संजय तिवारीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोकसभा 2024 का चुनाव वस्तुत: एक धर्मयुद्ध है। इसको बहुत संजीदगी से सभी को लड़ना ही होगा। राजनीतिक जय-पराजय अपनी जगह है किंतु देश को जीतना चाहिए। राष्ट्र विजयी हो, ऐसा संकल्प होना चाहिए। इसके लिए प्रतिज्ञा की नहीं केवल संकल्प की आवश्यकता है। प्रतिज्ञा में शक्ति नहीं होती। वह भीष्म बनाती है किंतु संकल्प शक्ति से भरी होती है। वह शिव बनाती है। शिव कल्याणकारी हैं। शिव से ही सत्य और सुंदर भी स्थापित हो पायेंगे। संकल्प और प्रतिज्ञा के बारे में श्रीमदभगवदगीता में भगवान कृष्ण ने बहुत सलीके से समझा दिया है। याद कीजिए कि जब जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा अर्जुन कर लेते हैं कि सूर्यास्त तक नहीं मारा तो अग्नि समाधि ले लूंगा। आचार्य द्रोण कमलव्यूह के अंदर जयद्रथ को छुपा देते हैं जिसका आकर 32 कोस का था। जाहिर है वह उस तक कैसे पहुंचते! जयद्रथ की सुरक्षा में बड़े बड़े वीर तैनात थे। भगवान कृष्ण बोले, अर्जुन तुम रास्ता साफ करो मैं रथ ले चलता हूं। संध्या हो आई अब भी 12 कोस रह गया। कृष्ण रथ से उतर गये। अर्जुन ने पूछा, केशव यह क्या? कृष्ण ने कहा अश्व थक गये हैं। आगे बोलते हुये भगवान कृष्ण जो बोले वह ध्यान देने योग्य है। अर्जुन कदाचित तुमने मेरे उपदेश पर ध्यान नहीं दिया था जो युद्ध के शुरू में मैंने दिया था! तुम प्रतिज्ञा करने वाले होते कौन हो? तुम तो निमित्त हो, यदि तुम प्रतिज्ञा न किये होते तो अब तक जयद्रथ को मार देते। तुम्हारा ध्यान एक तरफ सूर्य पर है दूसरी तरफ जयद्रथ पर। इसलिये तुम्हारे निशाने चूक रहें हैं। ऐसा लक्ष्य तय कर दिये कि असफल होने पर तुम्हें ही विनष्ट कर देगा... यह डर ही तुम्हें हरा देगा। भगवान के वचन बड़े सारगर्भित हैं। मुझे नहीं लगता आज तक किसी ने इतनी सुंदर यथार्थ बात की हो । कई संदर्भों में बात हो सकती है, लेकिन वर्तमान में देखिये सब प्रतिज्ञाबद्ध हो रहे हैं। यह क्या बात हुई कि अनुच्छेद 370 हटा दो तभी समर्थन करेंगे। पाकिस्तान पर हमला कर दो... तभी समर्थन करेंगे। राम मंदिर बना दो... तभी समर्थन करेंगे। श्रीराम मंदिर बन गया। 370 हट चुका। तीन तलाक भी हट गया। सीएए भी लागू हो गया। देश के गृहमंत्री ने ताल ठोक कर डंके की चोट पर संकल्प दोहरा दिया कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी हमारा है। ध्यान दीजिए, भाजपा प्रतिज्ञापत्र नहीं जारी करती, वह हर चुनाव में संकल्प पत्र जारी करती है। नेतृत्व सक्षम है किसी प्रतिज्ञा की आवश्यकता क्या है? सक्षम नेतृत्व केवल संकल्प लेता है और उसे हर हाल में पूरा भी करता है। आगे भी निश्चित ही दंडात्मक कार्य होगा और हो रहा है। यह ठीक है कि इस समय भावना प्रबल है परंतु इसी समय सुनियोजित तरीके से काम करने की आवश्यकता है। जो विरोधी हैं वह भी यही ढाल बना रहे हैं। फिलहाल उनसे न 370 से मतलब है न राम मंदिर से। गीता में भगवान ने कहा तो है :- स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥2- 31॥ अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये युद्ध से बढ़कर एक क्षत्रिय के लिये कुछ नहीं है। सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥2- 38॥ सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और पराजय को एक सा देखते हुए ही युद्ध करो। ऐसा करते हुए तुम्हें पाप नहीं मिलेगा। अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि। तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥2- 33॥ लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, तो अपने धर्म और यश की हानि करोगे और पाप प्राप्त करोगे। इसलिए बाकी सब चिंतन छोड़कर, निस्संकोच योग्य एवं सक्षम नेतृत्व को ही चुनें, यही इस धर्मयुद्ध में आप सभी का आसन्न धर्म है, तथा इसी में राष्ट्रहित एवं धर्म हित सन्निहित है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
विश्व गौरैया दिवस/ 20 मार्च पर विशेषप्रभुनाथ शुक्ल एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारी सोच अब आहिस्ता-आहिस्ता बदलने लगी है। हम प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति थोड़ा मित्रवत भाव रखने लगे हैं। घर की टेरेस पर पक्षियों के लिए दाना-पानी डालने लगे हैं। गौरैया से हम फ्रेंडली हो चले हैं। किचन गार्डन और घर की बालकनी में कृतिम घोंसला लगाने लगे हैं। गौरैया धीरे-धीरे हमारे आसपास आने लगी है। उसकी चीं-चीं की आवाज हमारे घर आंगन में सुनाई पड़ने लगी है। गौरैया संरक्षण को लेकर ग्लोबल स्तर पर बदलाव आया है। यह सुखद है। फिर भी अभी यह नाकाफी है। हमें प्रकृति से संतुलन बनाना चाहिए। हम प्रकृति और पशु-पक्षियों के साथ मिलकर एक सुंदर प्राकृतिक वातावरण तैयार कर सकते हैं। जिन पशु-पक्षियों को हम अनुपयोगी समझते हैं, वह हमारे लिए प्राकृतिक पर्यावरण को संरक्षित करने में अच्छी खासी भूमिका निभाते हैं, लेकिन हमें इसका ज्ञान नहीं होता।गौरैया हमारी प्राकृतिक मित्र है और पर्यावरण में सहायक है। गौरैया प्राकृतिक सहचरी है। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फुदकती और चावल या अनाज के दाने को चुगती है। कभी घर की दीवार पर लगे आईने पर अपनी हमशक्ल पर चोंच मारती दिख जाती है। एक वक्त था जब बबूल के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में घोंसले लटके होते थे, लेकिन वक्त के साथ गौरैया एक कहानी बन गई। हालांकि पर्यावरण के प्रति जागरुकता के चलते हाल के सालों में यह दिखाई देने लगी है। गौरैया इंसान की सच्ची दोस्त भी है और पर्यावरण संरक्षण में उसकी खासी भूमिका भी है। दुनिया भर में 20 मार्च गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी गौरैया संरक्षण के लिए लोगों से पहल कर चुके हैं। उन्होंने राज्यसभा सदस्य बृजलाल के प्रयासों को को सोशल मीडिया में खूब सराहा था और कहा था कि गौरैया संरक्षण को लेकर आपका प्रयास बेहतरीन और काबिल-ए-तारीफ है। राज्यसभा सदस्य बृजलाल ने अपने घर में गौरैया संरक्षण को लेकर काफी अच्छे उपाय किए हैं। उन्होंने गौरैया के लिए दाना-पानी और घोंसले की व्यवस्था की है। जंगल में आजकल पंच सितारा संस्कृति विस्तार ले रही है। प्रकृति के सुंदर स्थान को भी इंसान कमाने का जरिया बना लिया है। जिसकी वजह पशु- पक्षियों के लिए खतरा बन गया है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर के प्रयासों से 20 मार्च को चुलबुली गौरैया के लिए रखा गया। 2010 में पहली बार यह दुनिया में मनाया गया। गौरैया का संरक्षण हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इनसान की भोगवादी संस्कृति ने हमें प्रकृति और उसके साहचर्य से दूर कर दिया है। गौरैया एक घरेलू और पालतू पक्षी है। यह इंसान और उसकी बस्ती के पास अधिक रहना पसंद करती है। पूर्वी एशिया में यह बहुतायत पाई जाती है। यह अधिक वजनी नहीं होती। इसका जीवनकाल दो साल का होता है। यह पांच से छह अंडे देती है। भारत की आंध्र यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में गौरैया की आबादी में 60 फीसदी से अधिक की कमी बताई गई है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी आफ प्रोटेक्शन आफ बर्ड्स ने इस चुलबुले और चंचल पक्षी को रेड लिस्ट में डाल दिया है। दुनिया भर में ग्रामीण और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी घटी है। गौरैया की घटती आबादी के पीछे मानव विकास सबसे अधिक जिम्मेदार है। गौरैया पासेराडेई परिवार की सदस्य है लेकिन इसे वीवरपिंच परिवार का भी सदस्य माना जाता है। इसकी लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। इसका वजन 25 से 35 ग्राम तक होता है। यह अधिकांश झुंड में रहती है। यह अधिकतम दो मील की दूरी तय करती है। मानव जहां-जहां गया, गौरैया उसका हमसफर बनकर उसके साथ गयी।गांवों में अब पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। जिसका कारण है कि मकानों में गौरैया को अपना घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। पहले गांवों में कच्चे मकान बनाए जाते थे। उसमें लकड़ी और दूसरी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता था। कच्चे मकान गौरैया के लिए प्राकृतिक वातावरण और तापमान के लिहाज से अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते थे, लेकिन आधुनिक मकानों में यह सुविधा अब उपलब्ध नहीं होती। यह पक्षी अधिक तापमान में नहीं रह सकता। देश की खेती-किसानी में रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता प्रयोग बेजुबान पक्षियों और गौरैया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। केमिकल युक्त रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से कीड़े-मकोड़े भी विलुप्त हो चले हैं। जिनमें गिद्ध, कौआ, महोख, कठफोड़वा, और गौरैया शामिल हैं। इनके भोजन का भी संकट खड़ा हो गया है।प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर नासिक से हैं और वह बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े रहे हैं। उन्होंने यह मुहिम 2008 से शुरू की थी। आज यह दुनिया के 50 से अधिक मुल्कों तक पहुंच गयी है। दिलावर के विचार में गौरैया संरक्षण के लिए लकड़ी के बुरादे से छोटे-छोटे घर बनाये जायें और उसमें खाने की भी सुविधा भी उपलब्ध हो। घोंसले सुरक्षित स्थान पर हों, जिससे गौरैयों के अंडों और चूजों को हिंसक पक्षी और जानवर शिकार न बना सकें। हमें प्रकृति और जीव-जंतुओं के सरोकार से लोगों को परिचित कराना होगा। आने वाली पीढ़ी तकनीकी ज्ञान अधिक हासिल करना चाहती है, लेकिन पशु-पक्षियों से वह जुड़ना नहीं चाहती है। इसलिए हमें पक्षियों के बारे में जानकारी दिलाने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए, जिससे हम अपनी पर्यावरण दोस्त को उचित माहौल दे पायें। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
बिजली पैदा करने वाली बिल्ली मछली केपी सिंह एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रत्येक जीवित प्राणी में विद्युत उत्पन्न करने वाली मांसपेशियां होती हैं। विश्व की विद्युत उत्पन्न करने वाली सभी मछलियों में तीन प्रमुख हैं— बिल्ली मछली, विद्युत ईल और विद्युत रे। विद्युत उत्पन्न करने वाली बिल्ली मछली को अंग्रेजी में इलेक्ट्रिक कैट फिश कहते हैं। आस्ट्रेकोडमर्स को जीव वैज्ञानिकों ने विद्युत उत्पन्न करने वाली मछलियों का पूर्वज माना है। यह मछली लगभग 30 करोड़ साल पहले ही धरती से विलुप्त हो गयी थी। बिल्ली मछली उष्णकटिबंधीय अफ्रीका की नदियों और झीलों में पायी जाती है। यह नील नदी की घाटी में बहुतायत से मिलती है। यह एक मध्यम आकार की मछली है, जिसकी लंबाई 90 सेंटीमीटर से लेकर 1.5 मीटर तक होती है। कभी-कभी इससे ज्यादा लंबी विद्युत बिल्ली मछली भी देखने को मिलती है। इसका वजन 20 से 25 किलोग्राम तक होता है। इसके पीठ और शरीर के ऊपर का भाग कत्थई रंग का होता है, नीचे के भाग का रंग मांस के रंग का होता है। आंखें छोटी तथा मुंह के चारों ओर तीन जोड़ी मूछें होती हैं। इन मूंछों के कारण इसे बिल्ली मछली कहा जाता है। इसके शरीर पर पीठ के मीन पंख नहीं होते। विद्युत उत्पन्न करने वाली बिल्ली मछली के विद्युत उत्पादक अंग अनेक भागों में बंटे होते हैं। शरीर पर बहुत-सी प्लेटें होती हैं और हर प्लेट उसकी रीढ़ की हड्डी से जुड़ी होती है। इसका घनात्मक सिरा शरीर के आगे की और ऋणात्मक सिरा शरीर के पीछे वाले भाग पर होता है। इसके अंगों की संरचना जनरेटरों की तरह होती है और ये उसी की तरह काम करते हैं। यह बहुत शक्तिशाली बिजली उत्पन्न करती है। एक बड़े आकार की विद्युत उत्पन्न करने वाली बिल्ली मछली 350 वोल्ट तक की विद्युत उत्पन्न कर सकती है। इसका स्पर्श हो जाने से तेज झटका लगता है। इसे यदि एक्वेरियम में रख लिया जाए तो इसके शरीर की विद्युत से दूसरी मछलियां बेहोश हो जाती हैं और कभी-कभी उनकी मौत हो जाती है। यह एक तेज और चालाक शिकारी मछली है। दिन के समय पौधों के बीच या चट्टानों की दरारों में छिपी रहती है और रात के समय शिकार पर निकल पड़ती है। पूरी तरह मांसाहारी यह मछली छोटे-छोटे कृमि, ताजे पानी के झींगा-झींगी तथा छोटी मछलियों को अपना आहार बनाती है। शिकार की टोह में निकलने के बाद शिकार दिखाई देने पर ये धीरे-धीरे तैरकर उसके करीब पहुंच जाती है और बिजली की तेजी से उस पर झपट पड़ती है और अपने मजबूत जबड़ों में दबोच लेती है। कोई भी शिकार इसकी पकड़ में आने के बाद बच नहीं पाता, अगर बच भी जाए तो तेज करंट के कारण अचेत हो जाता है और फिर यह उसे आराम से खा लेती है। एक्वेरियम में रखने पर यह दूसरी मछलियों को बहुत परेशान करती है। यही कारण है बड़ी मछली के साथ इसके छोटे बच्चे ही एक्वेरियम में रखे जाते हैं। बड़े होने पर उन्हें नदियों में छोड़ दिया जाता है। इसकी लड़ाकू प्रवृत्ति के कारण इसे पालतू नहीं बनाया जा सकता। इस मछली में नर और मादा की शारीरिक संरचना एक जैसी होती है और ये दिखने में भी एक जैसे लगते हैं। प्रजनन काल में उत्पादक अंगों की सहायता से नर मादा की खोज करता है और इसके बाद ये प्रजनन करते हैं। कहा जाता है कि इस मछली के विषय में मिस्र के लोगों को प्राचीनकाल से ही इसकी जानकारी थी। वे इसके प्रति श्रद्धा रखते थे। अफ्रीका में अनेक स्थानों पर इस मछली को रोगों की चिकित्सा में इस्तेमाल में लाया जाता है और इससे दवाइयां तैयार की जाती है।
विकास सक्सेना एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध कहावत है कि एक कील की वजह से पूरा राज्य खो जाता है। इसको स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि कील की वजह से नाल, नाल की वजह से घोड़ा, घोड़े की वजह से युद्ध और युद्ध की वजह से राज्य से हाथ धोना पड़ जाता है। यही हाल लोकतंत्र में भी होता है। कई बार बहुत मजबूत दिख रहे नेता या दल के लिए कोई घटना उसके पतन का कारण बन जाती है। पश्चिम बंगाल इसका जीता जागता उदाहरण है। यहां 34 साल के वामपंथी शासन के लिए 14 मार्च, 2007 को नंदीग्राम में किसानों पर गोलीबारी की घटना विनाशकारी साबित हुई। कभी राज्य की 80 प्रतिशत से ज्यादा सीटें जीतने वाले वामदलों का आज यहां एक भी विधायक नहीं है। वामपंथियों को बेदखल करके यहां की सत्ता पर काबिज होने वाली ममता बनर्जी के लिए अब संदेशखाली का मामला वामपंथियों के नंदीग्राम की तरह साबित हो सकता है। इसके अलावा अब नागरिकता संशोधन कानून लागू करके केंद्र सरकार ने दीदी के लिए नयी मुसीबत खड़ी कर दी है।स्वतंत्र भारत के एक राज्य में सत्ताधारी दल का नेता किस प्रकार महिलाओं को अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल कर रहा था यह सुनकर सभ्य समाज के किसी भी व्यक्ति की रूह तक कांप जाये। पीड़ित महिलाओं ने स्वयं आरोप लगाये हैं कि कबीलाई संस्कृति की तरह सुंदर महिलाओं के घरों पर संदेश भेजे जाते थे कि वे रात को पार्टी कार्यालय पर आ जायें अन्यथा सफेद साड़ी पहनने के लिए तैयार रहें। हालात इतने खौफनाक थे कि तृणमूल कांग्रेस के गुंडे वहां के पुरुषों से सरेआम कहा करते थे कि वह महिला पत्नी भले ही तुम्हारी हो लेकिन उस पर अधिकार हमारा है। मामला सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संदेशखाली गांव की महिलाओं का शोषण रोकने की जगह उनकी अस्मत से खेलने वाले पार्टी कार्यकर्ता शेख शाहजहां और उसके गुर्गों को बचाने में अपनी राजसत्ता की ताकत का इस्तेमाल किया। मुख्य आरोपित शेख शाहजहां के मामले में ममता बनर्जी एक के बाद एक गलती करती चली गयीं। जब खाद्यान्न घोटाले के मामले में पूछताछ के लिए गए ईडी के अधिकारियों पर शेख शाहजहां और उसके गुंडो ने हमला किया तो उनको गिरफ्तार कराने की जगह यह जताने की कोशिश की गयी कि किस तरह केंद्रीय जांच एजेंसियों को बंगाल में काम करने से रोका जा सकता है। इस घटना के बाद गांव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की गई जिससे पीड़ित महिलाओं को नई ताकत मिल गयी। उन्होंने शेख शाहजहां के जुल्मों के खिलाफ आवाज बुलंद की। लेकिन जब ये महिलाएं कैमरे के सामने आकर अपनी व्यथा सुना रही थीं उस समय राज्य की महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनकी पीड़ा समझने के बजाए उन पर लांछन लगा रही थीं।ममता बनर्जी के सवाल हैरान करने वाले थे। वे अपनी पीड़ा बताने वाली महिलाओं के मुंह ढंकने पर सवाल उठा रही थीं। जबकि दुष्कर्म पीड़िताओं की पहचान उजागर करने पर रोक है। पीड़िताओं से पूछा जा रहा था कि उन्होंने अब तक पुलिस में शिकायत दर्ज क्यों नहीं कराई। महिलाएं बता रही थीं कि जब वे पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने जाती थीं तो उन्हें वापस शेख शाहजहां और उसके गुंडों के पास भेज दिया जाता था।शोषण की सारी सीमाएं पार होने के बाद सड़कों पर उतरी महिलाओं ने बाकायदा न्यायालय में शपथ पत्र देकर आप बीती बताई तो न्यायालय के दबाव में आरोपित शिबू हाजरा, उत्तम सरदार और शेख शाहजहां आदि के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हो गये। प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों पर हमले के मामले में फरार चल रहे शेख शाहजहां को 56 दिनों तक सरकार बचाती रही। मामले के ज्यादा तूल पकड़ने और न्यायालय से फटकार लगने पर आखिरकार उसे गिरफ्तार किया गया पर उसे बचाने के लिए ममता बनर्जी की सरकार पूरी ताकत से जुटी रही। कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद पश्चिम बंगाल की पुलिस ने शेख शाहजहां को सीबीआई के सुपुर्द नहीं किया। इसके बाद जब अवमानना का मामला दर्ज हुआ तो भी दो घंटा इंतजार कराने के बाद पश्चिम बंगाल की पुलिस ने शेख शाहजहां को सीबीआई के हवाले किया। न्यायालय जाते समय शेख शाहजहां की चाल -ढाल से उसके रुतबे का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। पश्चिम बंगाल के एक छोटे सुदूर गांव संदेशखाली जहां पहुंचने के लिए धामाखाली से नाव में सवार होकर इच्छामती नदी को पार करना पड़ता है। वहां की पीड़िताओं ने पूरे पश्चिम बंगाल के वातावरण का बदल कर रख दिया है। मां, माटी और मानुष की बात करने का दावा करने वाली ममता बनर्जी पर आरोप लग रहे हैं कि पीड़िताएं अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग की होने के कारण इनके लिए उनकी संवेदनाएं नहीं जगीं।पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक हैसियत का अंदाजा विधानसभा चुनाव 2021 के परिणामों से आसानी से लगाया जा सकता है। यहां की 292 विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में से 213 पर टीएमसी, 77 पर भाजपा और दो सीटों पर अन्य दलों के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। चुनाव नतीजे आने के बाद टीएमसी कार्यकर्ताओं ने अराजकता की सारी सीमाएं पार कर दीं। टीएमसी के गुंडो पर भाजपा समर्थक महिलाओं के साथ बलात्कार के भी आरोप लगे। इसके बाद किसी ने सिर मुंडवाकर तो किसी ने नाक रगड़कर भाजपा को छोड़कर टीएमसी का दामन थाम लिया। अब कई सामाजिक और राजनीतिक चिंतकों का मानना है कि संदेशखाली ममता बनर्जी के लिए वामपंथियों के नंदीग्राम की तरह हो सकता है। विधानसभा चुनाव 2006 में 233 सीटें जीतकर सीपीएम नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सत्ता में वापसी की थी। तब ममता बनर्जी की पार्टी महज 30 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। लगातार तीन दशक के शासन के बावजूद प्रचंड जीत से उत्साहित बुद्धदेव भट्टाचार्य ने हल्दिया बंदरगाह के निकट एक छोटे गांव नंदीग्राम में केमिकल हब बनाने की जिद ठान ली। इसके लिए इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप को 10 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना था। लेकिन नंदीग्राम के किसानों ने अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया। उनका नेतृत्व वहां के स्थानीय नेता और कांथी के विधायक शुभेंदु अधिकारी ने किया। ममता बनर्जी भी आंदोलनकारियों के साथ हो गयीं। इन आंदोलनकारियों ने इस इलाके की नाकेबंदी करके सरकारी कर्मचारियों की आवाजाही पर रोक लगा दी। इससे बलपूर्वक निपटने के लिए आज से 17 साल पहले 14 मार्च को 2500 पुलिसकर्मियों का एक जत्था नंदीग्राम भेजा गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच हुई गोलीबारी में 14 लोगों की मौत हो गयी। आरोप तो यहां तक है कि पुलिस दस्ते में करीब 400 सीपीएम के कार्यकर्ता शामिल थे। गोलीबारी के बाद 100 से अधिक लोग लापता थे। इस घटना और इसके बाद सिंगूर में टाटा के प्लांट को लेकर हुए संघर्ष ने पश्चिम बंगाल का माहौल बदल दिया। यहां लगभग 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ कर 2011 में ममता बनर्जी सत्ता पर काबिज हुईं। अब माना जा रहा है कि संदेशखाली में जिस तरह शेख शाहजहां को बचाने के प्रयास किए गए उससे ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ आम लोगों में आक्रोश है। अब नागरिकता संशोधन कानून की अधिसूचना जारी होने के बाद मतुआ समुदाय के साथ बंगाल के दूसरे लोगों ने जिस तरह खुशियां मनायी हैं, इससे माना जा रहा है कि संदेशखाली ममता दीदी के लिए वामपंथियों का नंदीग्राम हो सकता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
प्रो हिमांशु राय शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने में कर सकते हैं। - नेल्सन मंडेला एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की प्रगति के चित्रपट में, बीता दशक उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव की कहानी का जीवंत सूत्रधार रहा है। यह अवधि बदलाव को दर्शाती है, जहां शैक्षणिक संस्थान केवल ज्ञान के मंदिर भर नहीं रहे, बल्कि शिक्षण और समाज को समान रूप से आकार देते हुए नवाचार की आजमाइश बन गये। वैश्विकस्तर पर हो रहे परिवर्तनों के बीच, भारत का उच्च शिक्षा क्षेत्र उत्तरोत्तर विकसित हो रहा है। धूप में कमल की तरह खिल रहा है। यह केवल संख्या में वृद्धि का ही नहीं, बल्कि क्षमता की जागृति का भी प्रतीक है, जो भविष्य को ज्ञान, कौशल और विजन के सूत्र से बुन रहा है। अब जबकि भारत विश्व के लिए मानव संसाधनों का सबसे बड़ा उत्पादक बनने की दिशा में क्रमिक रूप से आगे बढ़ रहा है, हम भविष्य के संभावित घटनाक्रमों का अनुमान लगाते हुए बीते दशक में उच्च शिक्षा के परिदृश्य में भारत द्वारा की गई प्रगति पर विचार करते हैं। संभावनाओं से भरपूर दशक की शुरूआत: भारतीय उच्च शिक्षा परिदृश्य वर्ष 2013-14 में बड़े बदलाव की ओर अग्रसर होने के कारण एक अहम पड़ाव पर था। हालांकि उसकी प्रगति स्पष्ट थी, लेकिन पहुंच बढ़ाने, गुणवत्ता सुनिश्चित करने और समावेशिता को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण चुनौतियां यथावत थीं।18-23 वर्ष आयु वर्ग के लिए लगभग 23 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) के साथ पहुंच और नामांकन सीमित थे, जिनसे नितांत क्षेत्रीय असमानताएं एवं सामाजिक-आर्थिक बाधाएं प्रकट होती थीं। 723 विश्वविद्यालयों और 36,634 कॉलेजों सहित संस्थागत परिदृश्य, बुनियादी ढांचे की बाधाओं से विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों में जूझ रहा था। वित्त पोषण एक और महत्वपूर्ण मुद्दा था। जीडीपी के 3.84 प्रतिशत के कुल शैक्षिक व्यय में से उच्च शिक्षा को सीमित आवंटन प्राप्त हो रहा था। यद्यपि एमओओसी जैसी डिजिटल पहल (एनपीटीईएल के एक प्रमुख उपलब्धि होने के नाते) उभर चुकी थी लेकिन असमान इंटरनेट कनेक्टिविटी और ढांचागत चुनौतियों के कारण उसकी पहुंच सीमित थी। आनलाइन शिक्षा, हालांकि संभावनाएं दर्शा रही थी, लेकिन मुख्यधारा के शिक्षण अनुभवों में पूर्ण एकीकरण के सामर्थ्य के साथ वह अपनी प्रारंभिक अवस्था में थी। इन चुनौतियों के बावजूद, वर्ष 2013-14 आत्मनिरीक्षण और सुधार का दौर भी रहा। इसने भविष्य में आगे बढ़ने की महत्वपूर्ण प्रेरणा का कार्य किया, जहां भारतीय उच्च शिक्षा पहुंच के अंतर को पाटने, गुणवत्ता बढ़ाने और परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों को अपनाने का प्रयास करेगी। प्रमुख सुधार और पहल: 2014 के बाद के वर्ष भारतीय उच्च शिक्षा को परिवर्तनकारी पथ पर आगे बढ़ाने की दिशा में हुए ठोस प्रयासों के साक्षी रहे। शिक्षा तक पहुंच को व्यापक बनाने, उसकी गुणवत्ता बढ़ाने और तकनीकी प्रगति को अपनाने के प्रति लक्षित सुधारों और पहलों ने इस परिदृश्य को नया आकार दिया। नये विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की विशेषकर वंचित क्षेत्रों में स्थापना से संस्थागत नेटवर्क में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई। साथ ही श्रेयस योजना, प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा योजना, सब्सिडी के माध्यम से छात्र ऋण को किफायती बनाने के प्रयास (केंद्रीय क्षेत्र ब्याज सब्सिडी योजना 2009 को मजबूत करना) और क्रेडिट गारंटी फंड आवंटन (सीसीएफ योजना 2015) करने आदि जैसे लक्षित छात्रवृत्ति कार्यक्रमों के साथ हाशिये पर मौजूद समुदायों तक इस पहुंच का विस्तार हुआ और देश भर में महत्वकांक्षाओं को प्रेरणा मिली। एआईएसएचई वर्ष 2021-22 के अनुसार, उच्च शिक्षा में नामांकन वर्ष 2014-15 में 3.42 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2021-22 में 4.33 करोड़ हो गया। जीईआर वर्ष 2014-15 में 23.7 से बढ़कर वर्ष 2021-22 में 28.4 हो गया, महिला जीईआर वर्ष 2014-15 में 22.4 से बढ़कर वर्ष 2021-22 में 28.5 हो गया। इस विस्तार के परिणामस्वरूप लाखों युवा उच्च शिक्षा में प्रवेश कर रहे हैं, जिसमें पहले से कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों के प्रतिनिधित्व में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 एक परिवर्तनकारी रोडमैप के रूप में उभरी है, जिसमें बहु-विषयक शिक्षा, कौशल विकास और उद्योग भागीदारी पर जोर दिया गया है। इस मूलभूत बदलाव का उद्देश्य स्नातकों को उपयुक्त कौशल से लैस करना और तेजी से विकसित हो रहे नौकरी बाजार में रोजगार क्षमता को बढ़ावा देना है। केवल मेट्रिक्स के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि एनईपी ने, भारत में शिक्षा परिदृश्य को मौलिक रूप से फिर से परिभाषित करने के अपने प्रयासों की बदौलत इस क्षेत्र में हितधारकों के भीतर प्रेरणा और उत्थान की भावना जगायी है। विश्वविद्यालयों ने पाठ्यक्रम में संशोधन को अपनाया, लचीली क्रेडिट प्रणाली, पसंद-आधारित पाठ्यक्रम और उद्योग के अनुरूप विशेषज्ञता की शुरुआत की। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार के अग्रणी संस्थानों के साथ सहयोगपूर्ण अनुसंधान संबंधी पहल समृद्ध हुई, जिससे वैश्विक मंच पर भारत के अनुसंधान आउटपुट को बढ़ावा मिला। शिक्षक एवं शिक्षण पर पंडित मदन मोहन मालवीय राष्ट्रीय मिशन, गुणवत्ता सुधार कार्यक्रम, नेशनल मिशन आॅन मेंटरिंग, अटल एफडीपी आदि जैसे शिक्षक प्रशिक्षण प्रयासों का संकाय विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वयं (जिसे वर्ष 2016 में पाठ्यक्रमों के संदर्भ में विस्तारित और समृद्ध किया गया) और एमओओसी जैसे डिजिटल शिक्षा प्लेटफार्मों के उदय ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच में क्रांति ला दी। आनलाइन डिग्री कार्यक्रमों ने विकल्पों का और अधिक विस्तार किया। राष्ट्रीय डिजिटल विश्वविद्यालय की स्थापना परिवर्तनकारी हो सकती है। देश भर में इंटरनेट कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने पर केंद्रित डिजिटल इंडिया और भारतनेट जैसी पहल ने डिजिटल शिक्षण उपकरणों को व्यापक रूप से अपनाने का मार्ग प्रशस्त किया। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत की प्रगति उसके प्रभावशाली अनुसंधान आउटपुट और नवाचार से भी जाहिर होती है। जैसा कि यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन की 2022 की रिपोर्ट में कहा गया है कि वैज्ञानिक प्रकाशनों के क्षेत्र में भारत 2010 में वैश्विक स्तर पर सातवें स्थान से लंबी छलांग लगाते हुए वर्ष 2020 में तीसरे स्थान पर रहा। वर्ष 2017 और वर्ष 2022 के बीच अनुसंधान आउटपुट में 54 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो वैश्विक औसत से अधिक रही। इस अवधि में 1.3 मिलियन अकादमिक पेपर और 8.9 मिलियन उद्धरण देखे गये। नवाचार में वर्ष 2016-17 से वर्ष 2020-21 तक पेटेंट फाइलिंग में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई।निष्कर्षबीते दशक में भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र ने केवल वैश्विक प्रवृत्तियों के साथ तालमेल ही नहीं बनाये रखा है, बल्कि अकसर उनका मार्ग भी प्रशस्त किया है। पर्याप्त नीतिगत सुधारों और उन्नत तकनीकी उपकरणों के एकीकरण के माध्यम से, युवा, गतिशील भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने की नए सिरे से कल्पना की गयी है। आंकड़ों में प्रगति स्पष्ट होने के बावजूद, समान पहुंच, गुणवत्ता में सुधार और विविध अनुसंधान क्षेत्रों को बढ़ावा देने जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। शैक्षिक परिवर्तन की इस उल्लेखनीय यात्रा को बनाए रखने और इसमें तेजी लाने के लिए निवेश, नीतिगत सुधार और नवाचार के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता आवश्यक है। (लेखक, आईआईएम इंदौर के निदेशक हैं)।
अजय दीप वाधवाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। गत दिनों उत्तर प्रदेश से एक दुखद समाचार आया कि विद्यालय में कक्षा दो के एक विद्यार्थी को हृदयघात हुआ और मात्र सात वर्ष की आयु में उसका दुखद निधन हो गया। इतनी कम आयु में हृदय रोग होना आश्चर्य की बात है।प्राय: बच्चे और युवा समझते हैं कि उनकी आयु अभी कम है और उन्हें स्वस्थ रहने के लिए विशेष कुछ नहीं करना है; कम आयु ही उन्हें स्वस्थ रखेगी। पर उपरोक्त घटना ने सभी बच्चों और उनके माता, पिता और शिक्षकों को इस पर पुन: सोचने के लिए मजबूर किया है। अगर हम स्वस्थ नहीं हैं तो कम आयु में भी घातक बीमारियां हम पर आक्रमण कर सकती हैं।अब समय आ गया है जब हम बच्चों और युवाओं पर पढ़ाई के समान ही स्वस्थ रहने पर भी ज्यादा जोर दें। उन्हें बताएं कि प्रति दिन आधा घंटा उन्हें अपने शरीर को स्वस्थ रखने पर व्यतीत करना चाहिए। वे इस आधे घंटे में व्यायाम, जिम, योग, जॉगिंग, वाकिंग या तैराकी आदि अवश्य करें। उन्हें प्राणायाम करना भी सिखाएं जिसकी उनकी आंतरिक इम्यून सिस्टम भी मजबूत होगी। उन पर बीमारियां जल्दी हमला नहीं कर पायेगी। आजकल विद्यार्थी देर रात तक या तो पढ़ने में या सोशल मीडिया में व्यस्त रहते हैं। देर से सोने के कारण वे सुबह देर से उठते हैं। इससे उनको सुबह व्यायाम आदि के लिए समय नहीं मिलता। उठते साथ ही स्कूल या कॉलेज जाने की उनकी जदोजहद आरंभ हो जाती है। माता पिता को चाहिए कि वे बच्चों को देर से सोने के नुकसान बतायें। समय पर सोना और समय पर उठने से इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है, जिस से कई बीमारियों से बचाव भी होता है। शरीर के लिए अच्छी नींद भी एक बहुत बढ़िया दवा है जो शरीर को स्वस्थ रखता है। साथ ही यह भी सत्य है कि जब हम सुबह जल्दी उठते हैं तो हमारे पास शेष सारे काम करने के लिए अधिक समय उपलब्ध होता है। हेनरी फोर्ड, फोर्ड कार के निर्माता, ने अपनी सफलता का श्रेय सुबह जल्दी उठने को दिया था।युवा ह्रदय सम्राट स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि एक स्वस्थ मस्तिष्क एक स्वस्थ शरीर में ही रहता है। अगर विद्यार्थी यह चाहते हैं कि वे परीक्षा अच्छे नंबर से पास करें, उन्हे अच्छी नौकरी मिले और जीवन में वे अपने ज्ञान से खूब नाम व पैसा कमाएं तो उनको अपना मस्तिष्क स्वस्थ रखना होगा और यह तभी संभव होगा जब उनका शरीर स्वस्थ होगा। स्वस्थ मस्तिष्क के लिए स्वस्थ शरीर एक आवश्यकता हैं। शारीरिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति सिर्फ अपने बीमार और अस्वस्थ शरीर के बारे में ही सोचता रहता है; उसका अपने काम, पढ़ाई या स्वयं के विकास पर ध्यान देने का मन नहीं करता और समय भी नहीं मिलता। साथ ही अस्वस्थ शरीर हमारा मेडिकल खर्च भी बढ़ाता है जिस से वित्तीय बोझ भी बढ़ता है। युवा अगर अपने को स्वस्थ रखेगा तो वह देखने में भी आकर्षक लगेगा जो की हर युवा का स्वप्न होता है। मां, बाप और शिक्षकों के लिए यह आवश्यक है कि वे बच्चों को स्वस्थ रहने की प्रेरणा लगातार देते रहें, उन्हें व्यायाम आदि के लिए प्रेरित करें और उसके लिए उन्हें समय भी दें। याद रखें कि हमारे विकास के लिए पढ़ाई जितनी आवश्यक है उतनी ही आवश्कता अच्छे स्वास्थ्य की भी है। जो फिट है वही हिट है। (लेखक कॉस्ट अकाउंटेंट सह मोटीवेटर हैं।)
ग्रिड प्रबंधक शाम के वक्त बिजली की बढ़ती मांग की समस्या से जूझ रहे हैं जिसका समाधान बाजार कीमतें तय करना ही है। इस संबंध में बता रहे हैं अजय शाहअजय शाह एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सौर ऊर्जा का दायरा बढ़ रहा है। लेकिन शाम को जब सूरज ढल जाता है तब सौर ऊर्जा के बड़े उपयोगकर्ता फिर से ग्रिड वाली बिजली की सेवाएं लेने लगते हैं। आर्थिक वृद्धि और मानव निर्मित संरचनाओं और बुनियादी ढांचे के समूह वाले निर्मित वातावरण में बदलाव के चलते शाम को वातानुकूलित साधनों की मांग बढ़ रही है। ग्रिड प्रबंधक शाम के वक्त बिजली की बढ़ती मांग की समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन इसके समायोजन के लिए कोई उपाय करना मुश्किल होता जा रहा है। इसका समाधान बाजार कीमतें तय करना ही है। सौर ऊर्जा की कीमत में काफी गिरावट आयी है। प्रत्येक कंपनी के पास यह मौका होता है कि वे किसी अनुबंध व्यवस्था के माध्यम से सौर ऊर्जा हासिल कर, दिन में बिजली खर्च कम कर सकें। लेकिन सूरज की रोशनी अस्थिर होती है और हर शाम सौर ऊर्जा कम हो जाती है जबकि बिजली की मांग बढ़ जाती है। आर्थिक विकास और चीन के सस्ते निर्माण की वजह से एयर कंडिशनिंग अपनाने की दर दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इस तरह के निर्मित वातावरण के चलते भारी संरचना बन रही है जिसमें अधिक ताप क्षमता होती है जो शाम को आंतरिक सतहों को गर्म कर देती है, जिससे शाम में एयर कंडिशनर के अधिक उपयोग की जरूरत महसूस होने लगती है। निर्मित वातावरण अब भारी संरचनाओं की ओर बढ़ रहा है, जिनमें अधिक ताप क्षमता होती है और इसके चलते शाम के वक्त तक आंतरिक सतह गर्म हो जाता है और एयर कंडिशनिंग की जरूरत महसूस होने लगती है। हर शाम, सौर ऊर्जा के उपयोगकर्ता ग्रिड का इस्तेमाल करने लगते हैं। ऐसे में ग्रिड प्रबंधकों की समस्या बढ़ने लगती है। भारतीय बिजली प्रणाली का एक बड़ा हिस्सा कोयला आधारित बिजली संयंत्र है और शाम के वक्त मांग बढ़ने पर आपूर्ति की कमी पूरा करने के लिए इन्हीं संयंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन दिन में, जब सूरज की रोशनी होती है तब इस बिजली के पर्याप्त खरीदार नहीं होते हैं। कोयला संयंत्रों को अपना उत्पादन बढ़ाने या कम करने में घंटों लग जाते हैं। वे थोड़े वक्त में घटती-बढ़ती मांग के आधार पर तुरंत बिजली उत्पादन करने में सक्षम नहीं होते हैं। दूसरी दिक्कत यह है कि वैश्विक वित्तीय संस्थान अब कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन जैसे कार्बन उत्सर्जन करने वाले नए बिजली संयंत्रों को वित्तीय सहायता देने से हिचक रहे हैं। इससे भारतीय बिजली कंपनियों को अक्षय ऊर्जा स्रोत जैसे कि सौर और पवन ऊर्जा की ओर रुख करना पड़ा है। नतीजतन, जीवाश्म ईंधन पर आधारित नई बिजली उत्पादन क्षमता की वृद्धि रुक गई है। मौजूदा स्थिति में निजी निवेश को फिर से उभारना है। सीएमआईई कैपेक्स डेटा बेस की क्रियान्वयन वाली परियोजनाएं 2020 के 44 लाख करोड़ रुपये के निचले स्तर से बढ़कर वर्तमान में 55.7 लाख करोड़ रुपये (दोनों मूल्य 2024 के रुपये के आधार पर) तक पहुंच गई हैं जो लगभग तीन वर्षों में वास्तविक रूप से 26 प्रतिशत की वृद्धि है। जैसे-जैसे ये परियोजनाएं पूरी होती जाएंगी, बिजली की मांग बढ़ेगी। हमें उन ग्रिड प्रबंधकों की सराहना करनी चाहिए जो इस परिस्थिति का सामना बहादुरी से कर रहे हैं। हर शाम जब सूरज ढल जाता है तब ग्रिड की मांग बढ़ जाती है। ग्रिड प्रबंधक मांग पूरा करने के लिए किसी तरह हालात संभालते हैं। ऐसे वक्त में पवन ऊर्जा (इसमें भी अनिश्चितता है) को अहमियत दी जाने लगी है। कुछ छोटे भंडारण संयंत्रों की शुरूआत हो गई है। जलविद्युत संयंत्रों और गैस संयंत्र मददगार होते हैं। केवल कोयला आधारित बिजली क्षमता को उनकी आर्थिक और तकनीकी क्षमता से परे इस्तेमाल किया जा रहा है जिस पर निर्भर रहना लंबे समय में टिकाऊ नहीं है। हर शाम बढ़ती मांग के बीच ग्रिड प्रबंधकों को वैकल्पिक समाधानों की आवश्यकता है। उनके लिए पुराने बिजली-खरीद समझौते (जहां उन्हें अनुबंध के तहत कुछ खास चीजें करने के लिए मजबूर किया जाता है) और कोयला आधारित बिजली संयंत्र (जो लचीली तकनीक नहीं है) बाधाएं हैं। ग्रिड प्रबंधकों ने अब तक एक दशक से भी अधिक समय से इन समस्याओं का साहसी तरीके से समाधान किया है। हम अतीत से भविष्य का अनुमान लगाते हैं और हम कुछ इस तरह सोचने लगते हैं कि चीजें उसी तरह चलती रहेंगी जैसी वे होती रही हैं। लेकिन यह समस्या अब एक खास मोड़ पर आ चुकी है। ग्रिड प्रबंधकों के लिए लगातार सुधार करने की गुंजाइश कम हो रही है। हाल के वर्षों में गर्मी के मौसम में बढ़ते बिजली संकट का मूल कारण भी यही है। हमें इसके कारकों को समझना चाहिए और यह उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले दिनों में ग्रिड प्रबंधकों के लिए इस संकट का प्रबंधन करना और भी कठिन हो जायेगा। हालांकि क्रियान्वयन के स्तर पर छोटे उतार-चढ़ाव देखे जाएंगे लेकिन इस रणनीति में ही खामी है। तीन प्रमुख कारक (दिन में सस्ती सौर ऊर्जा की निजी मांग, जीवाश्म ईंधन से संचालित होने वाले संयंत्रों की वैश्विक फंडिंग न मिलना और वातानुकूलित यंत्रों को चलाने की बढ़ती मांग) नीति निमार्ताओं के नियंत्रण से परे हैं। इस समस्या के समाधान के लिए एक और उपकरण का इस्तेमाल किया जा सकता है जो मूल्य प्रणाली से संबंधित है। आज ग्रिड इंजीनियर कीमतों में स्थिरता चाहते हैं ताकि निश्चित मांग मिल सके। वे हर शाम मांग के आधार पर आपूर्ति करते हैं। ग्रिड प्रबंधकों को मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को हल करना चाहिए। इसमें आर्थिक दृष्टिकोण से मूल्यवर्धन होता है। मूल्य प्रणाली भी आपूर्ति और मांग के बीच के अंतर को कम करती है। टमाटर की आपूर्ति और मांग में उतार-चढ़ाव होता रहता है और इसका हल निकालने के लिए कोई बागवानी इंजीनियर नहीं होते हैं। इसमें कीमतों की मुख्य भूमिका होती है। टमाटर की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता रहता है और इससे हर वक्त मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनता है। बिजली के साथ भी ऐसा ही हो सकता है। दोपहर में जब सूरज की रोशनी होती है तब बिजली की कीमत शून्य हो जानी चाहिए (भले ही यह कोयला आधारित ताप बिजली आपूर्तिकर्ता ही क्यों न हो)। शाम को जब इसकी कमी होती है तब बिजली की कीमत तेजी से बढ़ जानी चाहिए। बिजली की कीमत के अनुसार सभी इसके इस्तेमाल के तरीके बदल सकते हैं और बिजली खरीदने वाले उपभोक्ता सस्ती बिजली का फायदा उठाने के लिए अपने काम दिन में करने लगेंगे। शाम को एसी चालू करने से पहले लोग बिजली की कीमत का ध्यान रखने लगेंगे। चेन्नई जैसी जगहों पर आॅफिस की पोशाक शॉर्ट्स हो सकती है। बुनियादी ढांचे या भवन निर्माण में इमारतों को ठंडा रखने वाले डिजाइनों को प्राथमिकता दी जाएगी। दो-पाली वाली प्रणाली में काम किया जा सकता है जिसमें दिन की पाली (जब सूरज की रोशनी हो) और रात की पाली (शाम में बिजली की कीमतों में तेजी आने के बाद शुरू होने वाली) में काम होगा। बिजली भंडारण भी एक तरह का कारोबार है जिसके तहत दिन में सस्ती बिजली खरीदी जाती है और शाम को महंगी बिजली बेची जाती है। बिजली के दैनिक मूल्य में उतार-चढ़ाव से भंडारण में निजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा। भंडारण संयंत्र बनाने का निर्णय व्यक्तिगत आधार पर किया जाना चाहिए और यह लाभ की संभावना के आधार पर होना चाहिए न कि इसे केंद्रीय योजनाकारों के द्वारा किया जाना चाहिए। पवन ऊर्जा उत्पादकों को हर शाम फायदा होगा जिससे पवन ऊर्जा में अधिक और सौर ऊर्जा में कम निवेश को फिर से बढ़ावा मिलेगा। साथ ही कोयला आधारित बिजली संयंत्र दिन में शून्य या कम कमाई करेंगे और शाम में अधिक मांग के समय मुनाफा कमाएंगे। फिलहाल ग्रिड इंजीनियरों से बहुत अधिक उम्मीदें की जा रही हैं। भविष्य की बिजली प्रणाली सौर, पवन और बिजली भंडारण का संयोजन होगा जिसे कीमतों के द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। समस्या का समाधान बड़े पैमाने पर केंद्रीयकृत तरीके से नहीं, बल्कि बिजली खपत कम करने और अक्षय ऊर्जा के स्रोत अपनाने जैसे छोटे कदमों के जरिये व्यक्तिगत स्तर पर किया जा सकता है। इससे ग्रिड प्रबंधकों को हर शाम बिजली आपूर्ति और मांग में संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होगी। (लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)
राजकुमारी पाण्डेय एबीएन एडिटोरियल डेस्क। क्या आप शिव के अवतार के नाम जानना चाहते हैं? जानते हैं शिव के 10 अवतार के नाम। सद्गुरु हमें बता रहें हैं शिव के अवतारों के बारे में। सद्गुरु योग विद्या के आधार पर शिव के 10 अलग-अलग रूपों के बारे में बता रहे हैं कि हर एक रूप किसका प्रतिनिधित्व करता है। आइये ऊर्जस्वी नटराज, भयावह कालभैरव, बच्चों जैसे भोलेनाथ और अन्य रूपों के बारे में जानें। शिव के असंख्य रूप हैं, जो हर उस संभव विशेषता को समाहित करते हैं : जिनकी कल्पना एक इंसान कर सकता है और नहीं कर सकता। इनमें से कुछ बहुत ही उग्र और भयंकर है। कुछ रहस्यमयी हैं। कुछ प्रिय और आकर्षक हैं। सीधे-साधे भोलेनाथ से ले कर उग्र कालभैरव तक, सुंदर सोमसुंदर ले कर भयानक अघोरशिव तक, वे सारी संभावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए हैं, और इन सबसे अनछुए भी हैं। परंतु इन सबके बीच, इनके पाँच बुनियादी रूप हैं। इस आलेख में, सद्गुरू बता रहे हैं कि ये क्या हैं और इनके पीछे का विज्ञान क्या है।योग योग योगेश्वराय भूत भूत भूतेश्वराय काल काल कालेश्वराय शिव शिव सर्वेश्वराय शंभो शंभो महादेवाय 1 योगीश्वर सद्गुरु : योग के पथ पर होने का अर्थ है कि आप अपने जीवन में एक ऐसे चरण पर आ गए हैं जहां आपने अपने भौतिक शरीर की सीमाओं को जान लिया है। आपने भौतिक सीमाओं से परे जाने की आवश्यकता को महसूस किया है झ्र आप स्वयं को इस असीम ब्रह्माण्ड में भी बँधा हुआ पा रहे हैं। आप यह देखने योग्य हो गए हैं कि अगर आप छोटी सीमा में बंध सकते हैं, तो आप कहीं न कहीं विशाल सीमा में भी बंध सकते हैं। आपको ये बात समझने के लिए ब्रह्मांड के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने की जरूरत नहीं है। यहीं बैठे आप जानते हैं कि अगर यह सीमा आपके लिए बाधा बन रही है तो विशाल ब्रह्मांड भी कभी आपके लिए बाधा बन जायेगा, दूरियां लांघने की क्षमता आने से ये आपके अनुभव में आ जायेगा। एक बार आपकी दूरियां लांघने की क्षमता बढ़ेगी, तो आपके लिए किसी भी तरह की सीमा बाधा बन जायेगी। जब आप इसे एक बार जान और समझ लेंगे, जब आप उस तड़प को जान लेंगे, जिसे भौतिक रूप से पूरा नहीं किया जा सकता, तो आप योग की खोज करना शुरू करते हैं। योग का अर्थ है भौतिक सीमाओं के बंधनों से आजाद होना। आपका प्रयास केवल भौतिकता पर महारत जासिल करना नहीं, पर इसकी सीमा को तोड़ते हुए, ऐसे आयाम को छूना है, जो भौतिक प्रकृति नहीं रखता। आप ऐसी दो चीजों को जोड़ना चाहते हैं झ्र जिनमें एक सीमा में कैद तथा दूसरी असीम है। आप सीमाओं को अस्तित्व की असीम प्रकृति में विलीन करना चाहते हैं, इसलिए, योगेश्वराय। 2 भूतेश्वर यह सारी भौतिक सृष्टि : जिसे हम देख, सुन, सूंघ, छू व चख सकते हैं : यह देह, यह ग्रह, ब्रह्माण्ड, सब कुछ, यह सब कुछ पंच तत्वों का ही खेल है। केवल पंच तत्वों की मदद से कैसी अद्भुत शरारत ये सृष्टि रच दी गयी है। केवल पंच तत्व, जिन्हें आप एक हाथ की अंगुलियों से गिन सकते हैं, इसने कितनी चीजें तैयार की गयी हैं। सृजन इससे अधिक करुणामयी नहीं हो सकता। अगर ये कहीं पचास लाख तत्व होते तो आप कहीं खो कर रह जाते। पंच भूतों के रूप में जाने गये, इन तत्वों को साधना ही सब कुछ है :आपकी सेहत, आपका कल्याण, इस जगत में आपका बल और अपनी इच्छा से कुछ रचने की योग्यता। जाने-अनजाने, चेतन या अचेतन तौर पर, व्यक्ति किसी हद तक इन विभिन्न आयामों को साध लेते हैं। वे कितना नियंत्रण रखते हैं, उसी से उनकी देह, मन और उनके द्वारा होने वाले कामों और उनकी सफलता की प्रकृति सुनिश्चित होती है, या उनकी दृष्टि या समझ कहां तक जा सकती है आदि तय होता है। भूत भूत भूतेश्वराय का अर्थ है कि जो भी जीवन के पंच भूतों को साध लेता है, वह कम से कम भौतिक जगत में, अपने जीवन की नियति या भाग्य को तय कर सकता है। 3 कालेश्वर काल : समय। भले ही आपने पांचों तत्त्वों को अपने बस में कर लिया हो, इस असीम के साथ एकाकार हो गए हों या आपने विलय को जान लिया हो : जब तक आप यहां हैं, समय चलता जा रहा है। समय को साधना, एक बिलकुल ही अलग आयाम है। काल का अर्थ केवल समय नहीं, इसका एक अर्थ अंधकार भी है। समय अंधकार है। समय प्रकाश नहीं हो सकता क्योंकि प्रकाश समय में एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाता है। प्रकाश समय का दास है। प्रकाश एक ऐसा तत्व है, जिसका एक आदि और अंत है। समय वैसा तत्व नहीं है। हिंदू जीवनशैली के अनुसार, वे समय के छह अलग-अलग आयाम हैं। एक बात तो आपको जाननी ही होगी : जब आप यहां बैठे हैं, तो आपका समय तेजी से भाग रहा है। मृत्यु के लिए तमिल में बहुत सटीक शब्द या अभिव्यक्ति है : कालम आइटांगा- उसका समय समाप्त हो गया। अंग्रेजी में भी हम कुछ समय पहले ऐसा कहते थे, वह एक्सपायर हो गया। किसी दवा की तरह इंसान की भी एक्सपायरी डेट होती है। आपको लग सकता है कि आप कई जगहों पर जा रहे हैं। नहीं, जहां तक आपके शरीर का संबंध है, यह सीध कब्र की ओर जा रहा है, एक क्षण के लिए भी इसकी यात्रा नहीं थमती। आप इसे धीमा तो कर सकते हैं किंतु यह अपनी दिशा नहीं बदलता। जब आप बड़े होंगे तो धीरे-धीरे जान सकेंगे कि यह धरती आपको वापस निगलने की तैयारी में है। जीवन अपनी बारी पूरी करता है। समय जीवन का एक विशेष आयाम है : यह अन्य तीन आयामों के साथ मेल नहीं खाता। और ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं में से, यह सबसे अधिक रहस्यमयी है। आप इसकी व्याख्या नहीं कर सकते क्योंकि यह है ही नहीं। यह अस्तित्व के ऐसे किसी भी रूप में नहीं है, जिनकी आपको समझ है। यह सृष्टि का सबसे शक्तिशाली आयाम है, जो सारे ब्रह्मांड को एक साथ थामे रखता है। इसी के कारण आधुनिक भौतिकी भ्रम में है कि गुरुत्वाकर्षण कैसे काम करता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण है ही नहीं। यह समय ही है जो सब कुछ एक साथ बांधे रखता है। 4.शिव-सर्वेश्वर-शंभो शिव का अर्थ है, जो है ही नहीं, जो विलीन हो गया। जो है ही नहीं, हर चीज का आधार नहीं, और वही असीम सर्वेश्वर है। शंभो केवल एक मार्ग और एक कुंजी है। अगर आप इसे एक खास तरह से उच्चारित कर सकें, कि आपका शरीर टूट उठे, तो ये एक मार्ग बन जायेगा। अगर आप इन सभी पहलुओं को साधते हुए वहां तक जाना चाहते हैं तो इसमें लंबा समय लगेगा। अगर आप केवल इस रास्ते पर चलना चाहते हैं : तो आप इन पहलुओं से कौशल से नहीं, बल्कि चुपके से भीतर घुस कर परे निकल जाते हैं। जब मैं छोटा था, तो मैसूर के चिड़ियाघर में मेरे कुछ दोस्त थे। रविवार की सुबह का मतलब था कि मेरी जेब में पॉकेट मनी के दो रुपए होते। मैं मछली मार्केट के उस हिस्से में जाता, जहां वे आधी सड़ी मछलियां रखते थे। कई बार मुझे दो रुपए में दो-तीन किलो मछली मिल जाती थी। मैं उन्हें एक पन्नी में डाल कर मैसूर के चिड़ियाघर में ले जाता। मेरे पास उससे ज्यादा पैसे नहीं होते थे। उन दिनों चिड़ियाघर का टिकट एक रुपया था; यह वहां जाने का सीधा रास्ता था। वहां लगभग दो फीट ऊंचा बैरियर था, अगर आप उसके नीचे से रेंग कर निकल सकें तो उसका कोई शुल्क नहीं लगता था। मुझे रेंग कर जाने में कोई परेशानी नहीं थी। मैं घुटनों के बल होते हुए निकल जाता और सारा दिन अपने दोस्तों को सड़ी मछलियां खिलाता। अगर आप सीधा चलना चाहते हैं, तो यह एक कठिन मार्ग है : ढेर सारा काम। अगर आप केवल घुटनों के बल चलना चाहते हैं तो इसके लिए कई आसान उपाय हैं। जो लोग घुटनों के बल चलना पसंद करते हैं, उन्हें किसी भी चीज को साधने की चिंता नहीं करनी पडती। जब तक जीवन चलता है, जीयें। जब आप मरेंगे, तो उस परम को पा लेंगे। किसी भी सरल सी चीज का हुनर साधने में भी अपनी ही एक सुदंरता है : एक सौंदर्यबोध का एहसास है। मिसाल के लिए, एक फुटबॉल को किक मारना। यहां तक कि एक बालक भी ऐसा कर सकता है। पर जब कोई उसे साध लेता है, तो अचानक उसमें एक सौंदर्य बोध आ जाता है। आधी दुनिया उसे बैठ कर देखती है। अगर आप कौशल को जानना और आनंद लेना चाहते हैं, तो आपको काम करना होगा। पर अगर आप घुटनों के बल चलने के लिए तैयार हैं, तो केवल शंभो की जरूरत है। 5 शिव का भोलेनाथ रूप शिव को हमेशा से बहुत शक्तिशाली माना गया है। पर, साथ ही साथ, वे ऐसे हैं जो दुनिया के साथ चालाकी या कपट नहीं कर सकते। इसीलिये, शिव के एक रूप को भोलेनाथ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि वे बच्चों जैसे हैं। भोलेनाथ का मतलब है, भोला-भाला, या अनजान, अज्ञानी। आप देखते होंगे कि ज्यादातर बुद्धिमान लोगों को बहुत आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है क्योंकि वे अपनी बुद्धिमत्ता छोटी-छोटी चीजों में नहीं लगाते। चालाकी, धूर्तता और चतुराई निचली स्तर की बुद्धि में होती है जो दुनिया में किसी बुद्धिमान व्यक्ति को आसानी से बेवकूफ बना सकती है। पैसे या समाज के स्तर पर इसका कुछ महत्व हो सकता है, पर जीवन के स्तर पर इसका कोई मतलब नहीं होता। हम जब बुद्धिमत्ता की बात करते हैं तो ये सिर्फ होशियारी के बारे में नहीं होती। हम जीवन के उस आयाम को पूरे प्रवाह में बहने देने की बात कर रहे हैं जो जीवन को संभव बनाता है। शिव भी ऐसे ही हैं। वे कोई मूर्ख नहीं हैं, पर वे छोटी-छोटी बातों में अपनी बुद्धिमत्ता का उपयोग करने की परवाह नहीं करते। 6 शिव का नटराज रूपनृत्य के भगवान का रूप, नटेश या नटराज, शिव के सबसे महत्वपूर्ण रूपों में से एक है। मैं जब स्विट्जरलैंड की सीईआरएन में गया, जो सारी दुनिया की एक खास भौतिक विज्ञान प्रयोगशाला है और जहां परमाणुओं पर अनगिनत प्रयोग किये जाते हैं, मैंने देखा कि प्रवेश दरवाजे के सामने नटराज की एक मूर्ति लगी है। ये इसलिये कि उनको लगा कि वे वहां जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके इतने ज्यादा नजदीक, इस मानव संस्कृति में कुछ और नहीं है। नटराज उस प्रचुरता और सृष्टिरचना के नृत्य के प्रतीक हैं जो चिरकाल की स्थिरता से स्वयं बनी है । चिदंबरम मंदिर में जो नटराज हैं, वे बहुत ही प्रतीकात्मक हैं, क्योंकि, आप जिसे चिदंबरम कहते हैं, वह संपूर्ण स्थिरता ही है। इस मंदिर के रूप में उसी का पवित्र रूप दशार्या गया है। हमारी जो भी शास्त्रीय कलायें हैं वे इसी सम्पूर्ण स्थिरता को मनुष्य में लाने के लिये हैं। बिना स्थिरता के सच्ची कला हो ही नहीं सकती। 7 अर्धनारीश्वर रूप सामान्य ढंग से शिव को संपूर्ण पुरुष कहा जाता है, पर उनके अर्धनारीश्वर रूप में उनका आधा भाग एक पूर्ण विकसित स्त्री का है। ऐसा कहने का मतलब यह है कि अगर आपके अंदर के पुरुष और स्त्री सही ढंग से मिलते हैं तो आप अति आनंद की हमेशा रहने वाली स्थिति में होंगे। अगर आप इसे बाहर से करने की कोशिश करते हैं तो ये ज्यादा दिन नहीं चलता, और उसके साथ मुश्किलें आती हैं और यह नाटक हमेशा चलता रहता है। यहां पुरुषत्व और स्त्रीत्व का मतलब शारीरिक रूप से पुरुष या स्त्री नहीं है। ये कुछ खास गुण हैं। मूल रूप से ये दो व्यक्तियों के मिलने की इच्छा की बात भी नहीं है, पर, जीवन के दो आयामों के मिलने की इच्छा की बात है झ्र बाहर से भी और अंदर से भी। अगर आप इसे अंदर से हासिल कर लेते हैं, तो बाहर की ओर ये शत-प्रतिशत आपके चयन से होगा, नहीं तो बाहरी रूप एक भयानक मजबूरी बन जायेगा। ये एक प्रतीकात्मक बात है : ये दिखाने के लिये कि अगर आपका अस्तित्व पूरी तरह से विकसित हो जाता है, तो आप आधे पुरुष और आधे स्त्री होंगे : ना कि कोई नपुंसक झ्र पर एक पूर्ण पुरुष और एक पूर्ण स्त्री। तब ही आप एक पूर्ण मनुष्य होंगे। 8 कालभैरव रूप शिव का एक खतरनाक रूप है कालभैरव झ्र जब वे काल(समय) का नाश करने में लग गये थे। सभी भौतिक वास्तविकतायें समय की एक निश्चित अवधि में होती हैं। अगर मैं आपके समय को नष्ट कर देता हूं तो आपके लिए सब कुछ खत्म हो जायेगा। शिव ने एक खास वेशभूषा पहनी और फिर भैरवी यातना बनाने के लिये वे कालभैरव बन गये। यातना का अर्थ है : भयानक दुख, तकलीफ। जब मृत्यु का पल आता है तब बहुत सारे जन्मों की यादें जबर्दस्त तीव्रता के साथ प्रकट हो जाती हैं और जो भी दर्द और दुख आपको होने हैं, वे एक सेकंड के एक छोटे से भाग में ही हो जाते हैं।फिर भूतकाल का कोई भी अंश आप में नहीं रहता। अपने सॉफ्टवेयर को खत्म कर देना दर्दनाक होता है पर मृत्यु के पल में ये होता ही है और आपके पास कोई चारा नहीं होता। वे इसे जितना कम कर सकते हैं, कर देते हैं ताकि तकलीफ जल्दी खत्म हो जाये। वैसा तभी होगा जब हम इसे बहुत ज्यादा तीव्र बना देंगे। अगर ये हल्का हुआ तो खत्म नहीं होगा, हमेशा चलता रहेगा। 9 आदियोगी यौगिक परंपरा में, शिव को भगवान की तरह पूजा नहीं जाता। वे आदियोगी अर्थात पहले योगी और आदिगुरु, पहले गुरु भी हैं, जिनमें से यौगिक विज्ञान का जन्म हुआ। दक्षिणायन की पहली पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा होती है जब आदियोगी ने यह विज्ञान अपने पहले सात शिष्यों, सप्तर्षियों को सिखाना शुरू किया। ये किसी भी धर्म के अस्तित्व में आने से भी पहले की बात है। लोगों के मानवता को तोड़ने के विभाजनकारी तरीके ढूंढ़ने से पहले, मानवीय चेतना को ऊंचे स्तर पर ले जाने के लिये शक्तिशाली साधनों का पता लगाया जा चुका था और उनका प्रचार, प्रसार भी किया गया था। उन साधनों की बनावट, उनकी खासियत, इतनी ज्यादा है कि विश्वास नहीं होता। ये पूछना कि क्या उस समय लोग इतने खास थे, ठीक नहीं है क्योंकि ये चीजें किसी खास सभ्यता या विचार प्रक्रिया से नहीं आयीं थीं। ये अंदर की समझ से, आत्मज्ञान से आयीं थीं। यह आदियोगी ने ही बताया था। आज भी, आप उन चीजों में से कुछ भी बदल नहीं सकते क्योंकि उन्होंने हर चीज इतने सुंदर ढंग और बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से कही है। जिसे समझने में ही आपका सारा जीवन लग सकता है। 10 शिव का त्र्यंबक रूप शिव को हमेशा ही त्र्यंबक कहा गया है क्योंकि उनके पास एक तीसरी आंख है। पर, तीसरी आंख का मतलब ये नहीं है कि उनके माथे पर कोई दरार बनी हुई है। इसका मतलब सिर्फ ये है कि उनकी समझ अपनी पूरी संभावना पर पहुंच गयी है। ये तीसरी आंख दिव्यदृष्टि की आंख है। हमारी दो भौतिक आंखें सिर्फ ज्ञानेन्द्रिय हैं। वे हर तरह की बकवास मन में भरती रहती हैं क्योंकि आप जो भी देखते हैं वो सच नहीं होता। आप इस व्यक्ति या उस व्यक्ति को देखते हैं और उनके बारे में कुछ सोचने लगते हैं, पर आप उनमें शिव को नहीं देख पाते। इसीलिए एक और आंख, जो गहरी समझ वाली हो, खुलना जरूरी है। आप चाहे कितना भी सोचें, या फिलोसोफी करें, पर आपके मन में स्पष्टता नहीं आ सकती। आप जो भी तार्किक स्पष्टता बनाते हैं, उसे कोई भी नष्ट कर सकता है और मुश्किल हालात इसको पूरी तरह से उल्ट-पुल्ट कर सकते हैं। सिर्फ जब, दिव्यदृष्टि खुलती है, जब आपके पास आंतरिक दृष्टि होती है, तभी एकदम सही स्पष्टता आती है। हम शिव को जो कुछ भी कहते हैं, वह और कुछ नहीं पर पूरी समझ का ही स्वरूप है। इसी संदर्भ में हम ईशा योग सेंटर में महाशिवरात्रि का उत्सव मनाते हैं। ये एक अवसर है और एक संभावना है जिससे सभी लोग अपनी समझ को कम से कम एक स्तर आगे ले जा सकें। यही शिव की बात है। यही योग है। ये कोई धर्म नहीं है, ये अंदरूनी विकास का विज्ञान है।
आर्थिकी की छलांग अजय सानी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इसमें दो राय नहीं कि वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही में जीडीपी के आंकड़े अर्थव्यवस्था में आशा का संचार करने वाले हैं। अक्तूबर-दिसंबर की तिमाही के जीडीपी आंकड़े बताते हैं कि देश कोरोनाकाल के संकट और वैश्विक चुनौतीपूर्ण स्थितियों से मुक्त होकर विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। शुक्रवार को शेयर बाजार का रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंचना बताता है कि उसे तरक्की के आंकड़े रास आए हैं। विपक्षी नेता कह सकते हैं कि चुनावी समर में जाते देश की गुलाबी तसवीर सरकार पेश कर रही है। लेकिन मार्च माह के पहले दिन घरेलू बाजार में दमदार तेजी हकीकत बयां करती है। विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ा है। जिसके चलते सेंसेक्स और निफ्टी नए सर्वकालिक उच्च स्तर तक जा पहुंचे। जो बताते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था ने नई रफ्तार पकड़ ली है। देश ने आर्थिक विकास के मामले में चीन-अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। गुरुवार को जारी तीसरी तिमाही के आंकड़ों के अनुसार देश की विकास दर 8.4 फीसदी रही है। पहले कयास लगाए जा रहे थे कि यह आंकड़ा साढ़े छह प्रतिशत के आसपास रह सकता है। वैसे इससे पहले दूसरी तिमाही की ग्रोथ दर 7.6 फीसदी रही थी। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष की इसी तिमाही में विकास दर 4.3 फीसदी रही थी। निस्संदेह, ये आंकड़े मोदी सरकार के लिए बूस्टर का काम कर सकते हैं। जो आने वाले आम चुनाव में एक मुद्दा भी रहेगा और सरकार अर्थव्यवस्था के सवाल पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने में मजबूत रहेगी। इतना ही नहीं, आईएमएफ जैसी वैश्विक संस्थाएं भी कह रही हैं कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक विकास की गति अमेरिका, जापान व चीन से अधिक रहेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि विकास के आंकड़ों की यह क्षमता देश के 140 करोड़ से अधिक लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाये। देश में बेरोजगारी की दर धरातल पर कम हो। उल्लेखनीय है कि पिछली तिमाही में अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन के मूल में तीन बड़े कारक रहे हैं। भले ही कृषि क्षेत्र में सुस्ती देखी गई है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग, माइनिंग और विनिर्माण के क्षेत्रों में उत्साहवर्धक गति देखी गयी है। बढ़ते अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि का भी अर्थव्यवस्था को गति देने में योगदान रहा है। उत्साहजनक बात यह रही कि उत्पादन क्षेत्र में तीसरी तिमाही में 11.6 फीसदी की वृद्धि देखी गयी है। यह वृद्धि पिछली तिमाही में महज 4.8 फीसदी रही थी। वहीं खनन के क्षेत्र में भी विकास दर 7.5 फीसदी रही है। अच्छी बात यह भी है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फरवरी में करीब तीन अरब डॉलर बढ़ा है। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से शुक्रवार को दी गयी जानकारी के अनुसार, विदेशी मुद्रा का भंडार अब बढ़कर 619 अरब डॉलर हो गया है। वहीं दूसरी ओर भारतीय स्टेट बैंक के एक अध्ययन में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर आठ फीसदी के दायरे में रह सकती है। भारत की यह उपलब्धि इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि दुनिया की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाएं उच्च मुद्रास्फीति की चुनौतियों से जूझ रही हैं। जिसके चलते विश्व की वित्तीय स्थितियों में विषमता नजर आ रही है। वहीं भारत ने दुनिया में जारी युद्धों के प्रभाव, महामारी के प्रभावों के बावजूद ये कामयाबी हासिल की है। अच्छी बात यह है कि हमारी उपलब्धियां अनुमानों से अधिक हैं। सुखद यह भी है कि देश ने लगातार तीसरी बार अर्थव्यवस्था की विकास दर को सात प्रतिशत से अधिक रख पाने में सफलता पायी है। इसके बावजूद कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य अनुकूल नहीं है। निस्संदेह, विनिर्माण क्षेत्र में दो अंकों में वृद्धि महत्वपूर्ण है। लेकिन कृषि क्षेत्र में अपेक्षित वृद्धि का न होना हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। देश की खाद्य शृंखला को मजबूत बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। बहरहाल, अर्थव्यवस्था के ताजा आंकड़ों से निश्चित रूप से नये जनादेश के लिये जाने वाली राजग सरकार का आत्मविश्वास बढ़ेगा।
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