आतंक से कोई समझौता नहीं, आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका और भारत साथ-साथ हैं डॉ मयंक चतुर्वेदी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत और अमेरिका के आपसी संबंध समय-समय पर कभी बहुत मधुर और कभी अत्यधिक गर्म होने के साथ ही विरोधाभासी दिखायी देते रहे हैं। किंतु इसके बावजूद एक स्थिति है जो कभी नहीं बदली, वह है आतंक के मुद्दे पर दोनों देशों का समान दृष्टिकोण। दोनों देश, भारत-अमेरिका ने आतंक से अब तक कोई समझौता नहीं किया है। आतंक किसी भी तरह का हो उसका समाप्त होना आवश्यक है, यही इन दोनों देशों की नीति रही है। इसलिए तमाम विरोधाभासों के बीच भी यह दोनों देश आतंक के मुद्दे पर बार-बार मिलते हैं और इसके संपूर्ण समापन के लिए मिल-जुल कर प्रभावी योजनाएं बनाकर रणनीतिक तौर पर परिणामकारी कार्य करते रहे हैं। वस्तुत: हाल ही में हुई इस विषय से संबंधित दोनों देशों की बैठक, होमलैंड सिक्योरिटी डायलॉग (एचएसडी) ने फिर एक बार साफ कर दिया है कि आतंकवाद, आनलाइन कट्टरपंथी कंटेंट, साइबर क्राइम, संगठित अपराध और ड्रग्स ट्रैफिकिंग समेत सुरक्षा से संबंधित विभिन्न विषयों को लेकर भारत और अमेरिका एक तरह से ही सोचते हैं। दोनों ही देशों ने फिर एक बार आतंकवादियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यात्रा करने की क्षमता को बाधित करने की दिशा में उपायों पर चर्चा की है। इनका दुनिया के सभी देशों से कहना है कि वे तत्काल ऐसे अपरिवर्तनीय कदम उठाएं जिससे यह सुनिश्चित हो कि उनके नियंत्रण वाले किसी भी क्षेत्र का उपयोग आतंकवादी हमलों के लिए नहीं किया जायेगा। मीटिंग में दोनों देशों के बीच आंतरिक सुरक्षा संवाद, सहयोग के साथ ही खुफिया जानकारी साझा करने पर भी बात हुई है। आज जब देश की राजधानी दिल्ली में भारत की तरफ से केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला और अमेरिका से होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट की कार्यवाहक उप-सचिव क्रिस्टी केनेगेलो और इनके प्रतिनिधिमंडल आपस में मिले हैं, तब फिर से आतंकवाद से जुड़े कई विषयों पर समान रूप से सहमति बनती दिखायी दी है। दोनों पक्षों ने आतंकवादी वित्तपोषण का मुकाबला करने, नार्को-तस्करी और आतंकवाद से इसके जुड़ाव, संगठित अपराध और टेरर फंडिंग, कट्टरता को रोकने और उसका मुकाबला करने, आतंकवादी उद्देश्यों के लिए इंटरनेट का उपयोग, मानव रहित एरियल सिस्टम, वर्चुअल एसेट्स और डार्क वेब और उभरती प्रौद्योगिकियों का आतंकवादी उद्देश्यों के लिए उपयोग समेत आतंकवाद रोधी चुनौतियों पर जोर देने पर गहरा विचार-विमर्श हुआ है। यहां अमेरिका से भारत ने संगठित अपराध और टेरर फंडिंग के मुद्दे पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। मीटिंग में भारत की तरफ से अमेरिका की धरती का उपयोग भारत के खिलाफ न हो और खालिस्तानी समर्थकों की गतिविधियों पर अमेरिका पूरी निगरानी रखने के साथ उनकी रोकथाम करने का उपाय भी करे, इसके लिए भी कहा गया है। भारत से साक्ष्यों के साथ अमेरिका का आज यह बताया है कि कैसे यूएस में बैठे कुछ खालिस्तानी समर्थक भारत में अलगाववाद तत्वों को वित्तीय और अन्य तरह से मदद मुहैया करा रहे हैं। जिसे तत्काल रोके जाने पर भारत का जोर है। इसमें कुल मिलाकर भारतीय पक्ष ने खालिस्तानी आतंकवाद के मुद्दे पर अपना रुख पूरी तरह से अमेरिका के समक्ष स्पष्ट कर दिया है। बातचीत के दौरान, दोनों पक्षों ने आतंकवाद-रोधी और सुरक्षा क्षेत्रों में चल रहे सहयोग की समीक्षा की है। साथ ही आज द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को और गहरा करने के लिए, दोनों पक्षों ने अमेरिकी संघीय कानून प्रवर्तन प्रशिक्षण केंद्र और भारत के सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के बीच कानून प्रवर्तन प्रशिक्षण पर सहयोग के एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी किये गये हैं। इसके साथ ही आगे के लिए यह तय हो गया है कि भारत और अमेकिरा दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी होमलैंड सुरक्षा वार्ता के अगले दौर के लिए आगे वाशिंगटन डीसी में मिलेंगे और इस बात की समीक्षा करेंगे कि हमने संयुक्त रूप से मिलकर जो लक्ष्य आतंकवाद के खिलाफ तय किया था, उसमें कितनी सफलता पायी है। इससे पहले पिछले जब पिछले साल दिसंबर में अमेरिकी सिक्योरिटी एजेंसी एफबीआई के डायरेक्टर क्रिस्टोफर रे का भारत आना हुआ था, तब भी इसी प्रकार से भारत-अमेरिका ने आतंक के विषय पर एक समान नीति को आगे बढ़ाने पर जोर दिया था। साथ ही इससे पहले विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों पक्षों ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादी संगठनों से उत्पन्न खतरों पर विचारों का आदान-प्रदान किया और अल-कायदा, आईएसआईएस-दाएश, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और अल बदर जैसे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई की जरूरत पर बल दिया गया था। आज यह ठोस और परिणामकारी भारतीय विदेश नीति का ही असर है जो अमेरिका ने अपनी अधिकारिक सरकारी वेबसाइट स्टेट डॉट जीओवी के माध्यम से आतंकवाद के विषय में भारत-अमेरिका के निर्णयों को बहुत विस्तार से सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया है। जिसमें उसने साफ कहा है कि भारत आतंकवाद के खतरे से अत्यधिक प्रभावित रहा है। भारत न सिर्फ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में बल्कि भू-रणनीतिक एवं अन्य सुरक्षा संबंधी विषयों में भी सदैव अमेरिका का अहम साझेदार रहा है और रहेगा। हम भारत द्वारा उसके लोकतांत्रिक मूल्यों और नियमों के संदर्भ में आतंकवाद से निपटने के तौर-तरीकों का सम्मान करते हैं। इसके साथ ही यहां पर एक आतंकवाद से निपटने के लिए अमेरिका-भारत का संयुक्त घोषणा पत्र भी पढ़ने को मिलता है। जिसमें साफ कहा गया है कि आतंकवाद, जो वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए गहरा खतरा है, का मुकाबला करने और लोकतंत्र, न्याय और कानून के शासन के हमारे सामान्य मूल्यों को बनाए रखने के लिए भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रतिबद्धता एक दूसरे के साथ परस्पर स्पष्ट है। अल-कायदा और उसके सहयोगियों, लश्कर-ए-तैयब्बा, जैश-ए-मोहम्मद, डी कंपनी और हक्कानी नेटवर्क और अन्य क्षेत्रीय समूहों जैसी संस्थाओं द्वारा उत्पन्न खतरे से निपटने के लिए आज दोनों ही देश मिलकर कार्य करने के लिए संकल्पित हैं। साथ ही यहां पर भारत में हुए सभी आतंकवादी हमलों एवं आर्थिक रूप से किए गए हमलों की भी निंदा की गई है और भविष्य में इस प्रकार की हमलों को कैसे रोका जा सकता है इसके लिए प्रभावी कदम उठाये जाने पर बल दिया गया है। कहना होगा कि इस वक्त जो भारतीय विदेश नीति कार्य कर रही है, उसका ही आज यह परिणाम है कि दुनिया के तमाम देशों के साथ भारत के मधुर संबंध बने हैं और बन रहे हैं सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक ट्रेड हो, सभी में भारतीय प्रभावी भूमिका में नजर आ रहे हैं। आतंकवाद को रोकने के संदर्भ में भी यही बात यहां लागू हो रही है। जिस तरह से आज भारत और अमेरिका आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं, वह न सिर्फ भारत या अमेरिका के हित में है, बल्कि पूरी मानव जाति के हित में है। आज विदेश मंत्रालय बता भी रहा है कि अमेरिका ने आतंकवाद का मुकाबला करने के वैश्विक प्रयासों में भारत के नेतृत्व की सराहना की है। वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) आतंकवाद रोधी समिति की एक विशेष बैठक की भारत द्वारा मेजबानी किए जाने की सराहना कर रहा है।इसके साथ ही अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ते भारत की अमेरिका द्वारा की जा रही प्रशंसा आज यह बताने के लिए पर्याप्त है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार सभी नीतिगत निर्णयों के मामले में बहुत अच्छा कार्य कर रही है। आज इतना अच्छा कार्य हो रहा है कि दुनिया भर में भारत का सम्मान बढ़ता हुआ हर भारतीय को साफ दिखाई देता है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
विक्रम उपाध्यायएबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्वामी नारायण संस्था (बीएपीएस) के प्रबंधन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी जय पटेल हाल ही में यूएई से स्वदेश लौटे हैं। वहां से लौटने पर अहमदाबाद में जय पटेल ने यादगार पलों को हमारे साथ साझा किया। उन्होंने कहा, बप्पा के संदेश को चांद तक पहुंचने के पीछे की दूरदर्शी शक्ति पूरी तरह से पूज्य ब्रह्मविहारी स्वामी जी के गहन ज्ञान और अटूट भक्ति में निहित है।उल्लेखनीय है इस संस्था ने कुछ दिन पहले यूईए में भव्यतम हिंदू मंदिर का निर्माण कराया है। जय पटेल कहते हैं, स्वामी जी का तकनीकी पक्ष सबसे अहम है। उनका पूरा फोकस अंतरिक्ष अन्वेषण पर है। स्वामी जी की प्रतिक्रिया सूक्ष्म लेकिन गहन व्यावहारिक है। यूएई प्रवास के दौरान श्रद्धेय गुरु परम पूज्य प्रमुख स्वामी महाराज और परम पूज्य महंत स्वामी महाराज की पवित्र विरासत को ब्रह्माण्ड तक विस्तारित करने के बारे मे गहन चर्चा हुई।इस अनौपचारिक चर्चा ने उस समय असाधारण मोड़ ले लिया जब स्वामीजी ने चांद की शांत छवि, बप्पा के दिव्य चेहरे और एक दिव्य मंदिर से सजे कैलेंडर की और इशारा किया। उन्होंने चांद की सतह पर एक संदेश उकेरने का साहसिक विचार प्रस्तावित किया। यह मानव इतिहास में एक अद्वितीय उपलब्धि है। अटकलों से दूर स्वामी जी ने अपने पूज्य गुरु को श्रृद्धांजलि देने और वैश्विक शांति और सद्भाव को बढ़ावा देने के महान उद्देश्य के लिए इस उच्च आकांक्षा को साकार करने के लिए दृढ़ प्रतिबद्धता व्यक्त की।यह एक ऐतिहासिक क्षण होता है। यही क्षण सीमाओं को पार करता है और दिलों को एकजुट करता है। संस्थापक काम गफरियन और सीईओ स्टीव अल्टेमस की लीडरशिप में इंटुएटिव मशीन्स ने अभूतपूर्व महत्व के एक मिशन की शुरुआत की है।रिलेटिव डायनेमिक इंक के कुश पटेल के साथ सहयोग करते हुए टीम ने परम पूज्य प्रमुख स्वामी महाराज और परम पूज्य महंत स्वामी महाराज की शिक्षाओं और स्वामी ब्रह्मविहारी के मार्गदर्शन के साथ चांद की सतह पर शांति, एकता और सद्भाव का एक संदेश उकेरा है। इस उल्लेखनीय उपलब्धि को हासिल करने में कुश पटेल का समर्पण और अटूट प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण है।चंद्रमा पर बप्पा के संदेश को उकेरने की यात्रा ग्लोबल यूनिटी और समझ को बढ़ावा देने की साझा दृष्टि के साथ हुई। निस्वार्थ सेवा और मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण के लिए परम पूजनीय प्रमुख स्वामी महाराज दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं। उनकी शिक्षाएं, परम पूज्य ब्रह्मविहारी स्वामी की शिक्षाओं के साथ मानवता के लिए मार्गदर्शक रोशनी के रूप में काम करती हैं और साथ ही करुणा और सद्भाव के मार्ग को रोशन करती है।गफरियन और स्टीव अल्टेमस, नासा की दूरदर्शी लीडरशिप में इंटुएटिव मशीन्स ने इन सम्मानित आध्यात्मिक लीडर्स की विरासत का सम्मान करने के लिए इस महत्वाकांक्षी प्रयास की शुरूआत की है। आईएम-1 मिशन कोलेबोरेशन (आपसी सहयोग) और इनोवेशन (नवाचार) की शक्ति का एक प्रमाण है जो इतिहास बनाने के लिये दुनिया भर से प्रतिभाओं को एक साथ लाता है। बकौल जय पटेल वो ब्रह्मविहारी स्वामी में तीन उल्लेखनीय व्यक्तियों का अवतार देखते हैं जिसमें परमपूज्य प्रमुख स्वामी महाराज परम स्वामी विवेकानंद और यहां तक कि टाम क्रूज की एक झलक भी। अपने आध्यात्मिक पूर्ववर्तियों की तरह ब्रह्मविहारी स्वामी जी में भी सपनों की हकीकत में बदलने की क्षमता है। बप्पा का शांति और सद्भाव, एक विश्व, एक परिवार का संदेश चांद पर चमक रहा है। आठ अरब आत्माओं को मंत्रमुग्ध कर रहा है। इससे स्पष्ट है कि ब्रह्मविहारी स्वामी की दृष्टि की कोई सीमा नहीं है। (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
चालीसा संदेश सुश्री अनिमा टोप्पो एबीएन सोशल डेस्क। लेंट काथोलिक चर्च के अनुसार एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवधि है। यह पवित्र समय मसीही विश्वासियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस विशेष काल में हम खीस्त विश्वासी उपवास, प्रार्थना, त्याग से अपने जीवन को और बेहतर बनाते हैं। हम ईश्वर के मार्ग में चलने की कोशिश करते हैं। इससे हम पास्का पर्ब को योग्य रीती से मनाने के लिए तैयार होते हैं। हमारा संपूर्ण जीवन प्रकृति से जुड़ा है। सृष्टि के हर जीव जंतु मानव के जीवन को जीने के लिए प्रेरित करतें हैं और हौसल देते है। हमारे पर्यावरण के पेड़ पौधे भी हमें अपने जीवन में आगे बढने के लिए हमें एक बड़ी अध्यात्मिक शिक्षा देती है। हमारे आस-पास एवं बगानों में, गर्मी के समय में ही पेड़-पौधें काफी तीव्र गति से और सबसे ज्यादा बढ़ते हैं। पेड़ के सभी पत्तियां झड़ जाती हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो कि पेड़ का जीवन खत्म होने ही वाला है। परंतु ऐसा नहीं है। कुछ ही दिनों के बाद नई ऊर्जा के साथ उसकी ऊंचाइयां बढ़ने लगती है। उसमें नए-नए पत्ते लगते हैं, नई कलियां, फूल और फल आने लगते हैं। इस तरह से सब कुछ नया हो जाता है। ठीक उसी प्रकार चालीसा काल हर ख्रीस्त विश्वासियों के लिए अपने जीवन के बुराइया रूपी पुरानी पतियों को अलग करने का समय है। तथा क्षमा, प्रेम, और लोगो की जरूरतमंद की सेवा और सहायता से अपने जीवन को नया और बेहतर बनाने का समय है।इस तरह हम ईश्वर के साथ हमारा रिश्ता और मजबूत वा अधिक गहरा होता है तथा हम पास्का पर्व मनाने के लिए योग्य बनते हैं। (लेखिका प्रभात तारा मध्य विद्यालय, धुर्वा की शिक्षिका हैं।)
फादर प्रफुल बड़ाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। इसाई लोग राखबुध के दिन अपने माथे पर राख लगाकर ईस्टर रविवार के पूर्व चालीसा काल की शुरूआत करता है। उस बुधवार को वे राखबुध भी कहते हैं। राखबुध के दिन गिरजाघरों में विषय प्रार्थना की जाती है, उसी दौरान उनके सिर या माथे पर राख से क्रूस का चिह्न बनाया जाता है। इस दिन वे विशेष प्रार्थना, उपवास और परहेज करते हैं। इसी दिन से चालीसा प्राम्भ हो जाता है इसे लेंट भी कहते हैं।यह 40 या उससे अधिक दिनों का समयावधि होता है। यह काल इसाई धर्मावलंबियों के लिये विशेष समय होता है। राखबुध से लेकर पूरे चालीस दिनों तक लोग प्रार्थना, त्याग, तपस्या, पुण्य काम, परोपकार, बाईबल पठन, पापों के प्रति पश्चाताप और अपने जीवन का मूल्यांकन करते हुए येसु के प्रेम, बलिदान, दुख, मृत्य के रहस्यों का चिंतन करते है। राख का अनेक अर्थ या महत्व हो सकता है। लकड़ी या पत्ते की राख मिट्टी की उर्वरकता को बढ़ाने में सार्थक होता है। पौराणिक काल में इसे औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता था। ग्रामीण आंचलों में लोग राख का प्रयोग कपड़ा साफ करने के लिए भी करते थे। विभिन्न धर्मों में इसका धार्मिक महत्व भी हैं। यह शरीर की क्षणभंगुरता व नश्वरता को प्रकट करता है। साधु संत लोग स्नान के बाद राख लगाते थे यह अपने को याद दिलाने के लिये कि यह शरीर एक दिन राख बन जायेगा। शरीर तथा संसार से विरक्त रोह। होली का त्योहार बुराइयों को भष्म करने तथा शांति पाने का साधन माना जाता है। इसाइयों के लिए भी राख अहम मायने रखता है इसे हम धार्मिक मूल्यों के आधार पर जानने का प्रयास करे। कैथोलिक कलीसिया में और अन्य कुछ कलीसिया में भी बुधवार के दिन लोग गिरिजा घरों में इक्कट्ठे होते हैं, विशेष प्रार्थना या मिस्सा बलिदान में भाग लेकर पुरोहित या अधिकृत व्यक्ति द्वारा सिर पर राख क्रूस अंकित किया जाता है। क्रूस अंकित करते हुए पुरोहित कहता है- ऐ मनुष्य याद रख तू मिट्टी है और मिट्टी में मिल जायेगा या पश्चाताप करो और सुसमाचार में विश्वास करो। यह राख पिछले वर्ष के पाम संडे पर आशीषित खजूर के पत्तों को भष्म कर बनाया जाता है उस पर आशीष प्रार्थना की जाती है। बाईबल की पुरानी व्यवस्थान में हम पाते हैं। तपस्य तथा माथे के राख से यूहदियों के जीवन बच जाता है। एस्तेर 4:17 एस्तेर बाबुल के राजा के अनेक रानियों में एक थीं। एस्तेर एक यहूदी थी। इस्राएल से लायी गयी एक गुलामी महिला थी। उसके सुंदर चरित्र एवं सौंदर्य के कारण राजा ने उसे अपना पत्नी बनाया। एस्तेर के लिए जब पता चलता है कि राज दरबार का एक मंत्री यहूदियों को मारने का षडयंत्र रच रहा है। जब रानी एस्तेर को पता चला तो उसके अंदर बहुत दु:ख हुआ। वह मृत्यु के भय से प्रभु की शरण गयी। उन्होंने राजकीय वस्त्र उतारकर शोक के वस्त्र धारण किये। बहुमूल्य विलेपन के बदले अपने माथे पर राख डाला, घोर तपस्य द्वारा अपने शरीर को तपाया। तीन दिनों के कठोर तपस्या के पश्चात राजा के पास राजकीय पोषक के साथ आती है राजा का मन परिवर्तित हो जाता है। बाद में षडयंत्र रचने वाला मंत्री मारा जाता है। एस्तेर के तपस्य से बाबुल के गुलामी में रह रहे यहूदी मृत्यु से बच जाते हैं। राख प्रयाश्चित का प्रतीक है। जब नबी दानिएल के लिए पता चला कि कुछ वर्षों के बाद येरूसलेम नगर नष्ट किया जाएगा, पवित्र मंदिर विनाश किया जाएगा तो नबी दानिएल के दिल में अपने नगर एवं लोगों के प्रति दया उमड़ती है। वह माथे पर राख डालकर उपवास व प्रार्थना करता है। वह अपने यहूदी लोगों तथा पूर्वजों के पापों के लिए प्रायश्चित करता है। राख तथा तपस्या विपत्ति व विनाश से बचाता है।योना का ग्रंथ अध्यय 3 में पाते हैं, असुर देश के नीनवे शहर में योना नबी घुम-घुमकर कहता है आज से ठीक चालीस दिन बाद ईश्वर इस शहर में विनाश लाने वाला है। इसे विरोधियों के हाथों में दे देगा। इसलिए पश्चाताप करो। नीनवे के राजा ने यह खबर सुना उन्होंने अपना राज वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया और राख पर बैठ गया।वह जानवर व लोगों को आदेश देता है कि वे प्रायश्चित करें। जब ईश्वर देखता है कि नीनवे के सभी प्राणी व लोग प्रायश्चित कर रहे हैं तो ईश्वर उन्हे विनाश से बचा लेता है। पाप से दूर होने और पश्चाताप का प्रतीक है। नये व्यवस्थान में मति का सुसमाचार अध्यय 11:20 में येसु ने उन लोगों को धिक्कारा जो उनके वचन को सुना तथा चमत्कार देखा फिर भी पश्चाताप नहीं किया। यही काम अगर तिरुस और सिदोन में किया होता वे कब के टाट ओढ़ते और राख लगा कर प्रायश्चित करते।राख जीवन की क्षणभंगुरता को प्रस्तुत करता है। यह शरीर टिकाऊ नहीं है। अयूब का ग्रंथ अध्याय 1: 21 में नंगा ही मां के गर्भ से आया और नंगा ही इस धरती के गर्भ में जाऊंगा। हम क्या ले आये और इस संसार से क्या ले जायेंगे। मनुष्य मात्र सांस है। बाईबल में कहा गया है ईश्वर ने मनुष्य को मिट्टी से बनाया। ईश्वर ने उसमें प्राण वायु फंूका। स्तोत्र ग्रंथ अध्याय 90:3 तू मनुष्य को फिर मिट्टी में मिलाते हुए काता है, आदम की संतान लौट जा। चालीसा काल त्याग, तपस्या, प्रार्थना तथा पश्चाताप का समय है। इसकी शुरुआत माथे पर राख लगा कर किया जाता है। चालीसा काल आपके लिए पुण्य समय हो यही कामना करता हूं। (लेखक संत अल्बर्टस कॉलेज रांची से संबद्ध रखते हैं।)
मोबाइल-लैपटॉप चार्जिंग के लिए घर में इलेक्ट्रिकल सॉकेट में चार्जर लगे रहते हैं। इन तारों को छोटे बच्चे मुंह में चबा सकते हैं या सॉकेट में अंगुली डाल सकते हैं। करंट के चलते हादसा हो सकता है। ऐसे में सतर्कता जरूरी है। गैजेट्स चार्ज कर स्विचआफ करें, सॉकेट बच्चों की पहुंच से दूर रखें या फिर चाइल्ड प्रूफिंग करवा दें। डॉ मोनिका शर्मा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कुछ समय पहले कर्नाटक में मोबाइल चार्जर के करंट से आठ महीने की मासूम बच्ची का जीवन छिन गया। सॉकेट में लगे चार्जर के तार से खेलते हुए बच्ची ने उसे मुंह में चबा लिया। जिससे करंट लगने से उसकी जान चली गई। इस तरह की खबरें कई बार अलग-अलग समाचार माध्यमों में पहले भी सामने आयी हैं। ऐसी दुर्घटनाएं हर किसी की चेताने वाली है। दरअसल, हमारी जिंदगी में बढ़ते स्मार्ट गैजेट्स ने ऐसे हादसों की आशंका बढ़ा दी है। घरों के कोने-कोने में चार्जर लगे होते हैं वहीं स्मार्ट फोन, लैपटॉप, ईयर प्लग्स और जाने क्या-क्या? ऐसे में बच्चों की सुरक्षा के लिए चार्जर के मामले में भी सतर्कता बरतना आवश्यक है। सही जगह चुनें जहां तक बच्चों की संभाल का मामला है तो बच्चों के लिए घर से सुरक्षित जगह कोई नहीं होती है। माता-पिता इसके लिए हर संभव इंतजाम करने की कोशिश भी करते हैं। बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी हर सुविधा जुटाते हैं पर कई बार घर के बड़ों की एक छोटी सी लापरवाही बच्चों की सेफ्टी के लिए खतरा बन जाती है। मामूली सी गलती बड़ी दुर्घटना को न्योता देने वाली साबित होती है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के चार्जर्स को लेकर बेहद सतर्क रहना जरूरी है। यहां-वहां किसी भी सॉकेट में चार्जर न लगाएं। घर में छोटे बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए चार्जर हमेशा किसी ऊंची जगह पर लगे सॉकेट में लगाएं या फिर चार्जर किसी ऐसे कोने में लगा हो जहां बच्चे पहुंच ही न पायें। स्विच आफ करना न भूलें घर के भीतर बच्चों के साथ होने वाली ऐसी ज्यादातर दुर्घटनाओं को घर के बड़ों की थोड़ी सी सजगता से रोका जा सकता है। स्मार्ट गैजेट्स को चार्ज करने के बाद स्विच आफ करना ऐसा ही छोटा सा कदम है, जो किसी अनहोनी को टाल सकता है। देखने में आता है हमारे घरों में लगे बहुत से चार्जर्स का स्विच आफ ही नहीं किया जाता। पैरेंट्स को अपनी इस आदत को बदलने की आवश्यकता है क्योंकि बच्चे अपनी जिज्ञासा और चंचलता के कारण सॉकेट के साथ खेलने लगते हैं। स्विच का आन होना करंट लगने के कारण हादसा बन सकता है। वैसे कोशिश तो यही होनी चाहिए कि बच्चे सॉकेट के पास ही न पहुंचें। सॉकेट में लगे चार्जर को वे छू भी न पाएं। फिर भी कभी ऐसा हो जाये तो चार्जर वाले सॉकेट का स्विच आॅफ होने से दुर्घटना का खतरा बहुत हद तक टल जाता है। सुरक्षा के इंतजाम घर में उपयोग होने वाले इलेक्ट्रिकल सॉकेट में चार्जर्स लगाने से जुड़ी सावधानियां बरतने के साथ ही उपयोग में न आ रहे सॉकेट्स पर भी गौर कीजिए। कई बार ऐसा होता है कि काम में न आने वाले सॉकेट भी हादसों का कारण बन जाते हैं। बच्चे खेलते हुए कइ बार सॉकेट में अंगुली, कभी किसी खिलौने का हिस्सा या कोई अन्य चीज डाल देते हैं। ऐसे में यह बेहद जरूरी हो जाता है कि घर में जिन इलेक्ट्रिकल सॉकेट का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा उन्हें बच्चों के लिए सुरक्षित बनाया जाये। इसके लिए तकनीकी उपाय या किसी मॉडर्न उपकरण का सहारा लिया जा सकता है। बिजली के ऐसे सॉकेट के लिए बाजार में चाइल्ड प्रूफिंग भी उपलब्ध है। इसे लगाकर घर में ऐसे सॉकेट्स के जोखिम से बच्चे की सुरक्षा यकीनी बनायी जा सकती है। असल में चाइल्ड प्रूफिंग, एक तरह का छोटा सा इलेक्ट्रिकल सॉकेट कवर होता है। इसे लगाने से घर में यहां-वहां लगे सॉकेट आपके नन्हे बच्चों के लिए खतरा नहीं बन सकते। ऐसी छोटी-छोटी सावधानियों को अपनाकर पैरेंट्स द्वारा बच्चों के लिए अपने घर के आंगन को सुरक्षित बनाया जा सकता है।
विश्व कैंसर दिवस 04 फरवरी पर विशेषरमेश सर्राफ धमोरा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कैंसर का नाम सुनते ही घबराहट होने लगती है। पीड़ित बीमारी से अधिक तो कैंसर के नाम से डर जाता है। जिस व्यक्ति को कैंसर होता है वह तो गंभीर यातना से गुजरता ही है उसके साथ ही उसका परिवार को भी बहुत कष्टमय स्थिति में गुजरना पड़ता है। जानलेवा होने के साथ ही कैंसर की बीमारी में मरीज को बहुत अधिक शारीरिक पीड़ा भी झेलनी पड़ती है। कैंसर की बीमारी इतनी भयावह होती है, जिसमें मरीज की मौत सुनिश्चित मानी जाती है। बीमारी की पीड़ा व मौत के डर से मरीज घुट-घुट कर मरता है। कैंसर के बारे में जागरुकता बढ़ाने और इसकी रोकथाम, पहचान और उपचार को प्रोत्साहित करने के लिए 04 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है। विश्व कैंसर दिवस के परिप्रेक्ष्य 04 फरवरी 2000 को पेरिस में न्यू मिलेनियम के लिए कैंसर के खिलाफ विश्व शिखर सम्मेलन में हुआ था। विश्व कैंसर दिवस का प्राथमिक लक्ष्य कैंसर और बीमारी के कारण होने वाली मौतों को कम करना है। 1933 में अंतरराष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण संघ ने स्विट्जरलैंड में जिनेवा में पहली बार विश्व कैंसर दिवस मनाया था।यह दिवस कैंसर के बारे में जागरुकता बढ़ाने, लोगों को शिक्षित करने, इस रोग के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए दुनिया भर में सरकारों और व्यक्तियों को समझाने तथा हर साल लाखों लोगों को मरने से बचाने के लिए मनाया जाता है। 2014 में इसे विश्व कैंसर घोषणा के लक्ष्य 5 पर केंद्रित किया गया है, जो कैंसर के कलंक को कम और मिथकों को दूर करने से संबंधित है।दुनिया भर में हर साल एक करोड़ से अधिक लोग कैंसर की बीमारी से दम तोड़ते हैं, जिनमें से 40 लाख लोग समय से पहले (30-69 वर्ष आयु वर्ग) मर जाते हैं। इसलिए समय की मांग है कि इस बीमारी के बारे में जागरुकता बढ़ाने के साथ कैंसर से निपटने की व्यावहारिक रणनीति विकसित करनी चाहिए। 2025 तक कैंसर के कारण समय से पहले होने वाली मौतों के बढ़कर प्रति वर्ष एक करोड़ से अधिक होने का अनुमान है। यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2025 तक कैंसर के कारण समय से पहले होने वाली मौतों में 25 प्रतिशत कमी के लक्ष्य को हासिल किया जाए तो हर साल 15 लाख लोगों का जीवन बचाया जा सकता है। अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा कैंसर मरीज भारत में है। 2020 में 1.93 करोड़ नए कैंसर मरीज सामने आए थे, जिनमें 14 लाख से अधिक भारतीय थे। इतना ही नहीं भारत में सालाना बढ़ते कैंसर मामलों के चलते 2040 तक इनकी संख्या में 57.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी होने की आशंका है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के अनुसार देश में कैंसर के मामलों की संख्या 2022 में 14.6 लाख से बढ़कर 2025 में 15.7 लाख होने का अनुमान है, जिसके लिए सरकार को चिकित्सा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है। तभी समय पर कैंसर मरीजों की जांच से पहचान कर सही उपचार कर देकर उनकी जान बचाई जा सकती है। नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कहा है कि देश के अधिकांश क्षेत्रों में कैंसर की सही निगरानी नहीं हो पा रही है, जिस कारण अधिकांश मामलों में बीमारी का देरी से पता चल रहा है। देश के सभी शोध केंद्रों को पत्र लिख आईसीएमआर ने कैंसर की जांच और निगरानी को आसान बनाने के लिए प्रस्ताव मांगे हैं। देश के सभी जिलों में कैंसर निगरानी और जांच को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान के तहत नई नीति बनाने के लिए आईसीएमआर को जिम्मेदारी सौंपी है। इसके लिए अलग-अलग शोध टीमें गठित होंगी और भौगोलिक व स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा स्थिति के आधार पर वैज्ञानिक तथ्य एकत्रित किए जाएंगे। आंकड़े बताते हैं कि भारत में कैंसर से साल 2020 में 7,70,230, 2021 में 7,89,202 और 2022 में 8,08,558 लोगों की मौत हुई है। देश में कैंसर के मामलों की कुल संख्या 2022 में 14,61,427 रही। वहीं 2021 में यह 14,26,447, जबकि 2020 में 13,92,179 थी। सबसे ज्यादा कैंसर के मरीज उत्तर प्रदेश में हैं। यहां 2020 में 2,01,319, 2021 में 2,06,088 और 2022 में 2,10,958 मरीज मिले। वहीं सबसे कम कैंसर मरीज केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में हैं। यहां 2020 में 27, 2021 और 2022 में 28-28 मरीज मिले हैं। कैंसर रोगों का एक समूह है जो असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि और प्रसार से होता है। ये कोशिकाएं ट्यूमर नामक द्रव्यमान का निर्माण कर सकती हैं। जो शरीर के सामान्य कामकाज में हस्तक्षेप कर सकती हैं, जबकि कैंसर किसी को भी प्रभावित कर सकता है। यह पहचानना आवश्यक है कि कुछ जीवनशैली विकल्प, जैसे धूम्रपान, खराब आहार और शारीरिक गतिविधि की कमी, कैंसर के विकास के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। हाल ही में आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक फफड़ों का कैंसर (लंग्स कैंसर) सबसे खतरनाक कैंसर हो सकता है। हमारे देश में भी लंग्स कैंसर के केस तेजी से बढ़ रहे हैं। डॉक्टरों का अनुमान था कि 2023 के आखिर तक करीब 2.38 लाख से ज्यादा लोगों में लंग्स कैंसर मिल सकता है। विश्व कैंसर दिवस 2024 की थीम है केयर गैप को बंद करें। यह कैंसर देखभाल में वैश्विक असमानताओं को रेखांकित करती है। यह कैंसर के खिलाफ लड़ाई में सभी के लिए समान स्वास्थ्य देखभाल के महत्व पर जोर देते हुए, गुणवत्तापूर्ण उपचार तक पहुंच में अंतर को पाटने के लिए सामूहिक कार्रवाई का आह्वान करता है।कैंसर का पता लगाने, कैंसर के प्रकार और कारण, डायग्नोस और उपचार में काफी प्रगति हुई है, लेकिन अफसोस की बात है कि दुनिया की ज्यादातर आबादी के पास अभी भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवायें नहीं पहुंच पाई हैं, जिसमें गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की देखभाल, रेगुलर टीकाकरण, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं और पुरानी बीमारी का इलाज शामिल है। कैंसर की रोकथाम के बारे में जागरुकता फैलाकर, हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स को ट्रेनिंग देकर, इफेक्टिव कम्युनिटी बेस्ड प्लान को लागू करके, हम इस बीमारी से बचाव कर सकते हैं। विश्व कैंसर दिवस दुनिया पर कैंसर के प्रभाव को कम करने के लिए सभी के लिए मिलकर काम करने का एक अवसर है। जागरुकता बढ़ाकर, शिक्षा को बढ़ावा देकर, दूसरों को नैतिक रूप से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करके और कैंसर के खिलाफ लड़ाई में समर्थन देकर ऐसे लोगों का जीवन बचाना है जिसे रोका और ठीक किया जा सकता है। एकजुट होकर और काम करके हम इस बीमारी से हमारे स्वास्थ्य, हमारी अर्थव्यवस्था और एक समाज के रूप में हमारी आत्माओं पर पड़ने वाले असर को कम कर सकते हैं। कैंसर दुनियाभर में मौत का प्रमुख कारण बना हुआ है। विश्व स्वस्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार 2020 में लगभग एक करोड़ लोगों की मौत कैंसर से हुई थी, जिसमें ब्रेस्ट और लंग कैंसर के सबसे अधिक मामले सामने आए थे। डब्लूएचओ के अनुसार दुनिया भर में कैंसर के प्रति जागरुकता बढ़ाने से कैंसर के कारण होने वाली मौतों की संख्या को 30-50 प्रतिशत तक कम करने में मदद मिल सकती है। कैंसर की चुनौती से निपटने का सबसे अच्छा तरीका इस मुद्दे के बारे में लोगों से बातचीत शुरू कर के जागरुकता बढ़ाई जाए, तभी कैंसर जैसी जावलेवा बीमारी से लोगों की जीवन रक्षा की जा सकेगी। (लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
विष्णुदत्त शर्माराम राज बैठे त्रैलोका।हर्षित भये गये सब सोका।।एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह चौपाई अब वास्तविकता बनने जा रही है जब श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से चहुंओर हर्ष और आनंदमय वातावरण होगा। 5 अगस्त 2020 को राममंदिर की आधारशिला रखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जय सियाराम के उद्घोष के साथ अपने संबोधन में कहा था कि आप भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिये... इमारतें नष्ट हो गयीं, अस्तित्व मिटाने का भरसक प्रयास हुआ, लेकिन प्रभु श्रीराम आज भी हमारे मन में बसे हुए हैं। प्रभु श्रीराम हमारी संस्कृति के आधार हैं, भारत के जनमानस के विचार हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संकल्प स्वरूप यह भी कहा था कि राम काज किन्हें बिनु, मोहि कहां विश्राम22 जनवरी 2024 को भव्य-दिव्य मंदिर में हमारे रामलला विधि-विधान के साथ विराजने जा रहे हैं। सांस्कृतिक सभ्यता से परिपूर्ण हमारा भारत सरयू के किनारे एक स्वर्णिम अध्याय रचने जा रहा है। सोमनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक अयोध्या धाम इतिहास गढ़ने जा रहा है। आज संपूर्ण भारत राममय होकर आनंदित है। हर मन प्रफुल्लित है और भारतवासी भावुक हैं क्योंकि पांच सदियों का इंतजार खत्म होने जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की दृढ़ संकल्प शक्ति और कर्तव्य परायणता से अयोध्या धाम में श्री राम मंदिर निर्माण के साथ ही अनेक विकास परियोजनाओं के सृजन से अद्भुत अलौकिक वातावरण का निर्माण होने जा रहा है।हमारे रामलला की प्राण प्रतिष्ठा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, अपितु यह हमारे सांस्कृतिक अभ्युदय का प्रतीक है। यह प्राण प्रतिष्ठा आस्था, धैर्य और संकल्प के विजय का परिचायक है। यह हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक स्मृतियों एवं आध्यात्मिक मूल्यों का प्रतिबिंब भी है। अयोध्या में बना यह मंदिर देश के लिए सिर्फ पूजा स्थल नहीं बल्कि यह हमारे पूर्वजों के तप, त्याग और संकल्प का स्थायी प्रेरणापुंज है। जिन कारसेवकों के आंदोलन रूपी तपस्या के फलस्वरूप श्री रामलला का मंदिर आकार ले पाया है, वह आंदोलन अर्पण, तर्पण और संकल्प से ओत-प्रोत था। उसका लक्ष्य सिर्फ राम मंदिर नहीं अपितु रामराज्य स्थापित करना भी था।वर्ष 2014 में देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के पश्चात नरेन्द्र मोदी ने इसी रामराज्य की संकल्पना को साकार करने के लिए परिश्रम की पराकाष्ठा के साथ कार्य किया है। मोदी सरकार ने एक ओर सदियों से उपेक्षित सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं को प्रतिस्थापित किया तो दूसरी ओर गरीब कल्याण को प्राथमिकता के रूप में अपनी सरकार का लक्ष्य बनाया। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने अनुच्छेद 370 की बेड़ियों से मां भारती को आजाद कराना, तीन तलाक की कुरीति से अल्पसंख्यक बहनों को मुक्ति दिलाना, माताओं-बहनों को रसोई में खतरनाक धुएं से मुक्ति दिलाने के लिए गैस सिलेंडर, नारी शक्ति की गरिमा की रक्षा के लिए शौचालय का निर्माण, आयुष्मान भारत योजना के जरिए स्वास्थ्य सेवा, हर गरीब के सिर पर छत हो उस हेतु प्रधानमंत्री आवास योजना, कोई भूखा न रहे इस हेतु 80 करोड़ देशवासियों के लिए मुफ्त राशन की व्यवस्था, किसानों के लिए किसान सम्मान निधि, पिछले सात दशकों से देश को लूटने वाले भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कठोर कदम, कोरोनाकाल में हर भारतीय को मुफ्त वैक्सीन का प्रबंध जैसे अनेकों ऐतिहासिक कार्य किये। मोदी सरकार ने रामराज्य की अवधारणा को साकार करने के लिए हर संभव प्रयास किये है। दरअसल, किसी भी लोकतंत्र की गुणवत्ता उसके नेतृत्वकर्ताओं पर निर्भर करती है। नेतृत्वकर्ता यदि त्यागी, तपस्वी और न्याय प्रिय है तो निश्चित ही लोकतंत्र सफल होगा जैसा प्रभु श्रीराम के राज में था। वर्षों बाद प्रभु कृपा से ही पुनः भारत को इसी प्रकार त्यागी, तपस्वी और न्याय प्रिय नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के रूप में प्राप्त हुआ है।जहां एक ओर देश में राममंदिर के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना जागृत हो रही है, उसी समय यह हमारे भारत का अमृतकाल है और 2047 तक भारत को विकसित बनाने के लिए हम भारतीयों को अपने दायित्वों के प्रति कृत संकल्पित रहना है। रामराज्य की संकल्पना भी यही है जहां शासन जन-जन के साथ मिलकर लोकतंत्र को सशक्त बनाने में सहभागिता निभायें। आज भारत ने अपनी सांस्कृतिक विरासतों के गौरव के साथ ही विकास के नये प्रतिमान स्थापित किये हैं। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आज हमारा भारत अपने तीर्थों को भी संवार रहा है और डिजिटल टेक्नोलॉजी की शक्ति से परिपूर्ण विश्व का अग्रणी राष्ट्र भी बन रहा है। आज मोदी सरकार काशी विश्वनाथ धाम के पुनर्निमाण के साथ ही ग्रामीण विकास हेतु 30 हजार से अधिक पंचायत भवन भी बना रही है। सिर्फ केदारधाम का पुनरुत्थान ही नहीं अपितु 300 से अधिक मेडिकल कॉलेज भी देश में बन रहे हैं। सिर्फ महाकाल के लोक का ही निर्माण नहीं हो रहा, बल्कि स्वच्छ पेयजल के लिए दो लाख से ज्यादा पानी की टंकियों का भी निर्माण हो रहा है और 14 करोड़ घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंच रहा है। आज देश अपनी अतुलनीय वैज्ञानिक क्षमताओं के माध्यम से एक तरफ चन्द्रमा और सूरज की दूरी नाप रहा है तो वहीं हमारी पौराणिक मूर्तियों को भारत में वापस लाकर अपनी सांस्कृतिक सभ्यता के सवंर्धन का कार्य भी कर रहा है।प्रधानमंत्री ने अयोध्या धाम में महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे एवं अयोध्या धाम जंक्शन के लोकार्पण के अवसर पर कहा कि विकसित भारत के निर्माण को गति देने के अभियान को अयोध्या नगरी से नयी ऊर्जा मिल रही है। विश्व में कोई भी देश हो अगर उसे विकास की नयी ऊंचाई पर पहुंचना है, तो उसे अपनी विरासत को संभालना होगा। हमारी विरासत हमें प्रेरणा देती है। हमें सही मार्ग दिखाती है। आज का भारत पुरातन और नूतन को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ रहा है।वास्तव में आज अयोध्या में अध्यात्म और विरासत की भव्यता के साथ विकास की दिव्यता भी दिखती है। विकास और विरासत का यह संयोजन ही भारत को 21 वीं सदी में सबसे आगे ले जायेगा। तुलसीदास ने रामचरितमानस में लोकतंत्र, लोकमंगल और आदर्श राज्य व्यवस्था की अभिव्यक्ति की है। चित्रकूट से विदा होते हुए भरत को श्रीराम सबसे बड़ा उपदेश देते हुए राजा-प्रजा के संबंधों पर कहते हैं :-मुखिया मुख सों चाहिए, खान पान को एक।।पालै पोसै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।यानी शासन पक्षपाती एवं अन्यायी न हो, शासन में समाज के अंतिम व्यक्ति के अभ्युत्थान की चिंता प्रमुख होनी चाहिए। हम गर्व से कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के उत्थान की संकल्पना निश्चित ही साकार हो रही है। इस बात में कोई संशय नहीं है कि हमारे प्रधानमंत्री भारत की मिट्टी के कण-कण और भारत के जन-जन के पुजारी हैं। विगत साढ़े नौ वर्षों में न केवल हम भारतीय अपितु समूचा विश्व एक नये भारत के निर्माण का प्रत्यक्षदर्शी रहा है। यह नया भारत है जिसकी संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों को अपनाने में विश्व का हर देश स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता है। यह नया भारत अपनी आस्था, अस्मिता और अर्थव्यवस्था के प्रति सजग और संवेदनशील भी है और सचमुच में यही तो रामराज्य की संकल्पना है। (लेखक, मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष व लोकसभा सांसद हैं।)
आरके सिन्हाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। अयोध्या या भारत ही नहीं, सारे संसार में राम की चर्चा है। भारत तो राममय हो ही चुका है। अयोध्या में आगामी 22 जनवरी को होने वाले राममंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं। लगभग 500 वर्ष के दीर्घकालीन वनवास के पश्चात प्रभु श्री राम पुन: पूरे विधि-विधान के साथ अपने जन्म स्थान में पुन: विराजमान होने वाले हैं। भगवान राम फिर अयोध्या लौटे हैं लेकिन उनके उस जन्मस्थान पर आखिर सभी पंथ, सभी संप्रदाय के लोग समय-समय पर क्यों आते जाते रहे हैं? क्योंकि, राम किसी संकीर्ण विचारधारा से नहीं बंधे हैं। राम ही भारत की प्राणशक्ति हैं। राम ही धर्म हैं। मानव शरीर की श्रेष्ठता और उदात्तता का सीमांत राम से ही बनता है।हर व्यक्ति के जीवन में हर कदम पर जो भी अनुकरणीय हैं, वह राम ही हैं। इसीलिए तो यहां सिख गुरु नानकदेव भी आए और अयोध्या में जन्मे पांच जैन तीर्थंकरों ने भी अपने को राम की वंश-परंपरा से ही जोड़ा। बनारस से दलित संत रविदास भी रामदर्शन के लिए अयोध्या आए तो दक्षिण के आलावर संत भी। द्वैत सिद्धांत मानने वाले आचार्य भी। अद्वैत के प्रवर्तक शंकराचार्य और विशिष्टाद्वैत के बल्लभाचार्य भी अयोध्या आकर जन्मस्थान पर अपनी साधना में लीन रहे। निर्गुण कबीर भी राम को भजते हैं और सगुण तुलसी भी। भवभूति भी राम को जपते हैं। तुकाराम से तिरुवल्लुवर तक के लिए राम पीड़ित, शोषित और वंचित की अभिव्यक्ति हैं। श्रीराम की अयोध्या कैसी है? अयोध्या लोकतंत्र की जननी है। आराधिका है। संरक्षिका है।अयोध्या का लोकतंत्र संविधान या परंपरा से नहीं आचरण की श्रेष्ठता से चलता है। अयोध्या का लोकतंत्र लोकमंगल से चलता है। और वहां बना राम मंदिर? क्या जन्मस्थान पर बनी यह नई इमारत राजस्थान के बंसी पहाड़पुर के पत्थरों और कंक्रीट का महज एक मंदिर है? नहीं। ये बदलते भारत का प्रतीक है, जिसमें किसी अन्याय के प्रतिकार की ताकत है। इस मंदिर से हमारी परंपरा, संस्कृति, धर्म, सभ्यता, मान-सम्मान का गर्भनाल का रिश्ता है। अयोध्या का मंदिर श्रीराम का है। इस बीच, एक बात कहनी होगी कि अयोध्या में रामलला के मंदिर और प्राण प्रतिष्ठा की जिस तरह से तैयारियां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की निगरानी में हुई उसकी जितनी प्रशंसा की जाये कम है। योगी आदित्यनाथ ने राज्य सरकार के कामकाज के साथ मंदिर निर्माण के काम को भी देखा। वे रोज काम की प्रगति की जानकारी लेते रहे और अपने मंत्रिमंडल के साथियों व अफसरों को जरूरी निर्देश देते रहे। उनकी पैनी नजर के चलते ही राममंदिर में चल रहा निर्माण कार्य वक्त रहते पूर्ण हुआ। बहरहाल, अयोध्या श्रीराम की थी, श्रीराम की है और श्रीराम की ही रहेगी। श्रीराम भारत के कण-कण में हैं। हमारे भाव की हर हिलोर में श्रीराम हैं। राम यत्र-तत्र, सर्वत्र हैं। जिसमें रम गये, वहीं राम हैं। यहां सबके अपने-अपने राम हैं। गांधी के राम अलग हैं, लोहिया के राम अलग। बाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है। भवभूति के राम दोनों से अलग हैं। कबीर ने राम को जाना, तुलसी ने माना, निराला ने बखाना। राम एक हैं, पर राम के बारे में दृष्टि सबकी भिन्न है। त्रेता युग के श्री राम त्याग, शुचिता, मर्यादा, संबंधों और इन संबंधों से ऊपर मानवीय आदर्शों की वे प्रति मूर्ति है, जिनका दृष्टांत आधुनिक युग में भी अनुसरण करने के लिए दिया जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम आदर्श पुत्र, आदर्श राजा, आदर्श भ्राता ही नहीं वरन आदर्श पति भी हैं, जो आजीवन एकपत्नी व्रती रहे। भगवान श्री राम ने राजा होते हुए त्याग, संयम, धैर्य, सहयोग और प्रजा के प्रति सेवा भाव का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हुए पत्नी वियोग के साथ नाना प्रकार के कष्ट सहे। ईश्वरीय अवतार होने के बावजूद मनुष्य रूप में अनेक कष्ट सहने के बावजूद इतिहास ने भी उनके साथ कम अन्याय नहीं किया। माता सीता पर मिथ्या दोषरोपण के कारण राम द्वारा सीता का परित्याग एक मात्र ऐसा प्रसंग रहा, जिसके कारण आज भी प्रभु श्रीराम नारीवादियों के कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं। हालांकि, मूल वाल्मीकि रामायण में सीताजी के त्याग का ऐसा कोई प्रसंग नहीं मिलता। ऐसा माना जाता है यह प्रसंग बाद में तत्कालीन लेखकों तथा कवियों ने रामकथा की दिशा को मोड़ने या यूं कहें राम की छवि को धूमिल करने और सनातन संस्कृति को नष्ट भ्रष्ट करने के लिए जोड़ा। ऐसा भी कह सकते हैं कि भविष्य में नारी के लिए मयार्दा और शुचिता के कड़े मानदंड स्थापित करने के लिए बाद में यह प्रसंग जोड़ा गया हो। लंका विजय के पश्चात अग्नि को साक्षी मानकर सीता माता को पूरे मन से अपनाने वाले प्रभु श्रीराम माता सीता का परित्याग करने के बजाय उनके साथ पुन: वनवास लेना अधिक श्रेयस्कर समझते। लेकिन, इस अनर्गल प्रसंग ने प्रभु श्रीराम को निरपराध कटघरे में खड़ा कर दिया। वाकई सीता माता के साथ अन्याय हुआ या नहीं यह तो अतीत के गर्भ में है परंतु यदि श्रीराम पर मिथ्या दोष लगाया गया है, तो वाकई इस सूर्यवंशी महान प्रतापी और मर्यादित राजा के साथ हर युग में अन्याय हुआ है। इस बीच, कुछ ऐसे कथित ज्ञानी भी हैं जो श्रीराम को काल्पनिक मानते हैं। वैसे उनके कहने से क्या फर्क पड़ता है। फर्क तब पड़ता, अगर वे हजारों वर्ष से जिस प्रकार जीवित है, हयात है, साक्षात है, वह न होते। वे केवल जीवित ही नहीं हैं, उनके नाममात्र ने मुर्दा बना दिये गये राष्ट्र को ऐसा संजीवन कर दिया उसने विश्व सत्ता को अपने स्थान वापस कर दिया, जैसे वामन अवतार ने राजा बलि को। उनका नाम मात्र धर्म का पर्याय बन गया। दशरथ पुत्र श्रीराम से अधिक, कहीं गुना अधिक काम तो राम नाममात्र से हुए। गांधीजी ने साफ कहा कि वे इस बात में पड़ना ही नहीं चाहते कि राम ऐतिहासिक हैं या नहीं। उनके लिए रामनाम ही उनकी शक्ति और उनकी प्रेरणा थी। खैर, हिंदुत्व और सनातन धर्मावलंबियों के लिए अयोध्या में राममंदिर का निर्माण तथा भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा एक गौरवशाली क्षण है और वर्तमान पीढ़ी बेहद भाग्यशाली है जो, इन ऐतिहासिक क्षणों की साक्षी बनने जा रही है । वर्षों से प्रभु श्रीराम जन्मभूमि का विवाद न्यायालय के समक्ष लंबित था जिसमें प्रभु श्रीराम एक वादी के रूप में थे। दीर्घकाल के वनवास के पश्चात प्रभु श्रीराम को अयोध्या में उनका अपना स्थान प्राप्त हुआ है। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
प्रदीप मिश्र एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की तिथि ज्यों-ज्यों करीब आ रही है, वहां के अभ्युदय, आख्यान, आस्था और अध्यात्म के साथ-साथ आह्लाद और अर्थात पर चातुर्दिक चर्चाएं तेज हो गयी हैं। 2024 की जनवरी और विक्रम संवत 2080 का पुनीत पौष और फाल्गुन माह अयोध्या के दृष्टिकोण से सामाजिक चिंतन और राजनीतिक विचार-विमर्श का केंद्र बिंदु बन चुका है। अर्थव्यवस्था के अंकगणित के पैमाने पर भी समग्र आयोजन और प्रयोजन को परखा जा रहा है। देश में 20 लाख से अधिक मंदिर हैं लेकिन इस समय सबकुछ राममय है। सबसे ज्यादा मंदिर तमिलनाडु में हैं, जहां की सरकार की ओर से सनातन धर्म पर उठाये गये सवालों का सटीक जवाब देने का समय संभवत: सन्निकट है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने पर्यटन क्षेत्र के विकास के लिए 2023-24 के बजट में 10 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। अयोध्या, काशी और प्रयागराज में विकास कार्यों के लिए अलग से व्यवस्था की गयी। पर्यटन विभाग और धर्मार्थ कार्य विभाग क्रमश: 588 और 936 करोड़ रुपये से अकेले अयोध्या में ही कुंड, मठ और मंदिरों का जीर्णोद्धार करा रहा है। चित्रकूट, विंध्याचल, नैमिषारण्य, शुकताल, गोला गोकर्णनाथ, वृंदावन, बटेश्वर आदि में कॉरिडोर विकसित कर सुविधाएं बढ़ाने का प्रयास है। परिणाम, प्रदेश में 2022 में जो पर्यटक 31.85 करोड़ थे, सितंबर 2023 तक उनकी संख्या 32 करोड़ से अधिक हो गयी। 9.54 लाख सैलानी विदेशी रहे। इस दौरान सबसे ज्यादा 8.42 करोड़ पर्यटक और श्रद्धालु वाराणसी पहुंचे। दूसरी पसंद प्रयागराज रही और 4.50 करोड़ पर्यटकों ने शहर देखा। 2.39 करोड़ श्रद्धालुओं के साथ तीसरे स्थान पर अयोध्या रही। प्रयागराज के आंकड़े अगले साल और अयोध्या के आंकड़े जल्दी ही बदल जायेंगे। 2025 में प्रयागराज में महाकुंभ होगा, जिसमें छह करोड़ श्रद्धालु पहुंचने की आशा है। इसी मंतव्य से वहां की साज-सज्जा और सुरक्षा के साथ ही सुगम मार्ग बनाये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या आने का आह्वान किया है। माना जा रहा है कि इसके बाद अयोध्या देश का सबसे बड़ा धार्मिक पर्यटन स्थल हो जायेगा। प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रदेश सरकार को यहां हर महीने दो करोड़ श्रद्धालु आने का अनुमान है। रामनगरी में 26 जनवरी से 26 दिन तक प्रतिदिन प्रत्येक राज्य से पांच-पांच हजार श्रद्धालुओं को दर्शन कराने की योजना है। सामान्य तौर पर एक पर्यटक ढाई हजार रुपये से अधिक खर्च करता है। इस आधार पर प्रत्येक वर्ष 55 हजार करोड़ रुपये की आमदनी होगी। अर्थव्यवस्था इससे सशक्त होगी। वाराणसी और अयोध्या के बीच श्रद्धालुओं के लिए हेलिकॉप्टर सेवा फरवरी में शुरू होगी, जबकि आगरा-मथुरा के बीच यह शुरू हो चुकी है। अयोध्या का घटनाक्रम आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के क्षेत्र में भी सफलता का नया अध्याय लिख रहा है। कंफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेड (कैट) का कहना है कि इस आयोजन से 50 हजार करोड़ रुपये का व्यापार होगा। इसके अंतर्गत श्रीराम मंदिर के मॉडल से लेकर मूर्तियां, पूजन सामग्री, घंटा-घड़ियाल, अगरबत्ती-धूपवत्ती, चंदन, चित्र, दीपक और गंगाजल की खरीदारी बढ़ेगी। अयोध्या की यात्रा इसमें सम्मिलित नहीं है। रेलवे ने आस्था स्पेशल ट्रेनें चलायी हैं तो लाखों यात्री अपने या सार्वजनिक साधनों से रामलला के दर्शन-पूजन कर स्वयं को अनुग्रहीत करेंगे। यहां यह भी जानना उपयुक्त होगा कि 2021-22 में अयोध्या से विभिन्न क्षेत्रों में 110 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ था। 2022-23 में यह बढ़कर 254 करोड़ रुपये हो गया है। यही नहीं, अयोध्या में 2018-19 तक 28 हजार से अधिक रजिस्ट्री होती थीं, जो 2023-24 में अब तक 46 हजार पार हो गई हैं। यही स्थिति वाराणसी की है। यहां इसी अवधि में 40 हजार का आंकड़ा 72 हजार पहुंच गया है। तीर्थाटन के आंकड़े मात्र आंकड़े नहीं है। इनमें आस्था और अध्यात्म का अहम आधार है। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां की चारधाम यात्रा प्रसिद्ध है। घरेलू पर्यटकों में 44 फीसदी का उद्देश्य तीर्थयात्रा और धार्मिक यात्रा का होता है। 2022 में राज्य में पांच करोड़ लोग पहुंचे थे, जिसमें 3.8 करोड़ कांवड़िये और 45 लाख चारधाम के यात्री रहे। 2023 में वैष्णो देवी के दरबार में मत्था टेकने वालों की संख्या 97 लाख रही। 2022 में यह आंकड़ा 91.25 लाख था। 2012 में यहां पहली बार 1.04 करोड़ श्रद्धालु पहुंचे थे। बीते वर्ष 62 दिन चली अमरनाथ यात्रा में 4.45 लाख श्रद्धालु शामिल हुए थे, जबकि 2022 में यह संख्या 3.65 लाख थी। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में कॉरिडोर बनने के बाद पहली बार 8.10 लाख भक्तों ने दर्शन पूजन कर 2024 की शुरूआत की। एक दिन पहले यानी 32 दिसंबर को संख्या तीन लाख से अधिक थी। यही नहीं, तिरुपति बालाजी मंदिर में हर दिन 50 हजार से एक लाख के बीच श्रद्धालु पहुंचते हैं। एक कालखंड में बुजुर्ग ही तीर्थयात्रा के लिए उपयुक्त पात्र माने जाते थे। वह भी तब, जब उनकी मनौती पूरी होती थी या और मांगने की इच्छा होती थी। बाद में इसमें बदलाव आया। फिर भी देशाटन, तीर्थाटन और पर्यटन साधनों, संसाधनों और सुरक्षा की कमी के कारण अनियमित था। अब श्रद्धालुओं की श्रेणी में युवक-युवतियां और बच्चे भी आ गये हैं। आर्थिक सामर्थ्य बढ़ने के कारण एक बड़ा वर्ग वर्ष में कम से एक बार पौराणिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाले स्थानों पर जाता है। तीर्थयात्री आने-जाने से लेकर परिवहन, होटल, धर्मशाला, भोजनालय आदि पर खर्च करने के साथ स्थानीय महत्व की स्मृतियां संजोने के लिए खरीदारी भी करते हैं। यही कारण है कि हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा उत्सव देखने के लिए कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं। इन्हें समझते हुए छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने राम की महत्ता को समझते हुए राम वन गमन पथ बनवाया। छत्तीसगढ़ को माता कौशल्या का घर माना जाता है। हरियाणा सरकार ने सूरजकुंड में दिवाली उत्सव मनाने की योजना बनायी है तो कुरुक्षेत्र में दो सौ करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर ज्योतिसर पार्क खोला जा रहा है। यहां देश में पहली बार महाभारत की कहानी के वाचन के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी उपकरणों का प्रयोग किया जायेगा। जिले में 164 अन्य तीर्थस्थलों का विकास किया जा रहा है। कुरुक्षेत्र में 1989 में जिला स्तरीय गीता जयंती महोत्सव अब वैश्विक हो गया है। 24 दिसंबर 2023 को गीता जयंती के उपलक्ष्य में कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में एक लाख श्रद्धालुओं द्वारा गीता पाठ का विश्व रिकॉर्ड अविस्मरणीय हो गया है। असम में कामाख्या मंदिर के विकास कार्यों पर 500 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र के कोल्हापुर में महालक्ष्मी मंदिर कॉरिडोर और नासिक से त्र्यंबकेश्वर तक सुविधाजनक मार्ग निर्माणाधीन है। यदि तेलंगाना में भगवान नृसिंह का मंदिर बन रहा है तो राजस्थान में गोविंद देव मंदिर और पुष्कर तीर्थ में सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश है। तीर्थाटन का महत्व सरकारों को भी पता चल गया है। यही कारण है कि पंजाब सरकार ने नवंबर में गुरुनानक देव के प्रकाशोत्सव पर मुख्यमंत्री तीर्थ योजना शुरू की। इसमें तीन महीने तक 53,850 बुजुर्ग श्रद्धालुओं को देश भर के तीर्थस्थलों के दर्शन के लिए लाने-ले जाने से जुड़े सारे खर्च सरकार देगी। इस पर 40 हजार करोड़ रुपये खर्च का अनुमान है। मध्य प्रदेश के निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनाव से चंद दिन पहले अपनी तीर्थ दर्शन योजना में बड़ी सोच प्रदर्शित कर राज्य के 32 वृद्धजनों को दर्शन-पूजन के लिए हवाई जहाज से प्रयागराज भेजा। इससे पहले यह योजना हरियाणा और दिल्ली में भी चलाई जा चुकी है। दिल्ली सरकार ने 75 हजार लोगों को तीर्थयात्रा करायी थी। भारत में सैर सपाटा वाले प्रमुख स्थानों में 75 से 80 प्रतिशत से अधिक तीर्थस्थल हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, योगेश्वर श्रीकृष्ण, देवाधिदेव महादेव, दुष्ट विनाशनी दुर्गा और काली के अलावा अमोघ आशीषों से आच्छादित हनुमान देशवासियों की आस्था के केंद्र रहे हैं। यही कारण है कि धीरे-धीरे तीर्थस्थल ही पर्यटन के प्रमुख स्थान बन गए। पर्यटन पहले से अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। अब तीर्थाटन आस्था के साथ अर्थव्यवस्था का नया आधार बन गया है। यही कारण है कि इनके लिए सरकारें ब्रांडिंग और व्यवस्थाएं विकसित कर रही हैं। रोजगार और अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पर्यटन उद्योग की देश की जीडीपी में 9.2 प्रतिशत और रोजगार में 8.1 फीसदी हिस्सेदारी है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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