहीं किया था। भारत की आजादी का इतिहास बहुत ही गौरवशाली है। लंबे संघर्ष के बाद देश को आजादी मिली थी। इस आजादी में शामिल स्वाधीनता सेनानियों के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद के विचार रहें। स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रेरित होकर हमारे कई स्वाधीनता सेनानियों ने राष्ट्र सेवा करने का संकल्प लिया था। स्वामी विवेकानंद के विचार जितने उनके जीवन काल में महत्वपूर्ण थे, आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनके विचारों में देश की एकता और अखंडता का पुट मिलता है। भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के विचारों पर स्वामी विवेकानंद का गहरा प्रभाव था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ने कहा- यद्यपि स्वामी विवेकानंद ने कोई राजनीतिक संदेश नहीं दिया, लेकिन जो उनके संपर्क में आया या जिसने भी उनके लेखों को पढ़ा, वह देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत हो गया। उनमें स्वत: ही राजनीतिक चेतना पैदा हो गयी। सुभाष चंद्र बोस ने बिल्कुल सही दर्ज किया कि स्वामी विवेकानंदने कोई राजनीतिक विचार नहीं दिया था। लेकिन उनके विचारों में देश की परतंत्रता की कोई बात स्वीकार नहीं थी। उन्हें यह स्वीकार था कि कैसे भारतवासी परतंत्रता से मुक्त हो। जब भारत वासियों का इतना गौरवमई इतिहास रहा है। तब उनकी भावी पीढ़ी गुलाम कैसे रह सकती है? स्वामी विवेकानंद का अपने धर्म और अपनी आस्था पर पूर्ण विश्वास था। उन्हें भारत वर्ष में जन्म लेने पर गर्व था। उनका कथन, तुम बस विचारों की बाढ़ लगा दो। बाकी प्रकृति स्वयं संभाल लेगी। अर्थात वे एक एक भारतीय को शिक्षित होते देखना चाहते थे। हर भारतवासी के अंदर में शिक्षा का अलख जगाना चाहते थे। भारत की नारियां, जो देश की आधी आबादी है। उसको भी शिक्षित करना चाहते थे। उनका मत था कि देश की आधी आबादी जब अशिक्षित रहेगी, तब देश कैसे स्वालंबन, स्वाधीनता और स्वाभिमान का अनुभव कर सकता है? इसलिए वे पुरुषों के साथ नारियों को भी शिक्षित करना चाहते थे। उन्होंने अपने भाषणों में नारियों की शिक्षा पर बहुत ही बल दिया था। नारी शिक्षा पर उन्होंने कहा, भारत की स्त्रियों को ऐसी शिक्षा दी जाये, जिससे वे निर्भय होकर भारत के प्रति अपने कर्तव्य को भलीभांति निभा सकें। वे संघमित्रा लीला, अहिल्या बाई और मीराबाई आदि भारत की महान नारियों द्वारा चलायी गयी परंपरा को आगे बढ़ा सके। स्वामी विवेकानंद सच्चे अर्थों में भारत में नव जागृति लाने वाले पहले संत थे। वे एक महान वक्ता थे। वे भारत के एक शिल्पकार के रूप में भी जाने जाते हैं। हम सब स्वामी विवेकानंद के विचारों को आत्मसात कर एक बेहतर भारत के निर्माण में महती भूमिका अदा कर सकते हैं।
सर्बानंद सोनोवालएबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज दुनिया भारत को किफायती और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में पारंपरिक ज्ञान के भंडार के रूप में पहचानती है। इसका मुख्य कारण आयुर्वेद और योग में इसकी प्रभावशीलता है। भारत की जी-20 की अध्यक्षता ने इस प्रभावकारिता को विश्व की अग्रणी हस्तियों और स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े विशेषज्ञों के सामने बहुत ही लक्षित तरीके से प्रदर्शित करने का सुनहरा मौका प्रदान किया।आयुष मंत्रालय ने वैश्विक समुदाय को यह बताने के लिए सभी प्रासंगिक विचार-विमर्श में सक्रिय रूप से भाग लिया। भारत के पारंपरिक स्वास्थ्य विज्ञान अच्छे स्वास्थ्य और कल्याण के सतत विकास लक्ष्य 3 (एसडीजी 3) पर ध्यान केंद्रित करते हुए मानवता और पर्यावरण की लगातार बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए इसे प्रदर्शित कर रहे हैं।अब यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कोविड के बाद वैश्विक समुदाय के स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार में भारी बदलाव आया है। अब यह समग्र स्वास्थ्य और कल्याण की ओर स्थानांतरित हो गया है। न्यायसंगत तरीके से उच्च गुणवत्ता, सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना अब मानवता की जरूरत है। पिछले 9 वर्षों के दौरान आयुष मंत्रालय की विभिन्न पहलों ने विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में आधुनिक तकनीकी उपकरणों और आधुनिक पद्धतियों को शामिल किया है, जिसके परिणामस्वरूप समग्र रूप से साक्ष्य-आधारित आयुष क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि हुई है।यह याद रखना उचित होगा कि जापान के ओसाका में जी-20 शिखर सम्मेलन के तीसरे सत्र के दौरान, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में 5 ए - एक्सेसीबल (पहुंच योग्य), अफोर्डेबल (किफायती), अप्रोप्रिएट (समुचित), एकाउंटेबल (जवाबदेह) और एडेप्टेबल (अनुकूलनीय) के बारे में बताया था। आयुष मंत्रालय इन आयामों में लगातार योगदान दे रहा है और भारत की जी-20 अध्यक्षता के तहत व्यापक चर्चा के दौरान मंत्रालय ने विभिन्न कार्यक्रमों/सेमिनारों में प्रदर्शित किया कि उसके पास (ए) जी-20 देशों के भीतर पारंपरिक चिकित्सा के लिए अनुसंधान एवं विकास और नियामक दिशा- निर्देशों का मानकीकरण को लेकर वैश्विक सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देने के लिए सभी आवश्यक साधन हैं; (बी) ज्ञान साझा करने, क्षमता निर्माण और सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों की सुविधा के लिए उद्योग जगत से हितधारकों को शामिल करना। मंत्रालय ने सहयोग और साझेदारी के संभावित क्षेत्रों की पहचान करने के लिए विभिन्न जी-20 भागीदारी और कार्य समूहों के साथ मिलकर काम किया।जी-20 के तहत स्वास्थ्य कार्यसमूह की स्थापना महत्वपूर्ण वैश्विक स्वास्थ्य मुद्दों पर संवाद बढ़ाने और जी-20 देशों के दिग्गजों को सूचित करने के लिए की गयी है। साथ ही, यह समूह वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए समान स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त करने की दिशा में काम करता है। आयुष मंत्रालय ने जी-20 की भारत की अध्यक्षता के दौरान स्वास्थ्य संबंधी सभी कार्य समूह कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लिया। यह सब 17-18 अगस्त को गुजरात के गांधीनगर में आयोजित पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक शिखर सम्मेलन में किया गया। गुजरात के जामनगर में पारंपरिक चिकित्सा के लिए डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर में भागीदारी, विचारों और अनुभवों के आदान-प्रदान के मामले में और डब्ल्यूएचओ पांरपरिक चिकित्सा रणनीति 2025-35 के दस्तावेज दोनों के लिए भविष्य की रणनीतियों को तैयार करने को लेकर शिखर सम्मेलन एक बड़ी सफलता थी।पारंपरिक चिकित्सा में भारत सरकार के प्रयासों की सराहना करते हुए, डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस ने इस वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान पांरपरिक चिकित्सा में भारत के निर्विवाद योगदान की पुष्टि की। उल्लेखनीय है कि इस वैश्विक शिखर सम्मेलन के परिणाम दस्तावेज को जल्द ही डब्ल्यूएचओ द्वारा गुजरात घोषणा के रूप में जारी किया जायेगा।हाल ही में, जुलाई में दिल्ली में जी-20 शेरपा, अमिताभ कांत की अध्यक्षता में आयुष मंत्रालय द्वारा स्थिति का जायजा लिया गया था। बैठक में जी-20 के माध्यम से वैश्विक स्तर पर चिकित्सा की आयुष प्रणालियों को बढ़ावा देने के आयुष मंत्रालय के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित किया गया। डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन (जीसीटीएम) के भीतर नवीन तकनीकों और नवीन दृष्टिकोणों को शामिल करने का सुझाव देते हुए, अमिताभ कांत ने विस्तार से बताया कि कैसे इनफ्यूजन पारंपरिक कार्यप्रणालियों को आधुनिक बनाएगा और उनकी प्रभावशीलता को बढ़ाएगा, जिससे पारंपरिक चिकित्सा की व्यापक स्वीकृति और उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने जी-20 के सभी भागीदार समूहों में पारंपरिक चिकित्सा के सिद्धांतों को एकीकृत करने के लिए हितधारकों के बीच बेहतर सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।जी-20 की विभिन्न एंगेजमेंट और वर्किंग ग्रुप की बैठकों में आयुष मंत्रालय के प्रयासों का निश्चित रूप से प्रभाव पड़ा है। इस बैठक में यह तब स्पष्ट हुआ जब स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अपर सचिव श्री लव अग्रवाल की टिप्पणी में उन्होंने भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की आगामी स्वास्थ्य संबंधी घोषणा में पारंपरिक चिकित्सा को शामिल करने की पुष्टि की। उन्होंने आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल के संदर्भ में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की पूरी क्षमता का पता लगाने और सहयोग करने के लिए विशेषज्ञों और हितधारकों को एक मजबूत मंच प्रदान करने के लिए पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक समर्पित मंच की स्थापना की आवश्यकता भी जतायी। उसी बैठक में, स्टार्टअप-20 के इंडिया चेयर चिंतन वैष्णव ने कहा कि आयुष चिकित्सा प्रणाली को भविष्य को आकार देने वाले स्टार्टअप-20 एजेंडा की सूची में शामिल किया गया है, जिसे ब्राजील की जी-20 की अगली अध्यक्षता के तहत आगे बढ़ाया जायेगा।अपने अत्याधुनिक अस्पतालों और अत्यधिक कुशल डॉक्टरों के साथ, भारत चिकित्सा पर्यटन के लिए सबसे लोकप्रिय स्थलों में से एक बनकर उभरा है। देश में चिकित्सा पर्यटन को और बढ़ावा देने के लिए, तिरुवनंतपुरम में पहले स्वास्थ्य कार्यसमूह ने चिकित्सा मूल्य यात्रा पर एक अतिरिक्त कार्यक्रम का आयोजन किया। यह भारत में चिकित्सा पर्यटन उद्योग में अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा करने के लिए एक लाभदायक और व्यावहारिक मंच था। यहां कई हितधारकों द्वारा यह देखा गया कि एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल पर आधारित चिकित्सा मूल्य यात्रा के माध्यम से दुनिया के देश आपस में जुड़ेंगे। इसमें पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को मजबूत तरीके से शामिल किया गया है। यह मौजूदा स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में असमानताओं को दूर करने के उद्देश्य को पूरा करेगा।उल्लेखनीय है कि आयुष उद्योग हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण बदलाव से गुजरा है। बाजार अनुसंधान रिपोर्ट के अनुसार बाजार में प्रति वर्ष 17 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है और अनुमान है कि यह 23.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक तक पहुंच गया है। ये संख्याएं किसी भी उद्योग मानक से बहुत अधिक हैं। आयुष की बढ़ती लोकप्रियता और स्वीकार्यता का श्रेय बढ़ी हुई जागरूकता, वैज्ञानिक मान्यता, सरकारी समर्थन, वैश्विक पहुंच, जीवनशैली के रुझान और आयुष प्रणालियों द्वारा पेश किए गए व्यक्तिगत दृष्टिकोण को दिया जाता है। जैसे-जैसे अधिक लोग आयुष कार्यप्रणालियों के लाभों का अनुभव करेंगे, मुख्यधारा की स्वास्थ्य देखभाल में इसकी स्वीकृति और जुड़ाव बढ़ने की संभावना है।एक मोर्चे पर, यह आयुष क्षेत्र में काफी विकास के अवसरों को दशार्ता है, लेकिन इस तेज वृद्धि के साथ जुड़ी चुनौतियाँ भी हैं। चुनौतियों को सुरक्षा, प्रभावकारिता, पारदर्शिता, विश्वसनीयता और नैतिक कार्यप्रणालियों के संदर्भ में देखा जा सकता है।बढ़ती लोकप्रियता ऐसे उदाहरण भी सामने लाती है जहां भ्रामक दावों ने जनता के बीच अविश्वास पैदा कर दिया हैं। भारत सरकार ने भ्रामक जानकारी के मुद्दे के समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें विज्ञापन और उपभोक्ता संरक्षण के मामले भी शामिल हैं। इसके संचालन में सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने और आयुष के क्षेत्र में विश्वास को बढ़ावा देने की यात्रा वर्ष 2014 में आयुष मंत्रालय की स्थापना के बाद से ही शुरू हो गयी थी।इन वर्षों के दौरान, मंत्रालय ने अपने फामार्कोविजिलेंस कार्यक्रम को मजबूत करके सक्रिय रूप से कदम उठाये हैं। भ्रामक विज्ञापनों की निगरानी के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित किया गया है। इसके साथ ही, भ्रामक विज्ञापन से संबंधित अन्य नियम और विनियमन भी ऐसे मामलों से निपटने में समान रूप से प्रभावी हैं।सरकार की प्रमुख पहलों में से एक मजबूत फामार्को-विजिलेंस कार्यक्रम का कार्यान्वयन है। ये कार्यक्रम आयुष दवाओं की सुरक्षा की निगरानी करने और प्रतिकूल घटनाओं या दुष्प्रभावों पर डेटा इकट्ठा करने के लिए तैयार किए गए हैं। यह कार्यक्रम प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट एकत्र करता है, उनका विश्लेषण करता है और उन पर प्रतिक्रिया देता है। इस पूरी प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाता है कि आयुष दवाओं की सुरक्षा प्रोफाइल की लगातार निगरानी की जा सके।मंत्रालय ने नियामक अनुपालन और स्थापित दिशा-निदेर्शों के पालन के महत्व पर जोर दिया है। इसने आयुष औषधियों के लिए एक नियामक ढांचा लागू किया है, जिसमें निमार्ताओं, आयातकों और वितरकों के लिए लाइसेंसिंग और प्रमाणन प्रक्रियाएं शामिल हैं। इसके अलावा, मंत्रालय ने आयुष के क्षेत्र में अनुसंधान और साक्ष्य-आधारित कार्यप्रणालियों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया है। यह आयुष उपचारों की प्रभावकारिता और सुरक्षा को मान्यता देने के लिए कठिन वैज्ञानिक अध्ययन और नैदानिक परीक्षणों को प्रोत्साहित करता है।आयुष मंत्रालय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचनाओं का आदान-प्रदान करने, सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को साझा करने और आयुष दवाओं की नियामक निगरानी को मजबूत करने के लिए नियामक अधिकारियों के साथ सहयोग करता है। यह सहयोग यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि सुरक्षा मानक वैश्विक कार्यप्रणालियों के अनुरूप हैं और उनके बीच तालमेल भी है। हाल ही में गांधीनगर में डब्ल्यूएचओ पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान, इस विषय पर गहन विचार-विमर्श किया गया, जिसके परिणामस्वरूप भाग लेने वाले देशों के बीच इस क्षेत्र में समन्वित कार्रवाई की संभावना बढ़ी है।संक्षेप में, पिछले कुछ महीनों के दौरान जी-20 की अध्यक्षता की गतिविधियों ने विभिन्न भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को साक्ष्य-आधारित प्रभावकारिता को प्रदर्शित करने और साझा करने का एक उत्कृष्ट अवसर प्रदान किया। इसने देश और दुनिया भर में पारंपरिक चिकित्सा क्षेत्र के सभी हितधारकों की आशा और विश्वास को भी मजबूत किया है कि भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां व्यापक तौर पर स्वास्थ्य कवरेज के ऊंचे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मानवता की सेवा करने में सभी आवश्यक साधनों से सुसज्जित हैं। (लेखक, केंद्रीय आयुष और पोत, पत्तन एवं जलमार्ग मंत्री हैं।)
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