पाक होगा नीलाम और बोली लगायेगा हिंदुस्तान आर्थिक संकट के बीच पीओके में कैसे बजा गुलामी के खिलाफ आजादी का बिगुल? अभिनय आकाश एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पाकिस्तानी सेना की गोलियों से अब तक 3 नागरिक मारे जा चुके हैं और कई घायल भी हैं। पीओके में इस संघर्ष की एक वजह कश्मीर की खुशहाली भी है। पीओके के लोग कश्मीर की तरह सहूलियत की मांग करते रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान सरकार ने दो वक्त की रोटी के लिए उन्हें मोहताज बना दिया है। इस वजह से पीओके के लोग भारत में विलय की मांग भी करने लगे हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पिछले पांच दिनों से हाहाकार मचा हुआ है। पीओके के लोग पाकिस्तान के जुल्म, महंगाई और बदहाली से परेशान हो चुके हैं। हालात ये हैं कि पीओके की जनता और पाकिस्तान की सेना एक दूसरे की जान के प्यासे हो चुके हैं। इन दोनों के बीच कई दौर की हिंसा हो चुकी है। पाकिस्तानी सेना की गोलियों से अब तक 3 नागरिक मारे जा चुके हैं और कई घायल भी हैं। पीओके में इस संघर्ष की एक वजह कश्मीर की खुशहाली भी है। पीओके के लोग कश्मीर की तरह सहूलियत की मांग करते रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान सरकार ने दो वक्त की रोटी के लिए उन्हें मोहताज बना दिया है। इस वजह से पीओके के लोग भारत में विलय की मांग भी करने लगे हैं। पिछले कुछ दिनों में भारत के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री ने ऐसे कई बयान दिए हैं जिसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का जिक्र रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि पाकिस्तान ने अगर चूड़ियां नहीं पहनी है तो भारत पहना देगा। गृह मंत्री अमित शाह ने लगातार कहा कि पीओके भारत का हिस्सा है। इसे वापस लेंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि पीओके को ताकत से हासिल करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। वो खुद ही भारत में शामिल हो जाएगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि पीओके पर पाकिस्तानी कब्जा खत्म करके उसे भारत में शामिल कर लिया जाएगा। भारतीय नेताओं के ये बयान पिछले पांच से दस दिनों के अंदर आए हैं। पीओके के लोगों का विद्रोह भी इसी दौरान हो रहा है। सवाल ये है कि क्या पीओके में कुछ बड़ा होने वाला है?पीओके में विरोध प्रदर्शनबिजली और खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों के विरोध में व्यापारी शुक्रवार को सड़कों पर उतर आए। अगस्त 2023 में भी उच्च बिजली बिलों के खिलाफ ऐसे ही विरोध प्रदर्शन हुए थे। स्ट्राइक की वजह से पीओके की राजधानी और सबसे बड़े शहर मुजफ्फराबाद में सार्वजनिक परिवहन, दुकानें, बाजार और व्यवसाय बंद हो गये। मीरपुर और मुजफ्फराबाद डिवीजनों में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ दिए और पुलिस के साथ झड़प भी देखने को मिली। 12 मई को विधानसभा और अदालतों जैसी सरकारी इमारतों की सुरक्षा के लिए अर्धसैनिक रेंजरों को बुलाने की नौबत आ गई। बढ़ती ऊर्जा लागत के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दो साल से अधिक समय से अत्यधिक उच्च मुद्रास्फीति और निराशाजनक आर्थिक विकास दर का सामना कर रही है। पाकिस्तानी अखबार डॉन अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2022 से उपभोक्ता मुद्रास्फीति 20% से ऊपर रही है और मई 2023 में 38% तक पहुंच गयी है।भेदभाव का आरोप लगायापीओके के नेता क्षेत्र में बिजली वितरण में इस्लामाबाद सरकार द्वारा कथित भेदभाव का विरोध कर रहे हैं। डॉन ने क्षेत्र के प्रमुख चौधरी अनवारुल हक द्वारा नीलम-झेलम परियोजना द्वारा उत्पादित 2,600 मेगावाट जलविद्युत का उचित हिस्सा नहीं मिलने की शिकायतों पर रिपोर्ट प्रकाशित की है। हक ने यह भी कहा है कि हालिया बजट में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि के लिए संसाधनों के उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया गया था और उन्हें भुगतान करने के लिए विकास निधि का उपयोग करने के लिए मजबूर किया गया।भारत संग व्यापार पर रोकफरवरी 2019 के पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सूखे खजूर, सेंधा नमक, सीमेंट और जिप्सम जैसे पाकिस्तानी उत्पादों पर सीमा शुल्क बढ़ाकर 200% करने के बाद पीओके में व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ। परिणामस्वरूप, भारत में पाकिस्तान का निर्यात औसत से गिर गया। डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में $45 मिलियन प्रति माह से बढ़कर मार्च और जुलाई 2019 के बीच केवल $2.5 मिलियन प्रति माह हो गया। अगस्त 2019 में जम्मू और कश्मीर में भारत द्वारा किए गए संवैधानिक परिवर्तनों के बाद पाकिस्तान द्वारा सभी व्यापार बंद करने के बाद स्थिति और अधिक कठिन हो गई थी। भारत-पाकिस्तान व्यापार पिछले पांच वर्षों में सालाना लगभग 2 बिलियन डॉलर के निचले स्तर पर आ गया है।पाकिस्तान का आर्थिक संकटरूस-यूके्रन युद्ध के बाद वैश्विक खाद्य और ईंधन की कीमतें बढ़ने के बाद से पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट आई है। इसी तरह के भुगतान संतुलन संकट ने 2022-23 में श्रीलंका को भी पंगु बना दिया, जिससे भारत को समर्थन उपायों का विस्तार करना पड़ा। स्टेट बैंक आफ पाकिस्तान के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार अगस्त 2021 में 20.1 बिलियन डॉलर के शिखर से गिरकर फरवरी 2023 में 2.9 बिलियन डॉलर हो गया, जो केवल एक महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त है। पाकिस्तान अपनी कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 40% आयात करता है।सरकारी कंपनी को बेच पीओके बचायेंगे शहबाजपीएम शरीफ ने पीओके के लिए 23 अरब पाकिस्तानी रुपये (718 करोड़ हिंदुस्तानी रुपये) के पैकेज की घोषणा की है। पांच दिनों से चल रहे प्रदर्शन के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उच्चस्तरीय बैठक की। इस बैठक में पाक के पीएम अनवारुल हक, पीएमएल-एन के नेता राजा फारूक हैदर, कश्मीर मामलों के मंत्री अमीर मुकाम और कई प्रमुख राजनेता शामिल हुए। अब खबर आयी है कि शहबाज शरीफ पीओके का दौरा करने वाले हैं। पीओके के मुजफ्फराबाद में शहबाज शरीफ का दौरा होगा। इसके साथ ही खबर आयी है कि पाकिस्तान ने पीओके को बचाने के लिए 24 सरकारी कंपनियों को बेचने का फैसला किया है।
डॉ दिलीप अग्निहोत्रीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। अयोध्याधाम के भव्य श्रीराम मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या कम नहीं हो रही है। मंदिर लोकार्पण के बाद से यह सिलसिला अनवरत जारी है। यहां प्रतिदिन लघु भारत के भी दर्शन होते हैं। भाषा अलग है। लेकिन श्रद्धा भाव समान है। भीषण गर्मी में भी किसी का उत्साह कम नहीं है। अयोध्या की सड़कें, मंदिर सभी जगह श्रीराम की जय जयकार गूंजती रहती है। एक-दूसरे की जो भाषा भी जो नहीं समझते वह भी जय श्रीराम से परस्पर अभिवादन करते है। श्रीराम लला के दर्शन कर लोग भावविह्वल होते है। दर्शनार्थियों के इस हुजूम में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान भी शामिल हैं। उन्होंने श्रीराम लला के दर्शन किये। मत्था टेका। अयोध्या का पड़ोसी जिला बहराइच आरिफ मोहम्मद खान का चुनावी क्षेत्र रहा है। आरिफ मोहम्मद खान ने न केवल रामलला को जीभर के निहारा बल्कि उन्होंने रामलला के दरबार में उन्हें लेटकर प्रणाम किया और उनके प्रति अपनी भावना समर्पित की। उन्होंने सामाजिक सौहार्द का एक बड़ा संदेश दिया। आरिफ मोहम्मद अपने राष्ट्रवादी विचारों के लिए प्रसिद्ध हैं। वह उर्दू, फारसी, हिंदी संस्कृत आदि अनेक भाषाओं के जानकर हैं। बहुत अध्ययनशील हैं। अपने संबोधन में वह वेद पुराण उपनिषदों का उद्धरण देते हैं। भारतीय संस्कृति की महत्ता का प्रतिपादन करते हैं। कहते हैं कि यह भारत है जिसने ज्ञान और उसके प्रसार का मानवीय चिंतन दुनिया को दिया। सूर्य सिद्धांत यूरोपीय पुनर्जागरण का आधार है। नौवीं शताब्दी में भारतीय सूर्य सिद्धांत ग्रंथ को लेकर भारतीय मनीषी अरब गए थे। बगदाद के सुल्तान ने उसका अनुवाद कराया। इसके बाद यह ग्रंथ स्पेन के राजा ने मंगवाया। उसका अनुवाद वहां हुआ। युरोपीय पुनर्जागरण इसी भारतीय सिद्धांत पर आधारित है। उपनिषद कहते हैं ज्ञान प्राप्त करो फिर उसको साझा करो। कपिल मुनि ने ज्ञान प्राप्त किया। फिर उसे अपनी मां को सुनाया। यह प्रसार की ही ललक थी। भारतीय चिंतन में सेवा सहायता पूजा की भांति है। इसमें भेदभाव नहीं है। इस भारतीय विरासत पर अमल तय हो जाए तो सभी कार्य अपने आप होते चलेंगे। भारतीय ज्ञान का सारांश गीता में है। भारत में ज्ञान की पूजा हुई। इस मार्ग से भटके तभी भारत परतंत्र हुआ। ज्ञान का प्रसार बंद कर दिया। इसलिए गुलाम हुए। जो ज्ञान को साझा नहीं करता वह सरस्वती का उपासक नहीं खलनायक होता है। महामना मालवीय ने इसी चेतना का जागरण किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय इसका एक निमित्त या पड़ाव मात्र है। भारतीय संस्कृति का जागरण हो रहा है। ज्ञान की तरह पवित्र करने वाला कुछ नहीं है। ब्रह्मचारी वह है जो विद्यार्थी है। जिसमें जिज्ञासा है। विज्ञान का महत्व है। विज्ञान प्रकृति पर नियन्त्रण का प्रयास करता है। ज्ञान ब्रह्म की ओर ले जाता है। एकता का आधार आत्मा है। मनुष्य ही नहीं जीव-जन्तु सभी में आत्मा है। इसलिए भेदभाव नहीं होना चहिए। आरिफ मोहमद जनवरी में मणिराम दास छावनी में हुए अयोध्या उत्सव में सहभागी हुए थे। उसमें उन्होंने कहा था कि राम मंदिर के निर्माण से पूरा देश गर्व महसूस कर रहा है। उस खुशी में हिस्सा लेने के लिए आया हूं। श्रीराम का जीवन हमें सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भक्ति आंदोलन की शुरूआत दक्षिण में उत्तर भारत से काफी पहले हो गई थी। आंदोलन में श्रीराम को अवतार के रूप में देखा गया है। सबमें राम सबके राम यह वास्तविकता नजर आती है। आरिफ मोहम्मद खान की भगवान राम पर आस्था किसी से छुपी नहीं है। वह अकसर कहते हैं कि आज भी अगर आप ग्रामीण इलाकों में चले जाएं तो लोग एक दूसरे से राम-राम करते हैं। यहां तक कि जब झगड़ा हो जाता है तो लोग कहते हैं कि राम-राम करो, झगड़ा मत करो। ऐसा कोई नहीं है जिसके दिल में राम न हों। मुसलमान के दिल में भी राम हैं। हम ऐसे देश में रहते हैं जहां कि संस्कृति ये नहीं कहती है कि हम दूसरों पर हमला करें। भगवान राम भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि हैं। राम के व्यक्तित्व की विशेषता यह है कि वह हर युग के महानायक हैं। प्रभु राम समावेशी समाज, सामाजिक समरसता और एकता का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। रामकथा की लोकप्रियता भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
प्रहलाद सबनानी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वैश्विक स्तर पर आर्थिक क्षेत्र का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अभी तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकसित देशों का दबदबा बना रहता आया है। परंतु, अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2024 में भारत सहित एशियाई देशों के वैश्विक अर्थव्यवस्था में 60 प्रतिशत का योगदान होने की प्रबल संभावना है। एशियाई देशों में चीन एवं भारत मुख्य भूमिकाएं निभाते नजर आ रहे हैं। प्राचीन काल में वैश्विक अर्थव्यस्था में भारत का योगदान लगभग 32 प्रतिशत से भी अधिक रहता आया है। वर्ष 1947 में जब भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की थी उस समय वैश्विक अर्थव्यस्था में भारत का योगदान लगभग 3 प्रतिशत तक नीचे पहुंच गया था; क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले अरब से आये आक्रांताओं एवं बाद में अंग्रेजों ने बहुत नुकसान पहुंचाया था एवं भारत को जमकर लूटा था। वर्ष 1947 के बाद के लगभग 70 वर्षों में भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारतीय अर्थव्यवस्था के योगदान में कुछ बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आ पाया था। परंतु, पिछले 10 वर्षों के दौरान देश में लगातार मजबूत होते लोकतंत्र के चलते एवं आर्थिक क्षेत्र में लिए गए कई पारदर्शी निर्णयों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को तो जैसे पंख लग गये हैं। आज भारत इस स्थिति में पहुंच गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में वर्ष 2024 में अपने योगदान को लगभग 18 प्रतिशत के आसपास एवं एशिया के अन्य देशों यथा चीन, जापान एवं अन्य देशों के साथ मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था में एशियाई देशों के योगदान को 60 प्रतिशत तक ले जाने में सफल होता दिखाई दे रहा है। भारत आज अमेरिका, चीन, जर्मनी एवं जापान के बाद विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। साथ ही, भारत आज पूरे विश्व में सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में तो भारत की आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक रहने की प्रबल सम्भावना बन रही है क्योंकि वित्तीय वर्ष 2023-24 की पहली तीन तिमाहियों में भारत की आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक रही है, अक्टूबर-दिसंबर 2023 को समाप्त तिमाही में तो आर्थिक विकास दर 8.4 प्रतिशत की रही है। इस विकास दर के साथ भारत के वर्ष 2025 तक जापान की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने की प्रबल सम्भावना बनती दिखाई दे रही है। केवल 10 वर्ष पूर्व ही भारत विश्व की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और वर्ष 2013 में मोर्गन स्टैनली द्वारा किये गये एक सर्वे के अनुसार भारत विश्व के उन 5 बड़े देशों (दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, इंडोनेशिया, टर्की एवं भारत) में शामिल था जिनकी अर्थव्यवस्थाएं नाजुक हालत में मानी जाती थीं। आज भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3.7 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया है। साथ ही, वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में लगातार तेज वृद्धि आंकी जा रही है, जिससे भारत के वित्तीय संसाधनों पर दबाव कम हो रहा है और भारत पूंजीगत खर्चों के साथ ही गरीब वर्ग के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के लिए वित्त की व्यवस्था आसानी से कर पा रहा है। केंद्र सरकार के बजट में न केवल वित्तीय घाटा कम हो रहा है बल्कि आने वाले समय में केंद्र सरकार को अपने सामान्य खर्च चलाने के लिए ऋण लेने की आवश्यकता भी कम पड़ने लगेगी। दूसरे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपये की कीमत लगातार स्थिर बनी हुई है, जिससे विदेशी निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वास भी बढ़ रहा है और भारत में विदेशी निवेश भी लगातार बढ़ता जा रहा है। तीसरे, भारत में मुद्रा स्फीति पर भी तुलनात्मक रूप से नियंत्रण पाने में सफलता मिली है। अन्य देश अभी भी मुद्रा स्फीति की समस्या से जूझ रहे हैं। आर्थिक क्षेत्र में उक्त कारकों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक बने रहने की प्रबल सम्भावनाएं बनी रहेंगी। इसके ठीक विपरीत, जापान एवं जर्मनी की आर्थिक विकास दर या तो मंदी के दौर से गुजर रहीं हैं अथवा विकास दर बहुत कम अर्थात एक-दो प्रतिशत से भी कम बनी हुई है। भारत के स्टील उद्योग, सिमेंट उद्योग एवं आटोमोबाइल निर्माण के क्षेत्र ने 10 प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल कर ली है। डिजिटल आधारभूत ढांचे के निर्माण के क्षेत्र में तो भारत विश्व गुरु बन गया है और इससे आज भारत में 13400 करोड़ से अधिक के डिजिटल व्यवहार हो रहे हैं जो पूरे विश्व के डिजिटल व्यवहारों का 46 प्रतिशत है। जन-धन योजना के अंतर्गत खोले गए 50 करोड़ से अधिक बैंक खातों में आज 2.32 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा हो चुकी है, जो देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान दे रही है। वर्ष 2013-14 से वर्ष 2022-23 के दौरान मुद्रा स्फीति की औसत दर 5 प्रतिशत की रही है जो वर्ष 2003-04 से वर्ष 2013-14 के दौरान औसत 8.2 प्रतिशत की रही थी। मुद्रा स्फीति कम रहने का सीधा लाभ देश के गरीब वर्ग को मिलता है। साथ ही, अब तो आर्थिक विकास के साथ ही भारत में रोजगार के भी पर्याप्त अवसर निर्मित होने लगे हैं। स्कोच नामक संस्थान द्वारा जारी एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि भारत में वर्ष 2014 से वर्ष 2024 के दौरान 51.4 करोड़ व्यक्ति वर्ष के नये रोजगार निर्मित हुए हैं। इसमें केंद्र सरकार द्वारा किये गये सीधे प्रयासों के चलते 19.79 करोड़ व्यक्ति वर्ष के रोजगार के अवसर भी शामिल हैं। शेष 31.61 करोड़ व्यक्ति वर्ष रोजगार के अवसर अपने व्यवसाय प्रारम्भ करने के उद्देश्य से बैंकों से लिए गए ऋण के चलते निर्मित हुए हैं। स्कोच नामक संस्थान द्वारा उक्त प्रतिवेदन 80 संस्थानों पर की गई रिसर्च (केस स्टडी) के आधार पर जारी किया गया है। सूक्ष्म एवं लघु स्तर के ऋण लेने वाले व्यक्तियों ने रोजगार के करोड़ों नये अवसर निर्मित किए हैं। इस प्रतिवेदन के अनुसार औसतन प्रत्येक सूक्ष्म संस्थान 6.6 रोजगार के नए अवसर निर्मित करता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक के बाद अब मूडीज ने भी भारत में आर्थिक विकास के संदर्भ में बताया है कि आने वाले कुछ वर्षों तक भारत की आर्थिक विकास दर विश्व में सबसे अधिक बने रहने की प्रबल सम्भावना बनी रहेगी। इस प्रकार, एक के बाद एक विभिन्न वैश्विक आर्थिक संस्थान भारत में आर्थिक विकास दर के मामले में अपने अनुमानों को लगातार सुधारते और बढ़ाते जा रहे हैं। इस प्रकार, आगे आने वाले समय में भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान भी लगातार बढ़ता जाएगा और सम्भव है कि कालचक्र में ऐसा परिवर्तन हो कि भारत एक बार पुन: वैश्विक स्तर पर अपने आर्थिक योगदान को 32 प्रतिशत के स्तर तक वापस ले जाने में सफल हो। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
अजय सानीएबीएन एडिटोरियल डेस्क। हम सबको पता है कि मुनाफाखोर बाजार लगातार भ्रामक प्रचार के जरिये पीतल को सोना बताकर बेच देता है। हमें यह भी पता है कि फलों के जूस के नाम पर जो बोतलबंद पेय पदार्थ मिल रहा है, उस लागत पर वह बाजार में बिकना संभव नहीं है। हम यह भी नहीं सोचते कि फलों से जूस तैयार करने, उसके प्रसंस्करण, ट्रांसपोर्ट व एजेंट से लेकर दुकानदार का मुनाफा भी अंतिम उत्पाद की कीमत में जुड़ता है। फिर भी हम खरीदते-पीते हैं और भ्रम में जीते हैं। यह खेल प्राकृतिक उत्पादों के नाम पर बिकने वाले तमाम सामानों को लेकर भी है। यह अच्छा है कि देर से ही सही, स्वास्थ्य पर शोध करने वाली शीर्ष संस्था भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर ने एक रिपोर्ट में देश के लोगों की आंख खोलने का काम किया है।आईसीएमआर का कहना है कि असली फलों का जूस बेचने के भ्रामक दावे की हकीकत यह है कि उसमें लगभग दस फीसदी ही वास्तविक फलों के जूस की मात्रा होती है। कमोबेश यही स्थिति तमाम खाद्य पदार्थों को लेकर होती है। डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों को लेकर पैक पर लिखी जानकारी भी भ्रामक हो सकती है। जिस खाद्य या पेय पदार्थ को शूगर फ्री बताकर बेचा जाता है, बहुत संभव है उसमें वसा की मात्रा अधिक हो। उसमें परिष्कृत अनाज यानी सफेद आटा या स्टार्च मिला हो सकता है। दरअसल, आईसीएमआर के अंतर्गत काम करने वाली हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान यानी एनआईएन की तरफ से बनाये गये आहार संबंधी दिशा-निदेर्शों में भी माना गया है कि भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई द्वारा उपभोक्ताओं के हितों के लिये निर्धारित कड़े मानदंड दिखाने को लागू तो किये जाते हैं पर कंपनियां उपभोक्ताओं की आंख में धूल झोंकने के लिये कई तरकीबें निकाल लेती हैं। जिसमें उत्पाद को प्राकृतिक, शुगर फ्री, कम कैलोरी वाला होने का दावा किया जाता रहा है। दरअसल, बड़ा संकट यह भी है कि सामान खरीदने वाला उपभोक्ता उत्पाद की पैकिंग पर छपी जानकारी को ध्यान से नहीं पढ़ता है। पहले तो कंपनी सचेतक जानकारी बहुत छोटे प्वाइंट साइज में लिखती है, फिर ऐसी जगह छापती है, जहां एकदम नजर ही नहीं जाती। उसमें तमाम तरह के पोषक तत्व होने के दावे तो किये जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि किसी व्यक्ति को उपभोग के बाद वास्तव में कितना पोषण मिल रहा है। अकसर उत्पादों के जैविक होने का दावा किया जाता है। यहां भी देखना जरूरी है कि क्या इसको जैविक-भारत के लोगो से मंजूरी मिली है? कम कैलोरी, अधिक फाइबर व कम वसा का दावा क्या इसके उपयोग करने पर वास्तव में सही मिलता है? आजकल खाद्य व पेय पदार्थों को प्राकृतिक उत्पाद बताने का फैशन बाजार में चला हुआ है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने कई उदाहरणों के जरिये बताने का प्रयास किया है कि उपभोक्ता किसी उत्पाद को प्राकृतिक व पोषक बताने के दावे से भ्रमित न हों। किसी उत्पाद में एक-दो नाम के प्राकृतिक अवयव डालने से कोई उत्पादन प्राकृतिक नहीं हो जाता। एनआईएन ने पोषण संबंधी तथ्य और पोषक तत्वों संबंधी दावों में फर्क करने का आग्रह किया है। पोषण संबंधी तथ्य यह है कि किसी उत्पाद के उपयोग से वास्तव में शरीर को कितना पोषक तत्व मिलता है। विडंबना यह भी है कि तमाम डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर लगे लेबल पर सही जानकारी नहीं दी जाती। वैसे इस संबंध में हाथी के दांत दिखाने के अलग और खाने के अलग वाली कहावत ही चरितार्थ होती है। जिसका खमियाजा आम उपभोक्ता को भुगतना पड़ता है। हाल ही में आईसीएमआर ने एक शोध के बाद कहा था कि देश में 56.4 फीसदी बीमारियां गलत खानपान की वजह से होती हैं। इसके अलावा आईसीएमआर व एनआईएन की निदेशक की अगुवाई वाली विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार आहार संबंधी दिशा-निदेर्शों में कहा गया है कि शारीरिक सौष्ठव के लिये इस्तेमाल होने वाले प्रोटीन सप्लीमेंट का प्रयोग नुकसानदायक हो सकता है। निस्संदेह उपभोक्ताओं को भी सजग होकर देखना चाहिए कि किसी खाद्य-पेय पदार्थ में कोई कृत्रिम रंग, फ्लेवर या पदार्थ न मिला हो।
मनोज शर्माएबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस कभी भी इतने लंबे समय के लिए इतनी कमजोर हताश मायूस होकर विपक्ष में नहीं रही है। पांच सात साल के लिए कभी विपक्ष में रही भी है तो ठसक के साथ रही है। क्योंकि तब सत्ता में गठबंधन सरकारें रहीं हैं, जो खुद हिलती-डुलती आपसी टकराव में रहती थीं और कांग्रेस मजे लेती थी। 1989 में वीपी सिंह के हाथों हार के बाद राजीव गांधी ने कहा भी था कि ये एकाध हार हमारे लिए थोड़ा आराम का वक्त होता है, फिर तो सत्ता हमीं को मिलनी है। लेकिन 2014 के बाद कांग्रेस को वाकई में हारे दीन हीन विपक्षी होने का अहसास हुआ है। 44 और 55 सीटों पर सिमट जाना केंद्र में अकेले बहुमत वाली मजबूत सरकार का होना उन मसलों पर निर्णायक काम होना जिसे कांग्रेस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था- जैसे राम मंदिर, विदेशों में भी आतंकियों शत्रुओं को ठिकाने लगाना, पाकिस्तान पर स्ट्रैटेजिक हमले, पाकिस्तान को अलग थलग कमजोर बनाने में सफलता, तीन तलाक, 370, सीएए, एनआरसी जैसे बर्र के छत्ते में हाथ डालना, देश में आतंकवादी घटनाओं पर अंकुश, अब केंद्र का यूसीसी पर भी आगे बढ़ना। यूपी जैसे अराजक माफिया प्रभावी राज्य में लगातार दो बार भगवा सरकार और मुस्लिम माफियाओं का सफाया। ये सब बातें कांग्रेसी और सेकुलर सरकारों की फितरत के खिलाफ जाती हैं। अब हम कल्पना करें कि यूपीए नीत कांग्रेस सत्ता में आ जाये जैसे 2004 में हुआ था तो देश में क्या -क्या होगा? कश्मीर में 370 फिर से बहाल करने का प्रयास होगा सीएए, एनआरसी खत्म करने प्रयास होगा। अयोध्या राम मंदिर पर फिर से एक केस होगा और इसे विवादास्पद ढांचा बता दिया जायेगा। पाकिस्तान तुरंत व्यापारिक रिश्ते बहाल करेगा जिसे उसने कश्मीर में 370 हटाने के विरोध में स्वयं बंद किया था। कश्मीर में आतंकवाद की नयी फसल फिर से उगेगी। जहां तहां पर्व त्यौहारों में बम विस्फोट होने लगेंगे। सेना और अर्द्धसैनिक बलों के हाथ बांध दिये जायेंगे। जेलों में बंद कई दुर्दांत आतंकी अपराधी भ्रष्टाचारी बाहर आ जायेंगे। सेकुलरिज्म की आड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण चरम पर होगी। कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश सिंह तो कह भी चुके हैं कि कांग्रेस को सत्ता में आने दिजिये। उसके बाद हिंदू भी नमाज पढ़ेंगे। दस साल से सूखा में रहने वाले प्यासे केंद्रीय मंत्रीगण टूजी, कौमन वेल्थ, कोल गेट जैसे घोटालों को भी पीछे छोड़ देंगे। देश की सुरक्षा में प्रमाद होगा। विपक्ष के नेताओं से चुन चुन कर बदला लिया जायेगा। इसका एलान राहुल गांधी कर चुके हैं। बहुसंख्यकों को रोज आघात पहुंचाया जायेगा और उसमें यूपीए के ही सेकुलर हिंदू नेता शामिल होंगे। यह फेहरिश्त लंबी है। अब मैं कोई भविष्यद्रष्टा नहीं हूं पर अतीतद्रष्टा तो हम सभी हैं और उसके आधार पर ही यह सब लिखा गया है। यह सब कम तीव्रता में पहले घटित हो चुका है। जैसे... 2004 में बाजपेयी सरकार को धूल चटा कर कांग्रेस ने आते ही यही सब किया, 2009 में यूपीए टू ने तो भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये और हमारा प्रधानमंत्री बोला कि देश? के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों और मुसलमानों का है। उसके पहले मुंबई दिल्ली कश्मीर हर कुछ दिनों पर आतंकी हमलों से दहलता था। याद कीजिये जैसे ही महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सीएम बने हर छोटी से छोटी आवाज को भी सड़क छाप स्टाइल में उद्धव एंड कंपनी ने निबटाया। संजय राऊत, महाराष्ट्र पुलिस और शिव सैनिकों ने उद्धव के सीएम रहते भरपूर तांडव किया। यूपीए के आने पर यह महाराष्ट्र स्टाइल पूरे देश में होगा। और एक सबसे महत्वपूर्ण काम होगा कि अंबानी अडाणी को काले पानी की सजा देकर अंडमान निकोबार जेल में डाल दिया जायेगा, माल्या को रस्सी से बांध कर इंग्लैंड से मुंबई लाया जायेगा। इस देश से बेरोजगारी और महंगाई एक झटके में गायब हो जायेगी। दो रुपए में दिल्ली से अपने गांव बिहार झारखंड ट्रेन से लौट सकेंगे, उन युवाओं को फिर से ब्यूरोक्रेसी वाली नौकरी सौंप दी जायेगी जो 2014 में मोदी के आने से नौकरी गवां बैठे थे। टके सेर खाजा टके सेर भाजी मिलने लगेगा। हर व्यक्ति को नौकरी या फिर एक लाख रुपये हर महीने मिलेंगे। आखिर कांग्रेसी पीएम मनमोहन सिंह ने कहा ही था कि पैसे पेड़ पर लगते हैं जब मन करे दो चार अरब तोड़ लो। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और पत्रकारिता विभाग से जुड़े हैं।)
रौशन सांकृत्यायन एबीएन एडिटोरियल डेस्क। धरती में महर्षि वेदव्यास, अश्वत्थामा, राजा बलि, वीर हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, ऋषि मार्कंडेय और भगवान परशुराम को चिरंजीवी महायोद्धा माना जाता है। ये हमारी सनातन संस्कृति के ऐसे किरदार हैं, जो हमेशा जीवित रहेंगे। भार्गव वंश में पिता जमदग्नि और मां रेणुका की संतान के रूप में त्रेतायुग में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को जन्मे महर्षि परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। कुछ मान्यताओं के मुताबिक वह स्वयं रूद्र रूप थे। वायु पुराण के मुताबिक भगवान परशुराम का जन्म उनकी मां रेणुका द्वारा शिव और विष्णु दोनों को अर्पित प्रसाद खाने के कारण हुआ था। इस कारण उनमें क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों की विशेषताएं थीं। इसलिए उन्हें रुद्र रूप भी कहा जाता है। भगवान परशुराम शिव के परम भक्त थे। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें कई दिव्यास्त्र दिए थे, जिनमें एक अजेय हथियार फरसा भी था, जिसे परशु कहते हैं। माना जाता है कि भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ, इसलिए उनकी शक्ति भी अक्षय यानी अपार थी। भगवान परशुराम भारतीय संस्कृति के एक ऐसे किरदार हैं, जो कई विरोधाभाषी गुणों से सम्पन्न माने जाते हैं। मसलन एक तरफ जहां कुछ लोग उन्हें अत्यंत क्रोधी कहते हैं, वहीं उनके साथ यह मान्यता भी जुड़ी हुई है कि उन्हें कतई क्रोध नहीं आता था। वह अपने पिता के इतने आज्ञाकारी थे कि उनके कहने पर अपनी मां और भाइयों का वध कर दिया था और फिर उन्हीं पिता से वरदान लेकर उन सबको जीवित कर दिया था। बहरहाल, वह हिंदू धर्म के कल्प कल्पांतर नायक हैं, उनकी पूजा करने से पुरुषों में पौरुष का संचार होता है। माना जाता है कि परशुराम अभी भी जीवित हैं, वे हर दिन अपने स्थायी निवास महेंद्रगिरि पर्वत से सूर्योदय के समय हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं और सूर्यास्त के समय महेंद्रगिरि पर्वत में वापस आ जाते हैं। यह भी मान्यता है कि उन्हें यह अमरता भगवान शिव ने दी है। माना जाता है कि वह धरती पर हमेशा जीवित रहेंगे, जब तक कि समय का अंत नहीं हो जाता। भगवान परशुराम के बारे में कई अद्भुत कहानियां भी प्रचलित हैं। माना जाता है कि उनका अपने शिष्य भीष्म के साथ 24 दिनों तक महायुद्ध हुआ और दोनों ही एक-दूसरे को हरा नहीं सके। अंत में भीष्म ने परशुराम को हराने के लिए शक्तिशाली पार्श्वास्त्र का उपयोग करने की कोशिश की, लेकिन दिव्य ऋषि नारद और देवताओं ने हस्तक्षेप किया और भीष्म को शक्तिशाली हथियार इस्तेमाल करने से रोका ताकि धरती नष्ट न हो। इसी के साथ संघर्ष समाप्त की घोषणा कर दी गई और इस तरह दोनों में से कोई विजयी या पराजित नहीं हुआ। धरती में परशुराम अपने क्रोध और ब्रह्मचर्य के कारण जाने जाते हैं। माना जाता है कि वह धरती पर हमेशा रहेंगे।
एनके मुरलीधरएबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस पार्टी आज जिस प्रकार से दिशाहीन होकर आगे बढ़ रही है, उसमें मैं खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रहा। मैं न तो सनातन विरोधी नारे लगा सकता हूं और न ही सुबह-शाम देश के वेल्थ क्रिएटर्स को गाली दे सकता। इसलिए मैं कांग्रेस पार्टी के सभी पदों व प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहा हूं।गौरव वल्लभ ने कांग्रेस के प्रवक्ता पद से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। गौरव उन कांग्रेसियों में थे जो आर्थिक विषयों के मर्मज्ञ थे और कई मोर्चा पर भाजपा सहित एनडीए की कसकर घेराबंदी करते थे। उन्होंने जिन दो बिंदुओं पर कांग्रेस को आईना दिखाया सही में उन दो बिंदुओं को न समझ पाने के कारण ही कांग्रेस की दुर्गति हुई है। इन नीतियों के संप्रेषण में कांग्रेस से एक बड़ी भूल हुई है और वह है अडानी को लगातार टारगेट करना। राम मंदिर शुभारंभ के कार्यक्रम की उपेक्षा करने की उसकी नीति से अधिक खतरनाक है देश के उद्योगपतियों को अकारण गाली देना, उनके उपर जो देश-विदेश में षडयंत्र होता है उसको नैतिक समर्थन देना। निश्चित तौर पर देश की नयी आर्थिक नीति जो 1991 में देश में लागू किया गया उसके मूल में निजीकरण ही था। भारतीय जनता पार्टी में इतनी ईमानदारी थी कि वह इस नीति का पूरजोर विरोध नहीं करती थी। आज देश का विकास निजीकरण के नींव पर खड़ा है। अगर अमेरिका, जर्मनी, चीन औरजापान की बात करें तो उन देशों में आर्थिक नीतियों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच एक सहमति बनी रहती है जिससे विकास का पहिया तेज घूमता है। लेकिन भारत में कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी लगातार अडानी समूह की आलोचना करते रहते हैं। चूंकि गौरव खुद आर्थिक मामलों के जानकार हैं इस कारण वे कांग्रेस के इस प्रकार की नीतियोंसे क्षुब्ध थे। आज देश की हालत बेहतर इसलिये है कि निजी क्षेत्र पूरी ताकत से विकास कर रहा है।देश के 6.40 करोड़ सूक्ष्म और मध्यम उद्योगों से देश के लोगों को जहां जॉब मिला है वहीं आर्थिक गतिविधियों को भी एक नया मुकाम प्राप्त हुआ है। इन्हीं लघु और मध्यम उद्योगों के बीच से अडानी रिलायंस जैसे उद्यौगिक समूह का लगातार विकास होना देश के विकास का शुभ संकेत है। आज टाटा समूह का कुल एसेट पाकिस्तान की बजट से अधिक हो गया है। वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में निजी कंपनियों के सहारे ही विश्व के विकसित देशों की आर्थिक गति और विकास टिकी हुई है। राहुल गांधी को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस राफेल युद्धक विभान के फ्रांस से खरीदी के बाद हमारी सैन्य शक्तिसे चीन और पाकिस्तान संतुलित हुए है वह एक निजी कंपनी का उत्पाद है। आज देश में 21 हजार करोड़ के रक्षा उत्पाद का निर्यात हुआ है जिसमें अडानी समूह का भी एक बड़ा योगदान है। निजीकरण को लेकर देश में एक विरोधी माहौल बनाने का प्रयास किसी भी हालत में देश हित में नहीं है। कांग्रेस को इसका परिणाम भुगतना ही होगा या रणनीति बदलनी होगी। देश के कुल कार्यबल में 98 प्रतिशत कामगार निजी क्षेत्र में कार्य करते हैं। इस कोण से भी देखा जाए तो उन्हें लघु, मध्यम और बड़े उद्योगों में ही काम मिला हुआ है। यह दुख और आश्चर्य का विषय है कि कांग्रेस की नीतियों को वर्तमान सरकार तेजी से बढ़ा कर देश को दोहरे और अधूरे माहौल से निकालना चाहती है जिससे हम दुनिया में विकसित राष्ट, की श्रेणी में खड़ा हो सके। आर्थिक विषयों, रक्षा मामलों, सेना और अतंरिक्ष के विषयों पर कांग्रेस को बहुत चिंतन की आवश्यकता है अन्यथा कांग्रेस का गौरव सिर्फ चर्चा का विषय रह जायेगा।
एनके मुरलीधरएबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोक सभा के चुनाव प्रचार के आंरभ में ही पीएम मोदी ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि वे पश्चिम बंगाल में जब्त तीन हजार करोड़ रुपये को वहां के निर्धन परिवारों के बीच के वितरित करने की योजना पर कानूनी सलाह ले रहे हैं। सरकार ने संसद में बताया था कि 2017 से 2023 के बीच में आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली एजेंसियों द्वारा लगभग 1.11 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई है। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया था कि ईडी, डीआरआई, आयकर विभाग और अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा 10,683 करोड़ रुपये की 204 अचल संपत्तियां कुर्क की गयी हैं। संसद में दिये गए जवाब में पंकज चौधरी ने यह भी कहा था 2017-18 और 2021-22 के बीच दोनों बोर्डों द्वारा बेची गई संपत्ति 71 करोड़ रुपये की थी। वित्त राज्य मंत्री ने बताया था कि कई मामलों में सीबीडीटी और सीबीआईसी द्वारा संपत्तियों को कुर्क किया जाता है। कुर्क को अदालत में चुनौती दी जाती है और जब तक अदालत मामले का फैसला नहीं करती इन संपत्तियों को नहीं बेचा जा सकता है। इसके साथ ही पिछले पांच वर्षों के दौरान (1 फरवरी, 2018 से 31 जनवरी, 2023 तक) प्रवर्तन निदेशालय द्वारा 15,619.56 करोड़ की जब्ती की गयी थी। मंत्री द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक, 15,113.91 करोड़ रुपये की संपत्ति सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जमा कर दी गई है। लोकसभा की पश्चिम बंगाल की भाजपा प्रत्याशी अमृता राय से फोन पर बातचीत के क्रम में पीएम मोदी ने यह बात कही है। याद रहे कि विगत चुनाव में विदेशी काला धन भारत लाकर हर भारतीय परिवार को 15 लाख देने की बात को भी लोगों ने सुना था जिसे बाद में चुनावी जुमला बता दिया गया। तीसरी बारजीत को आश्वस्त मोदी क्या इस मुद्दे पर सही में गंभीर हैं?वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया था कि ईडी, डीआरआई, आयकर विभाग और अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा 10,683 करोड़ रुपये की 204 अचल संपत्तियां कुर्क की गयी हैं। संसद में दिये गए जवाब में पंकज चौधरी ने यह भी कहा था 2017-18 और 2021-22 के बीच दोनों बोर्डों द्वारा बेची गई संपत्ति 71 करोड़ रुपये की थी। वित्त राज्य मंत्री ने बताया था कि कई मामलों में सीबीडीटी और सीबीआईसी द्वारा संपत्तियों को कुर्क किया जाता है। कुर्क को अदालत में चुनौती दी जाती है और जब तक अदालत मामले का फैसला नहीं करती इन संपत्तियों को नहीं बेचा जा सकता है।इसके साथ ही पिछले पांच वर्षों के दौरान (1 फरवरी, 2018 से 31 जनवरी, 2023 तक) प्रवर्तन निदेशालय द्वारा 15,619.56 करोड़ की जब्ती की गयी थी। मंत्री द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक, 15,113.91 करोड़ रुपये की संपत्ति सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जमा कर दी गयी है। लोकसभा की पश्चिम बंगाल की भाजपा प्रत्याशी अमृता राय से फोन पर बातचीत के क्रम में पीएम मोदी ने यह बात कही है। याद रहे कि विगत चुनाव में विदेशी काला धन भारत लाकर हर भारतीय परिवार को 15 लाख देने की बात को भी लोगों ने सुना था जिसे बाद में चुनावी जुमला बता दिया गया। तीसरी बारजीत को आश्वस्त मोदी क्या इस मुद्दे पर सही में गंभीर हैं?
हृदयनारायण दीक्षितएबीएन एडिटोरियल डेस्क। आम चुनाव की घोषणा के साथ आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो गयी है। सामान्य संवाद की भाषा बदल गई है। शब्द आक्रामक हो गए हैं। संवाद की शालीनता समाप्त हो रही है। कायदे से दलतंत्र को लोकतंत्र की मजबूती के लिए काम करना चाहिए। संवाद की भाषा परस्पर प्रेमपूर्ण होनी चाहिए। दल परस्पर शत्रु नहीं हैं। वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को आमजनों तक ले जाने और मजबूत करने के उपकरण हैं। लेकिन शब्द अपशब्द हो रहे हैं। वैचारिक आधार पर दलों के मध्य बहस नहीं है।प्रधानमंत्री तक को अपशब्द कहे गये हैं। भारत के आम चुनाव दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्री उत्सव हैं। लेकिन अपशब्दों के प्रयोग वातावरण को उतप्त कर रहे हैं। आचार संहिता में निर्देश दिये गये हैं कि सभी दल और उम्मीदवार जाति, सम्प्रदाय, पंथिक समूह या भाषाई समूहों के मध्य अलगाववाद बढ़ाने से दूर रहेंगे। परस्पर विद्वेष और तनाव बढ़ाने वाले शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे। संहिता में राजनैतिक दलों की नीतिगत आलोचना की छूट दी गयी है। आलोचना में भी संयम बरतने के निर्देश हैं। सबसे बड़ी बात है कि नेताओं और कार्यकर्ताओं की निजी जिंदगी की आलोचना नहीं करेंगे। आदर्श चुनाव आचार संहिता में इसी तरह के तमाम संयम की अपेक्षा की गयी है। इस सब के बावजूद व्यक्तिगत आरोपों के माध्यम से वातावरण को बिगाड़ने का काम हो रहा है। शब्द की शक्ति बहुत बड़ी है। शतपथ ब्राह्मण के ऋषि ने वाणी को विराट कहा है। बाईबल में घोषणा है कि सबसे पहले शब्द था-इट वाज लोगोस फर्स्ट। महर्षि व्यास ने शब्द को ब्रह्म कहा है। शब्दों के सदुपयोग से सृजन की गतिविधि चलती रही है। पतंजलि ने महाभाष्य में ध्यान दिलाया है कि एक ही शब्द का स्थान के अनुसार प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थ देता है। कबीरदास ने भी कहा है कि, शब्द की मार बड़ी है। शब्द साधना स्तुतियों, काव्य और गीतों में प्रकट होती है। शब्द संयम अपरिहार्य है। ऐतरेय उपनिषद के शांति पाठ में प्रार्थना है, हे परमात्मा मेरी वाणी मन में स्थित हों और मन वाणी में स्थित हो जाये। मेरे मन और वाणी साथ साथ काम करे। मेरे संकल्प और वचन विशुद्ध होकर एक रहे। मेरा सुना हुआ और अनुभव में आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे। मेरा ज्ञान मुझे सदा स्मरण रहे। मन का अनुशासन जरूरी है। अनुशासित मन से सुन्दर शब्द और अर्थ निकलते हैं। मन और वाणी एक साम्य में हमारा मार्गदर्शन करें। ऋषि संकल्प करते हैं कि मैं अपनी वाणी से सदा ऐसे ही शब्दों का उच्चारण करूंगा, जो दोषरहित हो। मैं सत्य बोलूंगा-सत्यं बदिष्यामि। मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। भारतीय परंपरा में शब्द अनुशासन पर अतिरिक्त जोर दिया गया है। सृष्टि के जन्म और विकास के अनेक सिद्धांत हैं। चार्ल्स डारविन का सिद्धांत विकासवादी कहा जाता है। स्टीफेन हाकिंग जैसे ब्रह्माण्ड विज्ञानी सृष्टि के उद्भव पर काम करते रहे हैं। आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञानियों का कथन है कि एक समय सृष्टि का सारा पदार्थ और ऊर्जा एक छोटे से बिंदु पर थी। इसे ब्रह्म अण्ड भी कहा जाता है। अत्यधिक दबाव के कारण ब्रह्म अण्ड फूटा। उसके कण गतिशील हुए और इस तरह सृष्टि का विकास आगे चल पड़ा। वैज्ञानिक कार्ल सागन ने इसे कॉस्मिक एग ब्रह्म अण्ड कहा है। ऋग्वेद में इसे हिरण्यगर्भ कहा गया है। हिरण्य का अर्थ स्वर्ण या कोई अति चमकीली धातु है। ऋग्वेद में कहते हैं कि सबसे पहले हिरण्यगर्भ ही थे। ऐतरेय उपनिषद ऋग्वेद के आरण्यक का भाग है। उपनिषद (खंड 1-4) में कहा गया है, हिरण्यगर्भ पुरुष ने स्वयं को प्रकट करने के उद्देश्य से तप किया। तप के फलस्वरूप हिरण्यगर्भ फूट गया। इससे फूटकर मुख छिद्र बना। इसी मुखछिद्र से वाणी उत्पन्न हुई। वाणी आराध्य है। वाणी से ही विचार प्रकट होते हैं। वाद, विवाद और संवाद वाणी से ही संभव है। वाणी के ही सम्यक प्रयोग से संस्कृति का विकास हुआ। ऋग्वेद (10-125) में वाणी संपूर्ण प्रकृति को धारण करती है। वाणी में समूचा संसार व्याप्त है। ऋग्वेद में वाणी का सुंदर विवेचन है। वाणी के चार रूप बताये गये हैं। पहले रूप को परा कहा है। यह मन में स्थित रहती है। दूसरी का नाम पश्यन्ती बताया गया है। इस मनोदशा में वाणी प्रकट करने का विचार उठता है। तीसरी मध्यमा है। इस तल पर विचार शब्द अपना रूप ग्रहण करता है। शब्द योजना बनती है। शब्दों का विवेकीकरण होता है। चौथी का नाम बैखरी बताया गया है। यह प्रकट वार्ता है। लेकिन साधारण लोग पहली तीन स्थितियां कम जानते हैं। वे केवल चौथी का ही प्रयोग करते हैं। वाणी के सभी रूप पालनीय हैं। प्राचीन सुमेरी सभ्यता का विवेचक क्रेमर ने लिखा है कि सुमेरी दार्शनिकों ने दैवीय शब्द की सृजन शक्ति का सिद्धांत बताया था। सृजनकर्ता को योजनाओं के बारे में बोलना था। इच्छानुसार शब्द बोलने से ही कामना पूरी हो जाती थी। दर्शन में आकाश का गुण शब्द बताया गया है। शब्द शक्ति की खोज और पहचान का आदिस्रोत भारत है, ऋग्वेद है। चीन के एक दार्शनिक लाओत्सु (ईसापूर्व 400 वर्ष लगभग) ने भी सृष्टि के विकास पर लिखा है। ताओ ते चिग उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक है। ताओ ते चिग भी वाणी और शब्द का चमत्कार है। वाणी आराध्य है। छान्दोग्य उपनिषद में व्यथित नारद को सनत् कुमार ने वाणी की शक्ति का दर्शन बताया था। भारत में शब्द और वाणी का जैसा सदुपयोग हुआ है, वैसा अन्य सभ्यताओं में नहीं मिलता। वाणी के सम्यक ज्ञान और सम्यक सदुपयोग से मंत्र शक्ति का पादुर्भाव हुआ। मंत्र शब्दों के सम्यक प्रयोग से बनते हैं। मंत्रों का उच्चारण अनुशासित वाणी द्वारा ही संभव होता है। सुने गये शब्द अपनी अर्थवत्ता के कारण चित्त में रासायनिक परिवर्तन लाते हैं। मंत्र के प्रभाव होते हैं या नहीं? यह विषय वैज्ञानिक और दार्शनिक विवेचन का है। लेकिन वाणी की शक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। मधुर वाणी से गीत काव्य प्रकट होते हैं। इसी के सम्यक उपयोग से स्तुतियां बनती हैं।वाणी की शक्ति अपरिमित है। संस्कृति मनुष्य को उदात्त बनाती है। संस्कृत देववाणी है। इसमें संस्कृति के विकास की विराट क्षमता है। भारतीय संस्कृति में वाणी और शब्द के आश्चर्यजनक सदुपयोग मिलते हैं लेकिन राजनैतिक क्षेत्र में सामान्य वक्तव्य भी हिंसक हो जाते हैं। भारतीय सुभाषितों में कहा गया है कि सत्य बोलो-सत्यम ब्रूयात। प्रिय बोलो-प्रियं ब्रूयात। लेकिन अप्रिय सत्य मत बोलो। यहां सत्य को भी अप्रिय होने के कारण उचित नहीं कहा गया। 2024 के महासमर में सुन्दर वाणी का प्रयोग जरूरी है। लेकिन प्राचीन भारत के युद्धों में भी अश्लील और असभ्य शब्द प्रयोग नहीं मिलते। महाभारत का बड़ा हिस्सा युद्ध का है। सेनाएं आमने-सामने हैं। तब दोनों पक्षों के योद्धा परस्पर शालीन वार्तालाप करते थे। भारतीय लोकतंत्र में वैदिक काल से ही सभा समितियां हैं। स्तोता देवताओं से प्रार्थना करते हैं, मैं सभा में मधु बोलूं। मैं सभा में यशस्वी होऊं। उग्र विषय भी मधुर वाणी में बोलूं। आश्चर्य है कि जिस भारत में मधुर बोलने की प्रतिस्पर्धा थी, उसी परम्परा के उत्तराधिकारी होकर भी हम शब्द संयम तोड़ रहे हैं। वातावरण नयी पीढ़ी के लिए अप्रिय हो गया है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
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