एबीएन एडिटोरियल डेस्क। एक स्थान से दूजे स्थान में पहुंचना व एक-दूसरे का मिलना संक्रांति कहलाती है। संक्रान्ति की व्युत्पत्ति पर विचार करें तो ज्ञात होता है कि यह क्रम धातु का शब्द है, जिसका अर्थ गति करना है। इस धातु के पूर्व में सम्यक्/उत्तम/श्रेष्ठ रूप से के अर्थ में सम उपसर्ग युक्त है। इस धातु में क्ति प्रत्यय के जुड़ते ही संक्रांति शब्द की रचना होती है। यहां इसका अर्थ है, कोई ऐसा बड़ा परिवर्तन, जिससे किसी वस्तु का स्वरूप बिलकुल बदल जाये। जैसे- मकर संक्रान्ति। मकर संक्रान्ति पर्व के मूल मे रवि अर्थात् सूर्य की गति है।
ज्ञातव्य है कि सूर्य मास में एक बार अपनी राशि को छोड़कर किसी अन्य राशि में प्रवेश करता है। वह जैसे ही किसी अन्य राशि में प्रवेश करता है वैसा ही वह उस राशि की संक्रान्ति कहलाने लगती है। यही कारण है कि मकर संक्रान्ति को सूर्य के संक्रमणकाल का भी पर्व माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई पर ध्यान केन्द्रित करें : माघ मास मकर गत रबि जब होई।
तीरथपतिहिं आव सब कोई। इस चौपाई के अर्थ से ही सुस्पष्ट हो जाता है कि माघ-मास मे जब सूर्य मकर-राशि पर जाता है तब सबलोग तीर्थराज प्रयाग में आते हैं, फिर मकर संक्रान्ति के आयोजन के साक्षी बनते हैं। इसका आशय है कि सूर्य के राशि-परिवर्तन को संक्रान्ति का नाम दिया गया है, जोकि मास में एक बार होता है। पहले सूर्य धनुराशि पर होता है, फिर वह जैसे ही मकर राशि पर पहुंचता है वैसे ही सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाता है।
देवताओं के अयन को उत्तरायण की संज्ञा दी गयी है, जोकि मंगल का प्रतीक होता है; मंगलकारी होता है, इसीलिए इसे पुण्य-पर्व कहा गया है। अनुश्रुति है कि इससे शुभ कर्मों का समारम्भ होता है। यदि किसी की उत्तरायण मे मृत्यु होती है तो वह गमनागमन के बन्धन से मुक्त हो जाता है; अर्थात् उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, जब तुलसीदास कहते हैं : देव दनुज किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी।
तो इससे ज्ञात होता है कि मकर संक्रान्ति के अवसर पर देव, दैत्य, किन्नर तथा मानव-समूह सब आदरसहित त्रिवेणी मे स्नान करते हैं। इससे सुस्पष्ट हो जाता है कि मकर संक्रान्ति की कितनी महत्ता है। यही कारण है कि मकर संक्रान्ति का पर्व सूर्य को समर्पित होता है। सूर्य को आत्मबल और आत्मविश्वास का कारक माना गया है। इस अवसर पर सूर्य का दर्शन करके उन्हें अर्घ्य दिया जाता है।
ऐसा विधान है कि तांबे के लोटे में रक्त (लाल) चंदन, लाल पुष्प आदिक मिश्रित जल से पूर्वमुखी होकर तीन बार भगवान् भास्कर को जल दिया जाये, तत्पश्चात अपने स्थान पर ही खड़े होकर सात बार सूर्य की परिक्रमा की जाये। उसके बाद सूर्याष्टक और गायत्री मन्त्र का पाठ किया जाये। इस अवसर पर वर्जना भी है। जैसे : मैथुन करना, भैंस का दूध दूहना, फसल और वृक्ष काटना, कठोर वाणी का व्यवहार करना निषिद्ध है।
अर्थात जो मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य की आराधना करता है, उसे पापों से मुक्ति मिलती है और वह स्वर्ग का अधिकारी बनता है। उपर्युक्त उपदेश श्रीकृष्ण-द्वारा अर्जुन को किया गया है, जिसमे उन्होंने मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य की पूजा की महत्ता बतायी है। मकर संक्रांति-आयोजन के मूल मे दो कथाएं भी हैं। पहली कथा शनि और सूर्यदेव के साथ जुड़ी हुई है। सूर्य की एक पत्नी का नाम छायादेवी है। सूर्यपुत्र शनि का जन्म छाया देवी से ही हुआ था। शनि का शरीर जन्म से ही कृष्णवर्ण का था।
सूर्य के कृष्णवर्ण को देखते ही भगवान् भास्कर ने सुस्पष्ट कर दिया था कि शनि उनका पुत्र नहीं है। इतना ही नहीं, इस आरोप को मढ़ते हुए, सूर्य ने शनि को माता सहित घर से निष्कासित कर दिया था। शनि और छाया कुम्भ घर मे रहते थे। जब माता छाया को ज्ञात हुआ कि उनके पति सूर्य ने माता-पुत्र के लिए अभद्र शब्द-व्यवहार किये थे तब छाया ने उस अस वाक्य के कारण कुपित होकर अपने पतिदेव सूर्य को शाप दे दिया था : आप कुष्ठरोग से ग्रस्त हो जाइये। उसके पश्चात सूर्य के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा।
उन्होंने शनिदेव और माता छाया का घर कुम्भ को अपने तेज से जला डाला। कालान्तर में, शनिदेव ने अपने पिता के कुष्ठरोग का उपचार कर दिया था; साथ ही उनसे यह भी कहा था कि वे माता छाया के साथ उचित व्यवहार करें। सूर्यदेव अपने पुत्र शनि के आचरण से प्रभावित होकर उनके घर पहुंचे; परन्तु वहां तो सूर्य के प्रकोप से जलाये गये घर की राख के ढेर ही मिला। शनि ने अपने पिता का अभिनन्दन काले तिल भेंट करके किया था। सूर्यदेव अपने पुत्र-द्वारा स्वागत-सत्कार देखकर अति प्रसन्न हुए थे।
उन्होंने शनि को मकर नामक दूसरा घर दिया था। यही कारण है कि ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर शनिदेव को मकर और कुम्भ का स्वामी माना गया है। सूर्य ने वहां से लौटते समय कहा था : मैं प्रतिवर्ष इस घर (मकर) मे प्रवेश करूंगा, फिर यह घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो जायेगा। यही कारण है कि जनसामान्य अपने घर को समृद्ध करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति का आयोजन करता है।
अब दूसरी कथा को समझें- यह कथा मां गंगा और भगीरथ के साथ जुड़ी हुई है। एक बार की बात है, राजा सगर ने अपने राज्य मे अश्वमेध यज्ञ किया था। यज्ञ मे छोड़े गये घोड़े की देख-रेख करने का दायित्व अंशुमान को सौंपा गया था। उस यज्ञ के प्रभाव से देवलोक का आसन डोलने लगा था; दूसरी ओर, पाताललोक मे कठोर तपस्या कर रहे कपिल मुनि के तेज से देवराज इन्द्र भयभीत हो चुका था। इन्द्र ने एक पन्थ-दो काज को सिद्ध करने के उद्देश्य से एक षड्यन्त्र रच डाला।
उसने एक दैत्य का वेश धारण कर उस घोड़े को चुरा लिया। वह उस घोड़े को लेकर पाताललोक के उस पूर्वोत्तर-भाग में गया, जहां कपिल मुनि तपस्या मे लीन थे। इन्द्र चुपके से उस घोड़े को मुनि के आश्रम में बांधकर चला गया। उधर, घोड़े को न देखकर खलबली मच गयी। राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों से उस खोये हुए घोड़े का पता लगाने का आदेश किया था। उन्होंने पृथ्वीलोक को छान मारा; मगर घोड़ा कहीं दिखा नहीं, फिर उन्होंने पृथ्वी को खोदकर पाताललोक मे प्रवेश किया, जहां तपस्या में रत एक मुनि के आश्रम में वह घोड़ा बंधा दिखा था।
ऐसा देखकर, सागर के उन पुत्रों ने अपना धैर्य खो दिया था। वे सब चीखते हुए, अभद्र भाषा का व्यवहार कर, कपिल मुनि को आरोपित करने लगे। उस चीख से उनकी तपस्या भंग हो गयी। मुनि ने क्रोधावेग मे जैसे ही आंखें खोलीं, राजा सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गये। कहा जाता है कि सगर के वंशज महाराजा दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हुए अपने पूर्वजों को तारने के लिए एक पैर पर खड़े रहकर मां गंगा की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर गंगा ने उनसे वर मांगने के लिए कहा था।
भगीरथ ने उनसे मृत्युलोक मे अवतरित होने का वरदान मांगा था, फिर क्या थाझ्र उसी क्षण मां गंगा का पूरे वेग के साथ धरती पर अवतरण हुआ था। गंगाधारा कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई गंगासागर पहुंची थी। इस प्रकार भगीरथ के साठ हजार पूर्वज तर गये। मकर संक्रान्ति के दिन ही मां गंगा स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थीं, जिनका संस्पर्श पाकर राजा सगर के समस्त पुत्रों को मुक्ति प्राप्त हुई थी।
इससे मकर संक्रान्ति मे गंगास्नान का महत्व बढ़ जाता है। मकर संक्रान्ति भारत-सहित नेपाल में भी आयोजित किया जाता है। इसका आयोजन भारत के कई राज्यों मे भिन्न-भिन्न नामों से किया जाता रहा है। इसे केरल-राज्य मे मकर विलक्कु कहा जाता है। वहां के श्रद्धालुजन दिव्य मकर-ज्योति के दर्शनार्थ सबरीमाला मन्दिर मे जाते हैं। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप मे आयोजित किया जाता है।
कर्नाटक में एलु-बिरोधु, पंजाब-हरियाणा मे माघी-लोहड़ी, उत्तराखण्ड और गुजरात मे उत्तरायण के नाम मे मनाया जाता है। इस प्रकार भगवान् भास्कर से ज्ञान, ऊर्जा, ऊष्मा ग्रहण करने के उद्देश्य से मकर संक्रान्ति पर्व-विशेष की महत्ता शीर्ष पर दिखती है। (लेखक, व्याकरण एवं भाषा विज्ञानी हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िये...। उनको आप सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं। स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में पूरा देश मनाता है। उनका जन्म 12 जनवरी को हुआ था। उनकी जीवन यात्रा से हमें सीख मिलती है कि व्यक्ति की उम्र कितनी भी कम हो, लेकिन वह जीवन में कुछ ऐसा कर सकता है कि सदियों तक उसे भुलाया नहीं जा सकता।
उनकी जीवन यात्रा मात्र 39 साल की रहीं। उनकी यात्रा उन युवाओं के लिए नजीर है, जो 39 वर्ष तक समझ नहीं पाते कि उन्हें जीवन में क्या करना है? ऐसी स्थिति से निराकरण के लिए विवेकानन्द ने युवाओं को आह्वान किया कि उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ।अपने नर जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये। विवेकानंद केवल संत ही नहीं, वक्ता, विचारक और एक महान देशभक्त थे। उनका संबंध राजस्थान से भी जुड़ा हुआ है। खेतड़ी राजा अजीत सिंह स्वामी विवेकानंद के मित्र और शिष्य थे।
अजीत सिंह ने उन्हें सच्चिदानंद नाम रखने के स्थान पर विवेकानंद नाम रखने का सुझाव भी दिया था। विवेकानंद अपने जीवनकाल में तीन बार खेतड़ी आए। उनके शिकांगो धर्म सम्मेलन में जाने की व्यवस्था अजीत सिंह ने ही की थी। 1893 में महाराज अजीत सिंह ने स्वामी विवेकानंद के खेतडी में आने पर भव्य समारोह का भी आयोजन किया गया था। उस समारोह में एक नर्तकी का गाने का भी कार्यक्रम रखा गया। इस समारोह से स्वामी विवेकानंद नर्तकी के कार्यक्रम को देखे बिना ही जाने लगे क्योंकि उनका मानना था कि एक संन्यासी वहां रुककर क्या करेंगे?
महाराजा अजीत सिंह ने उन्हें वहां रुकने की प्रार्थना की। इस बारे में नर्तकी को पता चला तो उसने सूरदास का लिखा भजन प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो, प्रभु नाम तिहारो, चाह तो पार करो। भजन के बोल सुनने के बाद विवेकानंद के आंखों से आंसुओं की धारा फूट पड़ी और उन्होंने नृतकी को मां कहकर संबोधित किया और कहा, आज मुझे महसूस हुआ है कि भक्ति किस स्तर पर की जा सकती है।
कुछ लोगों का मानना है कि इस घटना के बाद उन्हें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनका मानना था कि यह सब ईश्वर की करनी है। इस बात की पृष्टि इससे कर सकते हैं कि अमेरिका के शिकांगो में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि किसी वेश्या को देखकर घृणा नहीं करें, वो हजारों महिलाओं के सम्मान की रक्षा कर रही हैं, हमें उनसे नफरत नहीं बल्कि उनका सम्मान करना चाहिए।
1893 में संयुक्त राज्य अमेरिका में आयोजित धर्म सम्मेलन में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्हें बोलने का 2 मिनट का समय दिया गया। उन्होंने अपने भाषण के प्रारंभ ह्यमेरे अमेरिकी बहनों और भाइयों शब्द ने सभी का मन मोह लिया। इसके बाद उन्होंने इंग्लैण्ड और यूरोप के कई कई शहरों में हिन्दू दर्शन के सिद्धांतों का प्रचार- प्रसार करते हुए कई निजी और सार्वजनिक व्याख्यानों का आयोजन किया। उनके व्याख्यानों से एक विदेशी महिला इस कदर प्रभावित हुई कि उन्होंने विवेकानंद से शादी का प्रस्ताव तक रख दिया।
विदेशी महिला ने यहा तक कहा कि आप मुझसे शादी कर लेंगे तो मुझे आप जैसा योग्य पुत्र प्राप्त होगा। महिला की बात सुनकर एक बार तो विवेकानंद बहुत गंभीर हो गये और समझाते हुए कहा कि मैं तो संन्यासी हूं, शादी नहीं कर सकता। लेकिन मैं आपकी मेरे जैसे पुत्र होने की अभिलाषा को पूरी कर सकता हूं। महिला ने तत्परता से कहा कि कैसे? विवेकानंद ने कहा कि आप मेरी मां बन जाएं, आपको मेरे जैसा पुत्र भी मिल जायेगा।
यह बात सुनकर महिला उनके चरणों में गिरकर कहने लगी आप ईश्वर के समान हैं, जो किसी भी परिस्थितियों में अपने धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते हैं। उन्होंने हर परिस्थितियों में भी नारी का सम्मान करने से भी पीछे नहीं हटे। वे 25 साल की उम्र में संन्यासी बन गए थे। उस समय भारत में ब्रिटेन की हुकूमत की थी। अंग्रेजों का शासन था। वे सशस्त्र क्रांति के माध्यम से देश को आजादी दिलाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने पाया कि अभी जनता में इन इरादों के परिपक्वता नहीं है। इसलिए उन्होंने एकला चलो की नीति अपनाते हुए देश और दुनिया को खंगाल डाला।
उन्होंने पाया कि पराधीनता के कारण भारत के लोगों का आत्म-सम्मान, स्वावलंबन और आत्म गौरव पूर्णत: समाप्त हो गया है। वे कहा करते थे कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिए, जो भारत के गांवों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जाएं। उनका यह सपना सपना ही रह गया। वे रूढ़िवादिता, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन का कड़ा विरोध करते थे। महात्मा गांधी ने स्वामी विवेकानंद के लिए कहा था कि उनके कार्यों को पढ़ने के बाद मेरा उनके प्रति प्रेम, हजारों गुणा बढ़ गया है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नये साल की पहली भोर ही मन को उदास कर गयी। सात जुलाई, 1967 से बिना नागा हर रोज एक कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट काक इस फानी दुनिया से अलविदा कह गये। उन्नाव के पुरा गांव के स्वतंत्रता सेनानी शोभ शुक्ल की पांचवीं संतान हरीश चन्द्र शुक्ला (दुनिया में काक नाम से पहचान) को सातवीं कक्षा में उनके पेंसिल से खौ-खौ करते बंदर के बनाये गये चित्र, जो चित्र कम कार्टून ज्यादा था, को कला अध्यापक जगदम्बा सिंह द्वारा दिये गये गुड ने उन्हें स्कैच बनाने को प्रेरित किया। फिर कापी पर पेंसिल से स्कैच करना उनके जीवन का परम सुख बन गया।
सातवीं कक्ष में बनाया गया वह बंदर और उसकी शरारतें, कारस्तानियां हरीश के मस्तिष्क में इतने गहरे पैठ गयीं कि काक बनने पर भी वह बंदर स्मृति से विस्मृत नहीं हुआ बल्कि और ज्यादा शिद्दत से उभरा। काक के कार्टूनों के प्रिय पात्र जो गली का फक्कड़ बुड्ढा रहा, जो देश-दुनिया की हर घटना पर आम आदमी के मन की बात होती है, उसे कहने में गुरेज नहीं करता।
उसे जरा गौर से देखियेगा, उसके पार्श्व में कहीं न कहीं वह बंदर दिखायी दे ही जाता है। पढ़ाई-लिखाई पूरी कर कानपुर के ही एक सरकारी प्रतिष्ठान में नौकरी मिलने और फिर दाम्पत्य जीवन में बंध जाने के बावजूद उनका कार्टून बनाने का शौक बदस्तूर जारी रहा। नित्य के दायित्वों को निभा जैसे ही फुरसत पाते, बस पेंसिल उठाकर स्कैच करने बैठ जाते। इसी से थकान उतरती थी, यही था जीवन का परम सुख।
वर्ष 1965-66 में उ.प्र. में चंदरभानु गुप्त मुख्यमंत्री थे। उन्होंने उन पर कार्टून स्कैच किया और कानपुर से प्रकाशित अखबार राम राज्य में भेज दिया। कार्टून छपा परंतु कोई विशेष रेस्पांस नहीं मिला। पहला कार्टून छपने के डेढ़ साल बाद सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान भारत आये। शुक्ला जी ने पेंसिल उठायी और कार्टून बनाया। जिसमें सीमांत गांधी की बड़ी छवि बनाते हुए उनका स्वागत करते नेताओं को बहुत छोटा-छोटा दिखाया गया था।
यह कार्टून दैनिक जागरण के संपादक नरेंद्र मोहन को दे आये। कार्टून गजब था और संपादक पारखी। उन्होंने कार्टून को 7 जुलाई, 1967 को पहले पन्ने पर प्रकाशित किया। संयोग देखिये, उसी दिन हरीश चंद्र शुक्ला के पहले बेटे का जन्म हुआ। सारा घर-परिवार खुश कि घर में नन्हा शिशु आया है लेकिन उनके लिये यह यक्ष प्रश्न अपने आप से कि वह पुत्र आगमन से खुश हैं या अपना कार्टून छपने से।
बहरहाल सात जुलाई 1967, कार्टूनों की दुनिया में ऐतिहासिक दिन बन गया, उसी दिन जाने माने कार्टूनिस्ट काक का नामकरण हुआ। उस दिन हरीशचंद्र शुक्ला नेपथ्य में चले गये और सामने थे काक, जिन्हें सारा देश इसी नाम से पहचानता हैं। स्वयं काक साहब भी इसी नाम से पुकारे जाने के हामी थे। उन्होंने खुद से संकल्प किया कि जब तक जीवन है, वह हर रोज कार्टून बनायेंगे।
इन 58 साल में एक भी दिन ऐसा नहीं जब काक साहब ने कार्टून न बनाया हो। काक की संकल्प शक्ति को क्या कहियेगा, कोरोना संकट में वे हर रोज कार्टून बनाते रहे। इस तरह काक ने कार्टूनों की दुनिया में ऊंची उड़ान भर दी। एक से एक नुकीला, चुभता हुआ, गुदगुदाता हुआ कार्टून हिंदी के तमाम अखबारों में दिखने लगा। कानपुर से दैनिक जागरण, आज, जयपुर में राजस्थान पत्रिका, चंडीगढ़ में हिंदी ट्रिब्यून में काक के कार्टून उड़ान भर रहे थे।
बात को बेहद सलीके से अपने प्रिय पात्र बुड्ढे के जरिये कहने वाले काक ने कोई नेता नहीं छोड़ा जिसका कार्टून न बनाया हो। देश भर के नेता काक को जानने-समझने लगे थे। दिनमान में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के बाद बतौर संपादक रघुवीर सहाय आये। रघुवीर सहाय की पहल पर काक ने दिनमान के लिये कार्टून बनाने शुरू किये। कई बार उनके कार्टून को ही रघुवीर सहाय ने कवर पेज बना दिया।
यह काक की काक दृष्टि का ही कमाल था कि रघुवीर सहाय के समय से दिनमान में छपने शुरू हुए कार्टून कन्हैया लाल नंदन, सतीश झा, घनश्याम पंकज के कार्यकाल में भी यथावत छपते रहे। पत्रिका के लिये काक के कार्टून अपरिहार्य हो गये थे। उन्हीं दिनों कलकत्ता से रविवार का प्रकाशन शुरू हुआ। योगेन्द्र कुमार लल्ला, एसपी सिंह, उदयन शर्मा काक को कहां छोड़ने वाले थे। रविवार के लिये भी काक अपरिहार्य हो गये थे। अपने कार्टून की बदौलत काक राजनेताओं के पंसदीदा हो गये थे।
अटल बिहारी वाजपेयी के विराट व्यक्तित्व से अवगत कराते हुए काक ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि जब बेहमई नरसंहार के बाद विभिन्न दलों के नेतागणों के दौरे हो रहे थे। इंदिरा गांधी के बाद अटल जी भी आये। उन दिनों जागरण के मुख पृष्ठ पर कार्टून छपा, शीर्षक था बेहमई की हुतात्माओं की शांति के लिए थोड़ी और धूल।
कार्टून में अटल जी बेहमई जा रहे थे, धूल उड़ रही थी। यह कार्टून कुछ ज्यादा ही तीखा हो गया था, पर वाह अटल जी, उसी दिन कानपुर की विशाल सभा में उन्होंने कार्टून का बाकायदा उल्लेख किया और उलाहना दिया कि कार्टूनिस्ट ने हमें कुछ ज्यादा ही मोटा दिखा दिया है, देख लो, मैं इतना मोटा नहीं हूं। काक दंग रह गये यह सुनकर। अपनी आलोचना को न केवल इतनी सहजता से लेना बल्कि इतना अप्रत्याशित महत्व देना, यह अटल जी की विशेषता थी।
1967 से 1983 तक कुल 15 बरस तक हर रोज कार्टून बनाने और हर रोज किसी न किसी पत्र पत्रिका में कार्टून प्रकाशित होने के फलस्वरूप कार्टूनिस्ट काक प्रतिष्ठित हो चुके थे। सभी संपादक काक को सलाह देते कि अब पूर्णकालिक रूप से अखबार ज्वाइन करो। कालांतर हरीश चन्द्र शुक्ला को उसी सरकारी प्रतिष्ठान में छोड़ उन्होंने पूर्णकालिक रूप से काक बन कर जनसत्ता में ज्वाइन किया। डेढ़ साल बाद नवभारत टाइम्स में आये और 1999 में सेवानिवृत्त हुए। लेकिन कार्टून बनाना ही उनका जीवन रहा, उनकी सांसें रहीं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कहते रहे हैं कि उनकी सरकार लोगों के हितों के लिए काम करती रहेगी और यही कारण है कि इस साल भी मोदी सरकार की ओर से कुछ बड़े घोषणाएं की गयी। 2024 समाप्त होने जा रहा है। 2025 की शुरुआत कुछ ही दिनों में हो जायेगी। देश की राजनीति के लिहाज से देखें तो 2024 बहुत खास रहा क्योंकि इसी साल देश में आम चुनाव हुए।
भाजपा अपने दम पर तो नहीं लेकिन अपने सहयोगियों के समर्थन से तीसरी बार नरेंद्र मोदी का नेतृत्व में सरकार बनाने में कामयाब हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कहते रहे हैं कि उनकी सरकार लोगों के हितों के लिए काम करती रहेगी और यही कारण है कि इस साल भी मोदी सरकार की ओर से कुछ बड़े घोषणाएं की गई। आज हम आपको 2024 में घोषित की गई कुछ सरकारी योजनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं।
पहले शुरू किये गये राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन की सफलता के आधार पर, केंद्र सरकार ने 2024 में दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों सहित भारत के सभी क्षेत्रों को कवर करने के लिए इसके विस्तार की घोषणा की। इस पहल का उद्देश्य नागरिकों को डिजिटल स्वास्थ्य सेवा, इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड और टेलीमेडिसिन तक पहुंच प्रदान करना है।
इसका उद्देश्य डिजिटल प्रौद्योगिकी को एकीकृत करके, देश भर में स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच और गुणवत्ता में सुधार करके और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में अंतराल को संबोधित करके स्वास्थ्य सेवा वितरण में क्रांति लाना है।
मोदी सरकार ने 2024 में एक प्रमुख राष्ट्रीय शिक्षा सुधार कार्यक्रम शुरू किया, जिसका उद्देश्य सभी स्तरों पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है। सुधार कौशल विकास, परीक्षा के दबाव को कम करने और नवीन शिक्षण विधियों को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित हैं।
इसमें शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग बढ़ाना, डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म को बढ़ाना और ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी ढांचे में सुधार करना शामिल है। कार्यक्रम का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक छात्र, चाहे उनका स्थान कुछ भी हो, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करे जो उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करे।
2024 में, केंद्र सरकार ने देश भर में बुनियादी ढांचे की कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान का विस्तार किया। शुरुआत में 2021 में शुरू की गई यह पहल परिवहन, लॉजिस्टिक्स और संचार जैसे क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की एकीकृत योजना पर केंद्रित है।
यह विस्तार राज्यों को कार्यान्वयन प्रक्रिया में अधिक सक्रिय रूप से भाग लेने, प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों के विकास को लक्षित करने और व्यापार और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सुचारू रसद की सुविधा प्रदान करने की अनुमति देगा। इस कदम का उद्देश्य परिवहन लागत को कम करना, नौकरियां पैदा करना और वैश्विक व्यापार केंद्र के रूप में भारत की स्थिति में सुधार करना है।
भारत को स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करने के लिए इस वर्ष राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शुरू किया गया था। मिशन नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा संचालित इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से हरित हाइड्रोजन, एक नवीकरणीय और टिकाऊ ऊर्जा स्रोत का उत्पादन करने पर केंद्रित है।
सरकार का लक्ष्य स्टील, सीमेंट और परिवहन जैसे उद्योगों में हरित हाइड्रोजन के उपयोग को बढ़ावा देना, कार्बन उत्सर्जन को कम करना और देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह पहल स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में निवेश को आकर्षित करेगी और बड़ी संख्या में हरित नौकरियाँ पैदा करेगी।
महिलाओं को सशक्त बनाने की अपनी प्रतिबद्धता के अनुरूप, सरकार ने 2024 में महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा पैकेज लॉन्च किया। इस योजना में महिला उद्यमियों के लिए बढ़ी हुई वित्तीय सहायता, संकट में महिलाओं के लिए एक नयी हेल्पलाइन और लिंग आधारित हिंसा से निपटने के लिए सख्त कानून के प्रावधान शामिल हैं। यह पहल सुरक्षित सार्वजनिक स्थान प्रदान करने और सरकारी और निजी क्षेत्रों में नेतृत्व की भूमिकाओं में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ाने पर भी केंद्रित है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। टिमोथी और ग्रेस गे का घर, जो क्रिसमस के समय लाखों पर्यटकों का आकर्षण बन जाता है। इस घर में जलने वाले 7,20,420 बल्ब एक जादुई माहौल तैयार करते हैं, जो संगीत और रंगों के साथ बदलते रहते हैं। शुरुआत में, इस दंपति ने अपने पहले बच्चे के जन्मोत्सव पर घर को सजाया था, लेकिन धीरे-धीरे यह शौक गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो गया। 2012 में उन्होंने रिकॉर्ड अपने नाम किया और तब से उनका नाम लगातार इसमें शामिल है।
गांव का एक घर अपनी जगमगाहट के कारण गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हो गया है। इस अनूठे प्रकाशमान घर के कारण एक छोटा-सा गांव क्रिसमस के अवसर पर चर्चित पर्यटन स्थल बन जाता है। गांव की आबादी तो वह मुश्किल 4600 लोगों की है, लेकिन क्रिसमस के दौरान यहां 60000 पर्यटकों का रेला उमड़ पड़ता है जो सिर्फ इस घर की रोशनी को देखने के लिए आते हैं।
जी हां, हम बात कर रहे हैं न्यूयॉर्क के ग्रामीण डचेज काउंटी के यूनियन वाले में मौजूद दंपति टिमोथी और ग्रेस गे के घर की। यूनियन वाले गांव की अंधेरे माहौल से दूर से किसी प्रकाश स्तंभ की तरह चमकता हुआ दिखता है उनका यह अनूठा घर। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस घर में 7,20,420 बल्ब जलते हैं। ये बल्ब एक साउंड ट्रैक से जुड़े हुए हैं और करीब ढाई सौ गीतों की धुन पर बार-बार रंग बदलते हैं। इससे माहौल पूरा जादुई और मनोरंजक हो जाता है। यहां एक तालाब है जिसके ऊपर एक बड़ा-सा ग्लोब, हार्ट, तारे और इंद्रधनुष लटकाये गये हैं। जाहिर है ये सभी रंग-बिरंगे बल्बों से बने हुए हैं। इनका प्रतिबिंब जब जल में पड़ता है तो लगता है मानो हम किसी मायालोक में आ गये हैं।
पति और पत्नी यानी टिमोथी और ग्रेस गे ने सबसे पहले अपने इस घर में को 1995 में रोशन किया था। यह मौका था उनके पहले बच्चे के जन्मोत्सव का। अपनी खुशी का इजहार करने के लिए इस दंपति ने अपने घर को 600 रंग-बिरंगे बल्बों से सजाया था। कुछ वर्षों बाद शौक-शौक में उन्होंने अपने 1.7 एकड़ में विस्तृत आवासीय परिसर के सामने तालाब के आसपास मौजूद पेड़ों और झाड़ियां को भी मिनी बल्बों की झालर से सजा दिया।
वर्ष 2011 में उन्हें पता चला कि आस्ट्रेलिया का एक दंपति भी अपने घर को लाइटों से सजाता है, जिनका नाम गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। उस दंपति से वे सिर्फ कुछ बल्बों की दूरी पर हैं। फिर क्या था टिमोथी और ग्रेस गे ने यह रिकार्ड अपने नाम करने की ठान ली। अपनी मेहनत से 2012 में उन्होंने यह रिकॉर्ड हासिल कर लिया। सन?् 2013 में 1 वर्ष के लिए वे पिछड़ गए थे मगर 2014 से अब तक उनका ही नाम गिनीज बुक में दर्ज है। अपने इस अनूठे शौक के कारण इस दंपति की ख्याति राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गई है और उनके साथ-साथ उनका गांव भी दुनिया भर में चर्चित हो गया है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज दिनांक 20/ 12 /2024 को डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण, शोध संस्थान रांची में प्रगतिशील लेखक संघ, रांची के तत्वावधान में राही डूमरचीर की प्रथम काव्य कृति गाडा टोला का लोकार्पण सह कृति परिचर्चा आयोजित की गयी। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए डॉ अशोक प्रियदर्शी ने कहा की गाडा टोला की कविताएं हमें मौन में ले जाती हैं।
इन कविताओं को पढ़ते हुए कवि की भावना के साथ हम सहज रूप से जुड़ जाते हैं। मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर रविभूषण ने कहा कि इस वर्ष प्रकाशित हिंदी के 10 अच्छे कविता संग्रहों में से गाडा टोला एक है। समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में यह काव्य कृति अपनी शानदार उपस्थित रखेगी। राही डूमरचीर नवीन दृष्टि संपन्न, गहन संवेदना के कवि हैं।
वह स्थानिकता के साथ-साथ वैश्विकता के कवि हैं। वे लोकल, नेशनल, ग्लोबल प्रश्न उनके यहां एक साथ मौजूद हैं। यथार्थ बोध, जीवनबोध, इतिहास बोध, समयबोध सब एक साथ उनके यहां दर्ज है। कम शब्दों में वे बड़े सवाल उठाते हैं। समकालीन हिंदी कविता में उनकी उपस्थिति दमदार है। राही डूमरचीर की कविताएं बदलते समय की तकलीफ को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं।
विशिष्ट वक्ता के तौर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ माया प्रसाद ने कहा कि राही डूमरचीर की कविताएं हमें प्रकृति से जोड़ती हैं। इन कविताओं में पूरे प्रदेश के दोहन की व्यथा अभिव्यक्त है। कवि की कविताएं नये सौंदर्यबोध से संपृक्त हैं और अनूठी हैं। बीज वक्तव्य देते हुए प्रसिद्ध कथाकार रणेंद्र ने कहा कि राही डूमरचीर की कविताएं जल, जंगल, जमीन, हवा और खुशबू की बात करती कविताएं हैं।
यहां के गांव- घर आदिवासी दर्शन को कहती कविताएं हैं। सहजता से अपनी बात रखना इन कविताओं की एक बड़ी खूबसूरती है। मौके पर साहित्यकार महादेव टोप्पो ने कहा कि राही डूमरचीर आदिवासी दर्शन को लेकर जिस तरह से कविताएं रच रहे हैं वह हिंदी कविता को आश्वस्त करती हैं।
इस अवसर पर युवा आलोचक डॉ जिंदर सिंह मुंडा ने कहा कि राही की कविताओं में प्रयुक्त शब्द हमें नई शब्दावली देते हैं। राही ने अपनी कविता में संताली के कई सुंदर शब्दों को सहज रूप से स्थान दिया है; वह हिंदी भाषा को समृद्ध करता है। साथ ही उनकी प्रेम की कविताएं एक नये कलेवर में सामने आती हैं, नये बिम्ब हैं-
मौके पर डॉ उर्वशी, डॉ सावित्री बडाईक, डॉ प्रज्ञा गुप्ता साहित्यकार प्रमोद झा, आलोचक -चिंतक सुधीर सुमन, कवि प्रकाश देवकुलिश, कहानीकार पंकज मित्र ने भी अपने विचार रखे।
कवि राही डूमरचीर, कहानीकार रश्मि शर्मा, कहानीकार कमल, कवयित्री सुरेंद्र कौर नीलम, चित्रकार भारती, कवि प्रेम रंजन अनिमेष, कहानीकार चंद्रिका ठाकुर, फिल्मकार निरंजन शब्द कार टीम के सदस्य, रांची विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के शोधार्थी एवं छात्र, रांची विमेंस कॉलेज की छात्राएं एवं बड़ी संख्या में साहित्य अनुरागी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन कवि चेतन कश्यप ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन कवयित्री पार्वती तिर्की ने किया। (डॉ प्रज्ञा गुप्ता, सचिव, प्रगतिशील लेखक संघ, रांची।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। काथलिक कलीसिया में ख्रीस्त जयंती का अलग ही महत्व है। यह पर्व येसु के जन्मदिन की याद दिलाता है। उनका जन्म अद्भुत था, क्योंकि उनके जन्म से एक नया युग, नयी सोच और नयी जीवन शिक्षा की शुरुआत हुई। उनका जन्म भी विशिष्ट था, क्योंकि जोसफ और गर्भवती मरियम ने अगुस्तुस सीजर के समय यहूदी जनगणना के लिए अपना नाम दर्ज करवाने के लिए नाजरेथ से बेथलेहम पहुंचने के लिए लगभग 150 किलोमीटर पैदल यात्रा की।
बेथलेहम पहुंचने पर गर्भवती मरियम दर्द से तड़प रही थीं, और जोसफ बड़े आशा और उम्मीद से मदद की गुहार लगाते हुए घर-घर जाकर शरण की याचना कर रहे थे। लेकिन जोसफ और मरियम को अपरिचित और अजनबी समझकर अधिकांश लोग अपना दरवाजा बंद कर देते थे। फिर भी, जोसफ ने अपनी पत्नी मरियम को हौसला और साहस देते हुए, आशा की किरण के साथ हर घर का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हर बार यही जवाब मिलता, हमारे यहां स्थान नहीं है, कृपया आगे जाइये। थके-हारे वे शरण की खोज में दर-दर भटकते रहे।
अंत में, बहुत मुश्किल से उन्हें एक छोटे से कोने में एक स्थान मिला, जहां घरेलू जानवरों को रखा जाता था। वहीं, मरियम ने अपने प्यारे पुत्र येसु मसीह, दुनिया के मुक्तिदाता को जानवरों के बीच जन्म दिया। इस प्रकार, बड़ी तंगी में येसु का जन्म नाजरेथ के एक साधारण परिवार में हुआ, जहां जोसफ एक बढ़ाई थे।
येसु के जन्म का पर्व हम सभी मानवता के लिए, इस दुनिया के लिए आशा का संदेश देता है। यह पर्व आशा का पर्व है, क्योंकि यह हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए हिम्मत और साहस देता है। यह पर्व येसु के जन्म के समय की सामाजिक स्थिति और वास्तविकता आज के हमारे समाज, परिवार और हर एक माता-पिता के लिए एक सच्चे दर्पण की तरह है। यह जन्म पर्व हमारे जीवन की कड़वी सच्चाई है।
इस पर्व का यही संदेश है कि हम एक दूसरे के लिए आशा बनें। हम भी एक-दूसरे के लिए आशा बनें, जैसे जोसफ ने पूरी तत्परता और लगन के साथ अपनी पत्नी का साथ दिया। मरियम ने भी बड़े प्यार से, सुख और दु:ख में, एक आशा की किरण बनकर एक आदर्श पत्नी और मां का कर्तव्य निभाया और नाजरेथ के परिवार को प्रेम और पवित्र परिवार बनाया।
दूसरी ओर, येसु के जन्म के समय दुनिया ने उन्हें शरण नहीं दी और उनका साथ नहीं निभाया। दुनिया ने येसु को उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक दु:ख, गम, अन्याय, तिरस्कार और धोखा दिया, लेकिन बदले में उन्होंने दुनिया को न्याय, प्रेम, क्षमा, विश्वास और शांति की शिक्षा दी। उन्होंने हमेशा दबे कुचले, शोषित, असहाय, जरुरतमंदों का सहारा दिया, हर कदम में उनका साथ दिया।
इसलिए येसु इम्मानुएल कहलाये जिसका अर्थ है प्रभु हमारे साथ है। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक अपने जीवन से प्रेम, साहस और आशा का एक अमिट संदेश दिया। यह पर्व हमें एक गहरा निमंत्रण देता है कि हम हर लाचार, बेबस, हताश और निराश दिलों के लिए आशा की किरण बनें। एक-दूसरे के जीवन में उम्मीदों का दीप जलायें, ताकि हर कदम में एक नयी रोशनी और विश्वास का अहसास हो। (लेखक रांची महाधर्मप्रांत हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। क्रिसमस का समय हम ख्रीस्त विश्वासियों के लिए एक अद्भुत और उल्लासपूर्ण पर्व होता है। यह वह अनमोल क्षण है, जब हम प्रभु येसु के जन्म की खुशी में डूबकर इस पर्व को श्रद्धा, आस्था और हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। परंतु, क्या आप जानते हैं कि क्रिसमस का असली अर्थ क्या है? यह सिर्फ क्रिसमस ट्री, सांताक्लाज या रंग-बिरंगे केक का पर्व नहीं है। इन प्रतीकों के माध्यम से हम उत्सव का आनंद तो लेते हैं, लेकिन क्रिसमस का सच्चा संदेश कहीं अधिक गहरा और अर्थपूर्ण है।
क्रिसमस वह दिन है जब प्रभु येसु ने स्वर्ग से पृथ्वी पर आकर मानवता का उद्धार किया, पाप से मुक्ति प्रदान की और हमें प्रेम, शांति और मुक्ति का अद्वितीय संदेश दिया। यही असली क्रिसमस है : एक दिव्य प्रेम, शांति और समर्पण की कहानी, जो आज भी हमारे दिलों को सुकून और उत्साह देती है। इस दिन का महत्व सिर्फ उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें अपने आस्थाओं, आदर्शों और दृष्टिकोणों को नई दिशा देने के लिए प्रेरित करता है।
जैसे परम पिता परमेश्वर ने अपने इकलौते पुत्र को हमारी मुक्ति के लिए हमारे बीच भेजा, वैसे ही हमें भी समाज में उपस्थित असहाय, गरीब और जरूरतमंदों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। क्रिसमस हमें यह सिखाता है कि खुशियां तब ही सच्ची होती हैं, जब हम इन्हें एक-दूसरे के साथ बांटते हैं, जैसे प्रभु ने हमें अपना सब कुछ दे दिया।
क्रिसमस के समय में, सड़कों, दुकानों, पेट्रोल पंपों, रेलवे स्टेशनों और हर जगह सजावट की एक विशेष छटा देखने को मिलती है। हर कोने में क्रिसमस के गीत गूंजते हैं और पूरा वातावरण प्रभु के जन्म का उत्सव मनाता है। ये सारी सजावट और खुशी हमें यह याद दिलाती हैं कि यह पर्व सिर्फ बाहरी उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारी आत्मा को उज्जवल बनाने और एक दूसरे के प्रति प्रेम और दया का संदेश देने का पर्व है।
हम ख्रीस्त विश्वासियों के लिए क्रिसमस सिर्फ आनंद और उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा और मदद का प्रतीक है। यह हमें मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने और सभी के लिए प्रेम और शांति का मार्ग दिखाने के लिए प्रेरित करता है। क्रिसमस के इस शुभ अवसर पर, आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं और बधाईयां...। (लेखिका प्रभात तारा स्कूल, धुर्वा की सहायक शिक्षिका हैं।)
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