विचार

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Published / 2025-05-11 21:07:37
नर्सों का योगदान समाज के लिए अहम

समाज के लिए नर्सों के योगदान को नमन 

योगेश कुमार गोयल 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दया और सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल को आधुनिक नर्सिंग की जन्मदाता माना जाता है, जिनकी आज हम 205वीं जयंती मना रहे हैं। प्रतिवर्ष उन्हीं की जयंती पर 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है। लेडी विद द लैंप के नाम से विख्यात नाइटिंगेल का जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस शहर में हुआ था। भारत सरकार द्वारा वर्ष 1973 में नर्सों के अनुकरणीय कार्यों को सम्मानित करने के लिए उन्हीं के नाम से फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार की स्थापना की गई थी, जो प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के अवसर पर प्रदान किये जाते हैं। 

फ्लोरेंस नाइटिंगेल खूबसूरत, पढ़ी-लिखी और समझदार युवती थीं। उन्होंने अंग्रेजी, इटेलियन, लैटिन, जर्मनी, फ्रैंच, इतिहास और दर्शन शास्त्र सीखा था, वहीं अपनी बहन और माता-पिता के साथ कई देशों की यात्रा की थी। मात्र 16 वर्ष की आयु में ही उन्हें अहसास हो गया था कि उनका जन्म सेवा कार्यों के लिए ही हुआ है। हालांकि उस दौर में नर्सिंग को एक सम्मानित व्यवसाय भी नहीं माना जाता था। उनके माता-पिता संपन्न परिवार से थे। ऐसे में उनका मानना था कि धनी परिवार की लड़की के लिए वह पेशा सही नहीं है। 

दरअसल, वह ऐसा समय था, जब अस्पताल बेहद गंदी जगह पर होते थे और वहां बीमार लोगों की मौत के बाद काफी भयावह माहौल हो जाता था। 1850 में फ्लोरेंस ने जर्मनी में प्रोटेस्टेंट डेकोनेसिस संस्थान में दो सप्ताह की अवधि में एक नर्स के रूप में अपना प्रारम्भिक प्रशिक्षण पूरा किया। मरीजों, गरीबों और पीड़ितों के प्रति उनके सेवाभाव को देखते हुए आखिरकार उनके माता-पिता द्वारा वर्ष 1851 में उन्हें नर्सिंग की आगे की पढ़ाई के लिए अनुमति दे दी गयी। 

इसके बाद उन्होंने जर्मनी में महिलाओं के लिए एक क्रिश्चियन स्कूल में नर्सिंग की पढ़ाई शुरू की, जहां उन्होंने मरीजों की देखभाल के तरीकों और अस्पतालों को साफ रखने के महत्व के बारे में जाना। फ्लोरेंस का नर्सिंग के क्षेत्र में पहली बार अहम योगदान 1854 में क्रीमिया युद्ध के दौरान देखा गया। उस समय ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की (तुर्किये) की रूस से लड़ाई चल रही थी और सैनिकों को रूस के क्रीमिया में लड़ने के लिए भेजा गया था। युद्ध के दौरान सैनिकों के जख्मी होने, ठंड, भूख तथा बीमारी से मरने की खबरें आ रही थीं। 

युद्ध के समय वहां उनकी देखभाल के लिए कोई उपलब्ध नहीं था। ऐसे में ब्रिटिश सरकार द्वारा फ्लोरेंस के नेतृत्व में अक्तूबर 1854 में 38 नर्सों का एक दल घायल सैनिकों की सेवा के लिए तुर्की भेजा गया। फ्लोरेंस ने वहां पहुंच कर देखा कि किस प्रकार वहां अस्पताल घायल सैनिकों से खचाखच भरे हुए थे, जहां गंदगी, दुर्गंध, दवाओं तथा उपकरणों की कमी, दूषित पेयजल इत्यादि के कारण असुविधाओं के बीच संक्रमण से सैनिकों की बड़ी संख्या में मौतें हो रही थी। 

फ्लोरेंस ने अस्पताल की हालत सुधारने के अलावा घायल और बीमार सैनिकों की देखभाल में दिन-रात एक कर दिया, जिससे सैनिकों की स्थिति में काफी सुधार हुआ। उनकी अथक मेहनत के परिणामस्वरूप ही अस्पताल में सैनिकों की मृत्यु दर में बहुत ज्यादा कमी आयी। उस समय किये गये उनके सेवा कार्यो के लिए ही सभी सैनिक उन्हें आदर और प्यार से लेडी विद द लैंप कहने लगे थे। दरअसल, जब चिकित्सक अपनी ड्यूटी पूरी करके चले जाते, तब भी वह रात के गहन अंधेरे में हाथ में लालटेन लेकर घायलों की सेवा के लिए उपस्थित रहती थीं। 

1856 में युद्ध की समाप्ति के बाद जब वह वापस लौटीं, तब स्वयं महारानी विक्टोरिया ने पत्र लिखकर उनका धन्यवाद किया। उसके कुछ ही माह बाद रानी विक्टोरिया से उनकी मुलाकात हुई। उनके सुझावों के आधार पर ही वहां सैन्य चिकित्सा प्रणाली में बड़े पैमाने पर सुधार संभव हुआ और वर्ष 1858 में रॉयल कमीशन की स्थापना हुई। उसके बाद ही अस्पतालों की सफाई व्यवस्था पर ध्यान देना, सैनिकों को बेहतर खाना, कपड़े और देखभाल की सुविधा मुहैया कराना तथा सेना द्वारा डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने जैसे कार्यों की शुरुआत हुई। 

सेवाभाव से किए गए फ्लोरेंस नाइटिंगेल के कार्यों ने नर्सिंग व्यवसाय का चेहरा ही बदल दिया था, जिसके लिए उन्हें रेडक्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति द्वारा सम्मानित किया गया। मरीजों, गरीबों और पीड़ितों के प्रति फ्लोरेंस की सेवा भावना को देखते हुए ही नर्सिंग को उसके बाद महिलाओं के लिए सम्मानजनक पेशा माना जाने लगा और उनकी प्रेरणा से ही नर्सिंग क्षेत्र में महिलाओं को आने की प्रेरणा मिली। 

फ्लोरेंस के अथक प्रयासों के कारण ही रोगियों की देखभाल तथा अस्पताल में स्वच्छता के मानकों में अपेक्षित सुधार हुआ। 90 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1910 को फ्लोरेंस नाइटिंगेल का निधन हो गया, जिनकी कब्र सेंट मार्गरेट गिरजाघर के प्रांगण में है। उनके सम्मान में ही उनके जन्मदिवस 12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाए जाने की शुरुआत की गयी। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2025-05-11 21:04:13
पाक में अंदरूनी लड़ाई भी चरम पर

अब अंदरूनी लड़ाई में फंसा पाकिस्तान 

डॉ प्रभात ओझा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत-पाकिस्तान के बीच 10 मई की शाम 5 बजे से शुरू सीजफायर दुनिया में तनाव कम होने की तरह देखा जायेगा। इसके विपरीत खुद पाकिस्तान में ऐसा नहीं है। इसे उसी रात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के देश के नाम संबोधन से समझा जा सकता है। शहबाज ने अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और तुर्की जैसे देशों को सहयोग अथवा सीजफायर में मदद के लिए शुक्रिया कहा। 

गौर करने लायक है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने जनरल मुनीर के लिए भी ऐसा ही शुक्रिया करने के साथ एक कटु बात भी जोड़ दी। वह कठोर तथ्य यह है कि शहबाज ने परोक्ष रूप से मान लिया कि भारत के हमलों से पाकिस्तान को बहुत अधिक नुकसान पहुंचा है। सही मायनों में अब इस नुकसान की जिम्मेदारी तय करने का समय शुरू हो गया है। 

पीएम शहबाज के कई देशों और अपने सहयोगियों के लगातार धन्यवाद करते जाने के बीच दुनियाभर के कूटनीतिक विशेषज्ञ सांस रोके भाषण खत्म होने का इंतजार कर रहे थे। उन्हें थोड़ी देर के लिए शायद यह लगा कि शहबाज अपनी कुर्सी छोड़ने जा रहे हैं। लगा कि सीजफायर होते ही शहबाज को विदा करने की योजना बन चुकी है। ऐसा नहीं हुआ। उसके बाद अब शहबाज शरीफ की चाल की चर्चा शुरू हो गयी है। 

पाकिस्तानी हुक्मरान ही नहीं, आम लोगों को भी पता है कि भारत-पाक के मध्य हर युद्ध अथवा संघर्ष में पाकिस्तान की बदहाली के लिए किसी के सिर ठीकरा फोड़ने की परंपरा रही है। आमतौर पर इसमें राजनेताओं के बजाय सैन्य अधिकारी हावी होते रहे हैं। फिलहाल स्थिति अलग लग रही है। शहबाज ने संघर्ष में भारत की मजबूती और पाकिस्तान की बबार्दी का जिक्र कर फिलहाल इसकी जिम्मेदारी सेना पर डालने की कोशिश की है। ऐसे में सेना और सरकार के बीच अघोषित संघर्ष शुरू हो चुका है। 

इस तरह का ताजा मामला वर्ष 1999 के कारगिल युद्द का है, तब भी कुछ ऐसा ही हुआ था। कहते हैं कि जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को विश्वास में लिए बिना कारगिल, द्रास और बटालिक की चोटियों पर कार्रवाई शुरू कर दी थी। जब इन जगहों पर पाकिस्तानी सेना हार गयी तो जनरल मुशर्रफ ने पीएम नवाज को आगे कर दिया। बाद में तख्तापलट की कहानी लंबी हो जायेगी। 

पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमंत्री को इसका अंदाजा है। तभी उन्होंने जिम्मेदारी के लिए जनरल मुनीर को आगे करने की कोशिश की है। ऐसा करना उन्हें इसलिए भी जरूरी लगा कि सीजफायर तो पड़ाव भर है। अभी भारत की ओर से सिंधु का पानी रोकना,दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते फिर से कायम करने के साथ भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापारिक रिश्ते बहाल करने जैसे बड़े काम बाकी हैं। 

स्वाभाविक रूप से इसके लिए पाकिस्तानी राजनेताओं को ही आगे आना होगा। भारत का लोकतांत्रिक नेतृत्व भी सैन्य शासक की जगह पाकिस्तानी राजनेताओं को ही प्राथमिकता देगा। पाकिस्तान स्वयं इस हार के दंश से किस तरह बाहर निकलेगा, यह समझने के लिए कुछ समय लगेगा। फिलहाल, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल मुनीर पर आम पाकिस्तानियों का गुस्सा फूटने लगा है। 

पाकिस्तान के बुद्धिजीवी खुलेआम पाकिस्तान आर्मी चीफ के अप्रैल में दिए बयान को याद कर रहे हैं। जनरल मुनीर ने अपने उस बयान में हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से अलग बताया था। पाकिस्तानी प्रोफेसर डॉ इश्तियाक अहमद ने कहा है कि तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बाजवा के कार्यकाल में पाकिस्तान में शांति रही। 

आसिम मुनीर ने इस बात की चिंता नहीं कि मुसलमानों की एक तिहाई आबादी भारत में ही रहती है। मुनीर ने इस भावना को भड़काया कि हिंदुओं और मुसलमानों में कुछ भी एक जैसा नहीं है। बहरहाल, प्रो इश्तियाक का बयान एक उदाहरण भर है। यह आगाज है,अंजाम क्या होगा, इसे जानने के लिए इंतजार तो करना ही पड़ेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2025-05-10 19:38:23
प्राचीन और अवार्चीनकाल में भी युद्ध के क्षेत्र में योग के कौशल को परखा जा चुका है

स्वामी मुक्तरथ 

एबीनएन एडिटोरियल डेस्क। शनिवार को डीएवी पब्लिक स्कूल बरियातू में स्वामी मुक्तरथ के सान्निध्य में 11वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पूर्वाभ्यास कार्यक्रम चलाया गया। इसमें हजारों बच्चों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए सत्यानंद योग मिशन रांची के अध्यक्ष स्वामी मुक्तरथ ने कहा कि योग बहुत शक्तिशाली विद्या है। यह तंत्र से निकली हुई एक शाखा है जिसके प्रथम गुरु भगवान शिव हैं। 

वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ योग को सिद्ध करने वाले वर्तमान युग के प्रथम गुरु बिहार योग विद्यालय मुंगेर के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती हुए जिन्होंने संपूर्ण विश्व में योग को स्थापित किये। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस इन्हीं योगियों के प्रयास का फल है। 

योग के प्रभाव को प्राचीनकाल से हमलोग देख रहे हैं, जब भारत के सात ऋषियों के नाम पर आकाश के सात तारों का नाम पड़ा था, जिसे हम सप्तऋषि के नाम से जानते हैं। गौरव की बात यह है कि वर्तमान समय में भी नाशा ने शिवानंद गुरु-शिष्य परंपरा के तीन योगियों के नाम से आकाश के तीन तारों का नामकरण कर दिया है जो हैं स्वामी शिवानंद, स्वामी सत्यानंद और स्वामी निरंजनानंद। 

महाभारत के युद्व में जब अर्जुन विषाद में पड़ा था तो भगवान कृष्ण ने इसी योग की शिक्षा को देकर उन्हें अवसाद से मुक्ति दिये थे और युद्ध कौशल में रणविजय बनाये थे और इस काल में जब डॉ एपीजे अब्दुल कलाम डिप्रेशन में फंसे तो शिवानंद का योग उन्हें महान वैज्ञानिक बना दिया। युद्धक्षेत्र में योग के प्रभाव को कारगिल युद्ध में देखा जा चुका है। 

दानापुर मिलिट्री छावनी में बिहार योग विद्यालय के संन्यासियों के द्वारा सैनिकों का दो दल बनाकर एक को योग और दूसरे को व्यायाम कराया जाता था। संयोग से कारगिल वॉर में योग करने वाले दल को वहां भेजा गया जो बेहद ही कारगर सिद्ध हुआ। इन सैनिकों का हृदय गति, श्वांस की क्षमता बहुत अच्छी थी, इनकी मारक क्षमता यानी निशाना बहुत अच्छा था और स्टेमिना भी ज्यादा देर तक बनी रहती थी।  

आज तो योग की उपयोगिता और भी बढ़ गयी है क्योंकि अब न तो बच्चे साइकिल चलाते हैं न ही फुटबॉल खेलते हैं और न ही संतुलित भोजन करते हैं। यानि अब लगभग लोगों का शारीरिक श्रम नही होता है। शारिरिक श्रम नहीं होने से न तो लोग थकते हैं और न ही उन्हें अच्छी नींद आती है। जीवनशैली बिल्कुल खराब होते जा रही है, मोबाईल की आदत आंखों को दिमाग को और नींद को बर्बाद कर रही है। ऐसे में कुछ शारिरिक व्यायाम और प्राणायाम, मेडिटेशन, जल नेति तथा ध्यान करने की आवश्यकता है। 

डीएवी बरियातू के प्राचार्य एस के मिश्रा जी स्वामी मुक्तरथ जी को पुष्पगुछ और शॉल से स्वागत किये। श्री मिश्रा ने कहा कि शारिरिक शौष्ठव और मोरल को डेवलप किये बगैर अच्छा इंसान बनना कठिन है। बच्चों को नियमित रूप से योग करना चाहिए। हर गार्जियन का यह कर्तव्य बनता है कि बच्चों को प्रात:काल में योगाभ्यास करने की प्रेरणा को जागृत करें, उन्हें योग करने की सुविधा दें तभी आप के बच्चे में संस्कार का संवर्धन होगा और आज्ञाकारी भी बनेंगे। आप के सुख-दु:ख में खड़े उतरेंगे। श्री रोहित कुमार और केशव कुमार ने योगाभ्यास की प्रायोगिक शिक्षा का संचालन किया।

Published / 2025-05-03 21:31:58
दिमाग को उत्तेजित करने वाले हार्मोन एकाग्रता में बड़ा बाधक है इसे योग से संतुलित करने की विधि भारत के मनीषियों के पास : स्वामी मुक्तरथ

  • हार्मोन के असंतुलन से युवाओं में दिमाग की कमजोरी, अपराध वृत्ति और सामाजिक सोच की कमी बढ़ रही है। कारण है मेडिटेशन का अभाव : स्वामी मुक्तरथ 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हम ग्यारहवें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को मनाने जा रहे हैं और इस वर्ष 2025 का थीम है- मानवता। आज की सबसे बड़ी समस्या बीमारी नहीं है बल्कि सबसे बड़ी समस्या है नैतिकता का तीब्र ह्रास जिस वजह से मानवता खतरे में है। संवेदना हमारी मर रही है दिल के भीतर की भवनायें कमजोर पड़ रही है, विश्वास जो हुआ करता था वो अब मर रही है, समाज के किसी भी व्यक्ति का धौंस किसी के भी बच्चों पर रहता था, किसी भी बच्चे को समाज के अन्य व्यक्ति से अभिभावक जैसा डर रहता था, वो सब इस वर्तमान परिदृश्य से गायब हो गया। 

कारण है हमारे अंदर की मानवता सशंकित है,कमजोर हो गयी है, लोभ, नकारात्मक प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। आज मानसिक रोग के बढ़ने का भी यही कारण है। इस वर्ष के अंतर्राष्टीय योग दिवस का पूर्वाभ्यास योग कार्यक्रम रांची शहर में सत्यानन्द योग मिशन के तहत कई स्थानों में चल रहा है। आज 03 मई, शनिवार को डीएवी कपिलदेव के हजारों विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के बीच स्वामी मुक्तरथ जी अपना व्याख्यान एवं योग-ध्यान कार्यक्रम को संचालित कर रहे थे। 

मुक्तरथ जी ने कहा बिगड़ता जीवनशैली और संकीर्ण विचारधारा, सीमित सोच से दिमाग में पिट्यूटरी ग्लैण्ड पर बुरा असर होता है, उससे हार्मोन असंतुलित होने लगते हैं, एड्रिनल ग्लैण्ड का हार्मोन असंतुलित होने लगता है जिस कारण अपराध प्रवृत्ति बढ़ती है, नकारात्मकता में वृद्धि होती है और भय बढ़ता है। योग में थोड़ा आसन,कुछ प्राणायाम और दस मिनट ध्यान का ध्यान प्रतिदिन अवश्य करना चाहिये तभी हम मानवता को जिंदा रख पायेंगे। 

डीएवी कपिलदेव के प्राचार्य श्री एम के सिन्हा जी पहले स्वामी मुक्तरथ जी के साथ वैदिक हवन किये फिर योगाभ्यास को प्रारंभ किया गया। श्री सिन्हा ने कहा कि योग सबसे बड़ी शक्ति है जो विद्यार्थियों को शरीर से सबल और मन से मजबूत बनाता है। ध्यान से सारी समस्याएं समाप्त हो जाती है और विद्यार्थी को सही दिशा भी मिलता है। (लेखक सत्यानंद योग मिशन रांची के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2025-04-30 20:29:02
पोप फ्रांसिस का मानवता और दुनिया के प्रति महान योगदान

फादर सुशील टोप्पो 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पोप फ्रांसिस ने अपने पोप बनने के बाद मानवता और दुनिया के लिए कई महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं। उनके कार्य और विचार न केवल कैथोलिक चर्च के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणास्त्रोत बने हैं। यहां कुछ उनके महान योगदान दिए जा रहे हैं: 

पर्यावरण संरक्षण 

पोप फ्रांसिस ने 2015 में अपनी ऐतिहासिक एनसाइक्लिकल लौदातो सी जारी की, जिसमें उन्होंने जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने दुनिया भर के नेताओं और लोगों से अपील की कि वे पृथ्वी के संसाधनों का संरक्षण करें और अपनी गतिविधियों को प्रकृति के साथ संतुलित रखें। 

गरीबों और कमजोर वर्गों की मदद 

पोप फ्रांसिस ने हमेशा गरीबों, प्रवासियों, बुजुर्गों, बीमारों और असहाय लोगों की मदद करने की अपील की है। वे सभी के लिए समान अधिकार की बात करते हैं और समाज में असमानता के खिलाफ खुलकर बोलते हैं। उनका मानना है कि यदि हम ईश्वर के सच्चे अनुयायी हैं, तो हमें दुनिया के सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के लिए काम करना चाहिए। 

धार्मिक एकता और संवाद 

पोप फ्रांसिस ने कैथोलिक और गैर-कैथोलिक समुदायों के बीच धार्मिक एकता और संवाद को बढ़ावा दिया। उन्होंने इस्लाम, यहूदी, हिंदू और अन्य धर्मों के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकातें की और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया। उनका मानना है कि धार्मिक विविधता को समझना और सम्मान करना दुनिया के लिए शांति का रास्ता है। 

कलीसिया में सुधार 

पोप फ्रांसिस ने कैथोलिक चर्च में कई महत्वपूर्ण सुधार किए। उन्होंने चर्च के आंतरिक मामलों में पारदर्शिता बढ़ाई और कलीसिया के भीतर यौन शोषण के मामलों के खिलाफ सख्त कदम उठाए। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि चर्च का नेतृत्व और प्रबंधन सभी के लिए सुलभ हो, और विनम्रता और नम्रता का पालन किया जाए। 

विश्व शांति के लिए प्रयास 

पोप फ्रांसिस ने हमेशा दुनिया में शांति और सभी के बीच संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने युद्धों, संघर्षों और हिंसा के खिलाफ बात की है और शांति स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत की है। उन्होंने दुनिया के नेताओं से अपील की है कि वे शांति की ओर कदम बढ़ाएं और संघर्षों को समाप्त करने के लिए मिलकर काम करें। 

युवाओं के लिए प्रेरणा 

पोप फ्रांसिस युवाओं को अपने उद्देश्य के लिए समर्पित होने और समाज में बदलाव लाने के लिए प्रेरित करते हैं। वे हमेशा कहते हैं कि अपने सपनों को न खोएं और महान कार्य करने से डरें नहीं। उनका मानना है कि युवा पीढ़ी ही समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। महिलाओं की भूमिका को सशक्त 

बनाना 

पोप फ्रांसिस ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी भूमिका को बढ़ावा दिया। उन्होंने चर्च में महिलाओं की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया और उनकी आवाज को महत्वपूर्ण माना। उनका मानना है कि महिलाओं का योगदान समाज के हर क्षेत्र में होना चाहिए। 

विश्वभर में मानवाधिकारों का समर्थन 

पोप फ्रांसिस ने मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए कई बार आवाज उठाई है। उन्होंने मूलभूत अधिकारों, जैसे स्वतंत्रता, समानता और न्याय के लिए लड़ाई लड़ी है। उन्होंने शरणार्थियों, प्रवासियों और कमजोर वर्गों के अधिकारों के लिए भी कई बार संघर्ष किया है। 

पोप फ्रांसिस ने मानवता के कल्याण और दुनिया में शांति, समानता, और न्याय की स्थापना के लिए कई कदम उठाए हैं। उनका विनम्रता, सहिष्णुता, और दया का संदेश न केवल कैथोलिक चर्च तक सीमित है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणा है। उनकी कोशिशें मानवता को एक साथ लाने और दुनिया को एक बेहतर स्थान बनाने की दिशा में निरंतर जारी हैं। (लेखक रांची महाधर्मप्रांत हैं और ये उनके निजी विचार हैं।) 

Published / 2025-04-19 23:01:53
ख्रीस्तियों का पवित्र पर्व है पास्का

सुश्री अनिमा टोप्पो 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। ख्रीस्तियों के लिए पास्का का पर्व एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं पवित्र पर्व है। जो प्रभु येशु के पुनरुत्थान का उत्सव मनाता है। यह दिव्या उत्सव हमें प्रेम, आशा, बलिदान और नवजीवन का संदेश देता है। 

क्रूस पर उनके बलिदान और तीसरे दिन उनका पुनर्जीवित होना, समस्त मानव के लिए उद्वार का प्रतीक है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अंधकार के बाद प्रकाश आवश्यक आता है और प्रत्येक संघर्ष के बाद एक नई शुरुआत होती है। 

पास्का का यह पावन पर्व हम विश्वासियों के जीवन में प्रेम, विश्वास आशा का प्रकाश लाये। जिससे कि सभी खीस्त भाई -बहन अपने जीवन की कठिनाइयों पर विश्वास और प्रेम से विजय पा सके। प्रभु का पुनरुत्थान सभी खीस्त विश्वासियों में नया उत्साह, शांति, आद्यात्मिक जागृति लाये। (लेखिका प्रभात तारा स्कूल, धुर्वा, रांची की शिक्षिका हैं।)

Published / 2025-04-17 21:26:10
स्वामी अद्वैतानंद की तपस्थली रोहतास किला के समीप जोगिया मान गुफा का विकास हो : स्वामी जी

मुरलीधर 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत धम की भूमि है और यही धर्म और भक्ति देश की श्रेष्ठ सांस्कृतिक परम्परा है। आधुनिक काल में जिस प्रकार गुरु भक्ति की परंपरा आज भी देश में जीवित है उससे हमारी पांच हजार साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति की महानता प्रगट होती है। दुनिया के अनेक सभ्यता रोम, यूनान आदि नष्ट हो गयी लेकिन भारत भूमि संत मनीषियों के तप और मार्गदर्शन के कारण आज भी विश्व में श्रेष्ठ है। ऐसे ही एक श्रेष्ठ परम्परा के वाहक स्वामी अद्धैतानंदजी महाराज ने जो भक्ति का संदेश और परम्परा कायम किया वह आज भी श्रेष्ठ है।  

ज्ञान की श्रेष्ठ परम्परा को स्वामी जी ने अपनी जिंदगी में उतारकर प्रकट किया। स्वामी सत्यानंदजी परमहंस ने बताया कि ब्रम्ह विद्यालय आश्रम की लीलारी कुटी जो रोहतास जिले में है, वहां से यह गुफा 60 किलोमीटरकी कदूरी पर है। यहां जाने के लिये कोई नियमित बस या कोई दूसरी सुविधा नहीं है।  

इस संबंध में लेखक सह वरीय अधिवक्ता अवध बिहारी मितवा ने विशेष भेंट में बताया कि  रामनवमी के शुभ अवसर पर रोहतास गढ़ी पहाड़ी जंगल में स्थित जोगिया मान गुफा पवित्र स्थली पर भक्तों ने परमहंस दयाल स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज की जयंती धूमधाम से मनाई और पाठ आरती पूजन अर्चन किया। यों तो परमहंस दयाल जी की जयंती रामनवमी को देश विदेश में मनाई ही जाती है किंतु इस पवित्र गुफा पर यह प्रथम उत्सव है, जो सौभाग्यदाई और ऐतिहासिक है। 

दुर्गम मार्ग और जटिल लोकेशन वाला यह कार्यक्रम राजपुर के स्वामी जी महाराज की आज्ञा व कृपा से ही संभव हुआ है। इस प्रोग्राम में अवधविहारी मितवा, सुनील कु. सिंह, मनोज वर्मा ,गप्पू स्वर्णकार, मोहन प्रसाद, शुभम सिंह निवासी बलिया, उ.प्र. तथा ओमप्रकाश, मनोज कुमार निवासी लिलारी रोहतास बिहार एवं पृथवी उराव आदि स्थानीय भक्तगण शामिल हुए। 

वहां जाने के लिये एक रास्ता अकबरपुर से जाता है। यह स्थल स्वामी परमहंस दयाल जी महाराज के जीवन में महत्वपूर्ण स्थलों में एक है। इस स्थान पर अभी गुफा के पास रहने वाले लोग पूजा पाठ करते हैं। इसके विकास के लिए ब्रह्म विद्यालय आश्रम सजग और सक्रिय है। आज जिस प्रकार देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों का विकास हो रहा है उसमें जोगिया मान गुफा का विकास भी देश के अध्यात्मिक उन्नति के लिये अनिवार्य है।  

लेखक सह वकील अवध बिहारी मितवा ने बताया कि स्वामी सत्यानंदजी परमहंस की आज्ञा से रामनवमी के दिन मैं और मेरे कई मित्र इस गुफा में पहुंचे। रामनवमी के पुनीत अवसर पर जिस दिन स्वामी अद्वैतानंदजी महाराज का जन्म छपरा में हुआ था उसी दिन हम सब उनके तपोस्थली रोहतास के पहाड़ों के बीच स्थित तपोभूमि में पहुंचे। वहां हमने स्वामी जी के आदेश पर अदैतानंदजी महाराज की आरती की और उपस्थित लोगों के बीच प्रसाद का वितरण किया। 

श्री मितवा ने बताया कि जब वे गुफा में पहुंचे तो रोमांच से भर उठे। उन्हें अलौकिक अनुभव हुआ। श्री मितवा ब्रम्ह विदयालय आश्रम में स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज जिन्हें परमहंस दयाल के नाम से भी जाना जाता है उनके जीवन पर आधारित नाट्य के मंचन का अवसर भी मिलता है। वे परमहंस दयाल जी के जीवन पर अध्ययन भी करते हैं और उनकी तपोस्थली पर पहुंचने का अध्यात्मिक गौरव भी स्वामी जी के आर्शिवाद से प्राप्त हुआ। वे आने वाले समय में भी आश्रम के आदेश के अनुसार उस गुफा के विकास के लिए जो जबावदेही दी जायेगी वैसा काम करेंगे। 

निश्चित ही महान संत अदैतानंदजी महाराज के जीवन और उनसे जुड़े स्थानों में छपरा के साथ रोहतास का जोगिया मान गुफा का विकास भी उस परमपूज्य अनुकरणीय संत की प्रेरणा पाने का माध्यम बने यह भारतीय समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। गुरु से ज्ञान और ज्ञान से भक्ति की अकाट्य सिद्धांत और परम्परा के वाहक स्वामी परमहंस दयाल की भक्ति धारा को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान स्वामी सत्यांनदजी परमहंस विगत तीन दशकों से पूरे देश में एक दिन के भी विश्राम के बिना भक्तों को ज्ञान और भक्ति का संदेश दे रहे हैं।  

स्वामी जी अभी रांची के बसारगढ़ स्थित ब्रह्म विद्यालय आश्रम में सुबह दस से और शाम छह बजे से प्रतिदिन दो घंटै ज्ञान और भक्ति की गंगा अविरल प्रवाहित कर रहें हैं। 21 अपै्रल तक स्वामी जी रांची में प्रवास करेंगे। 22 को प्रात: गया के लिए प्रस्थान कर जायेंगे। आज भी सैकड़ों सन्यासी स्वामी के मार्गदर्शन में तत्वज्ञान की विशुद्ध शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

Published / 2025-04-13 21:15:25
खजूर रविवार : विनम्रता और आशा का प्रतीक

फा. सुशील टोप्पो 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। खजूर रविवार, जिसे पाम संडे भी कहा जाता है, ख्रीस्तीय समुदाय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन पवित्र सप्ताह—या जिसे पुण्य सप्ताह कहा जाता है—की शुरुआत होती है। यह ईस्टर या पास्का रविवार से ठीक पहले आता है। यह दिन उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति में मनाया जाता है जब प्रभु यीशु मसीह येरूशलम नगर में एक विनम्र राजा के रूप में प्रवेश करते हैं।

बाइबिल के अनुसार, जब यीशु येरूशलम पहुंचे, तो वहां के लोगों ने उनका स्वागत राजाओं की भांति किया—अपने वस्त्र बिछाकर और खजूर की डालियां लहराकर। यह दृश्य एक ओर उनके सम्मान और आदर का प्रतीक था, तो दूसरी ओर उनके विनम्र, शांतिपूर्ण स्वभाव का भी प्रतिबिंब था। 

इस दिन को दु:ख का रविवार भी कहा जाता है, क्योंकि यही वह समय है जब यीशु अपने दु:खभोग और मरण की ओर अग्रसर होते हैं। येसु के दुखभोग गाथा को सुनाया और मनन चिंतन किया जाता है। यह दिन उनके बलिदान के माध्यम से मानवता के उद्धार की शुरूआत भी दर्शाता है। 

चर्चों में इस दिन विशेष प्रार्थनाएं, मिस्सा, और खजूर की डालियों के साथ जुलूस का आयोजन होता है। चर्च के अंदर और बाहर खजूर की डालियों से सजावट की जाती है, और विश्वासी यीशु के आगमन की खुशी में गीत गाते हैं। इन डालियों का प्रयोग यीशु को एक युद्ध-वीर राजा नहीं, बल्कि शांति के दूत के रूप में स्वागत करने हेतु किया जाता है। 

यह दिन न केवल धार्मिक परंपरा का निर्वहन है, बल्कि आत्मचिंतन और आत्म-मंथन का भी अवसर है। ख्रीस्त अनुयायी इस दिन यीशु के त्याग, प्रेम, और उनके द्वारा दिए गए उद्धार के संदेश पर मनन करते हैं। 

अत:, खजूर रविवार का मूल संदेश है — विनम्रता, शांति और आशा। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सच्चा नेतृत्व सेवा और करुणा में निहित होता है, और सच्चा उद्धार बलिदान से प्राप्त होता है। खजूर रविवार न केवल एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति है, बल्कि यह हमारे जीवन में आध्यात्मिक नवीनीकरण का आह्वान भी है।  (लेखक रांची के महाधर्मप्रांत हैं।)

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